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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 181

सर्परूप नहुष और अपशकुन

अजगर की पकड़ में जकड़े भीम उससे पूछते हैं कि वह कौन है। सर्प बताता है कि वह पाण्डवों का पूर्वज राजा नहुष है, जिसे ब्राह्मणों का अपमान करने पर अगस्त्य के शाप ने इन्द्र के सिंहासन से गिरा दिया था, और जब कोई उसके प्रश्नों का उत्तर देगा तभी वह शाप से छूटेगा। भीम अपने लिए नहीं, बल्कि वन में पड़े अपने भाइयों और अपनी माता के लिए विलाप करते हैं। इधर भयानक अपशकुनों से चिन्तित युधिष्ठिर द्रौपदी से जानते हैं कि भीम शिकार के लिए गए हैं; वे अर्जुन और नकुल-सहदेव को द्रौपदी की रक्षा में छोड़कर धौम्य के साथ भीम के पदचिह्नों पर चलते हैं और एक उजाड़ पहाड़ी खड्ड में उन्हें सर्प की पकड़ में निश्चेष्ट पड़ा पाते हैं।

अध्याय 180अध्याय-सूचीअध्याय 182

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.181.1)

स भीमसेनस्तेजस्वी तदा सर्पवशं गतः । चिन्तयामास सर्पस्य वीर्यमत्यद्भुतं महत् ॥

sa bhīmasenastejasvī tadā sarpavaśaṃ gataḥ | cintayāmāsa sarpasya vīryamatyadbhutaṃ mahat

तब सर्प के वश में पड़े तेजस्वी भीमसेन उस सर्प के अत्यन्त अद्भुत और महान पराक्रम के विषय में सोचने लगे।

श्लोक 2 (3.181.2)

उवाच च महासर्पं कामयाब्रूहि पन्नग । कस्त्वं भो भुजगश्रेष्ठ किं मया च करिष्यसि ॥

uvāca ca mahāsarpaṃ kāmayābrūhi pannaga | kastvaṃ bho bhujagaśreṣṭha kiṃ mayā ca kariṣyasi

और उन्होंने उस महासर्प से कहा, "हे पन्नग, अपनी इच्छा से बताओ — हे भुजगश्रेष्ठ, तुम कौन हो, और मेरे साथ क्या करोगे?

भीमसेन उवाच

श्लोक 3 (3.181.3)

पाण्डवो भीमसेनोऽहं धर्मराजादनन्तरः । नागायुतसमप्राणस्त्वया नीतः कथं वशम् ॥

pāṇḍavo bhīmaseno'haṃ dharmarājādanantaraḥ | nāgāyutasamaprāṇastvayā nītaḥ kathaṃ vaśam

मैं पाण्डुपुत्र भीमसेन हूँ, धर्मराज से छोटा। मुझमें दस हजार हाथियों का बल है; तुमने मुझे वश में कैसे कर लिया?

श्लोक 4 (3.181.4)

सिंहाः केसरिणो व्याघ्रा महिषा वारणास्तथा । समागताश्च बहुशो निहताश्च मया युधि ॥

siṃhāḥ kesariṇo vyāghrā mahiṣā vāraṇāstathā | samāgatāśca bahuśo nihatāśca mayā yudhi

अयालदार सिंह, व्याघ्र, भैंसे और हाथी — ये सब अनेक बार मुझसे भिड़े हैं और मैंने इन्हें युद्ध में मार डाला है।

श्लोक 5 (3.181.5)

राक्षसाश्च पिशाचाश्च पन्नगाश्च महाबलाः । भुजवेगमशक्ता मे सोढुं पन्नगसत्तम ॥

rākṣasāśca piśācāśca pannagāśca mahābalāḥ | bhujavegamaśaktā me soḍhuṃ pannagasattama

हे पन्नगश्रेष्ठ, राक्षस, पिशाच और महाबली नाग भी मेरी भुजाओं का वेग सहने में असमर्थ रहे हैं।

श्लोक 6 (3.181.6)

किंनु विद्याबलं किंनु वरदानमथो तव । उद्योगमपि कुर्वाणो वशगोस्मि कृतस्त्वया ॥

kiṃnu vidyābalaṃ kiṃnu varadānamatho tava | udyogamapi kurvāṇo vaśagosmi kṛtastvayā

क्या यह किसी विद्या का बल है, या तुम्हें कोई वरदान मिला है, कि प्रयत्न करते हुए भी मैं तुम्हारे वश में हो गया हूँ?

श्लोक 7 (3.181.7)

असत्यो विक्रमो नॄणामिति मे धीयते मतिः । यथेदं मे त्वया नाग बलं प्रतिहतं महत् ॥

asatyo vikramo nṝṇāmiti me dhīyate matiḥ | yathedaṃ me tvayā nāga balaṃ pratihataṃ mahat

मनुष्यों का पराक्रम मिथ्या है — मेरी बुद्धि अब यही मानती है, क्योंकि हे नाग, तुमने मेरे इस महान बल को व्यर्थ कर दिया है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 8 (3.181.8)

इत्येवंवादिनं वीरं भीममक्लिष्टकारिणम् । भोगेन महता गृह्य समन्तात्पर्यवेष्टयत् ॥

ityevaṃvādinaṃ vīraṃ bhīmamakliṣṭakāriṇam | bhogena mahatā gṛhya samantātparyaveṣṭayat

अनायास कर्म करने वाले वीर भीम के ऐसा कहते-कहते उस सर्प ने उन्हें पकड़कर अपने विशाल शरीर से चारों ओर से लपेट लिया।

श्लोक 9 (3.181.9)

निगृह्यैनं महाबाहुं ततः स भुजगस्तदा । विमुच्यास्य भुजौ पीनाविदं वचनमब्रवीत् ॥

nigṛhyainaṃ mahābāhuṃ tataḥ sa bhujagastadā | vimucyāsya bhujau pīnāvidaṃ vacanamabravīt

उस महाबाहु को जकड़कर उस सर्प ने फिर उनकी दोनों पुष्ट भुजाएँ छोड़ दीं और ये वचन कहे—

सर्प उवाच

श्लोक 10 (3.181.10)

दिष्टस्त्वं क्षुधितस्याद्य देवैर्भक्षो महाभुज । दिष्ट्या कालस्य महतः प्रियाः प्राणा हि देहिनां ॥

diṣṭastvaṃ kṣudhitasyādya devairbhakṣo mahābhuja | diṣṭyā kālasya mahataḥ priyāḥ prāṇā hi dehināṃ

हे महाबाहु, आज देवताओं ने तुम्हें मुझ भूखे का भोजन ठहराया है। बड़े लम्बे समय के बाद यह मेरा सौभाग्य है; क्योंकि देहधारियों को अपने प्राण प्रिय होते हैं।

श्लोक 11 (3.181.11)

यथा त्विदं मया प्राप्तं भुजङ्गत्वमरिंदम । तदवश्यं त्वया मत्तः श्रोतव्यं शृणु यन्मम ॥

yathā tvidaṃ mayā prāptaṃ bhujaṅgatvamariṃdama | tadavaśyaṃ tvayā mattaḥ śrotavyaṃ śṛṇu yanmama

हे शत्रुदमन, मुझे यह सर्पयोनि कैसे मिली, यह तुम्हें मुझसे अवश्य सुनना चाहिए; मेरी कथा सुनो।

श्लोक 12 (3.181.12)

इमामवस्थां संप्राप्तो ह्यहं कोपान्महर्षिणा । शापस्यान्तं परिप्रेप्सुः सर्पस्य कथयामि तत् ॥

imāmavasthāṃ saṃprāpto hyahaṃ kopānmaharṣiṇā | śāpasyāntaṃ pariprepsuḥ sarpasya kathayāmi tat

एक महर्षि के क्रोध से मैं इस दशा को प्राप्त हुआ हूँ। शाप का अन्त चाहते हुए मैं तुम्हें इस सर्प की कथा सुनाता हूँ।

श्लोक 13 (3.181.13)

नहुषो नाम राजर्षिर्व्यक्तं ते श्रोत्रमागतः । तवैव पूर्वः पूर्वेषामायोर्वंशधरः सुतः ॥

nahuṣo nāma rājarṣirvyaktaṃ te śrotramāgataḥ | tavaiva pūrvaḥ pūrveṣāmāyorvaṃśadharaḥ sutaḥ

नहुष नामक राजर्षि का नाम निश्चय ही तुमने सुना होगा — वे तुम्हारे ही पूर्वजों के पूर्वज थे, आयु के पुत्र, जिन्होंने उनका वंश आगे बढ़ाया।

श्लोक 14 (3.181.14)

सोहं शापादगस्त्यस्य ब्राह्मणानवमत्य च । इमामवस्थामापन्नः पश्य दैवमिदं मम ॥

sohaṃ śāpādagastyasya brāhmaṇānavamatya ca | imāmavasthāmāpannaḥ paśya daivamidaṃ mama

वही मैं हूँ। ब्राह्मणों का अपमान करने के कारण अगस्त्य के शाप से मैं इस दशा में पड़ा हूँ। देखो, मेरा यह भाग्य!

श्लोक 15 (3.181.15)

त्वां चेदवध्यमायान्तमतीव प्रियदर्शनम् । अहमद्योपयोक्ष्यामि विधानं पश्य यादृशम् ॥

tvāṃ cedavadhyamāyāntamatīva priyadarśanam | ahamadyopayokṣyāmi vidhānaṃ paśya yādṛśam

तुम अवध्य हो और अत्यन्त प्रियदर्शन हो, फिर भी आज आए हुए तुम्हें मैं खा जाऊँगा। देखो, विधाता का विधान कैसा है!

श्लोक 16 (3.181.16)

न हि मे मुच्यते कश्चित्कथंचित्प्रग्रहं गतः । गजो वा महिषो वाऽपि षष्ठे काले नरोत्तम ॥

na hi me mucyate kaścitkathaṃcitpragrahaṃ gataḥ | gajo vā mahiṣo vā'pi ṣaṣṭhe kāle narottama

हे नरश्रेष्ठ, दिन के छठे भाग में जो भी मेरी पकड़ में आ जाता है — चाहे हाथी हो या भैंसा — वह किसी प्रकार नहीं छूटता।

श्लोक 17 (3.181.17)

नासि केवलसर्पेण तिर्यग्योनिषु वर्तता । गृहीतः कौरवश्रेष्ठ वरदानमिदं मम ॥

nāsi kevalasarpeṇa tiryagyoniṣu vartatā | gṛhītaḥ kauravaśreṣṭha varadānamidaṃ mama

हे कौरवश्रेष्ठ, तुम्हें पशुयोनि में रहने वाले किसी साधारण सर्प ने नहीं पकड़ा है; यह मुझे मिला हुआ वरदान है।

श्लोक 18 (3.181.18)

पतता हि विमानाग्रान्मया शक्रासनाद्द्रुतम् । कुरु शापान्तमित्युक्तो भगवान्मुनिसत्तमः ॥

patatā hi vimānāgrānmayā śakrāsanāddrutam | kuru śāpāntamityukto bhagavānmunisattamaḥ

जब मैं विमान के शिखर से, इन्द्र के आसन से तेजी से नीचे गिर रहा था, तब मैंने उन भगवान् मुनिश्रेष्ठ से कहा, "मेरे शाप का अन्त कीजिए।"

श्लोक 19 (3.181.19)

यस्त्वया वेष्टितो राजन्मोहमेति महाबलः । मोक्षस्ते भविता राजन्कस्माच्चित्कालपर्ययात् ॥

yastvayā veṣṭito rājanmohameti mahābalaḥ | mokṣaste bhavitā rājankasmāccitkālaparyayāt

"हे राजन्, तुम्हारी कुण्डली में लिपटा हुआ कोई भी, चाहे कितना ही बलवान हो, मोह को प्राप्त होगा। हे राजन्, कुछ समय बीतने पर तुम्हारा उद्धार होगा।"

श्लोक 20 (3.181.20)

ततोस्मि पतितो भूमौ न च मामजहात्स्मृतिः । स्मार्तमस्ति पुराणं मे यथैवाधिगतं तथा ॥

tatosmi patito bhūmau na ca māmajahātsmṛtiḥ | smārtamasti purāṇaṃ me yathaivādhigataṃ tathā

तब मैं धरती पर गिर पड़ा, पर मेरी स्मृति ने मेरा साथ नहीं छोड़ा; पुरानी बातें भी मुझे वैसे ही याद हैं जैसे मैंने उन्हें जाना था।

श्लोक 21 (3.181.21)

यस्तु ते व्याहृतान्प्रश्नान्प्रतिब्रूयाद्विभागवित् । स त्वां मोक्षयिता शापादिति मामब्रवीदृषिः ॥

yastu te vyāhṛtānpraśnānpratibrūyādvibhāgavit | sa tvāṃ mokṣayitā śāpāditi māmabravīdṛṣiḥ

"जो आत्मा और अनात्मा का विवेक जानने वाला तुम्हारे पूछे हुए प्रश्नों का उत्तर देगा, वही तुम्हें शाप से मुक्त करेगा" — ऐसा ऋषि ने मुझसे कहा।

श्लोक 22 (3.181.22)

गृहीतस्य त्वया राजन्प्राणिनोपि बलीयसः । सत्वभ्रंशोऽधिकस्यापि सर्वस्याशु भविष्यति ॥

gṛhītasya tvayā rājanprāṇinopi balīyasaḥ | satvabhraṃśo'dhikasyāpi sarvasyāśu bhaviṣyati

"हे राजन्, तुम जिस प्राणी को पकड़ोगे, वह तुमसे बलवान हो या बड़ा, उसका धैर्य और बल शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा।"

श्लोक 23 (3.181.23)

इतिचाप्यहमश्रौषं वचस्तेषां दयावताम् । मयि संजातहार्दानामथ तेऽन्तर्हिता द्विजाः ॥

iticāpyahamaśrauṣaṃ vacasteṣāṃ dayāvatām | mayi saṃjātahārdānāmatha te'ntarhitā dvijāḥ

मुझ पर स्नेह करने वाले उन दयालु ब्राह्मणों से मैंने यह भी सुना; फिर वे ब्राह्मण अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 24 (3.181.24)

सोहं परमदुष्कर्मा वसामि निरयेऽशुचौ । सर्पयोनिमिमां प्राप्यकालाकाङ्क्षी महाद्युते ॥

sohaṃ paramaduṣkarmā vasāmi niraye'śucau | sarpayonimimāṃ prāpyakālākāṅkṣī mahādyute

हे महातेजस्वी, इस प्रकार मैं महापापी इस सर्पयोनि को पाकर इस अपवित्र नरक में रहता हूँ और अपने समय की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (3.181.25)

तमुवाच महाबाहुर्भीमसेनो भुजङ्गमम् । न ते कुप्ये महासर्प नात्मने द्विजसत्तम ॥

tamuvāca mahābāhurbhīmaseno bhujaṅgamam | na te kupye mahāsarpa nātmane dvijasattama

महाबाहु भीमसेन ने उस सर्प से कहा, "हे महासर्प, न मैं तुम पर क्रोध करता हूँ और न अपने ऊपर, हे द्विजश्रेष्ठ।

भीमसेन उवाच

श्लोक 26 (3.181.26)

यस्मादभावी भावी वा मनुष्यः सुखदुःखयोः । आगमे यदि वाऽपाये न तत्र ग्लपयेन्मनः ॥

yasmādabhāvī bhāvī vā manuṣyaḥ sukhaduḥkhayoḥ | āgame yadi vā'pāye na tatra glapayenmanaḥ

क्योंकि मनुष्य सुख और दुःख के सामने कभी असमर्थ होता है और कभी समर्थ; वे आएँ या जाएँ, उनके कारण मन को खिन्न नहीं होने देना चाहिए।

श्लोक 27 (3.181.27)

दैवं पुरुषकारेण को वञ्चयितुमर्हति । दैवमेव परं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम् ॥

daivaṃ puruṣakāreṇa ko vañcayitumarhati | daivameva paraṃ manye pauruṣaṃ tu nirarthakam

पुरुषार्थ से भाग्य को कौन छल सकता है? मैं भाग्य को ही सर्वोपरि मानता हूँ; पुरुषार्थ तो निरर्थक है।

श्लोक 28 (3.181.28)

पश्य दैवोपघाताद्धि भुजवीर्यव्यपाश्रयम् । इमामवस्थां संप्राप्तमनिमित्तमिहाद्य माम् ॥

paśya daivopaghātāddhi bhujavīryavyapāśrayam | imāmavasthāṃ saṃprāptamanimittamihādya mām

देखो, अपनी भुजाओं के बल का भरोसा रखने वाला मैं आज यहाँ अकारण ही भाग्य की चोट से इस दशा को पहुँच गया हूँ।

श्लोक 29 (3.181.29)

किंतु नाद्यानुशोचामि तथाऽऽत्मानं विनाशितम् । तथा तु विपिने न्यस्तान्भ्रातॄन्राज्यपरिच्युतान् ॥

kiṃtu nādyānuśocāmi tathā''tmānaṃ vināśitam | tathā tu vipine nyastānbhrātṝnrājyaparicyutān

परन्तु आज मुझे अपने नष्ट होने का उतना शोक नहीं है, जितना वन में छूटे और राज्य से वंचित अपने भाइयों का है।

श्लोक 30 (3.181.30)

हिमवांश्च सुदुर्गोऽयं यक्षराक्षससंकुलः । मां समुद्वीक्षमाणास्ते प्रयतिष्यन्ति विह्वलाः ॥

himavāṃśca sudurgo'yaṃ yakṣarākṣasasaṃkulaḥ | māṃ samudvīkṣamāṇāste prayatiṣyanti vihvalāḥ

यह हिमालय अत्यन्त दुर्गम है और यक्षों तथा राक्षसों से भरा है; मुझे खोजते हुए वे व्याकुल होकर भटकते फिरेंगे।

श्लोक 31 (3.181.31)

विनष्टमथ मां श्रुत्वा भविष्यन्ति निरुद्यमाः । धर्मशीला मया ते हि बाध्यन्ते राज्यगृद्धिना ॥

vinaṣṭamatha māṃ śrutvā bhaviṣyanti nirudyamāḥ | dharmaśīlā mayā te hi bādhyante rājyagṛddhinā

और मुझे नष्ट हुआ सुनकर वे उत्साहहीन हो जाएँगे; क्योंकि वे तो धर्मशील हैं, राज्य का लोभी मैं ही उन्हें विवश करता रहा हूँ।

श्लोक 32 (3.181.32)

अथवा नार्जुनो धीमान्विषादमुपयास्यति । सर्वास्त्रविदनाधृष्यो देवगन्धर्वराक्षसैः ॥

athavā nārjuno dhīmānviṣādamupayāsyati | sarvāstravidanādhṛṣyo devagandharvarākṣasaiḥ

अथवा बुद्धिमान अर्जुन विषाद में नहीं पड़ेंगे, क्योंकि वे सब अस्त्रों के ज्ञाता हैं और देवता, गन्धर्व तथा राक्षस भी उन्हें पराजित नहीं कर सकते।

श्लोक 33 (3.181.33)

समर्थः स महाबाहुरेकाह्ना सुमहाबलः । देवराजमपि स्थानात्प्रच्यावयितुमञ्जसा ॥

samarthaḥ sa mahābāhurekāhnā sumahābalaḥ | devarājamapi sthānātpracyāvayitumañjasā

वे महाबली महाबाहु तो एक ही दिन में देवराज इन्द्र को भी सहज ही उनके स्थान से हटा सकते हैं,

श्लोक 34 (3.181.34)

किं पुनर्धृतराष्ट्रस्य पुत्रं दुर्द्यूतदेविनम् । विद्विष्टं सर्वलोकस्य दम्भमोहपरायणम् ॥

kiṃ punardhṛtarāṣṭrasya putraṃ durdyūtadevinam | vidviṣṭaṃ sarvalokasya dambhamohaparāyaṇam

तो फिर कपट-द्यूत खेलने वाले, सारे संसार से द्वेष पाने वाले, दम्भ और मोह में डूबे धृतराष्ट्र के पुत्र की तो बात ही क्या?

श्लोक 35 (3.181.35)

मातरं चैव शोचामि कृपणां पुत्रगृद्धिनीम् । याऽस्माकं नित्यमाशास्ते महत्त्वमधिकं परैः ॥

mātaraṃ caiva śocāmi kṛpaṇāṃ putragṛddhinīm | yā'smākaṃ nityamāśāste mahattvamadhikaṃ paraiḥ

मुझे अपनी दीन माता का भी शोक है, जो पुत्रों के लिए लालायित रहती हैं और सदा यही आशा करती हैं कि हम शत्रुओं से बढ़कर महानता पाएँ।

श्लोक 36 (3.181.36)

तस्याः कथं त्वनाथाया मद्विनाशाद्भुजङ्गम । सफलास्ते भविष्यन्ति मयि सर्वे मनोरथाः ॥

tasyāḥ kathaṃ tvanāthāyā madvināśādbhujaṅgama | saphalāste bhaviṣyanti mayi sarve manorathāḥ

हे भुजंगम, मेरे नष्ट हो जाने पर वह अनाथ हो जाएँगी; तब मुझ पर टिकी उनकी सारी आशाएँ कैसे पूरी होंगी?

श्लोक 37 (3.181.37)

नकुलः सहदेवश्च यमौ च गुरुवर्तिनौ । मद्बाहुबलसंगुप्तौ नित्यं पुरुषमानिनौ ॥

nakulaḥ sahadevaśca yamau ca guruvartinau | madbāhubalasaṃguptau nityaṃ puruṣamāninau

बड़ों की आज्ञा में चलने वाले यमज नकुल और सहदेव, जो सदा मेरी भुजाओं के बल से सुरक्षित रहते हैं और अपने पौरुष पर गर्व करते हैं,

श्लोक 38 (3.181.38)

भविष्यतो निरुत्साहौ भ्रष्टवीर्यपराक्रमौ । मद्विनाशात्परिद्यूनाविति मे वर्तते मतिः ॥

bhaviṣyato nirutsāhau bhraṣṭavīryaparākramau | madvināśātparidyūnāviti me vartate matiḥ

मेरे नष्ट होने से शोक में डूबकर उत्साहहीन हो जाएँगे और उनका बल-पराक्रम जाता रहेगा — ऐसा मेरा विचार है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 39 (3.181.39)

एवंविधं बहु तदा विललाप वृकोदरः । भुजङ्गभोगसंरुद्धो नाशकच्च विचेष्टितुम् ॥

evaṃvidhaṃ bahu tadā vilalāpa vṛkodaraḥ | bhujaṅgabhogasaṃruddho nāśakacca viceṣṭitum

इस प्रकार सर्प की कुण्डली में जकड़े हुए वृकोदर बहुत विलाप करते रहे; वे हिल-डुल भी नहीं सकते थे।

श्लोक 40 (3.181.40)

युधिष्ठिरस्तु कौन्तेयो बभूवास्वस्थचेतनः । अनिष्टदर्शनान्घोरानुत्पातान्परिचिन्तयन् ॥

yudhiṣṭhirastu kaunteyo babhūvāsvasthacetanaḥ | aniṣṭadarśanānghorānutpātānparicintayan

इधर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर अनिष्ट की सूचना देने वाले भयानक उत्पातों को देखकर अस्वस्थचित्त हो गए।

श्लोक 41 (3.181.41)

दारुणं ह्यशिवं नादं शिवा दक्षिणतः स्थिता । दीप्तायां दिशि वित्रस्ता रौति तस्याश्रमस्य ह ॥

dāruṇaṃ hyaśivaṃ nādaṃ śivā dakṣiṇataḥ sthitā | dīptāyāṃ diśi vitrastā rauti tasyāśramasya ha

उनके आश्रम के दक्षिण में खड़ी एक सियारिन जलती हुई दिशा की ओर मुँह करके भय से कठोर और अमंगल शब्द में रो रही थी।

श्लोक 42 (3.181.42)

एकपक्षाक्षिचरणा वर्तिका घोरदर्शना । रक्तं वमन्ती ददृशे प्रत्यादित्यमभासुरा ॥

ekapakṣākṣicaraṇā vartikā ghoradarśanā | raktaṃ vamantī dadṛśe pratyādityamabhāsurā

एक पंख, एक आँख और एक पैर वाली, भयानक दिखने वाली, निस्तेज वर्तिका चिड़िया सूर्य की ओर मुँह किए रक्त उगलती दिखाई दी।

श्लोक 43 (3.181.43)

प्रववौ चानिलो रूक्षश्चण्डः शर्करकर्षणः । अपसव्यानि सर्वाणि मृगपक्षिरुतानि च ॥

pravavau cānilo rūkṣaścaṇḍaḥ śarkarakarṣaṇaḥ | apasavyāni sarvāṇi mṛgapakṣirutāni ca

कंकड़ घसीटती हुई रूखी और प्रचण्ड वायु बहने लगी, और पशु-पक्षियों के सब शब्द बाईं ओर सुनाई देने लगे।

श्लोक 44 (3.181.44)

पृष्ठतो वायसः कृष्णो याहियाहीति वाशति । मुहुर्मुहुः स्फुरति च दक्षिणोऽस्य भुजस्तथा ॥

pṛṣṭhato vāyasaḥ kṛṣṇo yāhiyāhīti vāśati | muhurmuhuḥ sphurati ca dakṣiṇo'sya bhujastathā

उनके पीछे एक काला कौआ "जाओ, जाओ" की-सी काँव-काँव कर रहा था, और उनकी दाहिनी भुजा बार-बार फड़क रही थी।

श्लोक 45 (3.181.45)

हृदयं चरणश्चापि वामोऽस्य परितप्यति । सव्यस्याक्ष्णो विकारश्चाप्यनिष्टः समपद्यत ॥

hṛdayaṃ caraṇaścāpi vāmo'sya paritapyati | savyasyākṣṇo vikāraścāpyaniṣṭaḥ samapadyata

उनका हृदय और बायाँ पैर भी संतप्त होने लगे, और बाईं आँख में भी अशुभ फड़कन होने लगी।

श्लोक 46 (3.181.46)

धर्मराजोपि मेधावी शङ्कमानो महद्भयम् । द्रौपदीं परिपप्रच्छ क्व भीम इति भारत ॥

dharmarājopi medhāvī śaṅkamāno mahadbhayam | draupadīṃ paripapraccha kva bhīma iti bhārata

हे भारत, तब बुद्धिमान धर्मराज ने भी किसी बड़े संकट की आशंका से द्रौपदी से पूछा, "भीम कहाँ है?"

श्लोक 47 (3.181.47)

शशंस तस्मै पाञ्चाली चिरयातं वृकोदरम् । स प्रतस्थे महाबाहुर्धौम्येन सहितो नृपः ॥

śaśaṃsa tasmai pāñcālī cirayātaṃ vṛkodaram | sa pratasthe mahābāhurdhaumyena sahito nṛpaḥ

पांचाली ने उन्हें बताया कि वृकोदर को गए बहुत देर हो गई है। तब वे महाबाहु राजा धौम्य के साथ चल पड़े,

श्लोक 48 (3.181.48)

द्रौपद्या रक्षणं कार्यमित्युवाच धनंजयम् । नकुलं सहदेवं च व्यादिदेश द्विजान्प्रति ॥

draupadyā rakṣaṇaṃ kāryamityuvāca dhanaṃjayam | nakulaṃ sahadevaṃ ca vyādideśa dvijānprati

और धनंजय से कहा, "द्रौपदी की रक्षा करनी है," तथा नकुल और सहदेव को ब्राह्मणों की देखभाल का आदेश दिया।

श्लोक 49 (3.181.49)

स तस्य पदमुन्नीय तस्मादेवाश्रमात्प्रभुः । मृगयामास कौन्तेयो भीमसेनं महावने ॥

sa tasya padamunnīya tasmādevāśramātprabhuḥ | mṛgayāmāsa kaunteyo bhīmasenaṃ mahāvane

उसी आश्रम से उनके पदचिह्नों का पता लगाते हुए प्रभु कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर उस महावन में भीमसेन को खोजने लगे।

श्लोक 50 (3.181.50)

स प्राचीं दिशमास्थाय महतो गजयूथपान् । ददर्श पृथिवीं चिह्नैर्भीमस्य परिचिह्निताम् ॥

sa prācīṃ diśamāsthāya mahato gajayūthapān | dadarśa pṛthivīṃ cihnairbhīmasya paricihnitām

पूर्व दिशा की ओर जाकर उन्होंने हाथियों के झुंडों के बड़े-बड़े सरदारों को गिरा पड़ा देखा, और पृथ्वी को भीम के चिह्नों से अंकित पाया।

श्लोक 51 (3.181.51)

ततो मृगसहस्राणि मृगेन्द्राणां शतानि च । पतितानि वने दृष्ट्वा मार्गं तस्याविशन्नृपः ॥

tato mṛgasahasrāṇi mṛgendrāṇāṃ śatāni ca | patitāni vane dṛṣṭvā mārgaṃ tasyāviśannṛpaḥ

फिर वन में हजारों हिरणों और सैकड़ों सिंहों को गिरा पड़ा देखकर राजा उनके मार्ग पर चल पड़े।

श्लोक 52 (3.181.52)

धावतस्तस्य वीरस्य मृगार्थं वातरंहसः । ऊरुवातविनिर्भग्नान्द्रुमान्व्यावर्जितान्पथि ॥

dhāvatastasya vīrasya mṛgārthaṃ vātaraṃhasaḥ | ūruvātavinirbhagnāndrumānvyāvarjitānpathi

वायु के समान वेग वाले उस वीर के शिकार के पीछे दौड़ने से उसकी जाँघों के झोंके से टूटे और झुके हुए वृक्ष मार्ग में पड़े थे।

श्लोक 53 (3.181.53)

स गत्वा तैस्तदा चिह्नैर्ददर्श गिरिगह्वरे । रूक्षमारुतभूयिष्ठे निष्पत्रद्रुमसंकुले ॥

sa gatvā taistadā cihnairdadarśa girigahvare | rūkṣamārutabhūyiṣṭhe niṣpatradrumasaṃkule

उन चिह्नों के सहारे जाते हुए उन्होंने एक पहाड़ी खड्ड में, जहाँ रूखी हवाएँ बहुत चलती थीं और पत्रहीन वृक्ष भरे थे,

श्लोक 54 (3.181.54)

ईरिणे निर्जले देशे कण्टकिद्रुमसंकुले । अश्मस्थाणुक्षुपाकीर्णे सुदुर्गे विषमोत्कटे । गृहीतं भुजगेन्द्रेण निश्चेष्टमनुजं तदा ॥

īriṇe nirjale deśe kaṇṭakidrumasaṃkule | aśmasthāṇukṣupākīrṇe sudurge viṣamotkaṭe | gṛhītaṃ bhujagendreṇa niśceṣṭamanujaṃ tadā

काँटेदार वृक्षों से भरे, पत्थरों, ठूँठों और झाड़ियों से पटे, अत्यन्त दुर्गम, ऊबड़-खाबड़ और भयानक उस ऊसर, निर्जल प्रदेश में अपने छोटे भाई को सर्पराज की पकड़ में निश्चेष्ट पड़ा देखा।

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