आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 189
सरस्वती का तार्क्ष्य को उपदेश
मार्कण्डेय बताते हैं कि बुद्धिमान मुनि तार्क्ष्य के परम कल्याण के विषय में पूछने पर देवी सरस्वती ने उन्हें क्या उपदेश दिया। वे ब्रह्मज्ञान तथा गौ, बैल, वस्त्र, स्वर्ण, भूमि और कन्या के दान से मिलने वाले दिव्य लोकों का वर्णन करती हैं, और बताती हैं कि अग्निहोत्र कौन और कैसे करे। यह प्रकट करके कि वे अग्निहोत्र से आई हैं, वे अंत में मुक्त पुरुषों के उस परम, सनातन धाम का वर्णन करती हैं जहाँ सुगंधित वेतस वृक्ष और मधु की नदियाँ हैं, और जहाँ देवताओं ने यज्ञ किए थे।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.189.1)
अत्रैव च सरस्वत्या गीतं परपुरंजय । पृष्टया मुनिना वीर शृणु तार्क्ष्येण धीमता ॥
atraiva ca sarasvatyā gītaṃ parapuraṃjaya | pṛṣṭayā muninā vīra śṛṇu tārkṣyeṇa dhīmatā
हे शत्रुओं के नगर जीतने वाले वीर, इसी विषय में बुद्धिमान मुनि तार्क्ष्य के पूछने पर सरस्वती ने जो कहा था, उसे सुनो।
तार्क्ष्य उवाच
श्लोक 2 (3.189.2)
किं नु श्रेयः पुरुषस्येह भद्रे । कथं कुर्वन्न च्यवते स्वधर्मात् । आचक्ष्व मे चारुसर्वाङ्गि सर्वं । त्वया शिष्टो न च्यवेयं स्वधर्मात् ॥
kiṃ nu śreyaḥ puruṣasyeha bhadre | kathaṃ kurvanna cyavate svadharmāt | ācakṣva me cārusarvāṅgi sarvaṃ | tvayā śiṣṭo na cyaveyaṃ svadharmāt
"हे भद्रे, इस संसार में मनुष्य का परम कल्याण क्या है? वह कैसे आचरण करे कि अपने धर्म से न गिरे? हे सर्वांगसुंदरी, मुझे सब कुछ बताओ; तुम्हारी शिक्षा पाकर मैं अपने धर्म से नहीं गिरूँगा।"
श्लोक 3 (3.189.3)
कथं चाग्निं जुहुयां पूजये वा । कस्मिन्काले केन धर्मो न नश्येत् । एतत्सर्वं सुभगे प्रब्रवीहि । यथा लोकान्विरजाः संचरेयम् ॥
kathaṃ cāgniṃ juhuyāṃ pūjaye vā | kasminkāle kena dharmo na naśyet | etatsarvaṃ subhage prabravīhi | yathā lokānvirajāḥ saṃcareyam
"मैं अग्नि में आहुति कैसे दूँ, या पूजा कैसे करूँ? किस समय और किस उपाय से धर्म नष्ट नहीं होता? हे सुभगे, यह सब मुझे बताओ, जिससे मैं रजोगुण से रहित होकर लोकों में विचरण कर सकूँ।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 4 (3.189.4)
एवं पृष्टा प्रीतियुक्तेन तेन । शुश्रूषुणा चोत्तमबुद्धियुक्तम् । तार्क्ष्यं विप्रं धर्मयुक्तं हितं च । सरस्वती वाक्यमिदं बभाषे ॥
evaṃ pṛṣṭā prītiyuktena tena | śuśrūṣuṇā cottamabuddhiyuktam | tārkṣyaṃ vipraṃ dharmayuktaṃ hitaṃ ca | sarasvatī vākyamidaṃ babhāṣe
सुनने को उत्सुक, उत्तम बुद्धि से युक्त, धर्मनिष्ठ और हितकारी ब्राह्मण तार्क्ष्य के द्वारा प्रेमपूर्वक इस प्रकार पूछे जाने पर सरस्वती ने यह वचन कहा—
सरस्वत्युवाच
श्लोक 5 (3.189.5)
यो ब्रह्म जानाति यथोपदेशं । स्वाध्यायनित्यः शुचिरप्रमत्तः । स वै पुरो देवलोकस्य गन्ता । सहामरैः प्राप्नुयात्प्रीतियोगम् ॥
yo brahma jānāti yathopadeśaṃ | svādhyāyanityaḥ śucirapramattaḥ | sa vai puro devalokasya gantā | sahāmaraiḥ prāpnuyātprītiyogam
"जो उपदेश के अनुसार ब्रह्म को जानता है, नित्य स्वाध्याय करता है, पवित्र और सावधान रहता है, वह आगे बढ़कर देवलोक को जाता है और देवताओं के साथ आनंदमय संग पाता है।"
श्लोक 6 (3.189.6)
तत्र स्म रम्या विपुला विशोकाः । सुपुष्पिताः पुष्करिण्यः सुपुण्याः । अकर्दमा मीनवत्यः सुतीर्था । हिरण्मयैरावृताः पुण्डरीकैः ॥
tatra sma ramyā vipulā viśokāḥ | supuṣpitāḥ puṣkariṇyaḥ supuṇyāḥ | akardamā mīnavatyaḥ sutīrthā | hiraṇmayairāvṛtāḥ puṇḍarīkaiḥ
"वहाँ रमणीय, विशाल, शोकरहित, फूलों से भरे और अत्यंत पवित्र सरोवर हैं—कीचड़ से रहित, मछलियों से भरे, सुंदर घाटों वाले और स्वर्णिम कमलों से ढके हुए।"
श्लोक 7 (3.189.7)
तासां तीरेष्वासते पुण्यभाजो । महीयमानाः पृथगप्सरोभिः । सुपुण्यगन्धाभिरलंकृताभि- । र्हिरण्यवर्णाभिरतीव हृष्टाः ॥
tāsāṃ tīreṣvāsate puṇyabhājo | mahīyamānāḥ pṛthagapsarobhiḥ | supuṇyagandhābhiralaṃkṛtābhi- | rhiraṇyavarṇābhiratīva hṛṣṭāḥ
"उनके तटों पर पुण्य के भागी लोग बैठे रहते हैं; पवित्र सुगंध से अलंकृत, सुनहरे वर्ण वाली अप्सराएँ अलग-अलग उनका सत्कार करती हैं, और वे अत्यंत प्रसन्न रहते हैं।"
श्लोक 8 (3.189.8)
परं लोकं गोप्रदास्त्वाप्नुवन्ति । दत्त्वाऽनड्वाहं सूर्यलोकं व्रजन्ति । वासो दत्त्वा चान्द्रमसं तु लोकं । दत्त्वा हिरण्यममरत्वमेति ॥
paraṃ lokaṃ gopradāstvāpnuvanti | dattvā'naḍvāhaṃ sūryalokaṃ vrajanti | vāso dattvā cāndramasaṃ tu lokaṃ | dattvā hiraṇyamamaratvameti
"गौ का दान करने वाले परम लोक को पाते हैं; बैल का दान करके लोग सूर्यलोक को जाते हैं। वस्त्र देकर मनुष्य चंद्रलोक पाता है और सोना देकर अमरत्व प्राप्त करता है।"
श्लोक 9 (3.189.9)
धेनुं दत्त्वा सुप्रमां साधुदोहां । कल्याणवत्सामपलायिनीं च । यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- । स्तावद्वर्षाण्यासते देवलोके ॥
dhenuṃ dattvā supramāṃ sādhudohāṃ | kalyāṇavatsāmapalāyinīṃ ca | yāvanti romāṇi bhavanti tasyā- | stāvadvarṣāṇyāsate devaloke
"जो सुडौल, आसानी से दुही जाने वाली, अच्छे बछड़े वाली और भटकने वाली न हो, ऐसी गौ का दान करता है, वह उस गौ के शरीर पर जितने रोम हैं उतने वर्षों तक देवलोक में रहता है।"
श्लोक 10 (3.189.10)
अनड्वाहं सुव्रतं यो ददाति । हलस्य वोढारमनन्तवीर्यम् । धुरंधरं बलवन्तं युवानं । प्राप्नोति लोकान्दशधेनुदस्य ॥
anaḍvāhaṃ suvrataṃ yo dadāti | halasya voḍhāramanantavīryam | dhuraṃdharaṃ balavantaṃ yuvānaṃ | prāpnoti lokāndaśadhenudasya
"जो हल खींचने वाला, अपार बलशाली, जुए को धारण करने में समर्थ, बलवान, जवान और अच्छी तरह सधा हुआ बैल दान करता है, वह दस गौएँ देने वाले के लोकों को पाता है।"
श्लोक 11 (3.189.11)
ददाति यो वै कपिलां सचैलां । कांस्योपदोहां द्रविणैरुत्तरीयैः । तैस्तैर्गुणैः कामदुहाऽथ भूत्वा । नरं प्रदातारमुपैति नाकैः ॥
dadāti yo vai kapilāṃ sacailāṃ | kāṃsyopadohāṃ draviṇairuttarīyaiḥ | taistairguṇaiḥ kāmaduhā'tha bhūtvā | naraṃ pradātāramupaiti nākaiḥ
"जो वस्त्र से ढकी, काँसे के दोहन-पात्र सहित और साथ में धन की दक्षिणा के साथ कपिला गौ का दान करता है, वह गौ उन्हीं गुणों से कामधेनु बनकर स्वर्ग में दाता के पास पहुँचती है।"
श्लोक 12 (3.189.12)
यावन्ति रोमाणि भवन्ति धेन्वा- । स्तावत्फलं लभते गोप्रदाने । पुत्रांश्च पौत्रांश्च कुलं च सर्व- । मासप्तमं तारयते परत्र ॥
yāvanti romāṇi bhavanti dhenvā- | stāvatphalaṃ labhate gopradāne | putrāṃśca pautrāṃśca kulaṃ ca sarva- | māsaptamaṃ tārayate paratra
"गौ के शरीर पर जितने रोम होते हैं, गोदान से उतना ही फल मिलता है। वह अपने पुत्रों, पौत्रों और सातवीं पीढ़ी तक सारे कुल को परलोक में तार देता है।"
श्लोक 13 (3.189.13)
सदक्षिणां काञ्चनचारुशृङ्गीं । कांस्योपदोहां द्रविणैरुत्तरीयैः । धेनुं तिलानां ददतो द्विजाय । लोका वसूनां सुलभा भवन्ति ॥
sadakṣiṇāṃ kāñcanacāruśṛṅgīṃ | kāṃsyopadohāṃ draviṇairuttarīyaiḥ | dhenuṃ tilānāṃ dadato dvijāya | lokā vasūnāṃ sulabhā bhavanti
"जो ब्राह्मण को दक्षिणा सहित, सोने के सुंदर सींगों वाली, काँसे के दोहन-पात्र और अतिरिक्त धन के साथ तिलों की गौ देता है, उसके लिए वसुओं के लोक सुलभ हो जाते हैं।"
श्लोक 14 (3.189.14)
स्वकर्मभिर्दानवसंनिरुद्धे । तीव्रान्धकारे नरके पतन्तम् । महार्णवे नौरिव वातयुक्ता । दानं गवां तारयते परत्र ॥
svakarmabhirdānavasaṃniruddhe | tīvrāndhakāre narake patantam | mahārṇave nauriva vātayuktā | dānaṃ gavāṃ tārayate paratra
"अपने कर्मों के कारण दानवों से घिरकर घोर अंधकार वाले नरक में गिरते हुए मनुष्य को गोदान परलोक में वैसे ही पार लगा देता है जैसे हवा से चलने वाली नाव महासागर को पार कराती है।"
श्लोक 15 (3.189.15)
यो ब्राह्मदेयां तु ददाति कन्यां । भूमिप्रदानं च करोति विप्रे । ददाति दानं विधिना च यश्च । स लोकमाप्नोति पुरंदरस्य ॥
yo brāhmadeyāṃ tu dadāti kanyāṃ | bhūmipradānaṃ ca karoti vipre | dadāti dānaṃ vidhinā ca yaśca | sa lokamāpnoti puraṃdarasya
"जो ब्राह्म विधि से कन्या का दान करता है, ब्राह्मण को भूमि दान करता है और विधिपूर्वक दान देता है, वह पुरंदर (इन्द्र) के लोक को प्राप्त होता है।"
श्लोक 16 (3.189.16)
यः सप्तवर्षाणि जुहोति तार्क्ष्य । हव्यं त्वग्नौ नियतः साधुशीलः । सप्तावरान्सप्तपूर्वान्पुनाति । पितामहानात्मना कर्मभिः स्वैः ॥
yaḥ saptavarṣāṇi juhoti tārkṣya | havyaṃ tvagnau niyataḥ sādhuśīlaḥ | saptāvarānsaptapūrvānpunāti | pitāmahānātmanā karmabhiḥ svaiḥ
"हे तार्क्ष्य, जो संयमी और सदाचारी पुरुष सात वर्ष तक अग्नि में हवि की आहुति देता है, वह अपने कर्मों से अपनी सात आगे की और सात पिछली पीढ़ियों के पितरों को पवित्र कर देता है।"
तार्क्ष्य उवाच
श्लोक 17 (3.189.17)
किमग्निहोत्रस्य व्रतं पुराण- । माचक्ष्व मे पृच्छतश्चारुरूपे । त्वयाऽनुशिष्टोऽहमिहाद्य विद्यां । यदग्निहोत्रस्य व्रतं पुराणम् ॥
kimagnihotrasya vrataṃ purāṇa- | mācakṣva me pṛcchataścārurūpe | tvayā'nuśiṣṭo'hamihādya vidyāṃ | yadagnihotrasya vrataṃ purāṇam
"अग्निहोत्र का प्राचीन व्रत क्या है? हे सुंदरी, मैं पूछ रहा हूँ, मुझे बताओ। तुम्हारी शिक्षा पाकर मैं आज अग्निहोत्र का वह प्राचीन व्रत जान लूँ।"
सरस्वत्युवाच
श्लोक 18 (3.189.18)
न चाशुचिर्नाप्यनिर्णिक्तपाणि- । र्नाब्रह्मविज्जुहुयान्नाविपश्चित् । बुभुत्सवः शुचिकामा हि देवा । नाश्रद्दधानाद्धि हविर्जुषन्ति ॥
na cāśucirnāpyanirṇiktapāṇi- | rnābrahmavijjuhuyānnāvipaścit | bubhutsavaḥ śucikāmā hi devā | nāśraddadhānāddhi havirjuṣanti
"न अपवित्र, न बिना हाथ धोए, न ब्रह्म को न जानने वाला और न अज्ञानी आहुति दे। ज्ञान के इच्छुक और पवित्रता-प्रिय देवता श्रद्धाहीन की हवि स्वीकार नहीं करते।"
श्लोक 19 (3.189.19)
नाश्रोत्रियं देवहव्ये नियुञ्ज्या- । न्मोघं पुरा सिञ्चति तादृशो हि । अपूर्णमश्रोत्रियमाह तार्क्ष्य । न वै तादृग्जुहुयादग्निहोत्रम् ॥
nāśrotriyaṃ devahavye niyuñjyā- | nmoghaṃ purā siñcati tādṛśo hi | apūrṇamaśrotriyamāha tārkṣya | na vai tādṛgjuhuyādagnihotram
"देवताओं की आहुति में वेद न जानने वाले को नियुक्त नहीं करना चाहिए; ऐसा व्यक्ति आरंभ से ही व्यर्थ आहुति डालता है। हे तार्क्ष्य, वेद अश्रोत्रिय को अपूर्ण कहता है; ऐसे व्यक्ति को अग्निहोत्र नहीं करना चाहिए।"
श्लोक 20 (3.189.20)
ये वै कृशानुं जुह्वति श्रद्दधानाः । सत्यव्रता हुतशिष्टाशिनश्च । गवां लोकं प्राप्य ते पुण्यगन्धं । पश्यन्ति देवं परमं चापि सत्यम् ॥
ye vai kṛśānuṃ juhvati śraddadhānāḥ | satyavratā hutaśiṣṭāśinaśca | gavāṃ lokaṃ prāpya te puṇyagandhaṃ | paśyanti devaṃ paramaṃ cāpi satyam
"जो श्रद्धा के साथ अग्नि में आहुति देते हैं, सत्य-व्रत का पालन करते हैं और यज्ञ से बचा अन्न ही खाते हैं, वे पवित्र सुगंध वाले गोलोक को पाकर परम देव, परम सत्य का दर्शन करते हैं।"
तार्क्ष्य उवाच
श्लोक 21 (3.189.21)
क्षेत्रज्ञभूतां परलोकभावे । कर्मोदये बुद्धिमभिप्रविष्टाम् । प्रज्ञां च देवीं सुभगे विमृश्य । पृच्छामि त्वां का ह्यसि चारुरूपे ॥
kṣetrajñabhūtāṃ paralokabhāve | karmodaye buddhimabhipraviṣṭām | prajñāṃ ca devīṃ subhage vimṛśya | pṛcchāmi tvāṃ kā hyasi cārurūpe
"परलोक की स्थिति और कर्मफल के उदय में क्षेत्रज्ञ में प्रविष्ट बुद्धि और दिव्य प्रज्ञा के रूप में तुम्हारा विचार करके, हे सुभगे, हे सुंदरी, मैं तुमसे पूछता हूँ—तुम कौन हो?"
सरस्वत्युवाच
श्लोक 22 (3.189.22)
अग्निहोत्रादहमभ्यागताऽस्मि । विप्रर्षभाणां संशयच्छेदनाय । त्वत्संयोगादहमेतदब्रुवं । भावे स्थिता तथ्यमर्थं यथावत् ॥
agnihotrādahamabhyāgatā'smi | viprarṣabhāṇāṃ saṃśayacchedanāya | tvatsaṃyogādahametadabruvaṃ | bhāve sthitā tathyamarthaṃ yathāvat
"मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणों के संशय मिटाने के लिए अग्निहोत्र से आई हूँ। तुम्हारे संग के कारण अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित होकर मैंने तुमसे यह यथार्थ बात, जैसी है वैसी, कही है।"
तार्क्ष्य उवाच
श्लोक 23 (3.189.23)
न हि त्वया सदृशी काचिदस्ति । विभ्राजसे ह्यतिमात्रं यथा श्रीः । रूपं च ते दिव्यमनन्तकान्ति । प्रज्ञां च देवीं सुभगे बिभर्षि ॥
na hi tvayā sadṛśī kācidasti | vibhrājase hyatimātraṃ yathā śrīḥ | rūpaṃ ca te divyamanantakānti | prajñāṃ ca devīṃ subhage bibharṣi
"तुम्हारे समान कोई नहीं है; तुम लक्ष्मी की भाँति अत्यधिक दमकती हो। तुम्हारा रूप दिव्य और अनंत कांति वाला है, और हे सुभगे, तुम दिव्य प्रज्ञा धारण करती हो।"
सरस्वत्युवाच
श्लोक 24 (3.189.24)
श्रेष्ठानि यानि द्विपदांवरिष्ठ । यज्ञेषु विद्वन्नुपपादयन्ति । तैरेव चाहं संप्रवृद्धा भवामि । चाप्यायिता रूपवती च विप्र ॥
śreṣṭhāni yāni dvipadāṃvariṣṭha | yajñeṣu vidvannupapādayanti | taireva cāhaṃ saṃpravṛddhā bhavāmi | cāpyāyitā rūpavatī ca vipra
"हे मनुष्यों में श्रेष्ठ ब्राह्मण, विद्वान् लोग यज्ञों में जो श्रेष्ठ पदार्थ अर्पित करते हैं, उन्हीं से मैं बढ़ती हूँ, पुष्ट होती हूँ और रूपवती बनती हूँ।"
श्लोक 25 (3.189.25)
यच्चापि पात्रमुपयुज्यते ह । वानस्पत्यमायसं पार्थिवं वा । दिव्येन रूपेण च प्रज्ञया च । तेनैव सिद्धिरिति विद्धि विद्वन् ॥
yaccāpi pātramupayujyate ha | vānaspatyamāyasaṃ pārthivaṃ vā | divyena rūpeṇa ca prajñayā ca | tenaiva siddhiriti viddhi vidvan
"हे विद्वान्, वहाँ जो भी पात्र काम में लाया जाता है—लकड़ी का, लोहे का या मिट्टी का—जान लो कि दिव्य रूप और प्रज्ञा के द्वारा उसी से सिद्धि मिलती है।"
तार्क्ष्य उवाच
श्लोक 26 (3.189.26)
इदं श्रेयः परमं मन्यमाना । व्यायच्छन्ते मुनयः संप्रतीताः । आचक्ष्व मे तं परमं विशोकं । मोक्षं परं यं प्रविशन्ति धीराः । सांख्या योगाः परमं यं वदन्ति । परं पुराणं तमहं न वेद्मि ॥
idaṃ śreyaḥ paramaṃ manyamānā | vyāyacchante munayaḥ saṃpratītāḥ | ācakṣva me taṃ paramaṃ viśokaṃ | mokṣaṃ paraṃ yaṃ praviśanti dhīrāḥ | sāṃkhyā yogāḥ paramaṃ yaṃ vadanti | paraṃ purāṇaṃ tamahaṃ na vedmi
"इसे परम कल्याण मानकर मुनि पूरे विश्वास के साथ प्रयत्न करते हैं। मुझे उस परम, शोकरहित मोक्ष के विषय में बताओ जिसमें धीर पुरुष प्रवेश करते हैं, जिसे सांख्य और योग के ज्ञाता परम कहते हैं। उस परम और पुरातन को मैं नहीं जानता।"
सरस्वत्युवाच
श्लोक 27 (3.189.27)
तं वै परं वेदविदः प्रपन्नाः । परं परेभ्यः प्रथितं पुराणम् । स्वाध्यायदानव्रतपुण्ययोगै- । स्तपोधना वीतशोका विमुक्ताः ॥
taṃ vai paraṃ vedavidaḥ prapannāḥ | paraṃ parebhyaḥ prathitaṃ purāṇam | svādhyāyadānavratapuṇyayogai- | stapodhanā vītaśokā vimuktāḥ
"उस परम, श्रेष्ठों से भी श्रेष्ठ, प्रसिद्ध और पुरातन तत्त्व को वेदज्ञ लोग प्राप्त हुए हैं; स्वाध्याय, दान और व्रत के पुण्य-योग से तप के धनी वे शोकरहित और मुक्त हो जाते हैं।"
श्लोक 28 (3.189.28)
तस्याथ मध्ये वेतसः पुण्यगन्धः । सहस्रशाखो विपुलो विभाति । तस्य मूलात्सरितः प्रस्रवन्ति । मधूदकप्रस्रवणाः सुपुण्याः ॥
tasyātha madhye vetasaḥ puṇyagandhaḥ | sahasraśākho vipulo vibhāti | tasya mūlātsaritaḥ prasravanti | madhūdakaprasravaṇāḥ supuṇyāḥ
"उसके मध्य में पवित्र सुगंध वाला, हज़ार शाखाओं वाला एक विशाल वेतस वृक्ष शोभित है। उसकी जड़ से अत्यंत पवित्र नदियाँ बहती हैं, जिनसे मधु और जल की धाराएँ निकलती हैं।"
श्लोक 29 (3.189.29)
शाखांशाखां महानद्यः संयान्ति सिकताशयाः । धानापूपा मांसशाकाः सदापायसकर्दमाः ॥
śākhāṃśākhāṃ mahānadyaḥ saṃyānti sikatāśayāḥ | dhānāpūpā māṃsaśākāḥ sadāpāyasakardamāḥ
"रेतीली तलहटी वाली महानदियाँ एक-एक शाखा तक बहती हैं; उनमें भुने धान, पुए, मांस और शाक हैं, और उनका कीचड़ सदा खीर का होता है।"
श्लोक 30 (3.189.30)
यस्मिन्नग्निमुखा देवाः सेन्द्राः सहमरुद्गणाः । ईजिरे क्रतुभिः श्रेष्ठैस्तत्पदं परमं मुने ॥
yasminnagnimukhā devāḥ sendrāḥ sahamarudgaṇāḥ | ījire kratubhiḥ śreṣṭhaistatpadaṃ paramaṃ mune
"हे मुने, वही परम पद है, जहाँ अग्नि को आगे रखकर इन्द्र और मरुद्गणों सहित देवताओं ने श्रेष्ठ यज्ञों से यजन किया था।"