Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 182

अजगर नहुष के प्रश्न

युधिष्ठिर भीम को एक विशाल अजगर की कुंडलियों में जकड़ा पाते हैं। अजगर बताता है कि वह युधिष्ठिर का पूर्वज राजा नहुष है, जिसे अहंकार के कारण अगस्त्य के शाप से यह दशा मिली। वह भीम को तभी छोड़ने को तैयार होता है जब युधिष्ठिर उसके प्रश्नों का उत्तर दें — ब्राह्मण कौन है और जानने योग्य क्या है। युधिष्ठिर उत्तर देते हैं कि ब्राह्मण जन्म से नहीं, बल्कि सत्य, दान, क्षमा और सदाचार से पहचाना जाता है, क्योंकि वर्णों के मेल से जाति अनिश्चित हो गई है; और जानने योग्य परब्रह्म है, जो सुख और दुःख दोनों से परे है। सन्तुष्ट होकर सर्प कहता है कि अब वह भीम को क्यों खाए।

अध्याय 181अध्याय-सूचीअध्याय 183

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.182.1)

युधिष्ठिरस्तमासाद्य सर्पभोगेन वेष्टितम् । दयितं भ्रातरं धीमानिदं वचनमब्रवीत् ॥

yudhiṣṭhirastamāsādya sarpabhogena veṣṭitam | dayitaṃ bhrātaraṃ dhīmānidaṃ vacanamabravīt

सर्प की कुंडलियों में लिपटे अपने प्रिय भाई के पास पहुँचकर बुद्धिमान युधिष्ठिर ने यह वचन कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (3.182.2)

कुन्तीमातः कथमिमामापदं त्वमवाप्तवान् । कश्चायं पर्वताभोगप्रतिमः पन्नगोत्तमः ॥

kuntīmātaḥ kathamimāmāpadaṃ tvamavāptavān | kaścāyaṃ parvatābhogapratimaḥ pannagottamaḥ

"हे कुन्तीनन्दन, तुम इस विपत्ति में कैसे पड़ गए? और पर्वत के विस्तार जैसा यह महान नाग कौन है?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (3.182.3)

स धर्मराजमालक्ष्य भ्राता भ्रातरमग्रजम् । कथयामास तत्सर्वं ग्रहणादिविचेष्टितम् ॥

sa dharmarājamālakṣya bhrātā bhrātaramagrajam | kathayāmāsa tatsarvaṃ grahaṇādiviceṣṭitam

धर्मराज, अपने बड़े भाई को देखकर भीम ने पकड़े जाने से लेकर जो कुछ हुआ था, वह सब उन्हें कह सुनाया।

भीम उवाच

श्लोक 4 (3.182.4)

अयमार्य महासत्वो भक्षार्थं मां गृहीतवान् । नहुषो नाम राजर्षिः प्राणवानिव संस्थितः ॥

ayamārya mahāsatvo bhakṣārthaṃ māṃ gṛhītavān | nahuṣo nāma rājarṣiḥ prāṇavāniva saṃsthitaḥ

"हे आर्य, इस महाबली प्राणी ने मुझे खाने के लिए पकड़ लिया है। यह नहुष नाम के राजर्षि हैं, जो यहाँ वायु पीकर जीने वाले सर्प की भाँति पड़े हैं।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 5 (3.182.5)

मुच्यतामयमायुष्मन्भ्राता मेऽमितविक्रमः । वयमाहारमन्यं ते दास्यामः क्षुन्निवारणम् ॥

mucyatāmayamāyuṣmanbhrātā me'mitavikramaḥ | vayamāhāramanyaṃ te dāsyāmaḥ kṣunnivāraṇam

"हे आयुष्मन्, मेरे इस अपार पराक्रमी भाई को छोड़ दो। तुम्हारी भूख मिटाने के लिए हम तुम्हें दूसरा भोजन देंगे।"

सर्प उवाच

श्लोक 6 (3.182.6)

आहारो राजपुत्रोऽयं मया प्राप्तो मुखागतः । गम्यतां नेह स्थातव्यं श्वो भवानपि मे भवेत् ॥

āhāro rājaputro'yaṃ mayā prāpto mukhāgataḥ | gamyatāṃ neha sthātavyaṃ śvo bhavānapi me bhavet

"यह राजकुमार मेरा आहार है, जो स्वयं मेरे मुँह तक आ पहुँचा और मैंने इसे पा लिया। तुम चले जाओ, यहाँ मत ठहरो, नहीं तो कल तुम भी मेरे हो जाओगे।"

श्लोक 7 (3.182.7)

व्रतमेतन्महाबाहो विषयं मम यो व्रजेत् । स मे भक्षो भवेत्तात त्वं चापि विषये मम ॥

vratametanmahābāho viṣayaṃ mama yo vrajet | sa me bhakṣo bhavettāta tvaṃ cāpi viṣaye mama

"हे महाबाहु, मेरा यह नियम है कि जो कोई मेरे क्षेत्र में आ जाए, वह मेरा भक्ष्य बनता है। तात, तुम भी मेरे क्षेत्र में ही हो।"

श्लोक 8 (3.182.8)

चिरेणाद्य मयाऽऽहारः प्राप्तोऽयमनुजस्तव । नाहमेनं विमोक्ष्यामि न चान्यमभिकाङ्क्षये ॥

cireṇādya mayā''hāraḥ prāpto'yamanujastava | nāhamenaṃ vimokṣyāmi na cānyamabhikāṅkṣaye

"बहुत समय के बाद आज मुझे यह आहार — तुम्हारा छोटा भाई — मिला है। मैं इसे नहीं छोड़ूँगा, और मुझे कोई दूसरा भोजन नहीं चाहिए।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 9 (3.182.9)

देवो वा यदि वा दैत्य उरगो वा भवान्यदि । सत्यं सर्प वचो ब्रूहि पृच्छति त्वां युधिष्ठिरः ॥

devo vā yadi vā daitya urago vā bhavānyadi | satyaṃ sarpa vaco brūhi pṛcchati tvāṃ yudhiṣṭhiraḥ

"तुम देवता हो, दैत्य हो या सर्प — हे सर्प, सच-सच बताओ; यह युधिष्ठिर तुमसे पूछ रहा है।

श्लोक 10 (3.182.10)

किमर्थं च त्वया ग्रस्तो भीमसेनो भुजंगम । किमाहृत्यविदित्वा वा प्रीतिस्ते स्याद्भुजंगम । किमाहारं प्रयच्छामि कथं मुञ्चेद्भवानिमम् ॥

kimarthaṃ ca tvayā grasto bhīmaseno bhujaṃgama | kimāhṛtyaviditvā vā prītiste syādbhujaṃgama | kimāhāraṃ prayacchāmi kathaṃ muñcedbhavānimam

हे भुजंग, तुमने भीमसेन को क्यों पकड़ा है? क्या लाकर देने से या क्या जानकर तुम प्रसन्न होगे? मैं तुम्हें कौन-सा आहार दूँ? किस प्रकार तुम इसे छोड़ोगे?"

सर्प उवाच

श्लोक 11 (3.182.11)

नहुषो नाम राजाऽहमासं पूर्वस्तवानघ । प्रथितः पञ्चमः सोमादायोः पुत्रो नराधिप ॥

nahuṣo nāma rājā'hamāsaṃ pūrvastavānagha | prathitaḥ pañcamaḥ somādāyoḥ putro narādhipa

"हे निष्पाप नरेश, मैं तुम्हारा पूर्वज नहुष नाम का राजा था — आयु का प्रसिद्ध पुत्र, सोम से पाँचवीं पीढ़ी में उत्पन्न।

श्लोक 12 (3.182.12)

क्रतुभिस्तपसा चैवस्वाध्यायेन दमेन च । त्रैलोक्यैश्वर्यमव्यग्रं प्राप्तोऽहंविक्रमेण च ॥

kratubhistapasā caivasvādhyāyena damena ca | trailokyaiśvaryamavyagraṃ prāpto'haṃvikrameṇa ca

यज्ञों, तप, स्वाध्याय और इन्द्रिय-संयम से तथा अपने पराक्रम से मैंने तीनों लोकों का निर्विघ्न ऐश्वर्य प्राप्त किया।

श्लोक 13 (3.182.13)

तदैश्वर्यं समासाद्य दर्पो मामगमत्तदा । सहस्रं हि द्विजातीनामुवाह शिविकां मम ॥

tadaiśvaryaṃ samāsādya darpo māmagamattadā | sahasraṃ hi dvijātīnāmuvāha śivikāṃ mama

उस ऐश्वर्य को पाकर मुझमें अहंकार आ गया, और एक सहस्र ब्राह्मण मेरी पालकी ढोने लगे।

श्लोक 14 (3.182.14)

ऐश्वर्यमदमत्तोऽहमवमत्य ततो द्विजान् । इमामगस्त्येन दशामानीत इतिमे स्मृतिः ॥

aiśvaryamadamatto'hamavamatya tato dvijān | imāmagastyena daśāmānīta itime smṛtiḥ

ऐश्वर्य के मद में चूर होकर मैंने ब्राह्मणों का अपमान किया, और तब अगस्त्य ने मुझे इस दशा में पहुँचा दिया — ऐसा मुझे स्मरण है।

श्लोक 15 (3.182.15)

न तु मामजहात्प्रज्ञा यावदन्वेति पाण्डवः । तस्यैवानुग्रहाद्राजन्नगस्त्यस्य महात्मनः ॥

na tu māmajahātprajñā yāvadanveti pāṇḍavaḥ | tasyaivānugrahādrājannagastyasya mahātmanaḥ

किन्तु हे राजन्, उन्हीं महात्मा अगस्त्य की कृपा से, जब तक कोई पाण्डव यहाँ न आ जाए, तब तक मेरी बुद्धि ने मेरा साथ नहीं छोड़ा है।

श्लोक 16 (3.182.16)

षष्ठे काले मयाऽऽहारः प्राप्तोऽयमनुजस्तव । नाहमेनं विमोक्ष्यामि न चान्यदपि कामये ॥

ṣaṣṭhe kāle mayā''hāraḥ prāpto'yamanujastava | nāhamenaṃ vimokṣyāmi na cānyadapi kāmaye

छठे भोजन-काल में तुम्हारा यह छोटा भाई मुझे आहार के रूप में मिला है। मैं इसे नहीं छोड़ूँगा, और न मुझे कुछ और चाहिए।

श्लोक 17 (3.182.17)

प्रश्नानुच्चारितानद्य व्याहरिष्यसि चेन्मम । तथापश्चाद्विमोक्ष्यामि भ्रातरं ते वृकोदरम् ॥

praśnānuccāritānadya vyāhariṣyasi cenmama | tathāpaścādvimokṣyāmi bhrātaraṃ te vṛkodaram

परन्तु यदि आज तुम मेरे पूछे हुए प्रश्नों का उत्तर दे दोगे, तो उसके बाद मैं तुम्हारे भाई वृकोदर को छोड़ दूँगा।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 18 (3.182.18)

ब्रूहि सर्प यथाकामं प्रतिवक्ष्यामि ते वचः । अपि चेच्छक्नुयां प्रीतिमाहर्तुं ते भुजङ्गम ॥

brūhi sarpa yathākāmaṃ prativakṣyāmi te vacaḥ | api cecchaknuyāṃ prītimāhartuṃ te bhujaṅgama

"हे सर्प, जो चाहो पूछो, मैं तुम्हारी बात का उत्तर दूँगा — यदि मैं तुम्हें सन्तुष्ट कर सकूँ, हे भुजंग।

श्लोक 19 (3.182.19)

वेद्यंच ब्राह्मणेनेह तद्भवान्वेत्ति केवलम् । सर्पराज ततः श्रुत्वा प्रतिवक्ष्यामि ते वचः ॥

vedyaṃca brāhmaṇeneha tadbhavānvetti kevalam | sarparāja tataḥ śrutvā prativakṣyāmi te vacaḥ

ब्राह्मण को जो कुछ जानना चाहिए, वह सब तुम पूरी तरह जानते हो। इसलिए हे सर्पराज, तुम्हारी बात सुनकर मैं उत्तर दूँगा।"

सर्प उवाच

श्लोक 20 (3.182.20)

ब्राह्मणः को भवेद्राजन्वेद्यं किंच युधिष्ठिर । ब्रवीह्यतिमतिं त्वां हि वाक्यैरनुमिनोमि ते ॥

brāhmaṇaḥ ko bhavedrājanvedyaṃ kiṃca yudhiṣṭhira | bravīhyatimatiṃ tvāṃ hi vākyairanuminomi te

"हे राजन् युधिष्ठिर, ब्राह्मण कौन है और जानने योग्य क्या है? बताओ, क्योंकि तुम्हारी बातों से मैं अनुमान करता हूँ कि तुम अत्यन्त बुद्धिमान हो।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 21 (3.182.21)

सत्यं दानं क्षमा शीलमानृशंस्यं तपो घृणा । दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥

satyaṃ dānaṃ kṣamā śīlamānṛśaṃsyaṃ tapo ghṛṇā | dṛśyante yatra nāgendra sa brāhmaṇa iti smṛtaḥ

"हे नागराज, जिसमें सत्य, दान, क्षमा, सुशीलता, अक्रूरता, तप और दया दिखाई दें, वही ब्राह्मण कहा जाता है।

श्लोक 22 (3.182.22)

वेद्यं सर्प परं ब्रह्म निर्दुःखमसुखं च यत् । यत्रगत्वा न शोचन्ति भवतः किं विवक्षितं ॥

vedyaṃ sarpa paraṃ brahma nirduḥkhamasukhaṃ ca yat | yatragatvā na śocanti bhavataḥ kiṃ vivakṣitaṃ

हे सर्प, जानने योग्य वह परब्रह्म है, जो दुःख और सुख दोनों से परे है, और जहाँ पहुँचकर मनुष्य शोक नहीं करते। अब तुम क्या कहना चाहते हो?"

सर्प उवाच

श्लोक 23 (3.182.23)

चातुर्वर्ण्यं प्रमाणं च सत्यं च ब्रह्म चैव हि । शूद्रेष्वपि च सत्यं च दानमक्रोध एव च । आनृशंस्यमहिंसा च घृणा चैव युधिष्ठिर ॥

cāturvarṇyaṃ pramāṇaṃ ca satyaṃ ca brahma caiva hi | śūdreṣvapi ca satyaṃ ca dānamakrodha eva ca | ānṛśaṃsyamahiṃsā ca ghṛṇā caiva yudhiṣṭhira

"हे युधिष्ठिर, चारों वर्णों की व्यवस्था प्रामाणिक है, और सत्य तथा ब्रह्म भी; फिर भी सत्य, दान और अक्रोध शूद्रों में भी पाए जाते हैं, और अक्रूरता, अहिंसा तथा दया भी।

श्लोक 24 (3.182.24)

वेद्यं यच्चात्र निर्दुःखमसुखं च नराधिप । ताभ्यां हीनं पदं चान्यन्न तदस्तीति लक्षये ॥

vedyaṃ yaccātra nirduḥkhamasukhaṃ ca narādhipa | tābhyāṃ hīnaṃ padaṃ cānyanna tadastīti lakṣaye

और हे नरेश, तुमने जिसे जानने योग्य बताया — जो दुःख और सुख दोनों से रहित है — इन दोनों से रहित ऐसा कोई अन्य पद मुझे दिखाई नहीं देता।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 25 (3.182.25)

शूद्रे तु यद्भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते । न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः ॥

śūdre tu yadbhavellakṣma dvije tacca na vidyate | na vai śūdro bhavecchūdro brāhmaṇo na ca brāhmaṇaḥ

"यदि ये लक्षण शूद्र में हों और द्विज में न हों, तो वह शूद्र शूद्र नहीं है और वह ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं।

श्लोक 26 (3.182.26)

यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मणः स्मृतः । तत्रैतन्न भवेत्सर्प तं शूद्रमिति निर्दिशेत् ॥

yatraitallakṣyate sarpa vṛttaṃ sa brāhmaṇaḥ smṛtaḥ | tatraitanna bhavetsarpa taṃ śūdramiti nirdiśet

हे सर्प, जिसमें यह आचरण दिखाई दे, वह ब्राह्मण कहलाता है; और जिसमें यह न हो, उसे शूद्र कहना चाहिए।

श्लोक 27 (3.182.27)

यत्पुनर्भवता प्रोक्तं न वेद्यं विद्यतेति च । ताभ्यां हीनमतोऽन्यत्र पदं नास्तीति चेदपि ॥

yatpunarbhavatā proktaṃ na vedyaṃ vidyateti ca | tābhyāṃ hīnamato'nyatra padaṃ nāstīti cedapi

और तुमने जो कहा कि ऐसा कोई जानने योग्य नहीं है, और उन दोनों से रहित कोई अन्य पद नहीं है —

श्लोक 28 (3.182.28)

एवमेतन्मतं सर्प ताभ्यां हीनं तु विद्यते । यथा शीतोष्णयोर्मध्ये भवेन्नोष्णं न शीतता ॥

evametanmataṃ sarpa tābhyāṃ hīnaṃ tu vidyate | yathā śītoṣṇayormadhye bhavennoṣṇaṃ na śītatā

हे सर्प, यह तुम्हारा मत है; परन्तु उन दोनों से रहित पद भी है, जैसे शीत और उष्ण के बीच ऐसी अवस्था होती है जो न उष्ण है, न शीत।

श्लोक 29 (3.182.29)

एवं वै सुखदुःखाभ्यां हीनमस्ति पदं क्वचित् । एषा मम मतिः सर्प यथा वा मन्यते भवान् ॥

evaṃ vai sukhaduḥkhābhyāṃ hīnamasti padaṃ kvacit | eṣā mama matiḥ sarpa yathā vā manyate bhavān

इसी प्रकार सुख और दुःख दोनों से रहित पद भी कहीं है। हे सर्प, यह मेरा मत है — अथवा तुम क्या मानते हो?"

सर्प उवाच

श्लोक 30 (3.182.30)

यदि ते वृत्ततो राजन्ब्राह्मणः प्रसमीक्षितः । वृथा जातिस्तदायुष्मन्कृतिर्यावन्न विद्यते ॥

yadi te vṛttato rājanbrāhmaṇaḥ prasamīkṣitaḥ | vṛthā jātistadāyuṣmankṛtiryāvanna vidyate

"हे राजन्, यदि तुम आचरण से ही ब्राह्मण की परख करते हो, तो हे आयुष्मन्, जब तक कर्म न हो तब तक जाति व्यर्थ है।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 31 (3.182.31)

जातिरत्रमहासर्प मनुष्यत्वे महामते । संकरात्सर्ववर्णानां दुष्परीक्ष्येति मे मतिः ॥

jātiratramahāsarpa manuṣyatve mahāmate | saṃkarātsarvavarṇānāṃ duṣparīkṣyeti me matiḥ

"हे महामति महासर्प, मनुष्यों में सब वर्णों के आपस में मिल जाने के कारण जाति की परख करना कठिन है — यह मेरा मत है।

श्लोक 32 (3.182.32)

सर्वे सर्वास्वपत्यानि जनयन्ति यदा नराः । वाङ्मैथुनमथो जन्म मरणं च समं नृणाम् ॥

sarve sarvāsvapatyāni janayanti yadā narāḥ | vāṅmaithunamatho janma maraṇaṃ ca samaṃ nṛṇām

क्योंकि सभी पुरुष सभी वर्णों की स्त्रियों से सन्तान उत्पन्न करते हैं; और वाणी, मैथुन, जन्म तथा मृत्यु — ये सब मनुष्यों में समान हैं।

श्लोक 33 (3.182.33)

इदमार्षं प्रमाणं च ये यजामह इत्यपि । तस्माच्छीलं प्रधानेष्टं विदुर्ये तत्त्वदर्शिनः ॥

idamārṣaṃ pramāṇaṃ ca ye yajāmaha ityapi | tasmācchīlaṃ pradhāneṣṭaṃ vidurye tattvadarśinaḥ

इसीलिए ऋषियों का यह प्रमाण-वचन है — "ये यजामहे" (हम जो भी हों, यजन करते हैं); अतः तत्त्वदर्शी जानते हैं कि शील ही प्रधान और अभीष्ट है।

श्लोक 34 (3.182.34)

प्राङ्नाभिवर्धनात्पुंसो जातकर्म विधीयते । तथोपनयनं प्रोक्तं द्विजातीनां यथाक्रमम् । तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते ॥

prāṅnābhivardhanātpuṃso jātakarma vidhīyate | tathopanayanaṃ proktaṃ dvijātīnāṃ yathākramam | tatrāsya mātā sāvitrī pitā tvācārya ucyate

पुरुष का नाल काटे जाने से पहले ही उसका जातकर्म संस्कार किया जाता है; इसी प्रकार द्विजों के लिए क्रम से उपनयन का विधान बताया गया है। उसमें सावित्री उसकी माता और आचार्य उसका पिता कहलाता है।

श्लोक 35 (3.182.35)

वृत्त्या शूद्रसमो ह्येष यावद्वेदेन जायते । तस्मिन्नेवं मतिद्वैधे मनुः स्वायंभुवोऽब्रवीत् ॥

vṛttyā śūdrasamo hyeṣa yāvadvedena jāyate | tasminnevaṃ matidvaidhe manuḥ svāyaṃbhuvo'bravīt

जब तक वह वेद में जन्म नहीं लेता, तब तक आचरण में वह शूद्र के समान ही है। इस प्रकार मत-भेद होने पर स्वायम्भुव मनु ने कहा है —

श्लोक 36 (3.182.36)

कृतकृत्याः सर्ववर्णा यदि वृत्तं न पश्यति । संकरस्त्वत्र नागेन्द्र बलवान्प्रसमीक्षितः ॥

kṛtakṛtyāḥ sarvavarṇā yadi vṛttaṃ na paśyati | saṃkarastvatra nāgendra balavānprasamīkṣitaḥ

"सब वर्णों के संस्कार भले हो चुके हों, यदि उनमें सदाचार न दिखाई दे, तो हे नागराज, वहाँ वर्णसंकर ही प्रबल माना गया है।"

श्लोक 37 (3.182.37)

यत्रेदानीं महासर्प संस्कृतं वृत्तमिष्यते । तं ब्राह्मणमहं पूर्वमुक्तवान्भुजगोत्तम ॥

yatredānīṃ mahāsarpa saṃskṛtaṃ vṛttamiṣyate | taṃ brāhmaṇamahaṃ pūrvamuktavānbhujagottama

अतः हे महासर्प, जिसमें अब संस्कारयुक्त सदाचार पाया जाए, उसी को मैंने पहले ब्राह्मण कहा था, हे भुजगोत्तम।"

सर्प उवाच

श्लोक 38 (3.182.38)

श्रुतं विदितवेद्यस्य तव वाक्यं युधिष्ठिर । भक्षयेयमहं कस्माद्भ्रातरं ते वृकोदरम् ॥

śrutaṃ viditavedyasya tava vākyaṃ yudhiṣṭhira | bhakṣayeyamahaṃ kasmādbhrātaraṃ te vṛkodaram

"हे युधिष्ठिर, तुम जानने योग्य सब जानते हो; मैंने तुम्हारी बात सुन ली। अब मैं तुम्हारे भाई वृकोदर को क्यों खाऊँ?"

अध्याय 181अध्याय-सूचीअध्याय 183