आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 187
ब्राह्मणों की महिमा: तार्क्ष्य मुनि का पुत्र
पाण्डवों के ब्राह्मणों की महिमा पूछने पर मार्कण्डेय एक हैहय राजकुमार की कथा सुनाते हैं, जिसने शिकार करते समय काले मृगचर्म ओढ़े एक मुनि को मृग समझकर मार डाला। दुखी हैहय राजा अपना अपराध स्वीकार करने तार्क्ष्य अरिष्टनेमि मुनि के पास पहुँचे, और उन्होंने पाया कि मारा गया मुनि उन्हीं का पुत्र था, जो फिर जीवित था। तार्क्ष्य ने बताया कि सत्यनिष्ठा, शुद्ध जीवन, अतिथियों और आश्रितों की सेवा तथा क्षमाशीलता के कारण उन पर मृत्यु का वश नहीं चलता, और राजाओं को निर्भय करके घर लौटा दिया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.187.1)
मार्कण्डेयं महात्मानमूचुः पाण्डुसुतास्तदा । माहात्म्यं द्विजमुख्यानां श्रोतुमिच्छाम कथ्यताम् ॥
mārkaṇḍeyaṃ mahātmānamūcuḥ pāṇḍusutāstadā | māhātmyaṃ dvijamukhyānāṃ śrotumicchāma kathyatām
तब पाण्डुपुत्रों ने महात्मा मार्कण्डेय से कहा — "हम श्रेष्ठ ब्राह्मणों की महिमा सुनना चाहते हैं; कृपया कहिए।"
श्लोक 2 (3.187.2)
एवमुक्तः स भगवान्मार्कण्डेयो महातपाः । उवाच सुमहातेजाः सर्वशास्त्रविशारदः ॥
evamuktaḥ sa bhagavānmārkaṇḍeyo mahātapāḥ | uvāca sumahātejāḥ sarvaśāstraviśāradaḥ
ऐसा कहे जाने पर सब शास्त्रों के ज्ञाता, महान तेजस्वी, महातपस्वी भगवान मार्कण्डेय बोले —
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 3 (3.187.3)
हेहयानां कुलकरो राजा परपुरंजयः । कुमारो रूपसंपन्नो मृगयां व्यचरद्बली ॥
hehayānāṃ kulakaro rājā parapuraṃjayaḥ | kumāro rūpasaṃpanno mṛgayāṃ vyacaradbalī
हैहयों के कुल को आगे बढ़ाने वाला, शत्रुओं के नगर जीतने वाला एक रूपवान और बलवान राजकुमार शिकार खेलने निकला।
श्लोक 4 (3.187.4)
चरमाणस्तु सोऽरण्ये तृणवीरुत्समावृते । कृष्णाजिनोत्तरासङ्गं ददर्श मुनिमन्तिके ॥
caramāṇastu so'raṇye tṛṇavīrutsamāvṛte | kṛṣṇājinottarāsaṅgaṃ dadarśa munimantike
घास और लताओं से ढके वन में घूमते हुए उसने पास ही एक मुनि को देखा, जो काले मृगचर्म को उत्तरीय की तरह ओढ़े हुए थे।
श्लोक 5 (3.187.5)
स तेन हिंसितोऽरण्ये मन्यमानेन वै मृगम् । व्यथितः कर्म तत्कृत्वा शोकोपहतचेतनः ॥
sa tena hiṃsito'raṇye manyamānena vai mṛgam | vyathitaḥ karma tatkṛtvā śokopahatacetanaḥ
उन्हें मृग समझकर उसने वन में ही मार डाला। यह कर्म करके वह व्यथित हो उठा और उसका मन शोक से भर गया।
श्लोक 6 (3.187.6)
जगाम हेहयानां वै सकाशं प्रथितात्मनाम् । राज्ञां राजीवनेत्रोसौ कुमारः पृथिवीपते ॥
jagāma hehayānāṃ vai sakāśaṃ prathitātmanām | rājñāṃ rājīvanetrosau kumāraḥ pṛthivīpate
हे पृथ्वीपति! वह कमलनयन राजकुमार प्रसिद्ध हैहय राजाओं के पास गया
श्लोक 7 (3.187.7)
तेषां च तद्यथावृत्तं कथयामास वै तदा । स कुमारो महीपालो हेहयानां महीभृताम् ॥
teṣāṃ ca tadyathāvṛttaṃ kathayāmāsa vai tadā | sa kumāro mahīpālo hehayānāṃ mahībhṛtām
और उसने तब उन्हें सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों कह सुनाया — वह राजकुमार, जो हैहय राजाओं में पृथ्वी का पालक था।
श्लोक 8 (3.187.8)
तं चापि हिंसितं तात मुनिं मूलफलाशिनम् । श्रुत्वा दृष्ट्वा च ते तत्र बभूवुर्दीनमानसाः ॥
taṃ cāpi hiṃsitaṃ tāta muniṃ mūlaphalāśinam | śrutvā dṛṣṭvā ca te tatra babhūvurdīnamānasāḥ
हे तात! मूल-फल खाकर रहने वाले उस मुनि के मारे जाने की बात सुनकर और उसे देखकर वे सब वहाँ उदास हो गए।
श्लोक 9 (3.187.9)
कस्यायमिति ते सर्वे मार्गमाणास्ततस्ततः । जग्मुश्चारिष्टनाम्नोऽथ तार्क्ष्यस्याश्रममञ्जसा ॥
kasyāyamiti te sarve mārgamāṇāstatastataḥ | jagmuścāriṣṭanāmno'tha tārkṣyasyāśramamañjasā
यह किसका पुत्र है, यह जानने के लिए इधर-उधर खोजते हुए वे सब सीधे अरिष्ट(नेमि) नाम वाले तार्क्ष्य मुनि के आश्रम में पहुँचे।
श्लोक 10 (3.187.10)
तेऽभिवाद्य महात्मानं तं मुनिं संशितव्रतम् । तस्थुः सर्वे स तु मुनिस्तेषां पूजामथाहरत् ॥
te'bhivādya mahātmānaṃ taṃ muniṃ saṃśitavratam | tasthuḥ sarve sa tu munisteṣāṃ pūjāmathāharat
कठोर व्रत वाले उन महात्मा मुनि को प्रणाम करके वे सब खड़े रहे; और मुनि ने उनके लिए अर्घ्य आदि लाकर उनका सत्कार किया।
श्लोक 11 (3.187.11)
ते तमूचुर्महात्मानं न वयं सक्रियां मुने । त्वत्तोऽर्हाः कर्मदोषेण ब्राह्मणो हिंसितो हि नः ॥
te tamūcurmahātmānaṃ na vayaṃ sakriyāṃ mune | tvatto'rhāḥ karmadoṣeṇa brāhmaṇo hiṃsito hi naḥ
उन्होंने उन महात्मा से कहा — "हे मुनि! अपने कर्म-दोष के कारण हम आपसे सत्कार पाने योग्य नहीं हैं; हमसे एक ब्राह्मण की हत्या हो गई है।"
श्लोक 12 (3.187.12)
तानब्रवीत्स विप्रर्षिः कथं वो ब्राह्मणो हतः । क्व चासौ ब्रूत सहिताः पश्यध्वं मे तपोबलम् ॥
tānabravītsa viprarṣiḥ kathaṃ vo brāhmaṇo hataḥ | kva cāsau brūta sahitāḥ paśyadhvaṃ me tapobalam
उन विप्रर्षि ने उनसे कहा — "तुमसे ब्राह्मण की हत्या कैसे हुई? और वह कहाँ है? सब मिलकर बताओ, और मेरे तप का बल देखो।"
श्लोक 13 (3.187.13)
ते तु तत्सर्वमखिलमाख्यायास्मै यथातथम् । नापश्यंस्तमृषिं तत्र गतासुं ते समागताः ॥
te tu tatsarvamakhilamākhyāyāsmai yathātatham | nāpaśyaṃstamṛṣiṃ tatra gatāsuṃ te samāgatāḥ
उन्होंने सारी बात ज्यों-की-त्यों उन्हें बता दी; पर जब वे सब वहाँ पहुँचे, तो उन्हें वह मृत ऋषि दिखाई नहीं दिया।
श्लोक 14 (3.187.14)
अन्वेषमाणाः सव्रीडाः सुप्तवद्गतमानसाः । तानब्रवीत्तत्रमुनिस्तार्क्ष्यः परपुरंजयः ॥
anveṣamāṇāḥ savrīḍāḥ suptavadgatamānasāḥ | tānabravīttatramunistārkṣyaḥ parapuraṃjayaḥ
लज्जित होकर खोजते हुए उनके मन मानो नींद में डूबे-से भ्रमित थे; तब शत्रु-नगरों को जीतने वाले तार्क्ष्य मुनि ने वहाँ उनसे कहा —
तार्क्ष्य उवाच
श्लोक 15 (3.187.15)
स्यादयं ब्राह्मणः सोऽथयुष्माभिर्यो विनाशितः । पुत्रो ह्ययं मम नृपास्तपोबलसमन्वितः ॥
syādayaṃ brāhmaṇaḥ so'thayuṣmābhiryo vināśitaḥ | putro hyayaṃ mama nṛpāstapobalasamanvitaḥ
क्या यही वह ब्राह्मण है, जिसे तुमने मारा था? हे राजाओ! यह तप के बल से सम्पन्न मेरा पुत्र है।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 16 (3.187.16)
ते च दृष्ट्वैव तमृषिं विस्मयं परमं गताः । महदाश्चर्यमिति वै ते ब्रुवाणा महीपते ॥
te ca dṛṣṭvaiva tamṛṣiṃ vismayaṃ paramaṃ gatāḥ | mahadāścaryamiti vai te bruvāṇā mahīpate
हे पृथ्वीपति! उस ऋषि को देखते ही वे परम विस्मय में पड़ गए और कहने लगे — "यह तो महान आश्चर्य है!"
राजान ऊचुः
श्लोक 17 (3.187.17)
मृतो ह्ययमितो दृष्टः कथं जीवितमाप्तवान् । किमेतत्तपसो वीर्यं येनायं जीवितः पुनः । श्रोतुमिच्छामहे विप्र यदि श्रोतव्यमित्युत ॥
mṛto hyayamito dṛṣṭaḥ kathaṃ jīvitamāptavān | kimetattapaso vīryaṃ yenāyaṃ jīvitaḥ punaḥ | śrotumicchāmahe vipra yadi śrotavyamityuta
यह तो यहाँ मरा हुआ देखा गया था; फिर इसे जीवन कैसे मिल गया? यह तप की कैसी शक्ति है, जिससे यह फिर जीवित हो उठा? हे विप्र! यदि सुनाने योग्य हो, तो हम इसे सुनना चाहते हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 18 (3.187.18)
स तानुवाच नास्माकं मृत्युः प्रभवते नृपाः । कारणं च प्रवक्ष्यामि हेतुयोगं समासतः । मृत्युः प्रभवते येन नास्माकं नृपसत्तमाः ॥
sa tānuvāca nāsmākaṃ mṛtyuḥ prabhavate nṛpāḥ | kāraṇaṃ ca pravakṣyāmi hetuyogaṃ samāsataḥ | mṛtyuḥ prabhavate yena nāsmākaṃ nṛpasattamāḥ
उन्होंने उनसे कहा — "हे राजाओ! हम पर मृत्यु का वश नहीं चलता। मैं संक्षेप में इसका कारण और हेतु बताता हूँ — हे नृपश्रेष्ठो! किस कारण मृत्यु हम पर प्रभाव नहीं डाल पाती।
तार्क्ष्य उवाच
श्लोक 19 (3.187.19)
शुद्धाचारादनलसाः संध्योपासनतत्पराः । शुद्धान्नाः शुद्धसदना ब्रह्मचर्यव्रतान्विताः ॥
śuddhācārādanalasāḥ saṃdhyopāsanatatparāḥ | śuddhānnāḥ śuddhasadanā brahmacaryavratānvitāḥ
शुद्ध आचरण के कारण हम आलस्य से रहित हैं और सन्ध्योपासना में तत्पर रहते हैं; हमारा अन्न शुद्ध है, हमारे घर पवित्र हैं, और हम ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करते हैं।
श्लोक 20 (3.187.20)
सत्यमेवाभिजानीमो नानृते कुर्महे मनः । स्वधर्ममनुतिष्ठामस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥
satyamevābhijānīmo nānṛte kurmahe manaḥ | svadharmamanutiṣṭhāmastasmānmṛtyubhayaṃ na naḥ
हम केवल सत्य को जानते हैं और असत्य में मन नहीं लगाते; अपने धर्म का पालन करते हैं — इसलिए हमें मृत्यु का भय नहीं।
श्लोक 21 (3.187.21)
यद्ब्राह्मणानां कुशलं तदेषां कथयामहे । तेषां हि चरितं ब्रूमस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥
yadbrāhmaṇānāṃ kuśalaṃ tadeṣāṃ kathayāmahe | teṣāṃ hi caritaṃ brūmastasmānmṛtyubhayaṃ na naḥ
ब्राह्मणों में जो भला है, उसी का हम वर्णन करते हैं; हम उनके सदाचार की ही चर्चा करते हैं — इसलिए हमें मृत्यु का भय नहीं।
श्लोक 22 (3.187.22)
अतिथीनन्नपानेन भृत्यानत्यशनेन च । संभोज्य शेषमश्नीमस्तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥
atithīnannapānena bhṛtyānatyaśanena ca | saṃbhojya śeṣamaśnīmastasmānmṛtyubhayaṃ na naḥ
हम अतिथियों को अन्न-जल से और आश्रितों को भरपूर भोजन से तृप्त करके बचा हुआ खाते हैं — इसलिए हमें मृत्यु का भय नहीं।
श्लोक 23 (3.187.23)
क्षान्ता दान्ताः क्षमाशीलास्तीर्थदानपरायणाः । पुण्यदेशनिवासाच्च तस्मान्मृत्युभयं न नः । तेजस्विदेशवासाच्च तस्मान्मृत्युभयं न नः ॥
kṣāntā dāntāḥ kṣamāśīlāstīrthadānaparāyaṇāḥ | puṇyadeśanivāsācca tasmānmṛtyubhayaṃ na naḥ | tejasvideśavāsācca tasmānmṛtyubhayaṃ na naḥ
हम सहनशील, संयमी और क्षमाशील हैं, तीर्थ और दान में लगे रहते हैं; पवित्र देशों में निवास करने के कारण हमें मृत्यु का भय नहीं; तेजस्वी सिद्ध पुरुषों के सान्निध्य में रहने के कारण हमें मृत्यु का भय नहीं।
श्लोक 24 (3.187.24)
एतद्वै लेशमात्रं वः समाख्यातं विमत्सराः । गच्छध्वं सहिताः सर्वे न पापाद्भयमस्ति वः ॥
etadvai leśamātraṃ vaḥ samākhyātaṃ vimatsarāḥ | gacchadhvaṃ sahitāḥ sarve na pāpādbhayamasti vaḥ
हे ईर्ष्यारहित राजाओ! यह मैंने तुम्हें केवल संक्षेप में बताया है। अब तुम सब साथ मिलकर जाओ; तुम्हें पाप का कोई भय नहीं।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 25 (3.187.25)
एवमस्त्विति ते सर्वे प्रतिपूज्य महामुनिम् । स्वदेशमगमन्हृष्टा राजानो भरतर्षभ ॥
evamastviti te sarve pratipūjya mahāmunim | svadeśamagamanhṛṣṭā rājāno bharatarṣabha
"ऐसा ही हो" — कहकर उन सब राजाओं ने महामुनि का सम्मान किया, और हे भरतश्रेष्ठ! वे प्रसन्न होकर अपने देश लौट गए।