आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 168
किरात से युद्ध और पाशुपत अस्त्र की प्राप्ति का अर्जुन द्वारा वर्णन
इन्द्र के लौट जाने पर अर्जुन युधिष्ठिर का अभिवादन करते हैं, और युधिष्ठिर उनसे पूछते हैं कि स्वर्ग में उनका समय कैसे बीता और अस्त्र कैसे मिले। अर्जुन हिमालय पर अपनी महीनों की तपस्या, सूअर और उस पर अपना दावा करने वाले विशाल किरात, तथा उस लम्बे युद्ध का वर्णन करते हैं जिसमें किरात ने ब्रह्मास्त्र सहित उनके छोड़े हर अस्त्र को निगल लिया और अन्त में बाहुयुद्ध में उन्हें धरती पर गिरा दिया। तब शिव ने अपना स्वरूप प्रकट किया, अर्जुन का धनुष और तरकस लौटाया और उन्हें पाशुपत अस्त्र दिया, इस चेतावनी के साथ कि इसका प्रयोग मनुष्यों पर न करें, केवल घोर संकट में या दूसरे अस्त्रों के निवारण के लिए करें।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.168.1)
यथागतं गते शक्रे भ्रातृभिः सह संगतः । कृष्णया चैव बीभत्सुर्धर्मराजमपूजयत् ॥
yathāgataṃ gate śakre bhrātṛbhiḥ saha saṃgataḥ | kṛṣṇayā caiva bībhatsurdharmarājamapūjayat
जब इन्द्र जैसे आए थे वैसे ही लौट गए, तब भाइयों और कृष्णा (द्रौपदी) से मिलकर बीभत्सु (अर्जुन) ने धर्मराज युधिष्ठिर का सत्कारपूर्वक अभिवादन किया।
श्लोक 2 (3.168.2)
अभिवादयमानं तं मूर्ध्न्युपाघ्राय पाण्डवम् । हर्षगद्गदया वाचा प्रहृष्टोऽर्जुनमब्रवीत् ॥
abhivādayamānaṃ taṃ mūrdhnyupāghrāya pāṇḍavam | harṣagadgadayā vācā prahṛṣṭo'rjunamabravīt
प्रणाम करते हुए पाण्डुपुत्र अर्जुन का सिर सूँघकर अत्यन्त हर्षित युधिष्ठिर ने आनन्द से गद्गद वाणी में अर्जुन से कहा—
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 3 (3.168.3)
कथमर्जुन कालोऽयं स्वर्गे व्यतिगतस्तव । कथं चास्त्राण्यवाप्तानि देवराजश्च तोषितः ॥
kathamarjuna kālo'yaṃ svarge vyatigatastava | kathaṃ cāstrāṇyavāptāni devarājaśca toṣitaḥ
"अर्जुन, स्वर्ग में तुम्हारा यह समय कैसे बीता? तुमने अस्त्र कैसे प्राप्त किए और देवराज को कैसे संतुष्ट किया?
श्लोक 4 (3.168.4)
सम्यग्वा ते गृहीतानि कच्चिदस्त्राणि पाण्डव । कच्चित्सुराधिपः प्रीतो रुद्रश्चास्त्राण्यदात्तव ॥
samyagvā te gṛhītāni kaccidastrāṇi pāṇḍava | kaccitsurādhipaḥ prīto rudraścāstrāṇyadāttava
पाण्डव, क्या तुमने अस्त्र भली-भाँति ग्रहण कर लिए? क्या सुरराज तुमसे प्रसन्न हुए, और क्या रुद्र ने तुम्हें अस्त्र दिए?
श्लोक 5 (3.168.5)
यथा दृष्टश्च ते शक्रो भगवान्वा पिनाकधृत् । यथैवास्त्राण्यवाप्तानि यथैवाराधिताश्च ते ॥
yathā dṛṣṭaśca te śakro bhagavānvā pinākadhṛt | yathaivāstrāṇyavāptāni yathaivārādhitāśca te
तुमने इन्द्र को या पिनाकधारी भगवान् शिव को कैसे देखा, अस्त्र कैसे पाए और उनकी आराधना कैसे की—यह बताओ।
श्लोक 6 (3.168.6)
यथोक्तवांस्त्वां भगवाञ्शतक्रतुररिंदम । कृतप्रियस्त्वयाऽस्मीति तस्य ते किं प्रियं कृतम् ॥
yathoktavāṃstvāṃ bhagavāñśatakraturariṃdama | kṛtapriyastvayā'smīti tasya te kiṃ priyaṃ kṛtam
हे शत्रुदमन, भगवान् शतक्रतु (इन्द्र) ने तुमसे कहा था कि "तुमने मेरा प्रिय कार्य किया है।" तुमने उनका कौन-सा प्रिय कार्य किया?
श्लोक 7 (3.168.7)
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महाद्युते । यथा तुष्टो महादेवो देवराजस्तथाऽनघ ॥
etadicchāmyahaṃ śrotuṃ vistareṇa mahādyute | yathā tuṣṭo mahādevo devarājastathā'nagha
हे महातेजस्वी, निष्पाप अर्जुन, मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ कि महादेव कैसे संतुष्ट हुए और उसी प्रकार देवराज भी कैसे प्रसन्न हुए;
श्लोक 8 (3.168.8)
यच्चापि वज्रपाणेस्तु प्रियं कृतमरिंदम । एतदाख्याहि मे सर्वमखिलेन धनंजय ॥
yaccāpi vajrapāṇestu priyaṃ kṛtamariṃdama | etadākhyāhi me sarvamakhilena dhanaṃjaya
और हे अरिंदम, वज्रधारी इन्द्र का तुमने कौन-सा प्रिय कार्य किया। धनंजय, यह सब मुझे पूरा-पूरा बताओ।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 9 (3.168.9)
शृणु हन्त महाराज विधिना येन दृष्टवान् । शतक्रतुमहं देवं भगवन्तं च शंकरम् ॥
śṛṇu hanta mahārāja vidhinā yena dṛṣṭavān | śatakratumahaṃ devaṃ bhagavantaṃ ca śaṃkaram
महाराज, सुनिए कि किस प्रकार मैंने देव शतक्रतु (इन्द्र) और भगवान् शंकर के दर्शन किए।
श्लोक 10 (3.168.10)
विद्यामधीत्य तां राजंस्त्वयोक्तामरिमर्दन । भवता च समादिष्टस्तपसे प्रस्थितो वनम् ॥
vidyāmadhītya tāṃ rājaṃstvayoktāmarimardana | bhavatā ca samādiṣṭastapase prasthito vanam
हे शत्रुमर्दन राजन्, आपकी बताई हुई वह विद्या सीखकर और आपकी आज्ञा पाकर मैं तपस्या के लिए वन को चल पड़ा।
श्लोक 11 (3.168.11)
भृगुतुङ्गमथो गत्वा काम्यकादास्थितस्तपः । एकरात्रोषितः कंचिदपश्यं ब्राह्मणं पथि ॥
bhṛgutuṅgamatho gatvā kāmyakādāsthitastapaḥ | ekarātroṣitaḥ kaṃcidapaśyaṃ brāhmaṇaṃ pathi
काम्यक वन से भृगुतुंग पर्वत पर जाकर मैंने तप आरम्भ किया। वहाँ एक रात रहने के बाद मार्ग में मुझे एक ब्राह्मण दिखाई दिए।
श्लोक 12 (3.168.12)
स मामपृच्छत्कौन्तेय क्वासि गन्ता ब्रवीहि मे । तस्मा अवितथं सर्वमब्रवं कुरुनन्दन ॥
sa māmapṛcchatkaunteya kvāsi gantā bravīhi me | tasmā avitathaṃ sarvamabravaṃ kurunandana
उन्होंने मुझसे पूछा—"कुन्तीनन्दन, तुम कहाँ जा रहे हो? मुझे बताओ।" हे कुरुनन्दन, मैंने उन्हें सब कुछ सच-सच बता दिया।
श्लोक 13 (3.168.13)
स तथ्यं मम तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणो राजसत्तम । अपूजयत मां राजन्प्रीतिमांश्चाभवन्मयि ॥
sa tathyaṃ mama tacchrutvā brāhmaṇo rājasattama | apūjayata māṃ rājanprītimāṃścābhavanmayi
हे राजश्रेष्ठ, मेरी वह सच्ची बात सुनकर ब्राह्मण ने मेरा सम्मान किया, और राजन्, वे मुझ पर प्रसन्न हो गए।
श्लोक 14 (3.168.14)
ततो मामब्रवीत्प्रीतस्तप आतिष्ठ भारत । तपस्वी नचिरेण त्वं द्रक्ष्यसे विबुधाधिपम् ॥
tato māmabravītprītastapa ātiṣṭha bhārata | tapasvī nacireṇa tvaṃ drakṣyase vibudhādhipam
तब प्रसन्न होकर उन्होंने मुझसे कहा—"भारत, तप करो। तपस्वी होकर तुम शीघ्र ही देवताओं के स्वामी के दर्शन करोगे।"
श्लोक 15 (3.168.15)
ततोऽहं वचनात्तस्य गिरिमारुह्य शैशिरम् । तपोऽतप्यं महाराज मासं मूलफलाशनः ॥
tato'haṃ vacanāttasya girimāruhya śaiśiram | tapo'tapyaṃ mahārāja māsaṃ mūlaphalāśanaḥ
तब उनके कहने पर मैं हिमाच्छादित पर्वत पर चढ़ गया और महाराज, एक मास तक कन्द-मूल-फल खाकर तप करता रहा।
श्लोक 16 (3.168.16)
द्वितीयश्चापि मे मासो जलं भक्षयतो गतः । निराहारस्तृतीयेऽथ मासे पाण्डवनन्दन ॥
dvitīyaścāpi me māso jalaṃ bhakṣayato gataḥ | nirāhārastṛtīye'tha māse pāṇḍavanandana
दूसरा मास केवल जल पीकर बीता; और हे पाण्डवनन्दन, तीसरे मास में मैंने कुछ भी आहार नहीं लिया।
श्लोक 17 (3.168.17)
ऊर्ध्वबाहुश्चतुर्थं तु मासमस्मि स्थितस्तदा । न च मे हीयते प्राणस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥
ūrdhvabāhuścaturthaṃ tu māsamasmi sthitastadā | na ca me hīyate prāṇastadadbhutamivābhavat
चौथे मास मैं भुजाएँ ऊपर उठाए खड़ा रहा। फिर भी मेरा बल क्षीण नहीं हुआ—यह एक आश्चर्य-सा था।
श्लोक 18 (3.168.18)
पञ्चमे त्वथ संप्राप्ते प्रथमे दिवसे गते । वराहसंस्थितं भूतं मत्समीपं समागमत् ॥
pañcame tvatha saṃprāpte prathame divase gate | varāhasaṃsthitaṃ bhūtaṃ matsamīpaṃ samāgamat
पाँचवाँ मास आने पर, जब उसका पहला दिन बीत गया, तब सूअर के आकार का एक प्राणी मेरे पास आया।
श्लोक 19 (3.168.19)
निघ्नन्प्रोथेन पृथिवीं विलिखंश्चरणैरपि । संमार्जञ्जठरेणोर्वीं विवर्तंश्च मुहुर्मुहुः ॥
nighnanprothena pṛthivīṃ vilikhaṃścaraṇairapi | saṃmārjañjaṭhareṇorvīṃ vivartaṃśca muhurmuhuḥ
वह थूथन से धरती पर प्रहार करता, पैरों से उसे कुरेदता, पेट से भूमि को रगड़ता और बार-बार इधर-उधर लोटता था।
श्लोक 20 (3.168.20)
अनु तस्यापरं भूतं महत्कैरातसंस्थितम् । धनुर्बाणासिमत्प्राप्तं स्त्रीगणानुगतं तदा ॥
anu tasyāparaṃ bhūtaṃ mahatkairātasaṃsthitam | dhanurbāṇāsimatprāptaṃ strīgaṇānugataṃ tadā
उसके पीछे किरात (पहाड़ी शिकारी) का रूप धारण किए एक दूसरा विशाल प्राणी आया, जो धनुष, बाण और तलवार लिए था और जिसके पीछे स्त्रियों का समूह चल रहा था।
श्लोक 21 (3.168.21)
ततोऽहं धनुरादाय तथाऽक्षय्ये महेषुधी । अताडयं शरेणाथ तद्भूतं रोमहर्षणम् ॥
tato'haṃ dhanurādāya tathā'kṣayye maheṣudhī | atāḍayaṃ śareṇātha tadbhūtaṃ romaharṣaṇam
तब मैंने अपना धनुष और दो विशाल अक्षय तरकस लेकर उस रोंगटे खड़े कर देने वाले प्राणी पर बाण चलाया।
श्लोक 22 (3.168.22)
युगपत्तं किरातस्तु विकृष्य बलवद्धनुः । अभ्याजघ्ने दृढतरं कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥
yugapattaṃ kirātastu vikṛṣya balavaddhanuḥ | abhyājaghne dṛḍhataraṃ kampayanniva medinīm
उसी क्षण किरात ने भी अपना प्रबल धनुष खींचकर उसे और भी कसकर बेधा, मानो पृथ्वी को कँपा रहा हो।
श्लोक 23 (3.168.23)
स तु मामब्रवीद्राजन्मम पूर्वपरिग्रहः । मृगयाधर्ममुत्सृज्य किमर्थं ताडितस्त्वया ॥
sa tu māmabravīdrājanmama pūrvaparigrahaḥ | mṛgayādharmamutsṛjya kimarthaṃ tāḍitastvayā
राजन्, फिर वह मुझसे बोला—"यह पहले से मेरा लक्ष्य था। शिकार के नियम को छोड़कर तुमने इसे क्यों मारा?
श्लोक 24 (3.168.24)
एष ते निशितैर्बाणैर्दर्पं हन्मि स्थिरो भव । संघर्षवान्महाकायस्ततो मामभ्यधावत ॥
eṣa te niśitairbāṇairdarpaṃ hanmi sthiro bhava | saṃgharṣavānmahākāyastato māmabhyadhāvata
अपने इन तीखे बाणों से मैं तुम्हारा घमण्ड चूर करता हूँ, डटे रहो!" यह कहकर वह स्पर्धा से भरा विशालकाय प्राणी मुझ पर टूट पड़ा।
श्लोक 25 (3.168.25)
ततो गिरिमिवात्यर्थमावृणोन्मां महाशरैः । तं चाहं शरवर्षेण महता समवाकिरम् ॥
tato girimivātyarthamāvṛṇonmāṃ mahāśaraiḥ | taṃ cāhaṃ śaravarṣeṇa mahatā samavākiram
फिर उसने बड़े-बड़े बाणों से मुझे ऐसे ढक दिया जैसे कोई पर्वत को ढक दे, और मैंने भी बाणों की भारी वर्षा से उसे आच्छादित कर दिया।
श्लोक 26 (3.168.26)
ततः शरैर्दीप्तमुखैर्यन्त्रितैरनु यन्त्रितैः । प्रत्यविध्यमहं तं तु वज्रैरिव शिलोच्चयम् ॥
tataḥ śarairdīptamukhairyantritairanu yantritaiḥ | pratyavidhyamahaṃ taṃ tu vajrairiva śiloccayam
तब मैंने प्रज्वलित नोकों वाले, बार-बार पूरी शक्ति से खींचकर छोड़े गए बाणों से उसे वैसे ही बेधा जैसे वज्र पर्वत को बेधते हैं।
श्लोक 27 (3.168.27)
तस्य तच्छतधा रूपमभवच्च सहस्रधा । तानि चास्य शरीराणि शरैरहमताडयम् ॥
tasya tacchatadhā rūpamabhavacca sahasradhā | tāni cāsya śarīrāṇi śarairahamatāḍayam
उसका वह रूप सौ गुना, फिर हज़ार गुना हो गया, और मैंने उसके उन सभी शरीरों पर बाणों से प्रहार किया।
श्लोक 28 (3.168.28)
पुनस्तानि शरीराणि एकीभूतानि भारत । अदृश्यन्त महाराज तान्यहं व्यधमं पुनः ॥
punastāni śarīrāṇi ekībhūtāni bhārata | adṛśyanta mahārāja tānyahaṃ vyadhamaṃ punaḥ
भारत, महाराज, फिर वे सब शरीर एक हुए दिखाई दिए, और मैंने उन्हें फिर से छिन्न-भिन्न किया।
श्लोक 29 (3.168.29)
अणुर्बृहच्छिरा भूत्वा बृहच्चाणुशिराः पुनः । एकीभूतस्तदा राजन्सोऽभ्यवर्तत मां युधि ॥
aṇurbṛhacchirā bhūtvā bṛhaccāṇuśirāḥ punaḥ | ekībhūtastadā rājanso'bhyavartata māṃ yudhi
राजन्, वह कभी छोटे शरीर और बड़े सिर वाला, फिर बड़े शरीर और छोटे सिर वाला बनकर, फिर एक होकर युद्ध में मुझ पर टूट पड़ा।
श्लोक 30 (3.168.30)
यदाऽभिभवितुं बाणैर्न च शक्नोमि तं रणे । ततो महास्त्रमातिष्ठं वायव्यं भरतर्षभ ॥
yadā'bhibhavituṃ bāṇairna ca śaknomi taṃ raṇe | tato mahāstramātiṣṭhaṃ vāyavyaṃ bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, जब मैं रण में बाणों से उसे परास्त न कर सका, तब मैंने महान् वायव्य अस्त्र का सहारा लिया।
श्लोक 31 (3.168.31)
न चैनमशकं हन्तुं तदद्भुतमिवाभवत् । तस्मिन्प्रतिहते चास्त्रे विस्मयो मे महानभूत् ॥
na cainamaśakaṃ hantuṃ tadadbhutamivābhavat | tasminpratihate cāstre vismayo me mahānabhūt
फिर भी मैं उसे मार न सका—यह आश्चर्य-सा था। उस अस्त्र के निष्फल हो जाने पर मुझे बड़ा विस्मय हुआ।
श्लोक 32 (3.168.32)
तत्रापि च महाराज सविशेषमहं ततः । अस्त्रपूगेन महता रणे भूतमवाकिरम् ॥
tatrāpi ca mahārāja saviśeṣamahaṃ tataḥ | astrapūgena mahatā raṇe bhūtamavākiram
महाराज, तब भी मैंने और अधिक बल लगाकर युद्ध में उस प्राणी को अस्त्रों की भारी झड़ी से ढक दिया।
श्लोक 33 (3.168.33)
स्थूणाकर्णमथो जालं शरवर्षं शरोल्वणम् । शलभास्त्रमश्मवर्षं समास्थायाहमभ्ययाम् ॥
sthūṇākarṇamatho jālaṃ śaravarṣaṃ śarolvaṇam | śalabhāstramaśmavarṣaṃ samāsthāyāhamabhyayām
मैंने स्थूणाकर्ण अस्त्र, फिर जाल (वारुण) अस्त्र, बाणों से भरी घनी बाण-वर्षा, शलभास्त्र और पत्थरों की वर्षा का प्रयोग करते हुए उस पर धावा किया।
श्लोक 34 (3.168.34)
जग्रास प्रसभं तानि सर्वाण्यस्त्राणि मे नृप । तेषु सर्वेषु जग्धेषु ब्रह्मास्त्रं महदादिशम् ॥
jagrāsa prasabhaṃ tāni sarvāṇyastrāṇi me nṛpa | teṣu sarveṣu jagdheṣu brahmāstraṃ mahadādiśam
राजन्, उसने मेरे उन सब अस्त्रों को बलपूर्वक निगल लिया। उन सबके निगल लिए जाने पर मैंने महान् ब्रह्मास्त्र छोड़ा।
श्लोक 35 (3.168.35)
ततः प्रज्वलितैर्बाणैः सर्वतश्चोपचीयत । उपचीयमानश्च तदा महास्त्रेण व्यवर्धत ॥
tataḥ prajvalitairbāṇaiḥ sarvataścopacīyata | upacīyamānaśca tadā mahāstreṇa vyavardhata
तब वह चारों ओर प्रज्वलित बाणों से बढ़ने लगा, और इस प्रकार बढ़ता हुआ वह उस महान् अस्त्र के बल से और भी विस्तृत होता गया।
श्लोक 36 (3.168.36)
ततः संतापिता लोका मत्प्रसूतेन तेजसा । क्षणेन हि दिशः खं च सर्वतो हि विदीपितम् ॥
tataḥ saṃtāpitā lokā matprasūtena tejasā | kṣaṇena hi diśaḥ khaṃ ca sarvato hi vidīpitam
तब मेरे छोड़े हुए तेज से सारे लोक संतप्त हो उठे; क्षण भर में दिशाएँ और आकाश चारों ओर से जगमगा उठे।
श्लोक 37 (3.168.37)
तदप्यस्त्रं महातेजाः क्षणेनैव व्यशामयत् । ब्रह्मास्त्रे तु हते राजन्भयं मां महदाविशत् ॥
tadapyastraṃ mahātejāḥ kṣaṇenaiva vyaśāmayat | brahmāstre tu hate rājanbhayaṃ māṃ mahadāviśat
उस महातेजस्वी ने उस अस्त्र को भी क्षण भर में शान्त कर दिया। राजन्, ब्रह्मास्त्र के नष्ट हो जाने पर मुझ पर बड़ा भय छा गया।
श्लोक 38 (3.168.38)
ततोऽहं धनुरादाय तथाऽक्षय्ये महेषुधी । सहसाऽभ्यहनं भूतं तान्यप्यस्त्राण्यभक्षयत् ॥
tato'haṃ dhanurādāya tathā'kṣayye maheṣudhī | sahasā'bhyahanaṃ bhūtaṃ tānyapyastrāṇyabhakṣayat
तब मैंने धनुष और दोनों विशाल अक्षय तरकस लेकर सहसा उस प्राणी पर प्रहार किया; पर उसने उन अस्त्रों को भी निगल लिया।
श्लोक 39 (3.168.39)
एतेष्वस्त्रेषु भूतेन भक्षितेष्वायुधेषु च । मम तस्य च भूतस्य बाहुयुद्धमवर्तत ॥
eteṣvastreṣu bhūtena bhakṣiteṣvāyudheṣu ca | mama tasya ca bhūtasya bāhuyuddhamavartata
जब उस प्राणी ने ये अस्त्र और मेरे सारे आयुध निगल लिए, तब मेरे और उस प्राणी के बीच बाहुयुद्ध छिड़ गया।
श्लोक 40 (3.168.40)
व्यायामं मुष्टिभिः कृत्वा तलैरभिसमाहतौ । अपातयच्च तद्भूतमहं चापातयं महीम् ॥
vyāyāmaṃ muṣṭibhiḥ kṛtvā talairabhisamāhatau | apātayacca tadbhūtamahaṃ cāpātayaṃ mahīm
हम मुक्कों से भिड़ गए और एक-दूसरे पर हथेलियों से प्रहार करने लगे; उस प्राणी ने मुझे गिराया और मैंने उसे धरती पर पटक दिया।
श्लोक 41 (3.168.41)
ततः प्रहस्य तद्भूतं तत्रैवान्तरधीयत । सह स्त्रीभिर्महाराज पश्यतो मेऽद्भुतोपमम् ॥
tataḥ prahasya tadbhūtaṃ tatraivāntaradhīyata | saha strībhirmahārāja paśyato me'dbhutopamam
तब वह प्राणी हँसकर स्त्रियों सहित वहीं अन्तर्धान हो गया, महाराज, मेरे देखते-देखते—यह अद्भुत-सा दृश्य था।
श्लोक 42 (3.168.42)
मुख्यं कृत्वा स भगवांस्ततोऽन्यद्रूपमात्मनः । दिव्यमेव महाराज वसानोऽद्भुतमम्बरम् ॥
mukhyaṃ kṛtvā sa bhagavāṃstato'nyadrūpamātmanaḥ | divyameva mahārāja vasāno'dbhutamambaram
फिर महाराज, भगवान् ने अपना दूसरा, श्रेष्ठ और दिव्य रूप धारण किया और अद्भुत वस्त्र पहन लिए।
श्लोक 43 (3.168.43)
हित्वा किरातरूपं च भगवांस्त्रिदशेश्वरः । स्वरूपं दिव्यमास्थाय तस्थौ तत्र महेश्वरः ॥
hitvā kirātarūpaṃ ca bhagavāṃstridaśeśvaraḥ | svarūpaṃ divyamāsthāya tasthau tatra maheśvaraḥ
देवताओं के ईश्वर भगवान् ने किरात का रूप त्यागकर अपना दिव्य स्वरूप धारण किया, और महेश्वर वहाँ खड़े हो गए।
श्लोक 44 (3.168.44)
सोऽदृश्यत ततः साक्षाद्भगवान्गोवृषध्वजः । धनुर्गृह्य तदा पाणौ बहुरूपः पिनाकधृत् ॥
so'dṛśyata tataḥ sākṣādbhagavāngovṛṣadhvajaḥ | dhanurgṛhya tadā pāṇau bahurūpaḥ pinākadhṛt
तब वृषभध्वज भगवान् साक्षात् प्रकट हुए—अनेक रूपों वाले, पिनाकधारी, उस समय हाथ में धनुष लिए हुए।
श्लोक 45 (3.168.45)
स मामभ्येत्य समरे तथैवाभिमुखं स्थितम् । शूलपाणिरथोवाच तुष्टोस्मीति परंतप ॥
sa māmabhyetya samare tathaivābhimukhaṃ sthitam | śūlapāṇirathovāca tuṣṭosmīti paraṃtapa
हे परंतप, युद्ध में उसी प्रकार सामने खड़े मेरे पास आकर त्रिशूलधारी ने कहा—"मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।"
श्लोक 46 (3.168.46)
ततस्तद्धनुरादाय तूणौ चाक्षय्यसायकौ । प्रादान्ममैव भगवान्वरयस्वेति चाब्रवीत् ॥
tatastaddhanurādāya tūṇau cākṣayyasāyakau | prādānmamaiva bhagavānvarayasveti cābravīt
फिर भगवान् ने वह धनुष और अक्षय बाणों वाले दोनों तरकस लेकर मुझे ही लौटा दिए और कहा—"वर माँगो।"
महादेव उवाच
श्लोक 47 (3.168.47)
तुष्टोस्मि तव कौन्तेय ब्रूहि किं करवाणि ते । मनोगतं वीर यत्ते तद्ब्रूहि वितराम्यहम् । अमरत्वमपाहाय ब्रूहि यत्ते मनोगतम् ॥
tuṣṭosmi tava kaunteya brūhi kiṃ karavāṇi te | manogataṃ vīra yatte tadbrūhi vitarāmyaham | amaratvamapāhāya brūhi yatte manogatam
"कुन्तीपुत्र, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। बताओ, मैं तुम्हारा क्या करूँ? वीर, तुम्हारे मन में जो है वह कहो, मैं उसे प्रदान करूँगा। अमरता को छोड़कर, जो तुम्हारे मन में हो, वह कहो।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 48 (3.168.48)
ततः प्राञ्जलिरेवाहमस्त्रेषु कृतमानसः । प्रणम्य शिरसा शर्वं ततो वचनमाददे ॥
tataḥ prāñjalirevāhamastreṣu kṛtamānasaḥ | praṇamya śirasā śarvaṃ tato vacanamādade
तब हाथ जोड़कर, अस्त्रों में मन लगाए हुए, मैंने सिर झुकाकर शर्व (शिव) को प्रणाम किया और यह वचन कहा—
श्लोक 49 (3.168.49)
भगवान्मे प्रसन्नश्चेदीप्सितोऽयं वरो मम । अस्त्राणीच्छाम्यहं ज्ञातुं यानि देवेषु कानिचित् ॥
bhagavānme prasannaścedīpsito'yaṃ varo mama | astrāṇīcchāmyahaṃ jñātuṃ yāni deveṣu kānicit
"यदि भगवान् मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरा यही इच्छित वर है—देवताओं के पास जो भी अस्त्र हैं, मैं उन्हें जानना चाहता हूँ।"
श्लोक 50 (3.168.50)
ददानीत्येव भगवानब्रवीत्र्यम्बकश्च माम् । रौद्रमस्त्रं मदीयं त्वामुपस्थास्यति पाण्डव ॥
dadānītyeva bhagavānabravītryambakaśca mām | raudramastraṃ madīyaṃ tvāmupasthāsyati pāṇḍava
भगवान् त्र्यम्बक ने मुझसे कहा—"मैं देता हूँ। पाण्डव, मेरा रौद्र अस्त्र तुम्हें प्राप्त होगा।"
श्लोक 51 (3.168.51)
प्रददौ च मम प्रीतः सोऽस्त्रं पाशुपतं प्रभुः । उवाच च महादेवो दत्त्वा मेऽस्त्रं सनातनम् ॥
pradadau ca mama prītaḥ so'straṃ pāśupataṃ prabhuḥ | uvāca ca mahādevo dattvā me'straṃ sanātanam
और प्रसन्न होकर प्रभु ने मुझे पाशुपत अस्त्र दिया। वह सनातन अस्त्र देकर महादेव ने कहा—
महादेव उवाच
श्लोक 52 (3.168.52)
न प्रयोज्यं भवेदेतन्मानुषेषु कथंचन । जगद्विनिर्दहेदेवमल्पतेजसि पातितम् ॥
na prayojyaṃ bhavedetanmānuṣeṣu kathaṃcana | jagadvinirdahedevamalpatejasi pātitam
"इसका प्रयोग मनुष्यों पर कभी भी नहीं करना चाहिए। किसी अल्प तेज वाले पर छोड़ा जाए तो यह सारे जगत् को भस्म कर देगा।
श्लोक 53 (3.168.53)
पीड्यमानेन बलवत्प्रयोज्यं स्याद्धनंजय । अस्त्राणां प्रतिघाते च सर्वथैव प्रयोजयेः ॥
pīḍyamānena balavatprayojyaṃ syāddhanaṃjaya | astrāṇāṃ pratighāte ca sarvathaiva prayojayeḥ
धनंजय, जब तुम पर भारी संकट हो, तभी इसका प्रयोग करना चाहिए; और शत्रु के अस्त्रों का निवारण करने के लिए इसका प्रयोग सब प्रकार से कर सकते हो।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 54 (3.168.54)
ततोऽप्रतिहतं दिव्यं सर्वास्त्रप्रतिषेधनम् । मूर्तिमन्मे स्थितं पार्श्वे प्रसन्ने गोवृषध्वजे ॥
tato'pratihataṃ divyaṃ sarvāstrapratiṣedhanam | mūrtimanme sthitaṃ pārśve prasanne govṛṣadhvaje
तब वृषभध्वज शिव के प्रसन्न रहते, वह अप्रतिहत, सब अस्त्रों को रोक देने वाला दिव्य अस्त्र मूर्तिमान होकर मेरे पास आ खड़ा हुआ—
श्लोक 55 (3.168.55)
उत्सादनममित्राणां परसेनानिकर्तनम् । दुरासदं दुष्प्रसहं सुरदानवराक्षसैः ॥
utsādanamamitrāṇāṃ parasenānikartanam | durāsadaṃ duṣprasahaṃ suradānavarākṣasaiḥ
जो शत्रुओं का संहारक, पराई सेनाओं को काट डालने वाला, और देवताओं, दानवों तथा राक्षसों के लिए भी दुर्गम और असह्य है।
श्लोक 56 (3.168.56)
अनुज्ञातस्त्वहं तेन तत्रैव समुपाविशम् । प्रेक्षतश्चैव मे देवस्तत्रैवान्तरधीयत ॥
anujñātastvahaṃ tena tatraiva samupāviśam | prekṣataścaiva me devastatraivāntaradhīyata
उनकी आज्ञा पाकर मैं वहीं बैठ गया, और मेरे देखते-देखते वे देव वहीं अन्तर्धान हो गए।