आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 184
वर्षा और शरद्; काम्यकवन को वापसी
वैशम्पायन उस वर्षा ऋतु का वर्णन करते हैं जो पाण्डवों के वनवास में आई — गरजते बादल, जल से ऐसी भीगी धरती कि कुछ पहचान में न आए, उफनती नदियाँ और पशु-पक्षियों की पुकारें — और उसके बाद आई निर्मल शरद् का, जिसमें तारों भरी रातें, कमलों से सजे सरोवर और लबालब भरी सरस्वती थी। तपस्वियों के साथ कार्तिक की पवित्र पूर्णिमा मनाकर पाण्डव धौम्य, सारथियों और सेवकों के साथ काम्यक वन की ओर चल पड़ते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.184.1)
निदाघान्तकरः कालः सर्वभूतसुखावहः । तत्रैव वसतां तेषां प्रावृट् समभिपद्यत ॥
nidāghāntakaraḥ kālaḥ sarvabhūtasukhāvahaḥ | tatraiva vasatāṃ teṣāṃ prāvṛṭ samabhipadyata
जब वे वहीं रह रहे थे, तब ग्रीष्म का अन्त करने वाली और सब प्राणियों को सुख देने वाली वर्षा ऋतु आ पहुँची।
श्लोक 2 (3.184.2)
छादयन्तो महाघोषाः खं दिशश्च बलाहकाः । प्रववर्षुर्दिवारात्रमसिताः सततं तदा ॥
chādayanto mahāghoṣāḥ khaṃ diśaśca balāhakāḥ | pravavarṣurdivārātramasitāḥ satataṃ tadā
भारी गर्जना करते हुए काले बादल आकाश और दिशाओं को ढककर दिन-रात लगातार बरसते रहे।
श्लोक 3 (3.184.3)
तपात्ययनिकेताश्च शतशोऽथ सहस्रशः । अपेतार्कप्रभाजालाः सविद्युद्विमलप्रभाः ॥
tapātyayaniketāśca śataśo'tha sahasraśaḥ | apetārkaprabhājālāḥ savidyudvimalaprabhāḥ
सैकड़ों-हज़ारों बादल ग्रीष्म की समाप्ति पर मण्डपों के समान छा गए; उन्होंने सूर्य की किरणों के जाल को ढक लिया और वे बिजली की उज्ज्वल चमक से दमकने लगे।
श्लोक 4 (3.184.4)
विरूढशष्पा धरणी मत्तदंशसरीसृपा । बभूव पयसा सिक्ता शान्तधूमरजोगणा ॥
virūḍhaśaṣpā dharaṇī mattadaṃśasarīsṛpā | babhūva payasā siktā śāntadhūmarajogaṇā
धरती पर नई घास उग आई, और वह मतवाले डाँसों तथा रेंगने वाले जीवों से भर गई; जल से सिंचकर उसका धुआँ और धूल शान्त हो गए।
श्लोक 5 (3.184.5)
न स्म प्रज्ञायते किंचिदम्भसा समवस्तृते । समं वा विषमं वाऽपि नद्यो वा स्थावराणि वा ॥
na sma prajñāyate kiṃcidambhasā samavastṛte | samaṃ vā viṣamaṃ vā'pi nadyo vā sthāvarāṇi vā
जल से सब कुछ ढक जाने के कारण कुछ भी पहचान में नहीं आता था — न समतल, न ऊबड़-खाबड़, न नदियाँ और न स्थल।
श्लोक 6 (3.184.6)
क्षुब्धतोया महावेगाः श्वसमाना इवाशुगाः । सिन्धवः शोभयांचक्रुः काननानि तपात्यये ॥
kṣubdhatoyā mahāvegāḥ śvasamānā ivāśugāḥ | sindhavaḥ śobhayāṃcakruḥ kānanāni tapātyaye
उफनते जल वाली, प्रबल वेग वाली, मानो हाँफती हुई तेज़ बहती नदियाँ ग्रीष्म की समाप्ति पर वनों को शोभित करने लगीं।
श्लोक 7 (3.184.7)
नदतां काननान्तेषु श्रूयन्ते विविधाः स्वनाः । वृष्टिभिस्ताड्यमानानां वराहमृगपक्षिणाम् ॥
nadatāṃ kānanānteṣu śrūyante vividhāḥ svanāḥ | vṛṣṭibhistāḍyamānānāṃ varāhamṛgapakṣiṇām
वनों के छोरों पर वर्षा की बौछारों से पीड़ित होकर चिल्लाते सूअरों, हिरनों और पक्षियों की नाना प्रकार की ध्वनियाँ सुनाई देती थीं।
श्लोक 8 (3.184.8)
स्तोककाः शिखिनश्चैव पुंस्कोकिलगणैः सह । मत्ताः परिपतन्ति स्म दर्दुराश्चैव दर्पिताः ॥
stokakāḥ śikhinaścaiva puṃskokilagaṇaiḥ saha | mattāḥ paripatanti sma dardurāścaiva darpitāḥ
चातक और मोर, नर कोयलों के झुंडों के साथ, मतवाले होकर इधर-उधर उड़ने लगे, और मेंढक भी गर्व से भर उठे।
श्लोक 9 (3.184.9)
तदा बहुविधाकारा प्रावृण्मेघानुनादिता । अभ्यतीता शिवा तेषां चरतां मरुधन्वसु ॥
tadā bahuvidhākārā prāvṛṇmeghānunāditā | abhyatītā śivā teṣāṃ caratāṃ marudhanvasu
इस प्रकार मेघों की गर्जना से गूँजती, अनेक रूपों वाली वह मंगलमयी वर्षा ऋतु पर्वत के सूखे स्थानों में विचरते हुए उनके लिए बीत गई।
श्लोक 10 (3.184.10)
क्रौञ्चहंससमाकीर्णा शरत्प्रमुदिताऽभवत् । रूढकक्षवनप्रस्था प्रसन्नजलनिम्नगा ॥
krauñcahaṃsasamākīrṇā śaratpramuditā'bhavat | rūḍhakakṣavanaprasthā prasannajalanimnagā
फिर क्रौञ्च और हंसों से भरी आनन्दमयी शरद् ऋतु आई; वनों और ढलानों पर घनी घास उग आई, और नदियों का जल निर्मल हो गया।
श्लोक 11 (3.184.11)
विमलाकाशनक्षत्रा शरत्तेषां शिवाऽभवत् । मृगद्विजसमाकीर्णा पाण्डवानां महात्मनाम् ॥
vimalākāśanakṣatrā śaratteṣāṃ śivā'bhavat | mṛgadvijasamākīrṇā pāṇḍavānāṃ mahātmanām
निर्मल आकाश और नक्षत्रों वाली, पशु-पक्षियों से भरी शरद् ऋतु महात्मा पाण्डवों के लिए सुखद रही।
श्लोक 12 (3.184.12)
दृश्यन्ते शान्तरजसः क्षपाजलदशीतलाः । ग्रहनक्षत्रसङ्घैश्च सोमेन च विराजिताः ॥
dṛśyante śāntarajasaḥ kṣapājaladaśītalāḥ | grahanakṣatrasaṅghaiśca somena ca virājitāḥ
धूल से रहित, बादलों से शीतल, ग्रहों और नक्षत्रों के समूहों तथा चन्द्रमा से सुशोभित रातें दिखाई देने लगीं।
श्लोक 13 (3.184.13)
कुमुदैः पुण्डरीकैश्च शीतवारिधराः शिवाः । नदीः पुष्करिणीश्चैव ददृशुः समलंकृताः ॥
kumudaiḥ puṇḍarīkaiśca śītavāridharāḥ śivāḥ | nadīḥ puṣkariṇīścaiva dadṛśuḥ samalaṃkṛtāḥ
उन्होंने कुमुदों और कमलों से सजी, शीतल जल से भरी सुन्दर नदियाँ और सरोवर देखे।
श्लोक 14 (3.184.14)
आकाशनीकाशतटां नीपनीवारसंकुलाम् । बभूव चरतां हर्षः पुण्यतीर्थां सरस्वतीम् ॥
ākāśanīkāśataṭāṃ nīpanīvārasaṃkulām | babhūva caratāṃ harṣaḥ puṇyatīrthāṃ sarasvatīm
आकाश जैसे विस्तृत तटों वाली, कदम्ब के वृक्षों और नीवार (जंगली धान) से भरी, पवित्र तीर्थों वाली सरस्वती के किनारे विचरते हुए उन्हें बड़ा हर्ष हुआ।
श्लोक 15 (3.184.15)
ते वै मुमुदिरे वीराः प्रसन्नसलिलां शिवाम् । पश्यन्तो दृढधन्वानः परिपूर्णां सरस्वतीम् ॥
te vai mumudire vīrāḥ prasannasalilāṃ śivām | paśyanto dṛḍhadhanvānaḥ paripūrṇāṃ sarasvatīm
दृढ़ धनुष वाले वे वीर निर्मल जल से भरी, लबालब बहती मंगलमयी सरस्वती को देखकर आनन्दित हुए।
श्लोक 16 (3.184.16)
तेषां पुण्यतमा रात्रिः पर्वसन्धौ स्म शारदी । तत्रैव वसतामासीत्कार्तिकी जनमेजय ॥
teṣāṃ puṇyatamā rātriḥ parvasandhau sma śāradī | tatraiva vasatāmāsītkārtikī janamejaya
हे जनमेजय, वहीं रहते हुए उनके लिए पर्व-संधि पर पड़ने वाली अत्यन्त पवित्र शरद् की रात्रि — कार्तिक की पूर्णिमा — आई।
श्लोक 17 (3.184.17)
पुण्यकृद्भिर्महासत्वैस्तापसैः सह पाण्डवाः । तत्सर्वं भरतश्रेष्ठ समूहुर्योगमुत्तमम् ॥
puṇyakṛdbhirmahāsatvaistāpasaiḥ saha pāṇḍavāḥ | tatsarvaṃ bharataśreṣṭha samūhuryogamuttamam
हे भरतश्रेष्ठ, पुण्यात्मा और महान तपस्वियों के साथ पाण्डवों ने अपना सारा सामान अपने उत्तम वाहनों पर लाद लिया।
श्लोक 18 (3.184.18)
तमिस्राभ्युदये तस्मिन्धौम्येन सह पाण्डवाः । सूतैः पौरोगवैः साकं काम्यकं प्रययुर्वनम् ॥
tamisrābhyudaye tasmindhaumyena saha pāṇḍavāḥ | sūtaiḥ paurogavaiḥ sākaṃ kāmyakaṃ prayayurvanam
कृष्ण पक्ष के आरम्भ होने पर पाण्डव धौम्य, सारथियों और भोजनशाला के अध्यक्षों के साथ काम्यक वन की ओर चल पड़े।