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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 200

शिबि द्वारा बाज़ से कबूतर की रक्षा

मार्कण्डेय बताते हैं कि देवताओं ने उशीनर-पुत्र राजा शिबि की परीक्षा लेने का निश्चय किया: अग्नि कबूतर बने और इन्द्र उसका पीछा करते हुए बाज़, और कबूतर शरण माँगते हुए राजा की गोद में आ गिरा। शिबि कबूतर को सौंपने से इनकार करते हैं, बाज़ को उसके बदले बैल देने की पेशकश करते हैं, और अंत में बाज़ के कहने पर अपना मांस काट-काटकर तराज़ू पर रखते हैं और कबूतर के बराबर तौल पूरी करने के लिए स्वयं तराज़ू पर चढ़ जाते हैं। तब देवता प्रकट होकर घाव को सुवर्ण-जैसा शुभ चिह्न बना देते हैं और उन्हें कपोतरोमा नामक पुत्र का वरदान देते हैं।

अध्याय 199अध्याय-सूचीअध्याय 201

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.200.1)

देवानां कथा संजाता महीतलं गत्वा महीपतिं शिबिमौशीनरं साध्वेनं शिबिं जिज्ञास्याम इति । एवं भो इत्युक्त्वा अग्नीन्द्रावुपतिष्ठेताम् ॥

devānāṃ kathā saṃjātā mahītalaṃ gatvā mahīpatiṃ śibimauśīnaraṃ sādhvenaṃ śibiṃ jijñāsyāma iti | evaṃ bho ityuktvā agnīndrāvupatiṣṭhetām

देवताओं में चर्चा हुई: "चलो, पृथ्वी पर जाकर उशीनर-पुत्र राजा शिबि की परीक्षा लें कि वे सचमुच कितने साधु हैं।" "ऐसा ही हो" कहकर अग्नि और इन्द्र चल पड़े।

श्लोक 2 (3.200.2)

अग्निः कपोतरूपेण तमभ्यधावदामिषार्थमिन्द्रः श्येनरूपेण ॥

agniḥ kapotarūpeṇa tamabhyadhāvadāmiṣārthamindraḥ śyenarūpeṇa

अग्नि कबूतर का रूप धरकर राजा की ओर भागे, और इन्द्र बाज़ बनकर मांस के लिए उसका पीछा करने लगे।

श्लोक 3 (3.200.3)

अथ कपोतो राज्ञो दिव्यासनासीनस्योत्सङ्गं न्यपतत् ॥

atha kapoto rājño divyāsanāsīnasyotsaṅgaṃ nyapatat

तब वह कबूतर दिव्य आसन पर बैठे राजा की गोद में आ गिरा।

श्लोक 4 (3.200.4)

अथ पुरोहितो राजानमब्रवीत् । प्राणरक्षार्थं श्येनाद्भीतो भवन्तं प्राणार्थी प्रपद्यते ॥

atha purohito rājānamabravīt | prāṇarakṣārthaṃ śyenādbhīto bhavantaṃ prāṇārthī prapadyate

तब पुरोहित ने राजा से कहा — "बाज़ से डरा हुआ यह पक्षी प्राण बचाने के लिए आपकी शरण में आया है।

पुरोहित उवाच

श्लोक 5 (3.200.5)

वसु ददातु अन्तवान्पार्थिवोऽस्य निष्कृतिं कुर्यात् घोरं कपोतस्य निपातमाहुः ॥

vasu dadātu antavānpārthivo'sya niṣkṛtiṃ kuryāt ghoraṃ kapotasya nipātamāhuḥ

महाराज धन का दान करें। दिशाओं के अंत तक राज्य करने वाले राजा को इसका प्रायश्चित्त करना चाहिए, क्योंकि कबूतर का इस प्रकार आ गिरना बड़ा अशुभ माना जाता है।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 6 (3.200.6)

अथ कपोतो राजानमब्रवीत् । प्राणरक्षणार्थं श्येनाद्भीतो भवन्तं प्राणार्थी प्रपद्ये अङ्गैरङ्गानि प्राप्यार्थी मुनिर्भूत्वा प्राणांस्त्वां प्रपद्ये ॥

atha kapoto rājānamabravīt | prāṇarakṣaṇārthaṃ śyenādbhīto bhavantaṃ prāṇārthī prapadye aṅgairaṅgāni prāpyārthī munirbhūtvā prāṇāṃstvāṃ prapadye

तब कबूतर ने राजा से कहा — "बाज़ से डरकर मैं प्राण बचाने के लिए आपकी शरण में आया हूँ। मैं वास्तव में एक मुनि हूँ, जो अपने अंगों सहित इन अंगों में प्रविष्ट हुआ है। जीवन चाहता हुआ मैं आपकी शरण लेता हूँ — आप ही मेरे प्राण हैं।

कपोत उवाच

श्लोक 7 (3.200.7)

स्वाध्यायेन कर्शितं ब्रह्मचारिणं मां विद्धि । तपसा दमेन युक्तमाचार्यस्याप्रतिकूलभाषिणम् । एवंयुक्तमपापं मां विद्धि ॥

svādhyāyena karśitaṃ brahmacāriṇaṃ māṃ viddhi | tapasā damena yuktamācāryasyāpratikūlabhāṣiṇam | evaṃyuktamapāpaṃ māṃ viddhi

मुझे स्वाध्याय से दुर्बल हुआ ब्रह्मचारी जानिए — तप और इन्द्रिय-संयम से युक्त, और गुरु के विरुद्ध कभी न बोलने वाला। ऐसे गुणों वाले मुझको निष्पाप जानिए।

श्लोक 8 (3.200.8)

गदामि वेदान्विचिनोमि छन्दः । सर्वेवेदा अक्षरशो मे अधीताः । न साधु दानं श्रोत्रियस्य प्रदानं । मा प्रादाः श्येनाय न कपोतोऽस्मि ॥

gadāmi vedānvicinomi chandaḥ | sarvevedā akṣaraśo me adhītāḥ | na sādhu dānaṃ śrotriyasya pradānaṃ | mā prādāḥ śyenāya na kapoto'smi

मैं वेदों का पाठ करता हूँ और छन्दों का अध्ययन करता हूँ; मैंने सभी वेद अक्षर-अक्षर पढ़े हैं। किसी श्रोत्रिय को सौंप देना उचित दान नहीं है। मुझे बाज़ को न दीजिए — मैं कबूतर नहीं हूँ।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 9 (3.200.9)

अथ श्येनो राजानमब्रवीत् ॥

atha śyeno rājānamabravīt

तब बाज़ ने राजा से कहा —

श्येन उवाच

श्लोक 10 (3.200.10)

पर्यायेण वसतिर्वा भवेषु । सर्गे जातः पूर्वमस्मात्कपोतात् । त्वमाददानोऽथ कपोतमेनं । मा त्वं राजन्विघ्नकर्ता भवेथाः ॥

paryāyeṇa vasatirvā bhaveṣu | sarge jātaḥ pūrvamasmātkapotāt | tvamādadāno'tha kapotamenaṃ | mā tvaṃ rājanvighnakartā bhavethāḥ

"जन्म-जन्मान्तरों में प्राणी बारी-बारी से निवास करते हैं; पूर्व सृष्टि में तुम इसी कबूतर से उत्पन्न हुए थे। इसलिए इस कबूतर को अपनाकर, हे राजन्, मेरे आहार में बाधक मत बनो।"

राजोवाच

श्लोक 11 (3.200.11)

केनेदृशी जातु परा हि दृष्टा । वागुच्यमाना शकुनेन संस्कृता । यां वै कपोतो वदते यां च श्येन । उभौ विदित्वा कथमस्तु साधु ॥

kenedṛśī jātu parā hi dṛṣṭā | vāgucyamānā śakunena saṃskṛtā | yāṃ vai kapoto vadate yāṃ ca śyena | ubhau viditvā kathamastu sādhu

"किसने कभी ऐसा देखा है कि कोई पक्षी ऐसी परिष्कृत वाणी बोले? कबूतर जो कहता है और बाज़ जो कहता है, दोनों को जानकर मैं उचित काम कैसे करूँ?

श्लोक 12 (3.200.12)

नास्य वर्षं वर्षति वर्षकाले । नास्य बीजं रोहति काल उप्तम् । भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे । न त्राणं लभेत्त्राणमिच्छन्स काले ॥

nāsya varṣaṃ varṣati varṣakāle | nāsya bījaṃ rohati kāla uptam | bhītaṃ prapannaṃ yo hi dadāti śatrave | na trāṇaṃ labhettrāṇamicchansa kāle

जो शरण में आए भयभीत प्राणी को उसके शत्रु के हाथ सौंप देता है, उसके लिए वर्षा-ऋतु में वर्षा नहीं होती, समय पर बोया बीज नहीं उगता, और संकट के समय रक्षा चाहने पर उसे स्वयं कोई रक्षा नहीं मिलती।

श्लोक 13 (3.200.13)

जाता ह्रस्वा प्रजा प्रमीयते । सदा न वासं पितरोऽस्य कुर्वते । भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे । नास्य देवाः प्रतिगृह्णन्ति हव्यम् ॥

jātā hrasvā prajā pramīyate | sadā na vāsaṃ pitaro'sya kurvate | bhītaṃ prapannaṃ yo hi dadāti śatrave | nāsya devāḥ pratigṛhṇanti havyam

जो शरणागत भयभीत प्राणी को शत्रु के हाथ सौंप देता है, उसकी संतान छोटी अवस्था में ही मर जाती है, उसके पितरों को कभी ठौर नहीं मिलता, और देवता उसकी आहुति स्वीकार नहीं करते।

श्लोक 14 (3.200.14)

मोघमन्नं विन्दति चाप्रचेताः । स्वर्गाल्लोकाद्भ्रश्यति शीघ्रमेव । भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे । सेन्द्रा देवाः प्रहरन्त्यस्य वज्रम् ॥

moghamannaṃ vindati cāpracetāḥ | svargāllokādbhraśyati śīghrameva | bhītaṃ prapannaṃ yo hi dadāti śatrave | sendrā devāḥ praharantyasya vajram

जो शरणागत भयभीत प्राणी को शत्रु के हाथ सौंप देता है, वह अनुदार व्यक्ति व्यर्थ ही अन्न पाता है, शीघ्र ही स्वर्गलोक से गिर जाता है, और इन्द्र सहित देवता उस पर वज्र का प्रहार करते हैं।

श्लोक 15 (3.200.15)

उक्षाणं पक्त्वा सह ओदनेन । अस्मात्कपोतात्प्रति ते नयन्तु । यस्मिन्देशे रमसेऽतीव श्येन । तत्रमांसं शिवयस्ते वहन्तु ॥

ukṣāṇaṃ paktvā saha odanena | asmātkapotātprati te nayantu | yasmindeśe ramase'tīva śyena | tatramāṃsaṃ śivayaste vahantu

इस कबूतर के बदले लोग चावल के साथ एक बैल पकाकर तुम्हारे पास ले आएँ। हे बाज़, जिस स्थान पर तुम्हें सबसे अधिक आनन्द मिले, शिबि-देश के लोग वहीं वह मांस तुम्हारे लिए पहुँचा दें।"

श्येन उवाच

श्लोक 16 (3.200.16)

नोक्षाणो राजन्प्रार्थयेयं न चान्य- । दस्मान्मांसमधिकं वा कपोतात् । देवैर्दत्तः सोऽद्य ममैष भक्ष- । स्तन्मे ददस्व शकुनानामभावात् ॥

nokṣāṇo rājanprārthayeyaṃ na cānya- | dasmānmāṃsamadhikaṃ vā kapotāt | devairdattaḥ so'dya mamaiṣa bhakṣa- | stanme dadasva śakunānāmabhāvāt

"हे राजन्, न मैं बैल चाहता हूँ, न इस कबूतर से अधिक कोई और मांस। आज देवताओं ने यही मुझे भोजन के रूप में दिया है। इसे मुझे दे दो, क्योंकि पक्षियों का वध ही मेरा आहार है।"

राजोवाच

श्लोक 17 (3.200.17)

उक्षाणं वेहतमनूनं नयन्तु । ते पश्यन्तु पुरुषा ममैव । भयाहितस्य दायं ममान्तिकात्त्वां । प्रत्याम्नायं तु त्वं ह्येनं मा हिंसीः ॥

ukṣāṇaṃ vehatamanūnaṃ nayantu | te paśyantu puruṣā mamaiva | bhayāhitasya dāyaṃ mamāntikāttvāṃ | pratyāmnāyaṃ tu tvaṃ hyenaṃ mā hiṃsīḥ

"मेरे लोग तुम्हारे लिए एक पूरा, सर्वांग-सम्पन्न बैल या बाँझ गाय ले आएँ और स्वयं उसकी देखरेख करें; भय से ग्रस्त इस प्राणी के बदले, उसके प्रतिदान के रूप में, वे उसे मेरी ओर से तुम्हें दें। पर इसे मत मारो।

श्लोक 18 (3.200.18)

त्यजे प्राणान्नैव दद्यां कपोतं । सौम्यो ह्ययं किं न जानासि श्येन । यथा क्लेशं मा कुरुष्वेह सौम्य । नाहं कपोतमर्पयिष्ये कथंचित् ॥

tyaje prāṇānnaiva dadyāṃ kapotaṃ | saumyo hyayaṃ kiṃ na jānāsi śyena | yathā kleśaṃ mā kuruṣveha saumya | nāhaṃ kapotamarpayiṣye kathaṃcit

मैं प्राण त्याग दूँगा, पर कबूतर कभी नहीं दूँगा। हे बाज़, क्या तुम नहीं देखते कि यह कितना कोमल है? इसलिए हे सौम्य, यहाँ व्यर्थ कष्ट मत करो; मैं किसी भी प्रकार कबूतर को नहीं सौंपूँगा।

श्लोक 19 (3.200.19)

यथा मां वै साधुवादैः प्रसन्नाः । प्रशंसेयुः शिबयः कर्मणा तु । यथा श्येन प्रियमेव कुर्यां । प्रशाधि मां यद्वदेस्तत्करोमि ॥

yathā māṃ vai sādhuvādaiḥ prasannāḥ | praśaṃseyuḥ śibayaḥ karmaṇā tu | yathā śyena priyameva kuryāṃ | praśādhi māṃ yadvadestatkaromi

मुझे बताओ कि मैं ऐसा क्या करूँ जिससे शिबि-जन मेरे कर्म से प्रसन्न होकर साधुवाद देते हुए मेरी प्रशंसा करें, और हे बाज़, तुम्हारा भी प्रिय हो। मुझे आज्ञा दो; तुम जो कहोगे, मैं वही करूँगा।"

श्येन उवाच

श्लोक 20 (3.200.20)

ऊरोर्दक्षिणादुत्कृत्य स्वपिशितं तावद्राजन्यावन्मांसं कपोतेन समम् । तथा तस्मात्साधु त्रातः कपोतः प्रशंसेयुश्च शिबयः कृतं च प्रियं स्यान्ममेति ॥

ūrordakṣiṇādutkṛtya svapiśitaṃ tāvadrājanyāvanmāṃsaṃ kapotena samam | tathā tasmātsādhu trātaḥ kapotaḥ praśaṃseyuśca śibayaḥ kṛtaṃ ca priyaṃ syānmameti

"हे राजन्, अपनी दाहिनी जाँघ से उतना मांस काटकर दो जितना इस कबूतर के बराबर हो। इस प्रकार कबूतर की भली-भाँति रक्षा हो जाएगी, शिबि-जन तुम्हारी प्रशंसा करेंगे और मेरा भी प्रिय हो जाएगा।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 21 (3.200.21)

अथ स दक्षिणादूरोरुत्कृत्य स्वमांसपेशीं तुलयाधारयत् । गुरुतर एव कपोत आसीत् ॥

atha sa dakṣiṇādūrorutkṛtya svamāṃsapeśīṃ tulayādhārayat | gurutara eva kapota āsīt

तब राजा ने अपनी दाहिनी जाँघ से मांस का एक टुकड़ा काटकर तराज़ू पर तौला। कबूतर फिर भी भारी निकला।

श्लोक 22 (3.200.22)

पुनरन्यमुच्चकर्त गुरुतर एव कपोतः । एवं सर्वं समधिकृत्य शरीरं तुलायामारोपयामास तत्तथापि गुरुतर एव कपोत आसीत् ॥

punaranyamuccakarta gurutara eva kapotaḥ | evaṃ sarvaṃ samadhikṛtya śarīraṃ tulāyāmāropayāmāsa tattathāpi gurutara eva kapota āsīt

उन्होंने दूसरा टुकड़ा काटा; कबूतर फिर भी भारी रहा। इस प्रकार उन्होंने अपना सारा शरीर काट-काटकर तराज़ू पर चढ़ा दिया, फिर भी कबूतर ही भारी रहा।

श्लोक 23 (3.200.23)

अथ राजा स्वयमेव तुलामारुरोह । न च व्यलीकमासीद्राज्ञ एतद्वृत्तान्तं दृष्ट्वा त्रात इत्युक्त्वा प्रालीयत श्येनः अथ राजा अब्रवीत् ॥

atha rājā svayameva tulāmāruroha | na ca vyalīkamāsīdrājña etadvṛttāntaṃ dṛṣṭvā trāta ityuktvā prālīyata śyenaḥ atha rājā abravīt

तब राजा स्वयं तराज़ू पर चढ़ गए, और उनके मन में ज़रा भी खेद नहीं हुआ। यह देखकर बाज़ "वह बच गया" कहकर अदृश्य हो गया। तब राजा ने कहा —

राजोवाच

श्लोक 24 (3.200.24)

कपोतं विद्युः शिवयस्त्वां कपोत । पृच्छामि ते शकुने को नु श्येनः । नानीश्वर ईदृशं जातु कुर्या- । देतं प्रश्नं भगवन्मे विचक्ष्व ॥

kapotaṃ vidyuḥ śivayastvāṃ kapota | pṛcchāmi te śakune ko nu śyenaḥ | nānīśvara īdṛśaṃ jātu kuryā- | detaṃ praśnaṃ bhagavanme vicakṣva

"हे कपोत, शिबि-जन तुम्हें कबूतर ही समझेंगे; पर हे पक्षी, मैं तुमसे पूछता हूँ — वह बाज़ कौन था? कोई साधारण प्राणी ऐसा कभी नहीं कर सकता। हे भगवन्, मेरे इस प्रश्न का उत्तर दीजिए।"

कपोत उवाच

श्लोक 25 (3.200.25)

वैश्वानरोऽहं ज्वलनो धूमकेतु- । रथैव श्येनो वज्रहस्तः शचीपतिः । साधु ज्ञातुं त्वामृषभं सौरथेय । नौ जिज्ञासया त्वत्सकाशंप्रपन्नौ ॥

vaiśvānaro'haṃ jvalano dhūmaketu- | rathaiva śyeno vajrahastaḥ śacīpatiḥ | sādhu jñātuṃ tvāmṛṣabhaṃ sauratheya | nau jijñāsayā tvatsakāśaṃprapannau

"मैं वैश्वानर हूँ, धूम जिसकी ध्वजा है वह प्रज्वलित अग्नि; और वह बाज़ वज्रधारी शचीपति इन्द्र थे। हे सुरथा-पुत्र, हे नरश्रेष्ठ, हम दोनों तुम्हें भली-भाँति परखने के लिए तुम्हारे पास आए थे।

श्लोक 26 (3.200.26)

यामेतां पेशीं मम निष्क्रयाय । प्रादाद्भवानसिनोत्कृत्य राजन् । एतद्वो लक्ष्म शिवं करोमि । हिरण्यवर्णं रुचिरं पुण्यगन्धम् ॥

yāmetāṃ peśīṃ mama niṣkrayāya | prādādbhavānasinotkṛtya rājan | etadvo lakṣma śivaṃ karomi | hiraṇyavarṇaṃ ruciraṃ puṇyagandham

हे राजन्, मेरे बदले चुकाने के लिए तुमने तलवार से काटकर जो मांस का टुकड़ा दिया, उसे मैं तुम्हारे शरीर पर एक शुभ चिह्न बना देता हूँ — सुनहरे रंग का, सुन्दर और पवित्र सुगन्ध वाला।

श्लोक 27 (3.200.27)

एतासां प्रजानां पालयिता यशस्वी । सुरर्षीणामथ संमतो भृशम् । एतस्मात्पार्श्वात्पुरुषो जनिष्यति । कपोतरोमेति च तस्य नाम ॥

etāsāṃ prajānāṃ pālayitā yaśasvī | surarṣīṇāmatha saṃmato bhṛśam | etasmātpārśvātpuruṣo janiṣyati | kapotarometi ca tasya nāma

तुम्हारी इसी पसली से एक पुरुष उत्पन्न होगा, जो इन प्रजाओं का पालन करेगा, यशस्वी होगा और देवर्षियों में अत्यंत सम्मानित होगा; उसका नाम कपोतरोमा होगा।

श्लोक 28 (3.200.28)

कपोतरोमाणं शिबिनौद्भिदं पुत्रं प्राप्स्यसि नृपवृषसंहननं यशोदीप्यमानं द्रष्टासि शूरमृषभं सौरथानाम् ॥

kapotaromāṇaṃ śibinaudbhidaṃ putraṃ prāpsyasi nṛpavṛṣasaṃhananaṃ yaśodīpyamānaṃ draṣṭāsi śūramṛṣabhaṃ saurathānām

हे राजन्, तुम्हें अपने शरीर से प्रकट हुआ कपोतरोमा नामक पुत्र प्राप्त होगा; तुम उसे वृषभ-जैसे सुदृढ़ शरीर वाला, यश से दमकता हुआ, शूरवीर और सुरथवंशियों में श्रेष्ठ देखोगे।"

अध्याय 199अध्याय-सूचीअध्याय 201