आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 198
ययाति का सहस्र गोदान
मार्कण्डेय एक राजा की महिमा की एक और कथा सुनाते हैं। गुरुदक्षिणा जुटाने निकला एक ब्राह्मण नहुष-पुत्र ययाति के पास आकर एक शर्त पर याचना करना चाहता है — क्योंकि माँगे जाने पर मन में द्वेष उपजता है, तो राजा किस भाव से देंगे? ययाति उत्तर देते हैं कि वे दान देकर उसका बखान नहीं करते, अनुचित याचना का वचन नहीं देते और देकर प्रसन्न होते हैं; और वे ब्राह्मण को एक हज़ार गौएँ दे देते हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.198.1)
इदमन्यच्छ्रूयतां ययातिर्नाहुषो राजा राज्यस्थः पौरजनावृत आसांचक्रे । गुर्वर्थी ब्राह्मण उपेत्याब्रवीत् भो राजन्गुर्वर्थं भिक्षेयं समयादिति ॥
idamanyacchrūyatāṃ yayātirnāhuṣo rājā rājyasthaḥ paurajanāvṛta āsāṃcakre | gurvarthī brāhmaṇa upetyābravīt bho rājangurvarthaṃ bhikṣeyaṃ samayāditi
यह दूसरी कथा सुनो। नहुष-पुत्र राजा ययाति राजसिंहासन पर पुरवासियों से घिरे बैठे थे। गुरुदक्षिणा चाहने वाला एक ब्राह्मण उनके पास आया और बोला — "राजन्, मैं गुरुदक्षिणा के लिए एक शर्त पर आपसे याचना करना चाहता हूँ।"
राजोवाच
श्लोक 2 (3.198.2)
ब्रवीतु भगवान्समयमिति ॥
bravītu bhagavānsamayamiti
"पूज्यवर, शर्त बताइए।"
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 3 (3.198.3)
विद्वेषणं परमं जीवलोके । कुर्यान्नरः पार्थिव याच्यमानः । तं त्वां पृच्छामि कथं तु राज- । न्दद्याद्भवान्दयितं च मेऽद्य ॥
vidveṣaṇaṃ paramaṃ jīvaloke | kuryānnaraḥ pārthiva yācyamānaḥ | taṃ tvāṃ pṛcchāmi kathaṃ tu rāja- | ndadyādbhavāndayitaṃ ca me'dya
"हे राजन्, इस जीव-लोक में जिससे याचना की जाती है, उसके मन में याचक के प्रति घोर द्वेष उपज आता है। इसलिए मैं आपसे पूछता हूँ — आप आज मुझे मेरी प्रिय वस्तु किस भाव से देंगे?"
राजोवाच
श्लोक 4 (3.198.4)
न चानुकीर्तये दद्य दत्त्वा । अयाच्यमर्थं न च संशृणोमि । प्राप्यमर्थं च संश्रुत्य । तं चापि दत्त्वा सुसुखी भवामि ॥
na cānukīrtaye dadya dattvā | ayācyamarthaṃ na ca saṃśṛṇomi | prāpyamarthaṃ ca saṃśrutya | taṃ cāpi dattvā susukhī bhavāmi
"हे दान के योग्य, मैं देकर उसका बखान नहीं करता; और जो माँगने योग्य नहीं, उसका वचन भी नहीं देता। जो वस्तु उचित रूप से पाने योग्य हो, उसका वचन देकर और उसे दे भी देकर मैं बहुत सुखी होता हूँ।
श्लोक 5 (3.198.5)
ददामि ते रोहिणीनां सहस्रं । प्रियो हि मे ब्राह्मणो याचमानः । न मे मनः कुप्यति याचमाने । दत्तं न शोचामि कदाचिदर्थम् ॥
dadāmi te rohiṇīnāṃ sahasraṃ | priyo hi me brāhmaṇo yācamānaḥ | na me manaḥ kupyati yācamāne | dattaṃ na śocāmi kadācidartham
मैं तुम्हें एक हज़ार लाल गौएँ देता हूँ, क्योंकि याचना करने वाला ब्राह्मण मुझे प्रिय है। माँगने वाले पर मेरा मन कभी क्रुद्ध नहीं होता, और दिए हुए धन के लिए मैं कभी शोक नहीं करता।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 6 (3.198.6)
इत्युक्त्वा ब्राह्मणाय राजा गोसहस्रं ददौ । प्राप्तवांश्च गवां सहस्रं ब्राह्मण इति ॥
ityuktvā brāhmaṇāya rājā gosahasraṃ dadau | prāptavāṃśca gavāṃ sahasraṃ brāhmaṇa iti
यह कहकर राजा ने ब्राह्मण को एक हज़ार गौएँ दीं, और ब्राह्मण ने वे हज़ार गौएँ प्राप्त कीं।