आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 179
द्वैतवन की ओर वापसी
गन्धमादन छोड़ते हुए दुखी पाण्डव कैलास को पार करते हैं, राजा वृषपर्वा के आश्रम में एक रात और बदरी में एक मास बिताते हैं, फिर चीन, तुषार, दरद और कुलिन्द देशों से होते हुए किरातराज सुबाहु के नगर पहुँचते हैं। वहाँ वे अपने सारथियों और रथों को साथ लेते हैं, घटोत्कच को विदा करते हैं, और यमुना के उद्गम के पास विशाखयूप के वन में शिकार करते हुए एक वर्ष बिताते हैं, जहाँ युधिष्ठिर भीम को एक अजगर से छुड़ाते हैं। बारहवाँ वर्ष आरम्भ होने पर वे मरुभूमि के किनारे-किनारे सरस्वती तक जाकर द्वैतवन में बस जाते हैं, जहाँ वनवासी तपस्वी उनसे मिलने आते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.179.1)
नगोत्तमं प्रस्रवणैरुपेतं । दिशां गजैः किन्नरपक्षिभिश्च । सुखं निवासं जहतां हि तेषां । न प्रीतिरासीद्भरतर्षभाणाम् ॥
nagottamaṃ prasravaṇairupetaṃ | diśāṃ gajaiḥ kinnarapakṣibhiśca | sukhaṃ nivāsaṃ jahatāṃ hi teṣāṃ | na prītirāsīdbharatarṣabhāṇām
झरनों, दिग्गजों, किन्नरों और पक्षियों से युक्त उस श्रेष्ठ पर्वत पर अपना सुखद निवास छोड़ते समय उन भरतश्रेष्ठों को कोई प्रसन्नता नहीं हुई।
श्लोक 2 (3.179.2)
ततस्तु तेषां पुनरेव हर्षः । कैलासमालोक्य महान्बभूव । कुबेरकान्तं भरतर्षभाणां । महीधरं वारिधरप्रकाशम् ॥
tatastu teṣāṃ punareva harṣaḥ | kailāsamālokya mahānbabhūva | kuberakāntaṃ bharatarṣabhāṇāṃ | mahīdharaṃ vāridharaprakāśam
फिर कुबेर के प्रिय, जलधर मेघ के समान चमकते कैलास पर्वत को देखकर उन भरतश्रेष्ठों के मन में फिर से बड़ा हर्ष उमड़ आया।
श्लोक 3 (3.179.3)
समुच्छ्रयान्पर्वतसंनिरोधान् । गोष्ठान्हरीणां गिरिगह्वराणि । बहुप्रकाराणि समीक्ष्यवीराः । स्थलानि निम्नानि च तत्र तत्र ॥
samucchrayānparvatasaṃnirodhān | goṣṭhānharīṇāṃ girigahvarāṇi | bahuprakārāṇi samīkṣyavīrāḥ | sthalāni nimnāni ca tatra tatra
ऊँचे शिखरों, सटी हुई पर्वत-श्रेणियों, सिंहों की माँदों, अनेक प्रकार की पर्वत-कन्दराओं और जहाँ-तहाँ ऊँची-नीची भूमि को देखते हुए वे वीर,
श्लोक 4 (3.179.4)
तथैव चान्यानि महावनानि । मृगद्विजानेकपसेवितानि । आलोकयन्तोऽभिययुः प्रतीता- । स्ते धन्विनः खड्गधरा नराग्र्याः ॥
tathaiva cānyāni mahāvanāni | mṛgadvijānekapasevitāni | ālokayanto'bhiyayuḥ pratītā- | ste dhanvinaḥ khaḍgadharā narāgryāḥ
और इसी प्रकार मृगों, पक्षियों और हाथियों से सेवित अन्य बड़े-बड़े वनों को निहारते हुए, वे धनुर्धर और खड्गधारी नरश्रेष्ठ प्रसन्न मन से आगे बढ़ते गए।
श्लोक 5 (3.179.5)
वनानि रम्याणि नदीः सरांसि । गुहा गिरीणां गिरिगह्वराणि । एते निवासाः सततं बभूवु- । र्निशामुखं प्राप्य नरर्षभाणाम् ॥
vanāni ramyāṇi nadīḥ sarāṃsi | guhā girīṇāṃ girigahvarāṇi | ete nivāsāḥ satataṃ babhūvu- | rniśāmukhaṃ prāpya nararṣabhāṇām
रमणीय वन, नदियाँ, सरोवर, पर्वतों की छोटी गुफाएँ और बड़ी कन्दराएँ — साँझ होने पर यही उन नरश्रेष्ठों के निवास-स्थान बनते थे।
श्लोक 6 (3.179.6)
ते दुर्गवासं बहुधा निरुष्य । व्यतीत्य कैलासमचिन्त्यरूपम् । आसेदुरत्यर्थमनोरमं ते । तमाश्रमाग्र्यं वृषपर्वणस्तु ॥
te durgavāsaṃ bahudhā niruṣya | vyatītya kailāsamacintyarūpam | āseduratyarthamanoramaṃ te | tamāśramāgryaṃ vṛṣaparvaṇastu
दुर्गम स्थानों में अनेक बार रात बिताकर और अचिन्त्य रूप वाले कैलास को पार करके वे वृषपर्वा के अत्यन्त मनोहर श्रेष्ठ आश्रम में पहुँचे।
श्लोक 7 (3.179.7)
समेत्य राज्ञा वृषपर्वणा ते । प्रत्यर्चितास्तेन च वीतमोहाः । शशंसिरे विस्तरशः प्रवासं । शिवं यथावद्वृषपर्वणस्ते ॥
sametya rājñā vṛṣaparvaṇā te | pratyarcitāstena ca vītamohāḥ | śaśaṃsire vistaraśaḥ pravāsaṃ | śivaṃ yathāvadvṛṣaparvaṇaste
राजा वृषपर्वा से मिलकर और उनसे सत्कार पाकर, निश्चिन्त मन से उन्होंने वृषपर्वा को अपनी प्रवास-यात्रा का शुभ वृत्तान्त विस्तार से और यथाक्रम सुनाया।
श्लोक 8 (3.179.8)
सुखोषितास्तस्य त एकरात्रं । पुण्याश्रमे देवमहर्षिजुष्टे । अभ्याययुस्ते बदरीं विशालां । सुखेन वीराः पुनरेव वासम् ॥
sukhoṣitāstasya ta ekarātraṃ | puṇyāśrame devamaharṣijuṣṭe | abhyāyayuste badarīṃ viśālāṃ | sukhena vīrāḥ punareva vāsam
देवताओं और महर्षियों से सेवित उनके पवित्र आश्रम में एक रात सुख से बिताकर वे वीर फिर सहज ही विशाल बदरी में निवास के लिए लौट आए।
श्लोक 9 (3.179.9)
ऊषुस्ततस्तत्र महानुभावा । नारायणस्थानगताः समग्राः । कुबेरकान्तां नलिनीं विशोकाः । संपश्यमानाः सुरसिद्धजुष्टाम् ॥
ūṣustatastatra mahānubhāvā | nārāyaṇasthānagatāḥ samagrāḥ | kuberakāntāṃ nalinīṃ viśokāḥ | saṃpaśyamānāḥ surasiddhajuṣṭām
तब वे सब महानुभाव नारायण के स्थान में शोकरहित होकर रहने लगे, और देवताओं तथा सिद्धों से सेवित कुबेर की प्रिय कमल-सरसी को निहारते रहे।
श्लोक 10 (3.179.10)
तां चाथ दृष्ट्वा नलिनीं विशोकाः । पाण्डोः सुताः सर्वनरप्रधानाः । ते रेमिरे नन्दनवासमेत्य । द्विजर्षयो वीतमला यथैव ॥
tāṃ cātha dṛṣṭvā nalinīṃ viśokāḥ | pāṇḍoḥ sutāḥ sarvanarapradhānāḥ | te remire nandanavāsametya | dvijarṣayo vītamalā yathaiva
उस कमल-सरसी को देखकर समस्त मनुष्यों में श्रेष्ठ पाण्डुपुत्र शोकरहित हो गए और वहाँ ऐसे रमे, जैसे निष्पाप ब्रह्मर्षि नन्दनवन में पहुँचकर रमते हैं।
श्लोक 11 (3.179.11)
ततः क्रमेणोपययुर्नृवीरा । यथागतेनैव पथा समग्राः । विहृत्य मासं सुखिनो बदर्यां । किरातराज्ञो विषयं सुबाहोः ॥
tataḥ krameṇopayayurnṛvīrā | yathāgatenaiva pathā samagrāḥ | vihṛtya māsaṃ sukhino badaryāṃ | kirātarājño viṣayaṃ subāhoḥ
फिर बदरी में एक मास सुख से बिताकर वे सब वीर क्रम-क्रम से उसी मार्ग से, जिससे आए थे, किरातराज सुबाहु के देश की ओर चल पड़े।
श्लोक 12 (3.179.12)
चीनांस्तुषारान्दरदांश्च सर्वान् । देशान्कुलिन्दस्य च भूरिरम्यान् । अतीत्य दुर्गं हिमवत्प्रदेशं । पुरं सुबाहोर्ददृशुर्नृवीराः ॥
cīnāṃstuṣārāndaradāṃśca sarvān | deśānkulindasya ca bhūriramyān | atītya durgaṃ himavatpradeśaṃ | puraṃ subāhordadṛśurnṛvīrāḥ
चीन, तुषार और दरद — इन सब देशों को तथा कुलिन्द के अत्यन्त रमणीय प्रदेशों को लाँघकर, और हिमालय के दुर्गम क्षेत्र को पार करके, उन वीरों ने सुबाहु का नगर देखा।
श्लोक 13 (3.179.13)
श्रुत्वा च तान्पार्थिव पुत्रपौत्रा- । न्प्राप्तान्सुबाहुर्विषये समग्रान् । प्रत्युद्ययौ प्रीतियुतः स राजा । तं चाभ्यनन्दन्वृषभाः कुरूणाम् ॥
śrutvā ca tānpārthiva putrapautrā- | nprāptānsubāhurviṣaye samagrān | pratyudyayau prītiyutaḥ sa rājā | taṃ cābhyanandanvṛṣabhāḥ kurūṇām
राजा के पुत्र-पौत्रों को अपने राज्य में आया सुनकर राजा सुबाहु प्रसन्न होकर उनकी अगवानी को निकले, और कुरुश्रेष्ठों ने भी उनका अभिनन्दन किया।
श्लोक 14 (3.179.14)
समेत्य राज्ञा तु सुबाहुना ते । सूतैर्विशोकप्रमुखैश्च सर्वे । सहेन्द्रसेनैः परिचारकैश्च । पौरोगवैर्ये च महानसस्थाः ॥
sametya rājñā tu subāhunā te | sūtairviśokapramukhaiśca sarve | sahendrasenaiḥ paricārakaiśca | paurogavairye ca mahānasasthāḥ
राजा सुबाहु से मिलकर, विशोक आदि अपने सब सारथियों, इन्द्रसेन, परिचारकों, आगे चलने वाले सेवकों और रसोई में रहने वालों के साथ,
श्लोक 15 (3.179.15)
सुखोषितास्तत्र त एकरात्रं । सूतान्समादाय रथांश्च सर्वान् । घटोत्कचं सानुचरं विसृज्य । ततोऽभ्ययुर्यामुनमद्रिराजम् ॥
sukhoṣitāstatra ta ekarātraṃ | sūtānsamādāya rathāṃśca sarvān | ghaṭotkacaṃ sānucaraṃ visṛjya | tato'bhyayuryāmunamadrirājam
वे वहाँ एक रात सुख से रहे। फिर सारथियों और सब रथों को साथ लेकर, और घटोत्कच को उसके अनुचरों सहित विदा करके, वे यमुना के उद्गम वाले पर्वतराज की ओर चल दिए।
श्लोक 16 (3.179.16)
तस्मिन्गिरौ प्रस्रवणोपपन्न- । हिमोत्तरीयारुणपाण्डुसानौ । विशाखयूपं समुपेत्य चक्रु- । स्तदा निवासं पुरुषप्रवीराः ॥
tasmingirau prasravaṇopapanna- | himottarīyāruṇapāṇḍusānau | viśākhayūpaṃ samupetya cakru- | stadā nivāsaṃ puruṣapravīrāḥ
झरनों से भरे उस पर्वत पर, जिसकी लाल और श्वेत ढलानें हिम की चादर ओढ़े थीं, वे नरश्रेष्ठ विशाखयूप पहुँचे और वहाँ निवास किया।
श्लोक 17 (3.179.17)
वराहनानामृगपक्षिजुष्टं । महावनं चैत्ररथप्रकाशम् । शिवेन यात्वा मृगयाप्रधानाः । संवत्सरं तत्रवने विजह्रुः ॥
varāhanānāmṛgapakṣijuṣṭaṃ | mahāvanaṃ caitrarathaprakāśam | śivena yātvā mṛgayāpradhānāḥ | saṃvatsaraṃ tatravane vijahruḥ
सूअरों और नाना प्रकार के मृगों तथा पक्षियों से भरे, चैत्ररथ वन के समान उस विशाल वन में कुशलपूर्वक पहुँचकर, शिकार को ही प्रधान मानते हुए उन्होंने एक वर्ष तक वहाँ विहार किया।
श्लोक 18 (3.179.18)
तत्राससादातिबलं भुजङ्गं । क्षुधार्दितं मृत्युमिवोग्ररूपम् । वृकोदरः पर्वतकन्दरायां । विषादमोहव्यथितान्तरात्मा ॥
tatrāsasādātibalaṃ bhujaṅgaṃ | kṣudhārditaṃ mṛtyumivograrūpam | vṛkodaraḥ parvatakandarāyāṃ | viṣādamohavyathitāntarātmā
वहीं एक पर्वत-कन्दरा में वृकोदर का सामना एक अत्यन्त बलवान, भूख से पीड़ित, मृत्यु के समान भयंकर रूप वाले सर्प से हुआ, और उनका अन्तःकरण विषाद और मोह से व्याकुल हो उठा।
श्लोक 19 (3.179.19)
द्वीपोऽभवद्यत्र वृकोदरस्य । युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः । अमोक्षयद्यस्तमनन्ततेजा । ग्राहेण संवेष्टितसर्वगात्रम् ॥
dvīpo'bhavadyatra vṛkodarasya | yudhiṣṭhiro dharmabhṛtāṃ variṣṭhaḥ | amokṣayadyastamanantatejā | grāheṇa saṃveṣṭitasarvagātram
वहाँ धर्मधारियों में श्रेष्ठ, अनन्त तेजस्वी युधिष्ठिर वृकोदर के लिए द्वीप के समान आश्रय बने; उन्होंने सर्प की पकड़ में पूरे शरीर से जकड़े भीम को छुड़ाया।
श्लोक 20 (3.179.20)
ते द्वादशं वर्षमथोपयान्तं । वने विहर्तुं कुरवः प्रतीताः । तस्माद्वनाच्चैत्ररथप्रकाशा- । च्छ्रिया ज्वलन्तस्तपसा च युक्ताः ॥
te dvādaśaṃ varṣamathopayāntaṃ | vane vihartuṃ kuravaḥ pratītāḥ | tasmādvanāccaitrarathaprakāśā- | cchriyā jvalantastapasā ca yuktāḥ
फिर आते हुए बारहवें वर्ष को वन में बिताने के लिए, तेज से दीप्त और तप से युक्त कुरुवंशी प्रसन्न मन से चैत्ररथ के समान उस वन से निकल पड़े।
श्लोक 21 (3.179.21)
ततश्च यात्वा मरुधन्वपार्श्वं । सदा धनुर्वेदरतिप्रधानाः । सरस्वतीमेत्य निवासकामाः । सरस्ततो द्वैतवनं प्रतीयुः ॥
tataśca yātvā marudhanvapārśvaṃ | sadā dhanurvedaratipradhānāḥ | sarasvatīmetya nivāsakāmāḥ | sarastato dvaitavanaṃ pratīyuḥ
सदा धनुर्वेद में ही विशेष रुचि रखने वाले वे मरुभूमि के किनारे-किनारे चलकर, निवास की इच्छा से सरस्वती के तट पर आए और वहाँ से द्वैतवन के सरोवर पर पहुँचे।
श्लोक 22 (3.179.22)
समीक्ष्य तान्द्वैतवने निविष्टा- । न्निवासिनस्तत्रततोऽभिजग्मुः । तपोदमाचारसमाधियुक्ता- । स्तृणोदपात्रावरणाश्मकुट्टाः ॥
samīkṣya tāndvaitavane niviṣṭā- | nnivāsinastatratato'bhijagmuḥ | tapodamācārasamādhiyuktā- | stṛṇodapātrāvaraṇāśmakuṭṭāḥ
उन्हें द्वैतवन में बसा देखकर वहाँ के निवासी उनके पास आए — वे तप, इन्द्रियनिग्रह, सदाचार और समाधि से युक्त थे, अतिथियों का तृण के आसन और जलपात्र से सत्कार करते थे, और पत्थर से कूटकर अन्न खाते थे।
श्लोक 23 (3.179.23)
प्लक्षाक्षरौहीतकवेतसाश्च । तथा बदर्यः खदिराः शिरीषाः । बिल्वेङ्गुदाः पीलुशमीकरीराः । सरस्वतीतीररुहा बभूवुः ॥
plakṣākṣarauhītakavetasāśca | tathā badaryaḥ khadirāḥ śirīṣāḥ | bilveṅgudāḥ pīluśamīkarīrāḥ | sarasvatītīraruhā babhūvuḥ
सरस्वती के तट पर प्लक्ष, अक्ष, रोहीतक और बेंत, बेर, खैर और शिरीष, बेल, इंगुदी, पीलु, शमी और करील के वृक्ष शोभा पा रहे थे।
श्लोक 24 (3.179.24)
तां यक्षगन्धर्वमहर्षिकान्ता- । मावासभूतामिव देवतानाम् । सरस्वतीं प्रीतियुताश्चरन्तः । सुखं विजह्रुर्नरदेवपुत्राः ॥
tāṃ yakṣagandharvamaharṣikāntā- | māvāsabhūtāmiva devatānām | sarasvatīṃ prītiyutāścarantaḥ | sukhaṃ vijahrurnaradevaputrāḥ
यक्षों, गन्धर्वों और महर्षियों की प्रिय, देवताओं के निवास-स्थान-सी उस सरस्वती के तट पर प्रसन्न मन से विचरते हुए उन राजपुत्रों ने सुखपूर्वक विहार किया।