आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 202
इन्द्रद्युम्न की स्वर्ग में पुनः प्रतिष्ठा
यह पूछे जाने पर कि क्या कोई उनसे भी पहले जन्मा है, मार्कण्डेय राजर्षि इन्द्रद्युम्न की कथा सुनाते हैं, जो पुण्य क्षीण होने पर स्वर्ग से गिर पड़े थे, क्योंकि पृथ्वी पर उनकी कीर्ति लुप्त हो चुकी थी। किसी ऐसे व्यक्ति की खोज में जो उन्हें अब भी पहचानता हो, राजा मार्कण्डेय को हिमालय पर प्राकारकर्ण उल्लू के पास, फिर नाडीजंघ बगुले के पास, और अंत में अकूपार कछुए के पास ले गए, जिसने रोते हुए राजा के यज्ञों और उनकी दान की हुई गौओं के खुरों से बने सरोवर का स्मरण किया। तुरंत इन्द्रद्युम्न के लिए दिव्य रथ आ गया। अध्याय सत्कीर्ति द्वारा स्वर्ग में स्थान बने रहने के विषय में श्लोकों के साथ, और मार्कण्डेय द्वारा यह स्मरण कराने के साथ समाप्त होता है कि श्रीकृष्ण ने भी राजा नृग का उद्धार किया था।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.202.1)
मार्कण्डेयमृषयः पाण्डवाश्च पर्यपृच्छन् । अस्ति कश्चिद्भवतश्चिरजाततर इति ॥
mārkaṇḍeyamṛṣayaḥ pāṇḍavāśca paryapṛcchan | asti kaścidbhavataścirajātatara iti
ऋषियों और पाण्डवों ने मार्कण्डेय से पूछा — "क्या कोई ऐसा भी है जो आपसे भी पहले जन्मा हो?"
श्लोक 2 (3.202.2)
स तानुवाच । अस्ति खलु राजर्षिरिन्द्रद्युम्नो नाम क्षीणपुण्यस्त्रिदिवात्प्रच्युतः । कीर्तिस्ते व्युच्छिन्नेति । स मामुपातिष्ठत् । अथ प्रत्यभिजानाति मां भवानिति ॥
sa tānuvāca | asti khalu rājarṣirindradyumno nāma kṣīṇapuṇyastridivātpracyutaḥ | kīrtiste vyucchinneti | sa māmupātiṣṭhat | atha pratyabhijānāti māṃ bhavāniti
उन्होंने उनसे कहा — "हाँ, है। इन्द्रद्युम्न नाम के एक राजर्षि पुण्य क्षीण हो जाने पर स्वर्ग से गिरा दिए गए, यह कहकर कि 'तुम्हारी कीर्ति लुप्त हो गई है।' वे मेरे पास आए और पूछा, 'क्या आप मुझे पहचानते हैं?'"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 3 (3.202.3)
तमहमब्रुवम् । न वयं रासायनिकाः शरीरोपतापेनात्मनः समारभामहेऽर्थानामनुष्ठानम् ॥
tamahamabruvam | na vayaṃ rāsāyanikāḥ śarīropatāpenātmanaḥ samārabhāmahe'rthānāmanuṣṭhānam
मैंने उनसे कहा — "हम रसायन के सहारे जीने वाले नहीं हैं; हम अपने शरीर को तप से तपाकर ही अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं।
श्लोक 4 (3.202.4)
अस्ति खलु हिमवति प्राकारकर्णो नामोलूकः । स भवन्तं यदि जानीयात् । प्रकृष्टे चाध्वनि हिमवान् । तत्रासौ प्रतिवसतीति ॥
asti khalu himavati prākārakarṇo nāmolūkaḥ | sa bhavantaṃ yadi jānīyāt | prakṛṣṭe cādhvani himavān | tatrāsau prativasatīti
पर हिमालय पर प्राकारकर्ण नाम का एक उल्लू रहता है; सम्भव है वह आपको जानता हो। हिमालय बहुत दूर है, और वह वहीं रहता है।"
श्लोक 5 (3.202.5)
स मामश्वो भूत्वा तत्रावहद्यत्र बभूवोलूकः ॥
sa māmaśvo bhūtvā tatrāvahadyatra babhūvolūkaḥ
तब राजा घोड़ा बनकर मुझे उस स्थान पर ले गए जहाँ वह उल्लू रहता था।
श्लोक 6 (3.202.6)
अथैनं स राजर्षिः पर्यपृच्छत् । प्रत्यभिजानाति मां भवानिति ॥
athainaṃ sa rājarṣiḥ paryapṛcchat | pratyabhijānāti māṃ bhavāniti
तब राजर्षि ने उससे पूछा — "क्या आप मुझे पहचानते हैं?"
श्लोक 7 (3.202.7)
स मुहूर्तं ध्यात्वाब्रवीदेनम् । नाभिजाने भवन्तमिति ॥
sa muhūrtaṃ dhyātvābravīdenam | nābhijāne bhavantamiti
उसने कुछ क्षण सोचकर कहा — "मैं आपको नहीं पहचानता।"
श्लोक 8 (3.202.8)
स एवमुक्तो राजर्षिरिन्द्रद्युम्नः पुनस्तमुलूकमब्रवीत् । अस्ति कश्चिद्भवतश्चिरजाततर इति ॥
sa evamukto rājarṣirindradyumnaḥ punastamulūkamabravīt | asti kaścidbhavataścirajātatara iti
यह उत्तर पाकर राजर्षि इन्द्रद्युम्न ने उस उल्लू से फिर पूछा — "क्या कोई ऐसा है जो आपसे भी पहले जन्मा हो?"
श्लोक 9 (3.202.9)
स एवमुक्तोऽब्रवीदेनम् । अस्ति खल्विन्द्रद्युम्नसरो नाम । तस्मिन्नाडीजङ्घो नाम बकः प्रतिवसति । सोऽस्मत्तश्चिरजाततरः । तं पृच्छेति ॥
sa evamukto'bravīdenam | asti khalvindradyumnasaro nāma | tasminnāḍījaṅgho nāma bakaḥ prativasati | so'smattaścirajātataraḥ | taṃ pṛccheti
यह पूछे जाने पर उसने कहा — "इन्द्रद्युम्न-सरोवर नाम की एक झील है। उसमें नाडीजंघ नाम का एक बगुला रहता है; वह हमसे बहुत पहले जन्मा है। उससे पूछिए।"
श्लोक 10 (3.202.10)
तत इन्द्रद्युम्नो मां चोलूकं चादाय तत्सरोऽगच्छद्यत्रासौ नाडीजङ्घो नाम बको बभूव ॥
tata indradyumno māṃ colūkaṃ cādāya tatsaro'gacchadyatrāsau nāḍījaṅgho nāma bako babhūva
तब इन्द्रद्युम्न मुझे और उस उल्लू को साथ लेकर उस सरोवर पर गए जहाँ नाडीजंघ नाम का बगुला रहता था।
श्लोक 11 (3.202.11)
सोऽस्माभिः पृष्टः । भवानिन्द्रद्युम्नं राजानं प्रत्यभिजानातीति ॥
so'smābhiḥ pṛṣṭaḥ | bhavānindradyumnaṃ rājānaṃ pratyabhijānātīti
हमने उससे पूछा — "क्या आप राजा इन्द्रद्युम्न को पहचानते हैं?"
श्लोक 12 (3.202.12)
स एवमुक्तोऽब्रवीन्मुहूर्तं ध्यात्वा । नाभिजानाम्यहमिन्द्रद्युम्नं राजानमिति ॥
sa evamukto'bravīnmuhūrtaṃ dhyātvā | nābhijānāmyahamindradyumnaṃ rājānamiti
यह पूछे जाने पर उसने कुछ क्षण सोचकर कहा — "मैं राजा इन्द्रद्युम्न को नहीं पहचानता।"
श्लोक 13 (3.202.13)
ततः सोऽस्माभिः पृष्टः । अस्ति कश्चिदन्यो भवतश्चिरजाततर इति ॥
tataḥ so'smābhiḥ pṛṣṭaḥ | asti kaścidanyo bhavataścirajātatara iti
तब हमने उससे पूछा — "क्या कोई और है जो आपसे भी पहले जन्मा हो?"
श्लोक 14 (3.202.14)
स नोऽब्रवीदस्ति खल्विहैव सरस्यकूपारो नाम कच्छपः प्रतिवसति । स मत्तश्चिरजाततर इति । स यदि कथञ्चिदभिजानीयादिमं राजानं तमकूपारं पृच्छाम इति ॥
sa no'bravīdasti khalvihaiva sarasyakūpāro nāma kacchapaḥ prativasati | sa mattaścirajātatara iti | sa yadi kathañcidabhijānīyādimaṃ rājānaṃ tamakūpāraṃ pṛcchāma iti
उसने हमसे कहा — "हाँ, है। इसी सरोवर में अकूपार नाम का एक कछुआ रहता है; वह मुझसे बहुत पहले जन्मा है। सम्भव है वह इस राजा को पहचानता हो; चलिए, अकूपार से पूछें।"
श्लोक 15 (3.202.15)
ततः स बकस्तमकूपारं कच्छपं विज्ञापयामास । अस्त्यस्माकमभिप्रेतं भवन्तं कञ्चिदर्थमभिप्रष्टुम् । साध्वागम्यतां तावदिति ॥
tataḥ sa bakastamakūpāraṃ kacchapaṃ vijñāpayāmāsa | astyasmākamabhipretaṃ bhavantaṃ kañcidarthamabhipraṣṭum | sādhvāgamyatāṃ tāvaditi
तब उस बगुले ने अकूपार कछुए को सन्देश दिया — "हम आपसे एक बात पूछना चाहते हैं। कृपया यहाँ पधारिए।"
श्लोक 16 (3.202.16)
एतच्छ्रुत्वा स कच्छपस्तस्मात्सरस उत्थायाभ्यगच्छद्यत्र तिष्ठामो वयं तस्य सरसस्तीरे ॥
etacchrutvā sa kacchapastasmātsarasa utthāyābhyagacchadyatra tiṣṭhāmo vayaṃ tasya sarasastīre
यह सुनकर वह कछुआ सरोवर से निकलकर उसके तट पर उस स्थान पर आया जहाँ हम खड़े थे।
श्लोक 17 (3.202.17)
आगतं चैनं वयमपृच्छाम । भवानिन्द्रद्युम्नं राजानमभिजानातीति ॥
āgataṃ cainaṃ vayamapṛcchāma | bhavānindradyumnaṃ rājānamabhijānātīti
उसके आने पर हमने उससे पूछा — "क्या आप राजा इन्द्रद्युम्न को जानते हैं?"
श्लोक 18 (3.202.18)
स मुहूर्तं ध्यात्वा बाष्पपूर्णनयन उद्विग्नहृदयो वेपमानो विसञ्ज्ञकल्पः प्राञ्जलिरब्रवीत् । किमहमेनं न प्रत्यभिजानामि । अहं ह्यनेन सहस्रकृत्वः पूर्वमग्निचितिषूपहितपूर्वः । सरश्चेदमस्य दक्षिणादत्ताभिर्गोभिरतिक्रममाणाभिः कृतम् । अत्र चाहं प्रतिवसामीति ॥
sa muhūrtaṃ dhyātvā bāṣpapūrṇanayana udvignahṛdayo vepamāno visañjñakalpaḥ prāñjalirabravīt | kimahamenaṃ na pratyabhijānāmi | ahaṃ hyanena sahasrakṛtvaḥ pūrvamagnicitiṣūpahitapūrvaḥ | saraścedamasya dakṣiṇādattābhirgobhiratikramamāṇābhiḥ kṛtam | atra cāhaṃ prativasāmīti
उसने कुछ क्षण सोचा; फिर आँखों में आँसू भरकर, व्याकुल हृदय से, काँपते हुए और लगभग अचेत-सा होकर, हाथ जोड़कर बोला — "मैं इन्हें कैसे न पहचानूँगा? पहले इनके यज्ञों में हज़ार बार मुझे अग्नि-वेदियों में रखा गया था। यह सरोवर इन्हीं की दक्षिणा में दी गई गौओं के चलने से बना है। और मैं यहीं रहता हूँ।"
श्लोक 19 (3.202.19)
अथैतत्कच्छपेनोदाहृतं श्रुत्वा समनन्तरं देवलोकाद्देवरथः प्रादुरासीत् ॥
athaitatkacchapenodāhṛtaṃ śrutvā samanantaraṃ devalokāddevarathaḥ prādurāsīt
कछुए की यह बात सुनते ही देवलोक से एक दिव्य रथ प्रकट हो गया।
श्लोक 20 (3.202.20)
वाचश्चाश्रूयन्तेन्द्रद्युम्नं प्रति । प्रस्तुतस्ते स्वर्गः । यथोचितं स्थानमभिपद्यस्व । कीर्तिमानसि । अव्यग्रो याहीति ॥
vācaścāśrūyantendradyumnaṃ prati | prastutaste svargaḥ | yathocitaṃ sthānamabhipadyasva | kīrtimānasi | avyagro yāhīti
और इन्द्रद्युम्न को सम्बोधित करती हुई वाणियाँ सुनाई दीं — "तुम्हारे लिए स्वर्ग तैयार है। अपना उचित स्थान ग्रहण करो। तुम कीर्तिमान हो। निश्चिन्त होकर चलो।"
श्लोक 21 (3.202.21)
दिवं स्पृशति भूमिं च शब्दः पुण्यस्य कर्मणः । यावत्स शब्दो भवति तावत्पुरुष उच्यते ॥
divaṃ spṛśati bhūmiṃ ca śabdaḥ puṇyasya karmaṇaḥ | yāvatsa śabdo bhavati tāvatpuruṣa ucyate
पुण्य कर्म की कीर्ति स्वर्ग और पृथ्वी दोनों को छूती है; जब तक वह कीर्ति बनी रहती है, तब तक मनुष्य जीवित कहलाता है।
श्लोक 22 (3.202.22)
अकीर्तिः कीर्त्यते यस्य लोके भूतस्य कस्यचित् । पतत्येवाधमाँल्लोकान्यावच्छब्दः स कीर्त्यते ॥
akīrtiḥ kīrtyate yasya loke bhūtasya kasyacit | patatyevādhamām̐llokānyāvacchabdaḥ sa kīrtyate
जिस किसी प्राणी की संसार में अपकीर्ति फैलती है, वह तब तक अधम लोकों में गिरा रहता है जब तक वह अपकीर्ति कही जाती है।
श्लोक 23 (3.202.23)
तस्मात्कल्याणवृत्तः स्यादत्यन्ताय नरो भुवि । विहाय वृत्तं पापिष्ठं धर्ममेवाभिसंश्रयेत् ॥
tasmātkalyāṇavṛttaḥ syādatyantāya naro bhuvi | vihāya vṛttaṃ pāpiṣṭhaṃ dharmamevābhisaṃśrayet
इसलिए पृथ्वी पर मनुष्य को सदा सदाचारी रहना चाहिए; अत्यंत पापमय आचरण को छोड़कर उसे केवल धर्म का ही आश्रय लेना चाहिए।
श्लोक 24 (3.202.24)
इत्येतच्छ्रुत्वा स राजाब्रवीत् । तिष्ठ तावद्यावदिदानीमिमौ वृद्धौ यथास्थानं प्रतिपादयामीति ॥
ityetacchrutvā sa rājābravīt | tiṣṭha tāvadyāvadidānīmimau vṛddhau yathāsthānaṃ pratipādayāmīti
यह सुनकर राजा ने कहा — "थोड़ा ठहरो, जब तक मैं इन दोनों वृद्धों को उनके उचित स्थानों पर पहुँचा दूँ।"
श्लोक 25 (3.202.25)
स मां प्राकारकर्णं चोलूकं यथोचिते स्थाने प्रतिपाद्य तेनैव यानेन संसिद्धो यथोचितं स्थानं प्रतिपन्नः ॥
sa māṃ prākārakarṇaṃ colūkaṃ yathocite sthāne pratipādya tenaiva yānena saṃsiddho yathocitaṃ sthānaṃ pratipannaḥ
उन्होंने मुझे और प्राकारकर्ण उल्लू को हमारे उचित स्थानों पर पहुँचाया, और फिर कृतार्थ होकर उसी रथ से अपने उचित स्थान को चले गए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 26 (3.202.26)
एतन्मयानुभूतं चिरजीविना दृष्टमिति पाण्डवानुवाच मार्कण्डेयः ॥
etanmayānubhūtaṃ cirajīvinā dṛṣṭamiti pāṇḍavānuvāca mārkaṇḍeyaḥ
मार्कण्डेय ने पाण्डवों से कहा — "चिरजीवी होने के कारण मैंने यह स्वयं अनुभव किया और देखा है।"
श्लोक 27 (3.202.27)
पाण्डवाश्चोचुः प्रीताः । साधु । शोभनं कृतं भवता राजानमिन्द्रद्युम्नं स्वर्गलोकाच्च्युतं स्वे स्थाने स्वर्गे पुनः प्रतिपादयतेति ॥
pāṇḍavāścocuḥ prītāḥ | sādhu | śobhanaṃ kṛtaṃ bhavatā rājānamindradyumnaṃ svargalokāccyutaṃ sve sthāne svarge punaḥ pratipādayateti
पाण्डव प्रसन्न होकर बोले — "बहुत अच्छा! आपने स्वर्गलोक से गिरे हुए राजा इन्द्रद्युम्न को फिर से स्वर्ग में उनके अपने स्थान पर पहुँचाकर बड़ा उत्तम कार्य किया।"
श्लोक 28 (3.202.28)
अथैनानब्रवीदसौ । ननु देवकीपुत्रेणापि कृष्णेन नरके मज्जमानो राजर्षिर्नृगस्तस्मात्कृच्छ्रात्समुद्धृत्य पुनः स्वर्गं प्रतिपादित इति ॥
athainānabravīdasau | nanu devakīputreṇāpi kṛṣṇena narake majjamāno rājarṣirnṛgastasmātkṛcchrātsamuddhṛtya punaḥ svargaṃ pratipādita iti
तब उन्होंने उनसे कहा — "देवकी-पुत्र श्रीकृष्ण ने भी तो नरक में डूबते हुए राजर्षि नृग को उस संकट से उबारकर फिर से स्वर्ग पहुँचाया था।"