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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 180

अजगर द्वारा भीम का पकड़ा जाना

जनमेजय पूछते हैं कि दस हजार हाथियों के बल वाले और स्वयं कुबेर को ललकारने वाले भीम को एक अजगर से भय कैसे हुआ। वैशम्पायन बताते हैं कि वृषपर्वा के आश्रम के पास हिमालय के वनों में घूमते हुए भीम हिरणों, सूअरों और भैंसों का शिकार करते हैं, वृक्ष उखाड़ते हैं और ऐसी गर्जना करते हैं कि सिंह और हाथी अपनी गुफाएँ छोड़ भागते हैं। एक पर्वत-कन्दरा में उनका सामना एक विशाल अजगर से होता है, जो उन्हें दोनों भुजाओं से पकड़ लेता है; उस सर्प को मिले वरदान के कारण भीम की चेतना और बल जाता रहता है और वे छूट नहीं पाते।

अध्याय 179अध्याय-सूचीअध्याय 181

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (3.180.1)

कथं नागायुतप्राणो भीमो भीमपराक्रमः । भयमाहारयत्तीव्रं तस्मादजगरान्मुने ॥

kathaṃ nāgāyutaprāṇo bhīmo bhīmaparākramaḥ | bhayamāhārayattīvraṃ tasmādajagarānmune

हे मुनि, दस हजार हाथियों के बल वाले भयंकर पराक्रमी भीम को उस अजगर से ऐसा तीव्र भय कैसे हुआ?

श्लोक 2 (3.180.2)

पौलस्त्यं धनदं युद्धे य आह्वयति दर्पितः । नलिन्यां कदनं कृत्वा निहन्ता यक्षरक्षसाम् ॥

paulastyaṃ dhanadaṃ yuddhe ya āhvayati darpitaḥ | nalinyāṃ kadanaṃ kṛtvā nihantā yakṣarakṣasām

जिन्होंने गर्व में भरकर पुलस्त्यवंशी धनद कुबेर को युद्ध के लिए ललकारा, और कमल-सरोवर पर संहार मचाकर यक्षों और राक्षसों को मार डाला—

श्लोक 3 (3.180.3)

तं शंससि भयाविष्टमापन्नमरिसूदनम् । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ॥

taṃ śaṃsasi bhayāviṣṭamāpannamarisūdanam | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ paraṃ kautūhalaṃ hi me

उन्हीं शत्रुसंहारक को आप भय से ग्रस्त और संकट में पड़ा बता रहे हैं। यह मैं सुनना चाहता हूँ, क्योंकि मुझे बड़ा कौतूहल है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (3.180.4)

बह्वाश्चर्ये वने तेषां वसतामुग्रधन्विनाम् । प्राप्तानामाश्रमं राजन्राजर्षेर्वृषपर्वणः ॥

bahvāścarye vane teṣāṃ vasatāmugradhanvinām | prāptānāmāśramaṃ rājanrājarṣervṛṣaparvaṇaḥ

हे राजन्, जब वे उग्र धनुर्धर राजर्षि वृषपर्वा के आश्रम में पहुँचकर अनेक आश्चर्यों से भरे उस वन में रह रहे थे,

श्लोक 5 (3.180.5)

यदृच्छया धनुष्पाणिर्बद्धखड्गो वृकोदरः । ददर्श तद्वनं रम्यं देवगन्धर्वसेवितम् ॥

yadṛcchayā dhanuṣpāṇirbaddhakhaḍgo vṛkodaraḥ | dadarśa tadvanaṃ ramyaṃ devagandharvasevitam

तब हाथ में धनुष लिए और कमर में खड्ग बाँधे वृकोदर ने स्वेच्छा से घूमते हुए देवताओं और गन्धर्वों से सेवित वह रमणीय वन देखा।

श्लोक 6 (3.180.6)

स ददर्श शुभान्देशान्गिरेर्हिमवतस्तदा । देवर्षिसिद्धचरितानप्सरोगणसेवितान् ॥

sa dadarśa śubhāndeśāngirerhimavatastadā | devarṣisiddhacaritānapsarogaṇasevitān

उन्होंने तब हिमालय पर्वत के वे सुन्दर प्रदेश देखे, जहाँ देवर्षि और सिद्ध विचरते थे और अप्सराओं के समूह रहते थे,

श्लोक 7 (3.180.7)

चकोरैरुपचक्रैश्च पक्षिभिर्जीवजीवकैः । कोकिलैर्भृङ्गराजैश्च तत्र तत्र निनादितान् ॥

cakorairupacakraiśca pakṣibhirjīvajīvakaiḥ | kokilairbhṛṅgarājaiśca tatra tatra nināditān

जो जहाँ-तहाँ चकोर, उपचक्र, जीवजीवक, कोयल और भृंगराज पक्षियों के कलरव से गूँज रहे थे,

श्लोक 8 (3.180.8)

नित्यपुष्पफलैर्वृक्षैर्हिमसंस्पर्शकोमलैः । उपेतान्बहुलच्छायैर्मनोनयननन्दनैः ॥

nityapuṣpaphalairvṛkṣairhimasaṃsparśakomalaiḥ | upetānbahulacchāyairmanonayananandanaiḥ

और जो सदा फूलों-फलों से लदे, हिम के स्पर्श से कोमल, घनी छाया वाले तथा मन और नेत्रों को आनन्द देने वाले वृक्षों से भरे थे।

श्लोक 9 (3.180.9)

स संपश्यन्गिरिनदीर्वैडूर्यमणिसंनिभैः । सलिलैर्हिमसंकाशैर्हंसकारण्डवायुतैः ॥

sa saṃpaśyangirinadīrvaiḍūryamaṇisaṃnibhaiḥ | salilairhimasaṃkāśairhaṃsakāraṇḍavāyutaiḥ

उन्होंने पर्वतीय नदियों को देखा, जिनका जल वैदूर्य मणि के समान निर्मल और हिम के समान शीतल था, और जिनमें हंस और कारण्डव पक्षी भरे थे,

श्लोक 10 (3.180.10)

वनानि देवदारूणां मेघानामिव वागुराः । हरिचन्दनमिश्राणि तुङ्गकालीयकान्यपि ॥

vanāni devadārūṇāṃ meghānāmiva vāgurāḥ | haricandanamiśrāṇi tuṅgakālīyakānyapi

और देवदार के वन देखे, जो मेघों को फँसाने वाले जाल जैसे लगते थे, और जिनमें हरिचन्दन, तुंग और कालीयक के वृक्ष मिले हुए थे।

श्लोक 11 (3.180.11)

मृगयां परिधावन्स समेषु मरुधन्वसु । विध्यन्मृगाञ्शरैः शुद्धैश्चचार स महाबलः ॥

mṛgayāṃ paridhāvansa sameṣu marudhanvasu | vidhyanmṛgāñśaraiḥ śuddhaiścacāra sa mahābalaḥ

शिकार के लिए वे पर्वत के समतल निर्जल प्रदेशों में दौड़ते फिरे, और वे महाबली निर्मल बाणों से हिरणों को बेधते हुए विचरते रहे।

श्लोक 12 (3.180.12)

भीमसेनस्तु विख्यातो महान्तं दंष्ट्रिणं बलात् । निघ्नन्नागशतप्राणो वने तस्मिन्महाबलः ॥

bhīmasenastu vikhyāto mahāntaṃ daṃṣṭriṇaṃ balāt | nighnannāgaśataprāṇo vane tasminmahābalaḥ

सौ हाथियों के बल वाले वे विख्यात महाबली भीमसेन उस वन में बड़े-बड़े दाँतों वाले पशुओं को बलपूर्वक मारते रहे;

श्लोक 13 (3.180.13)

मृगाणां सवराहाणां महिषाणां महाभुजः । विनिघ्नंस्तत्रतत्रैव भीमो भीमपराक्रमः ॥

mṛgāṇāṃ savarāhāṇāṃ mahiṣāṇāṃ mahābhujaḥ | vinighnaṃstatratatraiva bhīmo bhīmaparākramaḥ

भयंकर पराक्रमी महाबाहु भीम जहाँ-तहाँ हिरणों, सूअरों और भैंसों को मारते फिरे।

श्लोक 14 (3.180.14)

स मातङ्गशतप्राणो मनुष्यशतवारणः । सिंहशार्दूलविक्रान्तो वने तस्मिन्महाबलः ॥

sa mātaṅgaśataprāṇo manuṣyaśatavāraṇaḥ | siṃhaśārdūlavikrānto vane tasminmahābalaḥ

सौ हाथियों के बल वाले, सौ मनुष्यों को रोक सकने वाले, सिंह और व्याघ्र के समान पराक्रमी वे महाबली उस वन में

श्लोक 15 (3.180.15)

वृक्षानुत्पाटयामास तरसा वै बभञ्ज च । पृथिव्याश्च प्रदेशान्वै नादयंस्तु वनानि च ॥

vṛkṣānutpāṭayāmāsa tarasā vai babhañja ca | pṛthivyāśca pradeśānvai nādayaṃstu vanāni ca

वेग से वृक्षों को उखाड़ते और तोड़ते रहे, और पृथ्वी के प्रदेशों तथा वनों को गुँजाते रहे।

श्लोक 16 (3.180.16)

पर्वताग्राणि वै मृद्नन्नादयानश्च विज्वरः । प्रक्षिपन्पादपांश्चापि नादेनापूरयन्महीम् ॥

parvatāgrāṇi vai mṛdnannādayānaśca vijvaraḥ | prakṣipanpādapāṃścāpi nādenāpūrayanmahīm

पर्वत-शिखरों को रौंदते, निश्चिन्त होकर गरजते और वृक्षों को उछालते हुए उन्होंने अपनी गर्जना से पृथ्वी को भर दिया।

श्लोक 17 (3.180.17)

वेगेन न्यपतद्भीमो निर्भयश्च पुनः पुनः । आस्फोटयन्क्ष्वेडयंश्च तलतालांश्च वादयन् । चिरसंबद्धदर्पस्तु भीमसेनो वने तदा ॥

vegena nyapatadbhīmo nirbhayaśca punaḥ punaḥ | āsphoṭayankṣveḍayaṃśca talatālāṃśca vādayan | cirasaṃbaddhadarpastu bhīmaseno vane tadā

भीम बार-बार निर्भय होकर बड़े वेग से झपटते, भुजाओं पर ताल ठोकते, सिंहनाद करते और हथेलियाँ बजाते रहे — बहुत दिनों से दबे दर्प वाले भीमसेन उस समय वन में ऐसा कर रहे थे।

श्लोक 18 (3.180.18)

गजेन्द्राश्च महासत्वा मृगेन्द्राश्च महाबलाः । भीमसेनस्य नादेन व्यमुञ्चन्त गुहा भयात् ॥

gajendrāśca mahāsatvā mṛgendrāśca mahābalāḥ | bhīmasenasya nādena vyamuñcanta guhā bhayāt

भीमसेन की गर्जना सुनकर बड़े बलवान गजराज और महाबली सिंह भय से अपनी गुफाएँ छोड़ भागे।

श्लोक 19 (3.180.19)

क्वचित्प्रधावंस्तिष्ठंश्च क्वचिच्चोपविशंस्तथा । मृगप्रेप्सुर्महारौद्रे वने चरति निर्भयः ॥

kvacitpradhāvaṃstiṣṭhaṃśca kvaciccopaviśaṃstathā | mṛgaprepsurmahāraudre vane carati nirbhayaḥ

कभी दौड़ते, कभी ठहरते और कभी बैठ जाते हुए, शिकार की चाह में वे उस अत्यन्त भयानक वन में निर्भय विचरते रहे।

श्लोक 20 (3.180.20)

स तत्रमनुजव्याघ्रो वने वनचरोपमः । पद्भ्यामभिसमापेदे भीमसेनो महाबलः ॥

sa tatramanujavyāghro vane vanacaropamaḥ | padbhyāmabhisamāpede bhīmaseno mahābalaḥ

वहाँ वह नरव्याघ्र महाबली भीमसेन वनवासी की भाँति वन में पैदल ही आगे बढ़ता गया।

श्लोक 21 (3.180.21)

स प्रविष्टो महारण्ये नादान्नदति चाद्भुतान् । त्रासयन्सर्वभूतानि महासत्वपराक्रमः ॥

sa praviṣṭo mahāraṇye nādānnadati cādbhutān | trāsayansarvabhūtāni mahāsatvaparākramaḥ

उस महावन में प्रवेश करके महान बल और पराक्रम वाले भीम अद्भुत गर्जनाएँ करने लगे, जिससे सब प्राणी भयभीत हो उठे।

श्लोक 22 (3.180.22)

ततो भीमस्य शब्देन भीताः सर्पा गुहाशयाः । अतिक्रान्तास्तु वेगेन जगामानुसृतः शनैः । ततोऽमरवरप्रख्यो भीमसेनो महाबलः ॥

tato bhīmasya śabdena bhītāḥ sarpā guhāśayāḥ | atikrāntāstu vegena jagāmānusṛtaḥ śanaiḥ | tato'maravaraprakhyo bhīmaseno mahābalaḥ

तब भीम के शब्द से डरकर गुफाओं में रहने वाले सर्प वेग से भाग निकले; और देवश्रेष्ठ के समान तेजस्वी महाबली भीमसेन धीरे-धीरे उनके पीछे चल पड़े।

श्लोक 23 (3.180.23)

स ददर्श महाकायं भुजङ्गं रोमहर्षणम् । गिरिदुर्गे समापन्नं कायेनावृत्य कन्दरम् ॥

sa dadarśa mahākāyaṃ bhujaṅgaṃ romaharṣaṇam | giridurge samāpannaṃ kāyenāvṛtya kandaram

उन्होंने पर्वत के एक दुर्गम स्थान में एक विशालकाय, रोंगटे खड़े कर देने वाला सर्प देखा, जो अपने शरीर से पूरी कन्दरा को घेरे हुए पड़ा था।

श्लोक 24 (3.180.24)

पर्वताभोगवर्ष्माणं भोगैश्चन्द्रार्कमण्डलैः । चित्राङ्गमङ्गजैश्चित्रैर्हरिद्रासदृशच्छविम् ॥

parvatābhogavarṣmāṇaṃ bhogaiścandrārkamaṇḍalaiḥ | citrāṅgamaṅgajaiścitrairharidrāsadṛśacchavim

उसका शरीर पर्वत के विस्तार जितना था, उसकी कुण्डलियों पर चन्द्र और सूर्य के मण्डल-से चिह्न थे, उसका अंग अपने ही रंग-बिरंगे चिह्नों से चित्रित था, और उसकी कान्ति हल्दी के समान थी;

श्लोक 25 (3.180.25)

गुहाकारेण वक्त्रेण चतुर्दंष्ट्रेण राजता । दीप्ताक्षेणातिताम्रेण लिहानं सृक्विणी मुहुः ॥

guhākāreṇa vaktreṇa caturdaṃṣṭreṇa rājatā | dīptākṣeṇātitāmreṇa lihānaṃ sṛkviṇī muhuḥ

गुफा के समान, चार दाढ़ों वाले चमकते मुख और अत्यन्त लाल दहकती आँखों वाला वह सर्प बार-बार अपने होठों के कोने चाट रहा था।

श्लोक 26 (3.180.26)

त्रासनं सर्वभूतानां कालान्तकयमोपमम् । निःश्वासक्ष्वेडनादेन भर्त्सयन्तमिव स्थितम् ॥

trāsanaṃ sarvabhūtānāṃ kālāntakayamopamam | niḥśvāsakṣveḍanādena bhartsayantamiva sthitam

सब प्राणियों को भयभीत करने वाला, काल, अन्तक और यम के समान वह सर्प अपनी फुफकार की गर्जना से मानो धमकाता हुआ पड़ा था।

श्लोक 27 (3.180.27)

स भीमं सहसाऽभ्येत्य पृदाकुः क्षुधितो भृशम् । जग्राहाजगरो ग्राहो भुजयोरुभयोर्बलात् ॥

sa bhīmaṃ sahasā'bhyetya pṛdākuḥ kṣudhito bhṛśam | jagrāhājagaro grāho bhujayorubhayorbalāt

भूख से अत्यन्त व्याकुल उस ग्राही अजगर ने सहसा भीम पर झपटकर उनकी दोनों भुजाओं को बलपूर्वक जकड़ लिया।

श्लोक 28 (3.180.28)

तेन संस्पृष्टगात्रस्य भीमसेनस्य वै तदा । संज्ञा मुमोह सहसा वरदानेन तस्य हि ॥

tena saṃspṛṣṭagātrasya bhīmasenasya vai tadā | saṃjñā mumoha sahasā varadānena tasya hi

उसके शरीर का स्पर्श होते ही, उस सर्प को मिले वरदान के कारण, भीमसेन की चेतना सहसा लुप्त हो गई।

श्लोक 29 (3.180.29)

दशनागसहस्राणि धारयन्ति हि यद्बलम् । तद्बलं भीमसेनस्य भुजयोरसमं परैः ॥

daśanāgasahasrāṇi dhārayanti hi yadbalam | tadbalaṃ bhīmasenasya bhujayorasamaṃ paraiḥ

दस हजार हाथियों में जितना बल होता है, उतना ही बल भीमसेन की भुजाओं में था, जिसकी बराबरी कोई और नहीं कर सकता था।

श्लोक 30 (3.180.30)

स तेजस्वी तथा तेन भुजगेन वशीकृतः । विस्फुरञ्शनकैर्भीमो न शशाक विचेष्टितुम् ॥

sa tejasvī tathā tena bhujagena vaśīkṛtaḥ | visphurañśanakairbhīmo na śaśāka viceṣṭitum

फिर भी उस सर्प के वश में होकर तेजस्वी भीम केवल धीरे-धीरे छटपटा सकते थे, कोई चेष्टा नहीं कर पाते थे।

श्लोक 31 (3.180.31)

नागायुतसमप्राणः सिंहस्कन्धो महाभुजः । गृहीतो व्यजहात्सत्वं वरदानविमोहितः ॥

nāgāyutasamaprāṇaḥ siṃhaskandho mahābhujaḥ | gṛhīto vyajahātsatvaṃ varadānavimohitaḥ

दस हजार हाथियों के समान बल वाले, सिंह जैसे कंधों वाले महाबाहु भीम पकड़े जाने पर वरदान से मोहित होकर अपनी सुध-बुध खो बैठे।

श्लोक 32 (3.180.32)

स हि प्रयत्नमकरोत्तीव्रमात्मविमोक्षणे । न चैनमशकद्वीरः कथंचित्प्रतिबाधितुम् ॥

sa hi prayatnamakarottīvramātmavimokṣaṇe | na cainamaśakadvīraḥ kathaṃcitpratibādhitum

उन्होंने अपने को छुड़ाने का बहुत प्रयत्न किया, पर वह वीर किसी भी प्रकार उस सर्प को परास्त न कर सका।

अध्याय 179अध्याय-सूचीअध्याय 181