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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 199

वृषदर्भ का गुप्त व्रत

युधिष्ठिर मार्कण्डेय से राजाओं की महिमा और सुनाने को कहते हैं, और मार्कण्डेय वृषदर्भ और सेदुक नामक दो राजाओं की कथा सुनाते हैं। गुरुदक्षिणा के लिए हज़ार घोड़े माँगने आए एक ब्राह्मण को सेदुक, स्वयं देने में असमर्थ होकर, वृषदर्भ के पास भेजते हैं, जो बचपन से एक गुप्त व्रत का पालन करते हैं। वृषदर्भ ब्राह्मण को कोड़े से मारते हैं, और जब ब्राह्मण शाप देने लगता है तो वे अपनी बात समझाकर उसे उस दिन की सारी आय दे देते हैं, जो हज़ार घोड़ों के मूल्य से भी अधिक थी।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.199.1)

भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डवः ॥

bhūya eva mahābhāgyaṃ kathyatāmityabravīt pāṇḍavaḥ

पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने कहा — "राजाओं की महिमा और भी सुनाइए।"

श्लोक 2 (3.199.2)

अथाचष्ट मार्कण्डेयो महाराज वृषदर्भसेदुकनामानौ राजानौ नीतिमार्गरतावस्त्रोपास्त्रकृतिनौ ॥

athācaṣṭa mārkaṇḍeyo mahārāja vṛṣadarbhasedukanāmānau rājānau nītimārgaratāvastropāstrakṛtinau

तब मार्कण्डेय ने यह कथा सुनाई — "महाराज, वृषदर्भ और सेदुक नाम के दो राजा थे। दोनों नीति के मार्ग पर चलते थे और अस्त्रों तथा उपास्त्रों के चलाने में निपुण थे।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 3 (3.199.3)

सेदुको वृषदर्भस्य बालस्यैव उपांशुव्रतमभ्यजानात् कुप्यमदेयं ब्राह्मणस्य ॥

seduko vṛṣadarbhasya bālasyaiva upāṃśuvratamabhyajānāt kupyamadeyaṃ brāhmaṇasya

सेदुक जानते थे कि वृषदर्भ बचपन से ही एक गुप्त व्रत का पालन करते हैं — ब्राह्मण को साधारण धातु नहीं देनी चाहिए।

श्लोक 4 (3.199.4)

अथ तं सेदुकं ब्राह्मणः कश्चिद् वेदाध्ययनसम्पन्न आशिषं दत्त्वा गुर्वर्थी भिक्षितवान् ॥

atha taṃ sedukaṃ brāhmaṇaḥ kaścid vedādhyayanasampanna āśiṣaṃ dattvā gurvarthī bhikṣitavān

एक बार वेदाध्ययन में निपुण कोई ब्राह्मण सेदुक के पास आया और आशीर्वाद देकर गुरुदक्षिणा के लिए याचना करने लगा।

श्लोक 5 (3.199.5)

अश्वसहस्रं मे भवान् ददात्विति तं सेदुको ब्राह्मणमब्रवीत् ॥

aśvasahasraṃ me bhavān dadātviti taṃ seduko brāhmaṇamabravīt

उसने कहा — "आप मुझे एक हज़ार घोड़े दीजिए।" सेदुक ने ब्राह्मण से कहा —

सेदुक उवाच

श्लोक 6 (3.199.6)

नास्ति सम्भवो गुर्वर्थं दातुमिति ॥

nāsti sambhavo gurvarthaṃ dātumiti

"मेरे लिए आपकी गुरुदक्षिणा दे पाना सम्भव नहीं है।

श्लोक 7 (3.199.7)

स त्वं गच्छ वृषदर्भसकाशम् । राजा परमधर्मज्ञो ब्राह्मण तं भिक्षस्व । स ते दास्यति तस्यैतदुपांशुव्रतमिति ॥

sa tvaṃ gaccha vṛṣadarbhasakāśam | rājā paramadharmajño brāhmaṇa taṃ bhikṣasva | sa te dāsyati tasyaitadupāṃśuvratamiti

आप वृषदर्भ के पास जाइए। वह राजा धर्म को भली-भाँति जानते हैं। हे ब्राह्मण, उन्हीं से माँगिए; वे आपको अवश्य देंगे। यही उनका गुप्त व्रत है।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 8 (3.199.8)

अथ ब्राह्मणो वृषदर्भसकाशं गत्वा अश्वसहस्रमयाचत् । स राजा तं कशेनाताडयत् ॥

atha brāhmaṇo vṛṣadarbhasakāśaṃ gatvā aśvasahasramayācat | sa rājā taṃ kaśenātāḍayat

तब ब्राह्मण वृषदर्भ के पास गया और उनसे हज़ार घोड़े माँगे। राजा ने उसे कोड़े से मारा।

श्लोक 9 (3.199.9)

तं ब्राह्मणोऽब्रवीत् । किं हंस्यनागसं मामिति ॥

taṃ brāhmaṇo'bravīt | kiṃ haṃsyanāgasaṃ māmiti

ब्राह्मण ने उनसे कहा — "मैंने कोई अपराध नहीं किया, फिर आप मुझे क्यों मारते हैं?"

श्लोक 10 (3.199.10)

एवमुक्त्वा तं शपन्तं राजाऽऽह । विप्र किं यो न ददाति तुभ्यमुताहोस्विद् ब्राह्मण्यमेतत् ॥

evamuktvā taṃ śapantaṃ rājā''ha | vipra kiṃ yo na dadāti tubhyamutāhosvid brāhmaṇyametat

यह कहकर जब वह शाप देने लगा, तो राजा बोले — "हे विप्र, जो तुम्हें दान नहीं देता, क्या तुम उसे शाप देते हो? या यही ब्राह्मणत्व है?"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 11 (3.199.11)

राजाधिराज तव समीपं सेदुकेन प्रेषितो भिक्षितुमागतः । तेनानुशिष्टेन मया त्वं भिक्षितोऽसि ॥

rājādhirāja tava samīpaṃ sedukena preṣito bhikṣitumāgataḥ | tenānuśiṣṭena mayā tvaṃ bhikṣito'si

"हे राजाधिराज, सेदुक ने मुझे आपके पास भेजा है और मैं याचना करने आया हूँ। उन्हीं के कहने पर मैंने आपसे माँगा है।"

राजोवाच

श्लोक 12 (3.199.12)

पूर्वाह्णे ते दास्यामि । यो मेऽद्य बलिरागमिष्यति । यो हन्यते कशया कथं मोघं क्षेपणं तस्य स्यात् ॥

pūrvāhṇe te dāsyāmi | yo me'dya balirāgamiṣyati | yo hanyate kaśayā kathaṃ moghaṃ kṣepaṇaṃ tasya syāt

"आज जो भी कर मेरे पास आएगा, वह मैं तुम्हें पूर्वाह्ण में दे दूँगा। जिसे मेरा कोड़ा लगे, उसके लिए वह प्रहार व्यर्थ कैसे हो सकता है?"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 13 (3.199.13)

इत्युक्त्वा ब्राह्मणाय दैवसिकामुत्पत्तिं प्रादात् । अधिकस्याश्वसहस्रस्य मूल्यमेवादादिति ॥

ityuktvā brāhmaṇāya daivasikāmutpattiṃ prādāt | adhikasyāśvasahasrasya mūlyamevādāditi

यह कहकर राजा ने ब्राह्मण को उस दिन की सारी आय दे दी। उन्होंने जो दिया, उसका मूल्य हज़ार घोड़ों से भी अधिक था।

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