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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 172

अर्जुन और निवातकवचों का युद्ध

निवातकवच अर्जुन को घेरकर उनके रथ पर शूलों, गदाओं और बाणों की वर्षा करते हैं। अर्जुन गाण्डीव से उन्हें मार गिराते हैं और मातलि दस हजार घोड़ों को ऐसी कुशलता से चलाते हैं कि वे दानवों को रौंद डालते हैं, और असुर सैकड़ों की संख्या में मारे जाते हैं। जब वे अर्जुन को बहुत पीड़ित करते हैं, तब अर्जुन माधव नाम से प्रसिद्ध, इन्द्र के प्रिय गान्धर्व अस्त्र का प्रयोग करके उनके हजारों शस्त्रों के टुकड़े कर देते हैं, और अपने बाणों से उन्हें ऐसा घायल कर देते हैं कि बल क्षीण होने पर निवातकवच माया से युद्ध करने लगते हैं।

अध्याय 171अध्याय-सूचीअध्याय 173

अर्जुन उवाच

श्लोक 1 (3.172.1)

ततो निवातकवचाः सर्वे वेगेन भारत । अभ्यद्रवन्मां सहिताः प्रगृहीतायुधा रणे ॥

tato nivātakavacāḥ sarve vegena bhārata | abhyadravanmāṃ sahitāḥ pragṛhītāyudhā raṇe

तब, हे भारत, सभी निवातकवच हथियार उठाए एक साथ बड़े वेग से रण में मुझ पर टूट पड़े।

श्लोक 2 (3.172.2)

आच्छाद्य रथपन्थानमुत्क्रोशन्तो महारथाः । आवृत्य सर्वतस्ते मां शरवर्षैरवाकिरन् ॥

ācchādya rathapanthānamutkrośanto mahārathāḥ | āvṛtya sarvataste māṃ śaravarṣairavākiran

रथ का मार्ग रोककर गर्जना करते हुए उन महारथियों ने मुझे चारों ओर से घेर लिया और बाणों की वर्षा से ढक दिया।

श्लोक 3 (3.172.3)

ततोऽपरे महावीर्याः शूलपट्टसपाणयः । शूलानि च भुशुण्डीश्च मुमुचुर्दानवा मयि ॥

tato'pare mahāvīryāḥ śūlapaṭṭasapāṇayaḥ | śūlāni ca bhuśuṇḍīśca mumucurdānavā mayi

फिर दूसरे महापराक्रमी दानवों ने, हाथों में शूल और पट्टिश लिए, मुझ पर शूल और भुशुण्डियाँ चलाईं।

श्लोक 4 (3.172.4)

सुमहत्तुमुलं वर्षं गदाशक्तिसमाकुलम् । अनिशं सृज्यमानं तैरपतन्मद्रथोपरि ॥

sumahattumulaṃ varṣaṃ gadāśaktisamākulam | aniśaṃ sṛjyamānaṃ tairapatanmadrathopari

उनके द्वारा निरन्तर छोड़ी गई, गदाओं और शक्तियों से भरी वह विशाल, भयंकर वर्षा मेरे रथ पर गिरने लगी।

श्लोक 5 (3.172.5)

अन्ये मामभ्यधावन्त निवातकवचा युधि । शितशस्त्रायुधा रौद्राः कालरूपाः प्रहारिणः ॥

anye māmabhyadhāvanta nivātakavacā yudhi | śitaśastrāyudhā raudrāḥ kālarūpāḥ prahāriṇaḥ

दूसरे निवातकवच तीखे शस्त्र लिए, काल के समान रूप वाले, भयंकर प्रहार करते हुए युद्ध में मुझ पर दौड़े।

श्लोक 6 (3.172.6)

तानहं विविधैर्बाणैर्वेगवद्भिरजिह्मगैः । गाण्डीवमुक्तैरभ्यघ्नमेकैकं दशभिर्मृधे ॥

tānahaṃ vividhairbāṇairvegavadbhirajihmagaiḥ | gāṇḍīvamuktairabhyaghnamekaikaṃ daśabhirmṛdhe

मैंने गाण्डीव से छोड़े गए वेगवान, सीधे जाने वाले अनेक प्रकार के बाणों से उस युद्ध में उनमें से प्रत्येक को दस-दस बाण मारे।

श्लोक 7 (3.172.7)

ते कृता विमुखाः सर्वे मत्प्रयुक्तैः शिलाशितैः । ततो मातलिना तूर्णं हयास्ते संप्रचोदिताः ॥

te kṛtā vimukhāḥ sarve matprayuktaiḥ śilāśitaiḥ | tato mātalinā tūrṇaṃ hayāste saṃpracoditāḥ

मेरे छोड़े हुए, शिला पर तेज़ किए गए बाणों से वे सब पीठ दिखाकर लौट पड़े। तब मातलि ने तुरन्त घोड़ों को हाँका,

श्लोक 8 (3.172.8)

अथ मार्गान्बहूंस्तत्र विचेरुर्वातरंहसः । सुसंयता मातलिना प्रामथ्नन्त दितेः सुतान् ॥

atha mārgānbahūṃstatra vicerurvātaraṃhasaḥ | susaṃyatā mātalinā prāmathnanta diteḥ sutān

और वायु के समान वेग वाले वे घोड़े वहाँ अनेक मार्गों पर दौड़ने लगे; मातलि द्वारा भली-भाँति नियन्त्रित होकर उन्होंने दिति के पुत्रों को रौंद डाला।

श्लोक 9 (3.172.9)

शतं शतास्ते हरयस्तस्मिन्युक्ता महारथे । तदा मातलिना यत्ता व्यचरन्नल्पका इव ॥

śataṃ śatāste harayastasminyuktā mahārathe | tadā mātalinā yattā vyacarannalpakā iva

उस महारथ में सौ-सौ के सौ घोड़े जुते हुए थे, फिर भी मातलि के सधे हुए नियन्त्रण में वे ऐसे चलते थे मानो थोड़े-से ही हों।

श्लोक 10 (3.172.10)

तेषां चरणपातेन रथनेमिस्वनेन च । मम बाणनिपातैश्च हतास्ते शतशोऽसुराः ॥

teṣāṃ caraṇapātena rathanemisvanena ca | mama bāṇanipātaiśca hatāste śataśo'surāḥ

उनके खुरों की चोट से, रथ के पहियों की गड़गड़ाहट से और मेरे बाणों के प्रहार से वे असुर सैकड़ों की संख्या में मारे गए।

श्लोक 11 (3.172.11)

गतासवस्तथैवान्ये दानवाः पाण्डवर्षभ । हतसारथयस्तत्र व्यकृष्यन्त तुरंगमैः ॥

gatāsavastathaivānye dānavāḥ pāṇḍavarṣabha | hatasārathayastatra vyakṛṣyanta turaṃgamaiḥ

हे पाण्डवश्रेष्ठ, इसी प्रकार दूसरे दानव भी प्राणहीन हो गए, और सारथियों के मारे जाने पर घोड़े उन्हें वहाँ घसीटते फिरे।

श्लोक 12 (3.172.12)

ते दिशो विदिशः सर्वे प्रतिरुध्य प्रहारिणः । अभ्यघ्नन्विविधैः शस्त्रैस्ततो मे व्यथितं मनः ॥

te diśo vidiśaḥ sarve pratirudhya prahāriṇaḥ | abhyaghnanvividhaiḥ śastraistato me vyathitaṃ manaḥ

उन प्रहार करने वालों ने सब दिशाओं और उपदिशाओं को घेरकर अनेक प्रकार के शस्त्रों से मुझ पर आघात किया; तब मेरा मन व्यथित हो उठा।

श्लोक 13 (3.172.13)

ततोऽहं मातलेर्वीर्यमद्भुतं समदर्शयम् । अश्वांस्तथा वेगवतो यदयत्नादधारयत् ॥

tato'haṃ mātalervīryamadbhutaṃ samadarśayam | aśvāṃstathā vegavato yadayatnādadhārayat

तब मैंने मातलि का अद्भुत पराक्रम देखा कि वे उन वेगवान घोड़ों को कितनी सहजता से साधे हुए थे।

श्लोक 14 (3.172.14)

ततोऽहं लघुभिश्चित्रैरस्त्रैस्तानसुरान्रणे । चिच्छेद सायुधान्राजञ्छतशोऽथ सहस्रशः ॥

tato'haṃ laghubhiścitrairastraistānasurānraṇe | ciccheda sāyudhānrājañchataśo'tha sahasraśaḥ

तब, हे राजन्, मैंने हल्के और विचित्र अस्त्रों से रण में उन असुरों को उनके शस्त्रों सहित सैकड़ों और हजारों की संख्या में काट डाला।

श्लोक 15 (3.172.15)

एवं मे चरतस्तत्र सर्वयत्नेन शत्रुहन् । प्रीतिमानभवद्वीरो मातलिः शक्रसारथिः ॥

evaṃ me caratastatra sarvayatnena śatruhan | prītimānabhavadvīro mātaliḥ śakrasārathiḥ

हे शत्रुसूदन, जब मैं इस प्रकार पूरे प्रयत्न से वहाँ विचर रहा था, तब इन्द्र के सारथि वीर मातलि बहुत प्रसन्न हुए।

श्लोक 16 (3.172.16)

वध्यमानास्ततस्तैस्तु हयैस्तेन रथेन च । अगमन्प्रक्षयं केचिन्न्यवर्तन्त तथाऽपरे ॥

vadhyamānāstatastaistu hayaistena rathena ca | agamanprakṣayaṃ kecinnyavartanta tathā'pare

तब उन घोड़ों और उस रथ से कुचले जाकर कुछ नष्ट हो गए और कुछ लौट पड़े।

श्लोक 17 (3.172.17)

स्पर्धमाना इवास्माभिर्निवातकवचा रणे । शरवर्षैः शरार्तं मां महद्भिः प्रत्यवारयन् ॥

spardhamānā ivāsmābhirnivātakavacā raṇe | śaravarṣaiḥ śarārtaṃ māṃ mahadbhiḥ pratyavārayan

मानो हमसे होड़ करते हुए निवातकवचों ने युद्ध में, बाणों से पीड़ित मुझको, बड़ी-बड़ी बाणवर्षाओं से रोक दिया।

श्लोक 18 (3.172.18)

शरवेगैर्निहत्याहमस्त्रैः शरविघातिभिः । ज्वलद्भिः परमैः शीघ्रैस्तानविध्यं सहस्रशः ॥

śaravegairnihatyāhamastraiḥ śaravighātibhiḥ | jvaladbhiḥ paramaiḥ śīghraistānavidhyaṃ sahasraśaḥ

बाणों को नष्ट करने वाले अस्त्रों से उनके बाणों का वेग नष्ट करके मैंने श्रेष्ठ, शीघ्रगामी और प्रज्वलित बाणों से उन्हें हजारों की संख्या में बींध डाला।

श्लोक 19 (3.172.19)

ततः संपीड्यमानास्ते क्रोधाविष्टा महासुराः । अपीडयन्मां सहिताः शक्तिशूलासिवृष्टिभिः ॥

tataḥ saṃpīḍyamānāste krodhāviṣṭā mahāsurāḥ | apīḍayanmāṃ sahitāḥ śaktiśūlāsivṛṣṭibhiḥ

तब इस प्रकार पीड़ित होकर क्रोध से भरे उन महान् असुरों ने एक साथ शक्ति, शूल और तलवारों की वर्षा से मुझे पीड़ित किया।

श्लोक 20 (3.172.20)

ततोऽहमस्त्रं प्रायुञ्जं गान्धर्वं नाम भारत । दयितं देवराजस्य माधवं नाम भारत ॥

tato'hamastraṃ prāyuñjaṃ gāndharvaṃ nāma bhārata | dayitaṃ devarājasya mādhavaṃ nāma bhārata

तब, हे भारत, मैंने गान्धर्व नामक अस्त्र का प्रयोग किया, जो माधव नाम से प्रसिद्ध और देवराज को प्रिय है।

श्लोक 21 (3.172.21)

ततः खड्गांस्त्रिशूलांश्च तोमरांश्च सहस्रशः । अस्त्रवीर्येण शतधा तैर्मुक्तानहमच्छिदम् ॥

tataḥ khaḍgāṃstriśūlāṃśca tomarāṃśca sahasraśaḥ | astravīryeṇa śatadhā tairmuktānahamacchidam

तब उस अस्त्र के बल से मैंने उनके द्वारा छोड़ी गई हजारों तलवारों, त्रिशूलों और तोमरों के सौ-सौ टुकड़े कर दिए।

श्लोक 22 (3.172.22)

छित्त्वा प्रहरणान्येषां ततस्तानपि सर्वशः । प्रत्यविध्यमहं रोषाद्दशभिर्दशभिः शरैः ॥

chittvā praharaṇānyeṣāṃ tatastānapi sarvaśaḥ | pratyavidhyamahaṃ roṣāddaśabhirdaśabhiḥ śaraiḥ

उनके हथियार काट देने के बाद मैंने क्रोध में भरकर उन सबको भी दस-दस बाणों से बींध डाला।

श्लोक 23 (3.172.23)

गाण्डीवाद्धि तदा सङ्ख्ये यथा भ्रमरपङ्क्तयः । निष्पतन्ति महाबाणास्तन्मातलिरपूजयत् ॥

gāṇḍīvāddhi tadā saṅkhye yathā bhramarapaṅktayaḥ | niṣpatanti mahābāṇāstanmātalirapūjayat

उस युद्ध में गाण्डीव से भौंरों की पंक्तियों के समान बड़े-बड़े बाण निकल रहे थे; मातलि ने इसकी सराहना की।

श्लोक 24 (3.172.24)

तेषामपि तु बाणास्ते बहुत्वाच्छलभा इव । अवाकिरन्मां बलवत्तानहं व्यधमं शरैः ॥

teṣāmapi tu bāṇāste bahutvācchalabhā iva | avākiranmāṃ balavattānahaṃ vyadhamaṃ śaraiḥ

उनके बाण भी इतने अधिक थे कि टिड्डियों के दल की तरह उन्होंने मुझे ज़ोर से ढक लिया, पर मैंने अपने बाणों से उन्हें छिन्न-भिन्न कर दिया।

श्लोक 25 (3.172.25)

वध्यमानास्ततस्ते तु निवातकवचाः पुनः । शरवर्षैर्महद्भिर्मां समन्तात्पर्यवारयन् ॥

vadhyamānāstataste tu nivātakavacāḥ punaḥ | śaravarṣairmahadbhirmāṃ samantātparyavārayan

इस प्रकार मारे जाते हुए निवातकवचों ने फिर से बड़ी-बड़ी बाणवर्षाओं से मुझे चारों ओर से घेर लिया।

श्लोक 26 (3.172.26)

शरवेगान्निहत्याहमस्त्रैरस्त्रविघातिभिः । ज्वलद्भिः परमैः शीघ्रैस्तानविध्यं सहस्रशः ॥

śaravegānnihatyāhamastrairastravighātibhiḥ | jvaladbhiḥ paramaiḥ śīghraistānavidhyaṃ sahasraśaḥ

अस्त्रों का नाश करने वाले अस्त्रों से उनके बाणों का वेग नष्ट करके मैंने श्रेष्ठ, शीघ्रगामी और प्रज्वलित बाणों से उन्हें हजारों की संख्या में बींध डाला।

श्लोक 27 (3.172.27)

तेषां छिन्नानि गात्राणि विसृजन्ति स्म शोणितम् । प्रावृषीवाभिवृष्टानि शृङ्गाण्यथ धराभृताम् ॥

teṣāṃ chinnāni gātrāṇi visṛjanti sma śoṇitam | prāvṛṣīvābhivṛṣṭāni śṛṅgāṇyatha dharābhṛtām

उनके कटे हुए अंगों से रक्त बह रहा था, जैसे वर्षाऋतु में भीगी हुई पर्वतों की चोटियों से जल बहता है।

श्लोक 28 (3.172.28)

इन्द्राशनिसमस्पर्शैर्वेगवद्भिरजिह्मगैः । मद्बाणैर्वध्यमानास्ते समुद्विग्नाः स्म दानवाः ॥

indrāśanisamasparśairvegavadbhirajihmagaiḥ | madbāṇairvadhyamānāste samudvignāḥ sma dānavāḥ

इन्द्र के वज्र के समान स्पर्श वाले, वेगवान और सीधे चलने वाले मेरे बाणों से मारे जाते हुए वे दानव अत्यन्त व्याकुल हो उठे।

श्लोक 29 (3.172.29)

शतधा भिन्नदेहास्ते क्षीणप्रहरणौजसः । ततो निवातकवचा मामयुध्यन्त मायया ॥

śatadhā bhinnadehāste kṣīṇapraharaṇaujasaḥ | tato nivātakavacā māmayudhyanta māyayā

उनके शरीर सौ-सौ जगह से छिद गए, शस्त्र और बल क्षीण हो गए; तब निवातकवच माया के द्वारा मुझसे लड़ने लगे।

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