आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 175
अर्जुन द्वारा हिरण्यपुर का विनाश
अर्जुन युधिष्ठिर को स्वर्ग-प्रवास का वृत्तान्त सुनाते रहते हैं। निवातकवचों से युद्ध के बाद लौटते समय उन्हें पौलोमों और कालकेयों का आकाशगामी नगर हिरण्यपुर दिखा, जिसे ब्रह्मा ने देवताओं से तो अवध्य बनाया था, पर मनुष्य से नहीं। अर्जुन ने उस नगर को धरती पर गिरा दिया, और जब उसके साठ हज़ार रथों ने उनके अस्त्रों को विफल कर दिया, तब उन्होंने रुद्र को प्रणाम करके पाशुपत अस्त्र छोड़ा, जिसने जगत् को भयानक रूपों से भरकर दानवों का संहार कर दिया। मातलि ने उनकी प्रशंसा की, और इन्द्र ने उन्हें गले लगाकर कहा कि अर्जुन की जीती हुई पृथ्वी पर युधिष्ठिर राज्य करेंगे।
अर्जुन उवाच
श्लोक 1 (3.175.1)
निवर्तमानेन मया महद्दृष्टं ततोऽपरम् । पुरं कामगमं दिव्यं पावकार्कसमप्रभम् ॥
nivartamānena mayā mahaddṛṣṭaṃ tato'param | puraṃ kāmagamaṃ divyaṃ pāvakārkasamaprabham
लौटते समय मैंने उसके बाद एक और बड़ा अद्भुत दृश्य देखा — इच्छानुसार चलने वाला एक दिव्य नगर, जो अग्नि और सूर्य के समान दमक रहा था।
श्लोक 2 (3.175.2)
रत्नद्रुममयैश्चित्रैर्भास्वरैश्च पतत्रिभिः । पौलोमैः कालकेयैश्च नित्यहृष्टैरधिष्ठितम् ॥
ratnadrumamayaiścitrairbhāsvaraiśca patatribhiḥ | paulomaiḥ kālakeyaiśca nityahṛṣṭairadhiṣṭhitam
वह रत्नमय विचित्र वृक्षों और चमकीले पक्षियों से सुशोभित था, और सदा हर्षित रहने वाले पौलोम तथा कालकेय दानव उसमें निवास करते थे।
श्लोक 3 (3.175.3)
गोपुराट्टालकोपेतं चतुर्द्वारं दुरासदम् । सर्वरत्नमयं दिव्यमद्भुतोपमदर्शनम् ॥
gopurāṭṭālakopetaṃ caturdvāraṃ durāsadam | sarvaratnamayaṃ divyamadbhutopamadarśanam
उसमें गोपुर और अट्टालिकाएँ थीं, चार द्वार थे और उस पर आक्रमण करना कठिन था; वह सर्वरत्नमय, दिव्य और देखने में अद्भुत था।
श्लोक 4 (3.175.4)
द्रुमैः पुष्पफलोपेतैः सर्वरत्नमयैर्वृतम् । तथा पतत्रिभिर्दिव्यैरुपेतं सुमनोहरैः ॥
drumaiḥ puṣpaphalopetaiḥ sarvaratnamayairvṛtam | tathā patatribhirdivyairupetaṃ sumanoharaiḥ
वह फूलों और फलों से लदे सर्वरत्नमय वृक्षों से घिरा था और मनोहर दिव्य पक्षियों से भरा हुआ था।
श्लोक 5 (3.175.5)
असुरैर्नित्यमुदितैः शूलर्ष्टिमुसलायुधैः । चापमुद्गरहस्तैश्च स्रग्विभिः सर्वतो वृतम् ॥
asurairnityamuditaiḥ śūlarṣṭimusalāyudhaiḥ | cāpamudgarahastaiśca sragvibhiḥ sarvato vṛtam
वह चारों ओर से मालाधारी, सदा प्रसन्न असुरों से घिरा था, जो शूल, ऋष्टि और मूसल लिए थे तथा हाथों में धनुष और मुद्गर धारण किए थे।
श्लोक 6 (3.175.6)
तदहं प्रेक्ष्य दैत्यानां पुरमद्भुतदर्शनम् । अपृच्छं मातलिं राजन्किमिदं दृश्यतेति वै ॥
tadahaṃ prekṣya daityānāṃ puramadbhutadarśanam | apṛcchaṃ mātaliṃ rājankimidaṃ dṛśyateti vai
हे राजन्, दैत्यों के उस अद्भुत नगर को देखकर मैंने मातलि से पूछा — "यह क्या दिखाई दे रहा है?"
मातलिरुवाच
श्लोक 7 (3.175.7)
पुलोमा नाम दैतेयी कालका च महासुरी । दिव्यं वर्षसहस्रं ते चेरतुः परमं तपः ॥
pulomā nāma daiteyī kālakā ca mahāsurī | divyaṃ varṣasahasraṃ te ceratuḥ paramaṃ tapaḥ
पुलोमा नाम की एक दैत्य-स्त्री और कालका नाम की एक महान असुर-स्त्री ने देवताओं के एक हज़ार वर्षों तक कठोर तप किया।
श्लोक 8 (3.175.8)
तपसोऽन्ते ततस्ताभ्यां स्वयंभूरददाद्वरम् । अगृह्णीतां वरं ते तु सुतानामल्पदुःखताम् ॥
tapaso'nte tatastābhyāṃ svayaṃbhūradadādvaram | agṛhṇītāṃ varaṃ te tu sutānāmalpaduḥkhatām
तप के अन्त में स्वयंभू ब्रह्मा ने उन्हें वर दिया। उन दोनों ने यह वर माँगा कि उनके पुत्रों को थोड़ा ही दुःख हो,
श्लोक 9 (3.175.9)
अवध्यतां च राजेन्द्र सुरराक्षसपन्नगैः । पुरं सुरमणीयं च खचरं सुकृतप्रभम् ॥
avadhyatāṃ ca rājendra surarākṣasapannagaiḥ | puraṃ suramaṇīyaṃ ca khacaraṃ sukṛtaprabham
हे राजेन्द्र, कि वे देवताओं, राक्षसों और नागों से अवध्य हों, और उन्हें एक अत्यन्त रमणीय, आकाश में विचरने वाला, पुण्य की प्रभा से चमकता नगर मिले,
श्लोक 10 (3.175.10)
सर्वरत्नैः समुदितं दुर्धर्षममरैरपि । महर्षियक्षगन्धर्वपन्नगासुरराक्षसैः ॥
sarvaratnaiḥ samuditaṃ durdharṣamamarairapi | maharṣiyakṣagandharvapannagāsurarākṣasaiḥ
जो सब प्रकार के रत्नों से भरा हो और जिस पर अमर देवता भी आक्रमण न कर सकें, न महर्षि, यक्ष, गन्धर्व, नाग, असुर और राक्षस ही,
श्लोक 11 (3.175.11)
सर्वकामगुणोपेतं वीतशोकमनामयम् । ब्रह्मणो भवनाच्छ्रेष्ठं कालकेयकृतं विभो ॥
sarvakāmaguṇopetaṃ vītaśokamanāmayam | brahmaṇo bhavanācchreṣṭhaṃ kālakeyakṛtaṃ vibho
जो सभी मनोवांछित भोगों से सम्पन्न, शोक और रोग से रहित हो। हे प्रभो, कालकेयों के लिए बना यह नगर ब्रह्मा के भवन से भी श्रेष्ठ है।
श्लोक 12 (3.175.12)
तदेतत्खपुरं दिव्यं चरत्यमरवर्जितम् । पौलोमाध्युषितं वीर कालकेयैश्च दानवैः ॥
tadetatkhapuraṃ divyaṃ caratyamaravarjitam | paulomādhyuṣitaṃ vīra kālakeyaiśca dānavaiḥ
हे वीर, यही वह दिव्य आकाश-नगर है जो देवताओं से दूर विचरता है, और जिसमें पौलोम तथा कालकेय दानव रहते हैं।
श्लोक 13 (3.175.13)
हिरण्यपुरमित्येवं ख्यायते नगरं महत् । रक्षितं कालकेयैश्च पौलोमैश्च महासुरैः ॥
hiraṇyapuramityevaṃ khyāyate nagaraṃ mahat | rakṣitaṃ kālakeyaiśca paulomaiśca mahāsuraiḥ
यह विशाल नगर हिरण्यपुर नाम से प्रसिद्ध है, और कालकेय तथा पौलोम महान असुर इसकी रक्षा करते हैं।
श्लोक 14 (3.175.14)
त एते मुदिता राजन्नवध्याः सर्वदैवतैः । निवसन्त्यत्र राजेन्द्र गतोद्वेगा निरुत्सुकाः ॥
ta ete muditā rājannavadhyāḥ sarvadaivataiḥ | nivasantyatra rājendra gatodvegā nirutsukāḥ
हे राजन्, हे राजेन्द्र, सब देवताओं से अवध्य होकर वे यहाँ प्रसन्नतापूर्वक, उद्वेग और उत्कण्ठा से रहित होकर रहते हैं।
श्लोक 15 (3.175.15)
सुरासुरैरवध्यानां दानवानां धनञ्जय । मानुषान्मृत्युरेतेषां निर्दिष्टो ब्रह्मणा पुरा ॥
surāsurairavadhyānāṃ dānavānāṃ dhanañjaya | mānuṣānmṛtyureteṣāṃ nirdiṣṭo brahmaṇā purā
हे धनञ्जय, देवताओं और असुरों से अवध्य इन दानवों की मृत्यु ब्रह्मा ने बहुत पहले ही मनुष्य के हाथ से निश्चित कर दी थी।
श्लोक 16 (3.175.16)
एतानपि रणे पार्थ कालकेयान्दुरासदान् । वज्रास्त्रेण नयस्वाशु विनाशं सुमहाबलान् ॥
etānapi raṇe pārtha kālakeyāndurāsadān | vajrāstreṇa nayasvāśu vināśaṃ sumahābalān
हे पार्थ, इन दुर्जेय और महाबली कालकेयों को भी युद्ध में वज्रास्त्र से शीघ्र नष्ट कर दो।
अर्जुन उवाच
श्लोक 17 (3.175.17)
सुरासुरैरवध्यं तदहं ज्ञात्वा विशांपते । अब्रुवं मातलिं हृष्टो याह्येतत्पुरमञ्जसा ॥
surāsurairavadhyaṃ tadahaṃ jñātvā viśāṃpate | abruvaṃ mātaliṃ hṛṣṭo yāhyetatpuramañjasā
हे प्रजानाथ, यह जानकर कि वह नगर देवताओं और असुरों से अजेय है, मैंने प्रसन्न होकर मातलि से कहा — "सीधे उस नगर की ओर चलो,
श्लोक 18 (3.175.18)
त्रिदशेशद्विषो यावत्क्षयमस्त्रैर्नयाम्यहम् । न कथंचिद्धि मे पापा न वध्या ये सुरद्विषः ॥
tridaśeśadviṣo yāvatkṣayamastrairnayāmyaham | na kathaṃciddhi me pāpā na vadhyā ye suradviṣaḥ
जिससे मैं देवराज के इन शत्रुओं को अपने अस्त्रों से नष्ट कर दूँ। देवताओं के ये पापी शत्रु किसी भी प्रकार मुझसे अवध्य नहीं हैं।"
श्लोक 19 (3.175.19)
उवाह मां ततः शीघ्रं हिरण्यपुरमन्तिकात् । रथेन तेन दिव्येन हरियुक्तेन मातलिः ॥
uvāha māṃ tataḥ śīghraṃ hiraṇyapuramantikāt | rathena tena divyena hariyuktena mātaliḥ
तब मातलि पीताभ घोड़ों से जुते उस दिव्य रथ में मुझे शीघ्र ही हिरण्यपुर के निकट ले गए।
श्लोक 20 (3.175.20)
ते मामालक्ष्य दैतेया विचित्राभरणाम्बराः । समुत्पेतुर्महावेगा रथानास्थाय दंशिताः ॥
te māmālakṣya daiteyā vicitrābharaṇāmbarāḥ | samutpeturmahāvegā rathānāsthāya daṃśitāḥ
मुझे देखते ही विचित्र आभूषण और वस्त्र पहने वे दैत्य कवच धारण करके रथों पर चढ़े और बड़े वेग से उमड़ पड़े।
श्लोक 21 (3.175.21)
ततो नालीकनाराचैर्भल्लैः शक्त्यृष्टितोमरैः । प्रत्यघ्नन्दानवेन्द्रा मां क्रुद्धास्तीव्रपराक्रमाः ॥
tato nālīkanārācairbhallaiḥ śaktyṛṣṭitomaraiḥ | pratyaghnandānavendrā māṃ kruddhāstīvraparākramāḥ
तब क्रोध में भरे, प्रचण्ड पराक्रमी दानवराज नालीक, नाराच, भल्ल, शक्ति, ऋष्टि और तोमरों से मुझ पर प्रहार करने लगे।
श्लोक 22 (3.175.22)
तदहं शस्त्रवर्षेण महता प्रत्यवारयम् । शस्त्रवर्षं महद्राजन्विद्याबलमुपाश्रितः ॥
tadahaṃ śastravarṣeṇa mahatā pratyavārayam | śastravarṣaṃ mahadrājanvidyābalamupāśritaḥ
हे राजन्, अपनी विद्या के बल का सहारा लेकर मैंने उस भारी शस्त्र-वर्षा को अपनी प्रचण्ड शस्त्र-वर्षा से रोक दिया।
श्लोक 23 (3.175.23)
व्यामोहयं च तान्सर्वान्रथमार्गैश्चरन्रणे । तेऽन्योन्यमभिसंमूढाः पातयन्ति स्म दानवाः ॥
vyāmohayaṃ ca tānsarvānrathamārgaiścaranraṇe | te'nyonyamabhisaṃmūḍhāḥ pātayanti sma dānavāḥ
रणभूमि में रथ के विविध मार्गों पर विचरते हुए मैंने उन सबको मोहित कर दिया, और वे दानव भ्रमित होकर एक-दूसरे को ही गिराने लगे।
श्लोक 24 (3.175.24)
तेषामेवं विमूढानामन्योन्यमभिधावताम् । शिरांसि विशिखैर्दीप्तैरच्छिन्दं शतसङ्घशः ॥
teṣāmevaṃ vimūḍhānāmanyonyamabhidhāvatām | śirāṃsi viśikhairdīptairacchindaṃ śatasaṅghaśaḥ
इस प्रकार भ्रमित होकर एक-दूसरे पर टूटते हुए उन दानवों के सिर मैंने दहकते बाणों से सैकड़ों की संख्या में काट डाले।
श्लोक 25 (3.175.25)
ते वध्यमाना दैतेयाः पुरमास्थाय तत्पुनः । खमुत्पेतुः सनगरा मायामास्थाय दानवीम् ॥
te vadhyamānā daiteyāḥ puramāsthāya tatpunaḥ | khamutpetuḥ sanagarā māyāmāsthāya dānavīm
मारे जाते हुए वे दैत्य फिर अपने नगर में जा बैठे और दानवी माया का आश्रय लेकर नगर-सहित आकाश में उड़ गए।
श्लोक 26 (3.175.26)
ततोऽहं शरवर्षेण महता कुरुनन्दन । मार्गमावृत्य दैत्यानां गतिं चैषामवारयम् ॥
tato'haṃ śaravarṣeṇa mahatā kurunandana | mārgamāvṛtya daityānāṃ gatiṃ caiṣāmavārayam
हे कुरुनन्दन, तब मैंने भारी बाण-वर्षा से दैत्यों का मार्ग घेरकर उनकी गति रोक दी।
श्लोक 27 (3.175.27)
तत्पुरं खचरं दिव्यं कामगं दिव्यवर्चसम् । दैतेयैर्वरदानेन धार्यते स्म यथासुखम् ॥
tatpuraṃ khacaraṃ divyaṃ kāmagaṃ divyavarcasam | daiteyairvaradānena dhāryate sma yathāsukham
वरदान के प्रभाव से दैत्य आकाश में इच्छानुसार चलने वाले उस दिव्य, तेजस्वी नगर को मनचाहे ढंग से ले जाते थे।
श्लोक 28 (3.175.28)
अन्तर्भूमौ निपतति पुनरूर्ध्वं प्रतिष्ठते । पुनस्तिर्यक् प्रयात्याशु पुनरप्सु निमज्जति ॥
antarbhūmau nipatati punarūrdhvaṃ pratiṣṭhate | punastiryak prayātyāśu punarapsu nimajjati
वह कभी धरती के भीतर धँस जाता, फिर ऊपर उठ खड़ा होता; कभी तेज़ी से तिरछा चला जाता, तो कभी जल में डूब जाता।
श्लोक 29 (3.175.29)
अमरावतिसंकाशं तत्पुरं कामगं महत् । अहमस्त्रैर्बहुविधैः प्रत्यगृह्णां परंतप ॥
amarāvatisaṃkāśaṃ tatpuraṃ kāmagaṃ mahat | ahamastrairbahuvidhaiḥ pratyagṛhṇāṃ paraṃtapa
हे परंतप, अमरावती के समान दिखने वाले उस इच्छाचारी विशाल नगर पर मैंने अनेक प्रकार के अस्त्रों से आक्रमण किया।
श्लोक 30 (3.175.30)
ततोऽहं शरजालेन दिव्यास्त्रनुदितेन च । व्यगृह्णां सह दैतेयैस्तत्पुरं पुरुषर्षभ ॥
tato'haṃ śarajālena divyāstranuditena ca | vyagṛhṇāṃ saha daiteyaistatpuraṃ puruṣarṣabha
हे पुरुषश्रेष्ठ, तब दिव्यास्त्रों से प्रेरित बाणों के जाल से मैंने दैत्यों सहित उस नगर को जकड़ लिया।
श्लोक 31 (3.175.31)
विक्षतं चायसैर्बाणैर्मत्प्रयुक्तैरजिह्मगैः । महीमभ्यपतद्राजन्प्रभग्नं पुरमासुरम् ॥
vikṣataṃ cāyasairbāṇairmatprayuktairajihmagaiḥ | mahīmabhyapatadrājanprabhagnaṃ puramāsuram
हे राजन्, मेरे छोड़े सीधे जाने वाले लोहे के बाणों से छिन्न-भिन्न होकर वह असुर-नगर टूटकर धरती पर आ गिरा।
श्लोक 32 (3.175.32)
ते वध्यमाना मद्बाणैर्वज्रवेगैरयस्मयैः । पर्यभ्रमन्त वै राजन्नसुराः कालचोदिताः ॥
te vadhyamānā madbāṇairvajravegairayasmayaiḥ | paryabhramanta vai rājannasurāḥ kālacoditāḥ
हे राजन्, वज्र के समान वेग वाले मेरे लोहे के बाणों से आहत होकर काल से प्रेरित वे असुर इधर-उधर चक्कर काटने लगे।
श्लोक 33 (3.175.33)
ततो मातलिरारुह्य पुरस्तान्निपतन्निव । महीमवातरत्क्षिप्रं रथेनादित्यवर्चसा ॥
tato mātalirāruhya purastānnipatanniva | mahīmavātaratkṣipraṃ rathenādityavarcasā
तब मातलि आकाश में ऊपर उठकर, मानो गिरते हुए, सूर्य के समान तेजस्वी रथ के साथ शीघ्र ही उनके सामने धरती पर उतर आए।
श्लोक 34 (3.175.34)
ततो रथसहस्राणि षष्टिस्तेषाममर्षिणाम् । युयुत्सूनां मया सार्धं पर्यवर्तन्त भारत । तान्यहं निशितैर्बाणैर्व्यधमं गार्ध्रराजितैः ॥
tato rathasahasrāṇi ṣaṣṭisteṣāmamarṣiṇām | yuyutsūnāṃ mayā sārdhaṃ paryavartanta bhārata | tānyahaṃ niśitairbāṇairvyadhamaṃ gārdhrarājitaiḥ
हे भारत, तब युद्ध के इच्छुक उन असहिष्णु दानवों के साठ हज़ार रथ मुझे घेरकर आ डटे। मैंने गिद्ध के पंखों से सजे तीखे बाणों से उन्हें छिन्न-भिन्न कर दिया।
श्लोक 35 (3.175.35)
ते युद्धे संन्यवर्तन्त समुद्रस्य यथोर्मयः । नेमे शक्या मानुषेण युद्धेनेति प्रचिन्त्य तत् ॥
te yuddhe saṃnyavartanta samudrasya yathormayaḥ | neme śakyā mānuṣeṇa yuddheneti pracintya tat
पर वे समुद्र की लहरों की तरह बार-बार युद्ध में लौट आते थे। यह सोचकर कि "इन्हें मानवीय युद्ध से नहीं जीता जा सकता",
श्लोक 36 (3.175.36)
ततोऽहमानुपूर्व्येण दिव्यान्यस्त्राण्ययोजयम् ॥
tato'hamānupūrvyeṇa divyānyastrāṇyayojayam
मैंने क्रमशः अपने दिव्यास्त्रों का प्रयोग आरम्भ किया।
श्लोक 37 (3.175.37)
ततस्तानि सहस्राणि रथिनां चित्रयोधिनाम् । अस्त्राणि मम दिव्यानि प्रत्यघ्नञ्छनकैरिव ॥
tatastāni sahasrāṇi rathināṃ citrayodhinām | astrāṇi mama divyāni pratyaghnañchanakairiva
तब विचित्र ढंग से युद्ध करने वाले उन हज़ारों रथियों ने मेरे दिव्यास्त्रों को मानो सहज ही काट डाला।
श्लोक 38 (3.175.38)
रथमार्गान्विचित्रांस्ते विचरन्तो महाबलाः । प्रत्यदृश्यन्त संग्रामे शतशोऽथ सहस्रशः ॥
rathamārgānvicitrāṃste vicaranto mahābalāḥ | pratyadṛśyanta saṃgrāme śataśo'tha sahasraśaḥ
रथ के विचित्र मार्गों पर विचरते हुए वे महाबली योद्धा युद्ध में सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में दिखाई देने लगे।
श्लोक 39 (3.175.39)
विचित्रमुकुटापीडा विचित्रकवचध्वजाः । विचित्राभरणाश्चैव मम प्रीतिकराऽभवन् ॥
vicitramukuṭāpīḍā vicitrakavacadhvajāḥ | vicitrābharaṇāścaiva mama prītikarā'bhavan
विचित्र मुकुटों और शिरोभूषणों, विचित्र कवचों और ध्वजाओं तथा विचित्र आभूषणों से सजे वे मुझे देखने में आनन्द देने वाले लगे।
श्लोक 40 (3.175.40)
अहं तु शरवर्षैस्तानस्त्रप्रचोदितै रणे । नाशक्नुवं पीडयितुं ते तु मां प्रत्यपीडयन् ॥
ahaṃ tu śaravarṣaistānastrapracoditai raṇe | nāśaknuvaṃ pīḍayituṃ te tu māṃ pratyapīḍayan
पर उस युद्ध में अस्त्रों से प्रेरित अपनी बाण-वर्षा से मैं उन्हें पीड़ित नहीं कर सका, उलटे वे मुझे पीड़ित करने लगे।
श्लोक 41 (3.175.41)
तैः पीड्यमानो बहुभिः कृतास्त्रैः कुशलैर्युधि । व्यथितोऽस्मि महायुद्धे भयं चागान्महन्मम ॥
taiḥ pīḍyamāno bahubhiḥ kṛtāstraiḥ kuśalairyudhi | vyathito'smi mahāyuddhe bhayaṃ cāgānmahanmama
उस महायुद्ध में अस्त्रविद्या में निपुण, कुशल और बहुसंख्य योद्धाओं से पीड़ित होकर मैं व्यथित हो उठा और मुझ पर बड़ा भय छा गया।
श्लोक 42 (3.175.42)
ततोऽहं परमायत्तो मातलिं परिपृष्टवान् ॥
tato'haṃ paramāyatto mātaliṃ paripṛṣṭavān
तब मैंने पूरी तरह सावधान होकर मातलि से पूछा —
श्लोक 43 (3.175.43)
किमेते मम बाणौघैर्दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितैः । न वध्यन्ते महाघोरैस्तत्त्वमाख्याहि पृच्छतः ॥
kimete mama bāṇaughairdivyāstrapratimantritaiḥ | na vadhyante mahāghoraistattvamākhyāhi pṛcchataḥ
"दिव्यास्त्रों के मन्त्रों से अभिमन्त्रित मेरे भयंकर बाण-समूहों से ये मारे क्यों नहीं जा रहे? मैं पूछता हूँ, मुझे इसका रहस्य बताओ।"
श्लोक 44 (3.175.44)
स मामुवाच पर्याप्तस्त्वमेषां भरतर्षभ । तानुद्दिश्याथ मर्माणि प्रतिघातं तदाचर ॥
sa māmuvāca paryāptastvameṣāṃ bharatarṣabha | tānuddiśyātha marmāṇi pratighātaṃ tadācara
उन्होंने मुझसे कहा — "हे भरतश्रेष्ठ, तुम इनके लिए पर्याप्त हो। अब इनके मर्मस्थलों को लक्ष्य करके प्रहार करो।"
श्लोक 45 (3.175.45)
एतच्छ्रुत्वा तु राजेन्द्र संप्रहृष्टस्तमूचिवान् । निवर्तय रथं शीघ्रं पश्य चैतान्निपातितान् ॥
etacchrutvā tu rājendra saṃprahṛṣṭastamūcivān | nivartaya rathaṃ śīghraṃ paśya caitānnipātitān
हे राजेन्द्र, यह सुनकर मैंने हर्षित होकर उनसे कहा — "रथ को शीघ्र लौटाओ, और इन्हें गिरते हुए देखो।"
श्लोक 46 (3.175.46)
एवमुक्तो रथं तत्र मातलिः पर्यवर्तयत् ॥
evamukto rathaṃ tatra mātaliḥ paryavartayat
ऐसा कहे जाने पर मातलि ने वहीं रथ को मोड़ दिया।
श्लोक 47 (3.175.47)
ततो मत्वा रणे भग्नं दानवाः प्रतिहर्षिताः । विचुक्रुशुर्महाराज स्वरेण महता मुहुः ॥
tato matvā raṇe bhagnaṃ dānavāḥ pratiharṣitāḥ | vicukruśurmahārāja svareṇa mahatā muhuḥ
हे महाराज, तब मुझे युद्ध में पराजित समझकर दानव बहुत प्रसन्न हुए और ऊँचे स्वर में बार-बार चिल्लाने लगे —
श्लोक 48 (3.175.48)
अभग्नः कैश्चिदप्येष पाण्डवो रणमूर्धनि । अस्माभिः समरे भग्न इत्येवं संघशस्तदा ॥
abhagnaḥ kaiścidapyeṣa pāṇḍavo raṇamūrdhani | asmābhiḥ samare bhagna ityevaṃ saṃghaśastadā
"जिस पाण्डव को रणभूमि में आज तक कोई नहीं हरा सका, उसे हमने युद्ध में भगा दिया!" — इस प्रकार वे झुंड के झुंड चिल्लाने लगे।
श्लोक 49 (3.175.49)
ततोऽहं देवदेवाय रुद्रायाव्यक्तमूर्तये । प्रयतः प्रणतो भूत्वा नमस्कृत्य महात्मने । स्वस्ति भूतेभ्य इत्युक्त्वा महास्त्रं समयोजयम् ॥
tato'haṃ devadevāya rudrāyāvyaktamūrtaye | prayataḥ praṇato bhūtvā namaskṛtya mahātmane | svasti bhūtebhya ityuktvā mahāstraṃ samayojayam
तब मैंने संयत होकर अव्यक्त-रूप देवाधिदेव रुद्र को प्रणाम किया, और उन महात्मा को नमस्कार करके "सब प्राणियों का कल्याण हो" कहते हुए उस महास्त्र का संधान किया,
श्लोक 50 (3.175.50)
यत्तद्रौद्रमिति ख्यातं सर्वामित्रविनाशनम् । महत्पाशुपतं दिव्यं सर्वलोकनमस्कृतम् ॥
yattadraudramiti khyātaṃ sarvāmitravināśanam | mahatpāśupataṃ divyaṃ sarvalokanamaskṛtam
जो "रौद्र" नाम से प्रसिद्ध है और सब शत्रुओं का नाश करने वाला है — वही महान दिव्य पाशुपत, जिसे सारे लोक नमस्कार करते हैं।
श्लोक 51 (3.175.51)
ततोऽपश्यं त्रिशिरसं पुरुषं नवलोचनम् । त्रिमुखं षड्भुजं दीप्तमर्कज्वलनमूर्धजम् । लेलिहानैर्महानागैः कृतचिह्नममित्रहन् ॥
tato'paśyaṃ triśirasaṃ puruṣaṃ navalocanam | trimukhaṃ ṣaḍbhujaṃ dīptamarkajvalanamūrdhajam | lelihānairmahānāgaiḥ kṛtacihnamamitrahan
हे शत्रुनाशक, तब मैंने तीन सिरों और नौ नेत्रों वाले एक पुरुष को देखा — तीन मुख, छह भुजाएँ, देदीप्यमान, सूर्य और अग्नि के समान जलते केश, और लपलपाती जीभों वाले महानागों से चिह्नित।
श्लोक 52 (3.175.52)
विभीस्ततस्तदस्त्रं तु घोरं रौद्रं सनातनम् । दृष्ट्वा गाण्डीवसंयोगमानीय भरतर्षभ ॥
vibhīstatastadastraṃ tu ghoraṃ raudraṃ sanātanam | dṛṣṭvā gāṇḍīvasaṃyogamānīya bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, तब निर्भय होकर उस भयंकर, सनातन रौद्रास्त्र को देखकर मैंने उसे गाण्डीव पर चढ़ाया,
श्लोक 53 (3.175.53)
नमस्कृत्वा त्रिनेत्राय शर्वायामिततेजसे । मुक्तवान्दानवेन्द्राणां पराभावाय भारत ॥
namaskṛtvā trinetrāya śarvāyāmitatejase | muktavāndānavendrāṇāṃ parābhāvāya bhārata
और अमित तेजस्वी त्रिनेत्र शर्व को नमस्कार करके, हे भारत, दानवराजों के विनाश के लिए उसे छोड़ दिया।
श्लोक 54 (3.175.54)
मुक्तमात्रे ततस्तस्मिन्रूपाण्यासन्सहस्रशः । मृगाणामथ सिंहानां व्याघ्राणां च विशांपते ॥
muktamātre tatastasminrūpāṇyāsansahasraśaḥ | mṛgāṇāmatha siṃhānāṃ vyāghrāṇāṃ ca viśāṃpate
हे प्रजानाथ, उसके छूटते ही हज़ारों रूप प्रकट हो गए — मृगों के, सिंहों के और बाघों के;
श्लोक 55 (3.175.55)
ऋक्षाणां महिषाणां च पन्नगानां तथा गवाम् । शरभाणां गजानां च वानराणां च सङ्घशः । ऋषभाणां वराहाणां मार्जाराणां तथैव च ॥
ṛkṣāṇāṃ mahiṣāṇāṃ ca pannagānāṃ tathā gavām | śarabhāṇāṃ gajānāṃ ca vānarāṇāṃ ca saṅghaśaḥ | ṛṣabhāṇāṃ varāhāṇāṃ mārjārāṇāṃ tathaiva ca
रीछों, भैंसों, नागों और गायों के; शरभों, हाथियों और झुंड के झुंड वानरों के; साँडों, वराहों और बिल्लियों के;
श्लोक 56 (3.175.56)
सालावृकाणां प्रेतानां भुरुण्डानां च सर्वशः । गृध्राणां गरुडानां च चमराणां तथैव च ॥
sālāvṛkāṇāṃ pretānāṃ bhuruṇḍānāṃ ca sarvaśaḥ | gṛdhrāṇāṃ garuḍānāṃ ca camarāṇāṃ tathaiva ca
भेड़ियों, प्रेतों और भुरुण्डों के; गिद्धों, गरुड़ों और चमरी मृगों के;
श्लोक 57 (3.175.57)
देवानां च ऋषीणां च गन्धर्वाणां च सर्वशः । पिशाचानां सयक्षाणां तथैव च सुरद्विषाम् ॥
devānāṃ ca ṛṣīṇāṃ ca gandharvāṇāṃ ca sarvaśaḥ | piśācānāṃ sayakṣāṇāṃ tathaiva ca suradviṣām
देवताओं, ऋषियों और गन्धर्वों के; पिशाचों और यक्षों के, तथा देवशत्रुओं के;
श्लोक 58 (3.175.58)
गुह्यकानां च संग्रामे नैर्ऋतानां तथैव च । झषाणां गजवक्राणामुलूकानां तथैव च ॥
guhyakānāṃ ca saṃgrāme nairṛtānāṃ tathaiva ca | jhaṣāṇāṃ gajavakrāṇāmulūkānāṃ tathaiva ca
युद्धस्थल में गुह्यकों और नैर्ऋतों के; झषों (बड़े जलजन्तुओं), गजमुखों और उल्लुओं के;
श्लोक 59 (3.175.59)
मीनवाजिसरूपाणां नानाशस्त्रासिपाणिनाम् । तथैव यातुधानानां गदामुद्गरधारिणाम् ॥
mīnavājisarūpāṇāṃ nānāśastrāsipāṇinām | tathaiva yātudhānānāṃ gadāmudgaradhāriṇām
मछली और घोड़े जैसे रूप वाले, हाथों में तलवारें और नाना प्रकार के शस्त्र लिए प्राणियों के; और गदा तथा मुद्गर धारण किए यातुधानों के।
श्लोक 60 (3.175.60)
एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्नानारूपधरैस्तदा । सर्वमासीज्जगद्व्याप्तं तस्मिन्नस्त्रे विसर्जिते ॥
etaiścānyaiśca bahubhirnānārūpadharaistadā | sarvamāsījjagadvyāptaṃ tasminnastre visarjite
उस अस्त्र के छोड़े जाने पर इनसे और अनेक रूप धारण करने वाले दूसरे बहुत से प्राणियों से सारा जगत् भर गया।
श्लोक 61 (3.175.61)
त्रिशिरोभिश्चतुर्दंष्ट्रैश्चतुरास्यैश्चतुर्भुजैः । अनेकरूपसंयुक्तैर्मांसमेदोवसास्थिभिः ॥
triśirobhiścaturdaṃṣṭraiścaturāsyaiścaturbhujaiḥ | anekarūpasaṃyuktairmāṃsamedovasāsthibhiḥ
तीन सिरों वाले, चार दाढ़ों, चार मुखों और चार भुजाओं वाले, अनेक रूपों से युक्त, मांस, मेद, वसा और अस्थियों से बने प्राणियों द्वारा
श्लोक 62 (3.175.62)
अभीक्ष्णं वध्यमानास्ते दानवा ये समागताः । अर्कज्वलनतेजोभिर्वज्राशनिसमप्रभैः ॥
abhīkṣṇaṃ vadhyamānāste dānavā ye samāgatāḥ | arkajvalanatejobhirvajrāśanisamaprabhaiḥ
वहाँ एकत्र हुए दानव बार-बार मारे जाने लगे। और सूर्य तथा अग्नि के समान तेज वाले, वज्र और बिजली जैसी प्रभा वाले,
श्लोक 63 (3.175.63)
अद्रिसारमयैश्चान्यैर्बाणैरपि निबर्हणैः । न्यहनं दानवान्सर्वान्मुहूर्तेनैव भारत ॥
adrisāramayaiścānyairbāṇairapi nibarhaṇaiḥ | nyahanaṃ dānavānsarvānmuhūrtenaiva bhārata
तथा लोहे के बने अन्य विनाशकारी बाणों से, हे भारत, मैंने क्षण भर में सब दानवों को मार डाला।
श्लोक 64 (3.175.64)
गाण्डीवास्त्रप्रणुन्नांस्तान्गतासून्नभसश्च्युतान् । दृष्ट्वाऽहं प्राणमं भूयस्त्रिपुरघ्नाय वेधसे ॥
gāṇḍīvāstrapraṇunnāṃstāngatāsūnnabhasaścyutān | dṛṣṭvā'haṃ prāṇamaṃ bhūyastripuraghnāya vedhase
गाण्डीव से छूटे अस्त्र से आहत, निष्प्राण होकर आकाश से गिरे उन दानवों को देखकर मैंने फिर त्रिपुरनाशक विधाता को प्रणाम किया।
श्लोक 65 (3.175.65)
तथा रौद्रास्त्रनिष्पिष्टान्दिव्याभरणभूषितान् । निशाम्य परमं हर्षमगमद्देवसारथिः ॥
tathā raudrāstraniṣpiṣṭāndivyābharaṇabhūṣitān | niśāmya paramaṃ harṣamagamaddevasārathiḥ
दिव्य आभूषणों से विभूषित उन दानवों को रौद्रास्त्र से पिसा हुआ देखकर देवताओं के सारथि अत्यन्त हर्षित हुए।
श्लोक 66 (3.175.66)
तदसह्यं कृतं कर्म देवैरपि दुरासदम् । दृष्ट्वा मां पूजयामास मातलिः शक्रसारथिः ॥
tadasahyaṃ kṛtaṃ karma devairapi durāsadam | dṛṣṭvā māṃ pūjayāmāsa mātaliḥ śakrasārathiḥ
वह असह्य कर्म, जो देवताओं के लिए भी दुष्कर था, पूरा हुआ देखकर इन्द्र के सारथि मातलि ने मेरा सम्मान किया।
श्लोक 67 (3.175.67)
उवाच वचनं चेदं प्रीयमाणः कृताञ्जलिः । हतांस्तान्दानवान्दृष्ट्वा मया सङ्ख्ये सहस्रशः ॥
uvāca vacanaṃ cedaṃ prīyamāṇaḥ kṛtāñjaliḥ | hatāṃstāndānavāndṛṣṭvā mayā saṅkhye sahasraśaḥ
युद्ध में मेरे द्वारा हज़ारों की संख्या में मारे गए उन दानवों को देखकर उन्होंने प्रसन्न होकर हाथ जोड़े और यह वचन कहा —
मातलिरुवाच
श्लोक 68 (3.175.68)
सुरासुरैरसह्यं हि कर्म यत्साधितं त्वया । न ह्येतत्संयुगे कर्तुमपि शक्तः सुरेश्वरः । ध्रुवं धनञ्जय प्रीतस्त्वयि शक्रः पुरार्दन ॥
surāsurairasahyaṃ hi karma yatsādhitaṃ tvayā | na hyetatsaṃyuge kartumapi śaktaḥ sureśvaraḥ | dhruvaṃ dhanañjaya prītastvayi śakraḥ purārdana
तुमने जो कर्म कर दिखाया है, वह देवताओं और असुरों के लिए भी असह्य है; युद्ध में यह कार्य स्वयं देवराज भी नहीं कर सकते थे। हे धनञ्जय, पुरों का भेदन करने वाले इन्द्र निश्चय ही तुमसे प्रसन्न हैं।
श्लोक 69 (3.175.69)
सुरासुरैरवध्यं हि पुरमेतत्खगं महत् । त्वया विमथितं वीर स्ववीर्यतपसो बलात् ॥
surāsurairavadhyaṃ hi purametatkhagaṃ mahat | tvayā vimathitaṃ vīra svavīryatapaso balāt
आकाश में चलने वाला यह विशाल नगर देवताओं और असुरों से अजेय था, पर हे वीर, तुमने अपने पराक्रम और तप के बल से इसे मथ डाला।
अर्जुन उवाच
श्लोक 70 (3.175.70)
विध्वस्ते खपुरे तस्मिन्दानवेषु हतेषु च । विनदन्त्यः स्त्रियः सर्वा निष्पेतुर्नगराद्बहिः ॥
vidhvaste khapure tasmindānaveṣu hateṣu ca | vinadantyaḥ striyaḥ sarvā niṣpeturnagarādbahiḥ
जब वह आकाश-नगर नष्ट हो गया और दानव मारे गए, तब उनकी सब स्त्रियाँ विलाप करती हुई नगर से बाहर निकल आईं।
श्लोक 71 (3.175.71)
प्रकीर्णकेश्यो व्यथिताः कुरर्य इव दुःखिताः । पेतुः पुत्रान्पितृन्भ्रातॄञ्शोचमाना महीतले ॥
prakīrṇakeśyo vyathitāḥ kurarya iva duḥkhitāḥ | petuḥ putrānpitṛnbhrātṝñśocamānā mahītale
बिखरे केशों वाली, व्यथित और कुररी पक्षियों की तरह दुःखी वे अपने पुत्रों, पिताओं और भाइयों का शोक करती हुई धरती पर गिर पड़ीं।
श्लोक 72 (3.175.72)
रुदत्यो दीनकण्ठ्यस्तु निनदन्त्यो हतेश्वराः । उरांसि पाणिभिर्घ्नन्त्यो विस्रस्तस्रग्विभूषणाः ॥
rudatyo dīnakaṇṭhyastu ninadantyo hateśvarāḥ | urāṃsi pāṇibhirghnantyo visrastasragvibhūṣaṇāḥ
दीन कण्ठ से रोती, चीत्कार करती, स्वामियों से हीन वे स्त्रियाँ हाथों से छाती पीटने लगीं; उनकी मालाएँ और आभूषण खिसककर गिर गए।
श्लोक 73 (3.175.73)
तच्छोकयुक्तमश्रीकं दुःखदैन्यसमाहतम् । न बभौ दानवपुरं हतत्विट्कं हतेश्वरम् ॥
tacchokayuktamaśrīkaṃ duḥkhadainyasamāhatam | na babhau dānavapuraṃ hatatviṭkaṃ hateśvaram
शोक से भरा, श्रीहीन, दुःख और दीनता से आहत, कान्तिहीन और स्वामियों से रहित वह दानव-नगर अब शोभा नहीं पा रहा था।
श्लोक 74 (3.175.74)
गन्धर्वनगराकारं हृतनागमिव ह्रदम् । शुष्कवृक्षमिवारण्यमदृश्यमभवत्पुरम् ॥
gandharvanagarākāraṃ hṛtanāgamiva hradam | śuṣkavṛkṣamivāraṇyamadṛśyamabhavatpuram
गन्धर्वनगर की तरह, उस सरोवर की तरह जिसके हाथी हर लिए गए हों, और सूखे वृक्षों वाले वन की तरह वह नगर अदृश्य हो गया।
श्लोक 75 (3.175.75)
मां तु संहृष्टमनसं क्षिप्रं मातलिरानयत् । देवराजस्य भवनं कृतकर्माणमाहवात् ॥
māṃ tu saṃhṛṣṭamanasaṃ kṣipraṃ mātalirānayat | devarājasya bhavanaṃ kṛtakarmāṇamāhavāt
प्रसन्नचित्त और कृतकार्य मुझको मातलि युद्धभूमि से शीघ्र देवराज के भवन में ले आए।
श्लोक 76 (3.175.76)
हिरण्यपुरमुत्सृज्य निहत्य च महासुरान् । निवातकवचांश्चैव ततोऽहं शक्रमागमम् ॥
hiraṇyapuramutsṛjya nihatya ca mahāsurān | nivātakavacāṃścaiva tato'haṃ śakramāgamam
हिरण्यपुर को छोड़कर, उन महान असुरों को और निवातकवचों को भी मारकर, मैं इन्द्र के पास पहुँचा।
श्लोक 77 (3.175.77)
मम कर्म च देवेन्द्रं मातलिर्विस्तरेण तत् । सर्वं विश्रावयामास यथाभूतं महाद्युते ॥
mama karma ca devendraṃ mātalirvistareṇa tat | sarvaṃ viśrāvayāmāsa yathābhūtaṃ mahādyute
हे महातेजस्वी, मातलि ने मेरे सारे कर्म देवराज को विस्तार से, जैसे घटे थे वैसे ही, कह सुनाए —
श्लोक 78 (3.175.78)
हिरण्यपुरघातं च मायानां च निवारणम् । निवातकवचानां च वधं सङ्ख्ये महौजसाम् । कालकेयवधं चैव अद्भुतं रोमहर्षणम् ॥
hiraṇyapuraghātaṃ ca māyānāṃ ca nivāraṇam | nivātakavacānāṃ ca vadhaṃ saṅkhye mahaujasām | kālakeyavadhaṃ caiva adbhutaṃ romaharṣaṇam
हिरण्यपुर का विनाश, मायाओं का निवारण, महाबली निवातकवचों का युद्ध में वध, और कालकेयों का अद्भुत, रोमांचकारी संहार।
श्लोक 79 (3.175.79)
तच्छ्रुत्वा भगवान्प्रीतः सहस्राक्षः पुरंदरः । मरुद्भिः सहितः श्रीमान्साधु साध्वित्यथाब्रवीत् । परिष्वज्य च मां प्रेम्णा मूर्ध्नि चाघ्राय सस्मितम् ॥
tacchrutvā bhagavānprītaḥ sahasrākṣaḥ puraṃdaraḥ | marudbhiḥ sahitaḥ śrīmānsādhu sādhvityathābravīt | pariṣvajya ca māṃ premṇā mūrdhni cāghrāya sasmitam
यह सुनकर सहस्र नेत्रों वाले श्रीमान् भगवान् पुरन्दर प्रसन्न हुए और मरुद्गणों के साथ "साधु, साधु" कहने लगे; फिर उन्होंने प्रेम से मुझे गले लगाकर मुस्कराते हुए मेरा मस्तक सूँघा।
श्लोक 80 (3.175.80)
ततो मां देवराजो वै समाश्वास्य पुनः पुनः । अब्रवीद्विबुधैः सार्धमिदं समधुरं वचः ॥
tato māṃ devarājo vai samāśvāsya punaḥ punaḥ | abravīdvibudhaiḥ sārdhamidaṃ samadhuraṃ vacaḥ
तब देवराज ने बार-बार मुझे आश्वस्त करते हुए देवताओं के साथ मुझसे ये मधुर वचन कहे —
इन्द्र उवाच
श्लोक 81 (3.175.81)
अतिदेवासुरं कर्म कृतमेव त्वया रणे । गुर्वर्थश्च कृतः पार्थ महाशत्रून्घ्नता मम ॥
atidevāsuraṃ karma kṛtameva tvayā raṇe | gurvarthaśca kṛtaḥ pārtha mahāśatrūnghnatā mama
हे पार्थ, तुमने युद्ध में ऐसा कर्म किया है जो देवताओं और असुरों से भी परे है; मेरे महान शत्रुओं को मारकर तुमने गुरु-दक्षिणा चुका दी है।
श्लोक 82 (3.175.82)
एवमेव सदा भाव्यं स्थिरेणाजौ धनंजय । असंमूढेन चास्त्राणां कर्तव्यं प्रतिपादनम् ॥
evameva sadā bhāvyaṃ sthireṇājau dhanaṃjaya | asaṃmūḍhena cāstrāṇāṃ kartavyaṃ pratipādanam
हे धनञ्जय, युद्ध में सदा इसी प्रकार स्थिर रहना, और मोह से रहित होकर अस्त्रों का प्रयोग करना।
श्लोक 83 (3.175.83)
अविषह्यो रणे हि त्वं देवदानवराक्षसैः । सयक्षासुरगन्धर्वैः सपक्षिगणपन्नगैः ॥
aviṣahyo raṇe hi tvaṃ devadānavarākṣasaiḥ | sayakṣāsuragandharvaiḥ sapakṣigaṇapannagaiḥ
युद्ध में देवता, दानव, राक्षस, यक्ष, असुर, गन्धर्व, पक्षिगण और नाग — कोई भी तुम्हारा सामना नहीं कर सकता।
श्लोक 84 (3.175.84)
वसुधां चापि कौन्तेय त्वद्बाहुबलनिर्जिताम् । पालयिष्यति धर्मात्मा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
vasudhāṃ cāpi kaunteya tvadbāhubalanirjitām | pālayiṣyati dharmātmā kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ
हे कौन्तेय, तुम्हारे बाहुबल से जीती गई पृथ्वी का पालन धर्मात्मा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर करेंगे।