आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 193
मार्कण्डेय द्वारा कलियुग के अन्त और कल्कि के प्राकट्य का भविष्य-कथन
युधिष्ठिर मार्कण्डेय से पूछते हैं कि कलियुग के अन्त में संसार की क्या दशा होगी। मार्कण्डेय बताते हैं कि चारों युगों में धर्म चार चरणों से घटकर एक चरण पर आ जाता है, और फिर अन्तिम युग का विस्तार से वर्णन करते हैं: छोटी आयु, लोभ और छल, वर्णों का सम्मिश्रण, अत्याचारी राजा, परिवार के विरुद्ध खड़ी स्त्रियाँ और सन्तानें, असमय वर्षा, आकाश के उत्पात तथा देवताओं और कर्मकाण्ड का त्याग। जब सूर्य, चन्द्र, तिष्य और बृहस्पति एक राशि में मिलेंगे तब कृतयुग लौटेगा, और सम्भल ग्राम में जन्मे कल्कि विष्णुयशा नामक ब्राह्मण धर्म से विजय पाने वाले चक्रवर्ती राजा बनकर म्लेच्छों के समूहों का संहार करेंगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.193.1)
युधिष्ठिरस्तु कौन्तेयो मार्कण्डेयं महामुनिम् । पुनः पप्रच्छ सामात्यो भविष्यां जगतो गतिम् ॥
yudhiṣṭhirastu kaunteyo mārkaṇḍeyaṃ mahāmunim | punaḥ papraccha sāmātyo bhaviṣyāṃ jagato gatim
तब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने अपने मन्त्रियों के साथ महामुनि मार्कण्डेय से संसार की भावी गति के विषय में फिर प्रश्न किया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (3.193.2)
आश्चर्यभूतं भवतः श्रुतं नो वदतांवर । मुने भार्गव यद्वृत्तं युगादौ प्रभवाप्ययौ ॥
āścaryabhūtaṃ bhavataḥ śrutaṃ no vadatāṃvara | mune bhārgava yadvṛttaṃ yugādau prabhavāpyayau
"हे वक्ताओं में श्रेष्ठ भार्गव मुनि, युगों के आरम्भ में जो सृष्टि और प्रलय हुए, उनका अद्भुत वृत्तान्त हमने आपसे सुना है।
श्लोक 3 (3.193.3)
अस्मिन्कलियुगे त्वस्ति पुनः कौतूहलं मम । समाकुलेषु धर्मेषु किंनु शेषं भविष्यति ॥
asminkaliyuge tvasti punaḥ kautūhalaṃ mama | samākuleṣu dharmeṣu kiṃnu śeṣaṃ bhaviṣyati
किन्तु इस कलियुग के विषय में मुझे फिर से जिज्ञासा है: जब धर्म अस्त-व्यस्त हो जाएँगे, तब क्या शेष रहेगा?
श्लोक 4 (3.193.4)
किंवीर्या मानवास्तत्र किमाहारविहारिणः । किमायुषः किंवसना भविष्यन्ति युगक्षये ॥
kiṃvīryā mānavāstatra kimāhāravihāriṇaḥ | kimāyuṣaḥ kiṃvasanā bhaviṣyanti yugakṣaye
युग के क्षय के समय मनुष्यों का पराक्रम कैसा होगा, उनका आहार-विहार कैसा होगा, उनकी आयु कितनी होगी और वे क्या पहनेंगे?
श्लोक 5 (3.193.5)
कां च काष्ठां समासाद्य पुनः संपत्स्यते कृतम् । विस्तरेण मुने ब्रूहि विचित्राणीह भाषसे ॥
kāṃ ca kāṣṭhāṃ samāsādya punaḥ saṃpatsyate kṛtam | vistareṇa mune brūhi vicitrāṇīha bhāṣase
और किस सीमा तक पहुँचकर फिर कृतयुग आएगा? मुनिवर, यह विस्तार से बताइए, क्योंकि आप अद्भुत बातें कहते हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (3.193.6)
इत्युक्तः स मुनिश्रेष्ठः पुनरेवाभ्यभाषत । रमयन्वृष्णिशार्दूलं पाण्डवांश्च महानृषिः ॥
ityuktaḥ sa muniśreṣṭhaḥ punarevābhyabhāṣata | ramayanvṛṣṇiśārdūlaṃ pāṇḍavāṃśca mahānṛṣiḥ
ऐसा कहे जाने पर मुनियों में श्रेष्ठ उन महर्षि ने वृष्णिवंश के सिंह श्रीकृष्ण और पाण्डवों को प्रसन्न करते हुए फिर कहना आरम्भ किया।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 7 (3.193.7)
शृणु राजन्मया दृष्टं यत्पुरा श्रुतमेव च । अनुभूतं च राजेन्द्र देवदेवप्रसादजम् ॥
śṛṇu rājanmayā dṛṣṭaṃ yatpurā śrutameva ca | anubhūtaṃ ca rājendra devadevaprasādajam
"हे राजन्, जो मैंने देखा है, जो पूर्वकाल में सुना है, और हे राजेन्द्र, जो देवाधिदेव की कृपा से मैंने स्वयं अनुभव किया है, उसे सुनो।
श्लोक 8 (3.193.8)
भविष्यं सर्वलोकस्य वृत्तान्तं भरतर्षभ । कलुषं कालमासाद्य कथ्यमानं निबोध मे ॥
bhaviṣyaṃ sarvalokasya vṛttāntaṃ bharatarṣabha | kaluṣaṃ kālamāsādya kathyamānaṃ nibodha me
हे भरतश्रेष्ठ, पापमय काल के आने पर समस्त संसार का जो भावी वृत्तान्त होगा, उसे मैं कहता हूँ; तुम समझो।
श्लोक 9 (3.193.9)
कृते चतुष्पात्सकलो निर्व्याजोपाधिवर्जितः । वृषः प्रतिष्ठितो धर्मो मनुष्ये भरतर्षभ ॥
kṛte catuṣpātsakalo nirvyājopādhivarjitaḥ | vṛṣaḥ pratiṣṭhito dharmo manuṣye bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, कृतयुग में धर्म चारों चरणों वाले वृषभ के समान मनुष्यों में पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित था; उसमें न कपट था, न कोई दोष।
श्लोक 10 (3.193.10)
अधर्मपादविद्धस्तु त्रिभिरंशैः प्रतिष्ठितः । त्रेतायां द्वापरेऽर्धेन व्यामिश्रो धर्म उच्यते ॥
adharmapādaviddhastu tribhiraṃśaiḥ pratiṣṭhitaḥ | tretāyāṃ dvāpare'rdhena vyāmiśro dharma ucyate
त्रेता में अधर्म के एक चरण से बिंधा हुआ धर्म तीन अंशों पर टिका रहता है; द्वापर में आधा अधर्म से मिला हुआ धर्म कहा जाता है।
श्लोक 11 (3.193.11)
त्रिभिरंशैरधर्मस्तु लोकानाक्रम्य तिष्ठति । तामसं युगमासाद्य तदा भरतसत्तम ॥
tribhiraṃśairadharmastu lokānākramya tiṣṭhati | tāmasaṃ yugamāsādya tadā bharatasattama
फिर हे भरतसत्तम, तामस युग आने पर अधर्म तीन अंशों से लोकों पर छाकर स्थित हो जाता है,
श्लोक 12 (3.193.12)
चतुर्थांशेन धर्मस्तु मनुष्यानुपतिष्ठति । आयुर्वीर्यं मनो बुद्धिर्बलं तेजश्च पाण्डव ॥
caturthāṃśena dharmastu manuṣyānupatiṣṭhati | āyurvīryaṃ mano buddhirbalaṃ tejaśca pāṇḍava
और धर्म केवल चौथे अंश से मनुष्यों के पास रहता है। हे पाण्डुनन्दन, आयु, पराक्रम, मन, बुद्धि, बल और तेज
श्लोक 13 (3.193.13)
मनुष्याणामनुयुगं ह्रसन्तीति निबोध मे । ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव युधिष्ठिर ॥
manuṣyāṇāmanuyugaṃ hrasantīti nibodha me | brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrāścaiva yudhiṣṭhira
युग-युग में मनुष्यों में घटते जाते हैं, यह मुझसे जान लो। हे युधिष्ठिर, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र
श्लोक 14 (3.193.14)
व्याजैर्धर्मं चरिष्यन्ति धर्मवैतंसिका नराः । सत्यं संक्षेप्स्यते लोके नरैः पण्डितमानिभिः ॥
vyājairdharmaṃ cariṣyanti dharmavaitaṃsikā narāḥ | satyaṃ saṃkṣepsyate loke naraiḥ paṇḍitamānibhiḥ
छल से धर्म का आचरण करेंगे; वे धर्म का जाल फैलाकर लोगों को ठगने वाले होंगे। अपने को पण्डित मानने वाले लोगों के कारण संसार में सत्य घट जाएगा।
श्लोक 15 (3.193.15)
सत्यहान्या ततस्तेषामायुरल्पं भविष्यति । आयुषः प्रक्षयाद्विद्यां न शक्ष्यन्त्युपशिक्षितुम् ॥
satyahānyā tatasteṣāmāyuralpaṃ bhaviṣyati | āyuṣaḥ prakṣayādvidyāṃ na śakṣyantyupaśikṣitum
सत्य की हानि से उनकी आयु थोड़ी हो जाएगी, और आयु के क्षीण होने से वे विद्या नहीं सीख सकेंगे।
श्लोक 16 (3.193.16)
विद्याहीनानविज्ञानाल्लोभोप्यभिभविष्यति । लोभमोहपरा मूढाः कामासक्ताश्च मानवाः ॥
vidyāhīnānavijñānāllobhopyabhibhaviṣyati | lobhamohaparā mūḍhāḥ kāmāsaktāśca mānavāḥ
विद्या से हीन और अज्ञानी लोगों को लोभ दबा लेगा। लोभ और मोह में डूबे, मूढ़ और कामनाओं में आसक्त मनुष्य
श्लोक 17 (3.193.17)
वैरबद्धा भविष्यन्ति परस्परवधैषिणः । ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः संकीर्यन्ते परस्परम् ॥
vairabaddhā bhaviṣyanti parasparavadhaiṣiṇaḥ | brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ saṃkīryante parasparam
आपस में वैर से बँधकर एक-दूसरे के वध की इच्छा करेंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य परस्पर मिश्रित हो जाएँगे;
श्लोक 18 (3.193.18)
शूद्रतुल्या भविष्यन्ति तपःसत्यविवर्जिताः । अन्त्या मध्या भविष्यन्ति मध्याश्चान्त्या न संशयः ॥
śūdratulyā bhaviṣyanti tapaḥsatyavivarjitāḥ | antyā madhyā bhaviṣyanti madhyāścāntyā na saṃśayaḥ
तप और सत्य से रहित होकर वे शूद्रों के समान हो जाएँगे। अन्त्य लोग मध्य में आ जाएँगे और मध्य के लोग अन्त्य हो जाएँगे, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 19 (3.193.19)
ईदृशो भविता लोको युगान्ते पर्युपस्थिते । वस्त्राणां प्रवरा शाणी धान्यानां कोरदूषकः ॥
īdṛśo bhavitā loko yugānte paryupasthite | vastrāṇāṃ pravarā śāṇī dhānyānāṃ koradūṣakaḥ
युग का अन्त आने पर संसार ऐसा ही होगा। वस्त्रों में सन का वस्त्र श्रेष्ठ माना जाएगा और अन्नों में कोदो।
श्लोक 20 (3.193.20)
भार्यामित्राश्च पुरुषा भविष्यन्ति युगक्षये । मत्स्यामिषेण जीवन्तो दुहन्तश्चाप्यजैडकम् ॥
bhāryāmitrāśca puruṣā bhaviṣyanti yugakṣaye | matsyāmiṣeṇa jīvanto duhantaścāpyajaiḍakam
युग के क्षय में पुरुष केवल अपनी पत्नियों को ही मित्र मानेंगे। वे मछली और मांस खाकर जिएँगे और बकरियों तथा भेड़ों को दुहेंगे,
श्लोक 21 (3.193.21)
गोषु नष्टासु पुरुषा येऽपि नित्यं धृतव्रताः । तेऽपि लोभसमायुक्ता भविष्यन्ति युगक्षये ॥
goṣu naṣṭāsu puruṣā ye'pi nityaṃ dhṛtavratāḥ | te'pi lobhasamāyuktā bhaviṣyanti yugakṣaye
क्योंकि गौएँ नष्ट हो चुकी होंगी। जो लोग सदा व्रतों का पालन करते आए हैं, वे भी युग के क्षय में लोभ से भर जाएँगे।
श्लोक 22 (3.193.22)
अन्योन्यं परिमुष्णन्तो हिंसयन्तश्च मानवाः । अजपा नास्तिकाः स्तेना भविष्यन्ति युगक्षये ॥
anyonyaṃ parimuṣṇanto hiṃsayantaśca mānavāḥ | ajapā nāstikāḥ stenā bhaviṣyanti yugakṣaye
युग के क्षय में मनुष्य एक-दूसरे को लूटते और सताते हुए जप से रहित, नास्तिक और चोर हो जाएँगे।
श्लोक 23 (3.193.23)
सरित्तीरेषु कुद्दालैर्वापयिष्यन्ति चौषधीः । ताश्चाप्यल्पफलास्तेषां भविष्यन्ति युगक्षये ॥
sarittīreṣu kuddālairvāpayiṣyanti cauṣadhīḥ | tāścāpyalpaphalāsteṣāṃ bhaviṣyanti yugakṣaye
वे नदियों के तटों पर कुदालों से अन्न के पौधे बोएँगे, और युग के क्षय में वे भी उन्हें थोड़ा ही फल देंगे।
श्लोक 24 (3.193.24)
श्राद्धे दैवे च पुरुषा येऽपि नित्यं धृतव्रताः । तेऽपि लोभसमायुक्ता भोक्ष्यन्तीह परस्परम् ॥
śrāddhe daive ca puruṣā ye'pi nityaṃ dhṛtavratāḥ | te'pi lobhasamāyuktā bhokṣyantīha parasparam
जो लोग सदा व्रत धारण करते आए हैं, वे भी लोभ से भरकर श्राद्ध और देव-कार्यों में एक-दूसरे का अन्न खाएँगे।
श्लोक 25 (3.193.25)
पिता पुत्रस्य भोक्ता च पितुः पुत्रस्तथैव च । अतिक्रान्तानि भोज्यानि भविष्यन्ति युगक्षये ॥
pitā putrasya bhoktā ca pituḥ putrastathaiva ca | atikrāntāni bhojyāni bhaviṣyanti yugakṣaye
पिता पुत्र का अन्न खाएगा और पुत्र पिता का; युग के क्षय में भोजन की सारी मर्यादाएँ लाँघ दी जाएँगी।
श्लोक 26 (3.193.26)
न व्रतानि चरिष्यन्ति ब्राह्मणा वेदनिन्दकाः । न यक्ष्यन्ति न होष्यन्ति हेतुवादविमोहिताः । निम्नेष्वीहां करिष्यन्ति हेतुवादविमोहिताः ॥
na vratāni cariṣyanti brāhmaṇā vedanindakāḥ | na yakṣyanti na hoṣyanti hetuvādavimohitāḥ | nimneṣvīhāṃ kariṣyanti hetuvādavimohitāḥ
ब्राह्मण वेदों की निन्दा करेंगे और व्रतों का पालन नहीं करेंगे; तर्कवाद से मोहित होकर वे न यज्ञ करेंगे, न हवन। तर्कवाद से मोहित होकर वे नीच कर्मों में मन लगाएँगे।
श्लोक 27 (3.193.27)
निम्ने कृषिं करिष्यन्ति योक्ष्यन्ति धुरि धेनुकाः । एकहायनवत्सांश्च वाहयिष्यन्ति मानवाः ॥
nimne kṛṣiṃ kariṣyanti yokṣyanti dhuri dhenukāḥ | ekahāyanavatsāṃśca vāhayiṣyanti mānavāḥ
वे निचली भूमि में खेती करेंगे, दुधारू गायों को जुए में जोतेंगे और एक वर्ष के बछड़ों से बोझ ढुलवाएँगे।
श्लोक 28 (3.193.28)
पुत्रः पितृवधं कृत्वा पिता पुत्रवधं तथा । स्त्रियोऽपि पतिपुत्रादीन्वधिष्यन्ति युगक्षये । निरुद्वेगो बृहद्वादी न निन्दामुपलप्स्यते ॥
putraḥ pitṛvadhaṃ kṛtvā pitā putravadhaṃ tathā | striyo'pi patiputrādīnvadhiṣyanti yugakṣaye | nirudvego bṛhadvādī na nindāmupalapsyate
पुत्र पिता का वध करेगा और पिता पुत्र का; युग के क्षय में स्त्रियाँ भी पति, पुत्र आदि का वध करेंगी; और ऐसा करने वाला निश्चिन्त होकर बड़ी-बड़ी बातें करेगा, फिर भी उसकी निन्दा नहीं होगी।
श्लोक 29 (3.193.29)
म्लेच्छभूतं जगत्सर्वं निष्क्रियं दानवर्जितम् । भविष्यति निरानन्दमनुत्सवमथो तथा ॥
mlecchabhūtaṃ jagatsarvaṃ niṣkriyaṃ dānavarjitam | bhaviṣyati nirānandamanutsavamatho tathā
सारा संसार म्लेच्छों जैसा हो जाएगा, कर्म और दान से रहित, आनन्दहीन और उत्सवों से शून्य।
श्लोक 30 (3.193.30)
प्रायशः कृपणानां हि तथा बन्धुमतामपि । विधवानां च वित्तानि हरिष्यन्तीह मानवाः ॥
prāyaśaḥ kṛpaṇānāṃ hi tathā bandhumatāmapi | vidhavānāṃ ca vittāni hariṣyantīha mānavāḥ
मनुष्य प्रायः दीनों का, बन्धु-बान्धवों वालों का भी, और विधवाओं का धन हर लेंगे।
श्लोक 31 (3.193.31)
स्वल्पवीर्यबलाः स्तब्धा लोभमोहपरायणाः । तत्कथादानसंतुष्टा शिष्टानामपि बान्धवाः ॥
svalpavīryabalāḥ stabdhā lobhamohaparāyaṇāḥ | tatkathādānasaṃtuṣṭā śiṣṭānāmapi bāndhavāḥ
थोड़े पराक्रम और बल वाले, अकड़े हुए, लोभ और मोह में डूबे, दान की बातों और भेंटों से ही सन्तुष्ट रहने वाले, सज्जनों के बन्धु-बान्धव भी
श्लोक 32 (3.193.32)
परिग्रहं करिष्यन्ति मायाचारपरिग्रहाः । संघातयन्तः कौन्तेय राजानः पापबुद्धयः ॥
parigrahaṃ kariṣyanti māyācāraparigrahāḥ | saṃghātayantaḥ kaunteya rājānaḥ pāpabuddhayaḥ
छलपूर्ण आचरण से धन-सम्पत्ति बटोरेंगे। हे कुन्तीनन्दन, पापबुद्धि राजा लोगों का संहार करवाते हुए,
श्लोक 33 (3.193.33)
परस्परवधोद्युक्ता मूर्खाः पण्डितमानिनः । भविष्यन्ति युगस्यान्ते क्षत्रिया लोककण्टकाः ॥
parasparavadhodyuktā mūrkhāḥ paṇḍitamāninaḥ | bhaviṣyanti yugasyānte kṣatriyā lokakaṇṭakāḥ
एक-दूसरे के वध में लगे हुए, मूर्ख होकर भी अपने को पण्डित मानने वाले ये क्षत्रिय युग के अन्त में संसार के लिए काँटे बन जाएँगे।
श्लोक 34 (3.193.34)
अरक्षितारो लुब्धाश्च मानाहंकारदर्पिताः । केवलं दण्डरुचयो भविष्यन्ति युगक्षये ॥
arakṣitāro lubdhāśca mānāhaṃkāradarpitāḥ | kevalaṃ daṇḍarucayo bhaviṣyanti yugakṣaye
युग के क्षय में वे प्रजा की रक्षा नहीं करेंगे, लोभी होंगे, मान और अहंकार से मदमत्त होंगे, और केवल दण्ड देने में ही रुचि रखेंगे।
श्लोक 35 (3.193.35)
आक्रम्याक्रम्य साधूनां दारांश्चापि धनानि च । भोक्ष्यन्ते निरनुक्रोशा रुदतामपि भारत ॥
ākramyākramya sādhūnāṃ dārāṃścāpi dhanāni ca | bhokṣyante niranukrośā rudatāmapi bhārata
हे भारत, वे बार-बार सज्जनों पर आक्रमण करके उनके रोते रहते हुए भी निर्दयता से उनकी स्त्रियों और धन का भोग करेंगे।
श्लोक 36 (3.193.36)
न कन्यां याचते कश्चिन्नापि कन्या प्रदीयते । स्वयंग्रहा भविष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते ॥
na kanyāṃ yācate kaścinnāpi kanyā pradīyate | svayaṃgrahā bhaviṣyanti yugānte samupasthite
युग का अन्त आने पर न कोई कन्या को माँगेगा, न कोई कन्या दी जाएगी; लोग स्वयं ही अपना साथी चुन लेंगे।
श्लोक 37 (3.193.37)
राजानश्चाप्यसंतुष्टाः परार्थान्मूढचेतसः । सर्वोपायैर्हरिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥
rājānaścāpyasaṃtuṣṭāḥ parārthānmūḍhacetasaḥ | sarvopāyairhariṣyanti yugānte paryupasthite
युग का अन्त आने पर राजा भी असन्तुष्ट और मूढ़चित्त होकर सब उपायों से दूसरों का धन हर लेंगे।
श्लोक 38 (3.193.38)
म्लेच्छीभूतं जगत्सर्वं भविष्यति न संशयः । हस्तो हस्तं परिमुषेद्युगान्ते समुपस्थिते ॥
mlecchībhūtaṃ jagatsarvaṃ bhaviṣyati na saṃśayaḥ | hasto hastaṃ parimuṣedyugānte samupasthite
सारा संसार म्लेच्छ बन जाएगा, इसमें संशय नहीं; युग का अन्त आने पर एक हाथ दूसरे हाथ को लूटेगा।
श्लोक 39 (3.193.39)
सत्यं संक्षिप्यते लोके नरैः पण्डितमानिभिः । स्थविरा बालमतयो बालाः स्थविरबुद्धयः ॥
satyaṃ saṃkṣipyate loke naraiḥ paṇḍitamānibhiḥ | sthavirā bālamatayo bālāḥ sthavirabuddhayaḥ
अपने को पण्डित मानने वाले लोगों के कारण संसार में सत्य घट जाएगा। बूढ़ों की बुद्धि बालकों जैसी होगी और बालकों की बूढ़ों जैसी।
श्लोक 40 (3.193.40)
भीरुस्तथा शूरमानी शूरा भीरुविषादिनः । न विश्वसन्ति चान्योन्यं युगान्ते पर्युपस्थिते ॥
bhīrustathā śūramānī śūrā bhīruviṣādinaḥ | na viśvasanti cānyonyaṃ yugānte paryupasthite
कायर अपने को शूर मानेगा और शूरवीर कायरों की तरह विषाद में डूबेंगे; युग का अन्त आने पर कोई किसी पर विश्वास नहीं करेगा।
श्लोक 41 (3.193.41)
नैकभार्यं जगत्सर्वं लोभमोहव्यवस्थितम् । अधर्मो वर्धते तत्र न तु धर्मः प्रवर्तते ॥
naikabhāryaṃ jagatsarvaṃ lobhamohavyavasthitam | adharmo vardhate tatra na tu dharmaḥ pravartate
लोभ और मोह से चलने वाला सारा संसार एकपत्नीव्रत नहीं निभाएगा। वहाँ अधर्म बढ़ता है और धर्म नहीं चलता।
श्लोक 42 (3.193.42)
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या नशिष्यन्ति जनाधिप । एकवर्णस्तदा लोको भविष्यति युगक्षये ॥
brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyā naśiṣyanti janādhipa | ekavarṇastadā loko bhaviṣyati yugakṣaye
हे जनेश्वर, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य नष्ट हो जाएँगे, और युग के क्षय में संसार एक ही वर्ण का हो जाएगा।
श्लोक 43 (3.193.43)
न क्षंस्यति पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा । भार्याश्च पतिशुश्रूषां न करिष्यन्ति संक्षये ॥
na kṣaṃsyati pitā putraṃ putraśca pitaraṃ tathā | bhāryāśca patiśuśrūṣāṃ na kariṣyanti saṃkṣaye
पिता पुत्र को क्षमा नहीं करेगा और पुत्र पिता को नहीं; उस विनाश-काल में पत्नियाँ पतियों की सेवा नहीं करेंगी।
श्लोक 44 (3.193.44)
ये यवान्ना जनपदा गोधूमान्नास्तथैव च । तान्देशान्संश्रयिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥
ye yavānnā janapadā godhūmānnāstathaiva ca | tāndeśānsaṃśrayiṣyanti yugānte paryupasthite
युग का अन्त आने पर लोग उन देशों का आश्रय लेंगे जहाँ जौ और गेहूँ मुख्य अन्न हैं।
श्लोक 45 (3.193.45)
स्वैराहाराश्च पुरुषा योषितश्च विशांपते । अन्योन्यं न सहिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥
svairāhārāśca puruṣā yoṣitaśca viśāṃpate | anyonyaṃ na sahiṣyanti yugānte paryupasthite
हे प्रजापालक, युग का अन्त आने पर पुरुष और स्त्रियाँ मनमाना आहार करेंगे और एक-दूसरे को सहन नहीं करेंगे।
श्लोक 46 (3.193.46)
म्लेच्छभूतं जगत्सर्वं भविष्यति युधिष्ठिर । श्राद्धे न देवान्न पितॄँस्तर्पयिष्यन्ति मानवाः ॥
mlecchabhūtaṃ jagatsarvaṃ bhaviṣyati yudhiṣṭhira | śrāddhe na devānna pitṝm̐starpayiṣyanti mānavāḥ
हे युधिष्ठिर, सारा संसार म्लेच्छ बन जाएगा; मनुष्य श्राद्ध में न देवताओं को तृप्त करेंगे, न पितरों को।
श्लोक 47 (3.193.47)
न कश्चित्कस्यचिच्छ्रोता न कश्चित्कस्यचिद्गुरुः । तमोग्रस्तस्तदा लोको भविष्यति जनाधिप ॥
na kaścitkasyacicchrotā na kaścitkasyacidguruḥ | tamograstastadā loko bhaviṣyati janādhipa
हे जनेश्वर, तब न कोई किसी की सुनेगा, न कोई किसी का गुरु होगा; संसार अन्धकार से ग्रस्त हो जाएगा।
श्लोक 48 (3.193.48)
परमायुश्च भविता तदा वर्षाणि षोडश । ततः प्राणान्विमोक्ष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते ॥
paramāyuśca bhavitā tadā varṣāṇi ṣoḍaśa | tataḥ prāṇānvimokṣyanti yugānte samupasthite
युग का अन्त आने पर परम आयु सोलह वर्ष की होगी, और उसके बाद लोग प्राण त्याग देंगे।
श्लोक 49 (3.193.49)
पञ्चमे वाऽथ षष्ठे वा वर्षे कन्या प्रसूयते । सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च प्रजास्यन्ति नरास्तदा ॥
pañcame vā'tha ṣaṣṭhe vā varṣe kanyā prasūyate | saptavarṣāṣṭavarṣāśca prajāsyanti narāstadā
तब पाँचवें या छठे वर्ष में ही कन्या सन्तान को जन्म देगी, और सात-आठ वर्ष के पुरुष सन्तान उत्पन्न करेंगे।
श्लोक 50 (3.193.50)
पत्यौ स्त्री तु तदा राजन्पुरुषो वा स्त्रियं प्रति । युगान्ते राजशार्दूल न तोषमुपयास्यति ॥
patyau strī tu tadā rājanpuruṣo vā striyaṃ prati | yugānte rājaśārdūla na toṣamupayāsyati
हे राजसिंह, युग के अन्त में न स्त्री पति से सन्तुष्ट होगी, न पुरुष स्त्री से।
श्लोक 51 (3.193.51)
अल्पद्रव्या वृथालिङ्गा हिंसा च प्रभविष्यति । न कश्चित्कस्यचिद्दाता भविष्यति युगक्षये ॥
alpadravyā vṛthāliṅgā hiṃsā ca prabhaviṣyati | na kaścitkasyaciddātā bhaviṣyati yugakṣaye
लोगों के पास थोड़ा धन होगा, वे धर्म के चिह्न व्यर्थ ही धारण करेंगे, और हिंसा का बोलबाला होगा; युग के क्षय में कोई किसी को दान नहीं देगा।
श्लोक 52 (3.193.52)
अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः । केशशूलाः स्त्रियश्चापि भविष्यन्ति युगक्षये ॥
aṭṭaśūlā janapadāḥ śivaśūlāścatuṣpathāḥ | keśaśūlāḥ striyaścāpi bhaviṣyanti yugakṣaye
युग के क्षय में जनपद अन्न बेचेंगे, चौराहों पर वेद बिकेंगे और स्त्रियाँ अपने शरीर का व्यापार करेंगी।
श्लोक 53 (3.193.53)
म्लेच्छाचाराः सर्वभक्षा दारुणाः सर्वकर्मसु । भाविनः पश्चिमे काले मनुष्या नात्र संशयः ॥
mlecchācārāḥ sarvabhakṣā dāruṇāḥ sarvakarmasu | bhāvinaḥ paścime kāle manuṣyā nātra saṃśayaḥ
उस अन्तिम काल में मनुष्य म्लेच्छों जैसे आचार वाले, सब कुछ खाने वाले और सभी कर्मों में क्रूर होंगे, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 54 (3.193.54)
क्रयविक्रयकाले च सर्वः सर्वस्य वञ्चनम् । युगान्ते भरतश्रेष्ठ वित्तलोभात्करिष्यति ॥
krayavikrayakāle ca sarvaḥ sarvasya vañcanam | yugānte bharataśreṣṭha vittalobhātkariṣyati
हे भरतश्रेष्ठ, युग के अन्त में खरीद-बिक्री के समय धन के लोभ से हर कोई हर किसी को ठगेगा।
श्लोक 55 (3.193.55)
ज्ञानानि चाप्यविज्ञाय करिष्यन्ति क्रियास्तथा । आत्मच्छन्देन वर्तन्ते युगान्ते समुपस्थिते ॥
jñānāni cāpyavijñāya kariṣyanti kriyāstathā | ātmacchandena vartante yugānte samupasthite
जानने योग्य तत्त्व को बिना समझे ही वे कर्मकाण्ड करेंगे; युग का अन्त आने पर लोग मनमाना आचरण करते हैं।
श्लोक 56 (3.193.56)
स्वभावात्क्रूरकर्माणश्चान्योन्यमभिशंसिनः । भवितारो जनाः सर्वे संप्राप्ते तु युगक्षये ॥
svabhāvātkrūrakarmāṇaścānyonyamabhiśaṃsinaḥ | bhavitāro janāḥ sarve saṃprāpte tu yugakṣaye
युग का क्षय आने पर सब लोग स्वभाव से ही क्रूर कर्म करने वाले और एक-दूसरे पर दोष लगाने वाले होंगे।
श्लोक 57 (3.193.57)
आरामांश्चैव वृक्षांश्च नाशयिष्यन्ति निर्व्यथाः । भविता संशयो लोके जीवितस्य हि देहिनाम् ॥
ārāmāṃścaiva vṛkṣāṃśca nāśayiṣyanti nirvyathāḥ | bhavitā saṃśayo loke jīvitasya hi dehinām
वे बिना किसी पीड़ा के बाग-बगीचों और वृक्षों को नष्ट कर देंगे; संसार में देहधारियों का जीवन ही संशय में पड़ जाएगा।
श्लोक 58 (3.193.58)
तथा लोभाभिभूताश्च भविष्यन्ति नरा नृप । ब्राह्मणांश्च हनिष्यन्ति ब्राह्मणस्वोपभोगिनः ॥
tathā lobhābhibhūtāśca bhaviṣyanti narā nṛpa | brāhmaṇāṃśca haniṣyanti brāhmaṇasvopabhoginaḥ
हे राजन्, लोग इसी प्रकार लोभ से अभिभूत हो जाएँगे और ब्राह्मणों का धन भोगते हुए ब्राह्मणों का ही वध करेंगे।
श्लोक 59 (3.193.59)
हाहाकृता द्विजाश्चैव भयार्ता वृषलार्दिताः । त्रातारमलभन्तो वै भ्रमिष्यन्ति महीमिमाम् ॥
hāhākṛtā dvijāścaiva bhayārtā vṛṣalārditāḥ | trātāramalabhanto vai bhramiṣyanti mahīmimām
हाहाकार करते, भय से पीड़ित और शूद्रों से सताए हुए द्विज कोई रक्षक न पाकर इस पृथ्वी पर भटकते फिरेंगे।
श्लोक 60 (3.193.60)
जीवितान्तकराः क्रूरा रौद्राः प्राणिविहिंसकाः । यदा भविष्यन्ति नरास्तदा संक्षेप्स्यते युगम् ॥
jīvitāntakarāḥ krūrā raudrāḥ prāṇivihiṃsakāḥ | yadā bhaviṣyanti narāstadā saṃkṣepsyate yugam
जब मनुष्य प्राण लेने वाले, क्रूर, भयंकर और जीवों की हिंसा करने वाले हो जाएँगे, तब युग का अन्त आ जाएगा।
श्लोक 61 (3.193.61)
आश्रयिष्यन्ति च नदीः पर्वतान्विषमाणि च । प्रधावमाना वित्रस्ता द्विजाः कुरुकुलोद्वह ॥
āśrayiṣyanti ca nadīḥ parvatānviṣamāṇi ca | pradhāvamānā vitrastā dvijāḥ kurukulodvaha
हे कुरुकुलश्रेष्ठ, भयभीत होकर भागते हुए द्विज नदियों, पर्वतों और दुर्गम स्थानों का आश्रय लेंगे।
श्लोक 62 (3.193.62)
दस्युभिः पीडिता राजन्काका इव द्विजोत्तमाः । कुराजभिश्च सततं करभारप्रपीडिताः ॥
dasyubhiḥ pīḍitā rājankākā iva dvijottamāḥ | kurājabhiśca satataṃ karabhāraprapīḍitāḥ
हे राजन्, लुटेरों से पीड़ित श्रेष्ठ द्विज कौओं की तरह सशंकित रहेंगे, और दुष्ट राजाओं के करों के बोझ से निरन्तर दबे रहेंगे।
श्लोक 63 (3.193.63)
धैर्यं त्यक्त्वा महीपाल दारुणे युगसंक्षये । विकर्माणि करिष्यन्ति शूद्राणां परिचारकाः ॥
dhairyaṃ tyaktvā mahīpāla dāruṇe yugasaṃkṣaye | vikarmāṇi kariṣyanti śūdrāṇāṃ paricārakāḥ
हे पृथ्वीपाल, युग के उस भयंकर क्षय में वे धैर्य छोड़कर शूद्रों के सेवक बनकर निषिद्ध कर्म करेंगे।
श्लोक 64 (3.193.64)
शूद्रा धर्मं प्रवक्ष्यन्ति ब्राह्मणाः पर्युपासकाः । श्रोतारश्च भविष्यन्ति प्रामाण्येन व्यवस्थिताः ॥
śūdrā dharmaṃ pravakṣyanti brāhmaṇāḥ paryupāsakāḥ | śrotāraśca bhaviṣyanti prāmāṇyena vyavasthitāḥ
शूद्र धर्म का उपदेश करेंगे और ब्राह्मण उनकी उपासना करते हुए उनकी बात को प्रमाण मानकर सुनेंगे।
श्लोक 65 (3.193.65)
विपरीतश्च लोकोऽयं भविष्यत्यधरोत्तरः । एडूकान्पूजयिष्यन्ति वर्जयिष्यन्ति देवताः । शूद्राश्च प्रभविष्यन्ति न द्विजा युगसंक्षये ॥
viparītaśca loko'yaṃ bhaviṣyatyadharottaraḥ | eḍūkānpūjayiṣyanti varjayiṣyanti devatāḥ | śūdrāśca prabhaviṣyanti na dvijā yugasaṃkṣaye
यह संसार उलट जाएगा, नीचे वाले ऊपर और ऊपर वाले नीचे। लोग अस्थियों वाले स्थानों (एडूकों) की पूजा करेंगे और देवताओं को त्याग देंगे; युग के क्षय में शूद्रों का प्रभुत्व होगा, द्विजों का नहीं।
श्लोक 66 (3.193.66)
आश्रमेषु महर्षीणां ब्राह्मणावसथेषु च । देवस्थानेषु चैत्येषु नागानामालयेषु च ॥
āśrameṣu maharṣīṇāṃ brāhmaṇāvasatheṣu ca | devasthāneṣu caityeṣu nāgānāmālayeṣu ca
महर्षियों के आश्रमों में, ब्राह्मणों के घरों में, देवस्थानों में, चैत्यों में और नागों के निवासों में,
श्लोक 67 (3.193.67)
एडूकचिह्ना पृथिवी न देवगृहभूषिता । भविष्यति युगे क्षीणे तद्युगान्तस्य लक्षणम् ॥
eḍūkacihnā pṛthivī na devagṛhabhūṣitā | bhaviṣyati yuge kṣīṇe tadyugāntasya lakṣaṇam
युग के क्षीण होने पर पृथ्वी एडूकों से चिह्नित होगी, देवमन्दिरों से सुशोभित नहीं; यही युगान्त का लक्षण है।
श्लोक 68 (3.193.68)
यदा रौद्रा धर्महीना मांसादाः पानपास्तथा । भविष्यन्ति नरा नित्यं तदा संक्षेप्स्यते युगम् ॥
yadā raudrā dharmahīnā māṃsādāḥ pānapāstathā | bhaviṣyanti narā nityaṃ tadā saṃkṣepsyate yugam
जब मनुष्य सदा भयंकर, धर्महीन, मांसाहारी और मदिरा पीने वाले होंगे, तब युग का अन्त आ जाएगा।
श्लोक 69 (3.193.69)
पुष्पं पुष्पे यदा राजन्फले वा फलमाश्रितम् । प्रजास्यति महाराज तदा संक्षेप्स्यते युगम् ॥
puṣpaṃ puṣpe yadā rājanphale vā phalamāśritam | prajāsyati mahārāja tadā saṃkṣepsyate yugam
हे राजन्, जब फूल पर फूल और फल पर फल लगने लगें, तब हे महाराज, युग का अन्त आ जाएगा।
श्लोक 70 (3.193.70)
अकालवर्षी पर्जन्यो भविष्यति गते युगे । अक्रमेण मनुष्याणां भविष्यन्ति तदा क्रियाः ॥
akālavarṣī parjanyo bhaviṣyati gate yuge | akrameṇa manuṣyāṇāṃ bhaviṣyanti tadā kriyāḥ
युग के बीत जाने पर मेघ असमय बरसेगा, और तब मनुष्यों के कर्म क्रम के विपरीत होंगे।
श्लोक 71 (3.193.71)
विरोधमथ यास्यन्ति वृषला ब्राह्मणैः सह । मही म्लेच्छजनाकीर्णा भविष्यति ततोऽचिरात् ॥
virodhamatha yāsyanti vṛṣalā brāhmaṇaiḥ saha | mahī mlecchajanākīrṇā bhaviṣyati tato'cirāt
तब शूद्र ब्राह्मणों से विरोध करेंगे, और शीघ्र ही पृथ्वी म्लेच्छों से भर जाएगी।
श्लोक 72 (3.193.72)
करभारभयाद्विप्रा भजिष्यन्ति दिशो दश । अन्यायवर्तिनश्चापि भविष्यन्ति नराधिपाः ॥
karabhārabhayādviprā bhajiṣyanti diśo daśa | anyāyavartinaścāpi bhaviṣyanti narādhipāḥ
करों के बोझ के भय से ब्राह्मण दसों दिशाओं में भाग जाएँगे, और राजा भी अन्याय करने वाले होंगे।
श्लोक 73 (3.193.73)
निर्विशेषा जनपदास्तथा विष्टिकरार्दिताः । आश्रमानुपलप्स्यन्ति फलमूलोपजीविनः ॥
nirviśeṣā janapadāstathā viṣṭikarārditāḥ | āśramānupalapsyanti phalamūlopajīvinaḥ
सब जनपद एक-से हो जाएँगे और बेगार लेने वालों से पीड़ित रहेंगे; फल-मूल पर जीने वाले लोग आश्रमों की शरण लेंगे।
श्लोक 74 (3.193.74)
एवं पर्याकुले लोके मर्यादा न भविष्यति । ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः परित्यक्ष्यन्ति सत्क्रियाम् । न स्थास्यन्त्युपदेशे च शिष्या विप्रियकारिणः ॥
evaṃ paryākule loke maryādā na bhaviṣyati | brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ parityakṣyanti satkriyām | na sthāsyantyupadeśe ca śiṣyā vipriyakāriṇaḥ
संसार के इस प्रकार अस्त-व्यस्त हो जाने पर कोई मर्यादा नहीं रहेगी। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सत्कर्म छोड़ देंगे, और शिष्य उपदेश पर नहीं चलेंगे, बल्कि अप्रिय कार्य करेंगे।
श्लोक 75 (3.193.75)
आचार्योपनिधिश्चैव भर्त्स्यते तदनन्तरम् । अर्थयुक्त्या प्रवत्स्यन्ति मित्रसंबन्धिबान्धवाः ॥
ācāryopanidhiścaiva bhartsyate tadanantaram | arthayuktyā pravatsyanti mitrasaṃbandhibāndhavāḥ
उसके बाद निर्धन आचार्य का भी तिरस्कार होगा, और मित्र, सम्बन्धी तथा बन्धु-बान्धव केवल धन के सम्बन्ध से ही साथ रहेंगे।
श्लोक 76 (3.193.76)
अभावः सर्वभूतानां युगान्ते संभविष्यति । दिशः प्रज्वलिताः सर्वा नक्षत्राण्यप्रभाणि च ॥
abhāvaḥ sarvabhūtānāṃ yugānte saṃbhaviṣyati | diśaḥ prajvalitāḥ sarvā nakṣatrāṇyaprabhāṇi ca
युग के अन्त में सब प्राणी अभाव से ग्रस्त होंगे। सब दिशाएँ जलती-सी होंगी और नक्षत्र प्रभाहीन हो जाएँगे;
श्लोक 77 (3.193.77)
प्रधूपितानि ज्योतींषि वाताः पर्याकुलास्तथा । उल्कापाताश्च बहवो महाभयनिदर्शकाः ॥
pradhūpitāni jyotīṃṣi vātāḥ paryākulāstathā | ulkāpātāśca bahavo mahābhayanidarśakāḥ
ज्योतिर्मय पिण्ड धुएँ से ढक जाएँगे, हवाएँ उथल-पुथल मचाएँगी, और महान भय की सूचना देने वाली बहुत-सी उल्काएँ गिरेंगी।
श्लोक 78 (3.193.78)
षड्भिरन्यैश्च सहितो भास्करः प्रतपिष्यति । तुमुलाश्चापि निर्ह्रादा दिग्दाहाश्चापि सर्वशः । कबन्धान्तर्हितो भानुरुदयास्तमने तदा ॥
ṣaḍbhiranyaiśca sahito bhāskaraḥ pratapiṣyati | tumulāścāpi nirhrādā digdāhāścāpi sarvaśaḥ | kabandhāntarhito bhānurudayāstamane tadā
सूर्य छह अन्य सूर्यों के साथ तपेगा; सब ओर भयंकर गर्जनाएँ होंगी और दिशाओं में दाह होगा; और तब उदय तथा अस्त के समय सूर्य कबन्ध से ढका रहेगा।
श्लोक 79 (3.193.79)
अकालवर्षी भगवान्भविष्यति सहस्रदृक् । सस्यानि च न रोक्ष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥
akālavarṣī bhagavānbhaviṣyati sahasradṛk | sasyāni ca na rokṣyanti yugānte paryupasthite
युग का अन्त आने पर सहस्रनेत्र इन्द्र असमय वर्षा करेंगे और अन्न नहीं उगेगा।
श्लोक 80 (3.193.80)
अभीक्ष्णं क्रूरवादिन्यः परुषा रुदितप्रियाः । भर्तॄणां वचने चैव न स्थास्यन्ति ततः स्त्रियः ॥
abhīkṣṇaṃ krūravādinyaḥ paruṣā ruditapriyāḥ | bhartṝṇāṃ vacane caiva na sthāsyanti tataḥ striyaḥ
तब स्त्रियाँ सदा कटु बोलने वाली, कठोर और रोने में रुचि रखने वाली होंगी, और पतियों की बात नहीं मानेंगी।
श्लोक 81 (3.193.81)
पुत्राश्च मातापितरौ हनिष्यन्ति युगक्षये । सूदयिष्यन्ति च पतीन्स्त्रियः पुत्रानपाश्रिताः ॥
putrāśca mātāpitarau haniṣyanti yugakṣaye | sūdayiṣyanti ca patīnstriyaḥ putrānapāśritāḥ
युग के क्षय में पुत्र माता-पिता का वध करेंगे, और स्त्रियाँ पुत्रों का सहारा लेकर पतियों को मार डालेंगी।
श्लोक 82 (3.193.82)
अपर्वणि महाराज सूर्यं राहुरुपैष्यति । युगान्ते हुतभुक्चापि सर्वतः प्रज्वलिष्यति ॥
aparvaṇi mahārāja sūryaṃ rāhurupaiṣyati | yugānte hutabhukcāpi sarvataḥ prajvaliṣyati
हे महाराज, बिना पर्व के ही राहु सूर्य को ग्रसेगा, और युग के अन्त में अग्नि भी सब ओर धधक उठेगी।
श्लोक 83 (3.193.83)
पानीयं भोजनं चापि याचमानास्तदाऽध्वगाः । न लप्स्यन्ते निवासं च निरस्ताः पथि शेरते ॥
pānīyaṃ bhojanaṃ cāpi yācamānāstadā'dhvagāḥ | na lapsyante nivāsaṃ ca nirastāḥ pathi śerate
तब पथिक पानी और भोजन माँगते फिरेंगे पर नहीं पाएँगे, न ठहरने का स्थान मिलेगा; ठुकराए हुए वे मार्ग में ही पड़े रहेंगे।
श्लोक 84 (3.193.84)
निर्घातवायसा नागाः शकुनाः समृगद्विजाः । रूक्षा वाचो विमोक्ष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥
nirghātavāyasā nāgāḥ śakunāḥ samṛgadvijāḥ | rūkṣā vāco vimokṣyanti yugānte paryupasthite
युग का अन्त आने पर वज्र-सी कर्कश ध्वनि करने वाले कौए, नाग, गिद्ध आदि पक्षी, पशु और पंछी रूखी बोलियाँ बोलेंगे।
श्लोक 85 (3.193.85)
मित्रसंबन्धिनश्चापि संत्यक्ष्यन्ति नरास्तदा । जनं परिजनं चापि युगान्ते पर्युपस्थिते ॥
mitrasaṃbandhinaścāpi saṃtyakṣyanti narāstadā | janaṃ parijanaṃ cāpi yugānte paryupasthite
युग का अन्त आने पर लोग मित्रों, सम्बन्धियों, अपने लोगों और आश्रितों को भी त्याग देंगे।
श्लोक 86 (3.193.86)
अथ देशान्दिशश्चापि पत्तनान्यापणानि च । क्रमशः संलयिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥
atha deśāndiśaścāpi pattanānyāpaṇāni ca | kramaśaḥ saṃlayiṣyanti yugānte paryupasthite
फिर युग का अन्त आने पर देश, दिशाएँ, नगर और बाज़ार एक-एक करके विलीन हो जाएँगे।
श्लोक 87 (3.193.87)
हा तात हा सुतेत्येवं तदा वाचः सुदारुणाः । विक्रोशमानश्चान्योन्यं जनो गां पर्यटिष्यति ॥
hā tāta hā sutetyevaṃ tadā vācaḥ sudāruṇāḥ | vikrośamānaścānyonyaṃ jano gāṃ paryaṭiṣyati
'हा तात! हा पुत्र!' ऐसी अत्यन्त दारुण पुकारें करते हुए लोग एक-दूसरे को बुलाते हुए पृथ्वी पर भटकेंगे।
श्लोक 88 (3.193.88)
भोवादिनस्तथा शूद्रा ब्राह्मणाः प्राकृतप्रियाः । पाषण्डजनसंकीर्णा भविष्यन्ति युगक्षये ॥
bhovādinastathā śūdrā brāhmaṇāḥ prākṛtapriyāḥ | pāṣaṇḍajanasaṃkīrṇā bhaviṣyanti yugakṣaye
युग के क्षय में शूद्र ब्राह्मणों को 'भो' कहकर सम्बोधित करेंगे, ब्राह्मण गँवारू आचरण पसन्द करेंगे, और सब ओर पाखण्डी लोग भर जाएँगे।
श्लोक 89 (3.193.89)
ततस्तुमुलसंघाते वर्तमाने युगक्षये । द्विजातिपूर्वको लोकः क्रमेण प्रभविष्यति ॥
tatastumulasaṃghāte vartamāne yugakṣaye | dvijātipūrvako lokaḥ krameṇa prabhaviṣyati
तब युग-क्षय के उस भयंकर संघर्ष के बीच संसार द्विजों से आरम्भ करके धीरे-धीरे फिर उन्नत होगा।
श्लोक 90 (3.193.90)
ततः कालान्तरेऽन्यस्मिन्पुनर्लोकविवृद्धये । भविष्यति पुनर्दैवमनुकूलं यदृच्छया ॥
tataḥ kālāntare'nyasminpunarlokavivṛddhaye | bhaviṣyati punardaivamanukūlaṃ yadṛcchayā
फिर किसी अन्य समय, संसार की पुनः वृद्धि के लिए, दैव अपने-आप फिर अनुकूल हो जाएगा।
श्लोक 91 (3.193.91)
यदा सूर्यश्च चन्द्रश्च तथा तिष्यबृहस्पती । एकराशौ समेष्यन्ति प्रपत्स्यति तदा कृतम् ॥
yadā sūryaśca candraśca tathā tiṣyabṛhaspatī | ekarāśau sameṣyanti prapatsyati tadā kṛtam
जब सूर्य, चन्द्रमा, तिष्य (पुष्य नक्षत्र) और बृहस्पति एक राशि में एकत्र होंगे, तब कृतयुग का आरम्भ होगा।
श्लोक 92 (3.193.92)
कालवर्षी च पर्जन्यो नक्षत्राणि शुभानि च । प्रदक्षिणा ग्रहाश्चापि भविष्यन्त्यनुलोमगाः । क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निरामयम् ॥
kālavarṣī ca parjanyo nakṣatrāṇi śubhāni ca | pradakṣiṇā grahāścāpi bhaviṣyantyanulomagāḥ | kṣemaṃ subhikṣamārogyaṃ bhaviṣyati nirāmayam
मेघ समय पर बरसेगा, नक्षत्र शुभ होंगे, और ग्रह दक्षिणावर्त होकर अनुकूल गति से चलेंगे; सब ओर कुशल, सुभिक्ष, आरोग्य और निरामयता होगी।
श्लोक 93 (3.193.93)
कल्की विष्णुयशा नाम द्विजः कालप्रचोदितः । उत्पत्स्यते महावीर्यो महाबुद्धिपराक्रमः ॥
kalkī viṣṇuyaśā nāma dvijaḥ kālapracoditaḥ | utpatsyate mahāvīryo mahābuddhiparākramaḥ
काल से प्रेरित होकर कल्कि विष्णुयशा नाम का एक ब्राह्मण उत्पन्न होगा, जो महान पराक्रमी, महाबुद्धिमान और महाबली होगा।
श्लोक 94 (3.193.94)
संभूतः संभलग्रामे ब्राह्मणावसथे शुभे । महात्मा वृत्तसंपन्नः प्रजानां हितकृन्नृप ॥
saṃbhūtaḥ saṃbhalagrāme brāhmaṇāvasathe śubhe | mahātmā vṛttasaṃpannaḥ prajānāṃ hitakṛnnṛpa
हे राजन्, वह सम्भल ग्राम में एक शुभ ब्राह्मण-घर में जन्म लेगा; वह महात्मा, सदाचार से सम्पन्न और प्रजा का हित करने वाला होगा।
श्लोक 95 (3.193.95)
मनसा तस्य सर्वाणि वाहनान्यायुधानि च । उपस्थास्यन्ति योधाश्च शस्त्राणि कवचानि च ॥
manasā tasya sarvāṇi vāhanānyāyudhāni ca | upasthāsyanti yodhāśca śastrāṇi kavacāni ca
वाहन, आयुध, योद्धा, शस्त्र और कवच सब उसके मन में सोचते ही उसके पास उपस्थित हो जाएँगे।
श्लोक 96 (3.193.96)
स धर्मविजयी राजा चक्रवर्ती भविष्यति । स चेमं संकुलं लोकं प्रसादमुपनेष्यति ॥
sa dharmavijayī rājā cakravartī bhaviṣyati | sa cemaṃ saṃkulaṃ lokaṃ prasādamupaneṣyati
वह धर्म से विजय पाने वाला चक्रवर्ती राजा होगा, और इस अशान्त संसार को शान्ति प्रदान करेगा।
श्लोक 97 (3.193.97)
उत्थितो ब्राह्मणो दीप्तः क्षयान्तकृदुदारधीः । संक्षेपको हि सर्वस्य युगस्य परिवर्तकः ॥
utthito brāhmaṇo dīptaḥ kṣayāntakṛdudāradhīḥ | saṃkṣepako hi sarvasya yugasya parivartakaḥ
उठ खड़ा हुआ वह तेजस्वी, उदारबुद्धि ब्राह्मण विनाश का अन्त करने वाला होगा; वही सबका संहार करने वाला और युग को बदलने वाला होगा।
श्लोक 98 (3.193.98)
स सर्वत्र गतान्क्षुद्रान्ब्राह्मणैः परिवारितः । उत्सादयिष्यति तदा सर्वम्लेच्छगणान्द्विजः ॥
sa sarvatra gatānkṣudrānbrāhmaṇaiḥ parivāritaḥ | utsādayiṣyati tadā sarvamlecchagaṇāndvijaḥ
ब्राह्मणों से घिरा हुआ वह द्विज तब सब ओर फैले हुए नीच लोगों का, म्लेच्छों के सारे समूहों का उन्मूलन कर देगा।"