आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 185
काम्यक वन में श्रीकृष्ण और मार्कण्डेय का आगमन
पाण्डवों के काम्यक वन में लौटने पर श्रीकृष्ण सत्यभामा के साथ वहाँ आते हैं, सबसे स्नेहपूर्वक मिलते हैं और धर्म पर चलने के लिए युधिष्ठिर की प्रशंसा करते हैं। वे द्रौपदी को द्वारका में उसके पुत्रों की कुशलता का समाचार देते हैं और युधिष्ठिर को दुर्योधन के विरुद्ध वृष्णियों की सेना देने का प्रस्ताव रखते हैं, परन्तु युधिष्ठिर अपनी प्रतिज्ञा निभाना चुनते हैं और श्रीकृष्ण पर ही भरोसा रखते हैं। तब चिरयुवा मुनि मार्कण्डेय और फिर नारद आते हैं, और श्रीकृष्ण के अनुरोध पर मार्कण्डेय प्राचीन कथाएँ सुनाने को तैयार होते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.185.1)
काम्यकं प्राप्य कौरव्य युधिष्ठिरपुरोगमाः । कृतातिथ्या मुनिगणैर्निषेदुः सह कृष्णया ॥
kāmyakaṃ prāpya kauravya yudhiṣṭhirapurogamāḥ | kṛtātithyā munigaṇairniṣeduḥ saha kṛṣṇayā
हे कुरुवंशी! काम्यक वन में पहुँचने पर मुनिगणों ने युधिष्ठिर आदि पाण्डवों का आतिथ्य-सत्कार किया, और वे द्रौपदी के साथ वहाँ बैठ गए।
श्लोक 2 (3.185.2)
ततस्तान्परिविश्वस्तान्वसतः पाण्डुनन्दनान् । ब्राह्मणा बहवस्तत्र समन्तात्पर्यवारयन् ॥
tatastānpariviśvastānvasataḥ pāṇḍunandanān | brāhmaṇā bahavastatra samantātparyavārayan
तब जब पाण्डुपुत्र वहाँ निश्चिन्त होकर रहने लगे, तो बहुत-से ब्राह्मण चारों ओर से आकर उन्हें घेरकर बैठ गए।
श्लोक 3 (3.185.3)
अथाब्रवीद्द्विजः कश्चिदर्जुनस्य प्रियः सखा । स एष्यति महाबाहुर्वशी शौरिरुदारधीः ॥
athābravīddvijaḥ kaścidarjunasya priyaḥ sakhā | sa eṣyati mahābāhurvaśī śaurirudāradhīḥ
तब अर्जुन के एक प्रिय मित्र ब्राह्मण ने कहा — "महाबाहु, जितेन्द्रिय और उदार बुद्धि वाले शौरि (श्रीकृष्ण) यहाँ आएँगे।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 4 (3.185.4)
विदिता हि हरेर्यूयमिहायाताः कुरूद्वहाः । सदा हि दर्शनाकाङ्क्षी श्रेयोन्वेषी च वो हरिः ॥
viditā hi hareryūyamihāyātāḥ kurūdvahāḥ | sadā hi darśanākāṅkṣī śreyonveṣī ca vo hariḥ
हे कुरुश्रेष्ठो! हरि को ज्ञात है कि आप लोग यहाँ आ गए हैं। हरि सदा आपके दर्शन की इच्छा रखते हैं और आपका कल्याण चाहते हैं।
श्लोक 5 (3.185.5)
बहुवत्सरजीवी च मार्कण्डेयो महातपाः । स्वाध्यायतपसा युक्तः क्षिप्रं युष्मान्समेष्यति ॥
bahuvatsarajīvī ca mārkaṇḍeyo mahātapāḥ | svādhyāyatapasā yuktaḥ kṣipraṃ yuṣmānsameṣyati
और अनेक वर्षों तक जीवित रहने वाले, स्वाध्याय और तप में लगे महातपस्वी मार्कण्डेय भी शीघ्र ही आपसे आ मिलेंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (3.185.6)
तथैव ब्रुवतस्तस्य प्रत्यदृश्यत केशवः । शैब्यसुग्रीवयुक्तेन रथेन रथिनां वरः ॥
tathaiva bruvatastasya pratyadṛśyata keśavaḥ | śaibyasugrīvayuktena rathena rathināṃ varaḥ
वह ऐसा कह ही रहा था कि रथियों में श्रेष्ठ केशव शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ों से जुते रथ पर दिखाई दिए।
श्लोक 7 (3.185.7)
मघवानिव पौलोम्या सहितः सत्यभामया । उपायाद्देवकीपुत्रो दिदृक्षुः कुरुसत्तमान् ॥
maghavāniva paulomyā sahitaḥ satyabhāmayā | upāyāddevakīputro didṛkṣuḥ kurusattamān
जैसे इन्द्र पौलोमी (शची) के साथ आते हैं, वैसे ही देवकीनन्दन सत्यभामा के साथ कुरुश्रेष्ठों के दर्शन की इच्छा से वहाँ पधारे।
श्लोक 8 (3.185.8)
अवतीर्य रथात्कृष्णो धर्मराजं यथाविधि । ववन्दे मुदितो धीमान्भीमं च बलिनां वरम् ॥
avatīrya rathātkṛṣṇo dharmarājaṃ yathāvidhi | vavande mudito dhīmānbhīmaṃ ca balināṃ varam
रथ से उतरकर बुद्धिमान श्रीकृष्ण ने प्रसन्न मन से धर्मराज को और बलवानों में श्रेष्ठ भीम को विधिपूर्वक प्रणाम किया।
श्लोक 9 (3.185.9)
पूजयामास धौम्यं च यमाभ्यामभिवादितः । परिष्वज्यमहाभागां द्रौपदीं पर्यसान्त्वयत् ॥
pūjayāmāsa dhaumyaṃ ca yamābhyāmabhivāditaḥ | pariṣvajyamahābhāgāṃ draupadīṃ paryasāntvayat
उन्होंने धौम्य का सम्मान किया, नकुल-सहदेव ने उन्हें प्रणाम किया, और सौभाग्यशालिनी द्रौपदी को हृदय से लगाकर उन्होंने उसे सान्त्वना दी।
श्लोक 10 (3.185.10)
स दृष्ट्वा फल्गुनं वीरं चिरस्य प्रियमागतम् । पर्यष्वजत दाशार्हः पुनः पुनररिंदमः ॥
sa dṛṣṭvā phalgunaṃ vīraṃ cirasya priyamāgatam | paryaṣvajata dāśārhaḥ punaḥ punarariṃdamaḥ
दीर्घकाल के बाद लौटे अपने प्रिय वीर फाल्गुन (अर्जुन) को देखकर शत्रुदमन दाशार्ह श्रीकृष्ण ने उन्हें बार-बार गले लगाया।
श्लोक 11 (3.185.11)
तथैव सत्यभामाऽपि द्रौपदीं परिषस्वजे । पाण्डवानां प्रियं भार्यां कृष्णस्य महिषी प्रिया ॥
tathaiva satyabhāmā'pi draupadīṃ pariṣasvaje | pāṇḍavānāṃ priyaṃ bhāryāṃ kṛṣṇasya mahiṣī priyā
इसी प्रकार श्रीकृष्ण की प्रिय पटरानी सत्यभामा ने भी पाण्डवों की प्रिय पत्नी द्रौपदी को गले लगाया।
श्लोक 12 (3.185.12)
ततस्ते पाण्डवाः सर्वेसभार्याः सपुरोहिताः । आनर्चुः पुण्डरीकाक्षं परिवव्रुश्च सर्वशः ॥
tataste pāṇḍavāḥ sarvesabhāryāḥ sapurohitāḥ | ānarcuḥ puṇḍarīkākṣaṃ parivavruśca sarvaśaḥ
तब पत्नी और पुरोहित सहित सब पाण्डवों ने कमलनयन श्रीकृष्ण की पूजा की और चारों ओर से उन्हें घेरकर बैठ गए।
श्लोक 13 (3.185.13)
कृष्णस्तु पार्थेन समेत्य विद्वान् । धनंजयेनासुरमर्दनेन । बभौ यथा भूतपतिर्महात्मा । समेत्य साक्षाद्भगवान्गुहेन ॥
kṛṣṇastu pārthena sametya vidvān | dhanaṃjayenāsuramardanena | babhau yathā bhūtapatirmahātmā | sametya sākṣādbhagavānguhena
असुरों का मर्दन करने वाले पार्थ धनंजय से मिलकर ज्ञानी श्रीकृष्ण वैसे ही शोभित हुए, जैसे भूतों के स्वामी महात्मा भगवान रुद्र साक्षात् गुह (कार्तिकेय) से मिलकर शोभित होते हैं।
श्लोक 14 (3.185.14)
ततः समस्तानि किरीटमाली । वनेषु वृत्तानि गदाग्रजाय । उक्त्वा यथावत्पुनरन्वपृच्छ- । त्तस्मिन्सुभद्रां च तथाऽभिमन्युम् ॥
tataḥ samastāni kirīṭamālī | vaneṣu vṛttāni gadāgrajāya | uktvā yathāvatpunaranvapṛccha- | ttasminsubhadrāṃ ca tathā'bhimanyum
तब किरीटधारी अर्जुन ने गद के बड़े भाई श्रीकृष्ण को वनों में घटी सारी बातें ज्यों-की-त्यों कह सुनाईं, और फिर उनसे सुभद्रा और अभिमन्यु का समाचार पूछा।
श्लोक 15 (3.185.15)
धौम्यं च कृष्णां च युधिष्ठिरं च । यमौ च भीमं च दशार्हसिंहः । उवाच दिष्ट्या भवतां शिवेन । प्राप्तः किरीटी मुदितः कृतास्त्रः ॥
dhaumyaṃ ca kṛṣṇāṃ ca yudhiṣṭhiraṃ ca | yamau ca bhīmaṃ ca daśārhasiṃhaḥ | uvāca diṣṭyā bhavatāṃ śivena | prāptaḥ kirīṭī muditaḥ kṛtāstraḥ
दाशार्हों में सिंह के समान श्रीकृष्ण ने धौम्य, द्रौपदी, युधिष्ठिर, नकुल-सहदेव और भीम से कहा — "सौभाग्य की बात है कि किरीटी अर्जुन अस्त्र-विद्या प्राप्त करके प्रसन्न और सकुशल आप लोगों के पास लौट आए हैं।"
श्लोक 16 (3.185.16)
स पूजयित्वा मधुहा यथाव- । त्पार्थांश्च कृष्णां च पुरोहितं च । उवाच राजानमभिप्रशंसन् । युधिष्ठिरं तेन सहोपविश्य ॥
sa pūjayitvā madhuhā yathāva- | tpārthāṃśca kṛṣṇāṃ ca purohitaṃ ca | uvāca rājānamabhipraśaṃsan | yudhiṣṭhiraṃ tena sahopaviśya
मधुसूदन ने पार्थों, द्रौपदी और पुरोहित का यथोचित सम्मान किया, फिर राजा युधिष्ठिर के साथ बैठकर उनकी प्रशंसा करते हुए कहा —
वासुदेव उवाच
श्लोक 17 (3.185.17)
धर्मः परः पाण्डव राज्यलाभा- । त्तस्यादिमाहुस्तप एव राजन् । सत्यार्जवाभ्यां चरता स्वधर्मं । जितस्त्वयाऽयं च परश्च लोकः ॥
dharmaḥ paraḥ pāṇḍava rājyalābhā- | ttasyādimāhustapa eva rājan | satyārjavābhyāṃ caratā svadharmaṃ | jitastvayā'yaṃ ca paraśca lokaḥ
हे पाण्डुनन्दन! राज्य-प्राप्ति से धर्म श्रेष्ठ है, और हे राजन्, तप को ही उसका आदि कहा गया है। सत्य और सरलता के साथ अपने धर्म का आचरण करके आपने यह लोक और परलोक दोनों जीत लिए हैं।
श्लोक 18 (3.185.18)
अधीतमग्रे चरता व्रतानि । सम्यग्धनुर्वेदमवाप्य कृत्स्नम् । क्षात्रेण धर्मेण वसूनि लब्ध्वा । सर्वे ह्यवाप्ताः क्रतवः पुराणाः ॥
adhītamagre caratā vratāni | samyagdhanurvedamavāpya kṛtsnam | kṣātreṇa dharmeṇa vasūni labdhvā | sarve hyavāptāḥ kratavaḥ purāṇāḥ
आपने पहले व्रतों का पालन करते हुए अध्ययन किया, सम्पूर्ण धनुर्वेद भली-भाँति प्राप्त किया, क्षत्रिय-धर्म से धन अर्जित किया और सभी प्राचीन यज्ञ सम्पन्न किए।
श्लोक 19 (3.185.19)
न ग्राम्यधर्मेषु रतिस्तवास्ति । कामान्न किंचित्कुरुषे नरेन्द्र । न चार्थलोभात्प्रजहासि धर्मं । तस्मात्प्रभावादसि धर्मराजः ॥
na grāmyadharmeṣu ratistavāsti | kāmānna kiṃcitkuruṣe narendra | na cārthalobhātprajahāsi dharmaṃ | tasmātprabhāvādasi dharmarājaḥ
हे नरेन्द्र! आपकी विषय-भोगों में रुचि नहीं है, आप कामनावश कुछ नहीं करते, और धन के लोभ से धर्म का त्याग नहीं करते। इसी प्रभाव से आप धर्मराज हैं।
श्लोक 20 (3.185.20)
दानं च सत्यं च तपश्च राजन् । क्षमा च शान्तिश्च दमो धृतिश्च । अवाप्य राष्ट्राणि वसूनि भोगा- । नेषा परा पार्थ सदा रतिस्ते ॥
dānaṃ ca satyaṃ ca tapaśca rājan | kṣamā ca śāntiśca damo dhṛtiśca | avāpya rāṣṭrāṇi vasūni bhogā- | neṣā parā pārtha sadā ratiste
हे राजन्! दान, सत्य, तप, क्षमा, शान्ति, दम और धृति — राज्य, धन और भोग पा लेने पर भी, हे पार्थ, यही सदा आपकी परम प्रीति के विषय रहे हैं।
श्लोक 21 (3.185.21)
हृतं च देशं कुरुजाङ्गलानां । कृष्णां सभायामवशां च पश्यन् । अपेतधर्मव्यवहारवृत्तं । सहेत तत्पाण्डव कस्त्वदन्यः ॥
hṛtaṃ ca deśaṃ kurujāṅgalānāṃ | kṛṣṇāṃ sabhāyāmavaśāṃ ca paśyan | apetadharmavyavahāravṛttaṃ | saheta tatpāṇḍava kastvadanyaḥ
कुरुजांगल देश का छिन जाना और सभा में द्रौपदी की विवशता देखना — ऐसा आचरण जिसमें धर्म और मर्यादा का लेश भी न था — हे पाण्डव! आपके सिवा उसे कौन सह सकता था?
श्लोक 22 (3.185.22)
असंशयं सर्वसमृद्धकामः । क्षिप्रं प्रजाः पालयितासि सम्यक् । अद्यैव तन्निग्रहणं कुरूणां । यदि प्रतिज्ञा भवतः समाप्ता ॥
asaṃśayaṃ sarvasamṛddhakāmaḥ | kṣipraṃ prajāḥ pālayitāsi samyak | adyaiva tannigrahaṇaṃ kurūṇāṃ | yadi pratijñā bhavataḥ samāptā
निःसन्देह आप शीघ्र ही सब मनोरथों से सम्पन्न होकर प्रजा का भली-भाँति पालन करेंगे। आपकी प्रतिज्ञा पूरी होते ही, उसी दिन कौरवों का दमन हो जाएगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (3.185.23)
प्रोवाच कृष्णामपि याज्ञसेनीं । दशार्हभर्ता सहितः सुहृद्भिः । दिष्ट्या समग्राऽसि धनंजयेन । समागतेत्येवमुवाच कृष्णः ॥
provāca kṛṣṇāmapi yājñasenīṃ | daśārhabhartā sahitaḥ suhṛdbhiḥ | diṣṭyā samagrā'si dhanaṃjayena | samāgatetyevamuvāca kṛṣṇaḥ
मित्रों से घिरे दाशार्हों के स्वामी श्रीकृष्ण ने यज्ञसेन की पुत्री द्रौपदी से भी कहा — "सौभाग्य से तुम धनंजय से मिलकर फिर पूर्ण हो गई हो।"
वासुदेव उवाच
श्लोक 24 (3.185.24)
कृष्णे धनुर्वेदरतिप्रधाना- । स्तवात्मजास्ते शिशवः सुशीलाः । सद्भिः सदैवाचरितं समाधिं । चरन्ति पुत्रास्तव याज्ञसेनि ॥
kṛṣṇe dhanurvedaratipradhānā- | stavātmajāste śiśavaḥ suśīlāḥ | sadbhiḥ sadaivācaritaṃ samādhiṃ | caranti putrāstava yājñaseni
हे कृष्णे! तुम्हारे पुत्र धनुर्वेद में विशेष रुचि रखते हैं; वे सुशील बालक हैं। हे याज्ञसेनी! तुम्हारे पुत्र सदा सत्पुरुषों द्वारा आचरित नियम का पालन करते हैं।
श्लोक 25 (3.185.25)
राज्ये नियुक्तैश्च निमन्त्र्यमाणाः । पित्रा च कृष्णे तव सोदरैश्च । न यज्ञसेनस्य न मातुलानां । गृहेषु बाला रतिमाप्नुवन्ति ॥
rājye niyuktaiśca nimantryamāṇāḥ | pitrā ca kṛṣṇe tava sodaraiśca | na yajñasenasya na mātulānāṃ | gṛheṣu bālā ratimāpnuvanti
हे कृष्णे! राज्य के अधिकारियों, तुम्हारे पिता और तुम्हारे भाइयों के निमन्त्रण देने पर भी वे बालक न यज्ञसेन के घर में और न अपने मामाओं के घरों में आनन्द पाते हैं।
श्लोक 26 (3.185.26)
आनर्तमेवाभिमुखाः शिवेन । गत्वाधनुर्वेदरतिप्रधानाः । तवात्मजा वृष्णिपुरं प्रविश्य । न दैवतेभ्यः स्पृहयन्ति कृष्णे ॥
ānartamevābhimukhāḥ śivena | gatvādhanurvedaratipradhānāḥ | tavātmajā vṛṣṇipuraṃ praviśya | na daivatebhyaḥ spṛhayanti kṛṣṇe
धनुर्वेद में अत्यन्त अनुरक्त तुम्हारे पुत्र कुशलपूर्वक आनर्त देश जाकर वृष्णियों के नगर (द्वारका) में रह रहे हैं, और हे कृष्णे! वहाँ वे देवताओं से भी ईर्ष्या नहीं करते।
श्लोक 27 (3.185.27)
यथा त्वमेवार्हसि तेषु वृत्तं । प्रयोक्तुमार्या च यथैव कुन्ती । तेष्वप्रमादेन तथा करोति । तथैव भूयश्च तथा सुभद्रा ॥
yathā tvamevārhasi teṣu vṛttaṃ | prayoktumāryā ca yathaiva kuntī | teṣvapramādena tathā karoti | tathaiva bhūyaśca tathā subhadrā
जैसे तुम स्वयं उनके आचरण का मार्गदर्शन करतीं, और जैसे आर्या कुन्ती करतीं, वैसे ही सुभद्रा बिना किसी चूक के उनकी देखभाल करती है — बल्कि उससे भी बढ़कर।
श्लोक 28 (3.185.28)
यथाऽनिरुद्धस्य यथाऽभिमन्यो- । र्यथा सुनीथस्य यथैव भानोः । तथा विनेता च गतिश्च कृष्णे । तवात्मजानामपि रौक्मिणेयः ॥
yathā'niruddhasya yathā'bhimanyo- | ryathā sunīthasya yathaiva bhānoḥ | tathā vinetā ca gatiśca kṛṣṇe | tavātmajānāmapi raukmiṇeyaḥ
हे कृष्णे! जैसे रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न अनिरुद्ध, अभिमन्यु, सुनीथ और भानु के शिक्षक और आश्रय हैं, वैसे ही वे तुम्हारे पुत्रों के भी शिक्षक और आश्रय हैं।
श्लोक 29 (3.185.29)
गदासिचर्मग्रहणेषु शूरा- । नस्त्रेषु शिक्षासु रथाश्वयाने । सम्यग्विनेता विनयेदतन्द्री- । स्तांश्चाभिमन्युं च सदा कुमारान् ॥
gadāsicarmagrahaṇeṣu śūrā- | nastreṣu śikṣāsu rathāśvayāne | samyagvinetā vinayedatandrī- | stāṃścābhimanyuṃ ca sadā kumārān
वे कुशल और अथक शिक्षक उन वीर कुमारों को, और अभिमन्यु को भी, सदा गदा, तलवार और ढाल चलाने में, अस्त्रों में, अभ्यास में तथा रथ और घोड़ों की सवारी में शिक्षा देते हैं।
श्लोक 30 (3.185.30)
स चापि सम्यक्प्रणिधाय शिक्षां । शस्त्राणि चैषां विधिवत्प्रदाय । तवात्मजानां च तथाऽभिमन्योः । पराक्रमैस्तुष्यति रौक्मिणेयः ॥
sa cāpi samyakpraṇidhāya śikṣāṃ | śastrāṇi caiṣāṃ vidhivatpradāya | tavātmajānāṃ ca tathā'bhimanyoḥ | parākramaistuṣyati raukmiṇeyaḥ
भली-भाँति शिक्षा देकर और विधिपूर्वक उन्हें शस्त्र प्रदान करके रुक्मिणीनन्दन तुम्हारे पुत्रों तथा अभिमन्यु के पराक्रम से प्रसन्न रहते हैं।
श्लोक 31 (3.185.31)
यथा विहारं प्रसमीक्षमाणाः । प्रयान्ति पुत्रास्तव याज्ञसेनि । एकैकमेषामनुयान्ति यत्र । रथाश्च यानानि च दन्तिनश्च ॥
yathā vihāraṃ prasamīkṣamāṇāḥ | prayānti putrāstava yājñaseni | ekaikameṣāmanuyānti yatra | rathāśca yānāni ca dantinaśca
हे याज्ञसेनी! जब तुम्हारे पुत्र विहार के लिए निकलते हैं, तब उनमें से प्रत्येक के पीछे-पीछे रथ, सवारियाँ और हाथी चलते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 32 (3.185.32)
अथाब्रवीद्धर्मराजं तु कृष्णो । दशार्हयोधाः कुकुरान्धकाश्च । एते निदेशं तव पालयन्त- । स्तिष्ठन्तु यत्रेच्छसि तत्र राजन् ॥
athābravīddharmarājaṃ tu kṛṣṇo | daśārhayodhāḥ kukurāndhakāśca | ete nideśaṃ tava pālayanta- | stiṣṭhantu yatrecchasi tatra rājan
फिर श्रीकृष्ण ने धर्मराज से कहा — "हे राजन्! दाशार्ह योद्धा, कुकुर और अन्धक — ये सब आपकी आज्ञा का पालन करते हुए जहाँ आप चाहें वहाँ डटे रहें।
वासुदेव उवाच
श्लोक 33 (3.185.33)
आवर्ततां कार्मुकवेगवाता । हलायुधप्रग्रहणा मधूनाम् । सेना तवार्थेषु नरेन्द्र यत्ता । ससादिपत्त्यश्वरथा सनागा ॥
āvartatāṃ kārmukavegavātā | halāyudhapragrahaṇā madhūnām | senā tavārtheṣu narendra yattā | sasādipattyaśvarathā sanāgā
हे नरेन्द्र! धनुषों के वेग से आँधी के समान तीव्र, हलायुध बलराम के नेतृत्व वाली मधुवंशियों की सेना — घुड़सवारों, पैदलों, घोड़ों, रथों और हाथियों सहित — आपके कार्य के लिए सन्नद्ध होकर कूच करे।
श्लोक 34 (3.185.34)
प्रस्थाप्यतां पाण्डव धार्तराष्ट्रः । सुयोधनः पापकृतां वरिष्ठः । स सानुबन्धः ससुहद्गणश्च । भौमस्य सौभाधिपतेश्च मार्गम् ॥
prasthāpyatāṃ pāṇḍava dhārtarāṣṭraḥ | suyodhanaḥ pāpakṛtāṃ variṣṭhaḥ | sa sānubandhaḥ sasuhadgaṇaśca | bhaumasya saubhādhipateśca mārgam
हे पाण्डव! पापियों में अग्रणी धृतराष्ट्रपुत्र सुयोधन को उसके सम्बन्धियों और मित्र-मण्डली सहित उसी मार्ग पर भेज दिया जाए, जिस पर भौम (नरकासुर) और सौभ का स्वामी (शाल्व) गए।
श्लोक 35 (3.185.35)
कामं तथा तिष्ठ नरेन्द्र तस्मि- । न्यथा कृतस्ते समयः सभायाम् । दाशार्हयोधैस्तु हतारियोधं । प्रतीक्षतां नागपुरं प्रभग्नम् ॥
kāmaṃ tathā tiṣṭha narendra tasmi- | nyathā kṛtaste samayaḥ sabhāyām | dāśārhayodhaistu hatāriyodhaṃ | pratīkṣatāṃ nāgapuraṃ prabhagnam
या फिर, हे नरेन्द्र, यदि आप चाहें तो सभा में की गई अपनी प्रतिज्ञा पर स्थिर रहें; और दाशार्ह योद्धाओं द्वारा शत्रु-योद्धाओं के मारे जाने से टूटा हुआ हस्तिनापुर आपकी प्रतीक्षा करे।
श्लोक 36 (3.185.36)
व्यपेतमन्युर्व्यपनीतपाप्मा । विहृत्य यत्रेच्छसि तत्र कामम् । ततः समृद्धिप्रभवं विशोकः । प्रपत्स्यसे नागपुरं सराष्ट्रम् ॥
vyapetamanyurvyapanītapāpmā | vihṛtya yatrecchasi tatra kāmam | tataḥ samṛddhiprabhavaṃ viśokaḥ | prapatsyase nāgapuraṃ sarāṣṭram
क्रोध और पाप से मुक्त होकर आप जहाँ चाहें इच्छानुसार विचरें। फिर शोकरहित होकर आप समृद्धि के स्रोत हस्तिनापुर को उसके राष्ट्र सहित प्राप्त करेंगे।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 37 (3.185.37)
ततस्तदाज्ञाय मतं महात्मा । यथावदुक्तं पुरुषोत्तमेन । प्रशस्य विप्रेक्ष्य च धर्मराजः । कृताञ्जलिः केशवमित्युवाच ॥
tatastadājñāya mataṃ mahātmā | yathāvaduktaṃ puruṣottamena | praśasya viprekṣya ca dharmarājaḥ | kṛtāñjaliḥ keśavamityuvāca
तब पुरुषोत्तम द्वारा यथोचित रूप से कहे गए उस मत को समझकर महात्मा धर्मराज ने उसकी प्रशंसा की, और केशव की ओर देखकर हाथ जोड़कर यों कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 38 (3.185.38)
असंशयं केशव पाण्डवानां । भवान्गतिस्त्वच्छरणा हि पार्थाः । कालोदये तच्च ततश्च भूयः । कर्ता भवान्कर्म न संशयोस्ति ॥
asaṃśayaṃ keśava pāṇḍavānāṃ | bhavāngatistvaccharaṇā hi pārthāḥ | kālodaye tacca tataśca bhūyaḥ | kartā bhavānkarma na saṃśayosti
हे केशव! निःसन्देह आप ही पाण्डवों की गति हैं; पार्थ आपकी ही शरण में हैं। समय आने पर आप यह कार्य और उससे भी अधिक करेंगे — इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 39 (3.185.39)
यथाप्रतिज्ञं विहृतश्च कालः । सर्वाः समा द्वादश निर्जनेषु । अज्ञातचर्यां विधिवत्समाप्य । भवद्गताः केशव पाण्डवेयाः ॥
yathāpratijñaṃ vihṛtaśca kālaḥ | sarvāḥ samā dvādaśa nirjaneṣu | ajñātacaryāṃ vidhivatsamāpya | bhavadgatāḥ keśava pāṇḍaveyāḥ
प्रतिज्ञा के अनुसार हमने निर्जन वनों में पूरे बारह वर्ष बिता दिए हैं। अज्ञातवास को विधिपूर्वक पूरा करके, हे केशव, पाण्डव आपकी ही शरण में होंगे।
श्लोक 40 (3.185.40)
एषैव बुद्धिर्जुषतां सदा त्वां । सत्ये स्थिताः केशव पाण्डवेयाः । सदानधर्माः सजनाः सदाराः । सबान्धवास्त्वच्छरणा हि पार्थाः ॥
eṣaiva buddhirjuṣatāṃ sadā tvāṃ | satye sthitāḥ keśava pāṇḍaveyāḥ | sadānadharmāḥ sajanāḥ sadārāḥ | sabāndhavāstvaccharaṇā hi pārthāḥ
हे केशव! हमारी यह बुद्धि सदा आपमें लगी रहे। पाण्डव सत्य में स्थित हैं; दान और धर्म के साथ, अपने जनों, पत्नी और बन्धु-बान्धवों सहित पार्थ आपकी ही शरण में हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 41 (3.185.41)
तथा वदतिवार्ष्णेये धर्मराजे च भारत । अथ पश्चात्तपोवृद्धो बहुवर्षसहस्रधृक् । प्रत्यदृश्यत धर्मात्मा मार्कण्डेयो महातपाः ॥
tathā vadativārṣṇeye dharmarāje ca bhārata | atha paścāttapovṛddho bahuvarṣasahasradhṛk | pratyadṛśyata dharmātmā mārkaṇḍeyo mahātapāḥ
हे भारत! जब वार्ष्णेय श्रीकृष्ण और धर्मराज इस प्रकार बातें कर रहे थे, तभी तप में वृद्ध, अनेक सहस्र वर्षों की आयु वाले धर्मात्मा महातपस्वी मार्कण्डेय वहाँ दिखाई दिए।
श्लोक 42 (3.185.42)
अजरश्चामरश्चैव रूपौदार्यगुणान्वितः । व्यदृश्यत तथा युक्तो यथा स्यात्पञ्चविंशकः ॥
ajaraścāmaraścaiva rūpaudāryaguṇānvitaḥ | vyadṛśyata tathā yukto yathā syātpañcaviṃśakaḥ
जरा और मृत्यु से रहित, रूप, उदारता और गुणों से सम्पन्न वे ऐसे दिखाई दिए मानो पच्चीस वर्ष के युवक हों।
श्लोक 43 (3.185.43)
तमागतमृषिं वृद्धं बहुवर्षसहस्रिणम् । उपातिष्ठन्त ते सर्वेपाण्डवाः सहयादवाः ॥
tamāgatamṛṣiṃ vṛddhaṃ bahuvarṣasahasriṇam | upātiṣṭhanta te sarvepāṇḍavāḥ sahayādavāḥ
अनेक सहस्र वर्षों की आयु वाले उन पधारे हुए वृद्ध ऋषि की सेवा में सब पाण्डव यादवों सहित उपस्थित हुए।
श्लोक 44 (3.185.44)
तमर्चितं सुविश्वस्तमासीनमृषिसत्तमम् । ब्राह्मणानां मतेनाह पाण्डवानां च केशवः ॥
tamarcitaṃ suviśvastamāsīnamṛṣisattamam | brāhmaṇānāṃ matenāha pāṇḍavānāṃ ca keśavaḥ
जब ऋषिश्रेष्ठ का सत्कार हो गया और वे निश्चिन्त होकर आसन पर बैठ गए, तब ब्राह्मणों और पाण्डवों की सम्मति से केशव ने कहा —
वासुदेव उवाच
श्लोक 45 (3.185.45)
शुश्रूषवः पाण्डवास्ते ब्राह्मणाश्च समागताः । द्रौपदी सत्यभामा च तथाऽहंपरमं वचः ॥
śuśrūṣavaḥ pāṇḍavāste brāhmaṇāśca samāgatāḥ | draupadī satyabhāmā ca tathā'haṃparamaṃ vacaḥ
ये पाण्डव, यहाँ एकत्र ब्राह्मण, द्रौपदी, सत्यभामा और मैं — सब आपके श्रेष्ठ वचन सुनने को उत्सुक हैं।
श्लोक 46 (3.185.46)
पुरावृत्ताः कथाः पुण्याः सदाचारान्सनातनान् । राज्ञांस्त्रीणामृषीणां च मार्कण्डेय प्रचक्ष्व नः ॥
purāvṛttāḥ kathāḥ puṇyāḥ sadācārānsanātanān | rājñāṃstrīṇāmṛṣīṇāṃ ca mārkaṇḍeya pracakṣva naḥ
हे मार्कण्डेय! हमें प्राचीन काल की पवित्र कथाएँ, और राजाओं, स्त्रियों तथा ऋषियों के सनातन सदाचार सुनाइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 47 (3.185.47)
तेषु तत्रोपविष्टेषु देवर्षिरपि नारदः । आजगाम विशुद्धात्मा पाण्डवानवलोककः ॥
teṣu tatropaviṣṭeṣu devarṣirapi nāradaḥ | ājagāma viśuddhātmā pāṇḍavānavalokakaḥ
जब वे सब वहाँ बैठे थे, तभी पाण्डवों के दर्शन की इच्छा से विशुद्धात्मा देवर्षि नारद भी आ पहुँचे।
श्लोक 48 (3.185.48)
तमप्यथ महात्मानं सर्वे ते पुरुषर्षभाः । पाद्यार्ध्याभ्यां यथान्यायमुपतस्थुर्मनीषिणः ॥
tamapyatha mahātmānaṃ sarve te puruṣarṣabhāḥ | pādyārdhyābhyāṃ yathānyāyamupatasthurmanīṣiṇaḥ
उन सभी बुद्धिमान पुरुषश्रेष्ठों ने उन महात्मा का भी पाद्य और अर्घ्य से यथोचित स्वागत किया।
श्लोक 49 (3.185.49)
नारदस्त्वथ देवर्षिर्ज्ञात्वा तांस्तु कृतक्षणान् । मार्कण्डेयस्य वदतस्तां कथामन्वमोदत ॥
nāradastvatha devarṣirjñātvā tāṃstu kṛtakṣaṇān | mārkaṇḍeyasya vadatastāṃ kathāmanvamodata
तब देवर्षि नारद ने यह जानकर कि सब सुनने को तैयार हैं, मार्कण्डेय द्वारा कही जाने वाली उस कथा का अनुमोदन किया।
श्लोक 50 (3.185.50)
उवाच चैनं कालज्ञं स्मयन्निव सनारदः । ब्रह्मर्षे कथ्यतां यत्ते पाण्डवेषु विवक्षितम् ॥
uvāca cainaṃ kālajñaṃ smayanniva sanāradaḥ | brahmarṣe kathyatāṃ yatte pāṇḍaveṣu vivakṣitam
और समय को पहचानने वाले नारद ने मानो मुस्कराते हुए उनसे कहा — "हे ब्रह्मर्षि! पाण्डवों से आप जो कहना चाहते हैं, वह कहिए।"
श्लोक 51 (3.185.51)
एवमुक्तः प्रत्युवाच मार्कण्डेयो महातपाः । क्षणं कुरुध्वंविपुलमाख्यातव्यं भविष्यति ॥
evamuktaḥ pratyuvāca mārkaṇḍeyo mahātapāḥ | kṣaṇaṃ kurudhvaṃvipulamākhyātavyaṃ bhaviṣyati
ऐसा कहे जाने पर महातपस्वी मार्कण्डेय ने उत्तर दिया — "आप सब स्थिर होकर बैठ जाइए; बहुत कुछ कहना होगा।"
श्लोक 52 (3.185.52)
एवमुक्ताः क्षणं चक्रुः पाण्डवाः सह तैर्द्विजैः । मध्यंदिने यथादित्यं प्रेक्षन्तस्ते महामुनिम् ॥
evamuktāḥ kṣaṇaṃ cakruḥ pāṇḍavāḥ saha tairdvijaiḥ | madhyaṃdine yathādityaṃ prekṣantaste mahāmunim
ऐसा कहे जाने पर पाण्डव उन ब्राह्मणों के साथ स्थिर होकर बैठ गए और मध्याह्न के सूर्य के समान तेजस्वी उन महामुनि को निहारने लगे।