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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 195

परिक्षित् और मण्डूक-कन्या; वामदेव के अश्व

युधिष्ठिर के ब्राह्मणों की महिमा और सुनाने का अनुरोध करने पर मार्कण्डेय बताते हैं कि अयोध्या के राजा परिक्षित् ने एक मण्डूक-कन्या को इस शर्त पर पाया कि उसे कभी जल न दिखाया जाए; बावड़ी में वह खो गई, और उसके पिता मण्डूकराज आयु से राजा का मेल हुआ, जिसने पुत्री को शाप दिया कि उसकी सन्तानें ब्राह्मणों से विमुख होंगी। उसका पुत्र शल शिकार के लिए ऋषि वामदेव के वेगवान घोड़े माँगकर लौटाने से मुकर जाता है और ऋषि द्वारा उत्पन्न राक्षसों के हाथों मारा जाता है। उसका भाई दल भी घोड़े नहीं लौटाता और वामदेव पर बाण चलाना चाहता है, पर बाण उसी के पुत्र को मार देता है और फिर उसके हाथ जकड़ जाते हैं; रानी की विनती से वह मुक्त होता है और घोड़े लौटा दिए जाते हैं।

अध्याय 194अध्याय-सूचीअध्याय 196

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.195.1)

भूय एव ब्राह्मणमहाभाग्यं वक्तुमर्हसीत्यब्रवीत्पाण्डवेयो मार्कण्डेयम् ॥

bhūya eva brāhmaṇamahābhāgyaṃ vaktumarhasītyabravītpāṇḍaveyo mārkaṇḍeyam

पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय से कहा — "ब्राह्मणों की महिमा आप और भी सुनाइए।"

श्लोक 2 (3.195.2)

अथाचष्ट मार्कण्डेयः ॥

athācaṣṭa mārkaṇḍeyaḥ

तब मार्कण्डेय ने यह कथा सुनाई।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 3 (3.195.3)

अयोध्यायामिक्ष्वाकुकुलोत्पन्नः पार्थिवः परिक्षिन्नाम मृगयामगमत् ॥

ayodhyāyāmikṣvākukulotpannaḥ pārthivaḥ parikṣinnāma mṛgayāmagamat

अयोध्या में इक्ष्वाकु-कुल में उत्पन्न परिक्षित् नाम के एक राजा थे। एक बार वे शिकार खेलने गए।

श्लोक 4 (3.195.4)

तमेकाश्वेन मृगमनुसरन्तं मृगो दूरमपाहरत् ॥

tamekāśvena mṛgamanusarantaṃ mṛgo dūramapāharat

वे अकेले एक घोड़े पर एक हिरन का पीछा कर रहे थे, और वह हिरन उन्हें बहुत दूर ले गया।

श्लोक 5 (3.195.5)

अथाध्वनि जातश्रमः क्षुत्तृष्णाभिभूतश्च कस्मिंश्चिदुद्देशे नीलं वनषण्डमपश्यत् । तच्च विवेश ॥

athādhvani jātaśramaḥ kṣuttṛṣṇābhibhūtaśca kasmiṃściduddeśe nīlaṃ vanaṣaṇḍamapaśyat | tacca viveśa

मार्ग में थके और भूख-प्यास से व्याकुल राजा ने एक स्थान पर घने, साँवले वृक्षों का एक कुंज देखा और उसमें चले गए।

श्लोक 6 (3.195.6)

ततस्तस्य वनषण्डस्य मध्येऽतीव रमणीयं सरो दृष्ट्वा साश्व एव व्यगाहत ॥

tatastasya vanaṣaṇḍasya madhye'tīva ramaṇīyaṃ saro dṛṣṭvā sāśva eva vyagāhata

उस कुंज के बीच एक अत्यन्त रमणीय सरोवर देखकर वे घोड़े सहित ही उसमें उतर गए।

श्लोक 7 (3.195.7)

अथाश्वस्तः स बिसमृणालमश्वस्याग्रे निक्षिप्य पुष्करिणीतीरे समाविशत् ॥

athāśvastaḥ sa bisamṛṇālamaśvasyāgre nikṣipya puṣkariṇītīre samāviśat

थकान मिटने पर उन्होंने कमल-नाल और मृणाल घोड़े के आगे डाल दिए और स्वयं उस कमल-सरोवर के तट पर बैठ गए।

श्लोक 8 (3.195.8)

ततः शयानो मधुरं गीतशब्दमशृणोत् ॥

tataḥ śayāno madhuraṃ gītaśabdamaśṛṇot

फिर लेटे-लेटे उन्होंने मधुर गीत का स्वर सुना।

श्लोक 9 (3.195.9)

स श्रुत्वाचिन्तयत् । नेह मनुष्यगतिं पश्यामि । कस्य खल्वयं गीतशब्द इति ॥

sa śrutvācintayat | neha manuṣyagatiṃ paśyāmi | kasya khalvayaṃ gītaśabda iti

उसे सुनकर उन्होंने सोचा — "यहाँ मनुष्यों का आना-जाना तो दिखाई नहीं देता। फिर यह गीत किसका है?"

श्लोक 10 (3.195.10)

अथापश्यत्कन्यां परमरूपदर्शनीयां पुष्पाण्यवचिन्वतीं गायन्तीं च ॥

athāpaśyatkanyāṃ paramarūpadarśanīyāṃ puṣpāṇyavacinvatīṃ gāyantīṃ ca

तब उन्होंने परम सुन्दर रूप वाली एक कन्या को देखा, जो फूल चुन रही थी और गा रही थी।

श्लोक 11 (3.195.11)

अथ सा राज्ञः समीपे पर्यक्रामत् ॥

atha sā rājñaḥ samīpe paryakrāmat

घूमती हुई वह राजा के समीप आ पहुँची।

श्लोक 12 (3.195.12)

तामब्रवीद्राजा । कस्यासि सुभगे त्वमिति ॥

tāmabravīdrājā | kasyāsi subhage tvamiti

राजा ने उससे पूछा — "हे सुभगे, तुम किसकी हो?"

श्लोक 13 (3.195.13)

सा प्रत्युवाच । कन्यास्मीति ॥

sā pratyuvāca | kanyāsmīti

उसने उत्तर दिया — "मैं कुमारी हूँ।"

श्लोक 14 (3.195.14)

तां राजोवाच । अर्थी त्वयाहमिति ॥

tāṃ rājovāca | arthī tvayāhamiti

राजा ने उससे कहा — "मैं तुम्हें चाहता हूँ।"

श्लोक 15 (3.195.15)

अथोवाच कन्या । समयेनाहं शक्या त्वया लब्धुम् । नान्यथेति ॥

athovāca kanyā | samayenāhaṃ śakyā tvayā labdhum | nānyatheti

तब कन्या बोली — "एक शर्त पर तुम मुझे पा सकते हो, अन्यथा नहीं।"

श्लोक 16 (3.195.16)

तां राजा समयमपृच्छत् ॥

tāṃ rājā samayamapṛcchat

राजा ने उससे वह शर्त पूछी।

श्लोक 17 (3.195.17)

ततः कन्येदमुवाच । उदकं मे न दर्शयितव्यमिति ॥

tataḥ kanyedamuvāca | udakaṃ me na darśayitavyamiti

तब कन्या ने कहा — "मुझे कभी जल न दिखाया जाए।"

श्लोक 18 (3.195.18)

स राजा बाढमित्युक्त्वा तां समागम्य तया सहास्ते ॥

sa rājā bāḍhamityuktvā tāṃ samāgamya tayā sahāste

राजा ने "ठीक है" कहकर उससे समागम किया और उसके साथ वहीं रहने लगे।

श्लोक 19 (3.195.19)

तत्रैवासीने राजनि सेनान्वगच्छत् । पदेनानुपदं दृष्ट्वा राजानं परिवार्यातिष्ठत् ॥

tatraivāsīne rājani senānvagacchat | padenānupadaṃ dṛṣṭvā rājānaṃ parivāryātiṣṭhat

राजा वहाँ बैठे ही थे कि उनकी सेना पीछे-पीछे आ पहुँची और पदचिह्नों के सहारे उन्हें खोजकर उन्हें घेरकर खड़ी हो गई।

श्लोक 20 (3.195.20)

पर्याश्वस्तश्च राजा तयैव सह शिबिकया प्रायादविघाटितया । स्वनगरमनुप्राप्य रहसि तया सह रमन्नास्ते । नान्यत्किञ्चनापश्यत् ॥

paryāśvastaśca rājā tayaiva saha śibikayā prāyādavighāṭitayā | svanagaramanuprāpya rahasi tayā saha ramannāste | nānyatkiñcanāpaśyat

भली-भाँति विश्राम करके राजा उसी के साथ बन्द पालकी में चल पड़े। अपने नगर पहुँचकर वे एकान्त में उसके साथ रमण करते रहे और किसी दूसरी बात की ओर उनका ध्यान ही नहीं गया।

श्लोक 21 (3.195.21)

अथ प्रधानामात्यस्तस्याभ्याशचराः स्त्रियोऽपृच्छत् । किमत्र प्रयोजनं वर्तत इति ॥

atha pradhānāmātyastasyābhyāśacarāḥ striyo'pṛcchat | kimatra prayojanaṃ vartata iti

तब प्रधान मन्त्री ने राजा के पास रहने वाली स्त्रियों से पूछा — "यहाँ क्या बात है?"

श्लोक 22 (3.195.22)

अथाब्रुवंस्ताः स्त्रियः । अपूर्वमिव पश्याम उदकं नात्र नीयतेति ॥

athābruvaṃstāḥ striyaḥ | apūrvamiva paśyāma udakaṃ nātra nīyateti

वे स्त्रियाँ बोलीं — "हम एक अनोखी बात देखती हैं — यहाँ जल नहीं लाया जाता।"

श्लोक 23 (3.195.23)

अथामात्योऽनुदकं वनं कारयित्वोदारवृक्षं बहुमूलपुष्पफलं रहस्युपगम्य राजानमब्रवीत् । वनमिदमुदारमनुदकम् । साध्वत्र रम्यतामिति ॥

athāmātyo'nudakaṃ vanaṃ kārayitvodāravṛkṣaṃ bahumūlapuṣpaphalaṃ rahasyupagamya rājānamabravīt | vanamidamudāramanudakam | sādhvatra ramyatāmiti

तब मन्त्री ने एक जलरहित उपवन बनवाया, जिसमें सुन्दर बड़े वृक्ष और बहुत-से कन्द, फूल और फल थे, और एकान्त में राजा के पास जाकर कहा — "यह सुन्दर उपवन जलरहित है। आप यहाँ आनन्द से विहार करें।"

श्लोक 24 (3.195.24)

स तस्य वचनात्तयैव सह देव्या तद्वनं प्राविशत् । स कदाचित्तस्मिन्वने रम्ये तयैव सह व्यवहरत् । अथ क्षुत्तृष्णार्दितः श्रान्तोऽतिमात्रमतिमुक्तागारमपश्यत् ॥

sa tasya vacanāttayaiva saha devyā tadvanaṃ prāviśat | sa kadācittasminvane ramye tayaiva saha vyavaharat | atha kṣuttṛṣṇārditaḥ śrānto'timātramatimuktāgāramapaśyat

उसकी बात मानकर राजा उसी रानी के साथ उस उपवन में गए। एक दिन उस रमणीय उपवन में उसके साथ घूमते हुए वे भूख-प्यास से पीड़ित और बहुत थक गए, और उन्हें अतिमुक्त लताओं का एक कुंज दिखाई दिया।

श्लोक 25 (3.195.25)

तत्प्रविश्य राजा सह प्रियया सुधातलसुकृतां विमलसलिलपूर्णां वापीमपश्यत् ॥

tatpraviśya rājā saha priyayā sudhātalasukṛtāṃ vimalasalilapūrṇāṃ vāpīmapaśyat

प्रिया के साथ उसमें प्रवेश करके राजा ने चूने से पक्के बने तल वाली, निर्मल जल से भरी एक बावड़ी देखी।

श्लोक 26 (3.195.26)

दृष्ट्वैव च तां तस्या एव तीरे सहैव तया देव्या व्यतिष्ठत् ॥

dṛṣṭvaiva ca tāṃ tasyā eva tīre sahaiva tayā devyā vyatiṣṭhat

उसे देखते ही वे रानी के साथ उसी के तट पर ठहर गए।

श्लोक 27 (3.195.27)

अथ तां देवीं स राजाब्रवीत् । साध्ववतर वापीसलिलमिति ॥

atha tāṃ devīṃ sa rājābravīt | sādhvavatara vāpīsalilamiti

तब राजा ने रानी से कहा — "बावड़ी के जल में उतर जाओ, अच्छा लगेगा।"

श्लोक 28 (3.195.28)

सा तद्वचः श्रुत्वावतीर्य वापीं न्यमज्जत् । न पुनरुदमज्जत् ॥

sā tadvacaḥ śrutvāvatīrya vāpīṃ nyamajjat | na punarudamajjat

उनकी बात सुनकर वह बावड़ी में उतरी और डूब गई, फिर ऊपर नहीं आई।

श्लोक 29 (3.195.29)

तां मृगयमाणो राजा नापश्यत् ॥

tāṃ mṛgayamāṇo rājā nāpaśyat

राजा ने उसे ढूँढा, पर वह कहीं दिखाई न दी।

श्लोक 30 (3.195.30)

वापीमपि निःस्राव्य मण्डूकं श्वभ्रमुखे दृष्ट्वा क्रुद्ध आज्ञापयामास । सर्वमण्डूकवधः क्रियतामिति । यो मयार्थी स मृतकैर्मण्डूकैरुपायनैर्मामुपतिष्ठेदिति ॥

vāpīmapi niḥsrāvya maṇḍūkaṃ śvabhramukhe dṛṣṭvā kruddha ājñāpayāmāsa | sarvamaṇḍūkavadhaḥ kriyatāmiti | yo mayārthī sa mṛtakairmaṇḍūkairupāyanairmāmupatiṣṭhediti

बावड़ी का पानी निकलवाकर उन्होंने एक बिल के मुहाने पर एक मेंढक देखा, और क्रोध में आज्ञा दी — "सब मेंढकों का वध किया जाए! जो मुझसे कुछ पाना चाहे, वह मरे हुए मेंढकों की भेंट लेकर मेरे पास आए।"

श्लोक 31 (3.195.31)

अथ मण्डूकवधे घोरे क्रियमाणे दिक्षु सर्वासु मण्डूकान्भयमाविशत् । ते भीता मण्डूकराज्ञे यथावृत्तं न्यवेदयन् ॥

atha maṇḍūkavadhe ghore kriyamāṇe dikṣu sarvāsu maṇḍūkānbhayamāviśat | te bhītā maṇḍūkarājñe yathāvṛttaṃ nyavedayan

जब मेंढकों का भयंकर संहार होने लगा, तो सब दिशाओं में मेंढकों पर भय छा गया, और डरे हुए मेंढकों ने अपने राजा को सारा वृत्तान्त सुनाया।

श्लोक 32 (3.195.32)

ततो मण्डूकराट्तापसवेषधारी राजानमभ्यगच्छत् ॥

tato maṇḍūkarāṭtāpasaveṣadhārī rājānamabhyagacchat

तब मेंढकों का राजा तपस्वी का वेश धारण करके राजा के पास आया।

श्लोक 33 (3.195.33)

उपेत्य चैनमुवाच । मा राजन्क्रोधवशं गमः । प्रसादं कुरु । नार्हसि मण्डूकानामनपराधिनां वधं कर्तुमिति ॥

upetya cainamuvāca | mā rājankrodhavaśaṃ gamaḥ | prasādaṃ kuru | nārhasi maṇḍūkānāmanaparādhināṃ vadhaṃ kartumiti

पास आकर उसने कहा — "राजन्, क्रोध के वश में न होइए। कृपा कीजिए। निरपराध मेंढकों का वध करना आपको शोभा नहीं देता।"

श्लोक 34 (3.195.34)

श्लोकौ चात्र भवतः । मा मण्डूकाञ्जिघांस त्वं कोपं सन्धारयाच्युत । प्रक्षीयते धनोद्रेको जनानामविजानताम् ॥

ślokau cātra bhavataḥ | mā maṇḍūkāñjighāṃsa tvaṃ kopaṃ sandhārayācyuta | prakṣīyate dhanodreko janānāmavijānatām

और इस विषय में दो श्लोक हैं — "मेंढकों को मारने की इच्छा मत करो; हे अच्युत, अपने क्रोध को रोको। जो लोग विवेक से काम नहीं लेते, उनका धन-वैभव क्षीण हो जाता है।

श्लोक 35 (3.195.35)

प्रतिजानीहि नैतांस्त्वं प्राप्य क्रोधं विमोक्ष्यसे । अलं कृत्वा तवाधर्मं मण्डूकैः किं हतैर्हि ते ॥

pratijānīhi naitāṃstvaṃ prāpya krodhaṃ vimokṣyase | alaṃ kṛtvā tavādharmaṃ maṇḍūkaiḥ kiṃ hatairhi te

प्रतिज्ञा करो कि तुम इन्हें नहीं मारोगे; क्रोध आ गया है तो उसे छोड़ दो। यह अधर्म करना बस करो — मेंढकों को मारकर तुम्हें क्या मिलेगा?"

श्लोक 36 (3.195.36)

तमेवंवादिनमिष्टजनशोकपरीतात्मा राजा प्रोवाच । न हि क्षम्यते तन्मया । हनिष्याम्येतान् । एतैर्दुरात्मभिः प्रिया मे भक्षिता । सर्वथैव मे वध्या मण्डूकाः । नार्हसि विद्वन्मामुपरोद्धुमिति ॥

tamevaṃvādinamiṣṭajanaśokaparītātmā rājā provāca | na hi kṣamyate tanmayā | haniṣyāmyetān | etairdurātmabhiḥ priyā me bhakṣitā | sarvathaiva me vadhyā maṇḍūkāḥ | nārhasi vidvanmāmuparoddhumiti

ऐसा कहने वाले से, प्रियजन के शोक से व्याकुल हृदय वाले राजा बोले — "यह मैं क्षमा नहीं कर सकता। मैं इन्हें मारूँगा। इन दुष्टों ने मेरी प्रिया को खा लिया है। मेंढक तो हर हाल में मेरे लिए वध्य हैं। हे विद्वन्, आप मुझे रोकिए मत।"

श्लोक 37 (3.195.37)

स तद्वाक्यमुपलभ्य व्यथितेन्द्रियमनाः प्रोवाच । प्रसीद राजन् । अहमायुर्नाम मण्डूकराजः । मम सा दुहिता सुशोभना नाम । तस्या दौःशील्यमेतत् । बहवो हि राजानस्तया विप्रलब्धपूर्वा इति ॥

sa tadvākyamupalabhya vyathitendriyamanāḥ provāca | prasīda rājan | ahamāyurnāma maṇḍūkarājaḥ | mama sā duhitā suśobhanā nāma | tasyā dauḥśīlyametat | bahavo hi rājānastayā vipralabdhapūrvā iti

यह बात सुनकर व्यथित मन और इन्द्रियों से वह बोला — "राजन्, प्रसन्न होइए। मैं आयु नाम का मेंढकों का राजा हूँ। वह मेरी पुत्री है, उसका नाम सुशोभना है। यह उसी की दुःशीलता है — वह पहले भी बहुत-से राजाओं को छल चुकी है।"

श्लोक 38 (3.195.38)

तमब्रवीद्राजा । तयास्म्यर्थी । सा मे दीयतामिति ॥

tamabravīdrājā | tayāsmyarthī | sā me dīyatāmiti

राजा ने उससे कहा — "मैं उसी को चाहता हूँ। वह मुझे दे दी जाए।"

श्लोक 39 (3.195.39)

अथैनां राज्ञे पितादात् । अब्रवीच्चैनाम् । एनं राजानं शुश्रूषस्वेति ॥

athaināṃ rājñe pitādāt | abravīccainām | enaṃ rājānaṃ śuśrūṣasveti

तब पिता ने उसे राजा को सौंप दिया और उससे कहा — "इस राजा की सेवा करना।"

श्लोक 40 (3.195.40)

स उवाच दुहितरम् । यस्मात्त्वया राजानो विप्रलब्धास्तस्मादब्रह्मण्यानि तवापत्यानि भविष्यन्त्यनृतकत्वात्तवेति ॥

sa uvāca duhitaram | yasmāttvayā rājāno vipralabdhāstasmādabrahmaṇyāni tavāpatyāni bhaviṣyantyanṛtakatvāttaveti

फिर उसने अपनी पुत्री से कहा — "क्योंकि तुमने राजाओं को छला है, इसलिए तुम्हारे असत्य के कारण तुम्हारी सन्तानें ब्राह्मणों से विमुख होंगी।"

श्लोक 41 (3.195.41)

स च राजा तामुपलभ्य तस्यां सुरतगुणनिबद्धहृदयो लोकत्रयैश्वर्यमिवोपलभ्य हर्षबाष्पकलया वाचा प्रणिपत्याभिपूज्य मण्डूकराजानमब्रवीत् । अनुगृहीतोऽस्मीति ॥

sa ca rājā tāmupalabhya tasyāṃ surataguṇanibaddhahṛdayo lokatrayaiśvaryamivopalabhya harṣabāṣpakalayā vācā praṇipatyābhipūjya maṇḍūkarājānamabravīt | anugṛhīto'smīti

उसे पाकर, जिसके रति-गुणों में उनका हृदय बँधा था, राजा को ऐसा लगा मानो तीनों लोकों का ऐश्वर्य मिल गया हो। उन्होंने मेंढकराज को प्रणाम कर उसका सम्मान किया और हर्ष के आँसुओं से रुँधी वाणी में कहा — "मैं अनुगृहीत हुआ।"

श्लोक 42 (3.195.42)

स च मण्डूकराजो जामातरमनुज्ञाप्य यथागतमगच्छत् ॥

sa ca maṇḍūkarājo jāmātaramanujñāpya yathāgatamagacchat

मेंढकराज अपने जामाता से विदा लेकर जैसे आया था वैसे ही लौट गया।

श्लोक 43 (3.195.43)

अथ कस्यचित्कालस्य तस्यां कुमारास्त्रयस्तस्य राज्ञः सम्बभूवुः शलो दलो बलश्चेति । ततस्तेषां ज्येष्ठं शलं समये पिता राज्येऽभिषिच्य तपसि धृतात्मा वनं जगाम ॥

atha kasyacitkālasya tasyāṃ kumārāstrayastasya rājñaḥ sambabhūvuḥ śalo dalo balaśceti | tatasteṣāṃ jyeṣṭhaṃ śalaṃ samaye pitā rājye'bhiṣicya tapasi dhṛtātmā vanaṃ jagāma

कुछ समय बाद उससे राजा के तीन पुत्र हुए — शल, दल और बल। फिर समय आने पर पिता ने सबसे बड़े पुत्र शल का राज्याभिषेक किया और तप में मन लगाकर वन को चले गए।

श्लोक 44 (3.195.44)

अथ कदाचिच्छलो मृगयामचरत् । मृगं चासाद्य रथेनान्वधावत् ॥

atha kadācicchalo mṛgayāmacarat | mṛgaṃ cāsādya rathenānvadhāvat

एक दिन शल शिकार को गया और एक हिरन को सामने पाकर रथ से उसका पीछा करने लगा।

श्लोक 45 (3.195.45)

सूतं चोवाच । शीघ्रं मां वहस्वेति ॥

sūtaṃ covāca | śīghraṃ māṃ vahasveti

उसने सारथि से कहा — "मुझे तेज़ी से ले चलो।"

श्लोक 46 (3.195.46)

स तथोक्तः सूतो राजानमब्रवीत् । मा क्रियतामनुबन्धः । नैष शक्यस्त्वया मृगो ग्रहीतुं यद्यपि ते रथे युक्तौ वाम्यौ स्यातामिति ॥

sa tathoktaḥ sūto rājānamabravīt | mā kriyatāmanubandhaḥ | naiṣa śakyastvayā mṛgo grahītuṃ yadyapi te rathe yuktau vāmyau syātāmiti

ऐसा कहे जाने पर सारथि ने राजा से कहा — "पीछा छोड़ दीजिए। यह हिरन आपसे पकड़ा नहीं जा सकता, चाहे आपके रथ में वाम्य घोड़े ही क्यों न जुते हों।"

श्लोक 47 (3.195.47)

ततोऽब्रवीद्राजा सूतम् । आचक्ष्व मे वाम्यौ । हन्मि वा त्वामिति ॥

tato'bravīdrājā sūtam | ācakṣva me vāmyau | hanmi vā tvāmiti

तब राजा ने सारथि से कहा — "मुझे वाम्यों के बारे में बताओ, नहीं तो मैं तुम्हें मार डालूँगा।"

श्लोक 48 (3.195.48)

स एवमुक्तो राजभयभीतो वामदेवशापभीतश्च सन्नाचख्यौ राज्ञे । वामदेवस्याश्वौ वाम्यौ मनोजवाविति ॥

sa evamukto rājabhayabhīto vāmadevaśāpabhītaśca sannācakhyau rājñe | vāmadevasyāśvau vāmyau manojavāviti

ऐसा कहे जाने पर राजा के भय से और वामदेव के शाप के भय से भी डरा हुआ सारथि राजा से बोला — "वाम्य वामदेव के घोड़े हैं, जो मन के समान वेगवान हैं।"

श्लोक 49 (3.195.49)

अथैनमेवं ब्रुवाणमब्रवीद्राजा । वामदेवाश्रमं याहीति ॥

athainamevaṃ bruvāṇamabravīdrājā | vāmadevāśramaṃ yāhīti

उसके ऐसा कहने पर राजा ने कहा — "वामदेव के आश्रम चलो।"

श्लोक 50 (3.195.50)

स गत्वा वामदेवाश्रमं तमृषिमब्रवीत् । भगवन्मृगो मया विद्धः पलायते । तं सम्भावयेयम् । अर्हसि मे वाम्यौ दातुमिति ॥

sa gatvā vāmadevāśramaṃ tamṛṣimabravīt | bhagavanmṛgo mayā viddhaḥ palāyate | taṃ sambhāvayeyam | arhasi me vāmyau dātumiti

वामदेव के आश्रम पहुँचकर उसने ऋषि से कहा — "भगवन्, मेरे बाण से घायल एक हिरन भागा जा रहा है। मैं उसे पकड़ना चाहता हूँ। आप मुझे अपने वाम्य घोड़े दे दीजिए।"

श्लोक 51 (3.195.51)

तमब्रवीदृषिः । ददानि ते वाम्यौ । कृतकार्येण भवता ममैव निर्यात्यौ क्षिप्रमिति ॥

tamabravīdṛṣiḥ | dadāni te vāmyau | kṛtakāryeṇa bhavatā mamaiva niryātyau kṣipramiti

ऋषि ने उससे कहा — "मैं तुम्हें वाम्य देता हूँ। काम पूरा होते ही इन्हें तुरन्त मुझे लौटा देना।"

श्लोक 52 (3.195.52)

स च तावश्वौ प्रतिगृह्यानुज्ञाप्य चर्षिं प्रायाद्वाम्यसंयुक्तेन रथेन मृगं प्रति । गच्छंश्चाब्रवीत्सूतम् । अश्वरत्नाविमावयोग्यौ ब्राह्मणानाम् । नैतौ प्रतिदेयौ वामदेवायेति ॥

sa ca tāvaśvau pratigṛhyānujñāpya carṣiṃ prāyādvāmyasaṃyuktena rathena mṛgaṃ prati | gacchaṃścābravītsūtam | aśvaratnāvimāvayogyau brāhmaṇānām | naitau pratideyau vāmadevāyeti

वह घोड़े लेकर और ऋषि से विदा लेकर वाम्यों से जुते रथ में हिरन की ओर चल पड़ा। जाते-जाते उसने सारथि से कहा — "ये दोनों रत्न-समान घोड़े ब्राह्मणों के योग्य नहीं हैं। इन्हें वामदेव को लौटाना नहीं है।"

श्लोक 53 (3.195.53)

एवमुक्त्वा मृगमवाप्य स्वनगरमेत्याश्वावन्तःपुरेऽस्थापयत् ॥

evamuktvā mṛgamavāpya svanagarametyāśvāvantaḥpure'sthāpayat

यह कहकर उसने हिरन को पकड़ा, अपने नगर लौटा और घोड़ों को अन्तःपुर में रख लिया।

श्लोक 54 (3.195.54)

अथर्षिश्चिन्तयामास । तरुणो राजपुत्रः कल्याणं पत्रमासाद्य रमते । न मे प्रतिनिर्यातयति । अहो कष्टमिति ॥

atharṣiścintayāmāsa | taruṇo rājaputraḥ kalyāṇaṃ patramāsādya ramate | na me pratiniryātayati | aho kaṣṭamiti

तब ऋषि ने सोचा — "युवा राजकुमार अच्छे वाहन पाकर उन्हीं में मग्न है और उन्हें मुझे लौटा नहीं रहा। अहो, कैसा कष्ट है!"

श्लोक 55 (3.195.55)

मनसा निश्चित्य मासि पूर्णे शिष्यमब्रवीत् । गच्छात्रेय । राजानं ब्रूहि । यदि पर्याप्तं निर्यातयोपाध्यायवाम्याविति ॥

manasā niścitya māsi pūrṇe śiṣyamabravīt | gacchātreya | rājānaṃ brūhi | yadi paryāptaṃ niryātayopādhyāyavāmyāviti

मन में निश्चय करके, पूरा एक महीना बीत जाने पर उन्होंने अपने शिष्य से कहा — "आत्रेय, जाओ और राजा से कहो — यदि तुम्हारा काम हो गया हो तो गुरु के वाम्य लौटा दो।"

श्लोक 56 (3.195.56)

स गत्वैवं तं राजानमब्रवीत् ॥

sa gatvaivaṃ taṃ rājānamabravīt

उसने जाकर राजा से यही कहा।

श्लोक 57 (3.195.57)

तं राजा प्रत्युवाच । राज्ञामेतद्वाहनम् । अनर्हा ब्राह्मणा रत्नानामेवंविधानाम् । किं च ब्राह्मणानामश्वैः कार्यम् । साधु प्रतिगम्यतामिति ॥

taṃ rājā pratyuvāca | rājñāmetadvāhanam | anarhā brāhmaṇā ratnānāmevaṃvidhānām | kiṃ ca brāhmaṇānāmaśvaiḥ kāryam | sādhu pratigamyatāmiti

राजा ने उसे उत्तर दिया — "यह राजाओं का वाहन है। ब्राह्मण ऐसे रत्नों के योग्य नहीं होते। और ब्राह्मणों को घोड़ों से क्या काम? भले से लौट जाओ।"

श्लोक 58 (3.195.58)

स गत्वैवमुपाध्यायायाचष्ट ॥

sa gatvaivamupādhyāyāyācaṣṭa

उसने लौटकर यह बात अपने गुरु को बता दी।

श्लोक 59 (3.195.59)

तच्छ्रुत्वा वचनमप्रियं वामदेवः क्रोधपरीतात्मा स्वयमेव राजानमभिगम्याश्वार्थमभ्यचोदयत् । न चादाद्राजा ॥

tacchrutvā vacanamapriyaṃ vāmadevaḥ krodhaparītātmā svayameva rājānamabhigamyāśvārthamabhyacodayat | na cādādrājā

यह अप्रिय बात सुनकर क्रोध से भरे वामदेव स्वयं राजा के पास गए और घोड़े लौटाने का आग्रह किया, पर राजा ने नहीं दिए।

वामदेव उवाच

श्लोक 60 (3.195.60)

प्रयच्छ वाम्यौ मम पार्थिव त्वं । कृतं हि ते कार्यमन्यैरशक्यम् । मा त्वा वधीद्वरुणो घोरपाशै- । र्ब्रह्मक्षत्रस्यान्तरे वर्तमानः ॥

prayaccha vāmyau mama pārthiva tvaṃ | kṛtaṃ hi te kāryamanyairaśakyam | mā tvā vadhīdvaruṇo ghorapāśai- | rbrahmakṣatrasyāntare vartamānaḥ

"हे राजन्, मेरे वाम्य मुझे लौटा दो; उनसे तुम्हारा वह काम हो गया जो दूसरों के लिए असम्भव था। कहीं ऐसा न हो कि वरुण अपने भयानक पाशों से तुम्हें मार डालें, क्योंकि तुम ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच आ खड़े हुए हो।"

राजोवाच

श्लोक 61 (3.195.61)

अनड्वाहौ सुव्रतौ साधु दान्ता- । वेतद्विप्राणां वाहनं वामदेव । ताभ्यां याहि त्वं यत्र कामो महर्षे । छन्दांसि वै त्वादृशं संवहन्ति ॥

anaḍvāhau suvratau sādhu dāntā- | vetadviprāṇāṃ vāhanaṃ vāmadeva | tābhyāṃ yāhi tvaṃ yatra kāmo maharṣe | chandāṃsi vai tvādṛśaṃ saṃvahanti

"हे वामदेव, सधे हुए, शान्त स्वभाव के दो अच्छे बैल — यही ब्राह्मणों का वाहन है। हे महर्षि, उन्हीं से जहाँ चाहो जाओ। तुम्हारे जैसों को तो वेद के छन्द वहन करते हैं।"

वामदेव उवाच

श्लोक 62 (3.195.62)

छन्दांसि वै मादृशं संवहन्ति । लोकेऽमुष्मिन्पार्थिव यानि सन्ति । अस्मिंस्तु लोके मम यानमेत- । दस्मद्विधानामपरेषां च राजन् ॥

chandāṃsi vai mādṛśaṃ saṃvahanti | loke'muṣminpārthiva yāni santi | asmiṃstu loke mama yānameta- | dasmadvidhānāmapareṣāṃ ca rājan

"हे राजन्, मुझ जैसे को परलोक में वहाँ के छन्द वहन करते हैं। पर इस लोक में तो यही मेरा और मेरे जैसे अन्य लोगों का वाहन है।"

राजोवाच

श्लोक 63 (3.195.63)

चत्वारो वा गर्दभास्त्वां वहन्तु । श्रेष्ठाश्वतर्यो हरयो वा तुरङ्गाः । तैस्त्वं याहि क्षत्रियस्यैष वाहो । मम वाम्यौ न तवैतौ हि विद्धि ॥

catvāro vā gardabhāstvāṃ vahantu | śreṣṭhāśvataryo harayo vā turaṅgāḥ | taistvaṃ yāhi kṣatriyasyaiṣa vāho | mama vāmyau na tavaitau hi viddhi

"चार गधे तुम्हें ढोएँ, या उत्तम खच्चरियाँ, या कुमैत घोड़े। उन्हीं से जाओ। यह क्षत्रिय का वाहन है। जान लो कि ये वाम्य मेरे हैं, तुम्हारे नहीं।"

वामदेव उवाच

श्लोक 64 (3.195.64)

घोरं व्रतं ब्राह्मणस्यैतदाहु- । रेतद्राजन्यदिहाजीवमानः । अयस्मया घोररूपा महान्तो । वहन्तु त्वां शितशूलाश्चतुर्धा ॥

ghoraṃ vrataṃ brāhmaṇasyaitadāhu- | retadrājanyadihājīvamānaḥ | ayasmayā ghorarūpā mahānto | vahantu tvāṃ śitaśūlāścaturdhā

"हे राजन्, ब्राह्मण का व्रत भयानक कहा गया है, और जब तक मैं यहाँ जीवित हूँ, मेरा यही व्रत है — लोहे के बने, तीखे शूल धारण किए, भयानक रूप वाले विशाल प्राणी तुम्हें चार टुकड़ों में फाड़कर ले जाएँ।"

राजोवाच

श्लोक 65 (3.195.65)

ये त्वा विदुर्ब्राह्मणं वामदेव । वाचा हन्तुं मनसा कर्मणा वा । ते त्वां सशिष्यमिह पातयन्तु । मद्वाक्यनुन्नाः शितशूलासिहस्ताः ॥

ye tvā vidurbrāhmaṇaṃ vāmadeva | vācā hantuṃ manasā karmaṇā vā | te tvāṃ saśiṣyamiha pātayantu | madvākyanunnāḥ śitaśūlāsihastāḥ

"हे वामदेव, जो लोग तुम्हें वाणी, मन या कर्म से हत्या पर उतारू ब्राह्मण के रूप में जानते हैं, वे मेरी आज्ञा से प्रेरित होकर हाथों में तीखे शूल और तलवारें लिए तुम्हें तुम्हारे शिष्य सहित यहीं मार गिराएँ।"

वामदेव उवाच

श्लोक 66 (3.195.66)

नानुयोगा ब्राह्मणानां भवन्ति । वाचा राजन्मनसा कर्मणा वा । यस्त्वेवं ब्रह्म तपसान्वेति विद्वां- । स्तेन श्रेष्ठो भवति हि जीवमानः ॥

nānuyogā brāhmaṇānāṃ bhavanti | vācā rājanmanasā karmaṇā vā | yastvevaṃ brahma tapasānveti vidvāṃ- | stena śreṣṭho bhavati hi jīvamānaḥ

"हे राजन्, ब्राह्मणों पर वाणी, मन या कर्म से कोई अभियोग नहीं चलता। जो विद्वान इस प्रकार तप के द्वारा ब्रह्म का अनुसरण करता है, वह उसी से जीते-जी श्रेष्ठ हो जाता है।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 67 (3.195.67)

एवमुक्ते वामदेवेन राज- । न्समुत्तस्थू राक्षसा घोररूपाः । तैः शूलहस्तैर्वध्यमानः स राजा । प्रोवाचेदं वाक्यमुच्चैस्तदानीम् ॥

evamukte vāmadevena rāja- | nsamuttasthū rākṣasā ghorarūpāḥ | taiḥ śūlahastairvadhyamānaḥ sa rājā | provācedaṃ vākyamuccaistadānīm

हे राजन्, वामदेव के ऐसा कहते ही भयानक रूप वाले राक्षस उठ खड़े हुए। उनके हाथों के शूलों से मारे जाते हुए उस राजा ने तब ऊँचे स्वर में यह कहा —

राजोवाच

श्लोक 68 (3.195.68)

इक्ष्वाकवो यदि ब्रह्मन्दलो वा । विधेया मे यदि वान्ये विशोऽपि । नोत्स्रक्ष्येऽहं वामदेवस्य वाम्यौ । नैवंविधा धर्मशीला भवन्ति ॥

ikṣvākavo yadi brahmandalo vā | vidheyā me yadi vānye viśo'pi | notsrakṣye'haṃ vāmadevasya vāmyau | naivaṃvidhā dharmaśīlā bhavanti

"हे ब्राह्मण, जब तक इक्ष्वाकु, या दल, या मेरी अन्य प्रजा मेरी आज्ञा में है, मैं वामदेव के वाम्य नहीं छोड़ूँगा। ऐसे लोग धर्मशील नहीं होते।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 69 (3.195.69)

एवं ब्रुवन्नेव स यातुधानै- । र्हतो जगामाशु महीं क्षितीशः । ततो विदित्वा नृपतिं निपातित- । मिक्ष्वाकवो वै दलमभ्यषिञ्चन् ॥

evaṃ bruvanneva sa yātudhānai- | rhato jagāmāśu mahīṃ kṣitīśaḥ | tato viditvā nṛpatiṃ nipātita- | mikṣvākavo vai dalamabhyaṣiñcan

यह कहते-कहते ही वह राजा यातुधानों के हाथों मारा जाकर तुरन्त धरती पर गिर पड़ा। राजा को मारा गया जानकर इक्ष्वाकुओं ने दल का राज्याभिषेक कर दिया।

श्लोक 70 (3.195.70)

राज्ये तदा तत्र गत्वा स विप्रः । प्रोवाचेदं वचनं वामदेवः । दलं राजानं ब्राह्मणानां हि देय- । मेवं राजन्सर्वधर्मेषु दृष्टम् ॥

rājye tadā tatra gatvā sa vipraḥ | provācedaṃ vacanaṃ vāmadevaḥ | dalaṃ rājānaṃ brāhmaṇānāṃ hi deya- | mevaṃ rājansarvadharmeṣu dṛṣṭam

तब वह विप्र वामदेव उस राज्य में गए और राजा दल से यह वचन बोले — "ब्राह्मणों का देय उन्हें दिया ही जाना चाहिए; हे राजन्, सभी धर्मों में यही देखा गया है।

श्लोक 71 (3.195.71)

बिभेषि चेत्त्वमधर्मान्नरेन्द्र । प्रयच्छ मे शीघ्रमेवाद्य वाम्यौ । एतच्छ्रुत्वा वामदेवस्य वाक्यं । स पार्थिवः सूतमुवाच रोषात् ॥

bibheṣi cettvamadharmānnarendra | prayaccha me śīghramevādya vāmyau | etacchrutvā vāmadevasya vākyaṃ | sa pārthivaḥ sūtamuvāca roṣāt

हे नरेन्द्र, यदि तुम अधर्म से डरते हो तो आज ही शीघ्र मेरे वाम्य मुझे दे दो।" वामदेव का यह वचन सुनकर उस राजा ने क्रोध में अपने सारथि से कहा —

राजोवाच

श्लोक 72 (3.195.72)

एकं हि मे सायकं चित्ररूपं । दिग्धं विषेणाहर सङ्गृहीतम् । येन विद्धो वामदेवः शयीत । संदश्यमानः श्वभिरार्तरूपः ॥

ekaṃ hi me sāyakaṃ citrarūpaṃ | digdhaṃ viṣeṇāhara saṅgṛhītam | yena viddho vāmadevaḥ śayīta | saṃdaśyamānaḥ śvabhirārtarūpaḥ

"मेरे लिए वह एक विचित्र, विष में बुझा, सँभालकर रखा हुआ बाण ले आओ, जिससे बिंधकर वामदेव कुत्तों द्वारा नोचा जाता हुआ तड़पता पड़ा रहे।"

वामदेव उवाच

श्लोक 73 (3.195.73)

जानामि पुत्रं दशवर्षं तवाहं । जातं महिष्यां श्येनजितं नरेन्द्र । तं जहि त्वं मद्वचनात्प्रणुन्न- । स्तूर्णं प्रियं सायकैर्घोररूपैः ॥

jānāmi putraṃ daśavarṣaṃ tavāhaṃ | jātaṃ mahiṣyāṃ śyenajitaṃ narendra | taṃ jahi tvaṃ madvacanātpraṇunna- | stūrṇaṃ priyaṃ sāyakairghorarūpaiḥ

"हे नरेन्द्र, मैं तुम्हारी पटरानी से उत्पन्न तुम्हारे दस वर्ष के पुत्र श्येनजित् को जानता हूँ। मेरे वचन से प्रेरित होकर अपने भयानक बाणों से अपने उसी प्रिय को शीघ्र मार डालो।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 74 (3.195.74)

एवमुक्तो वामदेवेन राज- । न्नन्तःपुरे राजपुत्रं जघान । स सायकस्तिग्मतेजा विसृष्टः । श्रुत्वा दलस्तच्च वाक्यं बभाषे ॥

evamukto vāmadevena rāja- | nnantaḥpure rājaputraṃ jaghāna | sa sāyakastigmatejā visṛṣṭaḥ | śrutvā dalastacca vākyaṃ babhāṣe

हे राजन्, वामदेव के ऐसा कहते ही वह छूटा हुआ तीक्ष्ण तेज वाला बाण अन्तःपुर में जाकर राजकुमार को मार गया। यह सुनकर दल ने यह वचन कहा —

राजोवाच

श्लोक 75 (3.195.75)

इक्ष्वाकवो हन्त चरामि वः प्रियं । निहन्मीमं विप्रमद्य प्रमथ्य । आनीयतामपरस्तिग्मतेजाः । पश्यध्वं मे वीर्यमद्य क्षितीशाः ॥

ikṣvākavo hanta carāmi vaḥ priyaṃ | nihanmīmaṃ vipramadya pramathya | ānīyatāmaparastigmatejāḥ | paśyadhvaṃ me vīryamadya kṣitīśāḥ

"हे इक्ष्वाकुओ, लो, मैं तुम्हारा प्रिय करता हूँ — आज इस ब्राह्मण को कुचलकर मार डालता हूँ। तीक्ष्ण तेज वाला दूसरा बाण लाओ, और हे भूपालो, आज मेरा पराक्रम देखो।"

वामदेव उवाच

श्लोक 76 (3.195.76)

यं त्वमेनं सायकं घोररूपं । विषेण दिग्धं मम संदधासि । न त्वमेनं शरवर्यं विमोक्तुं । सन्धातुं वा शक्ष्यसि मानवेन्द्र ॥

yaṃ tvamenaṃ sāyakaṃ ghorarūpaṃ | viṣeṇa digdhaṃ mama saṃdadhāsi | na tvamenaṃ śaravaryaṃ vimoktuṃ | sandhātuṃ vā śakṣyasi mānavendra

"हे मानवेन्द्र, विष में बुझा यह भयानक बाण, जिसे तुम मुझ पर साध रहे हो — इस श्रेष्ठ बाण को न तुम छोड़ सकोगे, न धनुष पर चढ़ा सकोगे।"

राजोवाच

श्लोक 77 (3.195.77)

इक्ष्वाकवः पश्यत मां गृहीतं । न वै शक्नोम्येष शरं विमोक्तुम् । न चास्य कर्तुं नाशमभ्युत्सहामि । आयुष्मान्वै जीवतु वामदेवः ॥

ikṣvākavaḥ paśyata māṃ gṛhītaṃ | na vai śaknomyeṣa śaraṃ vimoktum | na cāsya kartuṃ nāśamabhyutsahāmi | āyuṣmānvai jīvatu vāmadevaḥ

"हे इक्ष्वाकुओ, देखो, मैं जकड़ लिया गया हूँ। मैं यह बाण नहीं छोड़ पा रहा। और न ही इसका नाश करने का साहस कर पाता हूँ। वामदेव दीर्घायु हों, जीवित रहें!"

वामदेव उवाच

श्लोक 78 (3.195.78)

संस्पृशैनां महिषीं सायकेन । ततस्तस्मादेनसो मोक्ष्यसे त्वम् ॥

saṃspṛśaināṃ mahiṣīṃ sāyakena | tatastasmādenaso mokṣyase tvam

"इस रानी को बाण से छू दो; तब तुम उस पाप से मुक्त हो जाओगे।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 79 (3.195.79)

ततस्तथा कृतवान्पार्थिवस्तु । ततो मुनिं राजपुत्री बभाषे ॥

tatastathā kṛtavānpārthivastu | tato muniṃ rājaputrī babhāṣe

राजा ने वैसा ही किया। तब राजकुमारी ने मुनि से कहा —

राजपुत्र्युवाच

श्लोक 80 (3.195.80)

यथा युक्तं वामदेवाहमेनं । दिने दिने संविशन्ती व्यशंसम् । ब्राह्मणेभ्यो मृगयन्ती सूनृतानि । तथा ब्रह्मन्पुण्यलोकं लभेयम् ॥

yathā yuktaṃ vāmadevāhamenaṃ | dine dine saṃviśantī vyaśaṃsam | brāhmaṇebhyo mṛgayantī sūnṛtāni | tathā brahmanpuṇyalokaṃ labheyam

"हे वामदेव, जैसे मैं प्रतिदिन उनके पास सोते हुए उन्हें ब्राह्मणों के प्रति मधुर वचनों की खोज करती हुई उचित सीख देती रही हूँ, उसी सत्य से, हे ब्रह्मन्, मुझे पुण्यलोक प्राप्त हो।"

वामदेव उवाच

श्लोक 81 (3.195.81)

त्वया त्रातं राजकुलं शुभेक्षणे । वरं वृणीष्वाप्रतिमं ददानि ते । प्रशाधीमं स्वजनं राजपुत्रि । इक्ष्वाकुराज्यं सुमहच्चाप्यनिन्द्ये ॥

tvayā trātaṃ rājakulaṃ śubhekṣaṇe | varaṃ vṛṇīṣvāpratimaṃ dadāni te | praśādhīmaṃ svajanaṃ rājaputri | ikṣvākurājyaṃ sumahaccāpyanindye

"हे सुनयने, तुमने राजकुल की रक्षा की है। कोई अनुपम वर माँगो, मैं तुम्हें दूँगा। हे अनिन्द्ये राजकुमारी, अपने इन स्वजनों पर और इक्ष्वाकुओं के इस विशाल राज्य पर शासन करो।"

राजपुत्र्युवाच

श्लोक 82 (3.195.82)

वरं वृणे भगवन्नेकमेव । विमुच्यतां किल्बिषादद्य भर्ता । शिवेन चाध्याहि सपुत्रबान्धवं । वरो वृतो ह्येष मया द्विजाग्र्य ॥

varaṃ vṛṇe bhagavannekameva | vimucyatāṃ kilbiṣādadya bhartā | śivena cādhyāhi saputrabāndhavaṃ | varo vṛto hyeṣa mayā dvijāgrya

"भगवन्, मैं केवल एक ही वर माँगती हूँ — आज मेरे पति पाप से मुक्त हो जाएँ। और पुत्रों तथा बन्धुओं सहित उन पर कल्याण-दृष्टि रखिए। हे द्विजश्रेष्ठ, यही वर मैंने माँगा है।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 83 (3.195.83)

श्रुत्वा वचः स मुनी राजपुत्र्या- । स्तथास्त्विति प्राह कुरुप्रवीर । ततः स राजा मुदितो बभूव । वाम्यौ चास्मै सम्प्रददौ प्रणम्य ॥

śrutvā vacaḥ sa munī rājaputryā- | stathāstviti prāha kurupravīra | tataḥ sa rājā mudito babhūva | vāmyau cāsmai sampradadau praṇamya

हे कुरुवीर, राजकुमारी की बात सुनकर मुनि ने कहा — "तथास्तु।" तब राजा प्रसन्न हुआ और प्रणाम करके उसने वाम्य घोड़े उन्हें लौटा दिए।

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