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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 183

नहुष की शापमुक्ति

युधिष्ठिर और सर्प आगे स्वर्ग के मार्ग पर चर्चा करते हैं — दान, सत्य, प्रिय वचन और अहिंसा, जिनका छोटापन-बड़ापन परिस्थिति पर निर्भर है — फिर प्राणियों की तीन गतियों, मन के द्वारा आत्मा के एक-एक करके विषय-ग्रहण, और मन तथा बुद्धि के भेद पर। इसके बाद नहुष बताते हैं कि समृद्धि ने उन्हें कैसे मोहित किया: ब्रह्मर्षि जब उनकी पालकी ढो रहे थे, तब उनका पैर अगस्त्य को छू गया और उन्हें सर्प बनकर गिरने का शाप मिला, साथ ही यह वचन भी कि युधिष्ठिर उन्हें मुक्त करेंगे। भीम को छोड़कर वे दिव्य रूप धारण कर स्वर्ग लौट जाते हैं; युधिष्ठिर आश्रम लौटते हैं, जहाँ ब्राह्मण भीम के दुस्साहस की निन्दा करते हैं।

अध्याय 182अध्याय-सूचीअध्याय 184

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (3.183.1)

भवानेतादृशो लोके वेदवेदाङ्गपारगः । ब्रूहि किं कुर्वतः कर्म भवेद्गतिरनुत्तमा ॥

bhavānetādṛśo loke vedavedāṅgapāragaḥ | brūhi kiṃ kurvataḥ karma bhavedgatiranuttamā

"आप संसार में ऐसे हैं — वेदों और वेदांगों में पारंगत। बताइए, कौन-से कर्म करने से मनुष्य को सर्वोत्तम गति मिलती है?"

सर्प उवाच

श्लोक 2 (3.183.2)

पात्रे दत्त्वा प्रियाण्युक्त्वा सत्यमुक्त्वा च भारत । अहिंसानिरतः स्वर्गं गच्छेदिति मतिर्मम ॥

pātre dattvā priyāṇyuktvā satyamuktvā ca bhārata | ahiṃsānirataḥ svargaṃ gacchediti matirmama

"हे भारत, सुपात्र को दान देकर, प्रिय वचन बोलकर, सत्य बोलकर और अहिंसा में निरत रहकर मनुष्य स्वर्ग जाता है — यह मेरा मत है।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 3 (3.183.3)

दानाद्वा सर्प सत्याद्वा किमतो गुरु दृश्यते । अहिंसाप्रिययोश्चैव गुरुलाघवमुच्यताम् ॥

dānādvā sarpa satyādvā kimato guru dṛśyate | ahiṃsāpriyayoścaiva gurulāghavamucyatām

"हे सर्प, दान और सत्य में कौन बड़ा दिखाई देता है? और अहिंसा तथा प्रिय वचन में कौन भारी है और कौन हल्का — यह बताइए।"

सर्प उवाच

श्लोक 4 (3.183.4)

दानं च सत्यं तत्त्वं वा अहिंसा प्रियमेव च । एषां कार्यगरीयस्त्वाद्दृश्यते गुरुलाघवम् ॥

dānaṃ ca satyaṃ tattvaṃ vā ahiṃsā priyameva ca | eṣāṃ kāryagarīyastvāddṛśyate gurulāghavam

"दान और सत्य, अथवा अहिंसा और प्रिय वचन — इनमें कौन भारी है और कौन हल्का, यह कार्य की गुरुता से देखा जाता है।

श्लोक 5 (3.183.5)

क्वचिद्दानप्रयोगाद्धि सत्यमेव विशिष्यते । सत्यवाक्याच्च राजेन्द्र क्वचिद्दानं विशिष्यते ॥

kvaciddānaprayogāddhi satyameva viśiṣyate | satyavākyācca rājendra kvaciddānaṃ viśiṣyate

कभी दान के प्रयोग से सत्य श्रेष्ठ होता है, और हे राजेन्द्र, कभी सत्य वचन से दान श्रेष्ठ होता है।

श्लोक 6 (3.183.6)

एवमेव महेष्वास प्रियवाक्यान्महीपते । अहिंसा दृश्यते गुर्वी ततश्च प्रियमिष्यते ॥

evameva maheṣvāsa priyavākyānmahīpate | ahiṃsā dṛśyate gurvī tataśca priyamiṣyate

इसी प्रकार हे महाधनुर्धर पृथ्वीपति, प्रिय वचन से अहिंसा भारी दिखाई देती है, और कभी प्रिय वचन को श्रेष्ठ माना जाता है।

श्लोक 7 (3.183.7)

एवमेतद्भवेद्राजन्कार्यापेक्षमनन्तरम् । यदभिप्रेतमन्यत्ते ब्रूहि यावद्ब्रवीम्यहम् ॥

evametadbhavedrājankāryāpekṣamanantaram | yadabhipretamanyatte brūhi yāvadbravīmyaham

हे राजन्, यह सब कार्य की अपेक्षा से तय होता है। तुम्हें और जो कुछ जानना हो, पूछो; मैं बताता हूँ।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 8 (3.183.8)

कथं स्वर्गे गतिः सर्प कर्मणां च फलं ध्रुवम् । अशरीरस्य दृश्येत प्रब्रूहि विषयांश्च मे ॥

kathaṃ svarge gatiḥ sarpa karmaṇāṃ ca phalaṃ dhruvam | aśarīrasya dṛśyeta prabrūhi viṣayāṃśca me

"हे सर्प, स्वर्ग में गति कैसे होती है, और शरीर-रहित जीव को कर्मों का निश्चित फल कैसे मिलता दिखाई देता है? मुझे विषयों के बारे में भी बताइए।"

सर्प उवाच

श्लोक 9 (3.183.9)

तिस्रो वै गतयो राजन्परिदृष्टाः स्वकर्मभिः । मानुषं स्वर्गवासश्च तिर्यग्योनिश्च तत्त्रिधा ॥

tisro vai gatayo rājanparidṛṣṭāḥ svakarmabhiḥ | mānuṣaṃ svargavāsaśca tiryagyoniśca tattridhā

"हे राजन्, अपने कर्मों के अनुसार तीन गतियाँ देखी गई हैं — मनुष्य-योनि, स्वर्ग-वास और पशु-पक्षियों की योनि; यह तीन प्रकार की है।

श्लोक 10 (3.183.10)

तत्र वै मानुषाल्लोकाद्दानादिभिरनादिभिः । अहिंसार्थसमायुक्तैः कारणैः स्वर्गमश्नुते ॥

tatra vai mānuṣāllokāddānādibhiranādibhiḥ | ahiṃsārthasamāyuktaiḥ kāraṇaiḥ svargamaśnute

इनमें मनुष्य-लोक से, दान आदि सत्कर्मों और अहिंसा से युक्त कर्मों के द्वारा, मनुष्य स्वर्ग प्राप्त करता है।

श्लोक 11 (3.183.11)

विपरीतैश्च राजेन्द्र कारणैर्मानुषो भवेत् । तिर्यग्योनिस्तथा तात विशेषश्चात्र वक्ष्यते ॥

viparītaiśca rājendra kāraṇairmānuṣo bhavet | tiryagyonistathā tāta viśeṣaścātra vakṣyate

हे राजेन्द्र, इनके विपरीत कारणों से वह फिर मनुष्य होता है, अथवा हे तात, पशु-पक्षियों की योनि में जाता है; इसका विशेष विवरण अब कहा जाता है।

श्लोक 12 (3.183.12)

कामक्रोधसमायुक्तो हिंसालोभसमन्वितः । मनुष्यत्वात्परिभ्रष्टस्तिर्यग्योनौ प्रसूयते ॥

kāmakrodhasamāyukto hiṃsālobhasamanvitaḥ | manuṣyatvātparibhraṣṭastiryagyonau prasūyate

जो काम और क्रोध से युक्त, हिंसा और लोभ से भरा होता है, वह मनुष्यत्व से गिरकर पशु-योनि में जन्म लेता है।

श्लोक 13 (3.183.13)

तिर्यग्योन्याः पृथग्भावो मनुष्यार्थे विधीयते । गवादिभ्यस्तथाऽश्वेभ्यो देवत्वमपि दृश्यते ॥

tiryagyonyāḥ pṛthagbhāvo manuṣyārthe vidhīyate | gavādibhyastathā'śvebhyo devatvamapi dṛśyate

पशु-योनि से मनुष्यत्व की ओर अलग से जाने का विधान है; और गौ आदि तथा अश्वों से देवत्व की प्राप्ति भी देखी गई है।

श्लोक 14 (3.183.14)

सोयमेता गतीस्तात जन्तुश्चरति कार्यवान् । निम्ने महति चात्मानमवस्थाप्य च वै नृप ॥

soyametā gatīstāta jantuścarati kāryavān | nimne mahati cātmānamavasthāpya ca vai nṛpa

हे तात, इस प्रकार कर्मों से बँधा हुआ जीव इन गतियों में भटकता है, और हे नृप, अपने को कभी नीची और कभी ऊँची अवस्था में स्थापित करता है।

श्लोक 15 (3.183.15)

जातो जातश्च बलवान्भुङ्क्ते नाम्नाऽथ देहवान् । फलार्थस्तात निष्पृक्तः प्रजालक्षणभावनः ॥

jāto jātaśca balavānbhuṅkte nāmnā'tha dehavān | phalārthastāta niṣpṛktaḥ prajālakṣaṇabhāvanaḥ

हर बार जन्म लेकर वह बलवान देहधारी किसी नाम से अपने कर्मों का फल भोगता है; हे तात, फल की इच्छा रखते हुए भी वह स्वयं अलिप्त रहता है और अपने जन्मों के लक्षणों को रचता है।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 16 (3.183.16)

शब्दे स्पर्शे च रूपे च तथैव रसगन्धयोः । तस्याधिष्ठानमव्यग्रो ब्रूहि सर्प यथातथम् ॥

śabde sparśe ca rūpe ca tathaiva rasagandhayoḥ | tasyādhiṣṭhānamavyagro brūhi sarpa yathātatham

"हे सर्प, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध में उस आत्मा का आधार क्या है, यह स्पष्ट और यथार्थ रूप से बताइए।

श्लोक 17 (3.183.17)

किं न गृह्णासि विषयान्युगपत्त्वं महामते । एतावदुच्यतां चोक्तं सर्वं पन्नगसत्तम ॥

kiṃ na gṛhṇāsi viṣayānyugapattvaṃ mahāmate | etāvaducyatāṃ coktaṃ sarvaṃ pannagasattama

हे महामति, तुम सब विषयों को एक साथ क्यों ग्रहण नहीं करते? हे पन्नगश्रेष्ठ, यह सब बताइए।"

सर्प उवाच

श्लोक 18 (3.183.18)

तदात्मद्रव्यमायुष्मन्देहसंश्रयणान्वितम् । करणाधिष्ठितं भोगानुपभुङ्क्ते यथाविधि ॥

tadātmadravyamāyuṣmandehasaṃśrayaṇānvitam | karaṇādhiṣṭhitaṃ bhogānupabhuṅkte yathāvidhi

"हे आयुष्मन्, वह आत्मा-रूपी तत्त्व देह का आश्रय लेकर और इन्द्रियों पर अधिष्ठित होकर विधिपूर्वक भोगों को भोगता है।

श्लोक 19 (3.183.19)

ज्ञानं चैवात्र बुद्धिश्च मनश्च भरतर्षभ । तस्य भोगाधिकरणे करणानि निबोध मे ॥

jñānaṃ caivātra buddhiśca manaśca bharatarṣabha | tasya bhogādhikaraṇe karaṇāni nibodha me

हे भरतश्रेष्ठ, ज्ञान, बुद्धि और मन — इन्हें उसके भोग के साधन समझो।

श्लोक 20 (3.183.20)

मनसा तात पर्येति क्रमशो विषयानिमान् । विषयायतनत्वेन भूतात्मा क्षेत्रविष्ठितः ॥

manasā tāta paryeti kramaśo viṣayānimān | viṣayāyatanatvena bhūtātmā kṣetraviṣṭhitaḥ

हे तात, क्षेत्र (शरीर) में स्थित भूतात्मा इन्द्रियों के द्वार से मन के सहारे इन विषयों को क्रम से ग्रहण करता है।

श्लोक 21 (3.183.21)

तत्रचापि नरव्याघ्र मनो जन्तोर्विधीयते । तस्माद्युगपदत्रास्य ग्रहणं नोपपद्यते ॥

tatracāpi naravyāghra mano jantorvidhīyate | tasmādyugapadatrāsya grahaṇaṃ nopapadyate

हे नरव्याघ्र, वहाँ भी जीव का मन ही नियामक होता है; इसलिए एक साथ सब विषयों का ग्रहण सम्भव नहीं होता।

श्लोक 22 (3.183.22)

स आत्मा पुरुषव्याघ्र भ्रुवोरन्तरमाश्रितः । बुद्धिं द्रव्येषु सृजति विविधेषु परावराम् ॥

sa ātmā puruṣavyāghra bhruvorantaramāśritaḥ | buddhiṃ dravyeṣu sṛjati vividheṣu parāvarām

हे पुरुषव्याघ्र, वह आत्मा भौंहों के बीच स्थित रहकर नाना प्रकार के पदार्थों की ओर ऊँची-नीची बुद्धि को प्रेरित करता है।

श्लोक 23 (3.183.23)

बुद्धेरुत्तरकालं च वेदना दृश्यते बुधैः । एष वै राजशार्दूल विधिः क्षेत्रज्ञभावनः ॥

buddheruttarakālaṃ ca vedanā dṛśyate budhaiḥ | eṣa vai rājaśārdūla vidhiḥ kṣetrajñabhāvanaḥ

बुद्धि के पश्चात् वेदना (अनुभूति) होती है, ऐसा ज्ञानी देखते हैं। हे राजसिंह, यही क्षेत्रज्ञ को प्रकट करने वाली विधि है।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 24 (3.183.24)

मनसश्चापि बुद्धेश्च ब्रूहि मे लक्षणं परम् । एतदध्यात्मविदुषां परं कार्यं विधीयते ॥

manasaścāpi buddheśca brūhi me lakṣaṇaṃ param | etadadhyātmaviduṣāṃ paraṃ kāryaṃ vidhīyate

"मुझे मन और बुद्धि का श्रेष्ठ लक्षण बताइए; अध्यात्म जानने वालों के लिए यही परम कर्तव्य बताया गया है।"

सर्प उवाच

श्लोक 25 (3.183.25)

बुद्धिरात्मानुगाऽतीव उत्पातेन विधीयते । तदाश्रिता हि सा ज्ञेया बुद्धिस्तस्यैषिणी भवेत् ॥

buddhirātmānugā'tīva utpātena vidhīyate | tadāśritā hi sā jñeyā buddhistasyaiṣiṇī bhavet

"बुद्धि आत्मा का घनिष्ठ अनुसरण करती है और किसी प्रेरणा से उत्पन्न होती है; वह आत्मा पर आश्रित जानी जाती है, और वही उसकी खोज करती है।

श्लोक 26 (3.183.26)

बुद्धिरुत्पद्यते कार्यान्मनस्तूत्पन्नमेव हि । बुद्धेर्गुणविधानेन मनस्तद्गुणवद्भवेत् ॥

buddhirutpadyate kāryānmanastūtpannameva hi | buddherguṇavidhānena manastadguṇavadbhavet

बुद्धि कार्य से उत्पन्न होती है, जबकि मन पहले से ही उत्पन्न है; और बुद्धि के गुणों के विधान से मन भी उन्हीं गुणों वाला हो जाता है।

श्लोक 27 (3.183.27)

एतद्विशेषणं तात मनोबुद्ध्योर्मयेरितम् । त्वमप्यत्राभिसंबुद्धः कथं वा मन्यसे स्वयम् ॥

etadviśeṣaṇaṃ tāta manobuddhyormayeritam | tvamapyatrābhisaṃbuddhaḥ kathaṃ vā manyase svayam

हे तात, मन और बुद्धि का यह भेद मैंने कहा। तुम भी इस विषय में जाग्रत हो; तुम स्वयं क्या मानते हो?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 28 (3.183.28)

अहो बुद्धिमतांश्रेष्ठ शुभा बुद्धिरियं तव । विदितं वेदितव्यं ते कस्मान्नहुष पृच्छसि ॥

aho buddhimatāṃśreṣṭha śubhā buddhiriyaṃ tava | viditaṃ veditavyaṃ te kasmānnahuṣa pṛcchasi

"अहो, हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, तुम्हारी यह बुद्धि उत्तम है। जानने योग्य सब कुछ तुम जानते हो; फिर हे नहुष, तुम क्यों पूछते हो?

श्लोक 29 (3.183.29)

सर्वज्ञं त्वां कथं मोह आविशत्स्वर्गवासिनम् । एवमद्भुतकर्माणमिति मे संशयो महान् ॥

sarvajñaṃ tvāṃ kathaṃ moha āviśatsvargavāsinam | evamadbhutakarmāṇamiti me saṃśayo mahān

तुम सर्वज्ञ थे, स्वर्ग में रहते थे और ऐसे अद्भुत कर्म करते थे — तुम पर मोह कैसे छा गया? यही मेरा बड़ा संशय है।"

सर्प उवाच

श्लोक 30 (3.183.30)

सुप्रज्ञमपि चेच्छूरमृद्धिर्मोहयते नरम् । वर्तमानः सुखे सर्वो नावैतीति मतिर्मम ॥

suprajñamapi cecchūramṛddhirmohayate naram | vartamānaḥ sukhe sarvo nāvaitīti matirmama

"समृद्धि बुद्धिमान और शूरवीर मनुष्य को भी मोहित कर देती है। सुख में रहने वाला कोई भी ठीक से नहीं समझ पाता — यह मेरा मत है।

श्लोक 31 (3.183.31)

सोहमैश्वर्यमोहेन मदाविष्टो युधिष्ठिर । पतितः प्रतिसंबुद्धस्त्वां तु संबोधयाम्यहम् ॥

sohamaiśvaryamohena madāviṣṭo yudhiṣṭhira | patitaḥ pratisaṃbuddhastvāṃ tu saṃbodhayāmyaham

हे युधिष्ठिर, इसी प्रकार ऐश्वर्य के मोह और मद से ग्रस्त होकर मैं गिर पड़ा; अब मैं जाग गया हूँ और तुम्हें भी सचेत कर रहा हूँ।

श्लोक 32 (3.183.32)

कृतंकार्यं महाराज त्वया मम परंतप । क्षीणः शापः सुकृच्छ्रो मे त्वया संभाष्य साधुना ॥

kṛtaṃkāryaṃ mahārāja tvayā mama paraṃtapa | kṣīṇaḥ śāpaḥ sukṛcchro me tvayā saṃbhāṣya sādhunā

हे महाराज, हे शत्रुतापन, तुमने मेरा काम कर दिया। तुम जैसे साधु पुरुष से वार्तालाप करके मेरा अत्यन्त कष्टदायक शाप समाप्त हो गया।

श्लोक 33 (3.183.33)

अहं हि दिवि दिव्येन विमानेन चरन्पुरा । अभिमानेन मत्तः सन्कंचिन्नान्यमचिन्तयम् ॥

ahaṃ hi divi divyena vimānena caranpurā | abhimānena mattaḥ sankaṃcinnānyamacintayam

पहले मैं स्वर्ग में दिव्य विमान पर विचरता था, और अभिमान से मतवाला होकर किसी दूसरे को कुछ नहीं समझता था।

श्लोक 34 (3.183.34)

ब्रह्मर्षिदेवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगाः । वरं मम प्रयच्छन्ति सर्वे त्रैलोक्यवासिनः ॥

brahmarṣidevagandharvayakṣarākṣasapannagāḥ | varaṃ mama prayacchanti sarve trailokyavāsinaḥ

ब्रह्मर्षि, देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग — तीनों लोकों के सभी निवासी मुझे भेंट देते थे।

श्लोक 35 (3.183.35)

चक्षुषा यं प्रपश्यामि प्राणिनं पृथिवीपते । तस्य तेजो हराम्याशु तद्धि दृष्टेर्बलं मम ॥

cakṣuṣā yaṃ prapaśyāmi prāṇinaṃ pṛthivīpate | tasya tejo harāmyāśu taddhi dṛṣṭerbalaṃ mama

हे पृथ्वीपति, जिस प्राणी को मैं आँख उठाकर देखता, उसका तेज तुरन्त हर लेता था; ऐसी मेरी दृष्टि की शक्ति थी।

श्लोक 36 (3.183.36)

ब्रह्मर्षीणां सहस्रं हि उवाह शिबिकां मम । स मामपनयो राजन्भ्रंशयामास वै श्रियः ॥

brahmarṣīṇāṃ sahasraṃ hi uvāha śibikāṃ mama | sa māmapanayo rājanbhraṃśayāmāsa vai śriyaḥ

एक सहस्र ब्रह्मर्षि मेरी पालकी ढोते थे; हे राजन्, उसी अपराध ने मुझे मेरी श्री से गिरा दिया।

श्लोक 37 (3.183.37)

तत्र ह्यगस्त्यः पादेन वहन्स्पृष्टो महामुनिः । अगस्त्येन ततोस्म्युक्तो ध्वंस सर्पेति वै रुषा ॥

tatra hyagastyaḥ pādena vahanspṛṣṭo mahāmuniḥ | agastyena tatosmyukto dhvaṃsa sarpeti vai ruṣā

वहाँ पालकी ढोते हुए महामुनि अगस्त्य को मेरा पैर छू गया, और तब अगस्त्य ने क्रोध से मुझसे कहा — "सर्प होकर गिर जा!"

श्लोक 38 (3.183.38)

ततस्तस्माद्विमानाग्र्यात्प्रच्युतश्च्युतलक्षणः । प्रपतन्बुबुधेऽऽत्मानं व्यालीभूतमधोमुखम् ॥

tatastasmādvimānāgryātpracyutaścyutalakṣaṇaḥ | prapatanbubudhe''tmānaṃ vyālībhūtamadhomukham

तब अपने राजचिह्नों से वंचित होकर मैं उस श्रेष्ठ विमान से गिरा, और गिरते हुए मैंने अपने को सिर नीचे किए सर्प बना हुआ पाया।

श्लोक 39 (3.183.39)

अयाचं तमहं विप्रं शापस्यान्तो भवेदिति । प्रमादात्संप्रमूढस्य भगवन्क्षन्तुमर्हसि ॥

ayācaṃ tamahaṃ vipraṃ śāpasyānto bhavediti | pramādātsaṃpramūḍhasya bhagavankṣantumarhasi

मैंने उन ब्राह्मण से याचना की कि शाप का अन्त हो — "भगवन्, प्रमाद से मूढ़ हुए मुझको क्षमा करें।"

श्लोक 40 (3.183.40)

ततः स मामुवाचेदं प्रपतन्तं कृपान्वितः । युधिष्ठिरो धर्मराजः शापात्त्वां मोक्षयिष्यति ॥

tataḥ sa māmuvācedaṃ prapatantaṃ kṛpānvitaḥ | yudhiṣṭhiro dharmarājaḥ śāpāttvāṃ mokṣayiṣyati

तब गिरते हुए मुझसे उन्होंने करुणा से भरकर यह कहा — "धर्मराज युधिष्ठिर तुम्हें शाप से मुक्त करेंगे।

श्लोक 41 (3.183.41)

अभिमानस्य वै तस्य बलस्य च नराधिप । फले क्षीणे महाराज फलं पुण्यमवाप्स्यसि ॥

abhimānasya vai tasya balasya ca narādhipa | phale kṣīṇe mahārāja phalaṃ puṇyamavāpsyasi

हे महाराज, जब तुम्हारे उस अभिमान और बल का फल क्षीण हो जाएगा, तब तुम अपने पुण्य का फल फिर से पाओगे।"

श्लोक 42 (3.183.42)

ततो मे विस्मयो जातस्तद्दृष्ट्वा तपसो बलम् । ब्रह्म च ब्राह्मणत्वं च येन त्वाऽहमचूचुदम् ॥

tato me vismayo jātastaddṛṣṭvā tapaso balam | brahma ca brāhmaṇatvaṃ ca yena tvā'hamacūcudam

तब उनके तप का बल देखकर मुझे विस्मय हुआ; इसी कारण मैंने तुमसे ब्रह्म और ब्राह्मणत्व के विषय में प्रश्न किए।

श्लोक 43 (3.183.43)

सत्यं दमस्तपो योगमहिंसा ज्ञाननित्यता । साधकानि सतां पुंसां न जातिर्नकुलं नृप ॥

satyaṃ damastapo yogamahiṃsā jñānanityatā | sādhakāni satāṃ puṃsāṃ na jātirnakulaṃ nṛpa

हे नृप, सत्य, इन्द्रिय-संयम, तप, योग, अहिंसा और निरन्तर ज्ञान-साधना — ये ही सज्जनों को सिद्धि देने वाले हैं, न जाति और न कुल।

श्लोक 44 (3.183.44)

अरिष्ट एष ते भ्राता मुक्तो भीमो महाभुज । स्वस्ति तेऽस्तु महाराज गमिष्यामि दिवं पुनः ॥

ariṣṭa eṣa te bhrātā mukto bhīmo mahābhuja | svasti te'stu mahārāja gamiṣyāmi divaṃ punaḥ

हे महाबाहु, यह रहा तुम्हारा भाई भीम, सकुशल मुक्त। हे महाराज, तुम्हारा कल्याण हो; अब मैं फिर स्वर्ग जाऊँगा।

श्लोक 45 (3.183.45)

स चायं पुरुषव्याघ्र कालः पुण्य उपागतः । तदस्मात्कारणात्पार्थ कार्यं तन्मे महत्कृतम् ॥

sa cāyaṃ puruṣavyāghra kālaḥ puṇya upāgataḥ | tadasmātkāraṇātpārtha kāryaṃ tanme mahatkṛtam

हे पुरुषव्याघ्र, अब यह पुण्य समय आ पहुँचा है; इसलिए हे पार्थ, तुमने मेरा यह महान कार्य सिद्ध कर दिया।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 46 (3.183.46)

ततस्तस्मिन्मुहूर्ते तु विमानं कामगामि वै । अवपातेन महता तत्रावाप तदुत्तमम् ॥

tatastasminmuhūrte tu vimānaṃ kāmagāmi vai | avapātena mahatā tatrāvāpa taduttamam

तब उसी क्षण इच्छानुसार चलने वाला एक उत्तम विमान बड़े वेग से नीचे उतरा, और वहाँ उन्होंने उस श्रेष्ठ विमान को प्राप्त किया।

श्लोक 47 (3.183.47)

इत्युक्त्वाऽऽजगरं देहं मुक्त्वा स नहुषो नृपः । दिव्यं वपुः समास्थाय गतस्त्रिदिवमेव ह ॥

ityuktvā''jagaraṃ dehaṃ muktvā sa nahuṣo nṛpaḥ | divyaṃ vapuḥ samāsthāya gatastridivameva ha

यह कहकर राजा नहुष ने अजगर का शरीर छोड़ दिया और दिव्य रूप धारण करके स्वर्ग चले गए।

श्लोक 48 (3.183.48)

युधिष्ठिरोपि धर्मात्मा भ्रात्रा भीमेन संगतः । धौम्येन सहितः श्रीमानाश्रमं पुनरागमत् ॥

yudhiṣṭhiropi dharmātmā bhrātrā bhīmena saṃgataḥ | dhaumyena sahitaḥ śrīmānāśramaṃ punarāgamat

धर्मात्मा श्रीमान् युधिष्ठिर भी अपने भाई भीम से मिलकर धौम्य के साथ फिर आश्रम लौट आए।

श्लोक 49 (3.183.49)

ततो द्विजेभ्यः सर्वेभ्यः समेतेभ्यो यथातथम् । कथयामास तत्सर्वं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

tato dvijebhyaḥ sarvebhyaḥ sametebhyo yathātatham | kathayāmāsa tatsarvaṃ dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

तब धर्मराज युधिष्ठिर ने वहाँ एकत्र सभी ब्राह्मणों को वह सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों कह सुनाया।

श्लोक 50 (3.183.50)

तच्छ्रुत्वा ते द्विजाः सर्वे भ्रातरश्चास्य ते त्रयः । आसन्सुव्रीडिता राजन्द्रौपदी च यशस्विनी ॥

tacchrutvā te dvijāḥ sarve bhrātaraścāsya te trayaḥ | āsansuvrīḍitā rājandraupadī ca yaśasvinī

हे राजन्, यह सुनकर वे सब ब्राह्मण, उनके तीनों भाई और यशस्विनी द्रौपदी अत्यन्त लज्जित हुए।

श्लोक 51 (3.183.51)

ते तु सर्वेद्विजश्रेष्ठाः पाण्डवानां हितेप्सया । मैवमित्यब्रुवन्भीमं गर्हयन्तोऽस्य साहसम् ॥

te tu sarvedvijaśreṣṭhāḥ pāṇḍavānāṃ hitepsayā | maivamityabruvanbhīmaṃ garhayanto'sya sāhasam

पाण्डवों का हित चाहने वाले उन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने भीम के दुस्साहस की निन्दा करते हुए कहा — "ऐसा मत करो।"

श्लोक 52 (3.183.52)

पाण्डवास्तु भयान्मुक्तं प्रेक्ष्य भीमं महाबलम् । हर्षमाहारयांचक्रुर्विजह्रुश्च मुदा युताः ॥

pāṇḍavāstu bhayānmuktaṃ prekṣya bhīmaṃ mahābalam | harṣamāhārayāṃcakrurvijahruśca mudā yutāḥ

महाबली भीम को भय से मुक्त देखकर पाण्डव हर्ष से भर गए और आनन्दपूर्वक विहार करने लगे।

अध्याय 182अध्याय-सूचीअध्याय 184