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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 174

निवातकवचों का संहार

अदृश्य रहकर लड़ते निवातकवचों के सिर अर्जुन के अस्त्रमन्त्रों से प्रेरित बाण काट डालते हैं और वे अपने नगर में लौट जाते हैं; फिर वे अदृश्य होकर आकाश से पर्वत बरसाते हैं और कुछ भूमि के भीतर से घोड़ों और पहियों को जकड़ लेते हैं, यहाँ तक कि अर्जुन मानो गुफा में बन्द हो जाते हैं। मातलि के कहने पर अर्जुन इन्द्र का वज्रास्त्र छोड़ते हैं, और दानव बिखरे पर्वतों की तरह मरकर गिर पड़ते हैं, जबकि उनकी स्त्रियाँ चीखती हुई अपने स्वर्णमय भवनों में भाग जाती हैं। अर्जुन के यह पूछने पर कि देवता ऐसे भव्य नगर में क्यों नहीं रहते, मातलि बताते हैं कि यह पहले इन्द्र का नगर था, जिसे निवातकवचों ने ब्रह्मा के वरदान से छीन लिया, और ब्रह्मा ने विधान किया था कि इन्द्र ही दूसरे शरीर में उनका अन्त करेंगे; फिर अर्जुन मातलि के साथ देवलोक लौट आते हैं।

अध्याय 173अध्याय-सूचीअध्याय 175

अर्जुन उवाच

श्लोक 1 (3.174.1)

अदृश्यमानास्ते दैत्या योधयन्ति स्म मायया । अदृश्यानस्त्रवीर्येण तानप्यहमयोधयम् ॥

adṛśyamānāste daityā yodhayanti sma māyayā | adṛśyānastravīryeṇa tānapyahamayodhayam

वे दैत्य अदृश्य रहकर माया से युद्ध करने लगे, और मैंने भी अस्त्रों के बल से उन अदृश्य दैत्यों से युद्ध किया।

श्लोक 2 (3.174.2)

गाण्डीवमुक्ता विशिखाः सम्यगस्त्रप्रचोदिताः । अच्छिन्दन्नुत्तमाङ्गानि यत्रयत्र स्म तेऽभवन् ॥

gāṇḍīvamuktā viśikhāḥ samyagastrapracoditāḥ | acchindannuttamāṅgāni yatrayatra sma te'bhavan

अस्त्रमन्त्रों से भली-भाँति प्रेरित, गाण्डीव से छूटे बाणों ने वे जहाँ-जहाँ थे, वहीं उनके सिर काट डाले।

श्लोक 3 (3.174.3)

ततो निवातकवचा वध्यमाना मया युधि । संहृत्य मायां सहसा प्राविशन्पुरमात्मनः ॥

tato nivātakavacā vadhyamānā mayā yudhi | saṃhṛtya māyāṃ sahasā prāviśanpuramātmanaḥ

तब मेरे द्वारा युद्ध में मारे जाते हुए निवातकवच सहसा अपनी माया समेटकर अपने नगर में घुस गए।

श्लोक 4 (3.174.4)

व्यपयातेषु दैत्येषु प्रादुर्भूते च दर्शने । अपश्यं दानवांस्तत्र हताञ्शतसहस्रशः ॥

vyapayāteṣu daityeṣu prādurbhūte ca darśane | apaśyaṃ dānavāṃstatra hatāñśatasahasraśaḥ

दैत्यों के हट जाने और दृश्य स्पष्ट होने पर मैंने वहाँ लाखों दानवों को मरा पड़ा देखा।

श्लोक 5 (3.174.5)

विनिष्पिष्टानि तत्रैषां शस्त्राण्याभरणानि च । शतशः स्म प्रदृश्यन्ते गात्राणि कवचानि च ॥

viniṣpiṣṭāni tatraiṣāṃ śastrāṇyābharaṇāni ca | śataśaḥ sma pradṛśyante gātrāṇi kavacāni ca

वहाँ उनके शस्त्र और आभूषण चूर-चूर पड़े थे, और उनके अंग तथा कवच सैकड़ों की संख्या में दिखाई दे रहे थे।

श्लोक 6 (3.174.6)

हयानां नान्तरं ह्यासीत्पदाद्विचलितुं पदम् । उत्पत्य सहसा तस्थुरन्तरिक्षगमास्ततः ॥

hayānāṃ nāntaraṃ hyāsītpadādvicalituṃ padam | utpatya sahasā tasthurantarikṣagamāstataḥ

घोड़ों के लिए एक पग से दूसरा पग हिलाने तक की जगह न थी; तब आकाश में चलने वाले वे घोड़े सहसा उछलकर अन्तरिक्ष में स्थित हो गए।

श्लोक 7 (3.174.7)

ततो निवातकवचा व्योम संछाद्य केवलम् । अदृश्या ह्यभ्यवर्तन्त विसृजन्तः शिलोच्चयान् ॥

tato nivātakavacā vyoma saṃchādya kevalam | adṛśyā hyabhyavartanta visṛjantaḥ śiloccayān

तब निवातकवच समूचे आकाश को ढककर, अदृश्य रहते हुए, पर्वत बरसाते हुए मुझ पर टूट पड़े।

श्लोक 8 (3.174.8)

अन्तर्भूमिगताश्चान्ये हयानां चरणानथ । व्यगृह्णन्दानवा घोरा रथचक्रे च भारत ॥

antarbhūmigatāścānye hayānāṃ caraṇānatha | vyagṛhṇandānavā ghorā rathacakre ca bhārata

हे भारत, दूसरे भयंकर दानवों ने भूमि के भीतर जाकर घोड़ों के पैर और रथ के पहिये पकड़ लिए।

श्लोक 9 (3.174.9)

विनिगृह्य हयांश्चान्ये रथं च मम युध्यतः । सर्वतो मामविध्यन्त सरथं धरणीधरैः ॥

vinigṛhya hayāṃścānye rathaṃ ca mama yudhyataḥ | sarvato māmavidhyanta sarathaṃ dharaṇīdharaiḥ

मेरे युद्ध करते समय दूसरों ने मेरे घोड़ों और रथ को जकड़कर चारों ओर से पर्वतों द्वारा रथ सहित मुझ पर प्रहार किया।

श्लोक 10 (3.174.10)

पर्वतैरुपचीयद्भिः पतद्भिश्च तथाऽपरैः । स देशो यत्र वर्तामि गुहेव समपद्यत ॥

parvatairupacīyadbhiḥ patadbhiśca tathā'paraiḥ | sa deśo yatra vartāmi guheva samapadyata

पर्वतों के ढेर लगते जाने और दूसरे पर्वतों के गिरते रहने से वह स्थान, जहाँ मैं था, गुफा-सा बन गया।

श्लोक 11 (3.174.11)

पर्वतैश्छाद्यमानोऽहं निगृहीतैश्च वाजिभिः । अगच्छं परमामार्तिं मातलिस्तदलक्षयत् ॥

parvataiśchādyamāno'haṃ nigṛhītaiśca vājibhiḥ | agacchaṃ paramāmārtiṃ mātalistadalakṣayat

पर्वतों से ढका हुआ और घोड़ों के जकड़े जाने से मैं बड़े संकट में पड़ गया; मातलि ने यह देख लिया।

श्लोक 12 (3.174.12)

लक्षयित्वा च मां भीतमिदं वचनमब्रवीत् । अर्जुनार्जुन मा भैस्त्वं वज्रमस्त्रमुदीरय ॥

lakṣayitvā ca māṃ bhītamidaṃ vacanamabravīt | arjunārjuna mā bhaistvaṃ vajramastramudīraya

मुझे भयभीत देखकर उन्होंने यह वचन कहा— "अर्जुन, अर्जुन, डरो मत! वज्रास्त्र का प्रयोग करो।"

श्लोक 13 (3.174.13)

ततोऽहं तस्य तद्वाक्यं श्रुत्वा वज्रमुदीरयम् । देवराजस्य दयितं वज्रमस्त्रं नराधिप ॥

tato'haṃ tasya tadvākyaṃ śrutvā vajramudīrayam | devarājasya dayitaṃ vajramastraṃ narādhipa

हे नराधिप, उनकी बात सुनकर मैंने देवराज के प्रिय वज्रास्त्र का आवाहन किया।

श्लोक 14 (3.174.14)

अचलं स्थानमासाद्य गाण्डीवमनुमन्त्र्य च । अमुञ्चं वज्रसंस्पर्शानायतान्निशिताञ्शरान् ॥

acalaṃ sthānamāsādya gāṇḍīvamanumantrya ca | amuñcaṃ vajrasaṃsparśānāyatānniśitāñśarān

अचल स्थान पर स्थित होकर और गाण्डीव को अभिमन्त्रित करके मैंने वज्र के समान स्पर्श वाले लम्बे, तीखे बाण छोड़े।

श्लोक 15 (3.174.15)

ततो मायाश्च ताः सर्वा निवातकवचांश्च तान् । ते वज्रचोदिता बाणा वज्रभूताः समाविशन् ॥

tato māyāśca tāḥ sarvā nivātakavacāṃśca tān | te vajracoditā bāṇā vajrabhūtāḥ samāviśan

वज्रास्त्र से प्रेरित होकर स्वयं वज्र बने वे बाण उन सब मायाओं और उन निवातकवचों में जा घुसे।

श्लोक 16 (3.174.16)

ते वज्रवेगविहता दानवाः पर्वतोपमाः । इतरेतरमाश्लिष्य न्यपतन्पृथिवीतले ॥

te vajravegavihatā dānavāḥ parvatopamāḥ | itaretaramāśliṣya nyapatanpṛthivītale

वज्र के वेग से आहत होकर पर्वतों जैसे विशालकाय दानव एक-दूसरे से लिपटे हुए धरती पर गिर पड़े।

श्लोक 17 (3.174.17)

अन्तर्भूमौ च येऽगृह्णन्दानवा रथवाजिनः । अनुप्रविश्य तान्बाणाः प्राहिण्वन्यमसादनम् ॥

antarbhūmau ca ye'gṛhṇandānavā rathavājinaḥ | anupraviśya tānbāṇāḥ prāhiṇvanyamasādanam

और जिन दानवों ने भूमि के भीतर से रथ के घोड़ों को पकड़ रखा था, उनके पास भीतर घुसकर बाणों ने उन्हें यमलोक पहुँचा दिया।

श्लोक 18 (3.174.18)

हतैर्निवातकवचैर्निरस्तैः पर्वतोपमैः । समाच्छाद्यत देशः स विकीर्णैरिव पर्वतैः ॥

hatairnivātakavacairnirastaiḥ parvatopamaiḥ | samācchādyata deśaḥ sa vikīrṇairiva parvataiḥ

मारे गए और इधर-उधर फेंके गए पर्वताकार निवातकवचों से वह स्थान ऐसा ढक गया, मानो वहाँ पर्वत बिखरे पड़े हों।

श्लोक 19 (3.174.19)

न हयानां क्षतिः काचिन्न रथस्य न मातलेः । मम चादृश्यत तदा तदद्भुतमिवाभवत् ॥

na hayānāṃ kṣatiḥ kācinna rathasya na mātaleḥ | mama cādṛśyata tadā tadadbhutamivābhavat

न घोड़ों को, न रथ को, न मातलि को और न मुझे कोई क्षति दिखाई दी; यह अद्भुत-सा लगा।

श्लोक 20 (3.174.20)

ततो मां प्रहसन्राजन्मातलिः प्रत्यभाषत । नैतदर्जुन देवेषु त्वयि वीर्यं यदीक्ष्यते ॥

tato māṃ prahasanrājanmātaliḥ pratyabhāṣata | naitadarjuna deveṣu tvayi vīryaṃ yadīkṣyate

तब, हे राजन्, मातलि ने हँसते हुए मुझसे कहा— "अर्जुन, जो पराक्रम तुममें दिखाई देता है, वह देवताओं में भी नहीं है।"

श्लोक 21 (3.174.21)

हतेष्वसुरसङ्घेषु दारास्तेषां तु सर्वशः । प्राक्रोशन्नगरे तस्मिन्यथा शरदि लक्ष्मणाः ॥

hateṣvasurasaṅgheṣu dārāsteṣāṃ tu sarvaśaḥ | prākrośannagare tasminyathā śaradi lakṣmaṇāḥ

असुरों के दलों के मारे जाने पर उनकी स्त्रियाँ उस नगर में शरद् ऋतु की सारसियों की तरह विलाप करने लगीं।

श्लोक 22 (3.174.22)

ततो मातलिना सार्धमहं तत्पुरमभ्ययाम् । त्रासयन्रथघोषेण निवातकवचस्त्रियः ॥

tato mātalinā sārdhamahaṃ tatpuramabhyayām | trāsayanrathaghoṣeṇa nivātakavacastriyaḥ

तब मैं मातलि के साथ रथ के घोष से निवातकवचों की स्त्रियों को भयभीत करता हुआ उस नगर में गया।

श्लोक 23 (3.174.23)

तान्दृष्ट्वा दशसाहस्रान्मयूरसदृशान्हयान् । रथं च रविसंकाशं प्राद्रवन्गणशः स्त्रियः ॥

tāndṛṣṭvā daśasāhasrānmayūrasadṛśānhayān | rathaṃ ca ravisaṃkāśaṃ prādravangaṇaśaḥ striyaḥ

मोरों जैसे उन दस हजार घोड़ों और सूर्य के समान दमकते रथ को देखकर स्त्रियाँ झुण्ड की झुण्ड भाग खड़ी हुईं।

श्लोक 24 (3.174.24)

ताभिराभरणैः शब्दस्त्रासिताभिः समीरितः । शिलानामिव शैलेषु पतन्तीनामभूत्तदा ॥

tābhirābharaṇaiḥ śabdastrāsitābhiḥ samīritaḥ | śilānāmiva śaileṣu patantīnāmabhūttadā

उन भयभीत स्त्रियों के आभूषणों से उठी ध्वनि ऐसी थी, मानो पर्वतों पर शिलाएँ गिर रही हों।

श्लोक 25 (3.174.25)

वित्रस्ता दैत्यनार्यस्ताः स्वानि वेश्मान्यथाविशन् । बहुरत्नविचित्राणि शातकुम्भमयानि च ॥

vitrastā daityanāryastāḥ svāni veśmānyathāviśan | bahuratnavicitrāṇi śātakumbhamayāni ca

भय से काँपती वे दैत्य-नारियाँ अपने-अपने भवनों में चली गईं, जो अनेक रत्नों से चित्रित और सोने के बने थे।

श्लोक 26 (3.174.26)

तदद्भुताकारमहं दृष्ट्वा नगरमुत्तमम् । विशिष्टं देवनगरादपृच्छं मातलिं ततः ॥

tadadbhutākāramahaṃ dṛṣṭvā nagaramuttamam | viśiṣṭaṃ devanagarādapṛcchaṃ mātaliṃ tataḥ

अद्भुत आकार वाले, देवनगर से भी श्रेष्ठ उस उत्तम नगर को देखकर मैंने तब मातलि से पूछा—

श्लोक 27 (3.174.27)

इदमेवंविधं कस्माद्देवता न विशन्त्युत । पुरंदरपुराद्धीदं विशिष्टमिति लक्षये ॥

idamevaṃvidhaṃ kasmāddevatā na viśantyuta | puraṃdarapurāddhīdaṃ viśiṣṭamiti lakṣaye

"देवता ऐसे नगर में क्यों नहीं रहते? मुझे तो यह पुरन्दर (इन्द्र) के नगर से भी श्रेष्ठ दिखाई देता है।"

मातलिरुवाच

श्लोक 28 (3.174.28)

आसीदिदं पुरा पार्थ देवराजस्य नः पुरम् । ततो निवातकवचैरितः प्रच्याविताः सुराः ॥

āsīdidaṃ purā pārtha devarājasya naḥ puram | tato nivātakavacairitaḥ pracyāvitāḥ surāḥ

हे पार्थ, पूर्वकाल में यह हमारे देवराज का नगर था। फिर निवातकवचों ने देवताओं को यहाँ से निकाल दिया।

श्लोक 29 (3.174.29)

तपस्तप्त्वा महत्तीव्रं प्रसाद्य च पितामहम् । इदं वृतं निवासाय देवेभ्यश्चाभयं युधि ॥

tapastaptvā mahattīvraṃ prasādya ca pitāmaham | idaṃ vṛtaṃ nivāsāya devebhyaścābhayaṃ yudhi

उन्होंने महान् और कठोर तप करके पितामह को प्रसन्न किया और उनसे निवास के लिए यह नगर तथा युद्ध में देवताओं से अभय माँग लिया।

श्लोक 30 (3.174.30)

ततः शक्रेण भगवान्स्वयंभूरभिचोदितः । विधत्तां भगवानत्रेत्यात्मनो हितकाम्यया ॥

tataḥ śakreṇa bhagavānsvayaṃbhūrabhicoditaḥ | vidhattāṃ bhagavānatretyātmano hitakāmyayā

तब अपने हित की इच्छा से शक्र ने भगवान् स्वयम्भू (ब्रह्मा) से अनुरोध किया— "भगवन्, इस विषय में आप कोई विधान कीजिए।"

श्लोक 31 (3.174.31)

तत उक्तो भगवता दिष्टमत्रेति भारत । भवितान्तस्त्वमप्येषां देहेनान्येन वृत्रहन् ॥

tata ukto bhagavatā diṣṭamatreti bhārata | bhavitāntastvamapyeṣāṃ dehenānyena vṛtrahan

हे भारत, तब भगवान् ने उनसे कहा— "यहाँ विधान यही है कि हे वृत्रहन्, दूसरे शरीर के द्वारा तुम भी इनका अन्त करोगे।"

श्लोक 32 (3.174.32)

तत एषां वधार्थाय शक्रोऽस्त्राणि ददौ तव । न हि शक्याः सुरैर्हन्तुं य एते निहतास्त्वया ॥

tata eṣāṃ vadhārthāya śakro'strāṇi dadau tava | na hi śakyāḥ surairhantuṃ ya ete nihatāstvayā

इसीलिए इनके वध के लिए शक्र ने तुम्हें अस्त्र दिए; क्योंकि जिन्हें तुमने मारा है, उन्हें देवता नहीं मार सकते थे।

श्लोक 33 (3.174.33)

कालस्य परिणामेन ततस्त्वमिह भारत । एषामन्तकरः प्राप्तस्तत्त्वया च कृतं तथा ॥

kālasya pariṇāmena tatastvamiha bhārata | eṣāmantakaraḥ prāptastattvayā ca kṛtaṃ tathā

हे भारत, समय के फेर से तुम इनका अन्त करने के लिए यहाँ आए, और तुमने वैसा ही कर दिखाया।

श्लोक 34 (3.174.34)

दानवानां विनाशार्थं महास्त्राणां महद्बलम् । ग्राहितस्त्वं महेन्द्रेण पुरुषेन्द्र तदुत्तमम् ॥

dānavānāṃ vināśārthaṃ mahāstrāṇāṃ mahadbalam | grāhitastvaṃ mahendreṇa puruṣendra taduttamam

हे पुरुषश्रेष्ठ, दानवों के विनाश के लिए ही महेन्द्र ने तुम्हें महान् अस्त्रों का वह उत्तम महाबल प्राप्त कराया।

अर्जुन उवाच

श्लोक 35 (3.174.35)

ततः प्रशाम्य नगरं दानवांश्च निहत्य तान् । पुनर्मातलिना सार्धमगमं देवसद्म तत् ॥

tataḥ praśāmya nagaraṃ dānavāṃśca nihatya tān | punarmātalinā sārdhamagamaṃ devasadma tat

तब उस नगर को भली-भाँति देखकर और उन दानवों का संहार करके मैं मातलि के साथ फिर देवलोक लौट गया।

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