Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 167

इन्द्र का पाण्डवों के पास आगमन

भोर होने पर अर्जुन अपने भाइयों के साथ युधिष्ठिर को प्रणाम करते हैं, और देवताओं के बाजों की ध्वनि के बीच मरुद्गणों, गन्धर्वों और अप्सराओं के साथ इन्द्र आकाश से उतरते हैं। युधिष्ठिर उनका पूजन करते हैं और देवराज के पास विनीत भाव से खड़े अर्जुन को देखकर आनन्दित होते हैं। इन्द्र भविष्यवाणी करते हैं कि युधिष्ठिर पृथ्वी पर शासन करेंगे, उन्हें काम्यक लौटने को कहते हैं और घोषणा करते हैं कि तीनों लोक भी अर्जुन को नहीं जीत सकते; फिर वे स्वर्ग लौट जाते हैं। अध्याय इस समागम के पाठ के पुण्य के साथ समाप्त होता है।

अध्याय 166अध्याय-सूचीअध्याय 168

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.167.1)

ततो रजन्यां व्युष्टायां धर्मराजं युधिष्ठिरम् । भ्रातृभिः सहितः सर्वैरवन्दत धनंजयः ॥

tato rajanyāṃ vyuṣṭāyāṃ dharmarājaṃ yudhiṣṭhiram | bhrātṛbhiḥ sahitaḥ sarvairavandata dhanaṃjayaḥ

फिर रात बीतने पर धनंजय ने अपने सब भाइयों के साथ धर्मराज युधिष्ठिर को प्रणाम किया।

श्लोक 2 (3.167.2)

एतस्मिन्नेव काले तु सर्ववादित्रनिःस्वनः । बभूव तुमुलः शब्दस्त्वन्तरिक्षे दिवौकसाम् ॥

etasminneva kāle tu sarvavāditraniḥsvanaḥ | babhūva tumulaḥ śabdastvantarikṣe divaukasām

उसी समय आकाश में स्वर्गवासी देवताओं के सब प्रकार के बाजों का तुमुल शब्द होने लगा।

श्लोक 3 (3.167.3)

रथनेमिस्वनश्चैव घण्टाशब्दश्च भारत । पृथग्व्यालमृगाणां च पक्षिणां चैव सर्वशः ॥

rathanemisvanaścaiva ghaṇṭāśabdaśca bhārata | pṛthagvyālamṛgāṇāṃ ca pakṣiṇāṃ caiva sarvaśaḥ

हे भारत, रथ के पहियों की घरघराहट, घण्टों का नाद, और हिंस्र पशुओं तथा सब प्रकार के पक्षियों के अलग-अलग स्वर सुनाई देने लगे।

श्लोक 4 (3.167.4)

रवोन्मुखास्ते ददृशुः प्रीयमाणाः कुरूद्वह । मरुद्भिरन्वितं शक्रमापतन्तं विहायसा ॥

ravonmukhāste dadṛśuḥ prīyamāṇāḥ kurūdvaha | marudbhiranvitaṃ śakramāpatantaṃ vihāyasā

हे कुरुश्रेष्ठ, उस ध्वनि की ओर मुँह करके उन्होंने प्रसन्नता से देखा कि मरुद्गणों के साथ इन्द्र आकाश से उतर रहे हैं।

श्लोक 5 (3.167.5)

ते समन्तादनुययुर्गन्धर्वाप्सरसस्तथा । विमानैः सूर्यसंकाशैर्देवराजमरिंदमम् ॥

te samantādanuyayurgandharvāpsarasastathā | vimānaiḥ sūryasaṃkāśairdevarājamariṃdamam

गन्धर्व और अप्सराएँ सूर्य के समान चमकते विमानों में सवार होकर चारों ओर से शत्रुदमन देवराज के पीछे-पीछे चल रहे थे।

श्लोक 6 (3.167.6)

ततः स हरिभिर्युक्तं जाम्बूनदपरिष्कृतम् । मेघनादिनमारुह्य श्रिया परमया ज्वलन् ॥

tataḥ sa haribhiryuktaṃ jāmbūnadapariṣkṛtam | meghanādinamāruhya śriyā paramayā jvalan

फिर हरित अश्वों से जुते, स्वर्ण से सजे और मेघ के समान गर्जन करने वाले रथ पर सवार होकर परम श्री से दमकते हुए

श्लोक 7 (3.167.7)

पार्थानभ्याजगामाशु देवराजः पुरंदरः । आगत्य च सहस्राक्षो रथादवरुरोह वै ॥

pārthānabhyājagāmāśu devarājaḥ puraṃdaraḥ | āgatya ca sahasrākṣo rathādavaruroha vai

देवराज पुरन्दर शीघ्र ही पार्थों के पास आ पहुँचे; और आकर सहस्राक्ष इन्द्र रथ से उतर गए।

श्लोक 8 (3.167.8)

तं दृष्ट्वैव महात्मानं धर्मराजो युधिष्ठिरः । भ्रातृभिः सहितः श्रीमान्देवराजमुपागमत् ॥

taṃ dṛṣṭvaiva mahātmānaṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | bhrātṛbhiḥ sahitaḥ śrīmāndevarājamupāgamat

उन महात्मा देवराज को देखते ही श्रीमान् धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ उनके पास गए

श्लोक 9 (3.167.9)

पूजयामास चैवाथ विधिवद्भूरिदक्षिणः । यथार्हममितात्मानं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥

pūjayāmāsa caivātha vidhivadbhūridakṣiṇaḥ | yathārhamamitātmānaṃ vidhidṛṣṭena karmaṇā

और बहुत दक्षिणा देने वाले युधिष्ठिर ने उन अमित बुद्धि वाले देवराज का विधिपूर्वक, यथायोग्य, शास्त्रोक्त कर्म से पूजन किया।

श्लोक 10 (3.167.10)

धनंजयश्च तेजस्वी प्रणिपत्य पुरंदरम् । भृत्यवत्प्रणतस्तस्थौ देवराजसमीपतः ॥

dhanaṃjayaśca tejasvī praṇipatya puraṃdaram | bhṛtyavatpraṇatastasthau devarājasamīpataḥ

तेजस्वी धनंजय पुरन्दर को प्रणाम करके सेवक की भाँति विनीत भाव से देवराज के पास खड़े रहे।

श्लोक 11 (3.167.11)

आघ्राय तं महातेजाः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । धनंजयमभिप्रेक्ष्य विनीतं स्थितमन्तिके ॥

āghrāya taṃ mahātejāḥ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | dhanaṃjayamabhiprekṣya vinītaṃ sthitamantike

महातेजस्वी कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने पास में विनीत भाव से खड़े धनंजय को देखकर स्नेह से उनका सिर सूँघा।

श्लोक 12 (3.167.12)

जटिलं देवराजस्य तपोयुक्तमकल्मषम् । हर्षेण महताऽऽविष्टः फल्गुनस्याथ दर्शनात् । बभूव परमप्रीतो देवराजं च पूजयन् ॥

jaṭilaṃ devarājasya tapoyuktamakalmaṣam | harṣeṇa mahatā''viṣṭaḥ phalgunasyātha darśanāt | babhūva paramaprīto devarājaṃ ca pūjayan

देवराज के समीप खड़े उन जटाधारी, तपस्वी और निष्कलंक फाल्गुन को देखकर युधिष्ठिर महान् हर्ष में डूब गए; वे अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने देवराज का पूजन किया।

श्लोक 13 (3.167.13)

तं तथाऽदीनमनसं राजानं हर्षसंप्लुतम् । उवाच वचनं धीमान्धर्मराजं पुरंदरः ॥

taṃ tathā'dīnamanasaṃ rājānaṃ harṣasaṃplutam | uvāca vacanaṃ dhīmāndharmarājaṃ puraṃdaraḥ

उदार चित्त वाले और हर्ष से भरे उन धर्मराज से बुद्धिमान पुरन्दर ने यह वचन कहा —

इन्द्र उवाच

श्लोक 14 (3.167.14)

त्वमिमां पृथिवीं राजन्प्रशासिष्यसि पाण्डव । स्वस्ति प्राप्नुहि कौन्तेय काम्यकं पुनराश्रमम् ॥

tvamimāṃ pṛthivīṃ rājanpraśāsiṣyasi pāṇḍava | svasti prāpnuhi kaunteya kāmyakaṃ punarāśramam

"हे राजन्, हे पाण्डुनन्दन, तुम इस पृथ्वी का शासन करोगे। हे कुन्तीपुत्र, तुम्हारा कल्याण हो; अब फिर काम्यक आश्रम को लौट जाओ।

श्लोक 15 (3.167.15)

अस्त्राणि लब्धानि च पाण्डवेन । सर्वाणि मत्तः प्रयतेन राजन् । कृतप्रियश्चास्मि धनंजयेन । जेतुं न शक्यस्त्रिभिरेष लोकैः ॥

astrāṇi labdhāni ca pāṇḍavena | sarvāṇi mattaḥ prayatena rājan | kṛtapriyaścāsmi dhanaṃjayena | jetuṃ na śakyastribhireṣa lokaiḥ

"हे राजन्, संयमी पाण्डुपुत्र अर्जुन ने मुझसे सब अस्त्र प्राप्त कर लिए हैं। धनंजय ने मेरा प्रिय कार्य किया है; तीनों लोक मिलकर भी इसे जीत नहीं सकते।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (3.167.16)

एवमुक्त्वा सहस्राक्षः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । जगाम त्रिदिवं हृष्टः स्तूयमानो महर्षिभिः ॥

evamuktvā sahasrākṣaḥ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | jagāma tridivaṃ hṛṣṭaḥ stūyamāno maharṣibhiḥ

कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर से ऐसा कहकर सहस्राक्ष इन्द्र प्रसन्न होकर, महर्षियों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, स्वर्ग को चले गए।

श्लोक 17 (3.167.17)

धनेश्वरगृहस्थानां पाण्डवानां समागमम् । शक्रेण य इदं विद्वानधीयीत समाहितः ॥

dhaneśvaragṛhasthānāṃ pāṇḍavānāṃ samāgamam | śakreṇa ya idaṃ vidvānadhīyīta samāhitaḥ

जो विद्वान् कुबेर के निवास में रहते हुए पाण्डवों के इन्द्र के साथ हुए इस समागम के वृत्तान्त का एकाग्र होकर अध्ययन करे,

श्लोक 18 (3.167.18)

संवत्सरं ब्रह्मचारी नियतः संशितव्रतः । स जीवेद्धि निराबाधः सुसुखी शरदां शतम् ॥

saṃvatsaraṃ brahmacārī niyataḥ saṃśitavrataḥ | sa jīveddhi nirābādhaḥ susukhī śaradāṃ śatam

और एक वर्ष तक संयम और दृढ़ व्रत के साथ ब्रह्मचर्य का पालन करे, वह सब बाधाओं से मुक्त होकर अत्यन्त सुखपूर्वक सौ वर्ष तक जीता है।

अध्याय 166अध्याय-सूचीअध्याय 168