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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 177

नारद द्वारा दिव्यास्त्र-प्रदर्शन का निवारण

अगली सुबह अर्जुन पवित्र होकर शिव और इन्द्र को प्रणाम करते हैं और पृथ्वी को ही रथ बनाकर दिव्यास्त्रों का प्रदर्शन आरम्भ करते हैं। धरती काँप उठती है, नदियाँ और समुद्र क्षुब्ध हो जाते हैं, सूर्य और अग्नि का तेज मन्द पड़ जाता है, भूमि के भीतर रहने वाले प्राणी दया की याचना करते हैं, और ऋषि, देवता, ब्रह्मा, लोकपाल तथा शिव वहाँ आ जुटते हैं। देवताओं के भेजे नारद अर्जुन को रोकते हैं: बिना लक्ष्य या वास्तविक आवश्यकता के इन अस्त्रों का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए, अन्यथा ये तीनों लोकों का नाश कर देंगे; युधिष्ठिर इन्हें युद्ध में देखेंगे। देवता लौट जाते हैं और पाण्डव द्रौपदी के साथ उसी वन में रहते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.177.1)

तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां धर्मराजो युधिष्ठिरः । उत्थायावश्यकार्याणि कृतवान्भ्रातृभिः सह ॥

tasyāṃ rātryāṃ vyatītāyāṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | utthāyāvaśyakāryāṇi kṛtavānbhrātṛbhiḥ saha

उस रात के बीत जाने पर धर्मराज युधिष्ठिर उठे और भाइयों के साथ आवश्यक नित्यकर्म किए।

श्लोक 2 (3.177.2)

ततः संचोदयामास सोऽर्जुनं मातृनन्दनम् । दर्शयास्त्राणि कौन्तेय यैर्जिता दानवास्त्वया ॥

tataḥ saṃcodayāmāsa so'rjunaṃ mātṛnandanam | darśayāstrāṇi kaunteya yairjitā dānavāstvayā

फिर उन्होंने माता को आनन्द देने वाले अर्जुन से आग्रह किया — "हे कौन्तेय, वे अस्त्र दिखाओ जिनसे तुमने दानवों को जीता।"

श्लोक 3 (3.177.3)

ततो धनंजयो राजन्देवैर्दत्तानि पाण्डवः । अस्त्राणि तानि दिव्यानि दर्शयामास भारत ॥

tato dhanaṃjayo rājandevairdattāni pāṇḍavaḥ | astrāṇi tāni divyāni darśayāmāsa bhārata

हे राजन्, हे भारत, तब पाण्डुपुत्र धनञ्जय ने देवताओं के दिए वे दिव्यास्त्र दिखाए।

श्लोक 4 (3.177.4)

यथान्यायं महातेजाः शौचं परममास्थितः । नमस्कृत्य त्रिनेत्राय वासवाय च पाण्डवः ॥

yathānyāyaṃ mahātejāḥ śaucaṃ paramamāsthitaḥ | namaskṛtya trinetrāya vāsavāya ca pāṇḍavaḥ

उस महातेजस्वी पाण्डव ने विधिपूर्वक भली-भाँति पवित्र होकर त्रिनेत्र शिव और इन्द्र को नमस्कार किया।

श्लोक 5 (3.177.5)

गिरिकूबरपादाक्षं शुभवेणु त्रिवेणुमत् । पार्थिवं रथमास्थाय शोभमानो धनंजयः ॥

girikūbarapādākṣaṃ śubhaveṇu triveṇumat | pārthivaṃ rathamāsthāya śobhamāno dhanaṃjayaḥ

पृथ्वी को ही रथ बनाकर — जिसमें पर्वत ही कूबर, पहिए और धुरी थे, और सुन्दर बाँस ही त्रिवेणु थे — उस पर आरूढ़ होकर धनञ्जय शोभा पाने लगे।

श्लोक 6 (3.177.6)

दिव्येन संवृतस्तेन कवचेन सुवर्चसा । धनुरादाय गाण्डीवं देवदत्तं स वारिजम् ॥

divyena saṃvṛtastena kavacena suvarcasā | dhanurādāya gāṇḍīvaṃ devadattaṃ sa vārijam

उस दिव्य, कान्तिमान कवच से ढके हुए उन्होंने गाण्डीव धनुष और जल से उत्पन्न देवदत्त शंख हाथ में लिया।

श्लोक 7 (3.177.7)

शोशुभ्यमानः कौन्तेय आनुपूर्व्यान्महाभुजः । अस्त्राणि तानि दिव्यानि दर्शनायोपचक्रमे ॥

śośubhyamānaḥ kaunteya ānupūrvyānmahābhujaḥ | astrāṇi tāni divyāni darśanāyopacakrame

अत्यन्त शोभायमान होते हुए महाबाहु कुन्तीपुत्र ने क्रम से उन दिव्यास्त्रों को दिखाना आरम्भ किया।

श्लोक 8 (3.177.8)

अथ प्रयोक्ष्यमाणेषु दिव्येष्वस्त्रेषु तेषु वै । समाक्रान्ता मही पद्भ्यां समकम्पत सद्रुमा ॥

atha prayokṣyamāṇeṣu divyeṣvastreṣu teṣu vai | samākrāntā mahī padbhyāṃ samakampata sadrumā

जब वे दिव्यास्त्र प्रयोग में लाए जाने को थे, तब उनके पैरों से दबी पृथ्वी वृक्षों सहित काँपने लगी।

श्लोक 9 (3.177.9)

क्षुभिताः सरितश्चैव तथैव च महोदधिः । शैलाश्चापि व्यदीर्यन्त न ववौ च समीरणः ॥

kṣubhitāḥ saritaścaiva tathaiva ca mahodadhiḥ | śailāścāpi vyadīryanta na vavau ca samīraṇaḥ

नदियाँ क्षुब्ध हो उठीं, महासागर भी उमड़ पड़ा; पर्वत फटने लगे और वायु का बहना रुक गया।

श्लोक 10 (3.177.10)

न बभासे सहस्रांशुर्न जज्वाल च पावकः । न वेदाः प्रतिभान्ति स्म द्विजातीनां कथंचन ॥

na babhāse sahasrāṃśurna jajvāla ca pāvakaḥ | na vedāḥ pratibhānti sma dvijātīnāṃ kathaṃcana

सहस्र किरणों वाला सूर्य नहीं चमका, अग्नि नहीं जली, और द्विजों को वेद किसी प्रकार स्मरण नहीं आते थे।

श्लोक 11 (3.177.11)

अन्तर्भूमिगता ये च प्राणिनो जनमेजय । पीड्यमानाः समुत्थाय पाण्डवं पर्यवारयन् ॥

antarbhūmigatā ye ca prāṇino janamejaya | pīḍyamānāḥ samutthāya pāṇḍavaṃ paryavārayan

हे जनमेजय, धरती के भीतर रहने वाले प्राणी पीड़ित होकर ऊपर निकल आए और पाण्डव को घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 12 (3.177.12)

वेपमानाः प्राञ्जलयस्ते सर्वे विकृताननाः । दह्यमानास्तदाऽस्त्रैस्ते याचन्ति स्म धनंजयम् ॥

vepamānāḥ prāñjalayaste sarve vikṛtānanāḥ | dahyamānāstadā'straiste yācanti sma dhanaṃjayam

काँपते हुए, हाथ जोड़े, पीड़ा से विकृत मुखों वाले वे सब अस्त्रों से जलते हुए धनञ्जय से याचना करने लगे।

श्लोक 13 (3.177.13)

ततो ब्रह्मर्षयश्चैव सिद्धा ये च महर्षयः । जङ्गमानि च भूतानि सर्वाण्येवावतस्थिरे ॥

tato brahmarṣayaścaiva siddhā ye ca maharṣayaḥ | jaṅgamāni ca bhūtāni sarvāṇyevāvatasthire

तब ब्रह्मर्षि, सिद्ध, महर्षि और सब चलने-फिरने वाले प्राणी वहाँ आकर खड़े हो गए।

श्लोक 14 (3.177.14)

देवर्षयश्च प्रवरास्तथैव च दिवौकसः । यक्षराक्षसगन्धर्वास्तथैव च पतत्रिणः । खेचराणि च भूतानि सर्वाण्येवावतस्थिरे ॥

devarṣayaśca pravarāstathaiva ca divaukasaḥ | yakṣarākṣasagandharvāstathaiva ca patatriṇaḥ | khecarāṇi ca bhūtāni sarvāṇyevāvatasthire

श्रेष्ठ देवर्षि और स्वर्गवासी, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व और पक्षी भी, तथा आकाश में विचरने वाले सब प्राणी वहाँ आकर खड़े हो गए।

श्लोक 15 (3.177.15)

ततः पितामहश्चैव लोकपालाश्च सर्वशः । भगवांश्च महादेवः सगणोऽभ्याययौ तदा ॥

tataḥ pitāmahaścaiva lokapālāśca sarvaśaḥ | bhagavāṃśca mahādevaḥ sagaṇo'bhyāyayau tadā

फिर पितामह ब्रह्मा, सभी लोकपाल और अपने गणों सहित भगवान् महादेव वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 16 (3.177.16)

ततो वायुर्महाराज दिव्यैर्माल्यैः समन्वितः । अभितः पाण्डवं चित्रैरवचक्रे समन्ततः ॥

tato vāyurmahārāja divyairmālyaiḥ samanvitaḥ | abhitaḥ pāṇḍavaṃ citrairavacakre samantataḥ

हे महाराज, तब दिव्य मालाएँ लिए वायु ने पाण्डव के चारों ओर रंग-बिरंगे फूल बिखेर दिए।

श्लोक 17 (3.177.17)

जगुश्च गाथा विविधा गन्धर्वाः सुरचोदिताः । ननृतुः सङ्घशश्चैव राजन्नप्सरसां गणाः ॥

jaguśca gāthā vividhā gandharvāḥ suracoditāḥ | nanṛtuḥ saṅghaśaścaiva rājannapsarasāṃ gaṇāḥ

हे राजन्, देवताओं की प्रेरणा से गन्धर्व नाना प्रकार की गाथाएँ गाने लगे और अप्सराओं के समूह नाचने लगे।

श्लोक 18 (3.177.18)

तस्मिंश्च तादृशे काले नारदश्चोदितः सुरैः । आगम्याह वचः पार्थं श्रवणीयमिदं नृप ॥

tasmiṃśca tādṛśe kāle nāradaścoditaḥ suraiḥ | āgamyāha vacaḥ pārthaṃ śravaṇīyamidaṃ nṛpa

हे राजन्, ऐसे समय में देवताओं से प्रेरित होकर नारद वहाँ आए और पार्थ से यह सुनने योग्य वचन कहा —

नारद उवाच

श्लोक 19 (3.177.19)

अर्जुनार्जुन मा युङ्क्ष्व दिव्यान्यस्त्राणि भारत । नैतानि निरधिष्ठाने प्रयुज्यन्ते कथंचन ॥

arjunārjuna mā yuṅkṣva divyānyastrāṇi bhārata | naitāni niradhiṣṭhāne prayujyante kathaṃcana

अर्जुन, अर्जुन! हे भारत, दिव्यास्त्रों का प्रयोग मत करो। जहाँ कोई लक्ष्य न हो, वहाँ इनका प्रयोग कभी नहीं किया जाता।

श्लोक 20 (3.177.20)

अधिष्ठाने न वाऽनार्तः प्रयुञ्जीत कदाचन । प्रयोगेषु महान्दोषो ह्यस्त्राणां कुरुनन्दन ॥

adhiṣṭhāne na vā'nārtaḥ prayuñjīta kadācana | prayogeṣu mahāndoṣo hyastrāṇāṃ kurunandana

लक्ष्य होने पर भी, जो संकट में न हो, उसे इनका प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए। हे कुरुनन्दन, अस्त्रों के प्रयोग में बड़ा दोष है।

श्लोक 21 (3.177.21)

एतानि रक्ष्यमाणानि धनंजय यथागमम् । बलवन्ति सुखार्हाणि भविष्यन्ति न संशयः ॥

etāni rakṣyamāṇāni dhanaṃjaya yathāgamam | balavanti sukhārhāṇi bhaviṣyanti na saṃśayaḥ

हे धनञ्जय, शास्त्र के अनुसार रक्षित रहने पर ये बलवान और सुखदायक होंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 22 (3.177.22)

अरक्ष्यमाणान्येतानि त्रैलोक्यस्यापि पाण्डव । भवन्ति स्म विनाशाय मैवं भूयः कृथाः क्वचित् ॥

arakṣyamāṇānyetāni trailokyasyāpi pāṇḍava | bhavanti sma vināśāya maivaṃ bhūyaḥ kṛthāḥ kvacit

हे पाण्डव, रक्षित न रहें तो ये तीनों लोकों का भी विनाश कर देते हैं। ऐसा फिर कभी कहीं मत करना।

श्लोक 23 (3.177.23)

अजातशत्रो त्वं चैव द्रक्ष्यसे तानि संयुगे । योज्यमानानि पार्थेन द्विषतामवमर्दने ॥

ajātaśatro tvaṃ caiva drakṣyase tāni saṃyuge | yojyamānāni pārthena dviṣatāmavamardane

हे अजातशत्रु, तुम भी इन्हें युद्ध में देखोगे, जब पार्थ शत्रुओं को कुचलने के लिए इनका प्रयोग करेगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 24 (3.177.24)

निवार्याथ ततः पार्थं सर्वे देवा यथागतम् । जग्मुरन्ये च ये तत्र समाजग्मुर्नरर्षभ ॥

nivāryātha tataḥ pārthaṃ sarve devā yathāgatam | jagmuranye ca ye tatra samājagmurnararṣabha

हे नरश्रेष्ठ, इस प्रकार पार्थ को रोककर सब देवता जैसे आए थे वैसे ही लौट गए, और वहाँ एकत्र हुए दूसरे भी चले गए।

श्लोक 25 (3.177.25)

तेषु सर्वेषु कौरव्य प्रतियातेषु पाण्डवाः । तस्मिन्नेव वने हृष्टास्त ऊषुः सह कृष्णया ॥

teṣu sarveṣu kauravya pratiyāteṣu pāṇḍavāḥ | tasminneva vane hṛṣṭāsta ūṣuḥ saha kṛṣṇayā

हे कौरव्य, उन सबके चले जाने पर पाण्डव कृष्णा (द्रौपदी) के साथ उसी वन में प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे।

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