आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 173
दानवों की माया और मातलि का भय
निवातकवच माया का सहारा लेते हैं: पहले शिलाओं की वर्षा, फिर जल की बाढ़, फिर अग्नि और वायु, जिनका अर्जुन इन्द्रास्त्र, शोषण-अस्त्र, जलास्त्र और शैलास्त्र से प्रतिकार करते हैं। जब वे घना अन्धकार फैला देते हैं, तब घोड़े बिदक जाते हैं और मातलि के हाथ से चाबुक गिर पड़ता है; वे इन्द्र के सारथि के रूप में देखे गए महायुद्धों का स्मरण करते हुए कहते हैं कि वे कभी इतने विमूढ़ नहीं हुए। अर्जुन स्वयं को सँभालकर मातलि को ढाढ़स बँधाते हैं और अपनी अस्त्र-माया से उनकी मायाएँ नष्ट करते हैं, पर दानव नई-नई मायाएँ रचते रहते हैं और अन्त में माया से ढककर उनकी दृष्टि से ओझल हो जाते हैं।
अर्जुन उवाच
श्लोक 1 (3.173.1)
ततोऽश्मवर्षं सुमहत्प्रादुरासीत्समन्ततः । नगमात्रैः शिलाखण्डैस्तन्मां दृढमपीडयत् ॥
tato'śmavarṣaṃ sumahatprādurāsītsamantataḥ | nagamātraiḥ śilākhaṇḍaistanmāṃ dṛḍhamapīḍayat
तब चारों ओर पत्थरों की विशाल वर्षा होने लगी; वृक्षों जितने बड़े शिलाखण्डों से उसने मुझे बुरी तरह पीड़ित किया।
श्लोक 2 (3.173.2)
तदहं वज्रसंकाशैः शरैरिन्द्रास्त्रचोदितैः । अचूर्णयं वेगवद्भिः शतधैकैकमाहवे ॥
tadahaṃ vajrasaṃkāśaiḥ śarairindrāstracoditaiḥ | acūrṇayaṃ vegavadbhiḥ śatadhaikaikamāhave
मैंने इन्द्रास्त्र से प्रेरित, वज्र के समान वेगवान बाणों से उस युद्ध में एक-एक शिला के सौ-सौ टुकड़े करके उसे चूर्ण कर दिया।
श्लोक 3 (3.173.3)
चूर्ण्यमानेऽश्मवर्षे तु पावकः समजायत । तत्राश्मचूर्णा न्यपतन्पावकप्रकरा इव ॥
cūrṇyamāne'śmavarṣe tu pāvakaḥ samajāyata | tatrāśmacūrṇā nyapatanpāvakaprakarā iva
जब पत्थरों की वर्षा चूर्ण हो रही थी, तब आग उत्पन्न हो गई, और वहाँ पत्थरों का चूर्ण अंगारों के ढेरों के समान गिरने लगा।
श्लोक 4 (3.173.4)
ततोऽश्मवर्षे विहते जलवर्षं महत्तरम् । धाराभिरक्षमात्राभिः प्रादुरासीन्ममान्तिके ॥
tato'śmavarṣe vihate jalavarṣaṃ mahattaram | dhārābhirakṣamātrābhiḥ prādurāsīnmamāntike
पत्थरों की वर्षा नष्ट हो जाने पर मेरे पास उससे भी बड़ी जलवर्षा होने लगी, जिसकी धाराएँ रथ की धुरी जितनी मोटी थीं।
श्लोक 5 (3.173.5)
नभसः प्रच्युता धारास्तिग्मवीर्याः सहस्रशः । आवृण्वन्सर्वतो व्योम दिशश्चोपदिशस्तथा ॥
nabhasaḥ pracyutā dhārāstigmavīryāḥ sahasraśaḥ | āvṛṇvansarvato vyoma diśaścopadiśastathā
आकाश से गिरती हुई प्रचण्ड वेग वाली हजारों धाराओं ने सब ओर से आकाश, दिशाओं और उपदिशाओं को ढक लिया।
श्लोक 6 (3.173.6)
धाराणां च निपातेन वायोर्विष्फूर्जितेन च । गर्जितेन च मेघानां न प्राज्ञायत किंचन ॥
dhārāṇāṃ ca nipātena vāyorviṣphūrjitena ca | garjitena ca meghānāṃ na prājñāyata kiṃcana
धाराओं के गिरने, वायु की गर्जना और मेघों के गर्जन के कारण कुछ भी पहचाना नहीं जाता था।
श्लोक 7 (3.173.7)
धारा दिवि च संबद्धा वसुधायां च सर्वशः । व्यामोहयन्त मां तत्र निपतन्त्योऽनिशं भुवि ॥
dhārā divi ca saṃbaddhā vasudhāyāṃ ca sarvaśaḥ | vyāmohayanta māṃ tatra nipatantyo'niśaṃ bhuvi
आकाश से पृथ्वी तक सब ओर जुड़ी हुई और निरन्तर भूमि पर गिरती हुई उन धाराओं ने वहाँ मुझे भ्रमित कर दिया।
श्लोक 8 (3.173.8)
तत्रोपदिष्टमिन्द्रेण दिव्यमस्त्रं विशोषणम् । दीप्तं प्राहिणवं घोरमशुष्यत्तेन तज्जलम् ॥
tatropadiṣṭamindreṇa divyamastraṃ viśoṣaṇam | dīptaṃ prāhiṇavaṃ ghoramaśuṣyattena tajjalam
तब मैंने इन्द्र द्वारा सिखाया हुआ प्रज्वलित, भयंकर, दिव्य शोषण-अस्त्र छोड़ा, जिससे वह सारा जल सूख गया।
श्लोक 9 (3.173.9)
हतेऽश्मवर्षे च मया जलवर्षे च शोषिते । मुमुचुर्दानवा मायामग्निं वायुं च भारत ॥
hate'śmavarṣe ca mayā jalavarṣe ca śoṣite | mumucurdānavā māyāmagniṃ vāyuṃ ca bhārata
हे भारत, जब मैंने पत्थरों की वर्षा नष्ट कर दी और जलवर्षा सुखा दी, तब दानवों ने अग्नि और वायु की माया छोड़ी।
श्लोक 10 (3.173.10)
ततोऽहमग्निं व्यधमं सलिलास्त्रेण सर्वशः । शैलेन च महास्त्रेण वायोर्वेगमधारयम् ॥
tato'hamagniṃ vyadhamaṃ salilāstreṇa sarvaśaḥ | śailena ca mahāstreṇa vāyorvegamadhārayam
तब मैंने जलास्त्र से अग्नि को पूरी तरह शान्त कर दिया और महान् शैलास्त्र से वायु का वेग रोक दिया।
श्लोक 11 (3.173.11)
तस्यां प्रतिहतायां ते दानवा युद्धदुर्मदाः । प्राकुर्वन्विविधां मायां यौगपद्येन भारत ॥
tasyāṃ pratihatāyāṃ te dānavā yuddhadurmadāḥ | prākurvanvividhāṃ māyāṃ yaugapadyena bhārata
हे भारत, उसके नष्ट हो जाने पर युद्ध के उन्मादी दानवों ने एक साथ अनेक प्रकार की माया रची।
श्लोक 12 (3.173.12)
ततो वर्षं प्रादुरभूत्सुमहद्रोमहर्षणम् । अस्त्राणां घोररूपाणामग्नेर्वायोस्तथाऽश्मनाम् ॥
tato varṣaṃ prādurabhūtsumahadromaharṣaṇam | astrāṇāṃ ghorarūpāṇāmagnervāyostathā'śmanām
तब भयंकर अस्त्रों, अग्नि, वायु और पत्थरों की एक विशाल, रोंगटे खड़े कर देने वाली वर्षा होने लगी।
श्लोक 13 (3.173.13)
सा तु मायामयी वृष्टिः पीडयामास मां युधि । अथ घोरं तमस्तीव्रं प्रादुरासीत्समन्ततः ॥
sā tu māyāmayī vṛṣṭiḥ pīḍayāmāsa māṃ yudhi | atha ghoraṃ tamastīvraṃ prādurāsītsamantataḥ
उस मायामयी वर्षा ने युद्ध में मुझे पीड़ित कर दिया; फिर चारों ओर भयानक, घना अन्धकार छा गया।
श्लोक 14 (3.173.14)
तमसा संवृते लोके घोरेण परुषेण च । हरयो विमुखाश्चासन्प्रास्खलच्चापि मातलिः ॥
tamasā saṃvṛte loke ghoreṇa paruṣeṇa ca | harayo vimukhāścāsanprāskhalaccāpi mātaliḥ
जब संसार उस भयानक और कठोर अन्धकार से ढक गया, तब घोड़े मुँह फेरने लगे और मातलि भी लड़खड़ा गए।
श्लोक 15 (3.173.15)
हस्ताद्धिरण्मयश्चास्य प्रतोदः प्रापतद्भुवि । असकृच्चाह मां भीतः किं करिष्याव इत्यपि ॥
hastāddhiraṇmayaścāsya pratodaḥ prāpatadbhuvi | asakṛccāha māṃ bhītaḥ kiṃ kariṣyāva ityapi
उनके हाथ से सोने का चाबुक धरती पर गिर पड़ा, और वे भयभीत होकर बार-बार मुझसे कहने लगे— "हम दोनों क्या करें?"
श्लोक 16 (3.173.16)
मां च भीराविशत्तीव्रा तस्मिन्विगतचेतसि । स च मां विगतज्ञानः संत्रस्तमिदमब्रवीत् ॥
māṃ ca bhīrāviśattīvrā tasminvigatacetasi | sa ca māṃ vigatajñānaḥ saṃtrastamidamabravīt
उनके सुध-बुध खो देने पर मुझमें भी तीव्र भय समा गया; और विवेक खो चुके मातलि ने भयभीत हुए मुझसे यह कहा—
मातलिरुवाच
श्लोक 17 (3.173.17)
सुराणामसुराणां च संग्रामः सुमहानभूत् । अमृतार्थं पुरा पार्थ स च दृष्टो मयाऽनघ ॥
surāṇāmasurāṇāṃ ca saṃgrāmaḥ sumahānabhūt | amṛtārthaṃ purā pārtha sa ca dṛṣṭo mayā'nagha
हे पार्थ, पूर्वकाल में अमृत के लिए देवताओं और असुरों के बीच महान् संग्राम हुआ था; हे निष्पाप, उसे मैंने देखा था।
श्लोक 18 (3.173.18)
शम्बरस्य वधे घोरः संग्रामः सुमहानभूत् । सारथ्यं देवराजस्य तत्रापि कृतवानहम् ॥
śambarasya vadhe ghoraḥ saṃgrāmaḥ sumahānabhūt | sārathyaṃ devarājasya tatrāpi kṛtavānaham
शम्बर के वध के समय भी भयंकर महायुद्ध हुआ था; वहाँ भी मैंने देवराज का सारथ्य किया था।
श्लोक 19 (3.173.19)
तथैव वृत्रस्य वधे संगृहीता हया मया । वैरोचनेर्मया युद्धं दृष्टं चापि सुदारुणम् ॥
tathaiva vṛtrasya vadhe saṃgṛhītā hayā mayā | vairocanermayā yuddhaṃ dṛṣṭaṃ cāpi sudāruṇam
इसी प्रकार वृत्र के वध में घोड़ों की रास मैंने ही थामी थी, और विरोचनपुत्र (बलि) के साथ हुआ अत्यन्त दारुण युद्ध भी मैंने देखा है।
श्लोक 20 (3.173.20)
एते मया महाघोराः संग्रामाः पर्युपासिताः । न चापि विगतज्ञानो भूतपूर्वोस्मि पाण्डव ॥
ete mayā mahāghorāḥ saṃgrāmāḥ paryupāsitāḥ | na cāpi vigatajñāno bhūtapūrvosmi pāṇḍava
हे पाण्डव, इन सभी अत्यन्त भयंकर संग्रामों में मैं उपस्थित रहा हूँ, परन्तु पहले कभी मेरी चेतना इस प्रकार नष्ट नहीं हुई।
श्लोक 21 (3.173.21)
पितामहेन संहारः प्रजानां विहितो ध्रुवम् । न हि युद्धमिदं युक्तमन्यत्र जगतः क्षयात् ॥
pitāmahena saṃhāraḥ prajānāṃ vihito dhruvam | na hi yuddhamidaṃ yuktamanyatra jagataḥ kṣayāt
निश्चय ही पितामह (ब्रह्मा) ने प्रजा का संहार निश्चित कर दिया है, क्योंकि जगत के प्रलय के सिवा ऐसा युद्ध उचित नहीं है।
अर्जुन उवाच
श्लोक 22 (3.173.22)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । मोहयिष्यन्दानवानामहं मायाबलं महत् ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā saṃstabhyātmānamātmanā | mohayiṣyandānavānāmahaṃ māyābalaṃ mahat
उनकी यह बात सुनकर मैंने स्वयं ही अपने को सँभाला, और दानवों की महान् माया-शक्ति को मोहित करने के लिए
श्लोक 23 (3.173.23)
अब्रुवं मातलिं भीतं पश्य मे भुजयोर्बलम् । अस्त्राणां च प्रभावं वै धनुषो गाण्डिवस्य च ॥
abruvaṃ mātaliṃ bhītaṃ paśya me bhujayorbalam | astrāṇāṃ ca prabhāvaṃ vai dhanuṣo gāṇḍivasya ca
भयभीत मातलि से कहा— "मेरी भुजाओं का बल, मेरे अस्त्रों का प्रभाव और गाण्डीव धनुष की शक्ति देखो।
श्लोक 24 (3.173.24)
अद्यास्त्रमाययैतेषां मायामेतां सुदारुणाम् । विनिहन्मि तमश्चोग्रं मा भैः सूत स्थिरो भव ॥
adyāstramāyayaiteṣāṃ māyāmetāṃ sudāruṇām | vinihanmi tamaścograṃ mā bhaiḥ sūta sthiro bhava
आज मैं अपने अस्त्रों की माया से इनकी इस अत्यन्त भयानक माया और इस घोर अन्धकार को नष्ट कर दूँगा। सूत, डरो मत, स्थिर रहो।"
श्लोक 25 (3.173.25)
एवमुक्त्वाहमसृजमस्त्रमायां नराधिप । मोहनीं सर्वभूतानां हिताय त्रिदिवौकसाम् ॥
evamuktvāhamasṛjamastramāyāṃ narādhipa | mohanīṃ sarvabhūtānāṃ hitāya tridivaukasām
हे नराधिप, ऐसा कहकर मैंने स्वर्गवासियों के हित के लिए समस्त प्राणियों को मोहित करने वाली अस्त्र-माया छोड़ी।
श्लोक 26 (3.173.26)
पीड्यमानासु मायासु तासु तास्वसुरोत्तमाः । पुनर्बहुविधा मायाः प्राकुर्वन्नमितौजसः ॥
pīḍyamānāsu māyāsu tāsu tāsvasurottamāḥ | punarbahuvidhā māyāḥ prākurvannamitaujasaḥ
जब उनकी एक-एक माया नष्ट होने लगी, तब अपार बल वाले उन श्रेष्ठ असुरों ने फिर अनेक प्रकार की मायाएँ रचीं।
श्लोक 27 (3.173.27)
पुनः प्रकाशमभवत्तमसा ग्रस्यते पुनः । भवत्यदर्शनो लोकः पुनरप्सु निमज्जति ॥
punaḥ prakāśamabhavattamasā grasyate punaḥ | bhavatyadarśano lokaḥ punarapsu nimajjati
कभी प्रकाश हो जाता, फिर अन्धकार उसे निगल लेता; संसार अदृश्य हो जाता, और फिर जल में डूब जाता।
श्लोक 28 (3.173.28)
सुसंगृहीतैर्हरिभिः प्रकाशे सति मातलिः । व्यचरत्स्यन्दनाग्र्येण संग्रामे रोमहर्षणे ॥
susaṃgṛhītairharibhiḥ prakāśe sati mātaliḥ | vyacaratsyandanāgryeṇa saṃgrāme romaharṣaṇe
जब प्रकाश होता, तब मातलि घोड़ों को भली-भाँति साधकर उस श्रेष्ठ रथ के साथ उस रोमांचकारी संग्राम में विचरते।
श्लोक 29 (3.173.29)
ततः पर्यपतन्नुग्रा निवातकवचा मयि । तानहं विवरं दृष्ट्वा प्राहिण्वं यमसादनम् ॥
tataḥ paryapatannugrā nivātakavacā mayi | tānahaṃ vivaraṃ dṛṣṭvā prāhiṇvaṃ yamasādanam
तब भयंकर निवातकवच मुझ पर टूट पड़े, और अवसर देखकर मैंने उन्हें यमलोक भेज दिया।
श्लोक 30 (3.173.30)
वर्तमाने तथा युद्धे निवातकवचान्तके । नापश्यं सहसा सर्वान्दानवान्मायया वृतान् ॥
vartamāne tathā yuddhe nivātakavacāntake | nāpaśyaṃ sahasā sarvāndānavānmāyayā vṛtān
जब निवातकवचों का अन्त करने वाला वह युद्ध इस प्रकार चल रहा था, तभी सहसा माया से ढके वे सब दानव मुझे दिखाई देना बन्द हो गए।