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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 203

मार्कण्डेय का दान, अतिथि-सत्कार और शौच पर उपदेश

इन्द्रद्युम्न की कथा के बाद युधिष्ठिर मार्कण्डेय से पूछते हैं कि दान से स्वर्ग कैसे मिलता है। मुनि चार व्यर्थ जन्मों और सोलह व्यर्थ दानों को गिनाते हैं, सुपात्र ब्राह्मण को दान, कपिला गौ के दान और सबसे बढ़कर अन्नदान तथा अतिथि-सत्कार की महिमा बताते हैं, और यमलोक के निर्जल मार्ग का तथा उस पर हर प्रकार के दाता की यात्रा का वर्णन करते हैं। फिर वे तीन प्रकार के शौच, गायत्री के प्रभाव और ब्राह्मणों की महिमा का उपदेश देते हैं, और बताते हैं कि सच्चा तप उपवास और बाहरी व्रतों में नहीं, निर्मल मन और ज्ञान में है; अंत में दान के विशेष काल और रहस्य बताते हैं।

अध्याय 202अध्याय-सूचीअध्याय 204

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.203.1)

श्रुत्वा स राजा राजर्षिरिन्द्रद्युम्नस्य तत्तदा । मार्कण्डेयान्महाभागात्स्वर्गस्य प्रतिपादनम् ॥

śrutvā sa rājā rājarṣirindradyumnasya tattadā | mārkaṇḍeyānmahābhāgātsvargasya pratipādanam

जब राजा ने महाभाग मार्कण्डेय से राजर्षि इन्द्रद्युम्न के फिर से स्वर्ग पाने का वृत्तान्त सुना,

श्लोक 2 (3.203.2)

युधिष्ठिरो महाराज पुनः पप्रच्छ तं मुनिम् । कीदृशीषु ह्यवस्थासु दत्त्वा दानं महामुने । इन्द्रलोकं त्वनुभवेत्पुरुषस्तद्ब्रवीहि मे ॥

yudhiṣṭhiro mahārāja punaḥ papraccha taṃ munim | kīdṛśīṣu hyavasthāsu dattvā dānaṃ mahāmune | indralokaṃ tvanubhavetpuruṣastadbravīhi me

तब, हे महाराज, युधिष्ठिर ने उन मुनि से फिर पूछा — "हे महामुने, मुझे बताइए कि मनुष्य जीवन की किन अवस्थाओं में दान देकर इन्द्रलोक का सुख भोगता है।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 3 (3.203.3)

गार्हस्थ्येऽप्यथवा बाल्ये यौवने स्थाविरेऽपि वा । यथा फलं समश्नाति तथा त्वं कथयस्व मे ॥

gārhasthye'pyathavā bālye yauvane sthāvire'pi vā | yathā phalaṃ samaśnāti tathā tvaṃ kathayasva me

गृहस्थ-अवस्था में, बचपन में, यौवन में या बुढ़ापे में — दान का फल मनुष्य किस प्रकार पाता है, यह मुझसे कहिए।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 4 (3.203.4)

वृथा जन्मानि चत्वारि वृथा दानानि षोडश । वृथा जन्म ह्यपुत्रस्य ये च धर्मबहिष्कृताः ॥

vṛthā janmāni catvāri vṛthā dānāni ṣoḍaśa | vṛthā janma hyaputrasya ye ca dharmabahiṣkṛtāḥ

चार जन्म व्यर्थ हैं और सोलह दान व्यर्थ हैं। पुत्रहीन का जन्म व्यर्थ है, और उनका भी जो धर्म से बहिष्कृत हैं;

श्लोक 5 (3.203.5)

परपाकं च येऽश्नन्ति आत्मार्थं च पचेत्तु यः । पर्यश्नन्ति वृथा यत्र तदसत्यं प्रकीर्त्यते ॥

parapākaṃ ca ye'śnanti ātmārthaṃ ca pacettu yaḥ | paryaśnanti vṛthā yatra tadasatyaṃ prakīrtyate

उनका भी जो पराये का पकाया अन्न खाते हैं, और उसका जो केवल अपने लिए पकाता है। जिस जीवन में लोग व्यर्थ ही खाते-पीते हैं, वह असत्य कहा जाता है।

श्लोक 6 (3.203.6)

आरूढपतिते दत्तमन्यायोपहृतं च यत् । व्यर्थं तु पतिते दानं ब्राह्मणे तस्करे तथा ॥

ārūḍhapatite dattamanyāyopahṛtaṃ ca yat | vyarthaṃ tu patite dānaṃ brāhmaṇe taskare tathā

ऊँचे उठकर पतित हुए व्यक्ति को दिया गया दान, और अन्याय से कमाया हुआ दान व्यर्थ है; पतित ब्राह्मण और चोर को दिया दान भी व्यर्थ है;

श्लोक 7 (3.203.7)

गुरौ चानृतिके पापे कृतघ्ने ग्रामयाजके । वेदविक्रयिणे दत्तं तथा वृषलयाजके ॥

gurau cānṛtike pāpe kṛtaghne grāmayājake | vedavikrayiṇe dattaṃ tathā vṛṣalayājake

झूठ बोलने वाले गुरु को, पापी को, कृतघ्न को, पूरे गाँव के लिए यज्ञ कराने वाले को, वेद बेचने वाले को और शूद्रों का यज्ञ कराने वाले को दिया दान भी;

श्लोक 8 (3.203.8)

ब्रह्मबन्धुषु यद्दत्तं यद्दत्तं वृषलीपतौ । स्त्रीजितेषु च यद्दत्तं व्यालग्राहे तथैव च ॥

brahmabandhuṣu yaddattaṃ yaddattaṃ vṛṣalīpatau | strījiteṣu ca yaddattaṃ vyālagrāhe tathaiva ca

केवल जन्म से ब्राह्मण कहलाने वालों को, शूद्रा के पति को, स्त्री के वश में रहने वालों को और साँप पकड़ने वाले को दिया गया दान भी;

श्लोक 9 (3.203.9)

परिचारकेषु यद्दत्तं वृथा दानानि षोडश । तमोवृतस्तु यो दद्याद्भयात्क्रोधात्तथैव च ॥

paricārakeṣu yaddattaṃ vṛthā dānāni ṣoḍaśa | tamovṛtastu yo dadyādbhayātkrodhāttathaiva ca

और सेवकों को दिया गया दान — ये सोलह व्यर्थ दान हैं। जो मनुष्य तमोगुण से घिरा हुआ, भय से या क्रोध से दान देता है,

श्लोक 10 (3.203.10)

भुङ्क्ते च दानं तत्सर्वं गर्भस्थस्तु नरः सदा । ददद्दानं द्विजातिभ्यो वृद्धभावेन मानवः ॥

bhuṅkte ca dānaṃ tatsarvaṃ garbhasthastu naraḥ sadā | dadaddānaṃ dvijātibhyo vṛddhabhāvena mānavaḥ

वह उस सारे दान का फल गर्भ में रहते हुए ही भोग लेता है; किन्तु जो मनुष्य द्विजों को दान देता है, वह उसका फल वृद्धावस्था तक भोगता है।

श्लोक 11 (3.203.11)

तस्मात्सर्वास्ववस्थासु सर्वदानानि पार्थिव । दातव्यानि द्विजातिभ्यः स्वर्गमार्गजिगीषया ॥

tasmātsarvāsvavasthāsu sarvadānāni pārthiva | dātavyāni dvijātibhyaḥ svargamārgajigīṣayā

इसलिए, हे राजन्, स्वर्ग का मार्ग जीतने की इच्छा रखने वाले को जीवन की सभी अवस्थाओं में द्विजों को सब प्रकार के दान देने चाहिए।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 12 (3.203.12)

चातुर्वर्ण्यस्य सर्वस्य वर्तमानाः प्रतिग्रहे । केन विप्रा विशेषेण तारयन्ति तरन्ति च ॥

cāturvarṇyasya sarvasya vartamānāḥ pratigrahe | kena viprā viśeṣeṇa tārayanti taranti ca

ब्राह्मण चारों वर्णों से दान ग्रहण करते हैं। वे किस विशेष शक्ति से दूसरों को तारते हैं और स्वयं भी तर जाते हैं?

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 13 (3.203.13)

जपैर्मन्त्रैश्च होमैश्च स्वाध्यायाध्यायनेन च । नावं वेदमयीं कृत्वा तारयन्ति तरन्ति च ॥

japairmantraiśca homaiśca svādhyāyādhyāyanena ca | nāvaṃ vedamayīṃ kṛtvā tārayanti taranti ca

जप, मन्त्र, होम और वेद के स्वाध्याय तथा अध्यापन से वे वेद को नौका बना लेते हैं; उसी से वे दूसरों को पार लगाते हैं और स्वयं भी पार हो जाते हैं।

श्लोक 14 (3.203.14)

ब्राह्मणांस्तोषयेद्यस्तु तुष्यन्ते तस्य देवताः । वचनाच्चापि विप्राणां स्वर्गलोकमवाप्नुयात् ॥

brāhmaṇāṃstoṣayedyastu tuṣyante tasya devatāḥ | vacanāccāpi viprāṇāṃ svargalokamavāpnuyāt

जो ब्राह्मणों को संतुष्ट करता है, उससे देवता संतुष्ट होते हैं; और ब्राह्मणों के वचन से वह स्वर्गलोक पा सकता है।

श्लोक 15 (3.203.15)

अनन्तं पुण्यलोकं तु गन्ताऽसौ तु न संशयः । श्लेष्मादिभिर्व्याप्ततनुर्म्रियमाणोऽविचेतनः ॥

anantaṃ puṇyalokaṃ tu gantā'sau tu na saṃśayaḥ | śleṣmādibhirvyāptatanurmriyamāṇo'vicetanaḥ

वह निःसंदेह अनन्त पुण्यलोक को जाएगा। जब शरीर कफ आदि से भर जाए और मनुष्य मरणासन्न और अचेत पड़ा हो, तब भी

श्लोक 16 (3.203.16)

ब्राह्मणा एव संपूज्याः पुण्यं स्वर्गमभीप्सता । श्राद्धकाले तु यत्नेन भोक्तव्या ह्यजुगुप्सिताः ॥

brāhmaṇā eva saṃpūjyāḥ puṇyaṃ svargamabhīpsatā | śrāddhakāle tu yatnena bhoktavyā hyajugupsitāḥ

पुण्य और स्वर्ग चाहने वाले को ब्राह्मणों का ही पूजन करना चाहिए। श्राद्ध के समय निर्दोष ब्राह्मणों को यत्नपूर्वक भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 17 (3.203.17)

दुर्बलः कुनखी कुष्ठी मायावी कुण्डगोलकौ । वर्जनीयाः प्रयत्नेन काण्डपृष्ठाश्च देहिनः ॥

durbalaḥ kunakhī kuṣṭhī māyāvī kuṇḍagolakau | varjanīyāḥ prayatnena kāṇḍapṛṣṭhāśca dehinaḥ

दुर्बल, बिगड़े नाखूनों वाला, कोढ़ी, मायावी, कुण्ड और गोलक (जारज पुत्र), और शस्त्र धारण करके जीविका चलाने वाले — इन्हें यत्नपूर्वक त्याग देना चाहिए।

श्लोक 18 (3.203.18)

जुगुप्सितं हि यच्छ्राद्धं दहत्यग्निरिवेन्धनम् ॥

jugupsitaṃ hi yacchrāddhaṃ dahatyagnirivendhanam

क्योंकि निन्दित व्यक्तियों से दूषित श्राद्ध (अपने फल को) वैसे ही जला डालता है जैसे अग्नि ईंधन को।

श्लोक 19 (3.203.19)

ये ये श्राद्धे न पूज्यन्ते मूकान्धबधिरादयः । तेऽपि सर्वे नियोक्तव्या मिश्रिता वेदपारगैः ॥

ye ye śrāddhe na pūjyante mūkāndhabadhirādayaḥ | te'pi sarve niyoktavyā miśritā vedapāragaiḥ

जिनका श्राद्ध में सत्कार नहीं होता — गूँगे, अंधे, बहरे आदि — वे भी सब नियुक्त किए जा सकते हैं, यदि वे वेदपारंगत ब्राह्मणों के साथ मिला दिए जाएँ।

श्लोक 20 (3.203.20)

प्रतिग्रहश्च वै देयः शृणु यस्य युधिष्ठिर । प्रदातारं तथाऽऽत्मानं यस्तारयति शक्तिमान् ॥

pratigrahaśca vai deyaḥ śṛṇu yasya yudhiṣṭhira | pradātāraṃ tathā''tmānaṃ yastārayati śaktimān

हे युधिष्ठिर, सुनो कि दान किसे देना चाहिए — उसे, जो दाता को और अपने आप को भी तारने की सामर्थ्य रखता है।

श्लोक 21 (3.203.21)

तस्मिन्देयं द्विजे दानं सर्वागमविजानता । प्रदातारं तथाऽऽत्मानं तारयेद्यः स शक्तिमान् ॥

tasmindeyaṃ dvije dānaṃ sarvāgamavijānatā | pradātāraṃ tathā''tmānaṃ tārayedyaḥ sa śaktimān

सब शास्त्रों के ज्ञाता को उसी द्विज को दान देना चाहिए जो दाता को और स्वयं को भी तारने में समर्थ हो।

श्लोक 22 (3.203.22)

न तथा हविषो होमैर्न पुष्पैर्नानुलेपनैः । अग्नयः पार्थ तुष्यन्ति यथा ह्यतिथिभोजने ॥

na tathā haviṣo homairna puṣpairnānulepanaiḥ | agnayaḥ pārtha tuṣyanti yathā hyatithibhojane

हे पार्थ, अग्निदेव घी की आहुतियों से, फूलों से या अनुलेपन से उतने प्रसन्न नहीं होते जितने अतिथियों को भोजन कराने से होते हैं।

श्लोक 23 (3.203.23)

तस्मात्त्वं सर्वयत्नेन यतस्वातिथिभोजने ॥

tasmāttvaṃ sarvayatnena yatasvātithibhojane

इसलिए तुम पूरे यत्न से अतिथियों को भोजन कराने में लगे रहो।

श्लोक 24 (3.203.24)

पादोदकं पादघृतं दीपमन्नं प्रतिश्रयम् । प्रयच्छन्ति तु ये राजन्नोपसर्पन्ति ते यमम् ॥

pādodakaṃ pādaghṛtaṃ dīpamannaṃ pratiśrayam | prayacchanti tu ye rājannopasarpanti te yamam

हे राजन्, जो अतिथि को पैर धोने का जल, पैरों के लिए घी, दीपक, अन्न और आश्रय देते हैं, वे यम के पास नहीं जाते।

श्लोक 25 (3.203.25)

देवमाल्यापनयनं द्विजोच्छिष्टावमार्जनम् । आकल्पपरिचर्या च गात्रसंवाहनानि च । अत्रैकैकं नृपश्रेष्ठ गोदानाद्व्यतिरिच्यते ॥

devamālyāpanayanaṃ dvijocchiṣṭāvamārjanam | ākalpaparicaryā ca gātrasaṃvāhanāni ca | atraikaikaṃ nṛpaśreṣṭha godānādvyatiricyate

देवताओं पर से उतरी मालाएँ हटाना, ब्राह्मणों का जूठन साफ़ करना, उनका वस्त्र-श्रृंगार सँवारना और उनके अंग दबाना — हे नृपश्रेष्ठ, इनमें से एक-एक काम गोदान से बढ़कर है।

श्लोक 26 (3.203.26)

कपिलायाः प्रदानात्तु मुच्यते नात्र संशयः । तस्मादलंकृतां दद्यात्कपिलां तु द्विजातये ॥

kapilāyāḥ pradānāttu mucyate nātra saṃśayaḥ | tasmādalaṃkṛtāṃ dadyātkapilāṃ tu dvijātaye

कपिला गौ के दान से मनुष्य मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। इसलिए सजाई हुई कपिला गौ द्विज को देनी चाहिए —

श्लोक 27 (3.203.27)

श्रोत्रियाय दरिद्राय गृहस्थायाग्निहोत्रिणे । पुत्रदाराभिभूताय तथा ह्यनुपकारिणे ॥

śrotriyāya daridrāya gṛhasthāyāgnihotriṇe | putradārābhibhūtāya tathā hyanupakāriṇe

ऐसे ब्राह्मण को जो वेदपाठी हो, दरिद्र हो, अग्निहोत्री गृहस्थ हो, स्त्री-पुत्रों के भार से दबा हो और जिसने दाता का कोई उपकार न किया हो।

श्लोक 28 (3.203.28)

एवंविधेषु दातव्या न समृद्धेषु भारत । को गुणो भरतश्रेष्ठ समृद्धेष्वभिवर्जितम् ॥

evaṃvidheṣu dātavyā na samṛddheṣu bhārata | ko guṇo bharataśreṣṭha samṛddheṣvabhivarjitam

हे भारत, गौ ऐसे ही लोगों को देनी चाहिए, धनवानों को नहीं। हे भरतश्रेष्ठ, समृद्ध व्यक्ति को दिए गए दान में कौन-सा गुण है?

श्लोक 29 (3.203.29)

एकस्यैका प्रदातव्या न बहूनां कदाचन । सा गौर्विक्रयमापन्ना हन्यात्त्रिपुरुषं कुलम् । न तारयति दातारं ब्राह्मणं नैव नैव तु ॥

ekasyaikā pradātavyā na bahūnāṃ kadācana | sā gaurvikrayamāpannā hanyāttripuruṣaṃ kulam | na tārayati dātāraṃ brāhmaṇaṃ naiva naiva tu

एक गौ एक ही व्यक्ति को देनी चाहिए, कभी अनेक को नहीं। यदि वह गौ बेची जाए तो तीन पीढ़ियों तक कुल का नाश करती है; वह न दाता को तारती है, न ब्राह्मण को।

श्लोक 30 (3.203.30)

ब्राह्मणस्य विशुद्धस्य सुवर्णं यः प्रयच्छति । सुवर्णानां शतं तेन दत्तं भवति शाश्वतम् ॥

brāhmaṇasya viśuddhasya suvarṇaṃ yaḥ prayacchati | suvarṇānāṃ śataṃ tena dattaṃ bhavati śāśvatam

जो शुद्ध आचरण वाले ब्राह्मण को सोना देता है, उसके द्वारा मानो सौ स्वर्ण-मुद्राएँ सदा के लिए दान हो जाती हैं।

श्लोक 31 (3.203.31)

अनड्वाहं तु यो दद्याद्बलवन्तं धुरंधरम् । स निस्तरति दुर्गाणि स्वर्गलोकं च गच्छति ॥

anaḍvāhaṃ tu yo dadyādbalavantaṃ dhuraṃdharam | sa nistarati durgāṇi svargalokaṃ ca gacchati

जो बलवान, बोझ ढोने में समर्थ बैल दान करता है, वह सब कठिनाइयों से पार हो जाता है और स्वर्गलोक को जाता है।

श्लोक 32 (3.203.32)

वसुंधरां तु यो दद्याद्द्विजाय विदुषात्मने । दातारं ह्यनुगच्छन्ति सर्वे कामाभिवाञ्छिताः ॥

vasuṃdharāṃ tu yo dadyāddvijāya viduṣātmane | dātāraṃ hyanugacchanti sarve kāmābhivāñchitāḥ

जो विद्वान द्विज को भूमि दान करता है, उस दाता के पीछे-पीछे सारी मनचाही वस्तुएँ चली आती हैं।

श्लोक 33 (3.203.33)

पृच्छन्ति चान्नदातारं वदन्ति पुरुषा भुवि । अध्वनि क्षीणगात्राश्च पांसुना चावकुण्ठिताः ॥

pṛcchanti cānnadātāraṃ vadanti puruṣā bhuvi | adhvani kṣīṇagātrāśca pāṃsunā cāvakuṇṭhitāḥ

मार्ग में थके, दुबले और धूल से सने लोग इस पृथ्वी पर अन्नदाता के बारे में पूछते हैं और उसकी चर्चा करते हैं।

श्लोक 34 (3.203.34)

तेषामेव श्रमार्तानां यो ह्यन्नं कथयेद्बुधः । अन्नदातृसमः सोऽपि कीर्त्यते नात्र संशयः ॥

teṣāmeva śramārtānāṃ yo hyannaṃ kathayedbudhaḥ | annadātṛsamaḥ so'pi kīrtyate nātra saṃśayaḥ

जो बुद्धिमान उन थके हुए लोगों को अन्न का पता बताता है, वह भी अन्नदाता के समान कहा जाता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 35 (3.203.35)

तस्मात्त्वं सर्वदानानि हित्वाऽन्नं संप्रयच्छ ह । न हीदृशं पुण्यफलं विचित्रमिह विद्यते ॥

tasmāttvaṃ sarvadānāni hitvā'nnaṃ saṃprayaccha ha | na hīdṛśaṃ puṇyaphalaṃ vicitramiha vidyate

इसलिए तुम अन्य सब दानों को छोड़कर अन्नदान करो। इस संसार में इसके समान अद्भुत पुण्यफल और कोई नहीं।

श्लोक 36 (3.203.36)

यथाशक्ति च यो दद्यादन्नं विप्रेषु संस्कृतम् । स तेन कर्मणाऽऽप्नोति प्रजापतिसलोकताम् ॥

yathāśakti ca yo dadyādannaṃ vipreṣu saṃskṛtam | sa tena karmaṇā''pnoti prajāpatisalokatām

जो अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को अच्छी तरह तैयार किया हुआ अन्न देता है, वह उस कर्म से प्रजापति के लोक में स्थान पाता है।

श्लोक 37 (3.203.37)

अन्नमेव विशिष्टं हि तस्मात्परतरं न च । अन्नं प्रजापतिश्चोक्तः स च संवत्सरो मतः ॥

annameva viśiṣṭaṃ hi tasmātparataraṃ na ca | annaṃ prajāpatiścoktaḥ sa ca saṃvatsaro mataḥ

अन्न ही सर्वश्रेष्ठ है; उससे बढ़कर कुछ नहीं। अन्न को प्रजापति कहा गया है, और प्रजापति संवत्सर माने गए हैं।

श्लोक 38 (3.203.38)

संवत्सरस्तु यज्ञोऽसौ सर्वं यज्ञे प्रतिष्ठितम् । तस्मात्सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥

saṃvatsarastu yajño'sau sarvaṃ yajñe pratiṣṭhitam | tasmātsarvāṇi bhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca

संवत्सर ही यज्ञ है और सब कुछ यज्ञ में प्रतिष्ठित है; उसी से सब स्थावर और जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 39 (3.203.39)

तस्मादन्नं विशिष्टं हि सर्वेभ्य इति विश्रुतम् ॥

tasmādannaṃ viśiṣṭaṃ hi sarvebhya iti viśrutam

इसलिए अन्न सबसे श्रेष्ठ प्रसिद्ध है।

श्लोक 40 (3.203.40)

येषां तटाकानि महोदकानि । वाप्यश्च कूपाश्च प्रतिश्रयाश्च । अन्नस्य दानं मधुरा च वाणी । यमस्य ते निर्वचना भवन्ति ॥

yeṣāṃ taṭākāni mahodakāni | vāpyaśca kūpāśca pratiśrayāśca | annasya dānaṃ madhurā ca vāṇī | yamasya te nirvacanā bhavanti

जिन्होंने जल से भरे तालाब, बावड़ियाँ, कुएँ और धर्मशालाएँ बनवाई हैं, जो अन्नदान करते हैं और मधुर वाणी बोलते हैं — वे यम की चर्चा तक नहीं सुनते।

श्लोक 41 (3.203.41)

धान्यं श्रमेणार्जितवित्तसंचितं । विप्रे सुशीले प्रतियच्छते यः । वसुंधरा तस्य भवेत्सुतुष्टा । धारां वसूनां प्रतिमुञ्चतीव ॥

dhānyaṃ śrameṇārjitavittasaṃcitaṃ | vipre suśīle pratiyacchate yaḥ | vasuṃdharā tasya bhavetsutuṣṭā | dhārāṃ vasūnāṃ pratimuñcatīva

जो मनुष्य परिश्रम से कमाए धन से संचित अन्न किसी सुशील ब्राह्मण को देता है, उससे पृथ्वी अत्यन्त प्रसन्न होती है और मानो उस पर धन की धारा बरसाती है।

श्लोक 42 (3.203.42)

अन्नदाः प्रथमं यान्ति सत्यवाक्तदनन्तरम् । अयाचितप्रदाता च समं यान्ति त्रयो जनाः ॥

annadāḥ prathamaṃ yānti satyavāktadanantaram | ayācitapradātā ca samaṃ yānti trayo janāḥ

अन्नदाता सबसे पहले जाते हैं, उनके बाद सत्य बोलने वाला, और बिना माँगे देने वाला — ये तीनों साथ-साथ चलते हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 43 (3.203.43)

कौतूहलसमुत्पन्नः पर्यपृच्छद्युधिष्ठिरः । मार्कण्डेयं महात्मानं पुनरेव सहानुजः ॥

kautūhalasamutpannaḥ paryapṛcchadyudhiṣṭhiraḥ | mārkaṇḍeyaṃ mahātmānaṃ punareva sahānujaḥ

तब कौतूहल से भरे युधिष्ठिर ने अपने छोटे भाइयों के साथ महात्मा मार्कण्डेय से फिर पूछा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 44 (3.203.44)

यमलोकस्य चाध्वानमन्तरं मानुषस्य च । कीदृशं किंप्रमाणं वा कथं वा तन्महामुने । तरन्ति पुरुषाश्चैव केनोपायेन शंस मे ॥

yamalokasya cādhvānamantaraṃ mānuṣasya ca | kīdṛśaṃ kiṃpramāṇaṃ vā kathaṃ vā tanmahāmune | taranti puruṣāścaiva kenopāyena śaṃsa me

"हे महामुने, मनुष्यलोक और यमलोक के बीच जो मार्ग है, वह कैसा है, कितना लंबा है, और मनुष्य किस उपाय से उसे पार करते हैं — यह मुझे बताइए।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 45 (3.203.45)

सर्वगुह्यतमं प्रश्नं पवित्रमृषिसंस्तुतम् । कथयिष्यामि ते राजन्धर्मं धर्मभृतां वर ॥

sarvaguhyatamaṃ praśnaṃ pavitramṛṣisaṃstutam | kathayiṣyāmi te rājandharmaṃ dharmabhṛtāṃ vara

यह प्रश्न सबसे अधिक गोपनीय, पवित्र और ऋषियों द्वारा प्रशंसित है। हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ राजन्, मैं तुम्हें यह धर्म बताऊँगा।

श्लोक 46 (3.203.46)

षडशीतिसहस्राणि योजनानां नराधिप । यमलोकस्य चाध्वानमन्तरं मानुषस्य च ॥

ṣaḍaśītisahasrāṇi yojanānāṃ narādhipa | yamalokasya cādhvānamantaraṃ mānuṣasya ca

हे नराधिप, मनुष्यलोक और यमलोक के बीच का मार्ग छियासी हज़ार योजन लंबा है।

श्लोक 47 (3.203.47)

आकाशं तदपानीयं घोरं कान्तारदर्शनम् । न तत्र वृक्षच्छाया वा पानीयं केतनानि च ॥

ākāśaṃ tadapānīyaṃ ghoraṃ kāntāradarśanam | na tatra vṛkṣacchāyā vā pānīyaṃ ketanāni ca

वह आकाश के समान सूना, जलरहित, भयानक और बीहड़ वन जैसा दिखता है। वहाँ न वृक्षों की छाया है, न जल, न ठहरने का कोई स्थान,

श्लोक 48 (3.203.48)

विश्रमेद्यत्र वै श्रान्तः पुरुषोऽध्वनि कर्शितः । नीयते यमदूतैस्तु यमस्याज्ञाकरैर्बलात् ॥

viśramedyatra vai śrāntaḥ puruṣo'dhvani karśitaḥ | nīyate yamadūtaistu yamasyājñākarairbalāt

जहाँ मार्ग से थका-माँदा मनुष्य विश्राम कर सके। यम की आज्ञा मानने वाले यमदूत उसे बलपूर्वक ले जाते हैं।

श्लोक 49 (3.203.49)

नराः स्त्रियस्तथैवान्ये पृथिव्यां जीवसंज्ञिताः । ब्राह्मणेभ्यः प्रदानानि नानारूपाणि पार्थिव ॥

narāḥ striyastathaivānye pṛthivyāṃ jīvasaṃjñitāḥ | brāhmaṇebhyaḥ pradānāni nānārūpāṇi pārthiva

पृथ्वी पर पुरुष, स्त्रियाँ और जीव कहलाने वाले अन्य प्राणी — हे राजन्, जिन्होंने ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान दिए हैं,

श्लोक 50 (3.203.50)

हयादीनां प्रकृष्टानि तेऽध्वानं यान्ति वै नराः । सन्निवार्यातपं यान्ति च्छत्रेणैव हि च्छत्रदाः ॥

hayādīnāṃ prakṛṣṭāni te'dhvānaṃ yānti vai narāḥ | sannivāryātapaṃ yānti cchatreṇaiva hi cchatradāḥ

उत्तम घोड़े आदि के दान — वे मनुष्य उन्हीं पर सवार होकर उस मार्ग पर जाते हैं। छत्र दान करने वाले छाते से धूप रोकते हुए जाते हैं।

श्लोक 51 (3.203.51)

तृप्ताश्चैवान्नदातारो ह्यतृप्ताश्चाप्यनन्नदाः । वस्त्रिणो वस्त्रदा यान्ति अवस्त्रा यान्त्यवस्त्रदाः ॥

tṛptāścaivānnadātāro hyatṛptāścāpyanannadāḥ | vastriṇo vastradā yānti avastrā yāntyavastradāḥ

अन्नदाता तृप्त होकर जाते हैं और अन्न न देने वाले भूखे; वस्त्र देने वाले वस्त्र पहनकर जाते हैं और वस्त्र न देने वाले नंगे।

श्लोक 52 (3.203.52)

हिरण्यदाः सुखं यान्ति पुरुषास्त्वभ्यलंकृताः । भूमिदास्तु सुखं यान्ति सर्वैः कामैः सुतर्पिताः ॥

hiraṇyadāḥ sukhaṃ yānti puruṣāstvabhyalaṃkṛtāḥ | bhūmidāstu sukhaṃ yānti sarvaiḥ kāmaiḥ sutarpitāḥ

स्वर्ण दान करने वाले आभूषणों से सजे सुखपूर्वक जाते हैं; भूमि दान करने वाले सब कामनाओं से तृप्त होकर सुख से जाते हैं।

श्लोक 53 (3.203.53)

यान्ति चैवापरिक्लिष्टा नराः सस्यप्रदायकाः । नराः सुखतरं यान्ति विमानेषु गृहप्रदाः ॥

yānti caivāparikliṣṭā narāḥ sasyapradāyakāḥ | narāḥ sukhataraṃ yānti vimāneṣu gṛhapradāḥ

अनाज दान करने वाले बिना कष्ट के जाते हैं, और घर दान करने वाले विमानों में और भी अधिक सुख से जाते हैं।

श्लोक 54 (3.203.54)

पानीयदा ह्यतृषिताः प्रहृष्टमनसो नराः । पन्थानं द्योतयन्तश्च यान्ति दीपप्रदाः सुखम् ॥

pānīyadā hyatṛṣitāḥ prahṛṣṭamanaso narāḥ | panthānaṃ dyotayantaśca yānti dīpapradāḥ sukham

जल दान करने वाले प्यास से रहित और प्रसन्नचित्त होकर जाते हैं; दीपदान करने वाले मार्ग को प्रकाशित करते हुए सुख से जाते हैं।

श्लोक 55 (3.203.55)

गोप्रदास्तु सुखं यान्ति निर्मुक्ताः सर्वपातकैः । विमानैर्हंससंयुक्तैर्यान्ति मासोपवासिनः ॥

gopradāstu sukhaṃ yānti nirmuktāḥ sarvapātakaiḥ | vimānairhaṃsasaṃyuktairyānti māsopavāsinaḥ

गोदान करने वाले सब पापों से मुक्त होकर सुख से जाते हैं; एक मास का उपवास करने वाले हंसों से जुते विमानों में जाते हैं,

श्लोक 56 (3.203.56)

तथा बर्हिप्रयुक्तैश्च षष्ठरात्रोपवासिनः । त्रिरात्रं क्षपते यस्तु एकभक्तेन पाण्डव ॥

tathā barhiprayuktaiśca ṣaṣṭharātropavāsinaḥ | trirātraṃ kṣapate yastu ekabhaktena pāṇḍava

और छह रात्रियों का उपवास करने वाले मोरों से जुते विमानों में। हे पाण्डव, जो तीन रातें एक ही समय भोजन करके बिताता है

श्लोक 57 (3.203.57)

अन्तरा चैव नाश्नाति तस्य लोका ह्यनामयाः । पानीयस्य गुणा दिव्याः प्रेतलोकसुखावहाः ॥

antarā caiva nāśnāti tasya lokā hyanāmayāḥ | pānīyasya guṇā divyāḥ pretalokasukhāvahāḥ

और बीच में कुछ नहीं खाता, उसे दुःखरहित लोक मिलते हैं। जलदान के दिव्य गुण प्रेतलोक में सुख देने वाले हैं।

श्लोक 58 (3.203.58)

तत्र पुष्पोदका नाम नदी तेषां विधीयते । शीतलं सलिलं तत्र पिबन्ति ह्यमृतोपमम् ॥

tatra puṣpodakā nāma nadī teṣāṃ vidhīyate | śītalaṃ salilaṃ tatra pibanti hyamṛtopamam

वहाँ उनके लिए पुष्पोदका नाम की नदी नियत है; वहाँ वे अमृत के समान शीतल जल पीते हैं।

श्लोक 59 (3.203.59)

ये च दुष्कृतकर्माणः पूयं तेषां विधीयते । एवं नदी महाराज सर्वकामप्रदा हि सा ॥

ye ca duṣkṛtakarmāṇaḥ pūyaṃ teṣāṃ vidhīyate | evaṃ nadī mahārāja sarvakāmapradā hi sā

और दुष्कर्म करने वालों के लिए वह पीब बन जाती है। हे महाराज, इस प्रकार वह नदी सब कामनाएँ पूरी करने वाली है।

श्लोक 60 (3.203.60)

तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र पूजयैनान्यथाविधि । अध्वनि क्षीणगात्रश्च पथि पांशुसमन्वितः ॥

tasmāttvamapi rājendra pūjayainānyathāvidhi | adhvani kṣīṇagātraśca pathi pāṃśusamanvitaḥ

इसलिए हे राजेन्द्र, तुम भी इनका विधिपूर्वक सत्कार करो। मार्ग में थका, दुबला और धूल से सना जो व्यक्ति

श्लोक 61 (3.203.61)

पृच्छते ह्यन्नदातारं गृहमायाति चाशया । तं पूजयाथ यत्नेन सोऽतिथिर्ब्राह्मणश्च सः ॥

pṛcchate hyannadātāraṃ gṛhamāyāti cāśayā | taṃ pūjayātha yatnena so'tithirbrāhmaṇaśca saḥ

अन्नदाता का पता पूछता हुआ आशा लेकर घर आता है — उसका यत्नपूर्वक सत्कार करो; वह अतिथि है और वही ब्राह्मण है।

श्लोक 62 (3.203.62)

तं यान्तमनुगच्छन्ति देवाः सर्वे सवासवाः । तस्मिन्संपूजिते प्रीता निराशा यान्त्यपूजिते ॥

taṃ yāntamanugacchanti devāḥ sarve savāsavāḥ | tasminsaṃpūjite prītā nirāśā yāntyapūjite

जब वह आगे जाता है तो इन्द्र सहित सब देवता उसके पीछे चलते हैं। उसका सत्कार होने पर वे प्रसन्न होते हैं, और सत्कार न होने पर निराश होकर लौट जाते हैं।

श्लोक 63 (3.203.63)

तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र पूजयैनं यथाविधि । एतत्ते शतशः प्रोक्तं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

tasmāttvamapi rājendra pūjayainaṃ yathāvidhi | etatte śataśaḥ proktaṃ kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi

इसलिए हे राजेन्द्र, तुम भी उसका विधिपूर्वक सत्कार करो। यह मैंने तुम्हें सैकड़ों प्रकार से कहा है; अब और क्या सुनना चाहते हो?

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 64 (3.203.64)

पुनः पुनरहं श्रोतुं कथां धर्मसमाश्रयाम् । पुण्यामिच्छामि धर्मज्ञ कथ्यमानां त्वया विभो ॥

punaḥ punarahaṃ śrotuṃ kathāṃ dharmasamāśrayām | puṇyāmicchāmi dharmajña kathyamānāṃ tvayā vibho

हे धर्मज्ञ प्रभो, आपके द्वारा कही जाने वाली धर्म पर आधारित पवित्र कथा को मैं बार-बार सुनना चाहता हूँ।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 65 (3.203.65)

धर्मान्तरं प्रति कथां कथ्यमानां मया नृप । सर्वपापहरां नित्यं शृणुष्वावहितो मम ॥

dharmāntaraṃ prati kathāṃ kathyamānāṃ mayā nṛpa | sarvapāpaharāṃ nityaṃ śṛṇuṣvāvahito mama

तो हे नृप, धर्म के एक अन्य विषय पर मेरी कही जाने वाली कथा ध्यान से सुनो, जो सदा सब पापों को हरने वाली है।

श्लोक 66 (3.203.66)

कपिलायां तु दत्तायां यत्फलं ज्येष्ठपुष्करे । तत्फलं भरतश्रेष्ठ विप्राणां पादधावने ॥

kapilāyāṃ tu dattāyāṃ yatphalaṃ jyeṣṭhapuṣkare | tatphalaṃ bharataśreṣṭha viprāṇāṃ pādadhāvane

हे भरतश्रेष्ठ, ज्येष्ठ पुष्कर में कपिला गौ का दान करने से जो फल मिलता है, वही फल ब्राह्मणों के पैर धोने से मिलता है।

श्लोक 67 (3.203.67)

द्विजपादोदकक्लिन्ना यावत्तिष्ठति मेदिनी । तावत्पुष्करपर्णेन पिबन्ति पितरो जलम् ॥

dvijapādodakaklinnā yāvattiṣṭhati medinī | tāvatpuṣkaraparṇena pibanti pitaro jalam

जब तक ब्राह्मण के चरण धोए जल से धरती गीली रहती है, तब तक पितर कमल के पत्ते से जल पीते हैं।

श्लोक 68 (3.203.68)

स्वागतेनाग्नयस्तृप्ता आसनेन शतक्रतुः । पितरः पादशौचेन अन्नाद्येन प्रजापतिः ॥

svāgatenāgnayastṛptā āsanena śatakratuḥ | pitaraḥ pādaśaucena annādyena prajāpatiḥ

स्वागत से अग्निदेव तृप्त होते हैं, आसन देने से शतक्रतु इन्द्र, पैर धुलाने से पितर और अन्न आदि से प्रजापति।

श्लोक 69 (3.203.69)

यावद्वत्सस्य पादौ द्वौ शिरश्चैव प्रदृश्यते । तस्मिन्काले प्रदातव्या प्रयतेनान्तरात्मना ॥

yāvadvatsasya pādau dvau śiraścaiva pradṛśyate | tasminkāle pradātavyā prayatenāntarātmanā

जब बछड़े के दोनों पैर और सिर दिखाई देने लगें, उसी समय संयमित अन्तःकरण से गौ का दान करना चाहिए।

श्लोक 70 (3.203.70)

अन्तरिक्षगतो वत्सो यावद्योन्यां प्रदृश्यते । तावद्गौः पृथिवी ज्ञेया यावद्गर्भं न मुञ्चति ॥

antarikṣagato vatso yāvadyonyāṃ pradṛśyate | tāvadgauḥ pṛthivī jñeyā yāvadgarbhaṃ na muñcati

जब तक बछड़ा अधर में योनि के पास दिखाई देता है और जब तक गौ उसे जन्म नहीं दे देती, तब तक उस गौ को पृथ्वी के समान जानना चाहिए।

श्लोक 71 (3.203.71)

यावन्ति तस्यां रोमाणि वत्सस्य च युधिष्ठिर । तावद्युगसहस्राणि स्वर्लोके महीयते ॥

yāvanti tasyāṃ romāṇi vatsasya ca yudhiṣṭhira | tāvadyugasahasrāṇi svarloke mahīyate

हे युधिष्ठिर, उस गौ और बछड़े के शरीर पर जितने रोम होते हैं, उतने हज़ार युगों तक दाता स्वर्गलोक में पूजित होता है।

श्लोक 72 (3.203.72)

सुवर्णनासां यः कृत्वा सखुरां कृष्णधेनुकाम् । तिलैः प्रच्छादितां दद्यात्सर्वरत्नैरलंकृताम् ॥

suvarṇanāsāṃ yaḥ kṛtvā sakhurāṃ kṛṣṇadhenukām | tilaiḥ pracchāditāṃ dadyātsarvaratnairalaṃkṛtām

जो सोने की नाक बनाकर, खुरों सहित, तिलों से ढकी और सब प्रकार के रत्नों से सजी काली गौ का दान करता है —

श्लोक 73 (3.203.73)

प्रतिग्रहं गृहीत्वा यः पुनर्ददति साधवे । फलानां फलमश्नाति तदा दत्त्वा च भारत ॥

pratigrahaṃ gṛhītvā yaḥ punardadati sādhave | phalānāṃ phalamaśnāti tadā dattvā ca bhārata

(और हे भारत, जो दान में पाई वस्तु को फिर किसी सज्जन को दे देता है, वह उस दान से फलों का भी फल भोगता है।)

श्लोक 74 (3.203.74)

ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना । चतुरन्ता भवेद्दत्ता पृथिवी नात्र संशयः ॥

sasamudraguhā tena saśailavanakānanā | caturantā bhaveddattā pṛthivī nātra saṃśayaḥ

— ऐसे दाता के द्वारा, निःसंदेह, समुद्र और गुफाओं सहित, पर्वतों, वनों और जंगलों सहित चारों ओर तक फैली पूरी पृथ्वी दान हो जाती है।

श्लोक 75 (3.203.75)

अन्तर्जानुशयो यस्तु भुञ्जते सक्तभाजनः । यो द्विजः शब्दरहितं संयन्तुस्तारणाय वै ॥

antarjānuśayo yastu bhuñjate saktabhājanaḥ | yo dvijaḥ śabdarahitaṃ saṃyantustāraṇāya vai

जो द्विज घुटनों के बीच हाथ रखकर, अपनी थाली से लगा हुआ और बिना आवाज़ किए भोजन करता है — ऐसा संयमी दूसरों को तारने में समर्थ होता है।

श्लोक 76 (3.203.76)

ये पानीयानि ददति तथाऽन्ये ये द्विजातयः । जपन्ति संहितां सम्यक्ते नित्यं तारणक्षमाः ॥

ye pānīyāni dadati tathā'nye ye dvijātayaḥ | japanti saṃhitāṃ samyakte nityaṃ tāraṇakṣamāḥ

जो जल दान करते हैं, और जो द्विज वेद की संहिता का विधिपूर्वक जप करते हैं, वे सदा दूसरों को तारने में समर्थ होते हैं।

श्लोक 77 (3.203.77)

हव्यं कव्यं च यत्किंचित्सर्वं तच्छ्रोत्रियोऽर्हति । दत्तं हि श्रोत्रिये साधौ ज्वलितेऽग्नौ यथा हुतम् ॥

havyaṃ kavyaṃ ca yatkiṃcitsarvaṃ tacchrotriyo'rhati | dattaṃ hi śrotriye sādhau jvalite'gnau yathā hutam

देवताओं या पितरों को जो कुछ भी अर्पण किया जाता है, उस सबका अधिकारी वेदपाठी ब्राह्मण है। सज्जन श्रोत्रिय को दिया दान प्रज्वलित अग्नि में दी गई आहुति के समान है।

श्लोक 78 (3.203.78)

मन्युप्रहरणा विप्रा न विप्राः शस्त्रयोधिनः । निहन्युर्मन्युना विप्रा वज्रपाणिरिवासुरान् ॥

manyupraharaṇā viprā na viprāḥ śastrayodhinaḥ | nihanyurmanyunā viprā vajrapāṇirivāsurān

ब्राह्मणों का शस्त्र क्रोध है; ब्राह्मण हथियारों से नहीं लड़ते। वे अपने क्रोध से ही शत्रुओं का नाश कर सकते हैं, जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरों का करते हैं।

श्लोक 79 (3.203.79)

धर्माश्रितेयं तु कथा कथिता हि तवानघ । यां श्रुत्वा मुनयः प्रीता नैमिषारण्यवासिनः ॥

dharmāśriteyaṃ tu kathā kathitā hi tavānagha | yāṃ śrutvā munayaḥ prītā naimiṣāraṇyavāsinaḥ

हे निष्पाप, मैंने तुम्हें धर्म पर आधारित यह कथा सुनाई है, जिसे सुनकर नैमिषारण्य में रहने वाले मुनि प्रसन्न हुए थे।

श्लोक 80 (3.203.80)

वीतशोकभयक्रोधा विपाप्मानस्तथैव च । श्रुत्वेमां तु कथां राजन्भवन्तीह तु मानवाः ॥

vītaśokabhayakrodhā vipāpmānastathaiva ca | śrutvemāṃ tu kathāṃ rājanbhavantīha tu mānavāḥ

हे राजन्, जो मनुष्य इस कथा को सुनते हैं, वे यहीं शोक, भय और क्रोध से रहित और निष्पाप हो जाते हैं।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 81 (3.203.81)

किं तच्छौचं भवेद्येन विप्रः शुद्धः सदा भवेत् । तदिच्छामि महाप्राज्ञ श्रोतुं धर्मभृतां वर ॥

kiṃ tacchaucaṃ bhavedyena vipraḥ śuddhaḥ sadā bhavet | tadicchāmi mahāprājña śrotuṃ dharmabhṛtāṃ vara

वह कौन-सा शौच है जिससे ब्राह्मण सदा शुद्ध रहता है? हे महाप्राज्ञ, धर्मात्माओं में श्रेष्ठ, मैं यह सुनना चाहता हूँ।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 82 (3.203.82)

वाक्शौचं कर्मशौचं च यच्च शौचं जलात्मकम् । त्रिभिः शौचैरुपेतो यः स स्वर्गी नात्र संशयः ॥

vākśaucaṃ karmaśaucaṃ ca yacca śaucaṃ jalātmakam | tribhiḥ śaucairupeto yaḥ sa svargī nātra saṃśayaḥ

वाणी की शुद्धि, कर्म की शुद्धि और जल से होने वाली शुद्धि — जिसमें ये तीनों शौच हों, वह स्वर्ग का अधिकारी है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 83 (3.203.83)

सायं प्रातश्च संध्यां यो ब्राह्मणोऽभ्युपसेवते । प्रजपन्पावनीं देवीं गायत्रीं वेदमातरम् ॥

sāyaṃ prātaśca saṃdhyāṃ yo brāhmaṇo'bhyupasevate | prajapanpāvanīṃ devīṃ gāyatrīṃ vedamātaram

जो ब्राह्मण सुबह और शाम संध्या-उपासना करता है और पवित्र करने वाली देवी, वेदमाता गायत्री का जप करता है —

श्लोक 84 (3.203.84)

स तया पावितो देव्या ब्राह्मणो नष्टकिल्बिषः । न सीदेत्प्रतिगृह्णानो महीमपि ससागराम् ॥

sa tayā pāvito devyā brāhmaṇo naṣṭakilbiṣaḥ | na sīdetpratigṛhṇāno mahīmapi sasāgarām

उस देवी से पवित्र होकर, पापों से रहित वह ब्राह्मण यदि समुद्रों सहित पूरी पृथ्वी भी दान में ले ले, तो भी उसका अहित नहीं होता।

श्लोक 85 (3.203.85)

ये चास्य दारुणा केचिद्ग्रहाः सूर्यादयो दिवि । ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवाः शिवतराः सदा ॥

ye cāsya dāruṇā kecidgrahāḥ sūryādayo divi | te cāsya saumyā jāyante śivāḥ śivatarāḥ sadā

आकाश में सूर्य आदि जो भी ग्रह उसके लिए क्रूर हों, वे उसके लिए सौम्य, कल्याणकारी और सदा अधिकाधिक शुभ हो जाते हैं।

श्लोक 86 (3.203.86)

सर्वे नानुगतं चैनं दारुणाः पिशिताशनाः । घोररूपा महाकाया धर्षयन्ति द्विजोत्तमम् ॥

sarve nānugataṃ cainaṃ dāruṇāḥ piśitāśanāḥ | ghorarūpā mahākāyā dharṣayanti dvijottamam

और भयानक रूप वाले, विशाल शरीर वाले, मांसभक्षी क्रूर राक्षस भी उस श्रेष्ठ ब्राह्मण पर, जिसके साथ गायत्री है, आक्रमण नहीं कर पाते।

श्लोक 87 (3.203.87)

नाध्यापनाद्याजनाद्वा अन्यायाद्वा प्रतिग्रहात् । दोषो भवति विप्राणां ज्वलिताग्निसमा द्विजाः ॥

nādhyāpanādyājanādvā anyāyādvā pratigrahāt | doṣo bhavati viprāṇāṃ jvalitāgnisamā dvijāḥ

पढ़ाने से, यज्ञ कराने से या अनुचित रूप से दान लेने से भी ब्राह्मणों को दोष नहीं लगता; द्विज प्रज्वलित अग्नि के समान होते हैं।

श्लोक 88 (3.203.88)

दुर्वेदा वा सुवेदा वा प्राकृताः संस्कृतास्तथा । ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्मच्छन्ना इवाग्नयः ॥

durvedā vā suvedā vā prākṛtāḥ saṃskṛtāstathā | brāhmaṇā nāvamantavyā bhasmacchannā ivāgnayaḥ

वेद कम जानते हों या अच्छी तरह, साधारण हों या संस्कारी — ब्राह्मणों का अपमान नहीं करना चाहिए; वे राख से ढकी अग्नि के समान हैं।

श्लोक 89 (3.203.89)

यथा श्मशाने दीप्तौजाः पावको नैव दुष्यति । एवं विद्वानविद्वान्वा ब्राह्मणो दैवतं महत् ॥

yathā śmaśāne dīptaujāḥ pāvako naiva duṣyati | evaṃ vidvānavidvānvā brāhmaṇo daivataṃ mahat

जैसे श्मशान में प्रज्वलित अग्नि दूषित नहीं होती, वैसे ही ब्राह्मण, विद्वान हो या अविद्वान, एक महान देवता है।

श्लोक 90 (3.203.90)

प्राकारैश्च पुरद्वारैः प्रासादैश्च पृथग्विधैः । नगराणि न शोभन्ते हीनानि ब्राह्मणोत्तमैः ॥

prākāraiśca puradvāraiḥ prāsādaiśca pṛthagvidhaiḥ | nagarāṇi na śobhante hīnāni brāhmaṇottamaiḥ

परकोटे, नगर-द्वार और तरह-तरह के महल होने पर भी, श्रेष्ठ ब्राह्मणों से रहित नगर शोभा नहीं पाते।

श्लोक 91 (3.203.91)

वेदाढ्या वृत्तसंपन्ना ज्ञानवन्तस्तपस्विनः । यत्र तिष्ठन्ति वै विप्रास्तन्नाम नगरं नृप ॥

vedāḍhyā vṛttasaṃpannā jñānavantastapasvinaḥ | yatra tiṣṭhanti vai viprāstannāma nagaraṃ nṛpa

हे राजन्, जहाँ वेदों के धनी, सदाचारी, ज्ञानवान और तपस्वी ब्राह्मण रहते हैं, वही सच्चा नगर है।

श्लोक 92 (3.203.92)

व्रजे वाऽप्यथवाऽरण्ये यत्र सन्ति बहुश्रुताः । तत्तन्नगरमित्याहुः पार्थ तीर्थं च तद्भवेत् ॥

vraje vā'pyathavā'raṇye yatra santi bahuśrutāḥ | tattannagaramityāhuḥ pārtha tīrthaṃ ca tadbhavet

हे पार्थ, चाहे गोशाला हो या वन, जहाँ भी बहुश्रुत विद्वान रहते हैं, उसे नगर कहा जाता है, और वह तीर्थ भी बन जाता है।

श्लोक 93 (3.203.93)

रक्षितारं च राजानं ब्राह्मणं च तपस्विनम् । अभिगम्याभिपूज्याथ सद्यः पापात्प्रमुच्यते ॥

rakṣitāraṃ ca rājānaṃ brāhmaṇaṃ ca tapasvinam | abhigamyābhipūjyātha sadyaḥ pāpātpramucyate

रक्षा करने वाले राजा और तपस्वी ब्राह्मण के पास जाकर उनका पूजन करने से मनुष्य तुरंत पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 94 (3.203.94)

पुण्यतीर्थाभिषेकं च पवित्राणां च कीर्तनम् । सद्भिः संभाषणं चैव प्रशस्तं कीर्त्यते बुधैः ॥

puṇyatīrthābhiṣekaṃ ca pavitrāṇāṃ ca kīrtanam | sadbhiḥ saṃbhāṣaṇaṃ caiva praśastaṃ kīrtyate budhaiḥ

पवित्र तीर्थों में स्नान, पावन मन्त्रों का कीर्तन और सज्जनों से वार्तालाप — इन्हें ज्ञानी प्रशंसनीय बताते हैं।

श्लोक 95 (3.203.95)

साधुसङ्गमपूतेन वाक्सुभाषितवारिणा । पवित्रीकृतमात्मानं सन्तो मन्यन्ते नित्यशः ॥

sādhusaṅgamapūtena vāksubhāṣitavāriṇā | pavitrīkṛtamātmānaṃ santo manyante nityaśaḥ

सज्जन सदा अपने आप को सत्संग से पवित्र हुआ और सुवचनों के जल से शुद्ध हुआ मानते हैं।

श्लोक 96 (3.203.96)

त्रिदण्डधारणं मौनं जटाभारोऽथ मुण्डनम् । वल्कलाजिनसंवेष्टं व्रतचर्याऽभिषेचनम् ॥

tridaṇḍadhāraṇaṃ maunaṃ jaṭābhāro'tha muṇḍanam | valkalājinasaṃveṣṭaṃ vratacaryā'bhiṣecanam

त्रिदण्ड धारण करना, मौन रहना, जटाओं का भार या मुण्डन, वल्कल और मृगचर्म ओढ़ना, व्रतों का पालन, तीर्थ-स्नान,

श्लोक 97 (3.203.97)

अग्निहोत्रं वने वासः शरीरपरिशोषणम् । सर्वाण्येतानि मिथ्या स्युर्यदि भावो न निर्मलः ॥

agnihotraṃ vane vāsaḥ śarīrapariśoṣaṇam | sarvāṇyetāni mithyā syuryadi bhāvo na nirmalaḥ

अग्निहोत्र, वनवास और शरीर को सुखाना — यदि भाव निर्मल न हो, तो ये सब मिथ्या हैं।

श्लोक 98 (3.203.98)

विशुद्धिं चक्षुरादीनां षण्णामिन्द्रियगामिनाम् । विकारि तेषां राजेन्द्र सुदुष्करतरं मनः ॥

viśuddhiṃ cakṣurādīnāṃ ṣaṇṇāmindriyagāminām | vikāri teṣāṃ rājendra suduṣkarataraṃ manaḥ

नेत्र आदि छह इन्द्रियों को, जो विषयों की ओर दौड़ती हैं, शुद्ध करना कठिन है; किन्तु हे राजेन्द्र, उनमें विकारशील मन को वश में करना सबसे अधिक दुष्कर है।

श्लोक 99 (3.203.99)

ये पापानि न कुर्वन्ति मनोवाक्कर्मबुद्धिभिः । ते तपन्ति महात्मानो न शरीरस्य शोषणम् ॥

ye pāpāni na kurvanti manovākkarmabuddhibhiḥ | te tapanti mahātmāno na śarīrasya śoṣaṇam

जो महात्मा मन, वाणी, कर्म और बुद्धि से पाप नहीं करते, वही सच्चा तप करते हैं; शरीर को सुखाना तप नहीं है।

श्लोक 100 (3.203.100)

न ज्ञातिभ्यो दया यस्य शुक्लदेहोऽविकल्मषः । हिंसा सा तपसस्तस्य नानाशित्वं तपः स्मृतम् ॥

na jñātibhyo dayā yasya śukladeho'vikalmaṣaḥ | hiṃsā sā tapasastasya nānāśitvaṃ tapaḥ smṛtam

जिसके मन में अपने स्वजनों के प्रति दया नहीं, वह शुद्ध जीविका वाला और निष्कलंक दिखता हुआ भी अपने तप का नाश करता है; केवल भोजन त्याग देना तप नहीं माना गया।

श्लोक 101 (3.203.101)

तिष्ठन्गृहे चैव मुनिर्नित्यं शुचिरलंकृतः । यावज्जीवं दयावांश्च सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

tiṣṭhangṛhe caiva munirnityaṃ śuciralaṃkṛtaḥ | yāvajjīvaṃ dayāvāṃśca sarvapāpaiḥ pramucyate

घर में रहता हुआ भी जो सदा पवित्र और सद्गुणों से अलंकृत रहता है, वह मुनि है; जो जीवनभर दयालु रहता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 102 (3.203.102)

न हि पापानि कर्माणि शुद्ध्यन्त्यनशनादिभिः । सीदत्यनशनादेव मांसशोणितलेपनः ॥

na hi pāpāni karmāṇi śuddhyantyanaśanādibhiḥ | sīdatyanaśanādeva māṃsaśoṇitalepanaḥ

उपवास आदि से पापकर्म शुद्ध नहीं होते; उपवास से तो केवल मांस और रक्त से बना शरीर ही क्षीण होता है।

श्लोक 103 (3.203.103)

अज्ञातं कर्म कृत्वा च क्लेशो नान्यत्प्रहीयते । नाग्निर्दहति कर्माणि भावशून्यस्य देहिनः ॥

ajñātaṃ karma kṛtvā ca kleśo nānyatprahīyate | nāgnirdahati karmāṇi bhāvaśūnyasya dehinaḥ

शास्त्र में न बताया गया कर्म करने से केवल कष्ट ही मिलता है, और कुछ (पाप) नष्ट नहीं होता। भावशून्य देहधारी के कर्मों को अग्नि नहीं जलाती।

श्लोक 104 (3.203.104)

पुण्यादेव प्रव्रजन्ति शुध्यन्त्यनशनानि च । न मूलफलभक्षित्वान्न मौनान्नानिलाशनात् ॥

puṇyādeva pravrajanti śudhyantyanaśanāni ca | na mūlaphalabhakṣitvānna maunānnānilāśanāt

पुण्य से ही मनुष्य आगे बढ़ते हैं और पुण्य से ही उपवास शुद्ध करते हैं — कंद-मूल-फल खाने से नहीं, मौन से नहीं, वायु पीकर रहने से नहीं,

श्लोक 105 (3.203.105)

शिरसो मुण्डनाद्वाऽपि न स्थानकुटिकासनात् । न जटाधारणाद्वाऽपि न तु स्थानकुटिकासनात् ॥

śiraso muṇḍanādvā'pi na sthānakuṭikāsanāt | na jaṭādhāraṇādvā'pi na tu sthānakuṭikāsanāt

न सिर मुँड़ाने से, न घर-बार छोड़ने से, न जटा रखने से, और न ही घर-बार त्याग देने से,

श्लोक 106 (3.203.106)

नित्यं ह्यनशनाद्वाऽपि नाग्निशुश्रूषणादपि । न चोदकप्रवेशेन न च क्ष्माशयनादपि ॥

nityaṃ hyanaśanādvā'pi nāgniśuśrūṣaṇādapi | na codakapraveśena na ca kṣmāśayanādapi

न सदा उपवास करने से, न अग्नि की सेवा से, न जल में प्रवेश करने से और न भूमि पर सोने से।

श्लोक 107 (3.203.107)

ज्ञानेन कर्मणा वापि जरामरणमेव च । व्याधयश्च प्रहीयन्ते प्राप्यते चोत्तमं पदम् ॥

jñānena karmaṇā vāpi jarāmaraṇameva ca | vyādhayaśca prahīyante prāpyate cottamaṃ padam

ज्ञान से या सत्कर्म से बुढ़ापा, मृत्यु और रोग दूर होते हैं और परम पद प्राप्त होता है।

श्लोक 108 (3.203.108)

बीजानि ह्यग्निदग्धानि न रोहन्ति पुनर्यथा । ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्नात्मा संयुज्यते पुनः ॥

bījāni hyagnidagdhāni na rohanti punaryathā | jñānadagdhaistathā kleśairnātmā saṃyujyate punaḥ

जैसे आग में भुने बीज फिर नहीं उगते, वैसे ही ज्ञान से जले क्लेशों से आत्मा फिर नहीं बँधता।

श्लोक 109 (3.203.109)

आत्मना विप्रहीणानि काष्ठकुण्ठोपमानि च । विनश्यन्ति न संदेहः फेनानीव महार्णवे ॥

ātmanā viprahīṇāni kāṣṭhakuṇṭhopamāni ca | vinaśyanti na saṃdehaḥ phenānīva mahārṇave

आत्मा से रहित शरीर सूखी लकड़ी के समान हैं; वे निःसंदेह नष्ट हो जाते हैं, जैसे महासागर में फेन।

श्लोक 110 (3.203.110)

आत्मानं विन्दते येन सर्वभूतगुहाशयम् । श्लोकेन यदि वाऽर्धेन क्षीणं तस्य प्रयोजनम् ॥

ātmānaṃ vindate yena sarvabhūtaguhāśayam | ślokena yadi vā'rdhena kṣīṇaṃ tasya prayojanam

जिससे मनुष्य सब प्राणियों के हृदय में रहने वाले आत्मा को जान लेता है — चाहे एक श्लोक से या आधे श्लोक से — उसका प्रयोजन पूरा हो जाता है।

श्लोक 111 (3.203.111)

द्व्यक्षरादभिसंधाय केचिच्छ्लोकपदाङ्कितैः । शतैरन्यैः सहस्रैश्च प्रत्ययो मोक्षलक्षणम् ॥

dvyakṣarādabhisaṃdhāya kecicchlokapadāṅkitaiḥ | śatairanyaiḥ sahasraiśca pratyayo mokṣalakṣaṇam

कुछ लोग दो अक्षरों के शब्द से उस पर मन टिकाते हैं, कुछ श्लोकों के पदों से अंकित सैकड़ों और हज़ारों शब्दों से; किन्तु मोक्ष का लक्षण दृढ़ निश्चय है।

श्लोक 112 (3.203.112)

नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः । ऊचुर्ज्ञानविदो वृद्धाः प्रत्ययो मोक्षलक्षणम् ॥

nāyaṃ loko'sti na paro na sukhaṃ saṃśayātmanaḥ | ūcurjñānavido vṛddhāḥ pratyayo mokṣalakṣaṇam

संशय करने वाले के लिए न यह लोक है, न परलोक, न सुख। ज्ञान के जानकार वृद्धों ने कहा है कि मोक्ष का लक्षण दृढ़ निश्चय है।

श्लोक 113 (3.203.113)

विदितार्थस्तु वेदानां परिवेद प्रयोजनम् । उद्विजेत्स तु देवेभ्यो दावाग्नेरिव मानवः ॥

viditārthastu vedānāṃ pariveda prayojanam | udvijetsa tu devebhyo dāvāgneriva mānavaḥ

जिसने वेदों का अर्थ जान लिया है, वह उनके सच्चे प्रयोजन को जानता है; वह देवताओं (से मिलने वाले भोगों) से वैसे ही डरता है जैसे मनुष्य दावानल से।

श्लोक 114 (3.203.114)

शुष्कं तर्कं परित्यज्य आश्रयस्व श्रुतिं स्मृतिम् । एकाक्षराभिसंबद्धं तत्त्वं हेतुभिरिच्छसि । बुद्धिर्न तस्य सिद्ध्येत साधनस्य विपर्ययात् ॥

śuṣkaṃ tarkaṃ parityajya āśrayasva śrutiṃ smṛtim | ekākṣarābhisaṃbaddhaṃ tattvaṃ hetubhiricchasi | buddhirna tasya siddhyeta sādhanasya viparyayāt

शुष्क तर्क छोड़कर श्रुति और स्मृति का आश्रय लो। यदि तुम एकाक्षर (ॐ) से जुड़े तत्त्व को केवल हेतुओं से जानना चाहोगे, तो साधन के उलटे होने से तुम्हारी बुद्धि सफल नहीं होगी।

श्लोक 115 (3.203.115)

वेद्यं पूर्वं वेदितव्यं प्रयत्ना- । त्तद्धीर्वेदस्तस्य वेदः शरीरम् । वेदस्तत्त्वं तत्समासोपलब्धिः । क्लीबस्त्वात्मा न स वेद्यं न वेदः ॥

vedyaṃ pūrvaṃ veditavyaṃ prayatnā- | ttaddhīrvedastasya vedaḥ śarīram | vedastattvaṃ tatsamāsopalabdhiḥ | klībastvātmā na sa vedyaṃ na vedaḥ

जो जानने योग्य है, उसे पहले प्रयत्न से जानना चाहिए; वही बुद्धि वेद है और वेद उसका शरीर है। वेद ही तत्त्व है, और उसी का संक्षेप में बोध है; किन्तु दुर्बल आत्मा न जानने योग्य को जानता है, न वेद को।

श्लोक 116 (3.203.116)

वेदोक्तमायुर्देवानामाशिषश्चैव कर्मणाम् । फलत्यनुयुगं लोके प्रभावश्च शरीरिणाम् ॥

vedoktamāyurdevānāmāśiṣaścaiva karmaṇām | phalatyanuyugaṃ loke prabhāvaśca śarīriṇām

वेद में बताई गई देवताओं की आयु, कर्मों के आशीर्वाद (फल) और देहधारियों का प्रभाव — ये संसार में प्रत्येक युग के अनुसार फल देते हैं।

श्लोक 117 (3.203.117)

इन्द्रियाणां प्रसादेन तदेतत्परिवर्जयेत् । तस्मादनशनं दिव्यं निरुद्धेन्द्रियगोचरम् ॥

indriyāṇāṃ prasādena tadetatparivarjayet | tasmādanaśanaṃ divyaṃ niruddhendriyagocaram

इन्द्रियों की निर्मलता से इन सबका त्याग करना चाहिए। इसलिए इन्द्रियों को उनके विषयों से रोक लेना ही दिव्य उपवास है।

श्लोक 118 (3.203.118)

तपसा स्वर्गगमनं भोगो दानेन जायते । ज्ञानेन मोक्षो विज्ञेयस्तीर्थस्नानादघक्षयः ॥

tapasā svargagamanaṃ bhogo dānena jāyate | jñānena mokṣo vijñeyastīrthasnānādaghakṣayaḥ

तप से स्वर्ग मिलता है, दान से भोग; ज्ञान से मोक्ष जानना चाहिए, और तीर्थस्नान से पापों का क्षय होता है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 119 (3.203.119)

एवमुक्तस्तु राजेन्द्र प्रत्युवाच महायशाः । भगवञ्श्रोतुमिच्छामि प्रदानविधिमुत्तमम् ॥

evamuktastu rājendra pratyuvāca mahāyaśāḥ | bhagavañśrotumicchāmi pradānavidhimuttamam

हे राजेन्द्र, ऐसा कहे जाने पर महायशस्वी युधिष्ठिर ने उत्तर दिया — "भगवन्, मैं दान की उत्तम विधि सुनना चाहता हूँ।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 120 (3.203.120)

यत्तत्पृच्छसि राजेन्द्र दानधर्मं युधिष्ठिर । इष्टं चेदं सदा मह्यं राजन्गौरवतस्तथा ॥

yattatpṛcchasi rājendra dānadharmaṃ yudhiṣṭhira | iṣṭaṃ cedaṃ sadā mahyaṃ rājangauravatastathā

हे राजेन्द्र युधिष्ठिर, तुम जिस दानधर्म के बारे में पूछते हो, वह अपने गौरव के कारण मुझे सदा प्रिय रहा है, हे राजन्।

श्लोक 121 (3.203.121)

शृणु दानरहस्यानि श्रुतिस्मृत्युदितानि च । छायायां करिणः श्राद्धं तत्कर्णपरिवीजितम् । दशकल्पायुतानीह न क्षीयेत युधिष्ठिर ॥

śṛṇu dānarahasyāni śrutismṛtyuditāni ca | chāyāyāṃ kariṇaḥ śrāddhaṃ tatkarṇaparivījitam | daśakalpāyutānīha na kṣīyeta yudhiṣṭhira

श्रुति और स्मृति में कहे गए दान के रहस्य सुनो। हाथी की छाया में, उसके कानों से पंखा झलते हुए किया गया श्राद्ध, हे युधिष्ठिर, दस अयुत कल्पों तक क्षीण नहीं होता।

श्लोक 122 (3.203.122)

जीवनाय समाक्लिन्नं वसु दत्त्वा महीपते । विप्रं तु वासयेद्यस्तु सर्वयज्ञैः स इष्टवान् ॥

jīvanāya samāklinnaṃ vasu dattvā mahīpate | vipraṃ tu vāsayedyastu sarvayajñaiḥ sa iṣṭavān

हे महीपते, जो ब्राह्मण को जीविका के लिए ताज़ा अन्न आदि धन देकर उसे रहने का स्थान देता है, उसने मानो सब यज्ञ कर लिए।

श्लोक 123 (3.203.123)

प्रतिस्रोतश्चित्रवाहाः पर्जन्योऽन्नानुसंचरन् । महाधुरि यथा नावा महापापैः प्रमुच्यते । विषुवे विप्रदत्तानि दधिमध्वक्षयाणि च ॥

pratisrotaścitravāhāḥ parjanyo'nnānusaṃcaran | mahādhuri yathā nāvā mahāpāpaiḥ pramucyate | viṣuve vipradattāni dadhimadhvakṣayāṇi ca

जहाँ नदी उलटी दिशा में बहती हो वहाँ दिए गए उत्तम घोड़े, और अन्न के लिए घूमते पर्जन्य (का सत्कार) अक्षय होते हैं; जैसे बड़ी धारा में मनुष्य बह निकलता है, वैसे ही दाता बड़े पापों से छूट जाता है। विषुव के दिन ब्राह्मणों को दिए गए दही और मधु अक्षय होते हैं।

श्लोक 124 (3.203.124)

पर्वसु द्विगुणं दानमृतौ दशगुणं भवेत् । अब्दे दशगुणं प्रोक्तमनन्तं विषुवे भवेत् ॥

parvasu dviguṇaṃ dānamṛtau daśaguṇaṃ bhavet | abde daśaguṇaṃ proktamanantaṃ viṣuve bhavet

पर्व के दिनों में दिया दान दुगना होता है, ऋतु-परिवर्तन पर दसगुना; वर्ष के आरंभ में भी दसगुना कहा गया है, और विषुव पर वह अनन्त हो जाता है।

श्लोक 125 (3.203.125)

अयने विषुवे चैव षडशीतिमुखेषु च । चन्द्रसूर्योपरागे च दत्तमक्षयमुच्यते ॥

ayane viṣuve caiva ṣaḍaśītimukheṣu ca | candrasūryoparāge ca dattamakṣayamucyate

अयन के समय, विषुव पर, षडशीतिमुख संक्रान्तियों पर और चन्द्र-सूर्य ग्रहण के समय दिया गया दान अक्षय कहा जाता है।

श्लोक 126 (3.203.126)

ऋतुषु दशगुणं वदन्ति दत्तं । शतगुणमृत्वयनादिषु ध्रुवम् । भवति सहस्रगुणं दिनस्य राहो- । र्विषुवति चाक्षयमश्नुते फलम् ॥

ṛtuṣu daśaguṇaṃ vadanti dattaṃ | śataguṇamṛtvayanādiṣu dhruvam | bhavati sahasraguṇaṃ dinasya rāho- | rviṣuvati cākṣayamaśnute phalam

कहते हैं कि ऋतु-परिवर्तन पर दिया दान दसगुना होता है, अयन आदि पर निश्चय ही सौगुना; राहु के दिन (ग्रहण पर) हज़ारगुना होता है, और विषुव पर दाता अक्षय फल भोगता है।

श्लोक 127 (3.203.127)

नाभूमिदो भूमिमश्नाति राज- । न्नायानदो यानमारुह्य याति । यान्यान्कामान्ब्राह्मणेभ्यो ददाति । तांस्तान्कामाञ्जायमानः स भुङ्क्ते ॥

nābhūmido bhūmimaśnāti rāja- | nnāyānado yānamāruhya yāti | yānyānkāmānbrāhmaṇebhyo dadāti | tāṃstānkāmāñjāyamānaḥ sa bhuṅkte

हे राजन्, जिसने भूमि दान नहीं की, वह भूमि का भोग नहीं करता; जिसने वाहन दान नहीं किया, वह वाहन पर चढ़कर नहीं चलता। मनुष्य ब्राह्मणों को जो-जो प्रिय वस्तुएँ देता है, अगले जन्म में वही-वही वस्तुएँ भोगता है।

श्लोक 128 (3.203.128)

अग्नेरपत्यं प्रथमं सुवर्णं । भूर्वैष्णवी सूर्यसुताश्च गावः । लोकास्त्रयस्तेन भवन्ति दत्ता । यः काञ्चनं गाश्च महीं च दद्यात् ॥

agnerapatyaṃ prathamaṃ suvarṇaṃ | bhūrvaiṣṇavī sūryasutāśca gāvaḥ | lokāstrayastena bhavanti dattā | yaḥ kāñcanaṃ gāśca mahīṃ ca dadyāt

सोना अग्नि की पहली संतान है, पृथ्वी विष्णु की है, और गौएँ सूर्य की पुत्रियाँ हैं। जो सोना, गौएँ और भूमि दान करता है, उसके द्वारा मानो तीनों लोक दान हो जाते हैं।

श्लोक 129 (3.203.129)

परं हि दानान्न बभूव शाश्वतं । भव्यं त्रिलोके भवते कुतः पुनः । तस्मात्प्रधानं परमं हि दानं । वदन्ति लोकेषु विशिष्टबुद्धयः ॥

paraṃ hi dānānna babhūva śāśvataṃ | bhavyaṃ triloke bhavate kutaḥ punaḥ | tasmātpradhānaṃ paramaṃ hi dānaṃ | vadanti lokeṣu viśiṣṭabuddhayaḥ

दान से बढ़कर स्थायी वस्तु कभी नहीं हुई; फिर तीनों लोकों में आगे कोई उससे श्रेष्ठ कैसे होगी? इसलिए संसार के विशिष्ट बुद्धि वाले लोग दान को ही प्रधान और परम बताते हैं।

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