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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 188

अत्रि, गौतम और राजा वैन्य

मार्कण्डेय ब्राह्मणों की महिमा के प्रसंग में अत्रि की कथा सुनाते हैं, जिन्हें उनकी पत्नी राजर्षि वैन्य के अश्वमेध यज्ञ में जाकर धन माँगने के लिए प्रेरित करती है। जब अत्रि राजा की स्तुति करते हुए उसे मनुष्यों में प्रथम और विधाता कहते हैं, तो गौतम उन्हें फटकारते हैं, और सभा के मुनि यह विवाद सनत्कुमार के पास ले जाते हैं, जो घोषणा करते हैं कि राजा देवताओं के नामों से पुकारा जाता है और सर्वोपरि है। प्रसन्न होकर वैन्य अत्रि को प्रचुर धन देते हैं; अत्रि वह धन अपने पुत्रों को देकर वन चले जाते हैं।

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मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.188.1)

भूय एव तु माहात्म्यं ब्राह्मणानां निबोध मे । वैन्यो नामेह राजर्षिरश्वमेधाय दीक्षितः ॥

bhūya eva tu māhātmyaṃ brāhmaṇānāṃ nibodha me | vainyo nāmeha rājarṣiraśvamedhāya dīkṣitaḥ

मुझसे ब्राह्मणों की महिमा फिर सुनो। यहाँ वैन्य नाम के एक राजर्षि थे, जिन्होंने अश्वमेध यज्ञ की दीक्षा ली थी।

श्लोक 2 (3.188.2)

तमत्रिर्गन्तुमारेभे वित्तार्थमिति नः श्रुतम् । भूयोऽर्थं नानुरुध्यत्स धर्मव्यक्तिनिदर्शनात् ॥

tamatrirgantumārebhe vittārthamiti naḥ śrutam | bhūyo'rthaṃ nānurudhyatsa dharmavyaktinidarśanāt

हमने सुना है कि अत्रि धन के लिए उनके पास जाने को उद्यत हुए। परंतु फिर उन्होंने धन का पीछा नहीं किया, यह देखकर कि फल के रूप में प्रकट हो जाने पर पुण्य क्षीण हो जाता है।

श्लोक 3 (3.188.3)

स विचिन्त्य महातेजा वनमेवान्वरोचयत् । धर्मपत्नीं समाहूय पुत्रांश्चेदमुवाच ह ॥

sa vicintya mahātejā vanamevānvarocayat | dharmapatnīṃ samāhūya putrāṃścedamuvāca ha

सोच-विचार कर उन महातेजस्वी मुनि ने वन जाना ही उचित समझा। उन्होंने अपनी धर्मपत्नी और पुत्रों को बुलाकर यह कहा—

अत्रिरुवाच

श्लोक 4 (3.188.4)

प्राप्स्यामः फलमत्यन्तं बहुलं निरुपद्रवम् । अरण्यगमनं क्षिप्रं रोचतां वो गुणाधिकम् ॥

prāpsyāmaḥ phalamatyantaṃ bahulaṃ nirupadravam | araṇyagamanaṃ kṣipraṃ rocatāṃ vo guṇādhikam

"हम ऐसा फल पाएँगे जो परम, विपुल और सब बाधाओं से रहित है। शीघ्र वन जाना तुम सबको रुचे, क्योंकि उसमें गुण अधिक है।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 5 (3.188.5)

तं भार्या प्रत्युवाचाथ धनमेवानुरुन्धती । वैन्यं गत्वा महात्मानमर्थयस्व धनं बहु ॥

taṃ bhāryā pratyuvācātha dhanamevānurundhatī | vainyaṃ gatvā mahātmānamarthayasva dhanaṃ bahu

तब धन पर ही मन लगाए उनकी पत्नी ने उत्तर दिया— "महात्मा वैन्य के पास जाकर उनसे बहुत-सा धन माँगो।"

भार्योवाच

श्लोक 6 (3.188.6)

स ते दास्यति राजर्षिर्यजमानोऽर्थिने धनम् । तत आदाय विप्रर्षे प्रतिगृह्य धनं बहु ॥

sa te dāsyati rājarṣiryajamāno'rthine dhanam | tata ādāya viprarṣe pratigṛhya dhanaṃ bahu

"यज्ञ कर रहे वे राजर्षि याचक को धन देंगे। हे विप्रर्षि, वहाँ से बहुत-सा धन ग्रहण करके ले आओ,"

श्लोक 7 (3.188.7)

भृत्यान्सुतान्संविभज्य ततो व्रज यथेप्सितम् । एष वै परमो धर्मो धर्मविद्भिरुदाहृतः ॥

bhṛtyānsutānsaṃvibhajya tato vraja yathepsitam | eṣa vai paramo dharmo dharmavidbhirudāhṛtaḥ

"उसे अपने सेवकों और पुत्रों में बाँट दो, फिर जहाँ चाहो चले जाओ। धर्म के ज्ञाताओं ने इसी को परम धर्म कहा है।"

अत्रिरुवाच

श्लोक 8 (3.188.8)

कथितो मे महाभागे गौतमेन महात्मना । वैन्यो धर्मार्थसंयुक्तः सत्यव्रतसमन्वितः ॥

kathito me mahābhāge gautamena mahātmanā | vainyo dharmārthasaṃyuktaḥ satyavratasamanvitaḥ

"हे सौभाग्यवती, महात्मा गौतम ने मुझसे कहा है कि वैन्य धर्म और अर्थ से युक्त हैं और सत्य के व्रत का पालन करते हैं।"

श्लोक 9 (3.188.9)

किंत्वस्ति तत्र द्वेष्टारो निवसन्ति हि मे द्विजाः । यथा मे गौतमः प्राह ततो न व्यवसाम्यहम् ॥

kiṃtvasti tatra dveṣṭāro nivasanti hi me dvijāḥ | yathā me gautamaḥ prāha tato na vyavasāmyaham

"किंतु वहाँ मुझसे द्वेष रखने वाले ब्राह्मण रहते हैं, जैसा गौतम ने मुझे बताया है; इसलिए मैं जाने का निश्चय नहीं कर पाता।"

श्लोक 10 (3.188.10)

तत्र स्म वाचं कल्याणीं धर्मकामार्थसंहिताम् । मयोक्तामन्यथा ब्रूयुस्ततस्ते वै निरर्थकाम् ॥

tatra sma vācaṃ kalyāṇīṃ dharmakāmārthasaṃhitām | mayoktāmanyathā brūyustataste vai nirarthakām

"वहाँ मैं धर्म, काम और अर्थ से युक्त जो भी कल्याणकारी वचन कहूँगा, उसे वे उलटकर निरर्थक बताएँगे।"

श्लोक 11 (3.188.11)

गमिष्यामि महाप्राज्ञे रोचते मे वचस्तव । गाश्च मे दास्यते वैन्यः प्रभूतं चार्थसंचयम् ॥

gamiṣyāmi mahāprājñe rocate me vacastava | gāśca me dāsyate vainyaḥ prabhūtaṃ cārthasaṃcayam

"फिर भी, हे परम बुद्धिमती, मैं जाऊँगा; तुम्हारी बात मुझे अच्छी लगती है। वैन्य मुझे गौएँ और प्रचुर धन-संपदा देंगे।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 12 (3.188.12)

एवमुक्त्वा जगामाशु वैन्ययज्ञं महातपाः । गत्वा च यज्ञायतनमत्रिस्तुष्टाव तं नृपम् ॥

evamuktvā jagāmāśu vainyayajñaṃ mahātapāḥ | gatvā ca yajñāyatanamatristuṣṭāva taṃ nṛpam

यह कहकर वे महातपस्वी शीघ्र ही वैन्य के यज्ञ में गए। यज्ञशाला में पहुँचकर अत्रि ने उस राजा की स्तुति की।

श्लोक 13 (3.188.13)

वाक्यैर्मङ्गलसंयुक्तैः पूजयानोऽब्रवीद्वचः । राजन्धन्यस्त्वमीशश्च भुवि त्वं प्रथमो नृपः । स्तुवन्ति त्वां मुनिगणास्त्वदन्यो नास्ति धर्मवित् ॥

vākyairmaṅgalasaṃyuktaiḥ pūjayāno'bravīdvacaḥ | rājandhanyastvamīśaśca bhuvi tvaṃ prathamo nṛpaḥ | stuvanti tvāṃ munigaṇāstvadanyo nāsti dharmavit

मंगलमय वचनों से उनका सम्मान करते हुए उन्होंने कहा— "हे राजन्, आप धन्य हैं, आप ही स्वामी हैं, पृथ्वी पर आप प्रथम राजा हैं। मुनियों के समूह आपकी स्तुति करते हैं; आपके सिवा कोई धर्म का ज्ञाता नहीं है।"

श्लोक 14 (3.188.14)

तमब्रवीदृषिः क्रुद्धो वचनं वै महातपाः ॥

tamabravīdṛṣiḥ kruddho vacanaṃ vai mahātapāḥ

तब महातपस्वी ऋषि गौतम ने क्रुद्ध होकर उनसे कहा—

गौतम उवाच

श्लोक 15 (3.188.15)

मैवमत्रे पुनर्ब्रूया न ते प्रज्ञा समाहिता । अत्र नः प्रथमो धाता महेन्द्रो वै प्रजापतिः ॥

maivamatre punarbrūyā na te prajñā samāhitā | atra naḥ prathamo dhātā mahendro vai prajāpatiḥ

"हे अत्रि, ऐसा फिर मत कहना; तुम्हारी बुद्धि स्थिर नहीं है। यहाँ हमारे प्रथम विधाता तो प्रजापति महेन्द्र हैं।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 16 (3.188.16)

अथात्रिरपि राजेन्द्र गौतमं प्रत्यभाषत । अयमेव विधाता च तथैवेन्द्रः प्रजापतिः । त्वमेव मुह्यसे मोहान्न प्रज्ञानं तवास्ति ह ॥

athātrirapi rājendra gautamaṃ pratyabhāṣata | ayameva vidhātā ca tathaivendraḥ prajāpatiḥ | tvameva muhyase mohānna prajñānaṃ tavāsti ha

हे राजेन्द्र, तब अत्रि ने भी गौतम को उत्तर दिया— "यही राजा विधाता है और वही इन्द्र तथा प्रजापति भी है। मोह के कारण तुम ही भ्रम में हो; तुममें समझ नहीं है।"

गौतम उवाच

श्लोक 17 (3.188.17)

जानामि नाहं मुह्यामि त्वंविवक्षुर्विमुह्यसे । स्तौषि त्वं दर्शनप्रेप्सू राजानं जनसंसदि ॥

jānāmi nāhaṃ muhyāmi tvaṃvivakṣurvimuhyase | stauṣi tvaṃ darśanaprepsū rājānaṃ janasaṃsadi

"मैं जानता हूँ, मैं भ्रम में नहीं हूँ; बोलने की उतावली में तुम ही भ्रमित हो रहे हो। राजा की कृपादृष्टि पाने की लालसा से तुम जनसभा में उसकी स्तुति कर रहे हो।"

श्लोक 18 (3.188.18)

न वेत्थ परमं धर्मं न चास्त्यत्र प्रयोजनम् । बालस्त्वमसि मूढश्च वृद्धः केनापि हेतुना ॥

na vettha paramaṃ dharmaṃ na cāstyatra prayojanam | bālastvamasi mūḍhaśca vṛddhaḥ kenāpi hetunā

"तुम परम धर्म को नहीं जानते, और इससे यहाँ कोई प्रयोजन भी सिद्ध नहीं होता। तुम बालक हो और मूढ़ हो; यों ही किसी कारण से बूढ़े हो गए हो।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 19 (3.188.19)

विवदन्तौ तथा तौ तु मुनीनां दर्शने स्थितौ । ये तस्य यज्ञे संवृत्तास्तेऽपृच्छन्त कथं त्विमौ ॥

vivadantau tathā tau tu munīnāṃ darśane sthitau | ye tasya yajñe saṃvṛttāste'pṛcchanta kathaṃ tvimau

इस प्रकार वे दोनों मुनियों की दृष्टि के सामने खड़े विवाद कर रहे थे, तब उस यज्ञ में एकत्र हुए लोगों ने उनके विषय में पूछा—

मुनय ऊचुः

श्लोक 20 (3.188.20)

प्रवेशः केन दत्तोऽयमनयोर्वैन्यसंसदि । उच्चैः समभिभाषन्तौ केन कार्येण विष्ठितौ ॥

praveśaḥ kena datto'yamanayorvainyasaṃsadi | uccaiḥ samabhibhāṣantau kena kāryeṇa viṣṭhitau

"ये दोनों वैन्य की सभा में कैसे आ गए? इन्हें प्रवेश किसने दिया? किस काम से ये यहाँ खड़े होकर इतने ऊँचे स्वर में बोल रहे हैं?"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 21 (3.188.21)

ततः परमधर्मात्मा काश्यपः सर्वधर्मवित् । विवादिनावनुप्राप्तौ तावुभौ प्रत्यवेदयत् ॥

tataḥ paramadharmātmā kāśyapaḥ sarvadharmavit | vivādināvanuprāptau tāvubhau pratyavedayat

तब परम धर्मात्मा और समस्त धर्म के ज्ञाता कश्यप ने उन्हें बताया कि ये दोनों विवाद करते हुए यहाँ आए हैं।

श्लोक 22 (3.188.22)

अथाब्रवीत्सदस्यांस्तु गौतमो मुनिसत्तमान् । आवयोर्व्याहृतं प्रश्नं शृणुत द्विजसत्तमाः । वैन्यं विधातेत्याहात्रिरत्र नौ संशयो महान् ॥

athābravītsadasyāṃstu gautamo munisattamān | āvayorvyāhṛtaṃ praśnaṃ śṛṇuta dvijasattamāḥ | vainyaṃ vidhātetyāhātriratra nau saṃśayo mahān

तब गौतम ने सभा के सदस्यों, उन श्रेष्ठ मुनियों से कहा— "हे श्रेष्ठ द्विजो, हम दोनों के बीच उठे प्रश्न को सुनिए। अत्रि कहते हैं कि वैन्य विधाता हैं; इस पर हम दोनों में बड़ा विवाद है।"

श्लोक 23 (3.188.23)

ततस्तु गौतमेनोक्तं वाक्यं वैन्यस्य संसदि । श्रुत्वैव तु महात्मानो मुनयोऽभ्यद्रवन्द्रुतम् ॥

tatastu gautamenoktaṃ vākyaṃ vainyasya saṃsadi | śrutvaiva tu mahātmāno munayo'bhyadravandrutam

वैन्य की सभा में गौतम के कहे वचन सुनते ही वे महात्मा मुनि तुरंत दौड़कर

श्लोक 24 (3.188.24)

सनत्कुमारं धर्मज्ञं संशयच्छेदनाय वै । पप्रच्छुः प्रणताः सर्वे ब्रह्माणमिव सोमपाः ॥

sanatkumāraṃ dharmajñaṃ saṃśayacchedanāya vai | papracchuḥ praṇatāḥ sarve brahmāṇamiva somapāḥ

संशय मिटाने के लिए धर्मज्ञ सनत्कुमार के पास गए। सबने प्रणाम करके उनसे वैसे ही पूछा जैसे सोमपान करने वाले ब्रह्मा से पूछते हैं।

श्लोक 25 (3.188.25)

स च तेषां वचः श्रुत्वा यथातत्त्वं महातपाः । प्रत्युवाचाथ तानेवं धर्मार्थसहितं वचः ॥

sa ca teṣāṃ vacaḥ śrutvā yathātattvaṃ mahātapāḥ | pratyuvācātha tānevaṃ dharmārthasahitaṃ vacaḥ

उनकी बात सुनकर उन महातपस्वी ने यथार्थ रूप से, धर्म और अर्थ से युक्त ये वचन कहे—

सनत्कुमार उवाच

श्लोक 26 (3.188.26)

ब्रह्म क्षत्रेण सहितं क्षत्रं च ब्रह्मणा सह । संयुक्तौ दहतः शत्रून्वनानीवाग्निमारुतौ ॥

brahma kṣatreṇa sahitaṃ kṣatraṃ ca brahmaṇā saha | saṃyuktau dahataḥ śatrūnvanānīvāgnimārutau

"ब्राह्मण-शक्ति क्षत्रिय-शक्ति के साथ और क्षत्रिय-शक्ति ब्राह्मण-शक्ति के साथ मिलकर शत्रुओं को वैसे ही जला डालती हैं जैसे अग्नि और वायु मिलकर वनों को।"

श्लोक 27 (3.188.27)

राजा वै प्रथितो धर्मः प्रजानां पतिरेव च । स एव शक्रः शुक्रश्च स धाता च बृहस्पतिः ॥

rājā vai prathito dharmaḥ prajānāṃ patireva ca | sa eva śakraḥ śukraśca sa dhātā ca bṛhaspatiḥ

"राजा धर्म-स्वरूप के रूप में प्रसिद्ध है और प्रजाओं का स्वामी भी है। वही इन्द्र है, वही शुक्र है, वही धाता और बृहस्पति है।"

श्लोक 28 (3.188.28)

प्रजापतिर्विराट् सम्राट् क्षत्रियो भूपतिर्नृपः । य एभिः स्तूयते शब्दैः कस्तं नार्चितुमर्हति ॥

prajāpatirvirāṭ samrāṭ kṣatriyo bhūpatirnṛpaḥ | ya ebhiḥ stūyate śabdaiḥ kastaṃ nārcitumarhati

"प्रजापति, विराट्, सम्राट्, क्षत्रिय, भूपति, नृप—जिसकी इन नामों से स्तुति होती है, उसका आदर कौन नहीं करेगा?"

श्लोक 29 (3.188.29)

पुरायोनिर्युधाजिच्च अभीष्टानचितो भवः । स्वर्णेता सहजिद्बभ्रुरिति राजाऽभिधीयते । सत्ययोनिः पुराविच्च सत्यधर्मप्रवर्तकः ॥

purāyoniryudhājicca abhīṣṭānacito bhavaḥ | svarṇetā sahajidbabhruriti rājā'bhidhīyate | satyayoniḥ purāvicca satyadharmapravartakaḥ

"राजा को पुरायोनि, युधाजित्, अभीष्ट, अनचित, भव, स्वर्णेता, सहजित् और बभ्रु कहा जाता है; और सत्ययोनि, पुराविद् तथा सत्य धर्म का प्रवर्तक भी।"

श्लोक 30 (3.188.30)

अधर्मादृषयो भीता बलं क्षत्रे समादधन् । तस्माद्धि ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रेण ब्रह्म चाव्ययम् ॥

adharmādṛṣayo bhītā balaṃ kṣatre samādadhan | tasmāddhi brahmaṇā kṣatraṃ kṣatreṇa brahma cāvyayam

"अधर्म से भयभीत होकर ऋषियों ने क्षत्रिय में बल स्थापित किया। इसलिए ब्राह्मण से क्षत्रिय और क्षत्रिय से ब्राह्मण अक्षय बना रहता है।"

श्लोक 31 (3.188.31)

आदित्यो दिवि देवेषु तमो नुदति तेजसा । तथैव नृपतिर्भूमावधर्मान्नुदते भृशम् ॥

ādityo divi deveṣu tamo nudati tejasā | tathaiva nṛpatirbhūmāvadharmānnudate bhṛśam

"जैसे आकाश में देवताओं के बीच सूर्य अपने तेज से अंधकार को दूर करता है, वैसे ही पृथ्वी पर राजा अधर्म को दृढ़ता से दूर करता है।"

श्लोक 32 (3.188.32)

ततो राज्ञः प्रधानत्वं शास्त्रप्रामाण्यदर्शनात् । उत्तरः सिद्ध्यते पक्षो येन राजेति भाषितम् ॥

tato rājñaḥ pradhānatvaṃ śāstraprāmāṇyadarśanāt | uttaraḥ siddhyate pakṣo yena rājeti bhāṣitam

"अतः शास्त्रों के प्रमाण से राजा की प्रधानता सिद्ध होती है, और बाद वाला पक्ष—जिसने राजा को विधाता कहा—सिद्ध होता है।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 33 (3.188.33)

ततः स राजा संहृष्टः सिद्धे पक्षे महामनाः । तमत्रिमब्रवीत्प्रीतः पूर्वं येनाभिसंस्तुतः ॥

tataḥ sa rājā saṃhṛṣṭaḥ siddhe pakṣe mahāmanāḥ | tamatrimabravītprītaḥ pūrvaṃ yenābhisaṃstutaḥ

तब अपने पक्ष के सिद्ध हो जाने पर वे उदारचित्त राजा अत्यंत हर्षित हुए और प्रसन्न होकर उन अत्रि से बोले जिन्होंने पहले उनकी स्तुति की थी—

वैन्य उवाच

श्लोक 34 (3.188.34)

यस्मात्पूर्वं मनुष्येषु ज्यायांसं मामिहाब्रवीः । सर्वदेवैश्च विप्रर्षे संमितं श्रेष्ठमेव च ॥

yasmātpūrvaṃ manuṣyeṣu jyāyāṃsaṃ māmihābravīḥ | sarvadevaiśca viprarṣe saṃmitaṃ śreṣṭhameva ca

"हे विप्रर्षि, चूँकि आपने पहले यहाँ मुझे मनुष्यों में सबसे बड़ा, सब देवताओं के समान और श्रेष्ठ कहा,"

श्लोक 35 (3.188.35)

तस्मात्तेऽहंप्रदास्यामि विविधं वसु भूरि च । दासीसहस्रं श्यामानां सुवस्त्राणामलंकृतम् ॥

tasmātte'haṃpradāsyāmi vividhaṃ vasu bhūri ca | dāsīsahasraṃ śyāmānāṃ suvastrāṇāmalaṃkṛtam

"इसलिए मैं आपको अनेक प्रकार का प्रचुर धन दूँगा—सुंदर वस्त्र पहने, अलंकृत एक हज़ार श्यामवर्णा दासियाँ,"

श्लोक 36 (3.188.36)

दशकोटीर्हिरण्यस्य रुक्मभारांस्तथा दश । एतद्ददामि विप्रर्षे सर्वज्ञस्त्वं मतो हि मे ॥

daśakoṭīrhiraṇyasya rukmabhārāṃstathā daśa | etaddadāmi viprarṣe sarvajñastvaṃ mato hi me

"दस करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ और दस भार सोना भी। हे विप्रर्षि, यह सब मैं आपको देता हूँ, क्योंकि मैं आपको सर्वज्ञ मानता हूँ।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 37 (3.188.37)

तदत्रिर्न्यायतः सर्वं प्रतिगृह्याभिसत्कृतः । प्रत्युज्जगाम तेजस्वी गृहानेव महातपाः ॥

tadatrirnyāyataḥ sarvaṃ pratigṛhyābhisatkṛtaḥ | pratyujjagāma tejasvī gṛhāneva mahātapāḥ

सम्मानित होकर अत्रि ने वह सब विधिपूर्वक स्वीकार किया, और वे तेजस्वी महातपस्वी अपने घर लौट गए।

श्लोक 38 (3.188.38)

प्रदाय च धनं प्रीतः पुत्रेभ्यः प्रयतात्मवान् । ततः समभिसंधाय वनमेवान्वपद्यत ॥

pradāya ca dhanaṃ prītaḥ putrebhyaḥ prayatātmavān | tataḥ samabhisaṃdhāya vanamevānvapadyata

प्रसन्न होकर उन्होंने वह धन अपने पुत्रों को दे दिया, और फिर संयमित मन से दृढ़ संकल्प करके वन को चले गए।

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