आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 170
इन्द्र की गुरुदक्षिणा और निवातकवचों पर अर्जुन का प्रस्थान
युधिष्ठिर को अपना वृत्तान्त सुनाते हुए अर्जुन बताते हैं कि दिव्य अस्त्रों में निपुण हो जाने पर इन्द्र ने उन्हें अद्वितीय घोषित किया और गुरुदक्षिणा के रूप में समुद्र के गर्भ में एक दुर्ग में रहने वाले तीन करोड़ निवातकवच दानवों के संहार की माँग की। इन्द्र ने उन्हें मातलि द्वारा चलाया जाने वाला अपना रथ, किरीट, कवच और गाण्डीव के लिए कभी जीर्ण न होने वाली प्रत्यंचा दी। देवताओं ने एकत्र होकर, उस रथ से इन्द्र की विजयों का स्मरण कराते हुए, उन्हें आशीर्वाद और देवदत्त शंख दिया, और अर्जुन दानवों के नगर की ओर चल पड़े।
अर्जुन उवाच
श्लोक 1 (3.170.1)
कृतास्त्रमतिविश्वस्तमथ मां हरिवाहनः । संस्पृश्य मूर्ध्नि पाणिभ्यामिदं वचनमब्रवीत् ॥
kṛtāstramativiśvastamatha māṃ harivāhanaḥ | saṃspṛśya mūrdhni pāṇibhyāmidaṃ vacanamabravīt
तब जब मैं अस्त्रविद्या में निपुण हो गया और उनका पूर्ण विश्वासपात्र बन गया, तब हरिवाहन इन्द्र ने अपने दोनों हाथों से मेरा सिर स्पर्श करके यह वचन कहा—
इन्द्र उवाच
श्लोक 2 (3.170.2)
न त्वमद्य युधा जेतुं शक्यः सुरगणैरपि । किं पुनर्मानुषे लोके मानुषैरकृतात्मभिः ॥
na tvamadya yudhā jetuṃ śakyaḥ suragaṇairapi | kiṃ punarmānuṣe loke mānuṣairakṛtātmabhiḥ
अब देवताओं के समूह भी तुम्हें युद्ध में नहीं जीत सकते; फिर मनुष्यलोक में असंयमी मनुष्यों की तो बात ही क्या!
श्लोक 3 (3.170.3)
अप्रमेयोऽप्रधृष्यश्च युद्धेष्वप्रतिमस्तथा । अजेयस्त्वं हि सङ्ग्रामे सर्वैरपि सुरासुरैः ॥
aprameyo'pradhṛṣyaśca yuddheṣvapratimastathā | ajeyastvaṃ hi saṅgrāme sarvairapi surāsuraiḥ
तुम अपरिमेय हो, तुम्हें कोई दबा नहीं सकता, और युद्धों में तुम्हारी कोई बराबरी नहीं। संग्राम में समस्त देवता और असुर मिलकर भी तुम्हें नहीं जीत सकते।
अर्जुन उवाच
श्लोक 4 (3.170.4)
अथाब्रवीत्पुनर्देवः संप्रहृष्टतनूरुहः । अस्त्रयुद्धे समो वीर न ते कश्चिद्भविष्यति ॥
athābravītpunardevaḥ saṃprahṛṣṭatanūruhaḥ | astrayuddhe samo vīra na te kaścidbhaviṣyati
फिर हर्ष से पुलकित होकर देवराज ने पुनः कहा— "वीर! अस्त्रयुद्ध में तुम्हारे समान कोई न होगा।"
इन्द्र उवाच
श्लोक 5 (3.170.5)
अप्रमत्तः सदा दक्षः सत्यवादी जितेन्द्रियः । ब्रह्मण्यश्चास्त्रविच्चासि शूरश्चासि कुरूद्वह ॥
apramattaḥ sadā dakṣaḥ satyavādī jitendriyaḥ | brahmaṇyaścāstraviccāsi śūraścāsi kurūdvaha
हे कुरुश्रेष्ठ! तुम सदा सावधान और दक्ष हो, सत्यवादी और जितेन्द्रिय हो; तुम ब्राह्मणों के भक्त, अस्त्रवेत्ता और शूरवीर हो।
श्लोक 6 (3.170.6)
अस्त्राणि समवाप्तानि त्वया दश च पञ्च च । पञ्चभिर्विधिभिः पार्थ विद्यते न त्वया समः ॥
astrāṇi samavāptāni tvayā daśa ca pañca ca | pañcabhirvidhibhiḥ pārtha vidyate na tvayā samaḥ
तुमने दस और पाँच अस्त्र, उनके पाँचों विधानों सहित, प्राप्त कर लिए हैं; हे पार्थ, तुम्हारे समान कोई नहीं है।
श्लोक 7 (3.170.7)
प्रयोगमुपसंहारमावृत्तिं च धनञ्जय । प्रायश्चित्तं च वेत्थ त्वं प्रतीघातं च सर्वशः ॥
prayogamupasaṃhāramāvṛttiṃ ca dhanañjaya | prāyaścittaṃ ca vettha tvaṃ pratīghātaṃ ca sarvaśaḥ
हे धनञ्जय, तुम अस्त्रों का प्रयोग, उपसंहार, बार-बार आवर्तन, प्रायश्चित्त और प्रतिघात — सब कुछ भली-भाँति जानते हो।
श्लोक 8 (3.170.8)
तव गुर्वर्थकालोऽयं समुत्पन्नः परंतप । प्रतिजानीष्व तं कर्तुं ततो वेत्स्याम्यहं परम् ॥
tava gurvarthakālo'yaṃ samutpannaḥ paraṃtapa | pratijānīṣva taṃ kartuṃ tato vetsyāmyahaṃ param
हे परंतप, अब तुम्हारी गुरुदक्षिणा का समय आ गया है। उसे चुकाने की प्रतिज्ञा करो, तब मैं तुम्हें आगे का कार्य बताऊँगा।
अर्जुन उवाच
श्लोक 9 (3.170.9)
ततोऽहमब्रवं राजन्देवराजमिदं वचः । विषह्यं यन्मया कर्तुं कृतमेव निबोध तत् ॥
tato'hamabravaṃ rājandevarājamidaṃ vacaḥ | viṣahyaṃ yanmayā kartuṃ kṛtameva nibodha tat
तब, हे राजन्, मैंने देवराज से यह कहा— "जो कुछ मेरे लिए करना सम्भव है, उसे आप पूरा हुआ ही समझिए।"
श्लोक 10 (3.170.10)
ततो मामब्रवीद्राजन्प्रहसन्बलवृत्रहा । नाविषह्यं तवाद्यास्ति त्रिषु लोकेषु किंचन ॥
tato māmabravīdrājanprahasanbalavṛtrahā | nāviṣahyaṃ tavādyāsti triṣu lokeṣu kiṃcana
तब, हे राजन्, बल और वृत्र का वध करने वाले इन्द्र ने हँसते हुए मुझसे कहा— "अब तीनों लोकों में ऐसा कुछ भी नहीं जो तुम्हारे लिए असाध्य हो।"
इन्द्र उवाच
श्लोक 11 (3.170.11)
निवातकवचा नाम दानवा मम शत्रवः । समुद्रकुक्षिमाश्रित्य दुर्गे प्रतिवसन्त्युत ॥
nivātakavacā nāma dānavā mama śatravaḥ | samudrakukṣimāśritya durge prativasantyuta
निवातकवच नाम के दानव मेरे शत्रु हैं, जो समुद्र के गर्भ का आश्रय लेकर एक दुर्गम दुर्ग में रहते हैं।
श्लोक 12 (3.170.12)
तिस्रः कोट्यः समाख्यातास्तुल्यरूपबलप्रभाः । तांस्तत्र जहि कौन्तेय गुर्वर्थस्ते भविष्यति ॥
tisraḥ koṭyaḥ samākhyātāstulyarūpabalaprabhāḥ | tāṃstatra jahi kaunteya gurvarthaste bhaviṣyati
वे तीन करोड़ बताए जाते हैं और रूप, बल तथा तेज में सब एक समान हैं। हे कौन्तेय, उन्हें वहीं मार डालो — यही तुम्हारी गुरुदक्षिणा होगी।
अर्जुन उवाच
श्लोक 13 (3.170.13)
ततो मातलिसंयुक्तं मयूरसमरोमभिः । हयैरुपेतं प्रादान्मे रथं दिव्यं महाप्रभम् ॥
tato mātalisaṃyuktaṃ mayūrasamaromabhiḥ | hayairupetaṃ prādānme rathaṃ divyaṃ mahāprabham
फिर उन्होंने मुझे मातलि द्वारा चलाया जाने वाला, मोर के समान रोमों वाले घोड़ों से जुता हुआ, महान् प्रभा वाला दिव्य रथ दिया।
श्लोक 14 (3.170.14)
बबन्ध चैव मे मूर्ध्नि किरीटमिदमुत्तमम् । स्वरूपसदृशं चैव प्रादादङ्गविभूषणम् ॥
babandha caiva me mūrdhni kirīṭamidamuttamam | svarūpasadṛśaṃ caiva prādādaṅgavibhūṣaṇam
उन्होंने मेरे सिर पर यह उत्तम किरीट बाँधा और मेरे रूप के अनुरूप अंगों के आभूषण भी दिए।
श्लोक 15 (3.170.15)
अभेद्यं कवचं चेदं स्पर्शरूपवदुत्तमम् । अजरां ज्यामिमां चापि गाण्डीवे समयोजयत् ॥
abhedyaṃ kavacaṃ cedaṃ sparśarūpavaduttamam | ajarāṃ jyāmimāṃ cāpi gāṇḍīve samayojayat
उन्होंने मुझे यह अभेद्य कवच दिया, जो स्पर्श और रूप दोनों में उत्तम है, और गाण्डीव पर यह कभी जीर्ण न होने वाली प्रत्यंचा चढ़ा दी।
श्लोक 16 (3.170.16)
ततः प्रायामहं तेन स्यन्दनेन विराजता । येनाजयद्देवपतिर्बलिं वैरोचनिं पुरा ॥
tataḥ prāyāmahaṃ tena syandanena virājatā | yenājayaddevapatirbaliṃ vairocaniṃ purā
तब मैं उस दीप्तिमान रथ पर सवार होकर चल पड़ा, जिसके द्वारा देवराज ने पूर्वकाल में विरोचनपुत्र बलि को जीता था।
श्लोक 17 (3.170.17)
ततो देवाः सर्व एव तेन घोषेण बोधिताः । मन्वाना देवराजं मां समाजग्मुर्विशांपते ॥
tato devāḥ sarva eva tena ghoṣeṇa bodhitāḥ | manvānā devarājaṃ māṃ samājagmurviśāṃpate
हे प्रजानाथ, तब उस रथ के घोष से जागे हुए सभी देवता मुझे देवराज समझकर वहाँ एकत्र हो गए।
श्लोक 18 (3.170.18)
दृष्ट्वा च मामपृच्छन्त किं करिष्यसि फल्गुन । तानब्रुवं यथाभूतमिदं कर्ताऽस्मि संयुगे ॥
dṛṣṭvā ca māmapṛcchanta kiṃ kariṣyasi phalguna | tānabruvaṃ yathābhūtamidaṃ kartā'smi saṃyuge
मुझे देखकर उन्होंने पूछा— "फाल्गुन, तुम क्या करने जा रहे हो?" मैंने उन्हें यथार्थ बता दिया कि युद्ध में मैं क्या करने वाला हूँ—
श्लोक 19 (3.170.19)
निवातकवचानां तु प्रस्थितं मां वधैषिणम् । निबोधत महाभागा शिवं चाशास्त मेऽनघाः ॥
nivātakavacānāṃ tu prasthitaṃ māṃ vadhaiṣiṇam | nibodhata mahābhāgā śivaṃ cāśāsta me'naghāḥ
"हे महाभाग देवताओ, जान लीजिए कि मैं निवातकवचों के वध की इच्छा से निकला हूँ; हे निष्पाप देवगण, मुझे मंगल का आशीर्वाद दीजिए।"
श्लोक 20 (3.170.20)
ततो वाग्भिः प्रशस्ताभिस्त्रिदशाः पृथिवीपते । तुष्टुवुर्मां प्रसन्नास्ते यथा देवं पुरंदरम् ॥
tato vāgbhiḥ praśastābhistridaśāḥ pṛthivīpate | tuṣṭuvurmāṃ prasannāste yathā devaṃ puraṃdaram
तब, हे पृथ्वीपते, प्रसन्न हुए देवताओं ने प्रशंसा भरे वचनों से मेरी वैसी ही स्तुति की, जैसी वे भगवान् पुरन्दर (इन्द्र) की करते हैं—
देवा ऊचुः
श्लोक 21 (3.170.21)
रथेनानेन मघवा जितवाञ्शम्बरं युधि । नमुचिं बलवृत्रौ च प्रह्लादनरकावपि ॥
rathenānena maghavā jitavāñśambaraṃ yudhi | namuciṃ balavṛtrau ca prahlādanarakāvapi
इसी रथ से मघवा (इन्द्र) ने युद्ध में शम्बर को जीता था, और नमुचि, बल, वृत्र, प्रह्लाद तथा नरक को भी।
श्लोक 22 (3.170.22)
बहूनि च सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदान्यपि । रथेनानेन दैत्यानां जितवान्मघवा युधि ॥
bahūni ca sahasrāṇi prayutānyarbudānyapi | rathenānena daityānāṃ jitavānmaghavā yudhi
इसी रथ से मघवा ने युद्ध में अनेक सहस्र, प्रयुत और अर्बुद तक दैत्यों को जीत लिया था।
श्लोक 23 (3.170.23)
त्वमप्यनेन कौन्तेय निवातकवचान्रणे । विजेता युधि विक्रम्य पुरेव मघवा वशी ॥
tvamapyanena kaunteya nivātakavacānraṇe | vijetā yudhi vikramya pureva maghavā vaśī
हे कौन्तेय, तुम भी इसी रथ से पराक्रम दिखाकर युद्ध में निवातकवचों को वैसे ही जीतोगे, जैसे पूर्वकाल में जितेन्द्रिय मघवा ने विजय पाई थी।
श्लोक 24 (3.170.24)
अयं च शङ्खप्रवरो येन जेतासि दानवान् । अनेन विजिता लोकाः शक्रेणापि महात्मना ॥
ayaṃ ca śaṅkhapravaro yena jetāsi dānavān | anena vijitā lokāḥ śakreṇāpi mahātmanā
और यह श्रेष्ठ शंख है, जिससे तुम दानवों को जीतोगे; इसी के द्वारा महात्मा शक्र ने भी लोकों पर विजय पाई थी।
अर्जुन उवाच
श्लोक 25 (3.170.25)
प्रदीयमानं देवैस्तं देवदत्तं जलोद्भवम् । प्रत्यगृह्णां जयायैनं स्तूयमानस्तदाऽमरैः ॥
pradīyamānaṃ devaistaṃ devadattaṃ jalodbhavam | pratyagṛhṇāṃ jayāyainaṃ stūyamānastadā'maraiḥ
देवताओं ने जल से उत्पन्न वह देवदत्त शंख मुझे भेंट किया, और अमरों की स्तुति के बीच मैंने विजय के लिए उसे ग्रहण किया।
श्लोक 26 (3.170.26)
स शङ्खी कवची बाणी प्रगृहीतशरासनः । दानवालयमत्युग्रं प्रयातोस्मि युयुत्सया ॥
sa śaṅkhī kavacī bāṇī pragṛhītaśarāsanaḥ | dānavālayamatyugraṃ prayātosmi yuyutsayā
शंख, कवच और बाणों से युक्त होकर, धनुष हाथ में लिए, मैं युद्ध की इच्छा से दानवों के अत्यन्त भयंकर निवास की ओर चल पड़ा।