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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 171

समुद्र के भीतर दानवनगर पर अर्जुन का आगमन

अर्जुन बताते हैं कि वे लहरों से उफनते और नौकाओं, जलजन्तुओं, शंखों तथा रत्नों से भरे समुद्र को पार करके दैत्यों के नगर के सामने पहुँचे। रथ की गर्जना सुनकर दानव उन्हें इन्द्र समझकर डर के मारे द्वार बन्द कर बैठे; पर जब उन्होंने देवदत्त शंख बजाया, तब निवातकवच हर प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लेकर हजारों की संख्या में निकल आए। मातलि ने उनके बीच रथ को इतने वेग से चलाया कि उसे कोई देख न पाया, दानवों के कोलाहल से बड़े-बड़े मत्स्य भाग खड़े हुए, और युद्ध छिड़ गया, जिसमें अर्जुन की स्तुति के लिए ऋषिगण आ जुटे।

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अर्जुन उवाच

श्लोक 1 (3.171.1)

ततोऽहं स्तूयमानस्तु तत्रतत्र सुरर्षिभिः । अपश्यमुदधिं भीममपांपतिमथाव्ययम् ॥

tato'haṃ stūyamānastu tatratatra surarṣibhiḥ | apaśyamudadhiṃ bhīmamapāṃpatimathāvyayam

तब जगह-जगह देवर्षियों से स्तुति पाते हुए मैंने भयंकर, अविनाशी जलपति समुद्र को देखा।

श्लोक 2 (3.171.2)

फेनवत्यः प्रकीर्णाश्च संहताश्च समुच्छ्रिताः । ऊर्मयश्चात्र दृश्यन्ते चलन्त इव पर्वताः ॥

phenavatyaḥ prakīrṇāśca saṃhatāśca samucchritāḥ | ūrmayaścātra dṛśyante calanta iva parvatāḥ

वहाँ फेन से भरी, बिखरी हुई, आपस में सटी और ऊँची उठती लहरें चलते-फिरते पर्वतों जैसी दिखाई देती थीं।

श्लोक 3 (3.171.3)

नावः सहस्रशस्तत्र रत्नपूर्णाः समन्ततः । नभसीव विमानानि विचरन्त्यो विरेजिरे ॥

nāvaḥ sahasraśastatra ratnapūrṇāḥ samantataḥ | nabhasīva vimānāni vicarantyo virejire

वहाँ चारों ओर रत्नों से भरी हजारों नौकाएँ थीं, जो आकाश में विचरते विमानों की भाँति चलती हुई शोभा पा रही थीं।

श्लोक 4 (3.171.4)

तिमिङ्गिलाः कच्छपाश्च तथा तिमितिमिङ्गिलाः । मकराश्चात्र दृश्यन्ते जले मग्ना इवाद्रयः ॥

timiṅgilāḥ kacchapāśca tathā timitimiṅgilāḥ | makarāścātra dṛśyante jale magnā ivādrayaḥ

वहाँ तिमिंगिल, कछुए, तिमितिमिंगिल और मगर जल में डूबे पर्वतों के समान दिखाई देते थे।

श्लोक 5 (3.171.5)

शङ्खानां च सहस्राणि मग्नान्यप्सु समन्ततः । दृश्यन्ते स्म यथा रात्रौ तारास्तन्वभ्रसंवृताः ॥

śaṅkhānāṃ ca sahasrāṇi magnānyapsu samantataḥ | dṛśyante sma yathā rātrau tārāstanvabhrasaṃvṛtāḥ

चारों ओर जल में हजारों शंख डूबे पड़े थे, जो ऐसे दिखते थे जैसे रात में पतले बादलों से ढके तारे।

श्लोक 6 (3.171.6)

तथा सहस्रशस्तत्र रत्नसङ्घाः प्लवन्त्युत । वायुश्च घूर्णते भीमस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥

tathā sahasraśastatra ratnasaṅghāḥ plavantyuta | vāyuśca ghūrṇate bhīmastadadbhutamivābhavat

वहाँ हजारों रत्नों के ढेर तैर रहे थे और भयंकर वायु चक्कर काट रही थी; वह दृश्य अद्भुत-सा था।

श्लोक 7 (3.171.7)

तमतीत्य महावेगं सर्वाम्भोनिधिमुत्तमम् । अपश्यं दानवाकीर्णं तद्दैत्यपुरमन्तिकात् ॥

tamatītya mahāvegaṃ sarvāmbhonidhimuttamam | apaśyaṃ dānavākīrṇaṃ taddaityapuramantikāt

उस प्रचण्ड वेग वाले, समस्त जलों के उत्तम भण्डार समुद्र को पार करके मैंने पास ही दानवों से भरा वह दैत्यनगर देखा।

श्लोक 8 (3.171.8)

तत्रैव मातलिस्तूर्णं निपात्य पृथिवीतले । दानवान्रथघोषेण तत्पुरं समुपाद्रवत् ॥

tatraiva mātalistūrṇaṃ nipātya pṛthivītale | dānavānrathaghoṣeṇa tatpuraṃ samupādravat

वहीं मातलि ने तुरन्त रथ को धरती पर उतारा और रथ की गड़गड़ाहट के साथ दानवों और उनके नगर पर धावा बोल दिया।

श्लोक 9 (3.171.9)

रथघोषं तु तं श्रुत्वा स्तनयित्नोरिवाम्बरे । मन्वाना देवराजं मामाविग्ना दानवाऽभवन् ॥

rathaghoṣaṃ tu taṃ śrutvā stanayitnorivāmbare | manvānā devarājaṃ māmāvignā dānavā'bhavan

आकाश में मेघगर्जन के समान रथ का वह घोष सुनकर दानव मुझे देवराज समझकर घबरा उठे।

श्लोक 10 (3.171.10)

सर्वे संभ्रान्तमनसः शरचापधराः स्थिताः । तथाऽसिशूलपरशुगदामुसलपाणयः ॥

sarve saṃbhrāntamanasaḥ śaracāpadharāḥ sthitāḥ | tathā'siśūlaparaśugadāmusalapāṇayaḥ

वे सब व्याकुलचित्त होकर धनुष-बाण लिए खड़े हो गए, और उनके हाथों में तलवारें, शूल, फरसे, गदाएँ और मूसल थे।

श्लोक 11 (3.171.11)

ततो द्वाराणि पिदधुर्दानवास्त्रस्तचेतसः । संविधाय पुरे रक्षां न स्म कश्चन दृश्यते ॥

tato dvārāṇi pidadhurdānavāstrastacetasaḥ | saṃvidhāya pure rakṣāṃ na sma kaścana dṛśyate

तब भयभीत दानवों ने द्वार बन्द कर दिए और नगर की रक्षा का प्रबन्ध कर लिया; उनमें से कोई दिखाई नहीं देता था।

श्लोक 12 (3.171.12)

ततः शङ्खमुपादाय देवदत्तं महास्वनम् । परमां मुदमाश्रित्य प्राधमं तं शनैरहम् ॥

tataḥ śaṅkhamupādāya devadattaṃ mahāsvanam | paramāṃ mudamāśritya prādhamaṃ taṃ śanairaham

तब मैंने महान् ध्वनि वाला देवदत्त शंख उठाया और परम हर्ष से भरकर धीरे-धीरे उसे बजाया।

श्लोक 13 (3.171.13)

स तु शब्दो दिवं स्तब्ध्वा प्रतिशब्दमजीजनत् । वित्रेसुश्च निलिल्युश्च भूतानि सुमहान्त्यपि ॥

sa tu śabdo divaṃ stabdhvā pratiśabdamajījanat | vitresuśca nililyuśca bhūtāni sumahāntyapi

वह शब्द आकाश में भरकर प्रतिध्वनि उत्पन्न करने लगा, और बड़े-बड़े प्राणी भी काँप उठे और छिप गए।

श्लोक 14 (3.171.14)

ततो निवातकवचाः सर्व एव समन्ततः । दंशिता विविधैस्त्राणैर्विचित्रायुधपाणयः ॥

tato nivātakavacāḥ sarva eva samantataḥ | daṃśitā vividhaistrāṇairvicitrāyudhapāṇayaḥ

तब सब ओर से सभी निवातकवच, अनेक प्रकार के कवच पहने और हाथों में विचित्र अस्त्र-शस्त्र लिए,

श्लोक 15 (3.171.15)

आयसैश्च महाशूलैर्गदाभिर्मुसलैरपि । पट्टसैः करवालैश्च रथचक्रैश्च भारत ॥

āyasaiśca mahāśūlairgadābhirmusalairapi | paṭṭasaiḥ karavālaiśca rathacakraiśca bhārata

हे भारत, लोहे के बड़े-बड़े शूल, गदाएँ, मूसल, पट्टिश, तलवारें और रथचक्र लेकर,

श्लोक 16 (3.171.16)

शतघ्नीभिर्भुशुण्डीभिः खड्गैश्चित्रैः स्वलंकृतैः । प्रगृहीतैर्दितेः पुत्राः प्रादुरासन्सहस्रशः ॥

śataghnībhirbhuśuṇḍībhiḥ khaḍgaiścitraiḥ svalaṃkṛtaiḥ | pragṛhītairditeḥ putrāḥ prādurāsansahasraśaḥ

शतघ्नियाँ, भुशुण्डियाँ और सुन्दर सजी हुई चमचमाती तलवारें हाथों में लिए दिति के पुत्र हजारों की संख्या में प्रकट हो गए।

श्लोक 17 (3.171.17)

ततो विचार्य बहुशो रथमार्गेषु तान्हयान् । प्राचोदयत्समे देशे मातलिर्भरतर्षभ ॥

tato vicārya bahuśo rathamārgeṣu tānhayān | prācodayatsame deśe mātalirbharatarṣabha

तब, हे भरतश्रेष्ठ, मातलि ने रथ के मार्गों पर बार-बार विचार करके घोड़ों को समतल भूमि पर हाँका।

श्लोक 18 (3.171.18)

तेन तेषां प्रणुन्नानामाशुत्वाच्छीघ्रगामिनाम् । नान्वपश्यत्तदा कश्चित्तन्मेऽद्भुतमिवाभवत् ॥

tena teṣāṃ praṇunnānāmāśutvācchīghragāminām | nānvapaśyattadā kaścittanme'dbhutamivābhavat

उनके हाँके हुए उन शीघ्रगामी घोड़ों की तीव्रता के कारण तब कोई उन्हें देख भी नहीं पाता था; यह मुझे अद्भुत-सा लगा।

श्लोक 19 (3.171.19)

ततस्ते दानवास्तत्र योधव्रातान्यनेकशः । विकृतस्वररूपाणि भृशं सर्वाण्यचोदयन् ॥

tataste dānavāstatra yodhavrātānyanekaśaḥ | vikṛtasvararūpāṇi bhṛśaṃ sarvāṇyacodayan

तब वहाँ उन दानवों ने विकृत स्वर और रूप वाले अपने अनेक योद्धा-दलों को ज़ोर से आगे बढ़ाया।

श्लोक 20 (3.171.20)

तेन शब्देन सहसा समुद्रे पर्वतोपमाः । आप्लवन्त गतैः सत्वैर्मत्स्याः शतसहस्रशः ॥

tena śabdena sahasā samudre parvatopamāḥ | āplavanta gataiḥ satvairmatsyāḥ śatasahasraśaḥ

उस शब्द से सहसा समुद्र में पर्वत जैसे विशाल लाखों मत्स्य सुध-बुध खोकर भाग खड़े हुए।

श्लोक 21 (3.171.21)

ततो वेगेन महता दानवा मामुपाद्रवन् । विमुञ्चन्तः शितान्बाणाञ्शतशोऽथ सहस्रशः ॥

tato vegena mahatā dānavā māmupādravan | vimuñcantaḥ śitānbāṇāñśataśo'tha sahasraśaḥ

तब दानव बड़े वेग से मुझ पर टूट पड़े और सैकड़ों-हजारों तीखे बाण छोड़ने लगे।

श्लोक 22 (3.171.22)

स संप्रहारस्तुमुलस्तेषां मम च भारत । अवर्तत महाघोरो निवातकवचान्तकः ॥

sa saṃprahārastumulasteṣāṃ mama ca bhārata | avartata mahāghoro nivātakavacāntakaḥ

हे भारत, तब उनके और मेरे बीच निवातकवचों का अन्त करने वाला अत्यन्त भयंकर और तुमुल युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 23 (3.171.23)

ततो देवर्षयश्चैव दानवर्षिगणाश्च ये । ब्रह्मर्षयश्च सिद्धाश्च समाजग्मुर्महामृधे ॥

tato devarṣayaścaiva dānavarṣigaṇāśca ye | brahmarṣayaśca siddhāśca samājagmurmahāmṛdhe

तब देवर्षि, दानवर्षियों के समूह, ब्रह्मर्षि और सिद्ध उस महासंग्राम में आ जुटे।

श्लोक 24 (3.171.24)

ते वै मामनुरूपाभिर्मधुराभिर्जयैषिणः । अस्तुवन्मुनयो वाग्भिर्यथेन्द्रं तारकामये ॥

te vai māmanurūpābhirmadhurābhirjayaiṣiṇaḥ | astuvanmunayo vāgbhiryathendraṃ tārakāmaye

मेरी विजय चाहने वाले उन मुनियों ने मधुर और उपयुक्त वचनों से मेरी वैसी ही स्तुति की, जैसी तारकामय संग्राम में इन्द्र की की थी।

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