आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 190
मनु और मत्स्य
युधिष्ठिर के अनुरोध पर मार्कण्डेय वैवस्वत मनु की कथा सुनाते हैं। बदरी में मनु के कठोर तप के समय एक छोटा मत्स्य उनसे रक्षा की याचना करता है, और उसके लगातार बढ़ते जाने पर मनु उसे घड़े से बावड़ी में, फिर गंगा में और अंत में समुद्र में पहुँचाते हैं। मत्स्य उन्हें आने वाले प्रलय की चेतावनी देता है और नौका बनाकर सप्तर्षियों और सब बीजों के साथ उस पर चढ़ने को कहता है; प्रलय आने पर सींगधारी मत्स्य बहुत वर्षों तक नौका को खींचकर हिमालय की चोटी तक ले जाता है, फिर स्वयं को ब्रह्मा प्रकट करके मनु को सारी प्रजा की सृष्टि का दायित्व सौंपता है। अंत में मार्कण्डेय मत्स्य के इस पुरातन आख्यान की महिमा बताते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.190.1)
ततः स पाण्डवो भूयो मार्कण्डेयमुवाच ह । कथयस्वेह चरितं मनोर्वैवस्वतस्य च ॥
tataḥ sa pāṇḍavo bhūyo mārkaṇḍeyamuvāca ha | kathayasveha caritaṃ manorvaivasvatasya ca
तब पाण्डुपुत्र ने फिर मार्कण्डेय से कहा— "यहाँ मुझे वैवस्वत मनु का चरित्र भी सुनाइए।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 2 (3.190.2)
विवस्वतः सुतो राजन्महर्षिः सुप्रतापवान् । बभूव नरशार्दूल प्रजापतिसमद्युतिः ॥
vivasvataḥ suto rājanmaharṣiḥ supratāpavān | babhūva naraśārdūla prajāpatisamadyutiḥ
हे राजन्, हे नरश्रेष्ठ, विवस्वान् के एक पुत्र महर्षि थे, जो अत्यंत प्रतापी और प्रजापति के समान तेजस्वी थे।
श्लोक 3 (3.190.3)
ओजसातेजसा लक्ष्म्या तपसा च विशेषतः । अतिचक्राम पितरं मनुः स्वंच पितामहम् ॥
ojasātejasā lakṣmyā tapasā ca viśeṣataḥ | aticakrāma pitaraṃ manuḥ svaṃca pitāmaham
ओज, तेज, लक्ष्मी और विशेषकर तप में मनु ने अपने पिता और पितामह को भी पीछे छोड़ दिया।
श्लोक 4 (3.190.4)
ऊर्ध्वबाहुर्विशालायां बदर्यां स नराधिपः । एकपादस्थितस्तीव्रं चकार सुमहत्तपः ॥
ūrdhvabāhurviśālāyāṃ badaryāṃ sa narādhipaḥ | ekapādasthitastīvraṃ cakāra sumahattapaḥ
विशाल बदरी में उस नरपति ने भुजाएँ ऊपर उठाकर, एक पैर पर खड़े होकर अत्यंत कठोर और महान तप किया।
श्लोक 5 (3.190.5)
अवाक्शिरास्तथा चापि नेत्रैरनिमिषैर्दृढम् । सोऽतप्यत तपो घोरं वर्षाणामयुतं तदा ॥
avākśirāstathā cāpi netrairanimiṣairdṛḍham | so'tapyata tapo ghoraṃ varṣāṇāmayutaṃ tadā
सिर नीचे झुकाए, अपलक नेत्रों से दृढ़तापूर्वक उन्होंने दस हज़ार वर्षों तक घोर तप किया।
श्लोक 6 (3.190.6)
तं कदाचित्तपस्यन्तमार्द्रचीरजटाधरम् । चीरिणीतीरमागम्य मत्स्यो वचनमब्रवीत् ॥
taṃ kadācittapasyantamārdracīrajaṭādharam | cīriṇītīramāgamya matsyo vacanamabravīt
एक बार जब वे भीगे वल्कल-वस्त्र और जटा धारण किए तप कर रहे थे, तब चीरिणी नदी के तट पर आकर एक मत्स्य ने उनसे कहा—
मत्स्य उवाच
श्लोक 7 (3.190.7)
भगवन्क्षुद्रमत्स्योऽस्मि बलवद्भ्यो भयंमम । मत्स्येभ्यो हि ततो मां त्वं त्रातुमर्हसि सुव्रत ॥
bhagavankṣudramatsyo'smi balavadbhyo bhayaṃmama | matsyebhyo hi tato māṃ tvaṃ trātumarhasi suvrata
"भगवन्, मैं एक छोटा मत्स्य हूँ; मुझे बलवान मत्स्यों से भय है। इसलिए हे सुव्रत, आप मेरी रक्षा करें।"
श्लोक 8 (3.190.8)
दुर्बलं बलवन्तो हि मत्स्या मत्स्यं विशेषतः । भक्षयन्ति सदा वृत्तिर्विहिता नः सनातनी ॥
durbalaṃ balavanto hi matsyā matsyaṃ viśeṣataḥ | bhakṣayanti sadā vṛttirvihitā naḥ sanātanī
"क्योंकि बलवान मत्स्य सदा दुर्बल मत्स्य को विशेष रूप से खा जाते हैं; यही हमारे लिए नियत सनातन जीविका है।"
श्लोक 9 (3.190.9)
तस्माद्भयौघान्महतो मज्जन्तं मां विशेषतः । त्रातुमर्हसि कर्तास्मि कृतेप्रतिकृतं तव ॥
tasmādbhayaughānmahato majjantaṃ māṃ viśeṣataḥ | trātumarhasi kartāsmi kṛtepratikṛtaṃ tava
"इसलिए भय की इस बड़ी बाढ़ में डूबते हुए मुझे आप बचाइए। आपके किए उपकार का मैं बदला चुकाऊँगा।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 10 (3.190.10)
स मत्स्यवचनं श्रुत्वा कृपयाऽभिपरिप्लुतः । मनुर्वैवस्वतोऽगृह्णात्तं मत्स्यं पाणिना स्वयम् ॥
sa matsyavacanaṃ śrutvā kṛpayā'bhipariplutaḥ | manurvaivasvato'gṛhṇāttaṃ matsyaṃ pāṇinā svayam
मत्स्य की बात सुनकर करुणा से भरे वैवस्वत मनु ने उस मत्स्य को स्वयं अपने हाथ में उठा लिया।
श्लोक 11 (3.190.11)
उदकान्तमुपानीय मत्स्यं वैवस्वतो मनुः । अलिञ्जरे प्राक्षिपत्तं चन्द्रांशुसदृशप्रभम् ॥
udakāntamupānīya matsyaṃ vaivasvato manuḥ | aliñjare prākṣipattaṃ candrāṃśusadṛśaprabham
जल के किनारे से उसे लाकर वैवस्वत मनु ने चंद्रकिरणों के समान चमकते उस मत्स्य को एक घड़े में डाल दिया।
श्लोक 12 (3.190.12)
स तत्र ववृधे राजन्मत्स्यः परमसत्कृतः । पुत्रवत्स्वीकरोत्तस्मै मनुर्भावं विशेषतः ॥
sa tatra vavṛdhe rājanmatsyaḥ paramasatkṛtaḥ | putravatsvīkarottasmai manurbhāvaṃ viśeṣataḥ
हे राजन्, वहाँ बड़े आदर से पाला गया वह मत्स्य बढ़ने लगा, और मनु उसके प्रति पुत्र जैसा विशेष स्नेह रखने लगे।
श्लोक 13 (3.190.13)
अथ कालेन महता स मत्स्यः सुमहानभूत् । अलिञ्जरजले चैव नासौ समभवत्किल ॥
atha kālena mahatā sa matsyaḥ sumahānabhūt | aliñjarajale caiva nāsau samabhavatkila
फिर बहुत समय बीतने पर वह मत्स्य बहुत बड़ा हो गया और घड़े के जल में नहीं समा सका।
श्लोक 14 (3.190.14)
अथ मत्स्यो मनुं दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत । भगवन्साधु मेऽद्यान्यत्स्थानं संप्रतिपादय ॥
atha matsyo manuṃ dṛṣṭvā punarevābhyabhāṣata | bhagavansādhu me'dyānyatsthānaṃ saṃpratipādaya
तब मत्स्य ने मनु को देखकर फिर कहा— "भगवन्, कृपया अब मुझे कोई दूसरा स्थान दीजिए।"
श्लोक 15 (3.190.15)
उद्धृत्यालिञ्जरात्तस्मात्ततः स भगवान्मनुः । तं मत्स्यमनयद्वापीं महतीं स मनुस्तदा ॥
uddhṛtyāliñjarāttasmāttataḥ sa bhagavānmanuḥ | taṃ matsyamanayadvāpīṃ mahatīṃ sa manustadā
तब भगवान् मनु उसे उस घड़े से निकालकर एक बड़ी बावड़ी में ले गए।
श्लोक 16 (3.190.16)
तत्रतं प्राक्षिपच्चापि मनुः परपुरंजय । अथावर्धत मत्स्यः स पुनर्वर्षगणान्बहून् ॥
tatrataṃ prākṣipaccāpi manuḥ parapuraṃjaya | athāvardhata matsyaḥ sa punarvarṣagaṇānbahūn
हे शत्रुनगरविजयी, मनु ने उसे वहाँ डाल दिया, और वह मत्स्य फिर बहुत वर्षों तक बढ़ता रहा।
श्लोक 17 (3.190.17)
द्वियोजनायता वापी विस्तृताचापि योजनम् । तस्यां नासौ समभवन्मत्स्यो राजीवलोचन ॥
dviyojanāyatā vāpī vistṛtācāpi yojanam | tasyāṃ nāsau samabhavanmatsyo rājīvalocana
वह बावड़ी दो योजन लंबी और एक योजन चौड़ी थी, फिर भी हे कमलनयन, वह मत्स्य उसमें न समा सका
श्लोक 18 (3.190.18)
विचेष्टितुं च कौन्तेय मत्स्यो वाप्यां विशांपते । मनुं मत्स्यस्ततो दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत ॥
viceṣṭituṃ ca kaunteya matsyo vāpyāṃ viśāṃpate | manuṃ matsyastato dṛṣṭvā punarevābhyabhāṣata
और न ही उसमें हिल-डुल सका, हे कुन्तीपुत्र, हे प्रजापालक। तब मत्स्य ने मनु को देखकर फिर कहा—
मत्स्य उवाच
श्लोक 19 (3.190.19)
नय मां भगवन्साधो समुद्रमहिषीं प्रियाम् । गङ्गां नात्रापि शक्तोस्मि वस्तुं मतिमतांवर ॥
naya māṃ bhagavansādho samudramahiṣīṃ priyām | gaṅgāṃ nātrāpi śaktosmi vastuṃ matimatāṃvara
"हे भगवन्, हे साधु, मुझे समुद्र की प्रिय रानी गंगा के पास ले चलिए। हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, मैं यहाँ भी नहीं रह सकता।"
श्लोक 20 (3.190.20)
निदेशे हि मया तुभ्यं स्थातव्यमनसूयता । वृद्धिर्हि परमा प्राप्ता त्वत्कृते हि मयाऽनघ ॥
nideśe hi mayā tubhyaṃ sthātavyamanasūyatā | vṛddhirhi paramā prāptā tvatkṛte hi mayā'nagha
"क्योंकि मुझे बिना किसी शिकायत के आपकी आज्ञा में रहना है; हे निष्पाप, आपके ही कारण मैंने यह बड़ी वृद्धि पाई है।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 21 (3.190.21)
एवमुक्तो मनुर्मत्स्यमनयद्भगवान्वशी । नदीं गङ्गां तत्रचैनं स्वयं प्राक्षिपदेव च ॥
evamukto manurmatsyamanayadbhagavānvaśī | nadīṃ gaṅgāṃ tatracainaṃ svayaṃ prākṣipadeva ca
ऐसा कहे जाने पर जितेन्द्रिय भगवान् मनु उस मत्स्य को गंगा नदी में ले गए और स्वयं उसे वहाँ छोड़ दिया।
श्लोक 22 (3.190.22)
स तत्र ववृधे मत्स्यः कंचित्कालमरिंदम । गतः पुनर्मनुं दृष्ट्वा मत्स्यो वचनमब्रवीत् ॥
sa tatra vavṛdhe matsyaḥ kaṃcitkālamariṃdama | gataḥ punarmanuṃ dṛṣṭvā matsyo vacanamabravīt
हे शत्रुदमन, वहाँ वह मत्स्य कुछ समय तक बढ़ता रहा; फिर मनु के पास जाकर उनसे बोला—
मत्स्य उवाच
श्लोक 23 (3.190.23)
गङ्गायां हि न शक्नोमि बृहत्त्वाच्चेष्टितुं प्रभो । समुद्रं नय मामाशु प्रसीद भगवन्निति ॥
gaṅgāyāṃ hi na śaknomi bṛhattvācceṣṭituṃ prabho | samudraṃ naya māmāśu prasīda bhagavanniti
"प्रभो, अपने बड़े आकार के कारण मैं गंगा में हिल-डुल नहीं सकता। भगवन्, कृपा करें, मुझे शीघ्र समुद्र में ले चलें।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 24 (3.190.24)
उद्धृत्य गङ्गासलिलात्ततो मत्स्यं मनुः स्वयम् । समुद्रमनयत्पार्थ तत्रचैनमवासृजत् ॥
uddhṛtya gaṅgāsalilāttato matsyaṃ manuḥ svayam | samudramanayatpārtha tatracainamavāsṛjat
तब मनु ने स्वयं उस मत्स्य को गंगा के जल से निकाला, हे पार्थ, उसे समुद्र तक ले गए और वहाँ छोड़ दिया।
श्लोक 25 (3.190.25)
सुमहानपि मत्स्यस्तु स मनोर्नयतस्तदा । आसीद्यथेष्टहार्यश्च स्पर्शगन्धसुखश्च वै ॥
sumahānapi matsyastu sa manornayatastadā | āsīdyatheṣṭahāryaśca sparśagandhasukhaśca vai
यद्यपि वह मत्स्य बहुत विशाल था, फिर भी ले जाते समय मनु उसे इच्छानुसार सहज ही उठा सकते थे, और उसका स्पर्श और गंध सुखद थे।
श्लोक 26 (3.190.26)
यदा समुद्रे प्रक्षिप्तः स मत्स्यो मनुना तदा । तत एनमिदं वाक्यं स्मयमान इवाब्रवीत् ॥
yadā samudre prakṣiptaḥ sa matsyo manunā tadā | tata enamidaṃ vākyaṃ smayamāna ivābravīt
जब मनु ने उस मत्स्य को समुद्र में छोड़ दिया, तब वह मानो मुस्कराते हुए उनसे यह बोला—
मत्स्य उवाच
श्लोक 27 (3.190.27)
भगवन्हि कृता रक्षा त्वया सर्वा विशेषतः । प्राप्तकालं तु यत्कार्यं त्वया तच्छ्रूयतां मम ॥
bhagavanhi kṛtā rakṣā tvayā sarvā viśeṣataḥ | prāptakālaṃ tu yatkāryaṃ tvayā tacchrūyatāṃ mama
"भगवन्, आपने हर प्रकार से मेरी पूरी रक्षा की है। अब समय आ गया है; आपको जो करना है, वह मुझसे सुनिए।"
श्लोक 28 (3.190.28)
अचिराद्भगवन्भौममिदं स्थावरजङ्गमम् । सर्वमेव महाभाग प्रलयं वै गमिष्यति ॥
acirādbhagavanbhaumamidaṃ sthāvarajaṅgamam | sarvameva mahābhāga pralayaṃ vai gamiṣyati
"हे महाभाग, भगवन्, शीघ्र ही पृथ्वी पर जो कुछ स्थावर और जंगम है, वह सब प्रलय को प्राप्त होगा।"
श्लोक 29 (3.190.29)
संप्रक्षालनकालोऽयंलोकानां समुपस्थितः । तस्मात्त्वां बोधयाम्यद्ययत्ते हितमनुत्तमम् ॥
saṃprakṣālanakālo'yaṃlokānāṃ samupasthitaḥ | tasmāttvāṃ bodhayāmyadyayatte hitamanuttamam
"लोकों के पूरी तरह धुल जाने का समय आ पहुँचा है। इसलिए आज मैं आपको वह बता रहा हूँ जो आपके लिए परम हितकर है।"
श्लोक 30 (3.190.30)
त्रसानां स्थावराणां च यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति । तस्य सर्वस्य संप्राप्तः कालः परमदारुणः ॥
trasānāṃ sthāvarāṇāṃ ca yacceṅgaṃ yacca neṅgati | tasya sarvasya saṃprāptaḥ kālaḥ paramadāruṇaḥ
"चर और अचर, जो हिलता है और जो नहीं हिलता—उन सबका अत्यंत भयंकर अंतकाल आ पहुँचा है।"
श्लोक 31 (3.190.31)
नौश्च कारयितव्या ते दृढा युक्तवटारका । तत्र सप्तर्षिभिः सार्धमारुहेथा महामुने ॥
nauśca kārayitavyā te dṛḍhā yuktavaṭārakā | tatra saptarṣibhiḥ sārdhamāruhethā mahāmune
"आपको रस्सियों से युक्त एक मज़बूत नौका बनवानी चाहिए। हे महामुने, सप्तर्षियों के साथ उस पर चढ़ जाइए।"
श्लोक 32 (3.190.32)
बीजानि चैव सर्वाणि यथोक्तानि मया पुरा । तस्यामारोहयेर्नावि सुसंगुप्तानि भागशः ॥
bījāni caiva sarvāṇi yathoktāni mayā purā | tasyāmārohayernāvi susaṃguptāni bhāgaśaḥ
"और जैसा मैंने पहले बताया था, सब बीजों को अलग-अलग भागों में भलीभाँति सुरक्षित करके उस नौका पर रख लीजिए।"
श्लोक 33 (3.190.33)
नौस्थश्च मां प्रतीक्षेथास्ततो मुनिजनप्रिय । आगमिष्याम्यहं शृङ्गी विज्ञेयस्तेन तापस ॥
nausthaśca māṃ pratīkṣethāstato munijanapriya | āgamiṣyāmyahaṃ śṛṅgī vijñeyastena tāpasa
"हे मुनिजनों के प्रिय, नौका पर बैठकर फिर मेरी प्रतीक्षा कीजिए। मैं सींग धारण किए आऊँगा; हे तपस्वी, उसी से आप मुझे पहचानेंगे।"
श्लोक 34 (3.190.34)
एवमेतत्त्वया कार्यमापृष्टोसि व्रजाम्यहम् । ता न शक्या महत्यो वै आपस्तर्तुं मया विना । नातिशङ्क्यमिदं चापि वचनं मे त्वया विभो ॥
evametattvayā kāryamāpṛṣṭosi vrajāmyaham | tā na śakyā mahatyo vai āpastartuṃ mayā vinā | nātiśaṅkyamidaṃ cāpi vacanaṃ me tvayā vibho
"आपको यही करना है। मैं विदा लेता हूँ, जा रहा हूँ। वह अपार जलराशि मेरे बिना पार नहीं की जा सकती। हे प्रभो, मेरे इस वचन पर आप तनिक भी संदेह न करें।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 35 (3.190.35)
एवं करिष्य इति तं स मत्स्यं प्रत्यभाषत । जग्मतुश्च यथाकाममनुज्ञाप्य परस्परम् ॥
evaṃ kariṣya iti taṃ sa matsyaṃ pratyabhāṣata | jagmatuśca yathākāmamanujñāpya parasparam
"मैं ऐसा ही करूँगा"—मनु ने उस मत्स्य को उत्तर दिया, और दोनों एक-दूसरे से विदा लेकर अपनी-अपनी इच्छा से चले गए।
श्लोक 36 (3.190.36)
ततो मनुर्महाराज यथोक्तं मत्स्यकेन ह । बीजान्यादाय सर्वाणि सागरं पुप्लुवे तदा । नौकया शुभयावीर महोर्मिणमरिंदम ॥
tato manurmahārāja yathoktaṃ matsyakena ha | bījānyādāya sarvāṇi sāgaraṃ pupluve tadā | naukayā śubhayāvīra mahormiṇamariṃdama
हे महाराज, तब जैसा मत्स्य ने कहा था, वैसे ही मनु सब बीज लेकर, हे वीर शत्रुदमन, एक सुंदर नौका में ऊँची लहरों वाले सागर पर चल पड़े।
श्लोक 37 (3.190.37)
चिन्तयामास च मनुस्तं मत्स्यं पृथिवीपते । सच तच्चिन्तितं ज्ञात्वा मत्स्यः परपुरंजय । शृङ्गी तत्राजगामाशु तदा भरतसत्तम ॥
cintayāmāsa ca manustaṃ matsyaṃ pṛthivīpate | saca taccintitaṃ jñātvā matsyaḥ parapuraṃjaya | śṛṅgī tatrājagāmāśu tadā bharatasattama
हे पृथ्वीपति, मनु ने उस मत्स्य का स्मरण किया; और हे शत्रुनगरविजयी, हे भरतश्रेष्ठ, मनु का विचार जानकर वह सींगधारी मत्स्य तुरंत वहाँ आ पहुँचा।
श्लोक 38 (3.190.38)
तं दृष्ट्वा मनुजव्याघ्र मनुर्मत्स्यं जलार्णवे । शृङ्गिणं तं यथोक्तेन रूपेणाद्रिमिवोच्छ्रितम् ॥
taṃ dṛṣṭvā manujavyāghra manurmatsyaṃ jalārṇave | śṛṅgiṇaṃ taṃ yathoktena rūpeṇādrimivocchritam
हे नरव्याघ्र, जलराशि में उस मत्स्य को देखकर—जो बताए हुए रूप में सींग धारण किए पर्वत के समान ऊँचा था—मनु ने
श्लोक 39 (3.190.39)
वटारकमयं पाशमथ मत्स्यस्य मूर्धनि । मनुर्मनुजशार्दूल तस्मिञ्शृङ्गे न्यवेशयत् ॥
vaṭārakamayaṃ pāśamatha matsyasya mūrdhani | manurmanujaśārdūla tasmiñśṛṅge nyaveśayat
हे मनुजश्रेष्ठ, तब रस्सी का फंदा उस मत्स्य के सिर पर उसके सींग में डाल दिया।
श्लोक 40 (3.190.40)
संयतस्तेन पाशेन मत्स्यः परपुरंजय । वेगेन महता नावं प्राकर्षल्लवणाम्भसि ॥
saṃyatastena pāśena matsyaḥ parapuraṃjaya | vegena mahatā nāvaṃ prākarṣallavaṇāmbhasi
हे शत्रुनगरविजयी, उस फंदे से बँधा हुआ मत्स्य बड़े वेग से नौका को खारे जल में खींचने लगा।
श्लोक 41 (3.190.41)
स ततार तया नावा समुद्रं मनुजेश्वर । नृत्यमानमिवोर्मीभिर्गर्जमानमिवाम्भसा ॥
sa tatāra tayā nāvā samudraṃ manujeśvara | nṛtyamānamivormībhirgarjamānamivāmbhasā
हे मनुष्यों के स्वामी, उस नौका से उन्होंने वह समुद्र पार किया, जो अपनी लहरों से मानो नाच रहा था और अपने जल से गरज रहा था।
श्लोक 42 (3.190.42)
क्षोभ्यमाणा महावातैः सा नौस्तस्मिन्महोदधौ । घूर्णते चपलेव स्त्री मत्ता परपुरंजय ॥
kṣobhyamāṇā mahāvātaiḥ sā naustasminmahodadhau | ghūrṇate capaleva strī mattā parapuraṃjaya
हे शत्रुनगरविजयी, उस महासागर में प्रचंड हवाओं से झकझोरी जाती वह नौका किसी चंचल, मतवाली स्त्री की तरह डगमगा रही थी।
श्लोक 43 (3.190.43)
नैव भूमिर्न च दिशः प्रदिशो वा चकाशिरे । सर्वं सलिलमेवासीत्खं द्यौश्च नरपुङ्गव ॥
naiva bhūmirna ca diśaḥ pradiśo vā cakāśire | sarvaṃ salilamevāsītkhaṃ dyauśca narapuṅgava
हे नरश्रेष्ठ, न भूमि दिखाई देती थी, न दिशाएँ, न उपदिशाएँ; सब कुछ जल ही जल था—आकाश और स्वर्ग भी।
श्लोक 44 (3.190.44)
एवंभूते तदा लोके संकुले भरतर्षभ । अदृश्यन्त सप्तर्षयो मनुर्मत्स्यस्तथैव च ॥
evaṃbhūte tadā loke saṃkule bharatarṣabha | adṛśyanta saptarṣayo manurmatsyastathaiva ca
हे भरतश्रेष्ठ, जब संसार ऐसी उथल-पुथल में था, तब केवल सप्तर्षि, मनु और वह मत्स्य ही दिखाई देते थे।
श्लोक 45 (3.190.45)
एवं बहून्वर्षगणांस्तां नावं सोऽथ मत्स्यकः । चकर्षातन्द्रितो राजंस्तस्मिन्सलिलसंचये ॥
evaṃ bahūnvarṣagaṇāṃstāṃ nāvaṃ so'tha matsyakaḥ | cakarṣātandrito rājaṃstasminsalilasaṃcaye
हे राजन्, इस प्रकार वह मत्स्य बहुत वर्षों तक बिना थके उस नौका को उस जलराशि में खींचता रहा।
श्लोक 46 (3.190.46)
ततो हिमवतः शृङ्गं यत्परं भरतर्षभ । तत्राकर्षत्ततो नावं स मत्स्यः कुरुनन्दन ॥
tato himavataḥ śṛṅgaṃ yatparaṃ bharatarṣabha | tatrākarṣattato nāvaṃ sa matsyaḥ kurunandana
हे भरतश्रेष्ठ, हे कुरुनन्दन, फिर वह मत्स्य नौका को खींचकर हिमालय की सबसे ऊँची चोटी पर ले गया।
श्लोक 47 (3.190.47)
अथाब्रवीत्तदा मत्स्यस्तानृषीन्प्रहसञ्शनैः । अस्मिन्हिमवतः शृङ्गे नावं बध्नीत माचिरम् ॥
athābravīttadā matsyastānṛṣīnprahasañśanaiḥ | asminhimavataḥ śṛṅge nāvaṃ badhnīta māciram
तब मत्स्य ने धीरे से हँसते हुए उन ऋषियों से कहा— "इस हिमालय की चोटी से नौका को बिना देर किए बाँध दो।"
श्लोक 48 (3.190.48)
सा बद्धा तत्र तैस्तूर्णमृषिभिर्भरतर्षभ । नौर्मत्स्यस्य वचः श्रुत्वा शृङ्गे हिमवतस्तदा ॥
sā baddhā tatra taistūrṇamṛṣibhirbharatarṣabha | naurmatsyasya vacaḥ śrutvā śṛṅge himavatastadā
हे भरतश्रेष्ठ, मत्स्य की बात सुनकर ऋषियों ने तुरंत वह नौका वहाँ हिमालय की चोटी से बाँध दी।
श्लोक 49 (3.190.49)
तच्च नौबन्धनं नाम शृङ्गं हिमवतः परम् । ख्यातमद्यापि कौन्तेय तद्विद्धि भरतर्षभ ॥
tacca naubandhanaṃ nāma śṛṅgaṃ himavataḥ param | khyātamadyāpi kaunteya tadviddhi bharatarṣabha
हे कुन्तीपुत्र, हे भरतश्रेष्ठ, जान लो कि हिमालय की वह सबसे ऊँची चोटी आज भी "नौबन्धन" नाम से प्रसिद्ध है।
श्लोक 50 (3.190.50)
अथाब्रवीदनिमिषस्तानृषीन्सहितस्तदा । अहं प्रजापतिर्ब्रह्मा मत्परं नाधिगम्यते । मत्स्यरूपेण यूयं च मयाऽस्मान्मोक्षिता भयात् ॥
athābravīdanimiṣastānṛṣīnsahitastadā | ahaṃ prajāpatirbrahmā matparaṃ nādhigamyate | matsyarūpeṇa yūyaṃ ca mayā'smānmokṣitā bhayāt
तब उस अपलक मत्स्य ने एकत्र ऋषियों से कहा— "मैं प्रजापति ब्रह्मा हूँ; मुझसे परे कुछ नहीं पाया जाता। मत्स्य-रूप में मैंने तुम सबको इस भय से मुक्त किया है।"
मत्स्य उवाच
श्लोक 51 (3.190.51)
मनुना च प्रजाः सर्वाः सदेवासुरमानुषाः । स्रष्टव्याः सर्वलोकाश्चयच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति ॥
manunā ca prajāḥ sarvāḥ sadevāsuramānuṣāḥ | sraṣṭavyāḥ sarvalokāścayacceṅgaṃ yacca neṅgati
"और मनु को देवता, असुर और मनुष्यों सहित सारी प्रजाओं और सब लोकों की—जो कुछ चलता है और जो नहीं चलता—सृष्टि करनी है।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 52 (3.190.52)
तपसा चापि तीव्रेण प्रतिभाऽस्य भविष्यति । मत्प्रसादात्प्रजासर्गे न च मोहं गमिष्यति । इत्युक्त्वा वचनं मत्स्यः क्षणेनादर्शनं गतः ॥
tapasā cāpi tīvreṇa pratibhā'sya bhaviṣyati | matprasādātprajāsarge na ca mohaṃ gamiṣyati | ityuktvā vacanaṃ matsyaḥ kṣaṇenādarśanaṃ gataḥ
"तीव्र तप से उसे प्रतिभा प्राप्त होगी, और मेरी कृपा से प्रजा की सृष्टि में वह मोह में नहीं पड़ेगा।" यह कहकर वह मत्स्य क्षण भर में अदृश्य हो गया।
श्लोक 53 (3.190.53)
स्रष्टुकामः प्रजाश्चापि मनुर्वैवस्वतः स्वयम् । प्रमूढोऽभूत्प्रजासर्गे तपस्तेपे महत्ततः ॥
sraṣṭukāmaḥ prajāścāpi manurvaivasvataḥ svayam | pramūḍho'bhūtprajāsarge tapastepe mahattataḥ
प्रजाओं की सृष्टि की इच्छा रखते हुए भी स्वयं वैवस्वत मनु सृष्टि-कार्य में मोहित हो गए; तब उन्होंने महान तप किया।
श्लोक 54 (3.190.54)
तपसा महता युक्तः सोऽथ स्रष्टुं प्रचक्रमे । सर्वाः प्रजा मनुः साक्षाद्यथावद्भरतर्षभ ॥
tapasā mahatā yuktaḥ so'tha sraṣṭuṃ pracakrame | sarvāḥ prajā manuḥ sākṣādyathāvadbharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, महान तप से युक्त होकर मनु ने तब सब प्रजाओं की साक्षात् और यथाविधि सृष्टि आरंभ की।
श्लोक 55 (3.190.55)
इत्येतन्मात्स्यकं नाम पुराणं परिकीर्तितम् । आख्यानमिदमाख्यातं सर्वपापहरं मया ॥
ityetanmātsyakaṃ nāma purāṇaṃ parikīrtitam | ākhyānamidamākhyātaṃ sarvapāpaharaṃ mayā
इस प्रकार "मात्स्यक" नाम का यह पुरातन आख्यान कहा गया; सब पापों को हरने वाला यह आख्यान मैंने तुम्हें सुनाया।
श्लोक 56 (3.190.56)
य इदं शृणुयान्नित्यं मनोश्चरितमादितः । स सुखी सर्वपूर्णार्थः सर्वलोकमियान्नरः ॥
ya idaṃ śṛṇuyānnityaṃ manoścaritamāditaḥ | sa sukhī sarvapūrṇārthaḥ sarvalokamiyānnaraḥ
जो मनुष्य मनु के इस चरित्र को आरंभ से नित्य सुनता है, वह सुखी होता है, उसके सब मनोरथ पूर्ण होते हैं और वह सभी लोकों को प्राप्त होता है।