Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 197

सुहोत्र ने शिबि को मार्ग दिया

ब्राह्मणों की महिमा सुन लेने के बाद पाण्डव मार्कण्डेय से क्षत्रियों की महिमा पूछते हैं। वे बताते हैं कि कुरुवंशी राजा सुहोत्र और उशीनर-पुत्र शिबि रथों पर आमने-सामने मिले और एक-दूसरे को अपने बराबर समझकर किसी ने मार्ग नहीं छोड़ा। तब नारद प्रकट होकर कठोरता का उत्तर कोमलता से और दुष्टता का उत्तर सज्जनता से देने के विषय में तीन श्लोक कहते हैं और उनमें से अधिक उदार को हट जाने को कहते हैं; सुहोत्र शिबि की प्रदक्षिणा करके उन्हें मार्ग देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।

अध्याय 196अध्याय-सूचीअध्याय 198

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.197.1)

ततः पाण्डवाः पुनर्मार्कण्डेयमूचुः ॥

tataḥ pāṇḍavāḥ punarmārkaṇḍeyamūcuḥ

तब पाण्डवों ने फिर मार्कण्डेय से कहा —

श्लोक 2 (3.197.2)

कथितं ब्राह्मणमहाभाग्यं राजन्यमहाभाग्यमिदानीं शुश्रूषामह इति तानुवाच मार्कण्डेयो महर्षिः श्रूयतामिति इदानीं राजन्यानां महाभाग्यमिति ॥

kathitaṃ brāhmaṇamahābhāgyaṃ rājanyamahābhāgyamidānīṃ śuśrūṣāmaha iti tānuvāca mārkaṇḍeyo maharṣiḥ śrūyatāmiti idānīṃ rājanyānāṃ mahābhāgyamiti

"आपने ब्राह्मणों की महिमा कही; अब हम क्षत्रियों की महिमा सुनना चाहते हैं।" महर्षि मार्कण्डेय ने उनसे कहा — "तो अब क्षत्रियों की महिमा सुनो।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 3 (3.197.3)

कुरूणामन्यतमः सुहोत्रो नाम राजा महर्षीनभिगम्य निवृत्य रथस्थमेव राजानमौशीनरं शिबिं ददर्शाभिमुखं तौ समेत्य परस्परेण यथावयः पूजां प्रयुज्य गुणसाम्येन परस्परेण तुल्यात्मानौ विदित्वान्योन्यस्य पन्थानं न ददतुस्तत्र नारदः प्रादुरासीत् किमिदं भवन्तौ परस्परस्य पन्थानमावृत्य तिष्ठत इति ॥

kurūṇāmanyatamaḥ suhotro nāma rājā maharṣīnabhigamya nivṛtya rathasthameva rājānamauśīnaraṃ śibiṃ dadarśābhimukhaṃ tau sametya paraspareṇa yathāvayaḥ pūjāṃ prayujya guṇasāmyena paraspareṇa tulyātmānau viditvānyonyasya panthānaṃ na dadatustatra nāradaḥ prādurāsīt kimidaṃ bhavantau parasparasya panthānamāvṛtya tiṣṭhata iti

कुरुवंश के सुहोत्र नामक एक राजा महर्षियों के दर्शन करके लौट रहे थे, तब उन्होंने सामने से रथ पर ही आते हुए उशीनर-पुत्र राजा शिबि को देखा। दोनों ने मिलकर आयु के अनुसार एक-दूसरे का सम्मान किया, पर गुणों में एक-दूसरे को अपने बराबर समझकर किसी ने किसी को मार्ग नहीं दिया। तभी वहाँ नारद प्रकट हुए और बोले — "यह क्या? आप दोनों एक-दूसरे का मार्ग रोककर क्यों खड़े हैं?"

श्लोक 4 (3.197.4)

तावूचतुर्नारद नैतद् भगवन् पूर्वकर्मकर्त्रादिभिर्विशिष्टस्य पन्था उपदिश्यते समर्थाय वा आवां च सख्यं परस्परेणोपगतौ तच्चावधानतोऽत्युत्कृष्टमधरोत्तरं परिभ्रष्टं नारदस्त्वेवमुक्तः श्लोकत्रयमपठत् ॥

tāvūcaturnārada naitad bhagavan pūrvakarmakartrādibhirviśiṣṭasya panthā upadiśyate samarthāya vā āvāṃ ca sakhyaṃ paraspareṇopagatau taccāvadhānato'tyutkṛṣṭamadharottaraṃ paribhraṣṭaṃ nāradastvevamuktaḥ ślokatrayamapaṭhat

दोनों ने कहा — "भगवन् नारद, बात ऐसी नहीं है। नियम यह है कि जो पूर्व कर्मों आदि में बढ़कर हो, या जो अधिक समर्थ हो, उसे मार्ग दिया जाता है। पर हम दोनों आपस में मित्र बन गए हैं, और ध्यान से देखने पर ऊँच-नीच का प्रश्न ही पूरी तरह मिट जाता है।" ऐसा कहे जाने पर नारद ने तीन श्लोक पढ़े —

नारद उवाच

श्लोक 5 (3.197.5)

क्रूरः कौरव्य मृदवे मृदुः क्रूरे च कौरव । साधुश्चासाधवे साधुः साधवे नाप्नुयात् कथम् ॥

krūraḥ kauravya mṛdave mṛduḥ krūre ca kaurava | sādhuścāsādhave sādhuḥ sādhave nāpnuyāt katham

"हे कौरव्य, क्रूर व्यक्ति कोमल के प्रति भी क्रूर होता है; हे कौरव, कोमल व्यक्ति क्रूर के प्रति भी कोमल होता है; सज्जन दुर्जन के प्रति भी सज्जन होता है — तो वह सज्जन के प्रति सज्जन क्यों न होगा?

श्लोक 6 (3.197.6)

कृतं शतगुणं कुर्यान्नास्ति देवेषु निर्णयः । औशीनरः साधुशीलो भवतो वै महीपतिः ॥

kṛtaṃ śataguṇaṃ kuryānnāsti deveṣu nirṇayaḥ | auśīnaraḥ sādhuśīlo bhavato vai mahīpatiḥ

किए गए उपकार का सौ गुना बदला देना चाहिए; देवताओं में भी इसका कोई बँधा नियम नहीं है। यह उशीनर-पुत्र भूपति तुमसे अधिक सुशील है।

श्लोक 7 (3.197.7)

जयेत् कदर्यं दानेन सत्येनानृतवादिनम् । क्षमया क्रूरकर्माणमसाधुं साधुना जयेत् ॥

jayet kadaryaṃ dānena satyenānṛtavādinam | kṣamayā krūrakarmāṇamasādhuṃ sādhunā jayet

कंजूस को दान से जीते, झूठ बोलने वाले को सत्य से; क्रूर कर्म करने वाले को क्षमा से जीते और दुर्जन को सज्जनता से।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 8 (3.197.8)

तदुभावेव भवन्तावुदारौ य इदानीं भवद्भ्यामन्यतमः सोऽपसर्पतु एतद् वै निदर्शनमित्युक्त्वा तूष्णीं नारदो बभूव । एतच्छ्रुत्वा तु कौरव्यः शिबिं प्रदक्षिणं कृत्वा पन्थानं दत्त्वा बहुकर्मभिः प्रशस्य प्रययौ ॥

tadubhāveva bhavantāvudārau ya idānīṃ bhavadbhyāmanyatamaḥ so'pasarpatu etad vai nidarśanamityuktvā tūṣṇīṃ nārado babhūva | etacchrutvā tu kauravyaḥ śibiṃ pradakṣiṇaṃ kṛtvā panthānaṃ dattvā bahukarmabhiḥ praśasya prayayau

"आप दोनों ही उदार हैं। अब आप दोनों में से जो कोई भी हो, वह हट जाए; यही इसका प्रमाण होगा।" यह कहकर नारद मौन हो गए। यह सुनकर कुरुवंशी राजा ने शिबि की प्रदक्षिणा की, उन्हें मार्ग दिया, उनके अनेक कर्मों की प्रशंसा की और आगे चले गए।

श्लोक 9 (3.197.9)

तदेतद् राज्ञो महाभाग्यमप्युक्तवान् नारदः ॥

tadetad rājño mahābhāgyamapyuktavān nāradaḥ

इस प्रकार नारद ने राजा की यह महिमा बताई।

अध्याय 196अध्याय-सूचीअध्याय 198