आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 169
अर्जुन द्वारा इन्द्रलोक-यात्रा और अस्त्र-प्राप्ति का वर्णन
अर्जुन युधिष्ठिर को अपना वृत्तान्त आगे सुनाते हैं। पहले मिले ब्राह्मण भविष्यवाणी करते हैं कि वे लोकपालों सहित इन्द्र के दर्शन करेंगे; फिर देवता हिमालय पर प्रकट होते हैं और यम, वरुण, कुबेर तथा इन्द्र उन्हें अस्त्र देते हैं। इन्द्र उनके उद्देश्य की परीक्षा लेते हैं, उनका यह वचन स्वीकार करते हैं कि वे दिव्य अस्त्रों का प्रयोग मनुष्यों पर केवल अस्त्रों के निवारण के लिए करेंगे, और मातलि का रथ भेजते हैं, जिसमें अर्जुन ऐसे अडिग खड़े रहते हैं कि मातलि चकित हो जाता है। अर्जुन अमरावती का, इन्द्र के दिए सम्मान का, अस्त्रों और चित्रसेन से संगीत की शिक्षा का, और स्वर्ग के भोगों के बीच भी अस्त्रों पर ही मन टिकाए रखने का वर्णन करते हैं।
अर्जुन उवाच
श्लोक 1 (3.169.1)
ततस्तामवसं प्रीतो रजनीं तत्र भारत । प्रसादाद्देवदेवस्य त्र्यम्बकस्य महात्मनः ॥
tatastāmavasaṃ prīto rajanīṃ tatra bhārata | prasādāddevadevasya tryambakasya mahātmanaḥ
भारत, तब देवाधिदेव महात्मा त्र्यम्बक की कृपा से मैंने वह रात वहीं प्रसन्नतापूर्वक बिताई।
श्लोक 2 (3.169.2)
व्युषितो रजनीं चाहं कृत्वा पौर्वाह्णिकीः क्रियाः । अपश्यं तं द्विजश्रेष्ठं दृष्टवानस्मि यं पुरा ॥
vyuṣito rajanīṃ cāhaṃ kṛtvā paurvāhṇikīḥ kriyāḥ | apaśyaṃ taṃ dvijaśreṣṭhaṃ dṛṣṭavānasmi yaṃ purā
रात बीत जाने पर प्रातःकाल की क्रियाएँ करके मैंने उन्हीं श्रेष्ठ ब्राह्मण को देखा जिन्हें मैं पहले देख चुका था।
श्लोक 3 (3.169.3)
तस्मै चाहं यथावृत्तं सर्वमेव न्यवेदयम् । भगवन्तं महादेवं समेतोस्मीति भारत ॥
tasmai cāhaṃ yathāvṛttaṃ sarvameva nyavedayam | bhagavantaṃ mahādevaṃ sametosmīti bhārata
भारत, मैंने उन्हें सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों सुना दिया कि मैं भगवान् महादेव से मिल चुका हूँ।
श्लोक 4 (3.169.4)
स मामुवाच राजेन्द्र प्रीयमाणो द्विजोत्तमः । दृष्टस्त्वया महादेवो यथा नान्येन केनचित् ॥
sa māmuvāca rājendra prīyamāṇo dvijottamaḥ | dṛṣṭastvayā mahādevo yathā nānyena kenacit
राजेन्द्र, प्रसन्न होकर उन द्विजश्रेष्ठ ने मुझसे कहा—"तुमने महादेव के ऐसे दर्शन किए हैं जैसे किसी और ने नहीं किए।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 5 (3.169.5)
समेतं लोकपालैस्तु सर्वैर्वैवस्वतादिभिः । द्रष्टास्यनघ देवेन्द्रं स च तेऽस्त्राणि दास्यति ॥
sametaṃ lokapālaistu sarvairvaivasvatādibhiḥ | draṣṭāsyanagha devendraṃ sa ca te'strāṇi dāsyati
निष्पाप अर्जुन, तुम वैवस्वत (यम) आदि सब लोकपालों के साथ देवराज इन्द्र के दर्शन करोगे, और वे तुम्हें अस्त्र देंगे।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 6 (3.169.6)
एवमुक्त्वा स मां राजन्नाश्लिष्य च पुनः पुनः । अगच्छत्स यथाकामं ब्राह्मणः सूर्यसन्निभः ॥
evamuktvā sa māṃ rājannāśliṣya ca punaḥ punaḥ | agacchatsa yathākāmaṃ brāhmaṇaḥ sūryasannibhaḥ
राजन्, मुझसे ऐसा कहकर और बार-बार मुझे गले लगाकर वे सूर्य के समान तेजस्वी ब्राह्मण अपनी इच्छा के अनुसार चले गए।
श्लोक 7 (3.169.7)
अथापराह्णे तस्याह्नः प्रावात्पुण्यः समीरणः । पुनर्नवमिमं लोकं कुर्वन्निव सपत्नहन् ॥
athāparāhṇe tasyāhnaḥ prāvātpuṇyaḥ samīraṇaḥ | punarnavamimaṃ lokaṃ kurvanniva sapatnahan
हे शत्रुनाशक, फिर उसी दिन अपराह्न में एक पवित्र वायु बहने लगी, मानो इस संसार को फिर से नया कर रही हो।
श्लोक 8 (3.169.8)
दिव्यानि चैव माल्यानि सुगन्धीनि नवानि च । शैशिरस्य गिरे पादे प्रादुरासन्समीपतः ॥
divyāni caiva mālyāni sugandhīni navāni ca | śaiśirasya gire pāde prādurāsansamīpataḥ
हिमालय पर्वत की तलहटी में पास ही दिव्य, सुगन्धित और ताज़ी मालाएँ प्रकट हो गईं।
श्लोक 9 (3.169.9)
वादित्राणि च दिव्यानि सुघोषाणि समन्ततः । स्तुतयश्चेन्द्रसंयुक्ता अश्रूयन्त मनोहराः ॥
vāditrāṇi ca divyāni sughoṣāṇi samantataḥ | stutayaścendrasaṃyuktā aśrūyanta manoharāḥ
चारों ओर मधुर ध्वनि वाले दिव्य वाद्य बजने लगे और इन्द्र की मनोहर स्तुतियाँ सुनाई देने लगीं।
श्लोक 10 (3.169.10)
गणाश्चाप्सरसां तत्र गन्धर्वाणां तथैव च । पुरस्ताद्देवदेवस्य जगुर्गीतानि सर्वशः ॥
gaṇāścāpsarasāṃ tatra gandharvāṇāṃ tathaiva ca | purastāddevadevasya jagurgītāni sarvaśaḥ
वहाँ अप्सराओं और गन्धर्वों के समूह देवराज के आगे सब प्रकार के गीत गाने लगे।
श्लोक 11 (3.169.11)
मरुतां च गणास्तत्र देवयानैरुपागमन् । महेन्द्रानुचरा ये च देवसद्मनिवासिनः ॥
marutāṃ ca gaṇāstatra devayānairupāgaman | mahendrānucarā ye ca devasadmanivāsinaḥ
मरुद्गण अपने दिव्य विमानों में वहाँ आए, और महेन्द्र के वे अनुचर भी जो देवलोक में निवास करते हैं।
श्लोक 12 (3.169.12)
ततो मरुत्वान्हरिभिर्युक्तैर्वाहैः स्वलंकृतैः । शचीसहायस्तत्रायात्सह सर्वैस्तदाऽमरैः ॥
tato marutvānharibhiryuktairvāhaiḥ svalaṃkṛtaiḥ | śacīsahāyastatrāyātsaha sarvaistadā'maraiḥ
तब मरुत्वान् इन्द्र शची के साथ, सुसज्जित हरे (पिंगल) घोड़ों से जुते वाहन पर सवार होकर सब देवताओं सहित वहाँ आए।
श्लोक 13 (3.169.13)
एतस्मिन्नेव काले तु कुबेरो नरवाहनः । दर्शयामास मां राजँल्लक्ष्म्या परमया युतः ॥
etasminneva kāle tu kubero naravāhanaḥ | darśayāmāsa māṃ rājam̐llakṣmyā paramayā yutaḥ
राजन्, उसी समय परम शोभा से युक्त नरवाहन कुबेर ने भी मुझे दर्शन दिए।
श्लोक 14 (3.169.14)
दक्षिणस्यां दिशि यमं प्रत्यपश्यं व्यवस्थितम् । वरुणं देवराजं च यथास्थानमवस्थितम् ॥
dakṣiṇasyāṃ diśi yamaṃ pratyapaśyaṃ vyavasthitam | varuṇaṃ devarājaṃ ca yathāsthānamavasthitam
दक्षिण दिशा में मैंने यम को खड़े देखा, और वरुण तथा देवराज इन्द्र को भी अपने-अपने स्थान पर स्थित देखा।
श्लोक 15 (3.169.15)
ते मामूचुर्महाराज सान्त्वयित्वा सुरर्षभाः । सव्यसाचिन्निरीक्षास्माँल्लोकपालानवस्थितान् ॥
te māmūcurmahārāja sāntvayitvā surarṣabhāḥ | savyasācinnirīkṣāsmām̐llokapālānavasthitān
महाराज, उन श्रेष्ठ देवताओं ने मुझे सान्त्वना देते हुए कहा—"सव्यसाची, यहाँ खड़े हम लोकपालों को देखो।
लोकपाला ऊचुः
श्लोक 16 (3.169.16)
सुरकार्यार्थसिद्ध्यर्थं दृष्टवानसि शंकरम् । अस्मत्तोऽपि गृहाण त्वमस्त्राणीति समन्ततः ॥
surakāryārthasiddhyarthaṃ dṛṣṭavānasi śaṃkaram | asmatto'pi gṛhāṇa tvamastrāṇīti samantataḥ
देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए तुमने शंकर के दर्शन किए हैं। अब हमसे भी अस्त्र ग्रहण करो"—ऐसा उन्होंने चारों ओर से कहा।
अर्जुन उवाच
श्लोक 17 (3.169.17)
ततोऽहं प्रयतो भूत्वा प्रणिपत्य सुरर्षभान् । प्रत्यगृह्णां तदाऽस्त्राणि महान्ति विविधानि च ॥
tato'haṃ prayato bhūtvā praṇipatya surarṣabhān | pratyagṛhṇāṃ tadā'strāṇi mahānti vividhāni ca
तब मैंने संयत होकर उन श्रेष्ठ देवताओं को प्रणाम किया और उनसे अनेक प्रकार के महान् अस्त्र ग्रहण किए।
श्लोक 18 (3.169.18)
गृहीतास्त्रस्ततो देवैरनुज्ञातोस्मि भारत । अथ देवा ययुः सर्वे यथागतमरिंदम ॥
gṛhītāstrastato devairanujñātosmi bhārata | atha devā yayuḥ sarve yathāgatamariṃdama
भारत, अस्त्र ग्रहण कर लेने पर देवताओं ने मुझे जाने की अनुमति दी, और हे अरिंदम, फिर सब देवता जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।
श्लोक 19 (3.169.19)
मघवानपि मां देवो रथमारोप्य सुप्रभम् । उवाच भगवान्वाक्यं स्मयन्निव महायशाः ॥
maghavānapi māṃ devo rathamāropya suprabham | uvāca bhagavānvākyaṃ smayanniva mahāyaśāḥ
महायशस्वी भगवान् मघवा (इन्द्र) ने भी मुझे अपने तेजस्वी रथ पर बिठाकर मानो मुस्कराते हुए यह वचन कहा—
इन्द्र उवाच
श्लोक 20 (3.169.20)
पुरैवागमनादस्माद्वेदाहं त्वां धनंजय । अतः परं त्वहं वै त्वां दर्शये भरतर्षभ ॥
puraivāgamanādasmādvedāhaṃ tvāṃ dhanaṃjaya | ataḥ paraṃ tvahaṃ vai tvāṃ darśaye bharatarṣabha
"धनंजय, यहाँ तुम्हारे आने से पहले ही मैं तुम्हें जानता था। भरतश्रेष्ठ, अब आगे मैं तुम्हें अपना दर्शन दूँगा।
श्लोक 21 (3.169.21)
त्वया हि तीर्थेषु पुरा समाप्लावः कृतोऽसकृत् । तपश्चेदं महत्तप्तं स्वर्गं गन्तासि पाण्डव ॥
tvayā hi tīrtheṣu purā samāplāvaḥ kṛto'sakṛt | tapaścedaṃ mahattaptaṃ svargaṃ gantāsi pāṇḍava
तुमने पहले अनेक बार तीर्थों में स्नान किया है और यह महान् तप भी किया है; पाण्डव, तुम स्वर्ग जाओगे।
श्लोक 22 (3.169.22)
भूयश्चैव च तप्तव्यं तपश्चरणमुत्तमम् । दुश्चरं घोरमस्त्राणां तपोबलकरं तव ॥
bhūyaścaiva ca taptavyaṃ tapaścaraṇamuttamam | duścaraṃ ghoramastrāṇāṃ tapobalakaraṃ tava
पर अभी और भी उत्तम तपस्या करनी है, जो कठिन और कठोर है और अस्त्रों के लिए तुम्हें तप का बल देगी।
श्लोक 23 (3.169.23)
स्वर्गस्त्ववश्यं गन्तव्यस्त्वया शत्रुनिषूदन । मातलिर्मन्नियोगात्त्वां त्रिदिवं प्रापयिष्यति ॥
svargastvavaśyaṃ gantavyastvayā śatruniṣūdana | mātalirmanniyogāttvāṃ tridivaṃ prāpayiṣyati
शत्रुनाशक, तुम्हें स्वर्ग अवश्य जाना है; मेरी आज्ञा से मातलि तुम्हें त्रिदिव (स्वर्ग) पहुँचाएगा।
श्लोक 24 (3.169.24)
विदितस्त्वं हि देवानां मुनीनां च महात्मनाम् । इहस्थः पाण्डवश्रेष्ठ तपः कुर्वन्सुदुष्करम् ॥
viditastvaṃ hi devānāṃ munīnāṃ ca mahātmanām | ihasthaḥ pāṇḍavaśreṣṭha tapaḥ kurvansuduṣkaram
पाण्डवश्रेष्ठ, यहाँ रहकर अत्यन्त कठिन तप करने वाले के रूप में तुम देवताओं और महात्मा मुनियों में जाने जाते हो।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 25 (3.169.25)
ततोऽहमब्रुवं शक्रं प्रसीद भगवन्मम । आचार्यं वरयेऽहं त्वामस्त्रार्थं त्रिदशेश्वर ॥
tato'hamabruvaṃ śakraṃ prasīda bhagavanmama | ācāryaṃ varaye'haṃ tvāmastrārthaṃ tridaśeśvara
तब मैंने इन्द्र से कहा—"भगवन्, मुझ पर कृपा कीजिए। हे देवेश्वर, अस्त्र-विद्या के लिए मैं आपको अपना आचार्य चुनता हूँ।"
इन्द्र उवाच
श्लोक 26 (3.169.26)
क्रूरकर्माऽस्त्रवित्तात भविष्यसि परंतप । यदर्थमस्त्राणीप्सुस्त्वं तं कामं पाण्डवाप्नुहि ॥
krūrakarmā'stravittāta bhaviṣyasi paraṃtapa | yadarthamastrāṇīpsustvaṃ taṃ kāmaṃ pāṇḍavāpnuhi
"तात, परंतप, अस्त्रों को जानकर तुम क्रूर कर्म करने वाले बन जाओगे। फिर भी पाण्डव, जिस उद्देश्य से तुम अस्त्र चाहते हो, उस कामना को प्राप्त करो।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 27 (3.169.27)
ततोऽहमब्रुवं नाहं दिव्यान्यस्त्राणि शत्रुहन् । मानुषेषु प्रयोक्ष्यामि विनाऽस्त्रप्रतिघातनात् ॥
tato'hamabruvaṃ nāhaṃ divyānyastrāṇi śatruhan | mānuṣeṣu prayokṣyāmi vinā'strapratighātanāt
तब मैंने कहा—"हे शत्रुनाशक, अस्त्रों के निवारण के सिवा मैं इन दिव्य अस्त्रों का प्रयोग मनुष्यों पर नहीं करूँगा।
श्लोक 28 (3.169.28)
तानि दिव्यानि मेऽस्त्राणि प्रयच्छ विबुधाधिप । लोकांश्चास्त्रजितान्पश्चाल्लभेयं सुरपुङ्गव ॥
tāni divyāni me'strāṇi prayaccha vibudhādhipa | lokāṃścāstrajitānpaścāllabheyaṃ surapuṅgava
हे देवाधिप, मुझे वे दिव्य अस्त्र दीजिए; हे सुरश्रेष्ठ, उसके बाद मैं अस्त्रों से जीते जाने वाले लोक प्राप्त करूँ।"
इन्द्र उवाच
श्लोक 29 (3.169.29)
परीक्षार्थं मयैतत्ते वाक्यमुक्तं धनंजय । ममात्मजस्य वचनं सूपपन्नमिदं तव ॥
parīkṣārthaṃ mayaitatte vākyamuktaṃ dhanaṃjaya | mamātmajasya vacanaṃ sūpapannamidaṃ tava
"धनंजय, वह बात मैंने तुम्हारी परीक्षा के लिए कही थी। तुम्हारा यह वचन मेरे पुत्र के सर्वथा योग्य है।
श्लोक 30 (3.169.30)
शिक्ष मे भवनं गत्वा सर्वाण्यस्त्राणि भारत । वायोरग्नेर्वसुभ्योऽपि वरुणात्समरुद्गणात् ॥
śikṣa me bhavanaṃ gatvā sarvāṇyastrāṇi bhārata | vāyoragnervasubhyo'pi varuṇātsamarudgaṇāt
भारत, मेरे भवन में जाकर सब अस्त्र सीखो—वायु से, अग्नि से, वसुओं से, और मरुद्गणों सहित वरुण से भी;
श्लोक 31 (3.169.31)
साध्यं पैतामहं चैव गन्धर्वोरगरक्षसाम् । वैष्णवानि च सर्वाणि नैर्ऋतानि तथैव च ॥
sādhyaṃ paitāmahaṃ caiva gandharvoragarakṣasām | vaiṣṇavāni ca sarvāṇi nairṛtāni tathaiva ca
साध्यों का अस्त्र, पितामह ब्रह्मा का अस्त्र, गन्धर्वों, नागों और राक्षसों के अस्त्र, विष्णु के सभी अस्त्र और उसी प्रकार निर्ऋति के अस्त्र भी;
श्लोक 32 (3.169.32)
मद्गतानि च जानीहि सर्वास्त्राणि कुरूद्वह ॥
madgatāni ca jānīhi sarvāstrāṇi kurūdvaha
और हे कुरुश्रेष्ठ, मेरे पास जो सब अस्त्र हैं, उन्हें भी जानो।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 33 (3.169.33)
एवमुक्त्वा तु मां शक्रस्तत्रैवान्तरधीयत ॥
evamuktvā tu māṃ śakrastatraivāntaradhīyata
मुझसे ऐसा कहकर इन्द्र वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 34 (3.169.34)
अथापश्यं हरियुजं रथमैन्द्रमुपस्थितम् । दिव्यं मायामयं पुण्यं यत्तं मातलिना नृप ॥
athāpaśyaṃ hariyujaṃ rathamaindramupasthitam | divyaṃ māyāmayaṃ puṇyaṃ yattaṃ mātalinā nṛpa
राजन्, तब मैंने हरे घोड़ों से जुता इन्द्र का रथ उपस्थित देखा—दिव्य, माया-सा अद्भुत, पवित्र, और मातलि द्वारा तैयार रखा हुआ।
श्लोक 35 (3.169.35)
लोकपालेषु यातेषु मामुवाचाथ मातलिः । द्रष्टुमिच्छति शक्रस्त्वां देवराजो महाद्युते ॥
lokapāleṣu yāteṣu māmuvācātha mātaliḥ | draṣṭumicchati śakrastvāṃ devarājo mahādyute
लोकपालों के चले जाने पर मातलि ने मुझसे कहा—"हे महातेजस्वी, देवराज इन्द्र आपको देखना चाहते हैं।
मातलिरुवाच
श्लोक 36 (3.169.36)
संसिद्धस्त्वं महाबाहो कुरु कार्यमनुत्तमम् । पश्य पुण्यकृतां लोकान्सशरीरो दिवं व्रज ॥
saṃsiddhastvaṃ mahābāho kuru kāryamanuttamam | paśya puṇyakṛtāṃ lokānsaśarīro divaṃ vraja
महाबाहु, आप सिद्धि पा चुके हैं। अब अनुपम कार्य कीजिए—पुण्यात्माओं के लोक देखिए और सशरीर स्वर्ग चलिए।
अर्जुन उवाच
श्लोक 37 (3.169.37)
देवराजः सहस्राक्षस्त्वां दिदृक्षति भारत । इत्युक्तोऽहं मातलिना गिरिमामन्त्र्य शैशिरम् ॥
devarājaḥ sahasrākṣastvāṃ didṛkṣati bhārata | ityukto'haṃ mātalinā girimāmantrya śaiśiram
भारत, सहस्र नेत्रों वाले देवराज आपके दर्शन चाहते हैं।" मातलि के ऐसा कहने पर मैंने हिमालय पर्वत से विदा ली,
श्लोक 38 (3.169.38)
प्रदक्षिणमुपावृत्य समारोहं रथोत्तमम् । चोदयामास स हयान्मनोमारुतरंहसः ॥
pradakṣiṇamupāvṛtya samārohaṃ rathottamam | codayāmāsa sa hayānmanomārutaraṃhasaḥ
उसकी परिक्रमा की और उस उत्तम रथ पर चढ़ गया। तब उसने मन और वायु के समान वेग वाले घोड़ों को हाँका—
श्लोक 39 (3.169.39)
मातलिर्हयतत्त्वज्ञो यथावद्भूरिदक्षिणः । अवैक्षत च मे वक्त्रं स्थितस्याथ स सारथिः । तथा भ्रान्ते रथे राजन्विस्मितश्चेदमब्रवीत् ॥
mātalirhayatattvajño yathāvadbhūridakṣiṇaḥ | avaikṣata ca me vaktraṃ sthitasyātha sa sārathiḥ | tathā bhrānte rathe rājanvismitaścedamabravīt
वह मातलि, जो घोड़ों के तत्त्व को जानने वाला और यथोचित रूप से उदार दानी है। फिर उस सारथि ने वहाँ खड़े मेरे मुख की ओर देखा, और राजन्, रथ के इस प्रकार चक्कर खाते हुए, विस्मित होकर यह कहा—
मातलिरुवाच
श्लोक 40 (3.169.40)
अत्यद्भुतमिदं त्वद्य विचित्रं प्रतिभाति मे । यदास्थितो रथं दिव्यं पदान्न चलितः पदम् ॥
atyadbhutamidaṃ tvadya vicitraṃ pratibhāti me | yadāsthito rathaṃ divyaṃ padānna calitaḥ padam
"आज मुझे यह अत्यन्त अद्भुत और विचित्र लगता है कि दिव्य रथ पर बैठकर भी आप अपने स्थान से एक पग भी नहीं हिले।
श्लोक 41 (3.169.41)
देवराजोऽपि हि मया नित्यमत्रोपलक्षितः । विचलन्प्रथमोत्पाते हयानां भरतर्षभ ॥
devarājo'pi hi mayā nityamatropalakṣitaḥ | vicalanprathamotpāte hayānāṃ bharatarṣabha
भरतश्रेष्ठ, मैंने सदा देखा है कि घोड़ों के पहली बार उछलकर दौड़ने पर स्वयं देवराज भी डगमगा जाते हैं।
श्लोक 42 (3.169.42)
त्वं पुनः स्थित एवात्र रथे भ्रान्ते कुरूद्वह । अतिशक्रमिदं सर्वं तवेति प्रतिभाति मे ॥
tvaṃ punaḥ sthita evātra rathe bhrānte kurūdvaha | atiśakramidaṃ sarvaṃ taveti pratibhāti me
किन्तु हे कुरुश्रेष्ठ, रथ के घूमते रहने पर भी आप यहाँ स्थिर ही खड़े रहे। आपका यह सब मुझे इन्द्र से भी बढ़कर प्रतीत होता है।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 43 (3.169.43)
इत्युक्त्वाऽऽकाशमाविश्य मातलिर्विबुधालयान् । दर्शयामास मे राजन्विमानानि च भारत ॥
ityuktvā''kāśamāviśya mātalirvibudhālayān | darśayāmāsa me rājanvimānāni ca bhārata
राजन्, भारत, ऐसा कहकर मातलि आकाश में प्रवेश कर गया और उसने मुझे देवताओं के निवास और विमान दिखाए।
श्लोक 44 (3.169.44)
स रथो हरिभिर्युक्तो ह्यूर्ध्वमाचक्रमे ततः । ऋषयो देवताश्चैव पूजयन्ति नरोत्तम ॥
sa ratho haribhiryukto hyūrdhvamācakrame tataḥ | ṛṣayo devatāścaiva pūjayanti narottama
फिर हरे घोड़ों से जुता वह रथ ऊपर की ओर चढ़ने लगा; हे नरश्रेष्ठ, ऋषि और देवता उसका सम्मान करते थे।
श्लोक 45 (3.169.45)
ततः कामगमाँल्लोकानपश्यं वै सुरर्षिणाम् । गन्धर्वाप्सरसां चैव प्रभावममितौजसाम् ॥
tataḥ kāmagamām̐llokānapaśyaṃ vai surarṣiṇām | gandharvāpsarasāṃ caiva prabhāvamamitaujasām
तब मैंने देवर्षियों के इच्छानुसार विचरण वाले लोक देखे, और अपार तेज वाले गन्धर्वों तथा अप्सराओं का वैभव भी देखा।
श्लोक 46 (3.169.46)
नन्दनादीनि देवानां वनान्युपवनानि च । दर्शयामास मे शीघ्रं मातलिः शक्रसारथिः ॥
nandanādīni devānāṃ vanānyupavanāni ca | darśayāmāsa me śīghraṃ mātaliḥ śakrasārathiḥ
इन्द्र के सारथि मातलि ने शीघ्र ही मुझे नन्दन आदि देवताओं के वन और उपवन दिखाए।
श्लोक 47 (3.169.47)
ततः शक्रस्य भवनमपश्यममरावतीम् । दिव्यैः कामफलैर्वृक्षै रत्नैश्च समलंकृताम् ॥
tataḥ śakrasya bhavanamapaśyamamarāvatīm | divyaiḥ kāmaphalairvṛkṣai ratnaiśca samalaṃkṛtām
फिर मैंने इन्द्र की नगरी अमरावती देखी, जो मनचाहे फल देने वाले दिव्य वृक्षों और रत्नों से सुशोभित थी।
श्लोक 48 (3.169.48)
न तां भासयते सूर्यो न शीतोष्णे न च क्लमः । न बाधते तत्र रजस्तत्रास्ति न जरा नृप ॥
na tāṃ bhāsayate sūryo na śītoṣṇe na ca klamaḥ | na bādhate tatra rajastatrāsti na jarā nṛpa
राजन्, उसे सूर्य प्रकाशित नहीं करता; वहाँ न शीत है, न गर्मी, न थकान; वहाँ धूल किसी को नहीं सताती और न बुढ़ापा है।
श्लोक 49 (3.169.49)
न तत्र शोको दैन्यं वा वैवर्ण्यं चोपलक्ष्यते । दिवौकसां महाराज न ग्लानिररिमर्दन । न क्रोधलोभौ तत्रास्तामशुभं वा विशांपते ॥
na tatra śoko dainyaṃ vā vaivarṇyaṃ copalakṣyate | divaukasāṃ mahārāja na glānirarimardana | na krodhalobhau tatrāstāmaśubhaṃ vā viśāṃpate
महाराज, वहाँ स्वर्गवासियों में न शोक दिखाई देता है, न दीनता, न मुख की मलिनता; हे शत्रुमर्दन, न वहाँ थकावट है; हे प्रजापालक, वहाँ न क्रोध है, न लोभ, न कोई अशुभ।
श्लोक 50 (3.169.50)
नित्यं तुष्टास्ते राजन्प्राणिनः सुरवेश्मनि । नित्यपुष्पफलास्तत्र पादपा हरितच्छदाः ॥
nityaṃ tuṣṭāste rājanprāṇinaḥ suraveśmani | nityapuṣpaphalāstatra pādapā haritacchadāḥ
राजन्, देवलोक के प्राणी सदा संतुष्ट रहते हैं। वहाँ के वृक्ष सदा फूलों और फलों से लदे और हरे पत्तों वाले हैं।
श्लोक 51 (3.169.51)
पुष्करिण्यश्च विविधाः पद्मसौगन्धिकायुताः । शीतस्तत्र ववौ वायुः सुगन्धो वीजते शुभः ॥
puṣkariṇyaśca vividhāḥ padmasaugandhikāyutāḥ | śītastatra vavau vāyuḥ sugandho vījate śubhaḥ
वहाँ कमलों और सुगन्धित सौगन्धिक पुष्पों से भरी अनेक प्रकार की पुष्करिणियाँ हैं। वहाँ शीतल, सुगन्धित और सुखद वायु पंखा-सी झलती हुई बहती है।
श्लोक 52 (3.169.52)
सर्वरत्नविचित्रा च भूमिः पुष्पविभूषिता । मृगद्विजाश्च बहवो रुचिरा मधुरस्वराः । विमानगामिनश्चात्र दृश्यन्ते बहवोऽमराः ॥
sarvaratnavicitrā ca bhūmiḥ puṣpavibhūṣitā | mṛgadvijāśca bahavo rucirā madhurasvarāḥ | vimānagāminaścātra dṛśyante bahavo'marāḥ
वहाँ की भूमि सब प्रकार के रत्नों से चित्रित और फूलों से सजी है; वहाँ अनेक सुन्दर, मधुर स्वर वाले पशु-पक्षी हैं, और विमानों में विचरते बहुत-से देवता दिखाई देते हैं।
श्लोक 53 (3.169.53)
ततोऽपश्यं वसून्रुद्रान्साध्यांश्च समरुद्गणान् । आदित्यानश्विनौ चैव तान्सर्वान्प्रत्यपूजयम् ॥
tato'paśyaṃ vasūnrudrānsādhyāṃśca samarudgaṇān | ādityānaśvinau caiva tānsarvānpratyapūjayam
फिर मैंने वसुओं, रुद्रों, मरुद्गणों सहित साध्यों, आदित्यों और दोनों अश्विनीकुमारों को देखा और उन सबका अभिवादन किया।
श्लोक 54 (3.169.54)
ते मां वीर्येण यशसा तेजसा च बलेन च । अस्त्रैश्चाप्यन्वजानन्त संग्रामे विजयेन च ॥
te māṃ vīryeṇa yaśasā tejasā ca balena ca | astraiścāpyanvajānanta saṃgrāme vijayena ca
उन्होंने मुझे पराक्रम, यश, तेज और बल का, अस्त्रों का और युद्ध में विजय का आशीर्वाद दिया।
श्लोक 55 (3.169.55)
प्रविश्य तां पुरीं दिव्यां देवगन्धर्वपूजिताम् । देवराजं सहस्राक्षमुपातिष्ठं कृताञ्जलिः ॥
praviśya tāṃ purīṃ divyāṃ devagandharvapūjitām | devarājaṃ sahasrākṣamupātiṣṭhaṃ kṛtāñjaliḥ
देवताओं और गन्धर्वों से पूजित उस दिव्य नगरी में प्रवेश करके मैं हाथ जोड़कर सहस्राक्ष देवराज के पास उपस्थित हुआ।
श्लोक 56 (3.169.56)
ददावर्धासनं प्रीतः शक्रो मे ददतां वरः । बहुमानाच्च गात्राणि पस्पर्श मम वासवः ॥
dadāvardhāsanaṃ prītaḥ śakro me dadatāṃ varaḥ | bahumānācca gātrāṇi pasparśa mama vāsavaḥ
दाताओं में श्रेष्ठ इन्द्र ने प्रसन्न होकर मुझे अपना आधा आसन दिया, और बड़े सम्मान से वासव ने मेरे अंगों का स्पर्श किया।
श्लोक 57 (3.169.57)
तत्राहं देवगन्धर्वैः सहितो भूरिदक्षिणैः । अस्त्रार्थमवसं स्वर्गे शिक्षाणोऽस्त्राणि भारत ॥
tatrāhaṃ devagandharvaiḥ sahito bhūridakṣiṇaiḥ | astrārthamavasaṃ svarge śikṣāṇo'strāṇi bhārata
भारत, वहाँ मैं अस्त्रों के लिए उदार देवताओं और गन्धर्वों के साथ स्वर्ग में रहा और अस्त्र सीखता रहा।
श्लोक 58 (3.169.58)
विश्वावसोश्च वै पुत्रश्चित्रसेनोऽभवत्सखा । स च गान्धर्वमखिलं ग्राहयामास मां नृप ॥
viśvāvasośca vai putraścitraseno'bhavatsakhā | sa ca gāndharvamakhilaṃ grāhayāmāsa māṃ nṛpa
राजन्, विश्वावसु का पुत्र चित्रसेन मेरा मित्र बन गया, और उसने मुझे सम्पूर्ण गान्धर्व-विद्या (संगीत-कला) सिखाई।
श्लोक 59 (3.169.59)
तत्राहमवसं राजन्गृहीतास्त्रः सुपूजितः । सुखं शक्रस्य भवने सर्वकामसमन्वितः ॥
tatrāhamavasaṃ rājangṛhītāstraḥ supūjitaḥ | sukhaṃ śakrasya bhavane sarvakāmasamanvitaḥ
राजन्, अस्त्र ग्रहण कर लेने के बाद मैं वहाँ इन्द्र के भवन में अत्यन्त सम्मानित होकर, सब सुख-सामग्री से युक्त, आनन्दपूर्वक रहा—
श्लोक 60 (3.169.60)
शृण्वन्वै गीतशब्दं च तूर्यशब्दं च पुष्कलम् । पश्यंश्चाप्सरसः श्रेष्ठा नृत्यन्तीर्भरतर्षभ ॥
śṛṇvanvai gītaśabdaṃ ca tūryaśabdaṃ ca puṣkalam | paśyaṃścāpsarasaḥ śreṣṭhā nṛtyantīrbharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, गीतों की ध्वनि और वाद्यों का भरपूर नाद सुनता हुआ, और श्रेष्ठ अप्सराओं को नाचते हुए देखता हुआ।
श्लोक 61 (3.169.61)
तत्सर्वमनवज्ञाय तथ्यं विज्ञाय भारत । अत्यर्थं प्रतिगृह्याहमस्त्रेष्वेव व्यवस्थितः ॥
tatsarvamanavajñāya tathyaṃ vijñāya bhārata | atyarthaṃ pratigṛhyāhamastreṣveva vyavasthitaḥ
भारत, उस सबका अनादर किए बिना, किन्तु उसे यथार्थ रूप में समझकर, मैंने अस्त्रों को ही सर्वोपरि माना और उन्हीं में लगा रहा।
श्लोक 62 (3.169.62)
ततोऽतुष्यत्सहस्राक्षस्तेन कामेन मे विभुः । एवं मे वसतो राजन्नेष कालोऽत्यगाद्दिवि ॥
tato'tuṣyatsahasrākṣastena kāmena me vibhuḥ | evaṃ me vasato rājanneṣa kālo'tyagāddivi
तब सहस्राक्ष प्रभु इन्द्र मेरी उस (अस्त्रों की) अभिलाषा से संतुष्ट हुए। राजन्, इस प्रकार स्वर्ग में रहते हुए मेरा यह समय बीत गया।