आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 201
चार राजभाइयों पर नारद का निर्णय; शिबि का पुत्र-दान
मार्कण्डेय बताते हैं कि विश्वामित्र-पुत्र अष्टक अपने अश्वमेध यज्ञ के बाद अपने भाइयों प्रतर्दन, वसुमना और शिबि के साथ रथ से लौट रहे थे और उन्होंने नारद को भी रथ पर बिठा लिया। यह पूछे जाने पर कि यदि सब स्वर्ग न जा सकें तो किसे उतरना पड़ेगा, नारद पहले अष्टक का नाम लेते हैं (जिन्होंने अपनी दान की गौओं की प्रशंसा की), फिर प्रतर्दन का (जिन्होंने अनमने भाव से घोड़े दिए), फिर वसुमना का (जो अपना पुष्परथ देने का वचन दोहराते रहे पर दिया नहीं), और कहते हैं कि शिबि के लिए तो वे स्वयं उतर जाएँगे। क्योंकि शिबि ने एक ब्राह्मण के कहने पर बिना क्रोध के अपने पुत्र बृहद्गर्भ को मारकर पकाया और स्वयं उसे खाने को भी तैयार हो गए; वह ब्राह्मण स्वयं विधाता थे, जिन्होंने बालक को जीवित कर दिया, और शिबि अपने मंत्रियों से कहते हैं कि वे यश या लाभ के लिए नहीं, बल्कि सज्जनों का मार्ग होने के कारण दान करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.201.1)
भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डवो मार्कण्डेयम् । अथाचष्ट मार्कण्डेयः । अष्टकस्य वैश्वामित्रेरश्वमेधे सर्वे राजानः प्रागच्छन् ॥
bhūya eva mahābhāgyaṃ kathyatāmityabravīt pāṇḍavo mārkaṇḍeyam | athācaṣṭa mārkaṇḍeyaḥ | aṣṭakasya vaiśvāmitreraśvamedhe sarve rājānaḥ prāgacchan
पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय से कहा — "राजाओं की महिमा और भी सुनाइए।" तब मार्कण्डेय ने यह कथा सुनाई। विश्वामित्र के पुत्र अष्टक के अश्वमेध यज्ञ में सभी राजा आए।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 2 (3.201.2)
भ्रातरश्चास्य प्रतर्दनो वसुमनाः शिबिरौशीनर इति । स च समाप्तयज्ञो भ्रातृभिः सह रथेन प्रायात् । ते च नारदमागच्छन्तमभिवाद्यारोहतु भवान् रथमित्यब्रुवन् ॥
bhrātaraścāsya pratardano vasumanāḥ śibirauśīnara iti | sa ca samāptayajño bhrātṛbhiḥ saha rathena prāyāt | te ca nāradamāgacchantamabhivādyārohatu bhavān rathamityabruvan
उनके भाई भी आए — प्रतर्दन, वसुमना और उशीनर-पुत्र शिबि। यज्ञ समाप्त होने पर अष्टक अपने भाइयों के साथ रथ से चल पड़े। रास्ते में आते हुए नारद को देखकर उन्होंने प्रणाम किया और कहा — "आप भी रथ पर चढ़ जाइए।"
श्लोक 3 (3.201.3)
तांस्तथेत्युक्त्वा रथमारुरोह । अथ तेषामेकः सुरर्षिं नारदमब्रवीत् । प्रसाद्य भगवन्तं किंचिदिच्छेयं प्रष्टुमिति ॥
tāṃstathetyuktvā rathamāruroha | atha teṣāmekaḥ surarṣiṃ nāradamabravīt | prasādya bhagavantaṃ kiṃcidiccheyaṃ praṣṭumiti
नारद "ठीक है" कहकर रथ पर चढ़ गए। तब उनमें से एक ने देवर्षि नारद से कहा — "भगवन्, यदि आप प्रसन्न हों तो मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ।"
श्लोक 4 (3.201.4)
पृच्छेत्यब्रवीदृषिः । सोऽब्रवीदायुष्मन्तः सर्वगुणप्रमुदिताः । अथायुष्मन्तं स्वर्गस्थानं चतुर्भिर्यातव्यं स्यात् कोऽवतरेत् । अयमष्टकोऽवतरेदित्यब्रवीदृषिः ॥
pṛcchetyabravīdṛṣiḥ | so'bravīdāyuṣmantaḥ sarvaguṇapramuditāḥ | athāyuṣmantaṃ svargasthānaṃ caturbhiryātavyaṃ syāt ko'vataret | ayamaṣṭako'vataredityabravīdṛṣiḥ
ऋषि ने कहा — "पूछो।" उसने कहा — "हम सब दीर्घायु हैं और सब गुणों से सम्पन्न हैं। अब यदि हम चारों को चिरस्थायी स्वर्गलोक जाना हो, तो किसे नीचे उतरना पड़ेगा?" ऋषि ने कहा — "यह अष्टक उतरेगा।"
श्लोक 5 (3.201.5)
किं कारणमित्यपृच्छत् । अथाचष्टाष्टकस्य गृहे मया उषितं स मां रथेनानुप्रावहदथापश्यमनेकानिगोसहस्राणि वर्णशो विविक्तानि तमहमपृच्छं कस्येमे गाव इति सोऽब्रवीत् । मया निसृष्टा इत्येतास्तेनैव स्वयं श्लाघति कथितेन । एषोऽवतरेदथ त्रिभिर्यातव्यं साम्प्रतं कोऽवतरेत् ॥
kiṃ kāraṇamityapṛcchat | athācaṣṭāṣṭakasya gṛhe mayā uṣitaṃ sa māṃ rathenānuprāvahadathāpaśyamanekānigosahasrāṇi varṇaśo viviktāni tamahamapṛcchaṃ kasyeme gāva iti so'bravīt | mayā nisṛṣṭā ityetāstenaiva svayaṃ ślāghati kathitena | eṣo'vataredatha tribhiryātavyaṃ sāmprataṃ ko'vataret
उसने पूछा — "इसका कारण क्या है?" नारद ने बताया — "मैं अष्टक के घर ठहरा था, और वह मुझे अपने रथ में घुमाने ले गया। तब मैंने रंग के अनुसार अलग-अलग बँटी हुई हज़ारों गौएँ देखीं। मैंने उससे पूछा, 'ये गौएँ किसकी हैं?' उसने कहा, 'ये मेरी दान की हुई हैं।' यह कहकर उसने स्वयं अपनी प्रशंसा की। इसलिए वह उतरेगा।" "अब यदि हम तीनों को जाना हो, तो कौन उतरेगा?"
श्लोक 6 (3.201.6)
प्रतर्दन इत्यब्रवीदृषिः । तत्र किं कारणं प्रतर्दनस्यापि गृहे मयोषितं स मां रथेनानुप्रावहत् ॥
pratardana ityabravīdṛṣiḥ | tatra kiṃ kāraṇaṃ pratardanasyāpi gṛhe mayoṣitaṃ sa māṃ rathenānuprāvahat
ऋषि ने कहा — "प्रतर्दन।" "इसका क्या कारण है?" "मैं प्रतर्दन के घर भी ठहरा था, और वह भी मुझे अपने रथ में घुमाने ले गया।
नारद उवाच
श्लोक 7 (3.201.7)
अथैनं ब्राह्मणो भिक्षेताश्वं मे ददातु भवान् निवृत्तो दास्यामीत्यब्रवीद् ब्राह्मणं त्वरितमेव दीयतामित्यब्रवीद् ब्राह्मणस्त्वरितमेव स ब्राह्मणस्यैवमुक्त्वा दक्षिणं पार्श्वमददत् ॥
athainaṃ brāhmaṇo bhikṣetāśvaṃ me dadātu bhavān nivṛtto dāsyāmītyabravīd brāhmaṇaṃ tvaritameva dīyatāmityabravīd brāhmaṇastvaritameva sa brāhmaṇasyaivamuktvā dakṣiṇaṃ pārśvamadadat
तब एक ब्राह्मण ने उससे माँगा — 'आप मुझे एक घोड़ा दीजिए।' उसने ब्राह्मण से कहा — 'लौटकर दूँगा।' ब्राह्मण बोला — 'अभी दे दीजिए।' 'अभी ही सही' — ब्राह्मण से यह कहकर उसने दाहिनी ओर का घोड़ा दे दिया।
श्लोक 8 (3.201.8)
अथान्योऽप्यश्वार्थी ब्राह्मण आगच्छत् । तथैव चैनमुक्त्वा वामपार्ष्णिमभ्यदादथ प्रायात् पुनरपि चान्योऽप्यश्वार्थी ब्राह्मण आगच्छत् त्वरितोऽथ तस्मै अपनह्य वामं धुर्यमददत् ॥
athānyo'pyaśvārthī brāhmaṇa āgacchat | tathaiva cainamuktvā vāmapārṣṇimabhyadādatha prāyāt punarapi cānyo'pyaśvārthī brāhmaṇa āgacchat tvarito'tha tasmai apanahya vāmaṃ dhuryamadadat
फिर घोड़ा माँगने वाला एक दूसरा ब्राह्मण आया। उससे भी वैसी ही बात कहकर उसने बाईं ओर पीछे का घोड़ा दे दिया और आगे चल पड़ा। फिर घोड़ा चाहने वाला एक और ब्राह्मण उतावली में आया, तो उसने बाईं ओर जुता हुआ धुरे का घोड़ा खोलकर उसे दे दिया।
श्लोक 9 (3.201.9)
अथ प्रायात् पुनरन्य आगच्छदश्वार्थी ब्राह्मणस्तमब्रवीदतियातो दास्यामि त्वरितमेव मे दीयतामित्यब्रवीद् ब्राह्मणस्तस्मै दत्त्वाश्वं रथधुरं गृह्णता व्याहृतं ब्राह्मणानां साम्प्रतं नास्ति किंचिदिति ॥
atha prāyāt punaranya āgacchadaśvārthī brāhmaṇastamabravīdatiyāto dāsyāmi tvaritameva me dīyatāmityabravīd brāhmaṇastasmai dattvāśvaṃ rathadhuraṃ gṛhṇatā vyāhṛtaṃ brāhmaṇānāṃ sāmprataṃ nāsti kiṃciditi
फिर वह आगे बढ़ा, तो घोड़ा माँगने वाला एक और ब्राह्मण आ गया। उसने उससे कहा — 'यात्रा पूरी करके दूँगा।' ब्राह्मण बोला — 'मुझे अभी दीजिए।' उसे घोड़ा देकर रथ का धुरा स्वयं थामते हुए उसने कहा — 'अब ब्राह्मणों के लिए कुछ भी नहीं बचा।'
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 10 (3.201.10)
य एष ददाति चासूयति च तेन व्याहृतेन तथावतरेत् । अथ द्वाभ्यां यातव्यमिति कोऽवतरेत् ॥
ya eṣa dadāti cāsūyati ca tena vyāhṛtena tathāvataret | atha dvābhyāṃ yātavyamiti ko'vataret
वह दान तो देता है, पर साथ ही कुढ़ता भी है; अपने उस कथन के कारण वह उतरेगा।" "अब यदि दो को जाना हो, तो कौन उतरेगा?"
श्लोक 11 (3.201.11)
वसुमना अवतरेदित्यब्रवीदृषिः ॥
vasumanā avataredityabravīdṛṣiḥ
ऋषि ने कहा — "वसुमना उतरेगा।"
श्लोक 12 (3.201.12)
किं कारणमित्यपृच्छदथाचष्ट नारदः । अहं परिभ्रमन् वसुमनसो गृहमुपस्थितः ॥
kiṃ kāraṇamityapṛcchadathācaṣṭa nāradaḥ | ahaṃ paribhraman vasumanaso gṛhamupasthitaḥ
उसने कारण पूछा, तो नारद ने बताया — "घूमते-घूमते मैं वसुमना के घर पहुँचा।
नारद उवाच
श्लोक 13 (3.201.13)
स्वस्तिवचनमासीत् पुष्परथस्य प्रयोजनेन तमहमन्वगच्छं स्वस्तिवाचितेषु ब्राह्मणेषु रथो ब्राह्मणानां दर्शितः ॥
svastivacanamāsīt puṣparathasya prayojanena tamahamanvagacchaṃ svastivāciteṣu brāhmaṇeṣu ratho brāhmaṇānāṃ darśitaḥ
वहाँ पुष्परथ के लिए स्वस्तिवाचन हो रहा था, और मैं भी उसमें सम्मिलित हुआ। ब्राह्मणों के स्वस्तिवाचन कर चुकने पर वह रथ ब्राह्मणों को दिखाया गया।
श्लोक 14 (3.201.14)
तमहं रथं प्राशंसमथ राजाब्रवीद्भगवता रथः प्रशस्तः । एष भगवतो रथ इति ॥
tamahaṃ rathaṃ prāśaṃsamatha rājābravīdbhagavatā rathaḥ praśastaḥ | eṣa bhagavato ratha iti
मैंने उस रथ की प्रशंसा की, तो राजा ने कहा — 'भगवान् ने रथ की प्रशंसा की है; यह रथ भगवान् का ही है।'
श्लोक 15 (3.201.15)
अथ कदाचित् पुनरप्यहमुपस्थितः पुनरेव च रथप्रयोजनमासीत् । सम्यगयमेष भगवत इत्येवं राजाब्रवीदिति पुनरेव तृतीयं स्वस्तिवाचनं समभावयमथ राजा ब्राह्मणानां दर्शयन् मामभिप्रेक्ष्याब्रवीत् । अथो भगवता पुष्परथस्य स्वस्तिवाचनानि सुष्ठु सम्भावितानि एतेन द्रोहवचनेनावतरेत् ॥
atha kadācit punarapyahamupasthitaḥ punareva ca rathaprayojanamāsīt | samyagayameṣa bhagavata ityevaṃ rājābravīditi punareva tṛtīyaṃ svastivācanaṃ samabhāvayamatha rājā brāhmaṇānāṃ darśayan māmabhiprekṣyābravīt | atho bhagavatā puṣparathasya svastivācanāni suṣṭhu sambhāvitāni etena drohavacanenāvataret
फिर किसी और समय मैं उसके पास दोबारा गया, और फिर से रथ की आवश्यकता पड़ी। राजा ने फिर वही कहा — 'ठीक है, यह भगवान् का ही है।' फिर मैंने तीसरी बार स्वस्तिवाचन में भाग लिया, तो राजा ने ब्राह्मणों को रथ दिखाते हुए मेरी ओर देखकर कहा — 'वाह, भगवान् ने पुष्परथ के लिए स्वस्तिवाचन तो बहुत अच्छा कराया!' अपने इस द्वेषभरे वचन के कारण वह उतरेगा।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 16 (3.201.16)
अथैकेन यातव्यं स्यात् कोऽवतरेत् पुनर्नारद आह शिबिर्यायादहमवतरेयमत्र किं कारणमित्यब्रवीत् । असावहं शिबिना समो नास्मि यतो ब्राह्मणः कश्चिदेनमब्रवीत् ॥
athaikena yātavyaṃ syāt ko'vataret punarnārada āha śibiryāyādahamavatareyamatra kiṃ kāraṇamityabravīt | asāvahaṃ śibinā samo nāsmi yato brāhmaṇaḥ kaścidenamabravīt
"अब यदि केवल एक को जाना हो, तो कौन उतरेगा?" नारद ने फिर कहा — "शिबि जाएँगे; मैं स्वयं उतर जाऊँगा।" उसने पूछा — "इसका क्या कारण है?" "मैं शिबि के बराबर नहीं हूँ। क्योंकि एक बार किसी ब्राह्मण ने उनसे कहा —
नारद उवाच
श्लोक 17 (3.201.17)
शिबे अन्नार्थ्यस्मीति तमब्रवीच्छिविः किं क्रियतामाज्ञापयतु भवानिति ॥
śibe annārthyasmīti tamabravīcchiviḥ kiṃ kriyatāmājñāpayatu bhavāniti
'शिबि, मुझे भोजन चाहिए।' शिबि ने उससे कहा — 'क्या करना होगा? आप आज्ञा दीजिए।'
श्लोक 18 (3.201.18)
अथैनं ब्राह्मणोऽब्रवीद् य एष ते पुत्रो बृहद्गर्भो नाम एष प्रमातव्य इति तमेनं संस्कुरु अन्नं चोपपादय ततोऽहं प्रतीक्ष्य इति । ततः पुत्रं प्रमाथ्य संस्कृत्य विधिना साधयित्वा पात्र्यामर्पयित्वा शिरसा प्रतिगृह्य ब्राह्मणममृगयत् ॥
athainaṃ brāhmaṇo'bravīd ya eṣa te putro bṛhadgarbho nāma eṣa pramātavya iti tamenaṃ saṃskuru annaṃ copapādaya tato'haṃ pratīkṣya iti | tataḥ putraṃ pramāthya saṃskṛtya vidhinā sādhayitvā pātryāmarpayitvā śirasā pratigṛhya brāhmaṇamamṛgayat
तब ब्राह्मण ने उनसे कहा — 'तुम्हारा जो यह बृहद्गर्भ नाम का पुत्र है, इसे मारना होगा। इसे पकाकर भोजन तैयार करो; तब तक मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा।' तब शिबि ने अपने पुत्र को मारकर, विधिपूर्वक तैयार कर, पकाया और पात्र में रखकर सिर पर उठाए हुए ब्राह्मण को ढूँढने लगे।
श्लोक 19 (3.201.19)
अथास्य मृगयमाणस्य कश्चिदाचष्ट एव ते ब्राह्मणो नगरं प्रविश्य दहति ते गृहं कोशागारमायुधागारं स्त्र्यगारमश्वशालां हस्तिशालां च क्रुद्ध इति ॥
athāsya mṛgayamāṇasya kaścidācaṣṭa eva te brāhmaṇo nagaraṃ praviśya dahati te gṛhaṃ kośāgāramāyudhāgāraṃ stryagāramaśvaśālāṃ hastiśālāṃ ca kruddha iti
जब वे ढूँढ रहे थे, तो किसी ने उनसे कहा — 'वह तुम्हारा ब्राह्मण नगर में घुसकर क्रोध में तुम्हारा महल, कोषागार, शस्त्रागार, अन्तःपुर, अश्वशाला और गजशाला जला रहा है।'
श्लोक 20 (3.201.20)
अथ शिबिस्तथैवाविकृतमुखवर्णो नगरं प्रविश्य ब्राह्मणं तमब्रवीत् सिद्धं भगवन्नन्नमिति ब्राह्मणो न किंचिद्व्याजहार विस्मयादधोमुखश्चासीत् ॥
atha śibistathaivāvikṛtamukhavarṇo nagaraṃ praviśya brāhmaṇaṃ tamabravīt siddhaṃ bhagavannannamiti brāhmaṇo na kiṃcidvyājahāra vismayādadhomukhaścāsīt
शिबि के मुख का रंग तक नहीं बदला; वे नगर में जाकर उस ब्राह्मण से बोले — 'भगवन्, भोजन तैयार है।' ब्राह्मण कुछ नहीं बोला; आश्चर्य से उसका सिर झुक गया।
श्लोक 21 (3.201.21)
ततः प्रासादयद् ब्राह्मणं भगवन् भुज्यतामिति । मुहूर्तादुद्वीक्ष्य शिबिमब्रवीत् ॥
tataḥ prāsādayad brāhmaṇaṃ bhagavan bhujyatāmiti | muhūrtādudvīkṣya śibimabravīt
तब शिबि ने ब्राह्मण को प्रसन्न करते हुए कहा — 'भगवन्, भोजन कीजिए।' कुछ क्षण बाद ब्राह्मण ने ऊपर देखकर शिबि से कहा —
श्लोक 22 (3.201.22)
त्वमेवैतदशानेति तत्राह तथेति शिबिस्तथैवाविमना महित्वा कपालमभ्युद्धार्य भोक्तुमैच्छत् ॥
tvamevaitadaśāneti tatrāha tatheti śibistathaivāvimanā mahitvā kapālamabhyuddhārya bhoktumaicchat
'इसे तुम स्वयं खाओ।' शिबि ने कहा — 'ठीक है।' और पहले की तरह ही अविचलित मन से, ब्राह्मण का सम्मान करते हुए, उन्होंने पात्र उठाया और खाने को उद्यत हुए।
श्लोक 23 (3.201.23)
अथास्य ब्राह्मणो हस्तमगृह्णात् । अब्रवीच्चैनं जितक्रोधोऽसि न ते किञ्चिदपरित्याज्यं ब्राह्मणार्थे ब्राह्मणोऽपि तं महाभागं सभाजयत् ॥
athāsya brāhmaṇo hastamagṛhṇāt | abravīccainaṃ jitakrodho'si na te kiñcidaparityājyaṃ brāhmaṇārthe brāhmaṇo'pi taṃ mahābhāgaṃ sabhājayat
तब ब्राह्मण ने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा — 'तुमने क्रोध को जीत लिया है। ब्राह्मण के लिए तुम्हारे पास कुछ भी ऐसा नहीं जिसे तुम त्याग न सको।' और ब्राह्मण ने उन महाभाग शिबि का सम्मान किया।
श्लोक 24 (3.201.24)
स ह्युद्वीक्षमाणः पुत्रमपश्यदग्रे तिष्ठन्तं देवकुमारमिव पुण्यगन्धान्वितमलङ्कृतं सर्वं च तमर्थं विधाय ब्राह्मणोऽन्तरधीयत ॥
sa hyudvīkṣamāṇaḥ putramapaśyadagre tiṣṭhantaṃ devakumāramiva puṇyagandhānvitamalaṅkṛtaṃ sarvaṃ ca tamarthaṃ vidhāya brāhmaṇo'ntaradhīyata
शिबि ने ऊपर देखा तो अपने पुत्र को सामने खड़ा पाया — देवकुमार के समान, पवित्र सुगन्ध से युक्त और आभूषणों से सजा हुआ। सब कुछ ठीक करके वह ब्राह्मण अन्तर्धान हो गया।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 25 (3.201.25)
तस्य राजर्षेर्विधाता तेनैव वेषेण परीक्षार्थमागत इति तस्मिन्नन्तर्हिते अमात्या राजानमूचुः । किं प्रेप्सुना भवता इदमेवं जानता कृतमिति ॥
tasya rājarṣervidhātā tenaiva veṣeṇa parīkṣārthamāgata iti tasminnantarhite amātyā rājānamūcuḥ | kiṃ prepsunā bhavatā idamevaṃ jānatā kṛtamiti
स्वयं विधाता उस राजर्षि की परीक्षा लेने के लिए उस वेश में आए थे। उनके अन्तर्धान हो जाने पर मंत्रियों ने राजा से कहा — "आप क्या पाना चाहते थे, जो आपने सब कुछ जानते हुए भी ऐसा किया?"
शिबिरुवाच
श्लोक 26 (3.201.26)
नैवाहमेतद् यशसे ददानि । न चार्थहेतोर्न च भोगतृष्णया । पापैरनासेवित एष मार्ग । इत्येवमेतत् सकलं करोमि ॥
naivāhametad yaśase dadāni | na cārthahetorna ca bhogatṛṣṇayā | pāpairanāsevita eṣa mārga | ityevametat sakalaṃ karomi
"मैं न यश के लिए दान करता हूँ, न धन के लिए, न भोगों की लालसा से। पापी लोग इस मार्ग पर कभी नहीं चले; इसीलिए मैं यह सब करता हूँ।
श्लोक 27 (3.201.27)
सद्भिः सदाध्यासितं तु प्रशस्तं । तस्मात् प्रशस्तं श्रयते मतिर्मे । एतन्महाभाग्यवरं शिबेस्तु । तस्मादहं वेद यथावदेतत् ॥
sadbhiḥ sadādhyāsitaṃ tu praśastaṃ | tasmāt praśastaṃ śrayate matirme | etanmahābhāgyavaraṃ śibestu | tasmādahaṃ veda yathāvadetat
सज्जन सदा इसी पर चलते आए हैं, इसलिए यह प्रशंसनीय है; और इसीलिए मेरा मन प्रशंसनीय मार्ग का आश्रय लेता है। यही शिबि की परम महिमा है, और इसीलिए मैं इसे यथार्थ रूप में जानता हूँ।"