आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 176
इन्द्र के उपहार और अर्जुन की वापसी
अर्जुन अपना वृत्तान्त पूरा करते हैं। इन्द्र घोषणा करते हैं कि अब पृथ्वी पर कोई मनुष्य उन्हें पराजित नहीं कर सकता, और उन्हें अभेद्य कवच, सोने की माला, देवदत्त शंख, किरीट और दिव्य वस्त्र देते हैं; इन्द्र के भवन में पाँच वर्ष रहने के बाद वे भाइयों के पास लौटा दिए जाते हैं। युधिष्ठिर उनके सौभाग्य पर आनन्दित होकर वे अस्त्र देखना चाहते हैं जिनसे निवातकवच मारे गए, और अर्जुन अगली सुबह उन्हें दिखाने का वचन देते हैं।
अर्जुन उवाच
श्लोक 1 (3.176.1)
ततो मामतिविश्वस्तं संरूढशरविक्षतम् । देवराजोऽनुगृह्येदं काले वचनमब्रवीत् ॥
tato māmativiśvastaṃ saṃrūḍhaśaravikṣatam | devarājo'nugṛhyedaṃ kāle vacanamabravīt
तब, जब मेरे बाणों के घाव भर चुके थे और देवराज को मुझ पर पूरा भरोसा हो गया था, उन्होंने कृपापूर्वक उचित समय पर यह वचन कहा —
इन्द्र उवाच
श्लोक 2 (3.176.2)
दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि त्वयि तिष्ठन्ति भारत । न त्वाऽभिभवितुं शक्तो मानुषो भुवि कश्चन ॥
divyānyastrāṇi sarvāṇi tvayi tiṣṭhanti bhārata | na tvā'bhibhavituṃ śakto mānuṣo bhuvi kaścana
हे भारत, सभी दिव्यास्त्र अब तुममें स्थित हैं। पृथ्वी पर कोई भी मनुष्य तुम्हें पराजित नहीं कर सकता।
श्लोक 3 (3.176.3)
भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णः शकुनिः सह राजभिः । संग्रामस्थस्य ते पुत्र कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥
bhīṣmo droṇaḥ kṛpaḥ karṇaḥ śakuniḥ saha rājabhiḥ | saṃgrāmasthasya te putra kalāṃ nārhanti ṣoḍaśīm
पुत्र, जब तुम युद्ध में खड़े होगे, तब भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण और शकुनि राजाओं के साथ मिलकर भी तुम्हारी सोलहवीं कला के बराबर नहीं होंगे।
अर्जुन उवाच
श्लोक 4 (3.176.4)
इदं च मे तनुत्राणं प्रायच्छन्मघवान्प्रभुः । अभेद्यं कवचं दिव्यं स्रजं चैव हिरण्मयीम् ॥
idaṃ ca me tanutrāṇaṃ prāyacchanmaghavānprabhuḥ | abhedyaṃ kavacaṃ divyaṃ srajaṃ caiva hiraṇmayīm
और प्रभु इन्द्र ने मुझे यह देहरक्षक, अभेद्य दिव्य कवच और यह सोने की माला दी।
श्लोक 5 (3.176.5)
देवदत्तं च मे शङ्खं देवः प्रादान्महारवम् । दिव्यं चेदं किरीटं मे स्वयमिन्द्रो युयोज ह ॥
devadattaṃ ca me śaṅkhaṃ devaḥ prādānmahāravam | divyaṃ cedaṃ kirīṭaṃ me svayamindro yuyoja ha
देवराज ने मुझे महान नाद करने वाला देवदत्त शंख दिया, और यह दिव्य किरीट स्वयं इन्द्र ने मेरे सिर पर पहनाया।
श्लोक 6 (3.176.6)
ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च । प्रादाच्छक्रो ममैतानि रुचिराणि बृहन्ति च ॥
tato divyāni vastrāṇi divyānyābharaṇāni ca | prādācchakro mamaitāni rucirāṇi bṛhanti ca
फिर इन्द्र ने मुझे ये सुन्दर और भव्य दिव्य वस्त्र तथा दिव्य आभूषण प्रदान किए।
श्लोक 7 (3.176.7)
एवं संपूजितस्तत्र सुखमस्म्युषितो नृप । इन्द्रस्य भवने पुण्ये गन्धर्वशिशुभिः सह ॥
evaṃ saṃpūjitastatra sukhamasmyuṣito nṛpa | indrasya bhavane puṇye gandharvaśiśubhiḥ saha
हे राजन्, इस प्रकार सम्मानित होकर मैं इन्द्र के पवित्र भवन में गन्धर्वकुमारों के साथ सुखपूर्वक रहा।
श्लोक 8 (3.176.8)
ततो मामब्रवीच्छक्रः प्रीतिमानमरैः सह । समयोऽर्जुन गन्तुं ते भ्रातरो हि स्मरन्ति ते ॥
tato māmabravīcchakraḥ prītimānamaraiḥ saha | samayo'rjuna gantuṃ te bhrātaro hi smaranti te
फिर प्रसन्न होकर इन्द्र ने देवताओं के साथ मुझसे कहा — "अर्जुन, अब तुम्हारे जाने का समय आ गया है; तुम्हारे भाई तुम्हें याद कर रहे हैं।"
श्लोक 9 (3.176.9)
एवमिन्द्रस्य भवने पञ्चवर्षाणि भारत । उषितानि मया राजन्स्मरता द्यूतजं कलिम् ॥
evamindrasya bhavane pañcavarṣāṇi bhārata | uṣitāni mayā rājansmaratā dyūtajaṃ kalim
हे भारत, हे राजन्, इस प्रकार जुए से उत्पन्न कलह को याद करते हुए मैंने इन्द्र के भवन में पाँच वर्ष बिताए।
श्लोक 10 (3.176.10)
ततो भवन्तमद्राक्षं भ्रातृभिः परिवारितम् । गन्धमादनमासाद्य पर्वतस्यास्य मूर्धनि ॥
tato bhavantamadrākṣaṃ bhrātṛbhiḥ parivāritam | gandhamādanamāsādya parvatasyāsya mūrdhani
फिर गन्धमादन पर आकर मैंने इस पर्वत की चोटी पर आपको भाइयों से घिरा हुआ देखा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 11 (3.176.11)
दिष्ट्या धनंजयास्त्राणि त्वया प्राप्तानि भारत । दिष्ट्या चाराधितो राजा देवानामीश्वरः प्रभुः ॥
diṣṭyā dhanaṃjayāstrāṇi tvayā prāptāni bhārata | diṣṭyā cārādhito rājā devānāmīśvaraḥ prabhuḥ
हे धनञ्जय, हे भारत, यह सौभाग्य है कि तुमने अस्त्र प्राप्त कर लिए; सौभाग्य है कि तुमने देवताओं के स्वामी, प्रभु इन्द्र को प्रसन्न किया।
श्लोक 12 (3.176.12)
दिष्ट्या च भगवान्स्थाणुर्देव्या सह परंतपः । साक्षाद्दृष्टः स्वयुद्धेन तोषितश्च त्वयाऽनघ ॥
diṣṭyā ca bhagavānsthāṇurdevyā saha paraṃtapaḥ | sākṣāddṛṣṭaḥ svayuddhena toṣitaśca tvayā'nagha
हे निष्पाप, यह सौभाग्य है कि तुमने शत्रुओं को तपाने वाले भगवान् स्थाणु (शिव) के देवी सहित साक्षात् दर्शन किए और अपने युद्ध से उन्हें प्रसन्न किया।
श्लोक 13 (3.176.13)
दिष्ट्या च लोकपालैस्त्वं समेतो भरतर्षभ । दिष्ट्या वर्धामहे पार्थ दिष्ट्याऽसि पुनरागतः ॥
diṣṭyā ca lokapālaistvaṃ sameto bharatarṣabha | diṣṭyā vardhāmahe pārtha diṣṭyā'si punarāgataḥ
हे भरतश्रेष्ठ, सौभाग्य है कि तुम लोकपालों से मिले। हे पार्थ, सौभाग्य से हमारा अभ्युदय हो रहा है; सौभाग्य से तुम फिर लौट आए हो।
श्लोक 14 (3.176.14)
अद्य कृत्स्नामिमां देवीं विजितां पुरमालिनीम् । पश्यामि भूमिं कौन्तेय त्वया मे प्रतिपादिताम् । मन्ये च धृतराष्ट्रस्य पुत्रानपि वशीकृतान् ॥
adya kṛtsnāmimāṃ devīṃ vijitāṃ puramālinīm | paśyāmi bhūmiṃ kaunteya tvayā me pratipāditām | manye ca dhṛtarāṣṭrasya putrānapi vaśīkṛtān
आज मैं नगरों की माला धारण किए इस सम्पूर्ण पृथ्वी देवी को जीती हुई मानता हूँ — हे कौन्तेय, वह भूमि जिसे तुमने मुझे सौंप दिया है — और धृतराष्ट्र के पुत्रों को भी वश में आया हुआ समझता हूँ।
श्लोक 15 (3.176.15)
इच्छामि तानि चास्त्राणि द्रष्टुं दिव्यानि भारत । यैस्तथा वीर्यवन्तस्ते निवातकवचा हताः ॥
icchāmi tāni cāstrāṇi draṣṭuṃ divyāni bhārata | yaistathā vīryavantaste nivātakavacā hatāḥ
हे भारत, मैं उन दिव्यास्त्रों को देखना चाहता हूँ जिनसे वैसे पराक्रमी निवातकवच मारे गए।
अर्जुन उवाच
श्लोक 16 (3.176.16)
श्वः प्रभाते भवान्द्रष्टा दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः । निवातकवचा घोरा यैर्मया विनिपातिताः ॥
śvaḥ prabhāte bhavāndraṣṭā divyānyastrāṇi sarvaśaḥ | nivātakavacā ghorā yairmayā vinipātitāḥ
कल सवेरे आप वे सब दिव्यास्त्र देखेंगे, जिनसे मैंने भयंकर निवातकवचों को मार गिराया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (3.176.17)
एवमागमनं तत्र कथयित्वा धनंजयः । भ्रातृभिः सहितः सर्वै रजनीं तामुवास ह ॥
evamāgamanaṃ tatra kathayitvā dhanaṃjayaḥ | bhrātṛbhiḥ sahitaḥ sarvai rajanīṃ tāmuvāsa ha
इस प्रकार वहाँ अपने आगमन का वृत्तान्त सुनाकर धनञ्जय ने अपने सब भाइयों के साथ वह रात बिताई।