आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 196
बक और इन्द्र: चिरजीवियों के दुःख और सुख
ऋषि बक इतने दीर्घायु कैसे हुए, यह पूछे जाने पर मार्कण्डेय इन्द्र के बक से मिलने की कथा सुनाते हैं। देवासुर-संग्राम के बाद इन्द्र ऐरावत पर बैठकर समृद्ध और धर्मपरायण पृथ्वी का भ्रमण करते हैं और पूर्वी समुद्र के निकट बक के आश्रम पहुँचते हैं। वे एक लाख वर्ष जी चुके मुनि से पूछते हैं कि चिरजीवियों का दुःख क्या है; बक प्रियजनों के वियोग, दुष्टों के संग, कुलों के विनाश और अज्ञानियों की सफलता को गिनाते हैं। फिर उनके सुख के विषय में पूछे जाने पर वे उस व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं जो किसी का आश्रित हुए बिना अपने घर में सादा भोजन करता है और पहले अतिथियों को खिलाता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.196.1)
मार्कण्डेयमृषयो ब्राह्मणा युधिष्ठिरश्च । पर्यपृच्छन्नृषिः केन दीर्घायुरासीद्बकः ॥
mārkaṇḍeyamṛṣayo brāhmaṇā yudhiṣṭhiraśca | paryapṛcchannṛṣiḥ kena dīrghāyurāsīdbakaḥ
ऋषियों, ब्राह्मणों और युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय से पूछा — "ऋषि बक किस कारण इतने दीर्घायु हुए?"
श्लोक 2 (3.196.2)
मार्कण्डेयस्तु तान्सर्वान्प्रत्युवाच महातपाः । दीर्घायुश्च बको राजन्नृषिर्नात्र विचारणा ॥
mārkaṇḍeyastu tānsarvānpratyuvāca mahātapāḥ | dīrghāyuśca bako rājannṛṣirnātra vicāraṇā
महातपस्वी मार्कण्डेय ने उन सबको उत्तर दिया — "राजन्, बक सचमुच दीर्घायु ऋषि हैं; इसमें कोई संदेह नहीं।"
श्लोक 3 (3.196.3)
एतच्छ्रुत्वा तु कौन्तेयो भ्रातृभिः सह भारत । मार्कण्डेयं पर्यपृच्छद्धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥
etacchrutvā tu kaunteyo bhrātṛbhiḥ saha bhārata | mārkaṇḍeyaṃ paryapṛcchaddharmarājo yudhiṣṭhiraḥ
हे भारत, यह सुनकर भाइयों सहित कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय से पूछा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 4 (3.196.4)
बकदाल्भ्यौ महात्मानौ श्रूयेते चिरजीविनौ । सखायौ देवराजस्य तावृषी लोकसंमतौ ॥
bakadālbhyau mahātmānau śrūyete cirajīvinau | sakhāyau devarājasya tāvṛṣī lokasaṃmatau
"महात्मा बक और दाल्भ्य चिरजीवी सुने जाते हैं। लोक में सम्मानित वे दोनों ऋषि देवराज के सखा हैं।
श्लोक 5 (3.196.5)
एतदिच्छामि भगवन्बकशक्रसमागमम् । सुखदुःखसमायुक्तं तत्त्वेन कथितं त्वया ॥
etadicchāmi bhagavanbakaśakrasamāgamam | sukhaduḥkhasamāyuktaṃ tattvena kathitaṃ tvayā
भगवन्, मैं बक और इन्द्र के उस समागम का, जिसमें सुख और दुःख की चर्चा हुई, यथार्थ वृत्तान्त आपसे सुनना चाहता हूँ।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 6 (3.196.6)
वृत्ते देवासुरे राजन्संग्रामे रोमहर्षणे । त्रयाणामपि लोकानामिन्द्रो लोकाधिपोऽभवत् ॥
vṛtte devāsure rājansaṃgrāme romaharṣaṇe | trayāṇāmapi lokānāmindro lokādhipo'bhavat
हे राजन्, जब देवताओं और असुरों का रोमांचकारी संग्राम समाप्त हुआ, तब इन्द्र तीनों लोकों के अधिपति हुए।
श्लोक 7 (3.196.7)
सम्यग्वर्षति पर्जन्ये सस्यसंपद उत्तमाः । निरामयाः सुधर्मिष्ठाः प्रजा धर्मपरायणाः । मुदितश्च जनः सर्वः स्वधर्मेषु व्यवस्थितः ॥
samyagvarṣati parjanye sasyasaṃpada uttamāḥ | nirāmayāḥ sudharmiṣṭhāḥ prajā dharmaparāyaṇāḥ | muditaśca janaḥ sarvaḥ svadharmeṣu vyavasthitaḥ
पर्जन्य के ठीक-ठीक बरसने से उत्तम फसलें हुईं; प्रजा रोगरहित, धर्म में दृढ़ और धर्मपरायण थी, और सब लोग अपने-अपने धर्म में स्थित रहकर प्रसन्न थे।
श्लोक 8 (3.196.8)
ताः प्रजा मुदिताः सर्वा दृष्ट्वा बलनिषूदनः । ततस्तु मुदितो राजन्देवराजः शतक्रतुः ॥
tāḥ prajā muditāḥ sarvā dṛṣṭvā balaniṣūdanaḥ | tatastu mudito rājandevarājaḥ śatakratuḥ
हे राजन्, उन सारी प्रजाओं को प्रसन्न देखकर बल का संहार करने वाले देवराज शतक्रतु आनन्दित हुए।
श्लोक 9 (3.196.9)
ऐरावतं समास्थाय अपश्यन्मुदिताः प्रजाः । आश्रमांश्च विचित्रांश्च नदीश्च विविधाः शुभाः ॥
airāvataṃ samāsthāya apaśyanmuditāḥ prajāḥ | āśramāṃśca vicitrāṃśca nadīśca vividhāḥ śubhāḥ
ऐरावत पर सवार होकर उन्होंने प्रसन्न प्रजा को, विचित्र आश्रमों को और अनेक सुन्दर नदियों को देखा;
श्लोक 10 (3.196.10)
नगराणि समृद्धानि खेटाञ्जनपदांस्तथा । प्रजापालनदक्षांश्च नरेन्द्रान्धर्मचारिणः ॥
nagarāṇi samṛddhāni kheṭāñjanapadāṃstathā | prajāpālanadakṣāṃśca narendrāndharmacāriṇaḥ
समृद्ध नगरों, खेड़ों और जनपदों को, तथा प्रजा-पालन में कुशल धर्माचारी राजाओं को;
श्लोक 11 (3.196.11)
उदपानं प्रपा वापी तटाकानि सरांसि च । नानाव्रतसमाचारैः सेवितानि द्विजोत्तमैः ॥
udapānaṃ prapā vāpī taṭākāni sarāṃsi ca | nānāvratasamācāraiḥ sevitāni dvijottamaiḥ
कुओं, प्याऊओं, बावड़ियों, तालाबों और सरोवरों को, जिनका सेवन नाना प्रकार के व्रत करने वाले श्रेष्ठ द्विज करते थे।
श्लोक 12 (3.196.12)
ततोऽवतीर्य रम्यायां पृथ्व्यां राजञ्छतक्रतुः । तत्र रम्ये शिवे देशे बहुवृक्षसमाकुले ॥
tato'vatīrya ramyāyāṃ pṛthvyāṃ rājañchatakratuḥ | tatra ramye śive deśe bahuvṛkṣasamākule
फिर हे राजन्, शतक्रतु रमणीय पृथ्वी पर उतरे, एक ऐसे सुन्दर और मंगलमय स्थान पर जो अनेक वृक्षों से भरा था,
श्लोक 13 (3.196.13)
पूर्वस्यां दिशि रम्यायां समुद्राभ्याशतो नृप । तत्राश्रमपदं रम्यं मृगद्विजनिषेवितम् । तत्राश्रमपदे रम्ये बकं पश्यति देवराट् ॥
pūrvasyāṃ diśi ramyāyāṃ samudrābhyāśato nṛpa | tatrāśramapadaṃ ramyaṃ mṛgadvijaniṣevitam | tatrāśramapade ramye bakaṃ paśyati devarāṭ
हे नृप, पूर्व दिशा के उस रमणीय प्रदेश में, समुद्र के निकट। वहाँ मृगों और पक्षियों से सेवित एक सुन्दर आश्रम था, और उसी सुन्दर आश्रम में देवराज ने बक को देखा।
श्लोक 14 (3.196.14)
बकस्तु दृष्ट्वा देवेन्द्रं दृढं प्रीतमनाऽभवत् । पाद्यासनार्घदानेन फलमूलैरथार्चयत् ॥
bakastu dṛṣṭvā devendraṃ dṛḍhaṃ prītamanā'bhavat | pādyāsanārghadānena phalamūlairathārcayat
देवेन्द्र को देखकर बक अत्यन्त प्रसन्न हुए और पाद्य, आसन और अर्घ्य देकर तथा फल-मूल से उनका सत्कार किया।
श्लोक 15 (3.196.15)
सुखोपविष्टो वरदस्ततस्तु बलसूदनः । ततः प्रश्नं बकं देव उवाच त्रिदशेश्वरः ॥
sukhopaviṣṭo varadastatastu balasūdanaḥ | tataḥ praśnaṃ bakaṃ deva uvāca tridaśeśvaraḥ
जब वरदाता बलसूदन सुख से बैठ गए, तब देवताओं के स्वामी उन देव ने बक से एक प्रश्न किया —
इन्द्र उवाच
श्लोक 16 (3.196.16)
शतं वर्षसहस्राणि मुने जातस्य तेऽनघ । समाख्याहि मम ब्रह्मन्किं दुःखं चिरजीविनाम् ॥
śataṃ varṣasahasrāṇi mune jātasya te'nagha | samākhyāhi mama brahmankiṃ duḥkhaṃ cirajīvinām
"हे निष्पाप मुनि, तुम्हें जन्मे एक लाख वर्ष हो गए। हे ब्रह्मन्, मुझे बताओ — चिरजीवियों का दुःख क्या है?"
बक उवाच
श्लोक 17 (3.196.17)
अप्रियैः सह संवासः प्रियैश्चापि विनाभवः । असद्भिः संप्रयोगश्च तद्दुःखं चिरजीविनाम् ॥
apriyaiḥ saha saṃvāsaḥ priyaiścāpi vinābhavaḥ | asadbhiḥ saṃprayogaśca tadduḥkhaṃ cirajīvinām
"अप्रिय लोगों के साथ रहना, प्रियजनों से बिछुड़ना, और दुष्टों का संग — यही चिरजीवियों का दुःख है।
श्लोक 18 (3.196.18)
पुत्रदारविनाशोऽत्र ज्ञातीनां सुहृदामपि । परेष्वायत्तता कृच्छ्रं किंनु दुःखतरं ततः ॥
putradāravināśo'tra jñātīnāṃ suhṛdāmapi | pareṣvāyattatā kṛcchraṃ kiṃnu duḥkhataraṃ tataḥ
पुत्रों और पत्नी का, जाति-बन्धुओं और मित्रों का भी नाश देखना, और दूसरों के अधीन रहने का कष्ट — इससे बढ़कर दुःख क्या होगा?
श्लोक 19 (3.196.19)
नान्यद्दुःखतरं किंचिल्लोकेषु प्रतिभाति मे । अर्थैर्विहीनः पुरुषः परैः संपरिभूयते ॥
nānyadduḥkhataraṃ kiṃcillokeṣu pratibhāti me | arthairvihīnaḥ puruṣaḥ paraiḥ saṃparibhūyate
संसार में मुझे इससे अधिक दुःखद कुछ नहीं लगता — धनहीन मनुष्य का दूसरे लोग तिरस्कार करते हैं।
श्लोक 20 (3.196.20)
अकुलानां कुले भावं कुलीनानां कुलक्षयम् । संयोगं विप्रयोगं च पश्यन्ति चिरजीविनः ॥
akulānāṃ kule bhāvaṃ kulīnānāṃ kulakṣayam | saṃyogaṃ viprayogaṃ ca paśyanti cirajīvinaḥ
चिरजीवी देखते हैं कि अकुलीन ऊँचे कुल को पा लेते हैं और कुलीनों के कुल नष्ट हो जाते हैं; वे मिलन भी देखते हैं और बिछोह भी।
श्लोक 21 (3.196.21)
अपि प्रत्यक्षमेवैतत्तव देव शतक्रतो । अकुलानां समृद्धानां कथं कुलविपर्ययः ॥
api pratyakṣamevaitattava deva śatakrato | akulānāṃ samṛddhānāṃ kathaṃ kulaviparyayaḥ
हे देव शतक्रतु, यह तो तुम्हें भी प्रत्यक्ष है — कैसे अकुलीन समृद्ध हो जाते हैं और कुलों की दशा उलट जाती है।
श्लोक 22 (3.196.22)
देवदानवगन्धर्वमनुष्योरगराक्षसाः । प्राप्नुवन्ति विपर्यासं किंनु दुःखतरं ततः ॥
devadānavagandharvamanuṣyoragarākṣasāḥ | prāpnuvanti viparyāsaṃ kiṃnu duḥkhataraṃ tataḥ
देवता, दानव, गन्धर्व, मनुष्य, नाग और राक्षस — सभी उलटफेर को प्राप्त होते हैं; इससे बढ़कर दुःख क्या होगा?
श्लोक 23 (3.196.23)
कुले जाताश्च क्लिश्यन्ते दौष्कुलेयवशानुगाः । आढ्यैर्दरिद्राऽवमताः किंनु दुःखतरं ततः ॥
kule jātāśca kliśyante dauṣkuleyavaśānugāḥ | āḍhyairdaridrā'vamatāḥ kiṃnu duḥkhataraṃ tataḥ
अच्छे कुल में जन्मे लोग नीच कुल वालों के वश में रहकर क्लेश पाते हैं; धनी दरिद्रों का अपमान करते हैं — इससे बढ़कर दुःख क्या होगा?
श्लोक 24 (3.196.24)
लोके वैधर्म्यमेतत्तु दृश्यते बहुविस्तरम् । हीनज्ञानाश्च हृष्यन्ते क्लिश्यन्ते प्राज्ञकोविदाः । बहुदुःखपरिक्लेशं मानुष्यमिह दृश्यते ॥
loke vaidharmyametattu dṛśyate bahuvistaram | hīnajñānāśca hṛṣyante kliśyante prājñakovidāḥ | bahuduḥkhaparikleśaṃ mānuṣyamiha dṛśyate
संसार में यह विपरीतता बहुत व्यापक रूप से दिखाई देती है — अज्ञानी आनन्द मनाते हैं और बुद्धिमान, विद्वान क्लेश पाते हैं। यहाँ मनुष्य-जीवन अनेक दुःखों और कष्टों से भरा दिखाई देता है।"
इन्द्र उवाच
श्लोक 25 (3.196.25)
पुनरेव महाभाग देवर्षिगणसेवित । समाख्याहि मम ब्रह्मन्किं सुखं चिरजीविनाम् ॥
punareva mahābhāga devarṣigaṇasevita | samākhyāhi mama brahmankiṃ sukhaṃ cirajīvinām
"हे महाभाग, देवर्षियों के समूहों से सेवित ब्रह्मन्, अब यह भी बताओ — चिरजीवियों का सुख क्या है?"
बक उवाच
श्लोक 26 (3.196.26)
अष्टमे द्वादशे वाऽपि शाकं यः पचते गृहे । कुमित्राण्यनपाश्रित्य किं वै सुखतरं ततः ॥
aṣṭame dvādaśe vā'pi śākaṃ yaḥ pacate gṛhe | kumitrāṇyanapāśritya kiṃ vai sukhataraṃ tataḥ
"जो आठवें या बारहवें दिन ही सही, अपने घर में साग पकाता है और बुरे मित्रों का सहारा नहीं लेता — उससे बढ़कर सुख क्या है?
श्लोक 27 (3.196.27)
यत्राहानि न गण्यन्ते नैनमाहुर्महाशनम् । अपि शाकं पचानस्य सुखं वै मघवन्गृहे ॥
yatrāhāni na gaṇyante nainamāhurmahāśanam | api śākaṃ pacānasya sukhaṃ vai maghavangṛhe
जहाँ दिन गिने नहीं जाते और कोई उसे पेटू नहीं कहता — हे मघवन्, अपने घर में साग पकाने वाले को भी सुख ही है।
श्लोक 28 (3.196.28)
अर्जितं स्वेन वीर्येण नाप्यपाश्रित्य कंचन । फलशाकमपि श्रेयो भोक्तुं ह्यकृपणं गृहे ॥
arjitaṃ svena vīryeṇa nāpyapāśritya kaṃcana | phalaśākamapi śreyo bhoktuṃ hyakṛpaṇaṃ gṛhe
अपने परिश्रम से कमाए हुए, किसी का सहारा लिए बिना, अपने घर में बिना दीनता के फल और साग खाना भी श्रेष्ठ है।
श्लोक 29 (3.196.29)
परस्य तु गृहे भोक्तुः परिभूतस्य नित्यशः । सुमृष्टमपि न श्रेयो विकल्पोऽयमतः सताम् ॥
parasya tu gṛhe bhoktuḥ paribhūtasya nityaśaḥ | sumṛṣṭamapi na śreyo vikalpo'yamataḥ satām
पर जो दूसरे के घर में खाता है और सदा तिरस्कृत होता है, उसके लिए स्वादिष्ट भोजन भी श्रेयस्कर नहीं; सज्जनों का यही निर्णय है।
श्लोक 30 (3.196.30)
श्ववद्धि लोलुपो यस्तु परान्नं भोक्तुमिच्छति । धिगस्तु तस्य तद्भुक्तं कृपणस्य दुरात्मनः ॥
śvavaddhi lolupo yastu parānnaṃ bhoktumicchati | dhigastu tasya tadbhuktaṃ kṛpaṇasya durātmanaḥ
जो कुत्ते की तरह लोभी होकर पराया अन्न खाना चाहता है — उस दीन, दुष्टात्मा के उस भोजन को धिक्कार है।
श्लोक 31 (3.196.31)
यो दत्त्वाऽतिथिभृत्येभ्यः पितृभ्यश्च द्विजोत्तमः । शिष्टान्यन्नानि यो भुङ्क्ते किं वै सुखतरं ततः ॥
yo dattvā'tithibhṛtyebhyaḥ pitṛbhyaśca dvijottamaḥ | śiṣṭānyannāni yo bhuṅkte kiṃ vai sukhataraṃ tataḥ
जो श्रेष्ठ द्विज पहले अतिथियों, आश्रितों और पितरों को देकर बचा हुआ अन्न खाता है — उससे बढ़कर सुख क्या है?
श्लोक 32 (3.196.32)
अतो मृष्टतरं नान्यत्पूतं किंचिच्छतक्रतो । दत्त्वा यस्त्वतिथिभ्योऽन्नं भुङ्क्ते तेनैव नित्यशः ॥
ato mṛṣṭataraṃ nānyatpūtaṃ kiṃcicchatakrato | dattvā yastvatithibhyo'nnaṃ bhuṅkte tenaiva nityaśaḥ
हे शतक्रतु, इससे अधिक मधुर और पवित्र कुछ नहीं — अतिथियों को अन्न देकर सदा उसी में से भोजन करना।
श्लोक 33 (3.196.33)
यावतो ह्यन्धसः पिण्डानश्नाति सततं द्विजः । तावतां गोसहस्राणां फलं प्राप्नोति दायकः । यदेनो यौवनकृतं तत्सर्वं नश्यते ध्रुवम् ॥
yāvato hyandhasaḥ piṇḍānaśnāti satataṃ dvijaḥ | tāvatāṃ gosahasrāṇāṃ phalaṃ prāpnoti dāyakaḥ | yadeno yauvanakṛtaṃ tatsarvaṃ naśyate dhruvam
द्विज अन्न के जितने ग्रास खाता है, दाता उतने ही हज़ार गौओं के दान का फल पाता है, और यौवन में किया हुआ उसका सारा पाप निश्चय ही नष्ट हो जाता है।
श्लोक 34 (3.196.34)
सदक्षिणस्य भुक्तस्य द्विजस्य तु करे गतम् । यद्वारि वारिणा सिञ्चेत्तद्ध्येनस्तरते क्षणात् ॥
sadakṣiṇasya bhuktasya dvijasya tu kare gatam | yadvāri vāriṇā siñcettaddhyenastarate kṣaṇāt
भोजन करा चुके और दक्षिणा पाए हुए ब्राह्मण के हाथ में जब जल से जल डाला जाता है, तो उससे मनुष्य क्षण भर में पाप से पार हो जाता है।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 35 (3.196.35)
एताश्चान्याश्च वै बह्वीः कथयित्वा कथाः शुभाः । बकेन सह देवेन्द्र आपृच्छ्य त्रिदिवं गतः ॥
etāścānyāśca vai bahvīḥ kathayitvā kathāḥ śubhāḥ | bakena saha devendra āpṛcchya tridivaṃ gataḥ
बक के साथ ये और ऐसी ही अनेक शुभ कथाएँ कहकर देवेन्द्र उनसे विदा लेकर स्वर्ग चले गए।