आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 178
पाण्डवों का गन्धमादन से प्रस्थान
इन्द्रलोक से अर्जुन के लौटने के बाद पाण्डव गन्धमादन पर्वत पर कुबेर के क्रीडा-उद्यानों में चार वर्ष सुख से बिताते हैं। फिर भीम, अर्जुन और नकुल-सहदेव युधिष्ठिर से आग्रह करते हैं कि पर्वत छोड़कर अज्ञातवास का वर्ष छिपकर बिताया जाए और दुर्योधन से राज्य वापस लिया जाए। युधिष्ठिर कुबेर के निवास की प्रदक्षिणा करते हैं, फिर कभी तपस्या के लिए लौटने का संकल्प लेकर पर्वत से विदा लेते हैं और उसी मार्ग से उतरते हैं, जिसमें घटोत्कच सबको उठाकर ले चलता है; लोमश मुनि उन्हें आशीर्वाद देकर स्वर्ग लौट जाते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (3.178.1)
तस्मिन्कृतास्त्रे रथिनां प्रवीरे । प्रत्यागते भवनाद्वृत्रहन्तुः । अतः परं किमकुर्वन्त पार्थाः । समेत्य शूरेण धनंजयेन ॥
tasminkṛtāstre rathināṃ pravīre | pratyāgate bhavanādvṛtrahantuḥ | ataḥ paraṃ kimakurvanta pārthāḥ | sametya śūreṇa dhanaṃjayena
जब रथियों में श्रेष्ठ वह वीर अस्त्रविद्या में निपुण होकर वृत्रहन्ता इन्द्र के भवन से लौट आया, तब शूरवीर धनंजय से मिलकर पार्थों ने आगे क्या किया?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 2 (3.178.2)
वनेषु तेष्वेव तु ते नरेन्द्राः । सहार्जुनेनेन्द्रसमेन वीराः । तस्मिंश्च शैलप्रवरे सुरम्ये । धनेश्वराक्रीडगता विजह्रुः ॥
vaneṣu teṣveva tu te narendrāḥ | sahārjunenendrasamena vīrāḥ | tasmiṃśca śailapravare suramye | dhaneśvarākrīḍagatā vijahruḥ
वे वीर नरेश इन्द्र के समान अर्जुन के साथ उन्हीं वनों में रहे, और उस सुरम्य श्रेष्ठ पर्वत पर धनपति कुबेर के क्रीडा-उद्यानों में विचरते हुए आनन्द करते रहे।
श्लोक 3 (3.178.3)
वेश्मानि तान्यप्रतिमानि पश्यन् । क्रीडाश्च नानाद्रुमसन्निबद्धाः । चचार धन्वी बहुधा नरेन्द्रः । सोऽस्त्रेषु यत्तः सततं किरीटी ॥
veśmāni tānyapratimāni paśyan | krīḍāśca nānādrumasannibaddhāḥ | cacāra dhanvī bahudhā narendraḥ | so'streṣu yattaḥ satataṃ kirīṭī
उन अनुपम भवनों को और नाना प्रकार के वृक्षों से सघन क्रीडा-स्थलों को देखते हुए किरीटधारी अर्जुन धनुष लिए अनेक प्रकार से विचरते रहे; वे सदा अपने अस्त्रों में ही दत्तचित्त रहते थे।
श्लोक 4 (3.178.4)
अवाप्य वासं नरदेवपुत्राः । प्रसादजं वैश्रवणस्य राज्ञः । न प्राणिनां ते स्पृहयन्ति राज- । ञ्शिवश्च कालः स बभूव तेषाम् ॥
avāpya vāsaṃ naradevaputrāḥ | prasādajaṃ vaiśravaṇasya rājñaḥ | na prāṇināṃ te spṛhayanti rāja- | ñśivaśca kālaḥ sa babhūva teṣām
राजा वैश्रवण (कुबेर) की कृपा से वहाँ निवास पाकर उन राजपुत्रों को किसी प्राणी के सुख की स्पृहा न रही, हे राजन्; वह समय उनके लिए मंगलमय रहा।
श्लोक 5 (3.178.5)
समेत्य पार्थेन यथैकरात्र- । मूषुः समास्तत्रतथा चतस्रः । पूर्वाश्च षट् ता दश पाण्डवानां । शिवा बभूवुर्वसतां वनेषु ॥
sametya pārthena yathaikarātra- | mūṣuḥ samāstatratathā catasraḥ | pūrvāśca ṣaṭ tā daśa pāṇḍavānāṃ | śivā babhūvurvasatāṃ vaneṣu
अर्जुन के साथ वे वहाँ चार वर्ष ऐसे रहे मानो एक ही रात बीती हो; और पहले के छह वर्ष मिलाकर, वनों में बसे पाण्डवों के वे दस वर्ष सुख से बीते।
श्लोक 6 (3.178.6)
ततोऽब्रवीद्वायुसुतस्तरस्वी । जिष्णुश्च राजानमुपोपविश्य । यमौ च वीरौ सुरराजकल्पा- । वेकान्तमास्थाय हितं प्रियं च ॥
tato'bravīdvāyusutastarasvī | jiṣṇuśca rājānamupopaviśya | yamau ca vīrau surarājakalpā- | vekāntamāsthāya hitaṃ priyaṃ ca
तब वेगवान वायुपुत्र भीम, जिष्णु अर्जुन और देवराज के समान दोनों वीर यमज एकान्त में राजा के पास बैठकर हितकर और प्रिय वचन बोले—
भीमसेनादय ऊचुः
श्लोक 7 (3.178.7)
तव प्रतिज्ञां कुरुराज सत्यां । चिकीर्षमाणास्त्वदनुप्रियं च । ततो न गच्छाम वनान्यपास्य । सुयोधनं सानुचरं निहन्तुम् ॥
tava pratijñāṃ kururāja satyāṃ | cikīrṣamāṇāstvadanupriyaṃ ca | tato na gacchāma vanānyapāsya | suyodhanaṃ sānucaraṃ nihantum
हे कुरुराज, आपकी प्रतिज्ञा को सत्य करने और आपका प्रिय करने की इच्छा से ही हम इन वनों को छोड़कर सुयोधन को उसके अनुचरों सहित मारने नहीं जाते।
श्लोक 8 (3.178.8)
एकादशं वर्षमिदं वसामः । सुयोधनेनात्तसुखाः सुखार्हाः । तं वञ्चयित्वाऽधमबुद्धिशील- । मज्ञातवासं सुखमाप्नुयाम ॥
ekādaśaṃ varṣamidaṃ vasāmaḥ | suyodhanenāttasukhāḥ sukhārhāḥ | taṃ vañcayitvā'dhamabuddhiśīla- | majñātavāsaṃ sukhamāpnuyāma
सुख के योग्य होकर भी सुयोधन द्वारा सुख छीन लिए जाने पर हम यह ग्यारहवाँ वर्ष यहाँ बिता रहे हैं। उस अधम बुद्धि और आचरण वाले को छलकर हम अज्ञातवास सुख से पूरा कर लें।
श्लोक 9 (3.178.9)
तवाज्ञया पार्थिव निर्विशङ्का । विहाय मानं विचरामो वनानि । समीपवासेन विलोभितास्ते । ज्ञास्यन्ति नास्मानपकृष्टदेशान् ॥
tavājñayā pārthiva nirviśaṅkā | vihāya mānaṃ vicarāmo vanāni | samīpavāsena vilobhitāste | jñāsyanti nāsmānapakṛṣṭadeśān
हे राजन्, आपकी आज्ञा से हम मान त्यागकर निःशंक होकर वनों में विचरें। हमारे पास ही रहने से भ्रम में पड़े वे लोग हमें हमारी हीन दशा में पहचान नहीं पाएँगे।
श्लोक 10 (3.178.10)
संवत्सरं तत्र विहृत्य गूढं । नराधमं तं सुखमुद्धरेम । निर्यात्य वैरं सफलं सपुष्पं । तस्मै नरेन्द्राधमपूरुषाय ॥
saṃvatsaraṃ tatra vihṛtya gūḍhaṃ | narādhamaṃ taṃ sukhamuddharema | niryātya vairaṃ saphalaṃ sapuṣpaṃ | tasmai narendrādhamapūruṣāya
वह वर्ष वहाँ छिपकर बिताने के बाद हम उस नराधम को सहज ही उखाड़ फेंकें, और उस अधम राजा से अपने वैर का फल और फूल सहित पूरा बदला चुका दें—
श्लोक 11 (3.178.11)
सुयोधनायानुचरैर्वृताय । ततो महीं प्राप्नुहि धर्मराज । स्वर्गोपमं देशमिमं चरद्भिः । शक्यो विहन्तुं नरदेव शोकः ॥
suyodhanāyānucarairvṛtāya | tato mahīṃ prāpnuhi dharmarāja | svargopamaṃ deśamimaṃ caradbhiḥ | śakyo vihantuṃ naradeva śokaḥ
अनुचरों से घिरे उस सुयोधन से। फिर, हे धर्मराज, आप पृथ्वी को प्राप्त कीजिए। हे नरदेव, स्वर्ग-जैसे इस प्रदेश में विचरते हुए शोक तो दूर किया जा सकता है,
श्लोक 12 (3.178.12)
कीर्तिस्तु ते भारत पुण्यगन्धा । नश्येद्धि लोकेषु चराचरेषु । तत्प्राप्य राज्यंकुरुपुङ्गवानां । शक्यं महत्प्राप्तुमथ क्रियाश्च ॥
kīrtistu te bhārata puṇyagandhā | naśyeddhi lokeṣu carācareṣu | tatprāpya rājyaṃkurupuṅgavānāṃ | śakyaṃ mahatprāptumatha kriyāśca
परन्तु हे भारत, आपकी पुण्य-सुगन्धित कीर्ति चर-अचर लोकों में नष्ट हो जाएगी। कुरुश्रेष्ठों का राज्य पा लेने पर ही महान फल पाया जा सकता है और यज्ञ आदि कर्म भी किए जा सकते हैं।
श्लोक 13 (3.178.13)
इदं तु शक्यं सततं नरेन्द्र । प्राप्तुं त्वया यल्लभसे कुबेरात् । कुरुष्व बुद्धिं द्विषतां वधाय । कृतागसां भारत निग्रहे च ॥
idaṃ tu śakyaṃ satataṃ narendra | prāptuṃ tvayā yallabhase kuberāt | kuruṣva buddhiṃ dviṣatāṃ vadhāya | kṛtāgasāṃ bhārata nigrahe ca
हे नरेन्द्र, जो कुछ आप कुबेर से पा रहे हैं, वह तो आप कभी भी पा सकते हैं। हे भारत, शत्रुओं के वध में और अपराधियों के दमन में अपना मन लगाइए।
श्लोक 14 (3.178.14)
तेजस्तवोग्रं न सहेत राजन् । समेत्य साक्षादपि वज्रपाणिः । न हि व्यथां जातु करिष्यतस्तौ । समेत्य देवैरपि धर्मराज ॥
tejastavograṃ na saheta rājan | sametya sākṣādapi vajrapāṇiḥ | na hi vyathāṃ jātu kariṣyatastau | sametya devairapi dharmarāja
हे राजन्, स्वयं वज्रधारी इन्द्र भी युद्ध में सामने आकर आपके उग्र तेज को सह नहीं सकते। हे धर्मराज, वे दोनों तो देवताओं से भिड़कर भी कभी विचलित नहीं होंगे—
श्लोक 15 (3.178.15)
तवार्थसिद्ध्यर्थमपि प्रवृत्तौ । सुपर्णकेतुश्च शिनेश्च नप्ता । यथैव कृष्णोऽप्रतिमो बलेन । तथैव राजन्स शिनिप्रवीरः ॥
tavārthasiddhyarthamapi pravṛttau | suparṇaketuśca śineśca naptā | yathaiva kṛṣṇo'pratimo balena | tathaiva rājansa śinipravīraḥ
आपका प्रयोजन सिद्ध करने में लगे वे दोनों, गरुडध्वज कृष्ण और शिनि के पौत्र सात्यकि। हे राजन्, जैसे कृष्ण बल में अतुलनीय हैं, वैसे ही शिनिवंश का वह वीर भी है।
श्लोक 16 (3.178.16)
तवार्थसिद्ध्यर्थमभिप्रपन्नो । यथैव कृष्णः सह यादवैस्तैः । तथैव चेमौ नरदेववर्य । यमौ च वीरौ कृतिनौ प्रयोगे ॥
tavārthasiddhyarthamabhiprapanno | yathaiva kṛṣṇaḥ saha yādavaistaiḥ | tathaiva cemau naradevavarya | yamau ca vīrau kṛtinau prayoge
हे नरश्रेष्ठ, जैसे कृष्ण उन यादवों के साथ आपका प्रयोजन सिद्ध करने में लगे हैं, वैसे ही हम दोनों भी हैं, और अस्त्र-प्रयोग में कुशल दोनों वीर यमज भी।
श्लोक 17 (3.178.17)
त्वदर्थयोगप्रभवप्रधानाः । शमं करिष्याम परान्समेत्य ॥
tvadarthayogaprabhavapradhānāḥ | śamaṃ kariṣyāma parānsametya
आपके धन-लाभ और ऐश्वर्य की वृद्धि को ही प्रधान मानकर हम शत्रुओं से भिड़कर उन्हें शान्त कर देंगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (3.178.18)
ततस्तदाज्ञाय मतं महात्मा । तेषां च धर्मस्य सुतो वरिष्ठः । प्रदक्षिणं स्थानमुपेत्य राजा । पर्याक्रमद्वैश्रवणस्य राज्ञः ॥
tatastadājñāya mataṃ mahātmā | teṣāṃ ca dharmasya suto variṣṭhaḥ | pradakṣiṇaṃ sthānamupetya rājā | paryākramadvaiśravaṇasya rājñaḥ
तब धर्मपुत्र महात्मा श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर ने उनका अभिप्राय समझकर राजा वैश्रवण के निवास-स्थान के पास जाकर उसकी प्रदक्षिणा की।
श्लोक 19 (3.178.19)
आमन्त्र्य वेश्मानि नदीः सरांसि । सर्वाणि रक्षांसि च धर्मराजः । यथागतं मार्गमवेक्षमाणः । पुनर्गिरिं चैव निरीक्षमाणः । ततो महात्मा स विशुद्धबुद्धिः । संप्रार्थयामास नगेन्द्रवर्यम् ॥
āmantrya veśmāni nadīḥ sarāṃsi | sarvāṇi rakṣāṃsi ca dharmarājaḥ | yathāgataṃ mārgamavekṣamāṇaḥ | punargiriṃ caiva nirīkṣamāṇaḥ | tato mahātmā sa viśuddhabuddhiḥ | saṃprārthayāmāsa nagendravaryam
भवनों, नदियों, सरोवरों और सब राक्षसों से विदा लेकर धर्मराज ने उस मार्ग की ओर देखा जिससे वे आए थे, और फिर पर्वत को निहारा; तब विशुद्ध बुद्धि वाले उन महात्मा ने उस श्रेष्ठ पर्वत से प्रार्थना की—
श्लोक 20 (3.178.20)
समाप्तकर्मा सहितः सुहृद्भि- । र्जित्वा सपत्नान्प्रतिलभ्य राज्यम् । शैलेन्द्र भूयस्तपसे जितात्मा । द्रष्टा तवास्मीति मतिं चकार ॥
samāptakarmā sahitaḥ suhṛdbhi- | rjitvā sapatnānpratilabhya rājyam | śailendra bhūyastapase jitātmā | draṣṭā tavāsmīti matiṃ cakāra
"हे पर्वतराज, जब मेरा कार्य पूरा हो जाएगा और मैं सुहृदों के साथ शत्रुओं को जीतकर राज्य वापस पा लूँगा, तब संयमित मन से तपस्या के लिए मैं फिर आपके दर्शन करूँगा।" ऐसा उन्होंने निश्चय किया।
श्लोक 21 (3.178.21)
वृतश्च सर्वैरनुजैर्द्विजैश्च । तेनैव मार्गेण पुनर्निवृत्तः । उवाह चैनान्गणशस्तथैव । घटोत्कचः पर्वतनिर्झरेषु ॥
vṛtaśca sarvairanujairdvijaiśca | tenaiva mārgeṇa punarnivṛttaḥ | uvāha caināngaṇaśastathaiva | ghaṭotkacaḥ parvatanirjhareṣu
सब छोटे भाइयों और ब्राह्मणों से घिरे हुए वे उसी मार्ग से लौट चले; और घटोत्कच पहले की ही तरह उन्हें दल-दल करके पर्वतीय झरनों के पार उठाकर ले चला।
श्लोक 22 (3.178.22)
तान्प्रस्थितान्प्रीतमना महर्षिः । पितेव पुत्राननुशिष्य सर्वान् । स लोमशो दिवमेवोर्जितश्री- । र्जगाम तेषां विजयं तदोक्त्वा ॥
tānprasthitānprītamanā maharṣiḥ | piteva putrānanuśiṣya sarvān | sa lomaśo divamevorjitaśrī- | rjagāma teṣāṃ vijayaṃ tadoktvā
उनके प्रस्थान करते समय प्रसन्नचित्त महर्षि लोमश ने पिता की भाँति उन सब पुत्रों को उपदेश दिया; फिर उन्हें विजय का आशीर्वाद देकर वे तेजस्वी मुनि स्वर्ग को ही चले गए।
श्लोक 23 (3.178.23)
तेनार्ष्टिषेणेन तथानुशिष्टा- । स्तीर्थानि रम्याणि तपोवनानि । महान्ति चान्यानि सरांसि पार्थाः । संपश्यमानाः प्रययुर्नराग्र्याः ॥
tenārṣṭiṣeṇena tathānuśiṣṭā- | stīrthāni ramyāṇi tapovanāni | mahānti cānyāni sarāṃsi pārthāḥ | saṃpaśyamānāḥ prayayurnarāgryāḥ
आर्ष्टिषेण से भी इसी प्रकार उपदेश पाकर नरश्रेष्ठ पार्थ रमणीय तीर्थों, तपोवनों और अन्य बड़े-बड़े सरोवरों को देखते हुए आगे बढ़े।