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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 191

युग, प्रलय और वटवृक्ष पर बैठे बालक का वृत्तान्त — मार्कण्डेय का कथन

युधिष्ठिर चिरंजीवी मार्कण्डेय से, जिन्होंने अकेले ही लोकों का प्रलय देखा है, सृष्टि के समस्त कारणों की कथा पूछते हैं। जनार्दन को नमस्कार करके मार्कण्डेय चारों युगों और ब्रह्मा के दिन का परिमाण बताते हैं, कलियुग के अन्त में धर्म के क्षय का वर्णन करते हैं और फिर आने वाले विनाश का — अनावृष्टि, सात प्रचण्ड सूर्य, संवर्तक अग्नि और वे महामेघ जो संसार को एक ही समुद्र में डुबो देते हैं। उस जल में अकेले भटकते हुए वे एक विशाल वटवृक्ष पर बैठे तेजस्वी बालक को देखते हैं; उसके मुख में खिंचकर वे सौ वर्ष से अधिक समय तक उसके शरीर के भीतर सारे जगत् में घूमते हैं, फिर श्वास के साथ बाहर निकलते हैं और उस बालक से पूछते हैं कि वह कौन है।

अध्याय 190अध्याय-सूचीअध्याय 192

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.191.1)

ततः स पुनरेवाथ मार्कण्डेयं तपस्विनम् । पप्रच्छ विनयोपेतो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥

tataḥ sa punarevātha mārkaṇḍeyaṃ tapasvinam | papraccha vinayopeto dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ

तब विनयशील धर्मराज युधिष्ठिर ने तपस्वी मार्कण्डेय से फिर प्रश्न किया।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (3.191.2)

नैके युगसहस्रान्तास्त्वया दृष्टा महामुने । न चापीह समः कश्चिदायुष्मान्दृश्यते तव ॥

naike yugasahasrāntāstvayā dṛṣṭā mahāmune | na cāpīha samaḥ kaścidāyuṣmāndṛśyate tava

"हे महामुने, आपने सहस्रों युगों का अन्त देखा है, और यहाँ आपके समान दीर्घायु कोई दिखाई नहीं देता।

श्लोक 3 (3.191.3)

वर्जयित्वा महात्मानं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् । न तेऽस्ति सदृशः कश्चिदायुषा ब्रह्मसत्तम ॥

varjayitvā mahātmānaṃ brahmāṇaṃ parameṣṭhinam | na te'sti sadṛśaḥ kaścidāyuṣā brahmasattama

"हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, महात्मा परमेष्ठी ब्रह्मा को छोड़कर आयु में आपके समान और कोई नहीं है।

श्लोक 4 (3.191.4)

अथाऽन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन्देवदानववर्जिते । त्वमेव प्रलये विप्र ब्रह्माणमुपतिष्ठसे ॥

athā'ntarikṣe loke'smindevadānavavarjite | tvameva pralaye vipra brahmāṇamupatiṣṭhase

"हे विप्र, प्रलय के समय जब इस लोक का आकाश देवताओं और दानवों से सूना हो जाता है, तब आप ही ब्रह्मा की उपासना में उपस्थित रहते हैं।

श्लोक 5 (3.191.5)

प्रलये चापि निर्वृत्ते प्रबुद्धे च पितामहे । त्वमेकः सृज्यमानानि भूतानीह प्रपश्यसि ॥

pralaye cāpi nirvṛtte prabuddhe ca pitāmahe | tvamekaḥ sṛjyamānāni bhūtānīha prapaśyasi

"और जब प्रलय समाप्त हो जाता है और पितामह जागते हैं, तब आप ही यहाँ उत्पन्न होते हुए प्राणियों को देखते हैं —

श्लोक 6 (3.191.6)

चतुर्विधानि विप्रर्षे यथावत्परमेष्ठिना । वायुभूता दिशः कृत्वा विक्षिप्यापस्ततस्ततः ॥

caturvidhāni viprarṣe yathāvatparameṣṭhinā | vāyubhūtā diśaḥ kṛtvā vikṣipyāpastatastataḥ

"हे विप्रर्षि, वे चार प्रकार के प्राणी, जिन्हें परमेष्ठी वायुरूप होकर, दिशाओं की रचना करके और जल को इधर-उधर बिखेरकर यथाविधि उत्पन्न करते हैं।

श्लोक 7 (3.191.7)

त्वया लोकगुरुः साक्षात्सर्वलोकपितामहः । आराधितो द्विजश्रेष्ठ तत्परेण समाधिना ॥

tvayā lokaguruḥ sākṣātsarvalokapitāmahaḥ | ārādhito dvijaśreṣṭha tatpareṇa samādhinā

"हे द्विजश्रेष्ठ, आपने एकाग्र समाधि के द्वारा लोकगुरु, सब लोकों के पितामह की साक्षात् आराधना की है।

श्लोक 8 (3.191.8)

स्वप्रमाणमथो विप्र त्वया कृतमनेकशः । घोरेणाविश्य तपसा वेधसो निर्जितास्त्वया ॥

svapramāṇamatho vipra tvayā kṛtamanekaśaḥ | ghoreṇāviśya tapasā vedhaso nirjitāstvayā

"हे विप्र, आपने अनेक बार अपनी आयु का परिमाण स्वयं निश्चित किया है; घोर तपस्या में प्रवेश करके आपने सृष्टिकर्ताओं को भी पीछे छोड़ दिया है।

श्लोक 9 (3.191.9)

नारायणाङ्कप्रख्यस्त्वं सांपरायेऽतिपठ्यसे ॥

nārāyaṇāṅkaprakhyastvaṃ sāṃparāye'tipaṭhyase

"महाप्रलय के समय आपकी स्तुति उस रूप में होती है जो नारायण की गोद में रहने के लिए प्रसिद्ध है।

श्लोक 10 (3.191.10)

भगवाननेकशः कृत्वा त्वया विष्णोश्च विश्वकृत् । कर्णिकोद्धरणं दिव्यं ब्रह्मणः कामरूपिणः । रत्नालंकारयोगाभ्यां दृग्भ्यां दृष्टस्त्वया पुरा ॥

bhagavānanekaśaḥ kṛtvā tvayā viṣṇośca viśvakṛt | karṇikoddharaṇaṃ divyaṃ brahmaṇaḥ kāmarūpiṇaḥ | ratnālaṃkārayogābhyāṃ dṛgbhyāṃ dṛṣṭastvayā purā

"आपने अनेक बार विश्व के रचयिता भगवान् विष्णु को देखा है, और उस कमल-कर्णिका के दिव्य उद्भव को भी जिससे इच्छानुसार रूप धारण करने वाले ब्रह्मा प्रकट होते हैं; बहुत पहले आपने उन्हें रत्नों और अलंकारों से सुशोभित-सी दृष्टि से देखा था।

श्लोक 11 (3.191.11)

तस्मात्तवान्तको मृत्युर्जरा वा देहनाशिनी । न त्वां विशति विप्रर्षे प्रसादात्परमेष्ठिनः ॥

tasmāttavāntako mṛtyurjarā vā dehanāśinī | na tvāṃ viśati viprarṣe prasādātparameṣṭhinaḥ

"इसलिए, हे विप्रर्षि, परमेष्ठी की कृपा से न अन्त करने वाली मृत्यु आपको छू पाती है और न देह का नाश करने वाली जरा।

श्लोक 12 (3.191.12)

यदा नैव रविर्नाग्निर्न वायुर्न च चन्द्रमाः । नैवान्तरिक्षं नैवोर्वी शेषं भवति किंचन ॥

yadā naiva ravirnāgnirna vāyurna ca candramāḥ | naivāntarikṣaṃ naivorvī śeṣaṃ bhavati kiṃcana

"जब न सूर्य रहता है, न अग्नि, न वायु, न चन्द्रमा; न आकाश रहता है, न पृथ्वी, और कुछ भी शेष नहीं रहता;

श्लोक 13 (3.191.13)

तस्मिन्नेकार्णवे लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्टे देवासुरगणे समुत्सन्नमहोरगे ॥

tasminnekārṇave loke naṣṭe sthāvarajaṅgame | naṣṭe devāsuragaṇe samutsannamahorage

"जब सारा लोक एक ही समुद्र बन जाता है, चर-अचर सब नष्ट हो जाते हैं, देवताओं और असुरों के समूह मिट जाते हैं और बड़े-बड़े नाग भी उखड़ जाते हैं;

श्लोक 14 (3.191.14)

शयानममितात्मानं पद्मे पद्मनिकेतनम् । त्वमेकः सर्वभूतेशं ब्रह्माणमुपतिष्ठसि ॥

śayānamamitātmānaṃ padme padmaniketanam | tvamekaḥ sarvabhūteśaṃ brahmāṇamupatiṣṭhasi

"तब आप ही कमल पर शयन करने वाले, कमल में निवास करने वाले, अपरिमित आत्मा, सर्वभूतेश्वर ब्रह्मा की उपासना करते हैं।

श्लोक 15 (3.191.15)

एतत्प्रत्यक्षतः सर्वं पूर्वं वृत्तं द्विजोत्तम । तस्मादिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वांहेत्वात्मिकां कथां ॥

etatpratyakṣataḥ sarvaṃ pūrvaṃ vṛttaṃ dvijottama | tasmādicchāmyahaṃ śrotuṃ sarvāṃhetvātmikāṃ kathāṃ

"हे द्विजोत्तम, पहले घटी यह सारी बात आपने अपनी आँखों से देखी है। इसलिए मैं वह सम्पूर्ण कथा सुनना चाहता हूँ जो सब कुछ के कारणों को बताती है।

श्लोक 16 (3.191.16)

अनुभूतं हि बहुशस्त्वयैकेन द्विजोत्तम । न तेऽस्त्यविदितं किंचित्सर्वलोकेषु नित्यदा ॥

anubhūtaṃ hi bahuśastvayaikena dvijottama | na te'styaviditaṃ kiṃcitsarvalokeṣu nityadā

"हे द्विजोत्तम, आपने अकेले ही यह सब अनेक बार अनुभव किया है; सब लोकों में कभी भी ऐसा कुछ नहीं है जो आपको ज्ञात न हो।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 17 (3.191.17)

हन्त ते कथयिष्यामि नमस्कृत्वा स्वयंभुवे । पुरुषाय पुराणाय शाश्वतायाव्ययाय च । अव्यक्ताय सुसूक्ष्माय निर्गुणाय गुणात्मने ॥

hanta te kathayiṣyāmi namaskṛtvā svayaṃbhuve | puruṣāya purāṇāya śāśvatāyāvyayāya ca | avyaktāya susūkṣmāya nirguṇāya guṇātmane

"अच्छा, मैं तुम्हें बताऊँगा — पहले स्वयम्भू को नमस्कार करके, जो पुराण पुरुष हैं, शाश्वत और अविनाशी हैं, अव्यक्त और अत्यन्त सूक्ष्म हैं, गुणों से परे होकर भी गुणों के आत्मा हैं।

श्लोक 18 (3.191.18)

य एष पृथुदीर्घाक्षः पीतवासा जनार्दनः । एष कर्ता विकर्ता च भूतात्मा भूतकृत्प्रभुः ॥

ya eṣa pṛthudīrghākṣaḥ pītavāsā janārdanaḥ | eṣa kartā vikartā ca bhūtātmā bhūtakṛtprabhuḥ

"यह जो विशाल और लम्बे नेत्रों वाले, पीताम्बरधारी जनार्दन हैं — यही कर्ता और संहर्ता हैं, यही प्राणियों के आत्मा, उनके रचयिता और स्वामी हैं।

श्लोक 19 (3.191.19)

अचिन्त्यं महदाश्चर्यं पवित्रमिति चोच्यते । अनादिनिधनं भूतं विश्वमव्ययमक्षयम् ॥

acintyaṃ mahadāścaryaṃ pavitramiti cocyate | anādinidhanaṃ bhūtaṃ viśvamavyayamakṣayam

"इन्हीं को अचिन्त्य, महान् आश्चर्य और पवित्र कहा जाता है; ये आदि और अन्त से रहित सत्ता हैं, यही विश्व हैं, अव्यय और अक्षय।

श्लोक 20 (3.191.20)

एष कर्ता न क्रियते कारणं चापि पौरुषे । को ह्येनं पुरुषं वेत्ति देवा अपि न तं विदुः ॥

eṣa kartā na kriyate kāraṇaṃ cāpi pauruṣe | ko hyenaṃ puruṣaṃ vetti devā api na taṃ viduḥ

"ये कर्ता हैं, पर इन्हें कोई नहीं रचता; पुरुषार्थ का कारण भी यही हैं। इस पुरुष को वास्तव में कौन जानता है? देवता भी इन्हें नहीं जानते।

श्लोक 21 (3.191.21)

सर्वमाश्चर्यमेवैतन्निर्वृत्तं राजसत्तम । आदितो मनुजव्याघ्र कृत्स्नस्य जगतः क्षये ॥

sarvamāścaryamevaitannirvṛttaṃ rājasattama | ādito manujavyāghra kṛtsnasya jagataḥ kṣaye

"हे राजश्रेष्ठ, हे नरव्याघ्र, सम्पूर्ण जगत् के आरम्भ से लेकर उसके विनाश तक यह सारा आश्चर्य इन्हीं से प्रकट हुआ है।

श्लोक 22 (3.191.22)

चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम् । तस्य तावच्छती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः ॥

catvāryāhuḥ sahasrāṇi varṣāṇāṃ tatkṛtaṃ yugam | tasya tāvacchatī sandhyā sandhyāṃśaśca tathāvidhaḥ

"कहते हैं, चार हज़ार वर्षों का कृतयुग होता है। उसकी संध्या उतने ही सौ वर्षों की होती है, और संध्यांश भी उतना ही।

श्लोक 23 (3.191.23)

त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते । तस्य तावच्छती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च ततः परं ॥

trīṇi varṣasahasrāṇi tretāyugamihocyate | tasya tāvacchatī sandhyā sandhyāṃśaśca tataḥ paraṃ

"तीन हज़ार वर्षों का त्रेतायुग कहा जाता है; उसकी संध्या उतने ही सौ वर्षों की होती है, और उसके बाद संध्यांश भी उतना ही।

श्लोक 24 (3.191.24)

तथा वर्षसहस्रे द्वे द्वापरं परिमाणतः । तस्यापि द्विशती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः ॥

tathā varṣasahasre dve dvāparaṃ parimāṇataḥ | tasyāpi dviśatī sandhyā sandhyāṃśaśca tathāvidhaḥ

"इसी प्रकार द्वापर का परिमाण दो हज़ार वर्ष है; उसकी संध्या दो सौ वर्षों की होती है, और संध्यांश भी उतना ही।

श्लोक 25 (3.191.25)

सहस्रमेकं वर्षाणां ततः कलियुगं स्मृतम् । तस्य वर्षशतं सन्ध्या सन्ध्यांशश्च ततः परम् ॥

sahasramekaṃ varṣāṇāṃ tataḥ kaliyugaṃ smṛtam | tasya varṣaśataṃ sandhyā sandhyāṃśaśca tataḥ param

"उसके बाद कलियुग एक हज़ार वर्षों का माना जाता है; उसकी संध्या सौ वर्षों की होती है, और उसके बाद संध्यांश भी उतना ही।

श्लोक 26 (3.191.26)

सन्ध्यासंध्यांशयोस्तुल्यं प्रमाणमुपधारय । क्षीणे कलियुगे चैव प्रवर्तति कृतं युगम् ॥

sandhyāsaṃdhyāṃśayostulyaṃ pramāṇamupadhāraya | kṣīṇe kaliyuge caiva pravartati kṛtaṃ yugam

"समझ लो कि संध्या और संध्यांश का परिमाण बराबर होता है। और जब कलियुग समाप्त हो जाता है, तब फिर कृतयुग आरम्भ होता है।

श्लोक 27 (3.191.27)

एषा द्वादशसाहस्री युगाख्या परिकीर्तिता । एतत्सहस्रपर्यन्तमहो ब्राह्ममुदाहृतम् ॥

eṣā dvādaśasāhasrī yugākhyā parikīrtitā | etatsahasraparyantamaho brāhmamudāhṛtam

"बारह हज़ार वर्षों का यह काल 'युग' नाम से प्रसिद्ध है। ऐसे एक हज़ार युगों का ब्रह्मा का एक दिन बताया गया है।

श्लोक 28 (3.191.28)

विश्वं हि ब्रह्मभवने सर्वतः परिवर्तते । लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलयं तं विदुर्बुधाः ॥

viśvaṃ hi brahmabhavane sarvataḥ parivartate | lokānāṃ manujavyāghra pralayaṃ taṃ vidurbudhāḥ

"तब सारा विश्व पूर्णतः ब्रह्मा के धाम में लौट जाता है; हे नरव्याघ्र, ज्ञानी उसी को लोकों का प्रलय कहते हैं।

श्लोक 29 (3.191.29)

अल्पावशिष्टे तु तदा युगान्ते भरतर्षभ । सहस्रान्ते नराः सर्वे प्रायशोऽनृतवादिनः ॥

alpāvaśiṣṭe tu tadā yugānte bharatarṣabha | sahasrānte narāḥ sarve prāyaśo'nṛtavādinaḥ

"हे भरतश्रेष्ठ, जब युग का थोड़ा ही भाग शेष रहता है, उस सहस्र के अन्त में प्रायः सभी मनुष्य झूठ बोलने लगते हैं।

श्लोक 30 (3.191.30)

यज्ञप्रतिनिधिः पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा । व्रतप्रतिनिधिश्चैव तस्मिन्काले प्रवर्तते ॥

yajñapratinidhiḥ pārtha dānapratinidhistathā | vratapratinidhiścaiva tasminkāle pravartate

"हे पार्थ, उस समय यज्ञ के स्थान पर उसका प्रतिनिधि, दान के स्थान पर उसका प्रतिनिधि और व्रत के स्थान पर उसका प्रतिनिधि चल पड़ता है।

श्लोक 31 (3.191.31)

ब्राह्मणाः शूद्रकर्माणस्तथा शूद्रा धनार्जकाः । क्षत्रधर्मेण वाऽप्यत्र वर्तयन्ति युगक्षये ॥

brāhmaṇāḥ śūdrakarmāṇastathā śūdrā dhanārjakāḥ | kṣatradharmeṇa vā'pyatra vartayanti yugakṣaye

"युग के क्षय के समय ब्राह्मण शूद्रों के कर्म करते हैं, और शूद्र धन कमाते हैं या क्षत्रिय-धर्म से जीविका चलाते हैं।

श्लोक 32 (3.191.32)

निवृत्तयज्ञस्वाध्याया दण्डाजिनविवर्जिताः । ब्राह्मणाः सर्वभक्षाश्च भविष्यन्ति कलौ युगे ॥

nivṛttayajñasvādhyāyā daṇḍājinavivarjitāḥ | brāhmaṇāḥ sarvabhakṣāśca bhaviṣyanti kalau yuge

"कलियुग में ब्राह्मण यज्ञ और स्वाध्याय छोड़ देंगे, दण्ड और मृगचर्म त्याग देंगे और सब कुछ खाने लगेंगे।

श्लोक 33 (3.191.33)

अजपा ब्राह्मणास्तात शूद्रा जपपरायणाः । विपरीते तदा लोके पूर्वरूपं क्षयस्य तत् ॥

ajapā brāhmaṇāstāta śūdrā japaparāyaṇāḥ | viparīte tadā loke pūrvarūpaṃ kṣayasya tat

"तात, ब्राह्मण जप नहीं करेंगे और शूद्र जप में लगे रहेंगे। जब संसार इस प्रकार उलट जाता है, तो वही उसके विनाश का पूर्व लक्षण है।

श्लोक 34 (3.191.34)

बहवो म्लेच्छराजानः पृथिव्यां मनुजाधिप । मृषानुशासिनः पापा मृषावादपरायणाः ॥

bahavo mleccharājānaḥ pṛthivyāṃ manujādhipa | mṛṣānuśāsinaḥ pāpā mṛṣāvādaparāyaṇāḥ

"हे मनुजेश्वर, पृथ्वी पर बहुत-से म्लेच्छ राजा होंगे — पापी, झूठ से शासन करने वाले और असत्य भाषण में लगे रहने वाले।

श्लोक 35 (3.191.35)

आन्ध्राः शकाः पुलिन्दाश्च यवनाश्च नराधिपाः । काम्भोजा बाह्लिकाः शूराऽऽभीरास्तथा नरोत्तम ॥

āndhrāḥ śakāḥ pulindāśca yavanāśca narādhipāḥ | kāmbhojā bāhlikāḥ śūrā''bhīrāstathā narottama

"हे नरश्रेष्ठ, आन्ध्र, शक, पुलिन्द और यवन राजा होंगे, और काम्भोज, बाह्लिक, शूर तथा आभीर भी।

श्लोक 36 (3.191.36)

न तदा ब्राह्मणः कश्चित्स्वधर्ममुपजीवति । क्षत्रियाश्चापि वैश्याश्च विकर्मस्था नराधिप ॥

na tadā brāhmaṇaḥ kaścitsvadharmamupajīvati | kṣatriyāścāpi vaiśyāśca vikarmasthā narādhipa

"हे नराधिप, तब कोई ब्राह्मण अपने धर्म से जीविका नहीं चलाता, और क्षत्रिय तथा वैश्य भी अपने कर्म छोड़कर दूसरे कर्मों में लग जाते हैं।

श्लोक 37 (3.191.37)

अल्पायुषः स्वल्पबलाः स्वल्पवीर्यपराक्रमाः । अल्पसाराल्पदेहाश्च तथा सत्याल्पभाषिणः ॥

alpāyuṣaḥ svalpabalāḥ svalpavīryaparākramāḥ | alpasārālpadehāśca tathā satyālpabhāṣiṇaḥ

"लोग अल्पायु, अल्पबल, थोड़े वीर्य और पराक्रम वाले, निःसार, छोटे शरीर वाले और बहुत कम सच बोलने वाले होते हैं।

श्लोक 38 (3.191.38)

बहुशून्या जनपदा मृगव्यालावृता दिशः । युगान्ते समनुप्राप्ते वृथा च ब्रह्मवादिनः ॥

bahuśūnyā janapadā mṛgavyālāvṛtā diśaḥ | yugānte samanuprāpte vṛthā ca brahmavādinaḥ

"जनपद बहुत-कुछ सूने हो जाते हैं, दिशाएँ मृगों और हिंस्र पशुओं से भर जाती हैं; युग का अन्त आने पर ब्रह्म की बातें करने वाले व्यर्थ ही बोलते हैं।

श्लोक 39 (3.191.39)

भोवादिनस्तथा शूद्रा ब्राह्मणाश्चार्यवादिनः । युगान्ते मनुजव्याघ्र भवन्ति बहुजन्तवः ॥

bhovādinastathā śūdrā brāhmaṇāścāryavādinaḥ | yugānte manujavyāghra bhavanti bahujantavaḥ

"शूद्र ब्राह्मणों को 'अरे' कहकर पुकारते हैं और ब्राह्मण शूद्रों को 'आर्य' कहते हैं; हे नरव्याघ्र, युग के अन्त में जीव-जन्तु बहुत बढ़ जाते हैं।

श्लोक 40 (3.191.40)

न तथा घ्राणयुक्ताश्च सर्वगन्धा विशांपते । रसाश्च मनुजव्याघ्र न तथा स्वादुयोगिनः ॥

na tathā ghrāṇayuktāśca sarvagandhā viśāṃpate | rasāśca manujavyāghra na tathā svāduyoginaḥ

"हे प्रजानाथ, सुगन्धियों में वैसी गन्ध नहीं रहती, और हे नरव्याघ्र, रसों में वैसा स्वाद नहीं रहता।

श्लोक 41 (3.191.41)

बहुप्रजा ह्रस्वदेहाः शीलाचारविवर्जिताः । मुखेभगाः स्त्रियो राजन्भविष्यन्ति युगक्षये ॥

bahuprajā hrasvadehāḥ śīlācāravivarjitāḥ | mukhebhagāḥ striyo rājanbhaviṣyanti yugakṣaye

"हे राजन्, युग के क्षय के समय स्त्रियाँ बहुत संतान वाली, छोटे शरीर वाली, शील और सदाचार से रहित होंगी और मुख से कामाचार करने वाली होंगी।

श्लोक 42 (3.191.42)

अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः । केशशूलाः स्त्रियो राजन्भविष्यन्ति युगक्षये ॥

aṭṭaśūlā janapadāḥ śivaśūlāścatuṣpathāḥ | keśaśūlāḥ striyo rājanbhaviṣyanti yugakṣaye

"हे राजन्, युग के क्षय के समय जनपदों के लोग अन्न बेचेंगे, ब्राह्मण वेद बेचेंगे और स्त्रियाँ अपना शरीर बेचेंगी।

श्लोक 43 (3.191.43)

अल्पक्षीरास्तथा गावो भविष्यन्ति जनाधिप । अल्पपुष्पफलाश्चापि पादपा बहुवायसाः ॥

alpakṣīrāstathā gāvo bhaviṣyanti janādhipa | alpapuṣpaphalāścāpi pādapā bahuvāyasāḥ

"हे जनाधिप, गायें थोड़ा दूध देंगी, और वृक्षों पर फूल-फल कम होंगे तथा कौए बहुत होंगे।

श्लोक 44 (3.191.44)

ब्रह्मवध्यानुलिप्तानां तथा मिथ्याभिशंसिनाम् । नृपाणां पृथिवीपाल प्रतिगृह्णन्ति वै द्विजाः ॥

brahmavadhyānuliptānāṃ tathā mithyābhiśaṃsinām | nṛpāṇāṃ pṛthivīpāla pratigṛhṇanti vai dvijāḥ

"हे पृथ्वीपाल, ब्राह्मण उन राजाओं से भी दान लेंगे जो ब्रह्महत्या से कलंकित और झूठे दोषारोपण करने वाले हैं।

श्लोक 45 (3.191.45)

लोभमोहपरीताश्च मिथ्याधर्मध्वजावृताः । भिक्षार्थं पृथिवीपाल चञ्चूर्यन्ते द्विजैर्दिशः ॥

lobhamohaparītāśca mithyādharmadhvajāvṛtāḥ | bhikṣārthaṃ pṛthivīpāla cañcūryante dvijairdiśaḥ

"हे पृथ्वीपाल, लोभ और मोह से घिरे, झूठे धर्म की ध्वजा ओढ़े ब्राह्मण भिक्षा के लिए दिशा-दिशा में भटकेंगे।

श्लोक 46 (3.191.46)

करभारभयाद्भीता गृहस्थाः परिमोषकाः । मुनिच्छद्माकृतिच्छन्ना वाणिज्यमुपभुञ्जते ॥

karabhārabhayādbhītā gṛhasthāḥ parimoṣakāḥ | municchadmākṛticchannā vāṇijyamupabhuñjate

"करों के बोझ के भय से डरे हुए गृहस्थ चोर बन जाते हैं; मुनियों का-सा वेश धारण करके छिपे हुए वे व्यापार से जीविका चलाते हैं।

श्लोक 47 (3.191.47)

मिथ्या च नखरोमाणि धारयन्ति तदा द्विजाः । अर्थलोभान्नरव्याघ्र वृथा च ब्रह्मचारिणः ॥

mithyā ca nakharomāṇi dhārayanti tadā dvijāḥ | arthalobhānnaravyāghra vṛthā ca brahmacāriṇaḥ

"तब ब्राह्मण दिखावे के लिए नख और केश बढ़ाते हैं; हे नरव्याघ्र, धन के लोभ से वे केवल नाम के ब्रह्मचारी होते हैं।

श्लोक 48 (3.191.48)

आश्रमेषु वृथाचाराः पानपा गुरुतल्पगाः । ऐहलौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम् ॥

āśrameṣu vṛthācārāḥ pānapā gurutalpagāḥ | aihalaukikamīhante māṃsaśoṇitavardhanam

"आश्रमों में लोग व्यर्थ आचरण करते हैं, मदिरा पीते हैं और गुरु-शय्या को दूषित करते हैं; वे केवल इसी लोक की वस्तुएँ चाहते हैं जो मांस और रक्त को बढ़ाती हैं।

श्लोक 49 (3.191.49)

पारलौकिककार्येषु प्रमत्ता भृशनास्तिकाः । बहुपाषण्डसंकीर्णाः परान्नगुणवादिनः । आश्रमा मनुजव्याघ्र न भवन्ति युगक्षये ॥

pāralaukikakāryeṣu pramattā bhṛśanāstikāḥ | bahupāṣaṇḍasaṃkīrṇāḥ parānnaguṇavādinaḥ | āśramā manujavyāghra na bhavanti yugakṣaye

"परलोक के कर्मों में प्रमादी, घोर नास्तिक, अनेक पाखण्डियों से भरे और पराए अन्न का गुण गाने वालों से घिरे — हे नरव्याघ्र, ऐसे आश्रम युग के क्षय के समय रहते ही नहीं।

श्लोक 50 (3.191.50)

यथर्तुवर्षी भगवान्न तथा पाकशासनः । न चापि सर्वबीजानि सम्यग्रोहन्ति भारत ॥

yathartuvarṣī bhagavānna tathā pākaśāsanaḥ | na cāpi sarvabījāni samyagrohanti bhārata

"हे भारत, पाकशासन भगवान् इन्द्र पहले की भाँति ऋतु के अनुसार वर्षा नहीं करते, और सब बीज भी ठीक से नहीं उगते।

श्लोक 51 (3.191.51)

फलं धर्मस्य राजेन्द्र सर्वत्र परिहीयते । हिंसाभिरामश्च जनस्तथा संपद्यतेऽशुचिः । अधर्मफलमत्यर्थं तदा भवति चानघ ॥

phalaṃ dharmasya rājendra sarvatra parihīyate | hiṃsābhirāmaśca janastathā saṃpadyate'śuciḥ | adharmaphalamatyarthaṃ tadā bhavati cānagha

"हे राजेन्द्र, धर्म का फल सब जगह घटता जाता है; लोग हिंसा में आनन्द लेने वाले और अपवित्र हो जाते हैं; और हे निष्पाप, अधर्म का फल अत्यधिक बढ़ जाता है।

श्लोक 52 (3.191.52)

तदा च पृथिवीपाल यो भवेद्धर्मसंयुतः । अल्पायुः स हि मन्तव्यो न हि धर्मोस्ति कश्चन ॥

tadā ca pṛthivīpāla yo bhaveddharmasaṃyutaḥ | alpāyuḥ sa hi mantavyo na hi dharmosti kaścana

"हे पृथ्वीपाल, उस समय जो धर्म से युक्त होता है उसे अल्पायु ही समझना चाहिए, क्योंकि तब धर्म रहता ही नहीं।

श्लोक 53 (3.191.53)

भूयिष्ठं कूटमानैश्च पण्यं विक्रीणते जनाः । वणिजश्च नरव्याघ्र बहुमाया भवन्त्युत ॥

bhūyiṣṭhaṃ kūṭamānaiśca paṇyaṃ vikrīṇate janāḥ | vaṇijaśca naravyāghra bahumāyā bhavantyuta

"लोग प्रायः खोटे नाप-तौल से माल बेचते हैं, और हे नरव्याघ्र, व्यापारी बड़े छल-कपट वाले हो जाते हैं।

श्लोक 54 (3.191.54)

धर्मिष्ठाः परिहीयन्ते पापीयान्वर्धते जनः । धर्मस्य बलहानिः स्यादधर्मश्च बलायते ॥

dharmiṣṭhāḥ parihīyante pāpīyānvardhate janaḥ | dharmasya balahāniḥ syādadharmaśca balāyate

"धर्मात्मा घटते जाते हैं और पापी लोग बढ़ते हैं; धर्म का बल क्षीण होता है और अधर्म बलवान हो जाता है।

श्लोक 55 (3.191.55)

अल्पायुषो दरिद्राश्च धर्मिष्ठा मानवास्तथा । दीर्घायुषः समृद्धाश्च विधर्माणो युगक्षये ॥

alpāyuṣo daridrāśca dharmiṣṭhā mānavāstathā | dīrghāyuṣaḥ samṛddhāśca vidharmāṇo yugakṣaye

"युग के क्षय के समय धर्मात्मा मनुष्य अल्पायु और दरिद्र होते हैं, जबकि अधर्मी दीर्घायु और समृद्ध होते हैं।

श्लोक 56 (3.191.56)

नगराणां विहारेषु विधर्माणो युगक्षये । अधर्मिष्ठैरुपायैश्च प्रजा व्यवहरन्त्युत ॥

nagarāṇāṃ vihāreṣu vidharmāṇo yugakṣaye | adharmiṣṭhairupāyaiśca prajā vyavaharantyuta

"युग के क्षय के समय नगरों के विहार-स्थलों में अधर्मी लोग भरे रहते हैं, और प्रजा अधर्मपूर्ण उपायों से व्यवहार करती है।

श्लोक 57 (3.191.57)

संचयेन तथाऽल्पेन भवन्त्याढ्यमदान्विताः । धनं विश्वासतो न्यस्तं मिथो भूयिष्ठशो नराः ॥

saṃcayena tathā'lpena bhavantyāḍhyamadānvitāḥ | dhanaṃ viśvāsato nyastaṃ mitho bhūyiṣṭhaśo narāḥ

"थोड़े-से संचय से ही लोग धनी होकर मद से भर जाते हैं। विश्वास करके सौंपे गए धन को अधिकतर लोग आपस में

श्लोक 58 (3.191.58)

हर्तुं व्यवसिता राजन्पापाचारसमन्विताः । नैतदस्तीति मनुजा वर्तन्ते निरपत्रपाः ॥

hartuṃ vyavasitā rājanpāpācārasamanvitāḥ | naitadastīti manujā vartante nirapatrapāḥ

"हड़पने को तत्पर रहते हैं, हे राजन्, पापाचार से युक्त होकर; और निर्लज्ज मनुष्य 'ऐसा कुछ है ही नहीं' कहते हुए व्यवहार करते हैं।

श्लोक 59 (3.191.59)

पुरुषादानि सत्वानि पक्षिणोऽथ मृगास्तथा । नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते ॥

puruṣādāni satvāni pakṣiṇo'tha mṛgāstathā | nagarāṇāṃ vihāreṣu caityeṣvapi ca śerate

"मनुष्यों को खाने वाले जीव, पक्षी और पशु नगरों के विहार-स्थलों में और देवस्थानों में भी पड़े रहते हैं।

श्लोक 60 (3.191.60)

सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च स्त्रियो गर्भधरा नृप । दशद्वादशवर्षाणां पुंसां पुत्रः प्रजायते ॥

saptavarṣāṣṭavarṣāśca striyo garbhadharā nṛpa | daśadvādaśavarṣāṇāṃ puṃsāṃ putraḥ prajāyate

"हे नृप, सात-आठ वर्ष की कन्याएँ गर्भ धारण करती हैं, और दस-बारह वर्ष के बालकों के पुत्र उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 61 (3.191.61)

भवन्ति षोडशे वर्षे नराः पलितिनस्तथा । आयुःक्षयो मनुष्याणां क्षिप्रमेव प्रपद्यते ॥

bhavanti ṣoḍaśe varṣe narāḥ palitinastathā | āyuḥkṣayo manuṣyāṇāṃ kṣiprameva prapadyate

"सोलहवें वर्ष में ही पुरुषों के बाल पक जाते हैं, और मनुष्यों की आयु शीघ्र ही क्षीण हो जाती है।

श्लोक 62 (3.191.62)

क्षीणायुषो महाराज तरुणा वृद्धशीलिनः । तरुणानां च यच्छीलं तद्वृद्धेषु प्रजायते ॥

kṣīṇāyuṣo mahārāja taruṇā vṛddhaśīlinaḥ | taruṇānāṃ ca yacchīlaṃ tadvṛddheṣu prajāyate

"हे महाराज, अल्पायु युवक वृद्धों जैसा आचरण करते हैं, और जो स्वभाव युवकों का होता है वह वृद्धों में दिखाई देता है।

श्लोक 63 (3.191.63)

विपरीतास्तदा नार्यो वञ्चयित्वाऽर्हतः पतीन् । व्युच्चरन्त्यपि दुःशीला दासैः पशुभिरेव च ॥

viparītāstadā nāryo vañcayitvā'rhataḥ patīn | vyuccarantyapi duḥśīlā dāsaiḥ paśubhireva ca

"तब स्त्रियाँ विपरीत आचरण वाली हो जाती हैं; अपने योग्य पतियों को धोखा देकर वे दुराचारिणी दासों और पशुओं के साथ भी व्यभिचार करती हैं।

श्लोक 64 (3.191.64)

वीरपत्न्यस्तथा नार्यः संश्रयन्ति नरान्नृप । भर्तारमपि जीवन्तमन्यान्व्यभिचरन्त्युत ॥

vīrapatnyastathā nāryaḥ saṃśrayanti narānnṛpa | bhartāramapi jīvantamanyānvyabhicarantyuta

"हे नृप, इसी प्रकार वीरों की पत्नियाँ भी दूसरे पुरुषों का आश्रय लेती हैं, और पति के जीवित रहते भी दूसरों के साथ व्यभिचार करती हैं।

श्लोक 65 (3.191.65)

तस्मिन्युगसहस्रान्ते संप्राप्ते चायुषः क्षये । अनावृष्टिर्महाराज जायते बहुवार्षिकी ॥

tasminyugasahasrānte saṃprāpte cāyuṣaḥ kṣaye | anāvṛṣṭirmahārāja jāyate bahuvārṣikī

"हे महाराज, जब सहस्र युगों का वह अन्त आ पहुँचता है और आयु क्षीण हो जाती है, तब अनेक वर्षों तक चलने वाली अनावृष्टि होती है।

श्लोक 66 (3.191.66)

ततस्तान्यल्पसाराणि सत्वानि क्षुधितानि वै । प्रलयं यान्ति भूयिष्ठं पृथिव्यां पृथिवीपते ॥

tatastānyalpasārāṇi satvāni kṣudhitāni vai | pralayaṃ yānti bhūyiṣṭhaṃ pṛthivyāṃ pṛthivīpate

"हे पृथ्वीपति, तब वे दुर्बल प्राणी भूख से व्याकुल होकर पृथ्वी पर बड़ी संख्या में नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 67 (3.191.67)

ततो दिनकरैर्दीप्तैः सप्तभिर्मनुजाधिप । पीयते सलिलं सर्वं समुद्रेषु सरित्सु च ॥

tato dinakarairdīptaiḥ saptabhirmanujādhipa | pīyate salilaṃ sarvaṃ samudreṣu saritsu ca

"हे मनुजाधिप, तब सात प्रज्वलित सूर्य समुद्रों और नदियों का सारा जल पी जाते हैं।

श्लोक 68 (3.191.68)

यच्च काष्ठं तृणं चापि शुष्कं चार्द्रं च भारत । सर्वं तद्भस्मसाद्भूतं दृश्यते भरतर्षभ ॥

yacca kāṣṭhaṃ tṛṇaṃ cāpi śuṣkaṃ cārdraṃ ca bhārata | sarvaṃ tadbhasmasādbhūtaṃ dṛśyate bharatarṣabha

"हे भारत, जो भी लकड़ी और घास है, सूखी हो या गीली, हे भरतश्रेष्ठ, वह सब भस्म हुई दिखाई देती है।

श्लोक 69 (3.191.69)

ततः संवर्तको वह्निर्वायुना सह भारत । लोकमाविशते पूर्वमादित्यैरुपशोषितम् ॥

tataḥ saṃvartako vahnirvāyunā saha bhārata | lokamāviśate pūrvamādityairupaśoṣitam

"हे भारत, तब संवर्तक अग्नि वायु के साथ उस लोक में प्रवेश करती है जिसे सूर्य पहले ही सुखा चुके होते हैं।

श्लोक 70 (3.191.70)

ततः स पृथिवीं भित्त्वा प्रविश्य च रसातलम् । देवदानवयक्षाणां भयं जनयते महत् ॥

tataḥ sa pṛthivīṃ bhittvā praviśya ca rasātalam | devadānavayakṣāṇāṃ bhayaṃ janayate mahat

"तब वह पृथ्वी को फाड़कर रसातल में प्रवेश करती है और देवताओं, दानवों तथा यक्षों में महान् भय उत्पन्न करती है।

श्लोक 71 (3.191.71)

निर्दहन्नागलोकं च यच्च किंचित्क्षिताविह । अधस्तात्पृथिवीपाल सर्वं नाशयते क्षणात् ॥

nirdahannāgalokaṃ ca yacca kiṃcitkṣitāviha | adhastātpṛthivīpāla sarvaṃ nāśayate kṣaṇāt

"हे पृथ्वीपाल, नागलोक को और यहाँ पृथ्वी पर जो कुछ है उसे जलाती हुई वह नीचे का सब कुछ क्षणभर में नष्ट कर देती है।

श्लोक 72 (3.191.72)

ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च । निर्दहत्यशिवो वायुः स च संवर्तकोऽनलः ॥

tato yojanaviṃśānāṃ sahasrāṇi śatāni ca | nirdahatyaśivo vāyuḥ sa ca saṃvartako'nalaḥ

"तब वह अशुभ वायु और वह संवर्तक अग्नि बीस-बीस योजनों के सैकड़ों और हज़ारों विस्तारों को जला डालते हैं।

श्लोक 73 (3.191.73)

सदेवासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् । ततो दहति दीप्तः स सर्वमेव जगद्विभुः ॥

sadevāsuragandharvaṃ sayakṣoragarākṣasam | tato dahati dīptaḥ sa sarvameva jagadvibhuḥ

तब वह प्रज्वलित, समर्थ अग्नि देवताओं, असुरों, गन्धर्वों, यक्षों, नागों और राक्षसों सहित समस्त जगत को जला डालती है।

श्लोक 74 (3.191.74)

ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिताः । उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शनाः ॥

tato gajakulaprakhyāstaḍinmālāvibhūṣitāḥ | uttiṣṭhanti mahāmeghā nabhasyadbhutadarśanāḥ

तब हाथियों के झुंड जैसे, बिजली की मालाओं से सजे, देखने में अद्भुत महामेघ आकाश में उठते हैं।

श्लोक 75 (3.191.75)

केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित्कुमुदसन्निभाः । केचित्किञ्जल्कसंकाशाः केचित्पीताः पयोधराः ॥

kecinnīlotpalaśyāmāḥ kecitkumudasannibhāḥ | kecitkiñjalkasaṃkāśāḥ kecitpītāḥ payodharāḥ

कुछ नीले कमल के समान साँवले हैं, कुछ कुमुद के समान; कुछ कमल-केसर जैसे दिखते हैं और कुछ मेघ पीले हैं।

श्लोक 76 (3.191.76)

केचिद्धारिद्रसंकाशाः कारण्डवनिभास्तथा । केचित्कमलपत्राभाः केचिद्धिङ्गुलसप्रभाः ॥

keciddhāridrasaṃkāśāḥ kāraṇḍavanibhāstathā | kecitkamalapatrābhāḥ keciddhiṅgulasaprabhāḥ

कुछ हल्दी के रंग के हैं, कुछ कारण्डव पक्षियों जैसे; कुछ कमल-दल की आभा वाले हैं और कुछ हिंगुल (सिन्दूर) जैसी कान्ति वाले।

श्लोक 77 (3.191.77)

केचित्पुरवराकाराः केचिद्गजकुलोपमाः । केचिदञ्जनसंकाशाः केचिन्मकरसन्निभाः ॥

kecitpuravarākārāḥ kecidgajakulopamāḥ | kecidañjanasaṃkāśāḥ kecinmakarasannibhāḥ

कुछ श्रेष्ठ नगरों के आकार के हैं, कुछ हाथियों के झुंड जैसे; कुछ अंजन के समान काले हैं और कुछ मगरों जैसे।

श्लोक 78 (3.191.78)

विद्युन्मालापिनद्धाङ्गाः समुत्तिष्ठन्ति वै घनाः । घोररूपा महाराज घोरस्वननिनादिताः ॥

vidyunmālāpinaddhāṅgāḥ samuttiṣṭhanti vai ghanāḥ | ghorarūpā mahārāja ghorasvananināditāḥ

हे महाराज, बिजली की मालाओं से लिपटे अंगों वाले, भयंकर रूप वाले और भयानक गर्जन से गूँजते हुए वे मेघ उठ खड़े होते हैं।

श्लोक 79 (3.191.79)

ततो जलधराः सर्वं व्याप्नुवन्ति नभस्तलम् । गर्जन्तः पृथिवीपाल पृथिवीधरसन्निभाः ॥

tato jaladharāḥ sarvaṃ vyāpnuvanti nabhastalam | garjantaḥ pṛthivīpāla pṛthivīdharasannibhāḥ

तब हे पृथ्वीपाल, पर्वतों जैसे वे मेघ गरजते हुए सारे आकाश-मण्डल पर छा जाते हैं।

श्लोक 80 (3.191.80)

तैरियं पृथिवी सर्वा सपर्वतवनाकरा । आपूर्यते महाराज सलिलौघपरिप्लुता ॥

tairiyaṃ pṛthivī sarvā saparvatavanākarā | āpūryate mahārāja salilaughapariplutā

हे महाराज, उनके द्वारा पर्वतों, वनों और खानों सहित यह सारी पृथ्वी जल की बाढ़ में डूबकर भर जाती है।

श्लोक 81 (3.191.81)

ततस्ते जलदा घोरा राविणः पुरुषर्षभ । पर्वतान्प्लावयन्त्याशु चोदिताः परमेष्ठिना ॥

tataste jaladā ghorā rāviṇaḥ puruṣarṣabha | parvatānplāvayantyāśu coditāḥ parameṣṭhinā

हे पुरुषश्रेष्ठ, तब परमेष्ठी की प्रेरणा से वे भयंकर, गरजते हुए मेघ शीघ्र ही पर्वतों को जल में डुबो देते हैं।

श्लोक 82 (3.191.82)

वर्षमाणा महत्तोयं पूरयन्तो वसुंधराम् । सुघोरमशिवं रौद्रं नाशयन्ति च पावकम् ॥

varṣamāṇā mahattoyaṃ pūrayanto vasuṃdharām | sughoramaśivaṃ raudraṃ nāśayanti ca pāvakam

भारी जल बरसाते और पृथ्वी को भरते हुए वे उस अत्यन्त भयानक, अमंगल और उग्र अग्नि को बुझा देते हैं।

श्लोक 83 (3.191.83)

ततो द्वादशवर्षाणि पयोदास्त उपप्लवे । धाराभिः पूरयन्तो वै चोद्यमाना महात्मना ॥

tato dvādaśavarṣāṇi payodāsta upaplave | dhārābhiḥ pūrayanto vai codyamānā mahātmanā

फिर उस प्रलय में बारह वर्षों तक, उस महात्मा की प्रेरणा से, वे मेघ अपनी धाराओं से सब कुछ भरते रहते हैं।

श्लोक 84 (3.191.84)

ततः समुद्रः स्वां वेलामतिक्रामति भारत । पर्वताश्च विदीर्यन्ते मही चापि विदीर्यते ॥

tataḥ samudraḥ svāṃ velāmatikrāmati bhārata | parvatāśca vidīryante mahī cāpi vidīryate

तब हे भारत, समुद्र अपनी सीमा लाँघ जाता है, पर्वत फट जाते हैं और पृथ्वी भी विदीर्ण हो जाती है।

श्लोक 85 (3.191.85)

सर्वतः सहसा भ्रान्तास्ते पयोदा नभस्तलम् । संवेष्टयित्वा नश्यन्ति वायुवेगपराहताः ॥

sarvataḥ sahasā bhrāntāste payodā nabhastalam | saṃveṣṭayitvā naśyanti vāyuvegaparāhatāḥ

वे मेघ अचानक चारों ओर घूमते हुए आकाश को घेर लेते हैं और फिर वायु के वेग से आहत होकर नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 86 (3.191.86)

ततस्तं मारुतं घोरं स्वयंभूर्मनुजाधिप । आदिः पद्मालयो देवः पीत्वा स्वपिति भारत ॥

tatastaṃ mārutaṃ ghoraṃ svayaṃbhūrmanujādhipa | ādiḥ padmālayo devaḥ pītvā svapiti bhārata

तब हे नरेश्वर, कमल में निवास करने वाले आदिदेव स्वयम्भू उस भयंकर वायु को पीकर सो जाते हैं, हे भारत।

श्लोक 87 (3.191.87)

तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे । नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते ॥

tasminnekārṇave ghore naṣṭe sthāvarajaṅgame | naṣṭe devāsuragaṇe yakṣarākṣasavarjite

उस भयानक एकार्णव में, जब सारे चर-अचर नष्ट हो चुके हों, देवताओं और असुरों के समूह मिट चुके हों और यक्ष-राक्षस भी न रहे हों,

श्लोक 88 (3.191.88)

निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे । अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन्भ्रमाम्येकोऽहमातुरः ॥

nirmanuṣye mahīpāla niḥśvāpadamahīruhe | anantarikṣe loke'sminbhramāmyeko'hamāturaḥ

जब हे महीपाल, न मनुष्य हों, न हिंसक पशु, न वृक्ष, और आकाश तक न रहा हो — ऐसे इस लोक में मैं अकेला, व्याकुल होकर भटकता हूँ।

श्लोक 89 (3.191.89)

एकार्णवे जले घोरे विचरन्पार्थिवोत्तम । अपश्यन्सर्वभूतानि वैक्लब्यमगमं ततः ॥

ekārṇave jale ghore vicaranpārthivottama | apaśyansarvabhūtāni vaiklabyamagamaṃ tataḥ

हे राजश्रेष्ठ, उस एकार्णव के भयानक जल में विचरते हुए और कहीं कोई प्राणी न देखकर मैं तब घबरा उठा।

श्लोक 90 (3.191.90)

ततः सुदीर्घं गत्वाऽहं प्लवमानो धराधिप । श्रान्तः क्वचिन्न शरणं लब्धवानस्म्यतन्द्रितः ॥

tataḥ sudīrghaṃ gatvā'haṃ plavamāno dharādhipa | śrāntaḥ kvacinna śaraṇaṃ labdhavānasmyatandritaḥ

फिर हे धराधिप, तैरते हुए बहुत दूर तक जाकर, थका होने पर भी बिना शिथिल हुए, मुझे कहीं कोई आश्रय नहीं मिला।

श्लोक 91 (3.191.91)

ततः कदाचित्पश्यामि तस्मिन्सलिलसंनिधौ । न्यग्रोधं सुमहान्तं वै विशालं पृथिवीपते ॥

tataḥ kadācitpaśyāmi tasminsalilasaṃnidhau | nyagrodhaṃ sumahāntaṃ vai viśālaṃ pṛthivīpate

फिर किसी समय, हे पृथ्वीपति, उस जलराशि में मैं एक अत्यन्त विशाल, दूर तक फैला हुआ वटवृक्ष देखता हूँ।

श्लोक 92 (3.191.92)

शाखायां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णायां नराधिप । पर्यङ्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्तृते ॥

śākhāyāṃ tasya vṛkṣasya vistīrṇāyāṃ narādhipa | paryaṅke pṛthivīpāla divyāstaraṇasaṃstṛte

हे नराधिप, उस वृक्ष की फैली हुई शाखा पर, दिव्य बिछौनों से सजे एक पलंग पर, हे पृथ्वीपाल,

श्लोक 93 (3.191.93)

उपविष्टं महाराज पद्मेन्दुसदृशाननम् । फुल्लपद्मविशालाक्षं बालं पश्यामि भारत ॥

upaviṣṭaṃ mahārāja padmendusadṛśānanam | phullapadmaviśālākṣaṃ bālaṃ paśyāmi bhārata

हे महाराज, मैं एक बालक को बैठा देखता हूँ, जिसका मुख कमल और चन्द्रमा के समान है और नेत्र खिले कमल जैसे विशाल हैं, हे भारत।

श्लोक 94 (3.191.94)

ततो मे पृथिवीपाल विस्मयः सुमहानभूत् । कथं त्वयं शिशुः शेते लोके नाशमुपागते ॥

tato me pṛthivīpāla vismayaḥ sumahānabhūt | kathaṃ tvayaṃ śiśuḥ śete loke nāśamupāgate

तब हे पृथ्वीपाल, मुझे बड़ा विस्मय हुआ — "जब सारा लोक नष्ट हो चुका है, तब यह शिशु यहाँ कैसे लेटा है?"

श्लोक 95 (3.191.95)

तपसा चिन्तयंश्चापि तं शिशुं नोपलक्षये । भूतं भव्यं भविष्यं च जानन्नपि नराधिप ॥

tapasā cintayaṃścāpi taṃ śiśuṃ nopalakṣaye | bhūtaṃ bhavyaṃ bhaviṣyaṃ ca jānannapi narādhipa

हे नराधिप, भूत, वर्तमान और भविष्य को जानते हुए भी, तपोबल से विचार करने पर भी मैं उस शिशु को पहचान न सका।

श्लोक 96 (3.191.96)

अतसीपुष्पवर्णाभः श्रीवत्सकृतभूषणः । साक्षाल्लक्ष्म्या इवावासः स तदा प्रतिभाति मे ॥

atasīpuṣpavarṇābhaḥ śrīvatsakṛtabhūṣaṇaḥ | sākṣāllakṣmyā ivāvāsaḥ sa tadā pratibhāti me

अलसी के फूल जैसी उसकी कान्ति थी और श्रीवत्स चिह्न उसका आभूषण था; वह मुझे उस समय साक्षात् लक्ष्मी का निवास-सा प्रतीत हुआ।

श्लोक 97 (3.191.97)

ततो मामब्रवीद्बालः स पद्मनिभलोचनः । श्रीवत्सधारी द्युतिमान्वाक्यं श्रुतिसुखावहम् ॥

tato māmabravīdbālaḥ sa padmanibhalocanaḥ | śrīvatsadhārī dyutimānvākyaṃ śrutisukhāvaham

तब कमल जैसे नेत्रों वाले, श्रीवत्सधारी, तेजस्वी उस बालक ने मुझसे कानों को सुख देने वाली बात कही —

श्लोक 98 (3.191.98)

जानामि त्वां परिश्रान्तं तात विश्रामकाङ्क्षिणम् । मार्कण्डेय महासत्वं यावदिच्छसि भार्गव ॥

jānāmi tvāṃ pariśrāntaṃ tāta viśrāmakāṅkṣiṇam | mārkaṇḍeya mahāsatvaṃ yāvadicchasi bhārgava

"तात मार्कण्डेय, हे महान सत्त्व वाले, मैं जानता हूँ कि तुम थक गए हो और विश्राम चाहते हो। हे भार्गव, जब तक तुम्हारी इच्छा हो,

श्लोक 99 (3.191.99)

अभ्यन्तरं शरीरं मे प्रविश्य मुनिसत्तम । आस्स्वेह विहितो वासः प्रसादस्ते कृतो मया ॥

abhyantaraṃ śarīraṃ me praviśya munisattama | āssveha vihito vāsaḥ prasādaste kṛto mayā

हे मुनिश्रेष्ठ, मेरे शरीर के भीतर प्रवेश करके यहीं रहो। तुम्हारे निवास की व्यवस्था कर दी गई है; यह कृपा मैंने तुम पर की है।"

श्लोक 100 (3.191.100)

ततो बालेन तेनैवमुक्तस्यासीत्तदा मम । निर्वेदो जीविते दीर्घे मनुष्यत्वे च भारत ॥

tato bālena tenaivamuktasyāsīttadā mama | nirvedo jīvite dīrghe manuṣyatve ca bhārata

उस बालक के ऐसा कहने पर, हे भारत, मुझे अपने लम्बे जीवन और मनुष्य होने से विरक्ति हो गई।

श्लोक 101 (3.191.101)

ततो बालेन तेनास्यं सहसा विवृतं कृतम् । तस्याहमवशो वक्त्रे दैवयोगात्प्रवेशितः ॥

tato bālena tenāsyaṃ sahasā vivṛtaṃ kṛtam | tasyāhamavaśo vaktre daivayogātpraveśitaḥ

तब उस बालक ने सहसा अपना मुख खोला, और दैवयोग से मैं विवश होकर उसके मुख में पहुँचा दिया गया।

श्लोक 102 (3.191.102)

ततः प्रविष्टस्तत्कुक्षिं सहसा मनुजाधिप । सराष्ट्रनगराकीर्णां कृत्स्नां पश्यामि मेदिनीम् ॥

tataḥ praviṣṭastatkukṣiṃ sahasā manujādhipa | sarāṣṭranagarākīrṇāṃ kṛtsnāṃ paśyāmi medinīm

हे मनुजाधिप, सहसा उसके उदर में प्रवेश करके मैं राष्ट्रों और नगरों से भरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वी को देखता हूँ —

श्लोक 103 (3.191.103)

गङ्गां शतद्रुं सीतां च यमुनामथ कौशिकीम् । चर्मण्वतीं वेत्रवतीं चन्द्रभागां सरस्वतीम् ॥

gaṅgāṃ śatadruṃ sītāṃ ca yamunāmatha kauśikīm | carmaṇvatīṃ vetravatīṃ candrabhāgāṃ sarasvatīm

गंगा, शतद्रु, सीता, यमुना और कौशिकी; चर्मण्वती, वेत्रवती, चन्द्रभागा और सरस्वती;

श्लोक 104 (3.191.104)

सिन्धुं चैव विपाशां च नदीं गोदावरीमपि । वस्वोकसारां नलिनीं नर्मदां चैव भारत ॥

sindhuṃ caiva vipāśāṃ ca nadīṃ godāvarīmapi | vasvokasārāṃ nalinīṃ narmadāṃ caiva bhārata

सिन्धु और विपाशा, गोदावरी नदी भी; वस्वोकसारा, नलिनी और नर्मदा, हे भारत;

श्लोक 105 (3.191.105)

नदीं ताम्रां च वेणां च पुण्यतोयां शुभावहाम् । सुवेणां कृष्णवेणां च इरामां च महानदीम् ॥

nadīṃ tāmrāṃ ca veṇāṃ ca puṇyatoyāṃ śubhāvahām | suveṇāṃ kṛṣṇaveṇāṃ ca irāmāṃ ca mahānadīm

ताम्रा नदी और पवित्र जल वाली, मंगलदायिनी वेणा; सुवेणा, कृष्णवेणा और महानदी इरामा;

श्लोक 106 (3.191.106)

वितस्तां च महाराज कावेरीं च महानदीम् । तुङ्गभद्रां कृष्णवेणीं कमलां च महानदीम् । शोणं च पुरुषव्याघ्र विशल्यां किंपुनामपि ॥

vitastāṃ ca mahārāja kāverīṃ ca mahānadīm | tuṅgabhadrāṃ kṛṣṇaveṇīṃ kamalāṃ ca mahānadīm | śoṇaṃ ca puruṣavyāghra viśalyāṃ kiṃpunāmapi

हे महाराज, वितस्ता और महानदी कावेरी; तुंगभद्रा, कृष्णवेणी और महानदी कमला; और हे पुरुषसिंह, शोण, विशल्या तथा किम्पुना भी।

श्लोक 107 (3.191.107)

एताश्चान्याश्च नद्योऽहं पृथिव्यां या नरोत्तम । परिक्रामन्प्रपश्यामि तस्य कुक्षौ महात्मनः ॥

etāścānyāśca nadyo'haṃ pṛthivyāṃ yā narottama | parikrāmanprapaśyāmi tasya kukṣau mahātmanaḥ

हे नरश्रेष्ठ, पृथ्वी पर जो ये और अन्य नदियाँ हैं, उन सबको मैं उस महात्मा के उदर में घूमते हुए देखता हूँ।

श्लोक 108 (3.191.108)

ततः समुद्रं पश्यामि यादोगणनिषेवितम् । रत्नाकरममित्रघ्न पयसोनिधिमुत्तमम् ॥

tataḥ samudraṃ paśyāmi yādogaṇaniṣevitam | ratnākaramamitraghna payasonidhimuttamam

फिर हे शत्रुनाशक, मैं जलजन्तुओं के समूहों से भरे, रत्नों की खान, जल के उत्तम भण्डार समुद्र को देखता हूँ।

श्लोक 109 (3.191.109)

ततः पश्यामि गगनं चन्द्रसूर्यविराजितम् । जाज्वल्यमानं तेजोभिः पावकार्कसमप्रभम् ॥

tataḥ paśyāmi gaganaṃ candrasūryavirājitam | jājvalyamānaṃ tejobhiḥ pāvakārkasamaprabham

फिर मैं चन्द्रमा और सूर्य से सुशोभित आकाश को देखता हूँ, जो तेज से जगमगा रहा है और अग्नि तथा सूर्य के समान प्रभावान है।

श्लोक 110 (3.191.110)

पश्यामि च महीं राजन्काननैरुपशोभिताम् । सपर्वतवनद्वीपां निम्नगाशतसंकुलाम् ॥

paśyāmi ca mahīṃ rājankānanairupaśobhitām | saparvatavanadvīpāṃ nimnagāśatasaṃkulām

और हे राजन्, मैं वनों से सुशोभित पृथ्वी को देखता हूँ, जो पर्वतों, वनों और द्वीपों सहित सैकड़ों नदियों से भरी है।

श्लोक 111 (3.191.111)

यजन्ते हि ततो राजन्ब्राह्मणा बहुभिर्मखैः । क्षत्रियाश्च प्रवर्तन्ते सर्ववर्णानुरञ्जनैः ॥

yajante hi tato rājanbrāhmaṇā bahubhirmakhaiḥ | kṣatriyāśca pravartante sarvavarṇānurañjanaiḥ

वहाँ हे राजन्, ब्राह्मण अनेक यज्ञों से यजन करते हैं और क्षत्रिय सब वर्णों को प्रसन्न रखते हुए अपने कर्मों में लगे रहते हैं।

श्लोक 112 (3.191.112)

वैश्याः कृषिं यथान्यायं कारयन्ति नराधिप । शुश्रूषायां च निरता द्विजानां वृषलास्तथा ॥

vaiśyāḥ kṛṣiṃ yathānyāyaṃ kārayanti narādhipa | śuśrūṣāyāṃ ca niratā dvijānāṃ vṛṣalāstathā

हे नराधिप, वैश्य यथोचित रूप से खेती कराते हैं और शूद्र भी द्विजों की सेवा में लगे रहते हैं।

श्लोक 113 (3.191.113)

ततः परिपतन्राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मनः । हिमवन्तं च पश्यामि हेमकूटं च पर्वतम् ॥

tataḥ paripatanrājaṃstasya kukṣau mahātmanaḥ | himavantaṃ ca paśyāmi hemakūṭaṃ ca parvatam

फिर हे राजन्, उस महात्मा के उदर में घूमते हुए मैं हिमालय और हेमकूट पर्वत को देखता हूँ।

श्लोक 114 (3.191.114)

निषधं चापि पश्यामि श्वेतं च रजतान्वितम् । पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम् ॥

niṣadhaṃ cāpi paśyāmi śvetaṃ ca rajatānvitam | paśyāmi ca mahīpāla parvataṃ gandhamādanam

मैं निषध को भी देखता हूँ और चाँदी से भरे श्वेत पर्वत को भी; और हे महीपाल, गन्धमादन पर्वत को भी देखता हूँ;

श्लोक 115 (3.191.115)

मन्दरं मनुजव्याघ्र नीलं चापि महागिरिम् । पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम् ॥

mandaraṃ manujavyāghra nīlaṃ cāpi mahāgirim | paśyāmi ca mahārāja meruṃ kanakaparvatam

हे नरसिंह, मन्दर को और महागिरि नील को; और हे महाराज, स्वर्णमय पर्वत मेरु को भी देखता हूँ।

श्लोक 116 (3.191.116)

महेन्द्रं चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम् । मलयं चापि पश्यामि पारियात्रं च पर्वतम् ॥

mahendraṃ caiva paśyāmi vindhyaṃ ca girimuttamam | malayaṃ cāpi paśyāmi pāriyātraṃ ca parvatam

मैं महेन्द्र और श्रेष्ठ पर्वत विन्ध्य को देखता हूँ; मलय और पारियात्र पर्वत को भी देखता हूँ।

श्लोक 117 (3.191.117)

एते चान्ये च बहवो यावन्तः पृथिवीधराः । तस्योदरे मया दृष्टाः सर्वे रत्नविभूषिताः ॥

ete cānye ca bahavo yāvantaḥ pṛthivīdharāḥ | tasyodare mayā dṛṣṭāḥ sarve ratnavibhūṣitāḥ

ये तथा और भी जितने पर्वत हैं, वे सब रत्नों से विभूषित मैंने उसके उदर में देखे।

श्लोक 118 (3.191.118)

सिंहान्व्याघ्रान्वराहांश्च पश्यामि मनुजाधिप । पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते । तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन्पर्यचरं तदा ॥

siṃhānvyāghrānvarāhāṃśca paśyāmi manujādhipa | pṛthivyāṃ yāni cānyāni sattvāni jagatīpate | tāni sarvāṇyahaṃ tatra paśyanparyacaraṃ tadā

हे मनुजाधिप, मैं सिंहों, बाघों और सूअरों को देखता हूँ; और हे जगतीपते, पृथ्वी पर जो भी अन्य प्राणी हैं, उन सबको मैंने वहाँ घूमते हुए देखा।

श्लोक 119 (3.191.119)

कुक्षौ तस्य नरव्याघ्र प्रविष्टः संचरन्दिशः । शक्रादींश्चापि पश्यामि कृत्स्नान्देवगणानहम् ॥

kukṣau tasya naravyāghra praviṣṭaḥ saṃcarandiśaḥ | śakrādīṃścāpi paśyāmi kṛtsnāndevagaṇānaham

हे नरव्याघ्र, उसके उदर में प्रवेश करके दिशाओं में विचरते हुए मैं इन्द्र आदि सारे देवगणों को देखता हूँ;

श्लोक 120 (3.191.120)

साध्यान्रुद्रांस्तथाऽऽदित्यान्गुह्यकान्पितरस्तथा । सर्पान्नागान्सुपर्णांश्च वसूनप्यश्विनावपि ॥

sādhyānrudrāṃstathā''dityānguhyakānpitarastathā | sarpānnāgānsuparṇāṃśca vasūnapyaśvināvapi

साध्यों, रुद्रों और आदित्यों को, गुह्यकों और पितरों को, सर्पों, नागों और सुपर्णों को, वसुओं और दोनों अश्विनीकुमारों को भी;

श्लोक 121 (3.191.121)

गन्धर्वाप्सरसो यक्षानृषींश्चैव महीपते । दैत्यदानवसङ्घांश्च नागांश्च मनुजाधिप ॥

gandharvāpsaraso yakṣānṛṣīṃścaiva mahīpate | daityadānavasaṅghāṃśca nāgāṃśca manujādhipa

हे महीपते, गन्धर्वों और अप्सराओं को, यक्षों और ऋषियों को; हे मनुजाधिप, दैत्यों और दानवों के समूहों को और नागों को;

श्लोक 122 (3.191.122)

सिंहिकातनयांश्चापि ये चान्ये सुरशत्रवः । यच्च किंचिन्मया लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम् ॥

siṃhikātanayāṃścāpi ye cānye suraśatravaḥ | yacca kiṃcinmayā loke dṛṣṭaṃ sthāvarajaṅgamam

सिंहिका के पुत्रों को तथा देवताओं के अन्य शत्रुओं को भी। और संसार में मैंने जो कुछ भी चर-अचर देखा था —

श्लोक 123 (3.191.123)

सर्वं पश्याम्यहं राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मनः । त्वरमाणः फलाहारः कृत्स्नं जगदिदं विभो ॥

sarvaṃ paśyāmyahaṃ rājaṃstasya kukṣau mahātmanaḥ | tvaramāṇaḥ phalāhāraḥ kṛtsnaṃ jagadidaṃ vibho

हे राजन्, वह सब मैं उस महात्मा के उदर में देखता हूँ — हे प्रभो, फल खाकर रहते और तेज़ी से घूमते हुए, यह सारा जगत।

श्लोक 124 (3.191.124)

अन्तःशरीरे तस्याहं वर्षाणामधिकं शतम् । न च पश्यामि यस्याहं देहस्यान्तं कदाचन ॥

antaḥśarīre tasyāhaṃ varṣāṇāmadhikaṃ śatam | na ca paśyāmi yasyāhaṃ dehasyāntaṃ kadācana

उसके शरीर के भीतर मैं सौ वर्ष से भी अधिक रहा, फिर भी मैंने कभी उसकी देह का अन्त नहीं देखा।

श्लोक 125 (3.191.125)

सततं धावमानश्च चिन्तयानो विशांपते । भ्रमंस्तत्र महीपाल यदा वर्षगणान्बहून् । आसादयामि नैवान्तं तस्य राजन्महात्मनः ॥

satataṃ dhāvamānaśca cintayāno viśāṃpate | bhramaṃstatra mahīpāla yadā varṣagaṇānbahūn | āsādayāmi naivāntaṃ tasya rājanmahātmanaḥ

हे प्रजानाथ, निरन्तर दौड़ते और विचार करते हुए, हे महीपाल, वहाँ अनेक वर्षों तक भटकते रहने पर भी, हे राजन्, मैं उस महात्मा का अन्त नहीं पा सका।

श्लोक 126 (3.191.126)

ततस्तमेव शरणं गतोस्मि विधिवत्तदा । वरेण्यं वरदं देवं मनसा कर्मणैव च ॥

tatastameva śaraṇaṃ gatosmi vidhivattadā | vareṇyaṃ varadaṃ devaṃ manasā karmaṇaiva ca

तब मैंने विधिपूर्वक, मन और कर्म से, उसी परम वरणीय, वरदायक देव की शरण ली।

श्लोक 127 (3.191.127)

ततोऽहं सहसा राजन्वायुवेगेन निःसृतः । महात्मनो मुखात्तस्य विवृतात्पुरुषोत्तम ॥

tato'haṃ sahasā rājanvāyuvegena niḥsṛtaḥ | mahātmano mukhāttasya vivṛtātpuruṣottama

तब हे राजन्, हे पुरुषोत्तम, मैं सहसा वायु के वेग से उस महात्मा के खुले हुए मुख से बाहर निकल आया।

श्लोक 128 (3.191.128)

ततस्तस्यैव शाखायां न्यग्रोधस्य विशांपते । आस्ते मनुजशार्दूल कृत्स्नमादाय वै जगत् ॥

tatastasyaiva śākhāyāṃ nyagrodhasya viśāṃpate | āste manujaśārdūla kṛtsnamādāya vai jagat

हे प्रजानाथ, हे मनुजसिंह, वहाँ उसी वटवृक्ष की शाखा पर वह सम्पूर्ण जगत को अपने भीतर लिए बैठा है।

श्लोक 129 (3.191.129)

तेनैव बालवेषेण श्रीवत्सकृतलक्षणम् । आसीनं तं नरव्याघ्र पश्याम्यमिततेजसम् ॥

tenaiva bālaveṣeṇa śrīvatsakṛtalakṣaṇam | āsīnaṃ taṃ naravyāghra paśyāmyamitatejasam

हे नरव्याघ्र, उसी बालरूप में, श्रीवत्स चिह्न से अंकित, अपार तेज वाले उसे मैं वहाँ बैठा देखता हूँ।

श्लोक 130 (3.191.130)

ततो मामब्रवीद्बालः स प्रीतः प्रहसन्निव । श्रीवत्सधारी द्युतिमान्पीतवासा महाद्युतिः ॥

tato māmabravīdbālaḥ sa prītaḥ prahasanniva | śrīvatsadhārī dyutimānpītavāsā mahādyutiḥ

तब श्रीवत्सधारी, कान्तिमान, पीताम्बरधारी, महातेजस्वी वह बालक प्रसन्न होकर मानो मुस्कराते हुए मुझसे बोला —

श्लोक 131 (3.191.131)

अपीदानीं शरीरेऽस्मिन्मामके मुनिसत्तम । उषितस्त्वं परिश्रान्तो मार्कण्डेय ब्रवीहि मे ॥

apīdānīṃ śarīre'sminmāmake munisattama | uṣitastvaṃ pariśrānto mārkaṇḍeya bravīhi me

"हे मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय, थके हुए तुम क्या अब तक मेरे इस शरीर में रह लिए? मुझे बताओ।"

श्लोक 132 (3.191.132)

मुहूर्तादथ मे दृष्टिः प्रादुर्भूता पुनर्नवा । मायानिर्मुक्तमात्मानमपश्यं लब्धचेतसम् ॥

muhūrtādatha me dṛṣṭiḥ prādurbhūtā punarnavā | māyānirmuktamātmānamapaśyaṃ labdhacetasam

तब क्षण भर में मुझे नई दृष्टि प्राप्त हुई, और मैंने स्वयं को माया से मुक्त और फिर से सचेत पाया।

श्लोक 133 (3.191.133)

तस्य ताम्रतलौ तात चरणौ सुप्रतिष्ठितौ । सुजातौ मृदुरक्ताभिरङ्गुलीभिर्विराजितौ ॥

tasya tāmratalau tāta caraṇau supratiṣṭhitau | sujātau mṛduraktābhiraṅgulībhirvirājitau

तात, उसके चरण दृढ़ता से टिके थे, उनके तलवे ताँबे जैसे लाल थे, वे सुगठित थे और कोमल, लालिमा लिए अंगुलियों से शोभित थे।

श्लोक 134 (3.191.134)

प्रयत्नेन मया मूर्ध्ना गृहीत्वा ह्यभिवन्दितौ । दृष्ट्वाऽपरिमितं तस्य प्रभावममितौजसः ॥

prayatnena mayā mūrdhnā gṛhītvā hyabhivanditau | dṛṣṭvā'parimitaṃ tasya prabhāvamamitaujasaḥ

उस अपार बलशाली के अपरिमित प्रभाव को देखकर मैंने यत्नपूर्वक उन चरणों को पकड़कर सिर झुकाकर प्रणाम किया।

श्लोक 135 (3.191.135)

विनयेनाञ्जलिं कृत्वा प्रयत्नेनोपगम्य ह । दृष्टो मया स भूतात्मा देवः कमललोचनः ॥

vinayenāñjaliṃ kṛtvā prayatnenopagamya ha | dṛṣṭo mayā sa bhūtātmā devaḥ kamalalocanaḥ

विनयपूर्वक हाथ जोड़कर और सावधानी से पास जाकर मैंने उस भूतात्मा, कमलनयन देव के दर्शन किए।

श्लोक 136 (3.191.136)

तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमब्रवम् । ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां मायां चैतां तवोत्तमाम् ॥

tamahaṃ prāñjalirbhūtvā namaskṛtyedamabravam | jñātumicchāmi deva tvāṃ māyāṃ caitāṃ tavottamām

मैंने हाथ जोड़कर उसे नमस्कार किया और कहा — "हे देव, मैं आपको और आपकी इस उत्तम माया को जानना चाहता हूँ।

श्लोक 137 (3.191.137)

आस्येनानुप्रविष्टोऽहं शरीरे भगवंस्तव । दृष्टवानखिलाँल्लोकान्समस्तान्जठरे हि ते ॥

āsyenānupraviṣṭo'haṃ śarīre bhagavaṃstava | dṛṣṭavānakhilām̐llokānsamastānjaṭhare hi te

हे भगवन्, मुख के मार्ग से आपके शरीर में प्रवेश करके मैंने आपके उदर में समस्त लोकों को पूरा-पूरा देखा है।

श्लोक 138 (3.191.138)

तव देव शरीरस्था देवदानवराक्षसाः । यक्षगन्धर्वनागाश्च जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥

tava deva śarīrasthā devadānavarākṣasāḥ | yakṣagandharvanāgāśca jagatsthāvarajaṅgamam

हे देव, आपके शरीर में देवता, दानव और राक्षस, यक्ष, गन्धर्व और नाग — समस्त चर-अचर जगत स्थित है।

श्लोक 139 (3.191.139)

त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीयते । द्रुतमन्तःशरीरे ते सततं परिवर्तिनः ॥

tvatprasādācca me deva smṛtirna parihīyate | drutamantaḥśarīre te satataṃ parivartinaḥ

और हे देव, आपकी कृपा से मेरी स्मृति नष्ट नहीं हुई, यद्यपि मैं आपके शरीर के भीतर निरन्तर तेज़ी से घूमता रहा।

श्लोक 140 (3.191.140)

निर्गतोऽहमकामस्तु इच्छया ते महाप्रभो । यतिष्ये पुण्डरीकाक्ष ज्ञातुं त्वाऽहमनिन्दितं ॥

nirgato'hamakāmastu icchayā te mahāprabho | yatiṣye puṇḍarīkākṣa jñātuṃ tvā'hamaninditaṃ

हे महाप्रभो, मैं बिना चाहे आपकी इच्छा से बाहर निकला हूँ। हे कमलनयन, मैं आप अनिन्द्य को जानने का प्रयत्न करूँगा।

श्लोक 141 (3.191.141)

इह भूत्वा शिशुः साक्षात्किं भवानवतिष्ठते । पीत्वा जगदिदं सर्वमेतदाख्यातुमर्हसि ॥

iha bhūtvā śiśuḥ sākṣātkiṃ bhavānavatiṣṭhate | pītvā jagadidaṃ sarvametadākhyātumarhasi

आप साक्षात् शिशु बनकर, इस समस्त जगत को पीकर, यहाँ क्यों स्थित हैं? यह मुझे बताने की कृपा करें।

श्लोक 142 (3.191.142)

किमर्थं च जगत्सर्वं शरीरस्थं तवानघ । कियन्तं च त्वया कालमिह स्थेयमरिंदम ॥

kimarthaṃ ca jagatsarvaṃ śarīrasthaṃ tavānagha | kiyantaṃ ca tvayā kālamiha stheyamariṃdama

हे निष्पाप, सारा जगत किस प्रयोजन से आपके शरीर में स्थित है? और हे शत्रुदमन, आपको कितने समय तक यहाँ रहना है?

श्लोक 143 (3.191.143)

एतदिच्छामि देवेश श्रोतुं ब्राह्मणकाम्यया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम् । महद्ध्येतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान्प्रभो ॥

etadicchāmi deveśa śrotuṃ brāhmaṇakāmyayā | tvattaḥ kamalapatrākṣa vistareṇa yathātatham | mahaddhyetadacintyaṃ ca yadahaṃ dṛṣṭavānprabho

हे देवेश, हे कमलनयन, ब्राह्मण की जिज्ञासा से मैं यह आपसे विस्तारपूर्वक और यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ; क्योंकि हे प्रभो, जो मैंने देखा है वह महान और अचिन्त्य है।"

श्लोक 144 (3.191.144)

इत्युक्तः स मया श्रीमान्देवदेवो महाद्युतिः । सान्त्वयन्मामिदं वाक्यमुवाच वदतांवरः ॥

ityuktaḥ sa mayā śrīmāndevadevo mahādyutiḥ | sāntvayanmāmidaṃ vākyamuvāca vadatāṃvaraḥ

मेरे ऐसा कहने पर वे श्रीमान, महातेजस्वी, वक्ताओं में श्रेष्ठ देवाधिदेव मुझे सान्त्वना देते हुए यह वचन बोले —

अध्याय 190अध्याय-सूचीअध्याय 192