आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 192
नारायण का मार्कण्डेय को आत्म-परिचय
बालक रूप में स्थित देव मार्कण्डेय को अपना परिचय देते हैं: वे नारायण हैं, जिनका निवास जल है, जो सब प्राणियों के उद्गम और अन्त हैं, और जिनके विराट् शरीर में लोक, देवता, चारों वर्ण और वेद स्थित हैं। वे बताते हैं कि धर्म की हानि होने पर वे जन्म लेते हैं, चारों युगों में उनका वर्ण कैसे बदलता है, और ब्रह्मा के जागने तक वे एक हजार युग-चक्रों तक कैसे सोते हैं; फिर वे मुनि को सुख से विचरने की अनुमति देते हैं। तब मार्कण्डेय पाण्डवों से कहते हैं कि वही देव उनके सम्बन्धी कृष्ण हैं और उन्हें उनकी शरण में जाने को कहते हैं; पाण्डव और द्रौपदी कृष्ण को प्रणाम करते हैं और कृष्ण उन्हें सान्त्वना देते हैं।
देव उवाच
श्लोक 1 (3.192.1)
कामं देवाऽपि मां विप्र न हि जानन्ति तत्त्वतः । त्वत्प्रीत्या तु प्रवक्ष्यामि यथेदं विसृजाम्यहम् ॥
kāmaṃ devā'pi māṃ vipra na hi jānanti tattvataḥ | tvatprītyā tu pravakṣyāmi yathedaṃ visṛjāmyaham
हे विप्र, देवता भी मुझे तत्त्व से नहीं जानते। फिर भी तुम्हारे प्रति स्नेह के कारण मैं बताऊँगा कि मैं इस जगत् की सृष्टि कैसे करता हूँ।
श्लोक 2 (3.192.2)
पितृभक्तोऽसि विप्रर्षे मां चैव शरणं गतः । ततो दृष्टोऽस्मि ते साक्षाद्ब्रह्मचर्यं च ते महत् ॥
pitṛbhakto'si viprarṣe māṃ caiva śaraṇaṃ gataḥ | tato dṛṣṭo'smi te sākṣādbrahmacaryaṃ ca te mahat
हे विप्रर्षि, तुम पितृभक्त हो और मेरी शरण में आए हो; इसीलिए तुमने मुझे साक्षात् देखा है। तुम्हारा ब्रह्मचर्य भी महान है।
श्लोक 3 (3.192.3)
आपो नारा इति प्रोक्तास्तासां नाम कृतं मया । तेन नारायणोऽस्म्युक्तो मम तद्ध्ययनं सदा ॥
āpo nārā iti proktāstāsāṃ nāma kṛtaṃ mayā | tena nārāyaṇo'smyukto mama taddhyayanaṃ sadā
जल को 'नारा' कहा जाता है; यह नाम मैंने ही रखा है। वह जल सदा मेरा अयन (निवास) रहा है, इसलिए मैं नारायण कहलाता हूँ।
श्लोक 4 (3.192.4)
अहंनारायणो नाम प्रभवः शाश्वतोऽव्ययः । विधाता सर्वभूतानां संहर्ता च द्विजोत्तम ॥
ahaṃnārāyaṇo nāma prabhavaḥ śāśvato'vyayaḥ | vidhātā sarvabhūtānāṃ saṃhartā ca dvijottama
मैं ही नारायण नाम वाला हूँ — सबका उद्गम, शाश्वत और अविनाशी। हे द्विजश्रेष्ठ, मैं ही समस्त प्राणियों का विधाता हूँ और मैं ही उनका संहारक भी।
श्लोक 5 (3.192.5)
अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शक्रश्चाहं सुराधिपः । अहं वैश्रवणो राजा यमः प्रेताधिपस्तथा ॥
ahaṃ viṣṇurahaṃ brahmā śakraścāhaṃ surādhipaḥ | ahaṃ vaiśravaṇo rājā yamaḥ pretādhipastathā
मैं विष्णु हूँ, मैं ब्रह्मा हूँ, और देवताओं का स्वामी इन्द्र भी मैं ही हूँ। मैं राजा वैश्रवण (कुबेर) हूँ और प्रेतों का स्वामी यम भी।
श्लोक 6 (3.192.6)
अहं शिवश्च सोमश्च कश्यपोऽथ प्रजापतिः । अहं धाता विधाता च यज्ञश्चाहं द्विजोत्तम ॥
ahaṃ śivaśca somaśca kaśyapo'tha prajāpatiḥ | ahaṃ dhātā vidhātā ca yajñaścāhaṃ dvijottama
मैं शिव हूँ, सोम हूँ, और प्रजापति कश्यप भी मैं ही हूँ। हे द्विजोत्तम, मैं धाता हूँ, विधाता हूँ और यज्ञ भी मैं ही हूँ।
श्लोक 7 (3.192.7)
अग्निरास्यं क्षितिः पादौ चन्द्रादित्यौ च लोचने । द्यौर्मूर्धा मे दिशः श्रोत्रे तथाऽऽपः स्वेदसंभवाः । सकलं च नभः कायो वायुर्मनसि मे स्थितः ॥
agnirāsyaṃ kṣitiḥ pādau candrādityau ca locane | dyaurmūrdhā me diśaḥ śrotre tathā''paḥ svedasaṃbhavāḥ | sakalaṃ ca nabhaḥ kāyo vāyurmanasi me sthitaḥ
अग्नि मेरा मुख है, पृथ्वी मेरे चरण, चन्द्रमा और सूर्य मेरे नेत्र; द्युलोक मेरा मस्तक है, दिशाएँ मेरे कान, और जल मेरे पसीने से उत्पन्न हुआ है। समूचा आकाश मेरा शरीर है और वायु मेरे मन में स्थित है।
श्लोक 8 (3.192.8)
मया क्रतुशतैरिष्टं बहुभिस्त्वाप्तदक्षिणैः । यजन्ते वेदविदुषो मां देवसदने स्थितम् ॥
mayā kratuśatairiṣṭaṃ bahubhistvāptadakṣiṇaiḥ | yajante vedaviduṣo māṃ devasadane sthitam
मैंने उचित दक्षिणाओं से युक्त सैकड़ों यज्ञ किए हैं। वेदों के ज्ञाता देवताओं के धाम में स्थित मेरा ही यजन करते हैं।
श्लोक 9 (3.192.9)
पृथिव्यां क्षत्रियेन्द्राश्च पार्थिवाः स्वर्गकाङ्क्षिणः । यजन्ते मां तथा वैश्याः स्वर्गलोकजिगीषया ॥
pṛthivyāṃ kṣatriyendrāśca pārthivāḥ svargakāṅkṣiṇaḥ | yajante māṃ tathā vaiśyāḥ svargalokajigīṣayā
पृथ्वी पर स्वर्ग की कामना करने वाले श्रेष्ठ क्षत्रिय राजा मेरा यजन करते हैं, और स्वर्गलोक को जीतने की इच्छा से वैश्य भी वैसा ही करते हैं।
श्लोक 10 (3.192.10)
चतुःसमुद्रपर्यन्तां मेरुमन्दरभूषणाम् । शेषो भूत्वाऽहमेवैतां धारयामि वसुंधराम् ॥
catuḥsamudraparyantāṃ merumandarabhūṣaṇām | śeṣo bhūtvā'hamevaitāṃ dhārayāmi vasuṃdharām
शेषनाग बनकर मैं ही चारों समुद्रों तक फैली, मेरु और मन्दर पर्वतों से सुशोभित इस वसुन्धरा को धारण करता हूँ।
श्लोक 11 (3.192.11)
वाराहं रूपमास्थाय मयेयं जगती पुरा । मज्जमाना जले विप्र वीर्येणासीत्समुद्धृता ॥
vārāhaṃ rūpamāsthāya mayeyaṃ jagatī purā | majjamānā jale vipra vīryeṇāsītsamuddhṛtā
हे विप्र, प्राचीन काल में वराह का रूप धारण करके मैंने जल में डूबती हुई इस पृथ्वी का अपने पराक्रम से उद्धार किया था।
श्लोक 12 (3.192.12)
अग्निश्च बडबावक्त्रे भूत्वाऽहं द्विजसत्तम । पिबाम्यापः सदा विद्वंस्ताश्चैव विसृजाम्यहम् ॥
agniśca baḍabāvaktre bhūtvā'haṃ dvijasattama | pibāmyāpaḥ sadā vidvaṃstāścaiva visṛjāmyaham
हे द्विजश्रेष्ठ, हे विद्वन्, बडवा (घोड़ी) के मुख की अग्नि बनकर मैं सदा जल को पीता हूँ और फिर उसे छोड़ता भी हूँ।
श्लोक 13 (3.192.13)
ब्रह्म वक्त्रं भुजौ क्षत्रमूरू मे संस्थिता विशः । पादौ शूद्रा भवन्तीमे विक्रमेण क्रमेण च ॥
brahma vaktraṃ bhujau kṣatramūrū me saṃsthitā viśaḥ | pādau śūdrā bhavantīme vikrameṇa krameṇa ca
ब्राह्मण मेरा मुख हैं, क्षत्रिय मेरी भुजाएँ, वैश्य मेरी जाँघों में स्थित हैं, और शूद्र मेरे ये चरण हैं — यह मेरे पराक्रम से और क्रम से हुआ है।
श्लोक 14 (3.192.14)
ऋग्वेदः सामवेदश्च यजुर्वेदोऽप्यथर्वणः । मत्तः प्रादुर्भवन्त्येते मामेव प्रविशन्ति च ॥
ṛgvedaḥ sāmavedaśca yajurvedo'pyatharvaṇaḥ | mattaḥ prādurbhavantyete māmeva praviśanti ca
ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद — ये सब मुझसे ही प्रकट होते हैं और मुझमें ही प्रवेश कर जाते हैं।
श्लोक 15 (3.192.15)
यतयः शान्तिपरमा यतात्मानो मुमुक्षवः । कामक्रोधद्वेषमुक्ता निःसंज्ञा वीतकल्मषाः ॥
yatayaḥ śāntiparamā yatātmāno mumukṣavaḥ | kāmakrodhadveṣamuktā niḥsaṃjñā vītakalmaṣāḥ
शान्ति को ही परम मानने वाले, संयमी, मोक्ष के इच्छुक, काम, क्रोध और द्वेष से मुक्त, इन्द्रिय-विषयों की चेतना से परे और निष्पाप यति —
श्लोक 16 (3.192.16)
सत्वस्था निरहंकारा नित्यमध्यात्मकोविदाः । मामेव सततं विप्राश्चिन्तयन्त उपासते ॥
satvasthā nirahaṃkārā nityamadhyātmakovidāḥ | māmeva satataṃ viprāścintayanta upāsate
सत्त्व में स्थित, अहंकार-रहित, अध्यात्म के नित्य ज्ञाता — ऐसे विप्र निरन्तर मेरा ही चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं।
श्लोक 17 (3.192.17)
अहं संवर्तको वह्निरहं संवर्तको यमः । अहं संवर्तकः सूर्यस्त्वहं संवर्तकोऽनिलः ॥
ahaṃ saṃvartako vahnirahaṃ saṃvartako yamaḥ | ahaṃ saṃvartakaḥ sūryastvahaṃ saṃvartako'nilaḥ
प्रलय (संवर्तक) की अग्नि मैं हूँ, प्रलयकाल का यम मैं हूँ; प्रलय का सूर्य भी मैं हूँ और प्रलय की वायु भी मैं ही हूँ।
श्लोक 18 (3.192.18)
तारारूपाणि दृश्यन्ते यान्येतानि नभस्तले । मम रूपाण्यथैतानि विद्धि त्वं द्विजसत्तम ॥
tārārūpāṇi dṛśyante yānyetāni nabhastale | mama rūpāṇyathaitāni viddhi tvaṃ dvijasattama
आकाश में जो ये तारों के रूप दिखाई देते हैं, हे द्विजश्रेष्ठ, उन्हें तुम मेरे ही रूप जानो।
श्लोक 19 (3.192.19)
रत्नाकराः समुद्राश्च सर्व एव चतुर्दिशः । वसनं शयनं चैव विलयं चैव विद्धि मे ॥
ratnākarāḥ samudrāśca sarva eva caturdiśaḥ | vasanaṃ śayanaṃ caiva vilayaṃ caiva viddhi me
चारों दिशाओं में फैले रत्नों की खान समुद्रों को तुम मेरा वस्त्र, मेरी शय्या और मेरा लय-स्थान जानो।
श्लोक 20 (3.192.20)
मयैव सुविभक्तास्ते देवकार्यार्थसिद्धये । कामं क्रोधं च हर्षं च भयं मोहं तथैव च । ममैव विद्धि रोमाणि सर्वाण्येतानि सत्तम ॥
mayaiva suvibhaktāste devakāryārthasiddhaye | kāmaṃ krodhaṃ ca harṣaṃ ca bhayaṃ mohaṃ tathaiva ca | mamaiva viddhi romāṇi sarvāṇyetāni sattama
देवताओं के कार्यों की सिद्धि के लिए मैंने ही उन्हें भली-भाँति विभाजित किया है। काम, क्रोध, हर्ष, भय और मोह — हे सत्पुरुषश्रेष्ठ, इन सबको मेरे ही रोम जानो।
श्लोक 21 (3.192.21)
प्राप्नुवन्ति नरा विप्र यत्कृत्वा कर्म शोभनम् । सत्यं दानं तपश्चोग्रमहिंसा चैव जन्तुषु ॥
prāpnuvanti narā vipra yatkṛtvā karma śobhanam | satyaṃ dānaṃ tapaścogramahiṃsā caiva jantuṣu
हे विप्र, जिन शुभ कर्मों को करके मनुष्य फल पाते हैं — सत्य, दान, कठोर तप और प्राणियों के प्रति अहिंसा —
श्लोक 22 (3.192.22)
मद्विधानेन विहिता मम देहविहारिणः । मयाऽभिभूतविज्ञाना विचेष्टन्ते न कामतः ॥
madvidhānena vihitā mama dehavihāriṇaḥ | mayā'bhibhūtavijñānā viceṣṭante na kāmataḥ
वे मेरे ही विधान से निर्धारित हैं। मनुष्य मेरे ही शरीर में विचरते हैं; उनका ज्ञान मुझसे अभिभूत है, और वे अपनी इच्छा से चेष्टा नहीं करते।
श्लोक 23 (3.192.23)
सम्यग्वेदमधीयाना यजन्ते विविधैर्मखैः । शान्तात्मानो जितक्रोधाः प्राप्नुवन्ति द्विजातयः ॥
samyagvedamadhīyānā yajante vividhairmakhaiḥ | śāntātmāno jitakrodhāḥ prāpnuvanti dvijātayaḥ
जो द्विज विधिपूर्वक वेद का अध्ययन करते हैं, विविध यज्ञों से यजन करते हैं, शान्तचित्त हैं और क्रोध को जीत चुके हैं, वे मुझे प्राप्त होते हैं।
श्लोक 24 (3.192.24)
प्राप्तुं न शक्यो यो विद्वन्नरैर्दुष्कृतकर्मभिः । लोभाभिभूतैः कृपणैरनार्यैरकृतात्मभिः ॥
prāptuṃ na śakyo yo vidvannarairduṣkṛtakarmabhiḥ | lobhābhibhūtaiḥ kṛpaṇairanāryairakṛtātmabhiḥ
हे विद्वन्, दुष्कर्मी, लोभ से ग्रस्त, कृपण, अनार्य और असंस्कृत चित्त वाले मनुष्य मुझे प्राप्त नहीं कर सकते।
श्लोक 25 (3.192.25)
तस्मान्महाफलंविद्धि पदं सुकृतकर्मणः । सुदुष्प्रापं विमूढानां मार्गं योगैर्निषेवितम् ॥
tasmānmahāphalaṃviddhi padaṃ sukṛtakarmaṇaḥ | suduṣprāpaṃ vimūḍhānāṃ mārgaṃ yogairniṣevitam
इसलिए जानो कि पुण्यकर्मा पुरुष को मिलने वाला पद महान फल देने वाला है। मूढ़ जनों के लिए वह अत्यन्त दुर्लभ है; वह योग के द्वारा सेवित मार्ग है।
श्लोक 26 (3.192.26)
यदा यदा च धर्मस्य ग्लानिर्भवति सत्तम । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥
yadā yadā ca dharmasya glānirbhavati sattama | abhyutthānamadharmasya tadā''tmānaṃ sṛjāmyaham
हे सत्तम, जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
श्लोक 27 (3.192.27)
दैत्या हिंसानुरक्ताश्च अवध्याः सुरसत्तमैः । राक्षसाश्चापि लोकेऽस्मिन्यदोत्पत्स्यन्ति दारुणाः ॥
daityā hiṃsānuraktāśca avadhyāḥ surasattamaiḥ | rākṣasāścāpi loke'sminyadotpatsyanti dāruṇāḥ
जब हिंसा में रत दैत्य, जिन्हें श्रेष्ठ देवता भी नहीं मार सकते, और भयंकर राक्षस इस लोक में उत्पन्न होते हैं,
श्लोक 28 (3.192.28)
तदाऽहंसंप्रसूयामि गृहेषु शुभकर्मणाम् । प्रविष्टो मानुषं देहं सर्वं प्रशमयाम्यहम् ॥
tadā'haṃsaṃprasūyāmi gṛheṣu śubhakarmaṇām | praviṣṭo mānuṣaṃ dehaṃ sarvaṃ praśamayāmyaham
तब मैं पुण्यकर्मा लोगों के घरों में जन्म लेता हूँ और मनुष्य-देह में प्रवेश करके सब कुछ शान्त कर देता हूँ।
श्लोक 29 (3.192.29)
सृष्ट्वा देवमनुष्यांस्तु गन्धर्वोरगराक्षसान् । स्थावराणि च भूतानि संहराम्यात्ममायया ॥
sṛṣṭvā devamanuṣyāṃstu gandharvoragarākṣasān | sthāvarāṇi ca bhūtāni saṃharāmyātmamāyayā
देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वों, नागों, राक्षसों और स्थावर प्राणियों की सृष्टि करके मैं अपनी माया से उनका संहार भी करता हूँ।
श्लोक 30 (3.192.30)
कर्मकाले पुनर्देहमनुचिन्त्य सृजाम्यहम् । आविश्य मानुषं देहं मर्यादाबन्धकारणात् ॥
karmakāle punardehamanucintya sṛjāmyaham | āviśya mānuṣaṃ dehaṃ maryādābandhakāraṇāt
कर्म का समय आने पर मैं फिर देह का चिन्तन करके उसे रचता हूँ, और मर्यादा की रक्षा के लिए मनुष्य-शरीर में प्रवेश करता हूँ।
श्लोक 31 (3.192.31)
श्वेतः कृतयुगे वर्णः पीतस्त्रेतायुगे मम । श्यामो द्वापरमासाद्य कृष्णः कलियुगे तथा ॥
śvetaḥ kṛtayuge varṇaḥ pītastretāyuge mama | śyāmo dvāparamāsādya kṛṣṇaḥ kaliyuge tathā
कृतयुग में मेरा वर्ण श्वेत होता है, त्रेतायुग में पीला; द्वापर आने पर वह श्याम हो जाता है और कलियुग में काला।
श्लोक 32 (3.192.32)
त्रयो भागा ह्यधर्मस्य तस्मिन्काले भवन्ति च । यदा भवति मे वर्णः कृष्णो वै द्विजसत्तम ॥
trayo bhāgā hyadharmasya tasminkāle bhavanti ca | yadā bhavati me varṇaḥ kṛṣṇo vai dvijasattama
उस युग में तीन भाग अधर्म होता है — वह युग, हे द्विजश्रेष्ठ, जब मेरा वर्ण काला हो जाता है।
श्लोक 33 (3.192.33)
अन्तकाले च संप्राप्ते कालो भूत्वाऽतिदारुणः । त्रैलोक्यं नाशयाम्येकः कृत्स्नं स्थावरजङ्गमम् ॥
antakāle ca saṃprāpte kālo bhūtvā'tidāruṇaḥ | trailokyaṃ nāśayāmyekaḥ kṛtsnaṃ sthāvarajaṅgamam
और जब अन्तकाल आता है, तब मैं अत्यन्त भयंकर काल बनकर अकेला ही चर-अचर सहित सम्पूर्ण त्रिलोकी का नाश कर देता हूँ।
श्लोक 34 (3.192.34)
अहं त्रिवर्त्मा विश्वात्मा सर्वलोकसुखावहः । अजितः सर्वगोऽनन्तो हृषीकेश उरुक्रमः । कालचक्रं नयाम्येको ब्रह्मन्नहमरूपकम् ॥
ahaṃ trivartmā viśvātmā sarvalokasukhāvahaḥ | ajitaḥ sarvago'nanto hṛṣīkeśa urukramaḥ | kālacakraṃ nayāmyeko brahmannahamarūpakam
मैं त्रिवर्त्मा (तीन मार्गों वाला), विश्वात्मा और सब लोकों को सुख देने वाला हूँ; अजेय, सर्वव्यापी, अनन्त, हृषीकेश और उरुक्रम हूँ। हे ब्रह्मन्, मैं अकेला, रूपरहित होकर कालचक्र को चलाता हूँ —
श्लोक 35 (3.192.35)
शमनं सर्वभूतानां सर्वकालकृतोद्यमम् । एवं प्रणिहितः सम्यङ्मायया मुनिसत्तम । सर्वभूतेषु विप्रेन्द्र न च मां वेत्ति कश्चन ॥
śamanaṃ sarvabhūtānāṃ sarvakālakṛtodyamam | evaṃ praṇihitaḥ samyaṅmāyayā munisattama | sarvabhūteṣu viprendra na ca māṃ vetti kaścana
जो सब प्राणियों का शमन करने वाला और सब कालों में उद्यमशील है। हे मुनिश्रेष्ठ, हे विप्रेन्द्र, इस प्रकार मैं अपनी माया से सब प्राणियों में भली-भाँति स्थित हूँ, फिर भी मुझे कोई नहीं जानता।
श्लोक 36 (3.192.36)
सर्वलोके च मां भक्ताः पूजयन्ति च सर्वशः ॥
sarvaloke ca māṃ bhaktāḥ pūjayanti ca sarvaśaḥ
और सब लोकों में मेरे भक्त सब प्रकार से मेरी पूजा करते हैं।
श्लोक 37 (3.192.37)
यच्च किंचित्त्वया प्राप्तं मयि क्लेशात्मकं द्विज । सुखोदयाय तत्सर्वं श्रेयसे च तवानघ ॥
yacca kiṃcittvayā prāptaṃ mayi kleśātmakaṃ dvija | sukhodayāya tatsarvaṃ śreyase ca tavānagha
हे द्विज, हे निष्पाप, मेरे भीतर तुम्हें जो कुछ भी क्लेश मिला, वह सब तुम्हारे सुख और कल्याण के लिए ही था।
श्लोक 38 (3.192.38)
यच्च किंचित्त्वया लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम् । विहितः सर्वथैवासौ ममात्मा भूतभावनः ॥
yacca kiṃcittvayā loke dṛṣṭaṃ sthāvarajaṅgamam | vihitaḥ sarvathaivāsau mamātmā bhūtabhāvanaḥ
संसार में तुमने जो कुछ भी चर-अचर देखा, वह सब प्रकार से विहित है; वह मेरा ही आत्मा है, जो प्राणियों को उत्पन्न करने वाला है।
श्लोक 39 (3.192.39)
अर्धं मम शरीरस्य सर्वलोकपितामहः । अहं नारायणो नाम शङ्खचक्रगदाधरः ॥
ardhaṃ mama śarīrasya sarvalokapitāmahaḥ | ahaṃ nārāyaṇo nāma śaṅkhacakragadādharaḥ
सब लोकों के पितामह (ब्रह्मा) मेरे शरीर का आधा भाग हैं। मैं शंख, चक्र और गदा धारण करने वाला नारायण हूँ।
श्लोक 40 (3.192.40)
यावद्युगानां विप्रर्षे सहस्रपरिवर्तनम् । तावत्स्वपिमि विश्वात्मा सर्वलोकपितामहः ॥
yāvadyugānāṃ viprarṣe sahasraparivartanam | tāvatsvapimi viśvātmā sarvalokapitāmahaḥ
हे विप्रर्षि, जब तक युगों के एक हजार चक्र पूरे होते हैं, तब तक मैं विश्वात्मा, सब लोकों का पितामह, सोता रहता हूँ।
श्लोक 41 (3.192.41)
एवं सर्वमहं कालमिहासे मुनिसत्तम । अशिशुः शिशुरूपेण यावद्ब्रह्मा न बुध्यते ॥
evaṃ sarvamahaṃ kālamihāse munisattama | aśiśuḥ śiśurūpeṇa yāvadbrahmā na budhyate
हे मुनिश्रेष्ठ, इस प्रकार जब तक ब्रह्मा नहीं जागते, तब तक मैं बालक न होते हुए भी बालक के रूप में सारे समय यहाँ रहता हूँ।
श्लोक 42 (3.192.42)
मया च दत्तो विप्राग्र्य वरस्ते ब्रह्मरूपिणा । असकृत्परितुष्टेन विप्रर्षिगणपूजित ॥
mayā ca datto viprāgrya varaste brahmarūpiṇā | asakṛtparituṣṭena viprarṣigaṇapūjita
हे विप्रश्रेष्ठ, ब्रह्मर्षियों के समूहों द्वारा पूजित! मैंने ही ब्रह्मा के रूप में बार-बार प्रसन्न होकर तुम्हें वर दिया था।
श्लोक 43 (3.192.43)
सर्वमेकार्णवं दृष्ट्वा नष्टं स्थावरजङ्गमम् । विक्लबोऽसि मया ज्ञातस्ततस्ते दर्शितं जगत् ॥
sarvamekārṇavaṃ dṛṣṭvā naṣṭaṃ sthāvarajaṅgamam | viklabo'si mayā jñātastataste darśitaṃ jagat
सब कुछ एक महासागर बना हुआ और चर-अचर सब नष्ट हुआ देखकर तुम व्याकुल हो गए थे; यह मैंने जाना, इसलिए तुम्हें जगत् दिखाया।
श्लोक 44 (3.192.44)
अभ्यन्तरं शरीरस्य प्रविष्टोऽसि यदा मम । दृष्ट्वा लोकं समस्तं च विस्मितो नावबुध्यसे ॥
abhyantaraṃ śarīrasya praviṣṭo'si yadā mama | dṛṣṭvā lokaṃ samastaṃ ca vismito nāvabudhyase
जब तुम मेरे शरीर के भीतर प्रविष्ट हुए और वहाँ समस्त लोक को देखा, तब तुम विस्मित हो गए और कुछ समझ न सके।
श्लोक 45 (3.192.45)
ततोऽसि वक्त्राद्विप्रर्षे द्रुतं निःसारितो मया । आख्यातस्ते मया चात्मा दुर्ज्ञेयोऽपि सुरासुरैः ॥
tato'si vaktrādviprarṣe drutaṃ niḥsārito mayā | ākhyātaste mayā cātmā durjñeyo'pi surāsuraiḥ
तब, हे विप्रर्षि, मैंने तुम्हें शीघ्र ही अपने मुख से बाहर निकाला, और अपने उस स्वरूप का वर्णन किया जिसे देवता और असुर भी कठिनाई से जान पाते हैं।
श्लोक 46 (3.192.46)
यावत्स भगवान्ब्रह्मा न बुध्येत महातपाः । तावत्त्वमिह विप्रर्षे विस्रब्धश्चर वै सुखम् ॥
yāvatsa bhagavānbrahmā na budhyeta mahātapāḥ | tāvattvamiha viprarṣe visrabdhaścara vai sukham
जब तक वे महातपस्वी भगवान ब्रह्मा नहीं जागते, तब तक, हे विप्रर्षि, तुम यहाँ निश्चिन्त होकर सुख से विचरो।
श्लोक 47 (3.192.47)
ततो विबुद्धे तस्मिंस्तु सर्वलोकपितामहे । एकीभूतः प्रवेक्ष्यामि शरीराणि द्विजोत्तम ॥
tato vibuddhe tasmiṃstu sarvalokapitāmahe | ekībhūtaḥ pravekṣyāmi śarīrāṇi dvijottama
फिर जब सब लोकों के पितामह जाग जाएँगे, तब, हे द्विजोत्तम, मैं एकीभूत होकर इन शरीरों में प्रवेश करूँगा —
श्लोक 48 (3.192.48)
आकाशं पृथिवीं ज्योतिर्वायुं सलिलमेव च । लोके यच्च भवेच्छेषमिह स्थावरजङ्गमम् ॥
ākāśaṃ pṛthivīṃ jyotirvāyuṃ salilameva ca | loke yacca bhaveccheṣamiha sthāvarajaṅgamam
आकाश, पृथ्वी, तेज, वायु और जल में, तथा लोक में जो कुछ भी चर-अचर शेष रहेगा उसमें।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 49 (3.192.49)
इत्युक्त्वान्तर्हितस्तात स देवः परमाद्भुतः । प्रजाश्चेमाः प्रपश्यामि विचित्रा विविधाः कृताः ॥
ityuktvāntarhitastāta sa devaḥ paramādbhutaḥ | prajāścemāḥ prapaśyāmi vicitrā vividhāḥ kṛtāḥ
हे तात, यह कहकर वे परम अद्भुत देव अन्तर्धान हो गए, और मैंने इन विचित्र तथा विविध रूपों में रची गई प्रजाओं को देखा।
श्लोक 50 (3.192.50)
एवं दृष्टं मया राजंस्तस्मिन्प्राप्ते युगक्षये । आश्चर्यं भरतश्रेष्ठ सर्वधर्मभृतां वर ॥
evaṃ dṛṣṭaṃ mayā rājaṃstasminprāpte yugakṣaye | āścaryaṃ bharataśreṣṭha sarvadharmabhṛtāṃ vara
हे राजन्, हे भरतश्रेष्ठ, हे समस्त धर्मधारियों में श्रेष्ठ, उस युगान्त के आने पर मैंने यह आश्चर्य देखा था।
श्लोक 51 (3.192.51)
यः स देवो मया दृष्टः पुरा पद्मायतेक्षणः । स एष पुरुषव्याघ्र संबन्धी ते जनार्दनः ॥
yaḥ sa devo mayā dṛṣṭaḥ purā padmāyatekṣaṇaḥ | sa eṣa puruṣavyāghra saṃbandhī te janārdanaḥ
हे पुरुषसिंह, कमल-दल के समान विशाल नेत्रों वाले जिस देव को मैंने पहले देखा था, वही ये तुम्हारे सम्बन्धी जनार्दन हैं।
श्लोक 52 (3.192.52)
अस्यैव वरदानाद्धि स्मृतिर्न प्रजहाति माम् । दीर्घमायुश्च कौन्तेय स्वच्छन्दमरणं मम ॥
asyaiva varadānāddhi smṛtirna prajahāti mām | dīrghamāyuśca kaunteya svacchandamaraṇaṃ mama
हे कुन्तीपुत्र, इन्हीं के वरदान से मेरी स्मृति मुझे नहीं छोड़ती, और मुझे दीर्घ आयु तथा इच्छामृत्यु प्राप्त है।
श्लोक 53 (3.192.53)
स एष कृष्णो वार्ष्णेयः पुराणपुरुषो विभुः । आस्ते हरिरचिन्त्यात्मा क्रीडन्निव महाभुजः ॥
sa eṣa kṛṣṇo vārṣṇeyaḥ purāṇapuruṣo vibhuḥ | āste hariracintyātmā krīḍanniva mahābhujaḥ
ये ही वृष्णिवंशी कृष्ण हैं — पुराणपुरुष, सर्वव्यापी प्रभु; अचिन्त्य स्वरूप वाले महाबाहु हरि, जो यहाँ मानो क्रीडा करते हुए विराजमान हैं।
श्लोक 54 (3.192.54)
एष धाता विधाता च संहर्ता चैव शाश्वतः । श्रीवत्सवक्षा गोविन्दः प्रजापतिपतिः प्रभुः ॥
eṣa dhātā vidhātā ca saṃhartā caiva śāśvataḥ | śrīvatsavakṣā govindaḥ prajāpatipatiḥ prabhuḥ
ये ही धाता, विधाता और शाश्वत संहर्ता हैं; श्रीवत्स-चिह्न से अंकित वक्ष वाले गोविन्द, प्रजापतियों के भी स्वामी, प्रभु।
श्लोक 55 (3.192.55)
दृष्ट्वेमं वृष्णिप्रवरं स्मृतिर्मामियमागता । आदिदेवमजं जिष्णुं पुरुषं पीतवाससम् ॥
dṛṣṭvemaṃ vṛṣṇipravaraṃ smṛtirmāmiyamāgatā | ādidevamajaṃ jiṣṇuṃ puruṣaṃ pītavāsasam
इन वृष्णिश्रेष्ठ को देखकर मुझे यह स्मृति हो आई — उन आदिदेव, अजन्मा, विजयी, पीताम्बरधारी पुरुष की।
श्लोक 56 (3.192.56)
सर्वेषामेव भूतानां पिता माता च माधवः । गच्छध्वमेनं शरणं शरण्यं कौरवर्षभाः ॥
sarveṣāmeva bhūtānāṃ pitā mātā ca mādhavaḥ | gacchadhvamenaṃ śaraṇaṃ śaraṇyaṃ kauravarṣabhāḥ
माधव ही समस्त प्राणियों के पिता और माता हैं। हे कुरुश्रेष्ठो, शरण देने वाले इन माधव की शरण में जाओ।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 57 (3.192.57)
एवमुक्ताश्च ते पार्था यमौ च पुरुषर्षभौ । द्रौपद्या सहिताः सर्वे नमश्चक्रुर्जनार्दनम् ॥
evamuktāśca te pārthā yamau ca puruṣarṣabhau | draupadyā sahitāḥ sarve namaścakrurjanārdanam
ऐसा कहे जाने पर पृथा के पुत्रों ने और पुरुषश्रेष्ठ दोनों जुड़वाँ भाइयों (नकुल-सहदेव) ने द्रौपदी सहित जनार्दन को प्रणाम किया।
श्लोक 58 (3.192.58)
स चैतान्पुरुषव्याघ्र साम्ना परमवल्गुना । सान्त्वयामास मानार्हो मन्यमानो यथाविधि ॥
sa caitānpuruṣavyāghra sāmnā paramavalgunā | sāntvayāmāsa mānārho manyamāno yathāvidhi
हे पुरुषसिंह, सम्मान के योग्य उन जनार्दन ने यथोचित आदर करते हुए अत्यन्त मधुर और कोमल वचनों से उन सबको सान्त्वना दी।