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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 194

कृतयुग का पुनरागमन और युधिष्ठिर को मार्कण्डेय का उपदेश

मार्कण्डेय अपनी भविष्यवाणी पूरी करते हैं: कल्कि लुटेरों का नाश करके अश्वमेध यज्ञ में पृथ्वी ब्राह्मणों को दे देंगे, धर्म की मर्यादाएँ स्थापित करेंगे और दुष्टों का वध करते हुए पृथ्वी पर विचरेंगे, और फिर यज्ञों, भरपूर अन्न और अपने-अपने कर्तव्य में लगे सब वर्णों के साथ कृतयुग लौट आएगा। वायु द्वारा कहे गए पुराण के आधार पर युगों का वर्णन समाप्त करके वे युधिष्ठिर को उपदेश देते हैं कि वे धर्म पर दृढ़ रहें, कभी ब्राह्मण का अपमान न करें, प्रजा की अपनी सन्तान की तरह रक्षा करें और काल की गति से व्यथित न हों। युधिष्ठिर उनकी आज्ञा मानने का वचन देते हैं, और पाण्डव, श्रीकृष्ण तथा वहाँ उपस्थित ब्राह्मण उस प्राचीन कथा को सुनकर हर्षित और विस्मित होते हैं।

अध्याय 193अध्याय-सूचीअध्याय 195

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.194.1)

ततश्चोरक्षयं कृत्वा द्विजेभ्यः पृथिवीमिमाम् । वाजिमेधे महायज्ञे विधिवत्कल्पयिष्यति ॥

tataścorakṣayaṃ kṛtvā dvijebhyaḥ pṛthivīmimām | vājimedhe mahāyajñe vidhivatkalpayiṣyati

"तब चोरों का नाश करके वह महान अश्वमेध यज्ञ में विधिपूर्वक यह पृथ्वी ब्राह्मणों को दान कर देगा।

श्लोक 2 (3.194.2)

स्थापयित्वा च मर्यादाः स्वयंभुविहिताः शुभाः । पुनः पुण्ययशःकर्म जरया संश्रयिष्यति ॥

sthāpayitvā ca maryādāḥ svayaṃbhuvihitāḥ śubhāḥ | punaḥ puṇyayaśaḥkarma jarayā saṃśrayiṣyati

स्वयम्भू ब्रह्मा द्वारा निर्धारित शुभ मर्यादाओं को स्थापित करके, वृद्धावस्था आने पर वह फिर से पवित्र और यशस्वी कर्मों का आश्रय लेगा।

श्लोक 3 (3.194.3)

तच्छीलमनुवर्त्स्यन्ति मनुष्या लोकवासिनः । विप्रैश्चोरक्षये चैव कृते क्षेमं भविष्यति ॥

tacchīlamanuvartsyanti manuṣyā lokavāsinaḥ | vipraiścorakṣaye caiva kṛte kṣemaṃ bhaviṣyati

संसार में रहने वाले मनुष्य उसके आचरण का अनुसरण करेंगे, और ब्राह्मणों द्वारा चोरों का नाश हो जाने पर कृतयुग में सब ओर कुशल-क्षेम होगा।

श्लोक 4 (3.194.4)

कृष्णाजिनानि शक्तीश्च त्रिशूलान्यायुधानि च । स्थापयन्द्विजशार्दूलो देशेषु विजितेषु च ॥

kṛṣṇājināni śaktīśca triśūlānyāyudhāni ca | sthāpayandvijaśārdūlo deśeṣu vijiteṣu ca

वह द्विजश्रेष्ठ जीते हुए देशों में काले मृगचर्म, शक्तियाँ, त्रिशूल और अन्य आयुध स्थापित करेगा।

श्लोक 5 (3.194.5)

संस्तूयमानो विप्रेन्द्रैर्मानयानो द्विजोत्तमान् । कल्की चरिष्यति महीं सदा दस्युवधे रतः ॥

saṃstūyamāno viprendrairmānayāno dvijottamān | kalkī cariṣyati mahīṃ sadā dasyuvadhe rataḥ

श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा स्तुति पाते हुए और उत्तम द्विजों का सम्मान करते हुए कल्कि सदा लुटेरों के वध में तत्पर रहकर पृथ्वी पर विचरण करेंगे।

श्लोक 6 (3.194.6)

हा मातस्तात पुत्रेति तास्ता वाचः सुदारुणाः । विक्रोशमानान्सुभृशं दस्यून्नेष्यति संक्षयम् ॥

hā mātastāta putreti tāstā vācaḥ sudāruṇāḥ | vikrośamānānsubhṛśaṃ dasyūnneṣyati saṃkṣayam

'हा माता! हा पिता! हा पुत्र!' ऐसी अत्यन्त दारुण पुकारें करते हुए बिलखते लुटेरों का वह संहार कर देगा।

श्लोक 7 (3.194.7)

ततोऽधर्मविनाशो वै धर्मवृद्धिश्च भारत । भविष्यति कृते प्राप्ते क्रियावांश्च जनस्तथा ॥

tato'dharmavināśo vai dharmavṛddhiśca bhārata | bhaviṣyati kṛte prāpte kriyāvāṃśca janastathā

हे भारत, तब कृतयुग आने पर अधर्म का नाश होगा और धर्म की वृद्धि होगी, और लोग सत्कर्मों में लगे रहेंगे।

श्लोक 8 (3.194.8)

आरामाश्चैव चैत्याश्च तटाकावसथास्तथा । पुष्करिण्यश्च विविधा देवतायतनानि च ॥

ārāmāścaiva caityāśca taṭākāvasathāstathā | puṣkariṇyaśca vividhā devatāyatanāni ca

बाग-बगीचे और चैत्य, तालाब और धर्मशालाएँ, अनेक प्रकार की पुष्करिणियाँ और देवमन्दिर

श्लोक 9 (3.194.9)

यज्ञक्रियाश्च विविधा भविष्यन्ति कृते युगे । ब्राह्मणाः साधवश्चैव मुनयश्च तपस्विनः ॥

yajñakriyāśca vividhā bhaviṣyanti kṛte yuge | brāhmaṇāḥ sādhavaścaiva munayaśca tapasvinaḥ

तथा अनेक प्रकार के यज्ञ कृतयुग में होंगे। ब्राह्मण सदाचारी होंगे और मुनि तपस्वी;

श्लोक 10 (3.194.10)

आश्रमा हतपाषण्डाः स्थिताः सत्ये जनास्तदा । जायन्ति सर्वभूतानि शुध्यमानानि चैव हि ॥

āśramā hatapāṣaṇḍāḥ sthitāḥ satye janāstadā | jāyanti sarvabhūtāni śudhyamānāni caiva hi

आश्रम पाखण्डियों से मुक्त होंगे और तब लोग सत्य में स्थित रहेंगे। सब प्राणी शुद्ध होकर जन्म लेंगे।

श्लोक 11 (3.194.11)

सर्वेष्वृतुषु राजेन्द्र सर्वं सस्यं भविष्यति । नरा दानेषु निरता व्रतेषु नियमेषु च ॥

sarveṣvṛtuṣu rājendra sarvaṃ sasyaṃ bhaviṣyati | narā dāneṣu niratā vrateṣu niyameṣu ca

हे राजेन्द्र, सभी ऋतुओं में सब प्रकार के अन्न उपजेंगे। मनुष्य दान, व्रत और नियमों में लगे रहेंगे;

श्लोक 12 (3.194.12)

जपयज्ञपरा विप्रा धर्मकामा मुदा युताः । पालयिष्यन्ति राजानो धर्मेणेमां वसुंधराम् ॥

japayajñaparā viprā dharmakāmā mudā yutāḥ | pālayiṣyanti rājāno dharmeṇemāṃ vasuṃdharām

ब्राह्मण जप और यज्ञ में तत्पर, धर्म की कामना वाले और आनन्द से युक्त होंगे, और राजा धर्म से इस पृथ्वी का पालन करेंगे।

श्लोक 13 (3.194.13)

व्यवहाररता वैश्या भविष्यन्ति कृते युगे । षट्कर्मनिरता विप्राः क्षत्रिया रक्षणे रताः ॥

vyavahāraratā vaiśyā bhaviṣyanti kṛte yuge | ṣaṭkarmaniratā viprāḥ kṣatriyā rakṣaṇe ratāḥ

कृतयुग में वैश्य व्यापार में लगे रहेंगे, ब्राह्मण अपने छह कर्मों में और क्षत्रिय रक्षा में,

श्लोक 14 (3.194.14)

शुश्रूषायां रताः शूद्रास्तथा वर्णत्रयस्य च । एष धर्मः कृतयुगे त्रेतायां द्वापरे तथा ॥

śuśrūṣāyāṃ ratāḥ śūdrāstathā varṇatrayasya ca | eṣa dharmaḥ kṛtayuge tretāyāṃ dvāpare tathā

और शूद्र तीनों वर्णों की सेवा में। यह कृतयुग का धर्म है, और त्रेता तथा द्वापर का भी,

श्लोक 15 (3.194.15)

पश्चिमे युगकाले च यः स ते संप्रकीर्तितः । सर्वलोकस्य विदिता युगसंख्या च पाण्डव ॥

paścime yugakāle ca yaḥ sa te saṃprakīrtitaḥ | sarvalokasya viditā yugasaṃkhyā ca pāṇḍava

और अन्तिम युग का भी, जैसा मैंने तुम्हें बताया है। हे पाण्डुनन्दन, सारे संसार को ज्ञात युगों की गणना,

श्लोक 16 (3.194.16)

एतत्ते सर्वमाख्यातमतीतानागतं मया । वायुप्रोक्तमनुस्मृत्य पुराणमृषिसंस्तुतम् ॥

etatte sarvamākhyātamatītānāgataṃ mayā | vāyuproktamanusmṛtya purāṇamṛṣisaṃstutam

भूत और भविष्य की ये सब बातें मैंने वायु द्वारा कहे गए और ऋषियों द्वारा प्रशंसित पुराण का स्मरण करके तुम्हें बता दी हैं।

श्लोक 17 (3.194.17)

एवं संसारमार्गा मे बहुशश्चिरजीविनः । दृष्टाश्चैवानुभूताश्च किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

evaṃ saṃsāramārgā me bahuśaścirajīvinaḥ | dṛṣṭāścaivānubhūtāśca kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi

इस प्रकार मुझ चिरजीवी ने संसार के मार्गों को अनेक बार देखा और अनुभव किया है। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?

श्लोक 18 (3.194.18)

इदं चैवापरं भूयः सह भ्रातृभिरच्युत । धर्मसंशयमोक्षार्थं निबोध वचनं मम ॥

idaṃ caivāparaṃ bhūyaḥ saha bhrātṛbhiracyuta | dharmasaṃśayamokṣārthaṃ nibodha vacanaṃ mama

हे अच्युत, अब अपने भाइयों के साथ धर्म-सम्बन्धी संशय से छूटने के लिए मेरा एक और वचन सुनो।

श्लोक 19 (3.194.19)

न तेऽन्यथाऽत्र विज्ञेयो धर्मो धर्मभृतांवर । धर्मात्मा हि सुखं राजन्प्रेत्य चेह च नन्दति ॥

na te'nyathā'tra vijñeyo dharmo dharmabhṛtāṃvara | dharmātmā hi sukhaṃ rājanpretya ceha ca nandati

हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, इस विषय में धर्म को अन्यथा मत समझना; क्योंकि हे राजन्, धर्मात्मा इस लोक में और मरने के बाद भी सुखपूर्वक आनन्द पाता है।

श्लोक 20 (3.194.20)

न ब्राह्मणे परिभवः कर्तव्यस्ते कदाचन । ब्राह्मणः कुपितो हन्यादपि लोकान्प्रतिज्ञया ॥

na brāhmaṇe paribhavaḥ kartavyaste kadācana | brāhmaṇaḥ kupito hanyādapi lokānpratijñayā

किसी ब्राह्मण का कभी तिरस्कार मत करना; क्योंकि क्रोधित ब्राह्मण अपनी प्रतिज्ञा से लोकों तक का नाश कर सकता है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (3.194.21)

मार्कण्डेयवचः श्रुत्वा कुरूणां प्रवरो नृपः । उवाच वचनं धीमान्परमं परमद्युतिः ॥

mārkaṇḍeyavacaḥ śrutvā kurūṇāṃ pravaro nṛpaḥ | uvāca vacanaṃ dhīmānparamaṃ paramadyutiḥ

मार्कण्डेय के वचन सुनकर कुरुओं में श्रेष्ठ, परम तेजस्वी और बुद्धिमान राजा ने यह उत्तम वचन कहा:

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 22 (3.194.22)

एतच्छ्रुत्वा मया किं स्यात्कर्तव्यं मुनिसत्तम । कथं चायं जितो लोको रक्षितव्यो भविष्यति ॥

etacchrutvā mayā kiṃ syātkartavyaṃ munisattama | kathaṃ cāyaṃ jito loko rakṣitavyo bhaviṣyati

"हे मुनिश्रेष्ठ, यह सुनकर मुझे क्या करना चाहिए? और मेरे द्वारा जीते गए इस लोक की रक्षा कैसे होगी?

श्लोक 23 (3.194.23)

कस्मिन्धर्मे मया स्थेयं प्रजाः संरक्षता मुने । कथं च वर्तमानो वै न च्यवेयं स्वधर्मतः ॥

kasmindharme mayā stheyaṃ prajāḥ saṃrakṣatā mune | kathaṃ ca vartamāno vai na cyaveyaṃ svadharmataḥ

हे मुने, प्रजा की रक्षा करते हुए मुझे किस धर्म में स्थित रहना चाहिए? और किस प्रकार आचरण करूँ कि अपने धर्म से च्युत न होऊँ?"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 24 (3.194.24)

दयावान्सर्वभूतेषु हितो रक्तोऽनसूयकः । अपत्यानामिव स्नेहात्प्रजानां रक्षणे रतः ॥

dayāvānsarvabhūteṣu hito rakto'nasūyakaḥ | apatyānāmiva snehātprajānāṃ rakṣaṇe rataḥ

"सब प्राणियों पर दया करने वाले, हितैषी, स्नेही और ईर्ष्या से रहित होकर, अपनी सन्तान की भाँति स्नेह से प्रजा की रक्षा में लगे रहो।

श्लोक 25 (3.194.25)

चर धर्मं त्यजाधर्मं पितॄन्पूर्वाननुस्मर । प्रमादाद्यत्कृतं तेऽभूत्सम्यग्ज्ञानेन तज्जय ॥

cara dharmaṃ tyajādharmaṃ pitṝnpūrvānanusmara | pramādādyatkṛtaṃ te'bhūtsamyagjñānena tajjaya

धर्म का आचरण करो, अधर्म को त्यागो, और अपने पूर्वज पितरों का स्मरण करो। प्रमादवश तुमसे जो कुछ हुआ हो, उसे सम्यक् ज्ञान से जीत लो।

श्लोक 26 (3.194.26)

अलं ते मानमाश्रित्य सततं प्रियवाग्भव । विजित्य पृथिवीं सर्वां मोदमानः सुखी भव ॥

alaṃ te mānamāśritya satataṃ priyavāgbhava | vijitya pṛthivīṃ sarvāṃ modamānaḥ sukhī bhava

अभिमान का सहारा लेना छोड़ दो; सदा प्रिय वाणी बोलो। समस्त पृथ्वी को जीतकर आनन्दपूर्वक सुखी रहो।

श्लोक 27 (3.194.27)

एष भूतो भविष्यश्च धर्मस्ते समुदीरितः । न तेऽस्त्यविदितं किंचिदतीतानागतं भुवि ॥

eṣa bhūto bhaviṣyaśca dharmaste samudīritaḥ | na te'styaviditaṃ kiṃcidatītānāgataṃ bhuvi

यह भूत और भविष्य का धर्म मैंने तुमसे कहा है। पृथ्वी पर बीता हुआ या आने वाला ऐसा कुछ नहीं है जो तुम्हें ज्ञात न हो।

श्लोक 28 (3.194.28)

तस्मादिमं परिक्लेशं त्वं तात हृदि मा कृथाः । प्राज्ञास्तात न मुह्यन्ति कालेनापि प्रपीडिताः ॥

tasmādimaṃ parikleśaṃ tvaṃ tāta hṛdi mā kṛthāḥ | prājñāstāta na muhyanti kālenāpi prapīḍitāḥ

इसलिए हे तात, इस क्लेश को मन में मत रखो। हे तात, बुद्धिमान लोग काल से पीड़ित होने पर भी मोहित नहीं होते।

श्लोक 29 (3.194.29)

एष कालो महाबाहो अपि सर्वदिवौकसाम् । मुह्यन्ति हि प्रजास्तात कालेनापि प्रचोदिताः ॥

eṣa kālo mahābāho api sarvadivaukasām | muhyanti hi prajāstāta kālenāpi pracoditāḥ

हे महाबाहो, यह काल सभी स्वर्गवासियों के लिए भी है; हे तात, काल से प्रेरित होकर सारी प्रजा मोहित हो जाती है।

श्लोक 30 (3.194.30)

मा च तेऽत्र विशङ्का भूद्यन्मयोक्तं तवानघ । अतिशङ्क्य वचो ह्येतद्धर्मलोपो भवेत्तव ॥

mā ca te'tra viśaṅkā bhūdyanmayoktaṃ tavānagha | atiśaṅkya vaco hyetaddharmalopo bhavettava

हे निष्पाप, मैंने तुमसे जो कहा है, उसके विषय में तुम्हारे मन में शंका न हो; इन वचनों पर अविश्वास करने से तुम्हारे धर्म की हानि होगी।

श्लोक 31 (3.194.31)

जातोसि प्रथिते वंशे कुरूणां भरतर्षभ । कर्मणा मनसा वाचा सर्वमेतत्समाचर ॥

jātosi prathite vaṃśe kurūṇāṃ bharatarṣabha | karmaṇā manasā vācā sarvametatsamācara

हे भरतश्रेष्ठ, तुम कुरुओं के प्रसिद्ध वंश में जन्मे हो; कर्म, मन और वाणी से इन सबका पालन करो।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 32 (3.194.32)

यत्त्वयोक्तं द्विजश्रेष्ठ वाक्यं श्रुतिमनोहरम् । तथा करिष्ये यत्नेन भवतः शासनं विभो ॥

yattvayoktaṃ dvijaśreṣṭha vākyaṃ śrutimanoharam | tathā kariṣye yatnena bhavataḥ śāsanaṃ vibho

"हे द्विजश्रेष्ठ, आपने जो कानों को प्रिय लगने वाला वचन कहा है, हे प्रभो, आपकी उस आज्ञा का मैं यत्नपूर्वक पालन करूँगा।

श्लोक 33 (3.194.33)

न मे लोभोस्ति विप्रेन्द्र न भयं न च मत्सरः । करिष्यामि हि तत्सर्वमुक्तं यत्ते मयि प्रभो ॥

na me lobhosti viprendra na bhayaṃ na ca matsaraḥ | kariṣyāmi hi tatsarvamuktaṃ yatte mayi prabho

हे विप्रवर, मुझमें न लोभ है, न भय, न ईर्ष्या; हे प्रभो, आपने मुझसे जो कुछ कहा है, वह सब मैं करूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 34 (3.194.34)

श्रुत्वा तु वचनं तस्य पाण्डवस्य यशस्विनः । संहृष्टाः पाण्डवा राजन्सहिताः शार्ङ्गधन्वना ॥

śrutvā tu vacanaṃ tasya pāṇḍavasya yaśasvinaḥ | saṃhṛṣṭāḥ pāṇḍavā rājansahitāḥ śārṅgadhanvanā

हे राजन्, यशस्वी पाण्डुपुत्र के वचन सुनकर शार्ङ्गधनुषधारी श्रीकृष्ण के साथ सब पाण्डव हर्षित हुए,

श्लोक 35 (3.194.35)

विप्रर्षभाश्च ते सर्वे ये तत्रासन्समागताः । तथा कथां शुभां श्रुत्वा मार्कण्डेयस्य धीमतः । विस्मिताः समपद्यन्त पुराणस्य निवेदनात् ॥

viprarṣabhāśca te sarve ye tatrāsansamāgatāḥ | tathā kathāṃ śubhāṃ śrutvā mārkaṇḍeyasya dhīmataḥ | vismitāḥ samapadyanta purāṇasya nivedanāt

और वहाँ एकत्र हुए सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण भी। बुद्धिमान मार्कण्डेय की वह शुभ कथा सुनकर वे उस पुराण-कथन से विस्मित हो उठे।

अध्याय 193अध्याय-सूचीअध्याय 195