आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 204
उदङ्क की स्तुति और विष्णु का वरदान
इन्द्रद्युम्न के पुनः स्वर्ग पाने की कथा सुनकर युधिष्ठिर मार्कण्डेय से पूछते हैं कि इक्ष्वाकुवंशी कुवलाश्व धुन्धुमार कैसे कहलाए। मार्कण्डेय मुनि उदङ्क की कथा से आरम्भ करते हैं, जो मरुभूमि में दीर्घकाल तक तप करके विष्णु के दर्शन पाते हैं और उनकी विश्वरूप पुरुष के रूप में स्तुति करते हैं। उदङ्क केवल धर्म में स्थिर बुद्धि और नित्य भक्ति का वर माँगते हैं; विष्णु वह वर देकर बताते हैं कि घोर तप कर रहे असुर धुन्धु का वध उदङ्क की प्रेरणा से बृहदश्व का पुत्र कुवलाश्व विष्णु के योगबल से करेगा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.204.1)
श्रुत्वा तु राजा राजर्षेरिन्द्रद्युम्नस्य तत्तथा । मार्कण्डेयान्महाभागात्स्वर्गस्य प्रतिपादनम् ॥
śrutvā tu rājā rājarṣerindradyumnasya tattathā | mārkaṇḍeyānmahābhāgātsvargasya pratipādanam
महाभाग मार्कण्डेय से राजर्षि इन्द्रद्युम्न के इस प्रकार पुनः स्वर्ग में प्रतिष्ठित होने का वृत्तान्त सुनकर राजा —
श्लोक 2 (3.204.2)
युधिष्ठिरो महाराज पप्रच्छ भरतर्षभ । मार्कण्डेयं तपोवृद्धं दीर्घायुषमकल्मषम् ॥
yudhiṣṭhiro mahārāja papraccha bharatarṣabha | mārkaṇḍeyaṃ tapovṛddhaṃ dīrghāyuṣamakalmaṣam
— युधिष्ठिर ने, हे महाराज, हे भरतश्रेष्ठ, तप में बढ़े-चढ़े, दीर्घायु और निष्पाप मार्कण्डेय से प्रश्न किया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 3 (3.204.3)
विदितास्तव धर्मज्ञ देवदानवरक्षसाम् । राजवंशाश्च विविधा ऋषिवंशाश्च शाश्वताः ॥
viditāstava dharmajña devadānavarakṣasām | rājavaṃśāśca vividhā ṛṣivaṃśāśca śāśvatāḥ
हे धर्मज्ञ! आप देवताओं, दानवों और राक्षसों के वंशों को, अनेक राजवंशों को और ऋषियों के सनातन वंशों को जानते हैं।
श्लोक 4 (3.204.4)
न तेऽस्त्यविदितं किंचिदस्मिँल्लोके द्विजोत्तम । अथ वेत्सि मुने वंशान्मनुष्योरगरक्षसाम् ॥
na te'styaviditaṃ kiṃcidasmim̐lloke dvijottama | atha vetsi mune vaṃśānmanuṣyoragarakṣasām
हे द्विजश्रेष्ठ! इस लोक में आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है। हे मुने! आप मनुष्यों, नागों और राक्षसों के वंशों को भी जानते हैं,
श्लोक 5 (3.204.5)
देवगन्धर्वयक्षाणां किन्नराप्सरसां तथा । इदमिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वे द्विजसत्तम ॥
devagandharvayakṣāṇāṃ kinnarāpsarasāṃ tathā | idamicchāmyahaṃ śrotuṃ tattve dvijasattama
और देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों, किन्नरों तथा अप्सराओं के वंशों को भी। हे द्विजोत्तम! मैं आपसे यथार्थ रूप में यह सुनना चाहता हूँ —
श्लोक 6 (3.204.6)
कुवलाश्व इति ख्यात इक्ष्वाकुकुलसंभवः । कथं नाम विपर्यासाद्धुन्धुमारत्वमागतः ॥
kuvalāśva iti khyāta ikṣvākukulasaṃbhavaḥ | kathaṃ nāma viparyāsāddhundhumāratvamāgataḥ
इक्ष्वाकु-कुल में उत्पन्न जो कुवलाश्व नाम से विख्यात थे, वे नाम बदलकर धुन्धुमार कैसे हो गए?
श्लोक 7 (3.204.7)
एतदिच्छामि तत्त्वेन ज्ञातुं भार्गवसत्तम । विपर्यस्तं यथा नाम कुवलाश्वस्य धीमतः ॥
etadicchāmi tattvena jñātuṃ bhārgavasattama | viparyastaṃ yathā nāma kuvalāśvasya dhīmataḥ
हे भार्गवश्रेष्ठ! मैं ठीक-ठीक जानना चाहता हूँ कि बुद्धिमान कुवलाश्व का नाम किस प्रकार बदल गया।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 8 (3.204.8)
युधिष्ठिरेणैवमुक्तो मार्कण्डेयो महामुनिः । धौन्धुमारमुपाख्यानं कथयामास भारत ॥
yudhiṣṭhireṇaivamukto mārkaṇḍeyo mahāmuniḥ | dhaundhumāramupākhyānaṃ kathayāmāsa bhārata
हे भारत! युधिष्ठिर के ऐसा कहने पर महामुनि मार्कण्डेय ने धुन्धुमार का उपाख्यान सुनाया।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 9 (3.204.9)
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु राजन्युधिष्ठिर । धर्मिष्ठमिदमाख्यानं धुन्धुमारस्य तच्छृणु ॥
hanta te kathayiṣyāmi śṛṇu rājanyudhiṣṭhira | dharmiṣṭhamidamākhyānaṃ dhundhumārasya tacchṛṇu
हे राजा युधिष्ठिर! सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ। धुन्धुमार का यह आख्यान अत्यन्त धर्ममय है; इसे सुनो।
श्लोक 10 (3.204.10)
यथा स राजा ऐक्ष्वाकः कुवलाश्वो महीपतिः । धुन्धुमारत्वमगमत्तच्छृणुष्व महीपते ॥
yathā sa rājā aikṣvākaḥ kuvalāśvo mahīpatiḥ | dhundhumāratvamagamattacchṛṇuṣva mahīpate
हे पृथ्वीपति! सुनो कि इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्व किस प्रकार धुन्धुमार बने।
श्लोक 11 (3.204.11)
महर्षिर्विश्रुतस्तात उदङ्क इति भारत । मरुधन्वसु रम्येषु आश्रमस्तस्य कौरव ॥
maharṣirviśrutastāta udaṅka iti bhārata | marudhanvasu ramyeṣu āśramastasya kaurava
हे तात, हे भारत! उदङ्क नाम के एक विख्यात महर्षि थे। हे कौरव! उनका आश्रम रमणीय मरुभूमि में था।
श्लोक 12 (3.204.12)
उदङ्कस्तु महाराज तपोऽतप्यत्सुदुश्चरम् । आरिराधयिषुर्विष्णुं बहून्वर्षगणान्विभुः ॥
udaṅkastu mahārāja tapo'tapyatsuduścaram | ārirādhayiṣurviṣṇuṃ bahūnvarṣagaṇānvibhuḥ
हे महाराज! सामर्थ्यवान उदङ्क ने विष्णु को प्रसन्न करने की इच्छा से बहुत वर्षों तक अत्यन्त कठिन तप किया।
श्लोक 13 (3.204.13)
तस्य प्रीतः स भगवान्साक्षाद्दर्शनमेयिवान् । दृष्ट्वा महर्षिस्तद्ब्रह्म तुष्टाव विविधैः स्तवैः ॥
tasya prītaḥ sa bhagavānsākṣāddarśanameyivān | dṛṣṭvā maharṣistadbrahma tuṣṭāva vividhaiḥ stavaiḥ
उनसे प्रसन्न होकर भगवान् ने उन्हें साक्षात् दर्शन दिए। उस ब्रह्म का दर्शन करके महर्षि ने अनेक प्रकार के स्तोत्रों से उनकी स्तुति की।
उदङ्क उवाच
श्लोक 14 (3.204.14)
त्वया देव प्रजाः सर्वाः ससुरासुरमानवाः । स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि तथैव च ॥
tvayā deva prajāḥ sarvāḥ sasurāsuramānavāḥ | sthāvarāṇi ca bhūtāni jaṅgamāni tathaiva ca
हे देव! देवता, असुर और मनुष्य — ये सारी प्रजाएँ, तथा सभी स्थावर और जंगम प्राणी आपने ही रचे हैं;
श्लोक 15 (3.204.15)
ब्रह्म वेदाश्च वेद्यं च त्वया सृष्टं महाद्युते । शिरस्ते गगनं देव नेत्रे शशिदिवाकरौ ॥
brahma vedāśca vedyaṃ ca tvayā sṛṣṭaṃ mahādyute | śiraste gaganaṃ deva netre śaśidivākarau
हे महातेजस्वी! ब्रह्म, वेद और वेदों से जानने योग्य तत्त्व भी आपने ही रचे हैं। हे देव! आकाश आपका सिर है, चन्द्रमा और सूर्य आपके नेत्र हैं;
श्लोक 16 (3.204.16)
निःश्वासः पवनश्चापि तेजोऽग्निश्च तवाच्युत । बाहवस्ते दिशः सर्वाः कुक्षिश्चापि महार्णवः ॥
niḥśvāsaḥ pavanaścāpi tejo'gniśca tavācyuta | bāhavaste diśaḥ sarvāḥ kukṣiścāpi mahārṇavaḥ
हे अच्युत! वायु आपका श्वास है और अग्नि आपका तेज; सारी दिशाएँ आपकी भुजाएँ हैं और महासागर आपका उदर।
श्लोक 17 (3.204.17)
ऊरू ते पर्वता देव खं नाभिर्मधुसूदन । पादौ ते पृथिवी चैव रोमाण्योषधयस्तथा ॥
ūrū te parvatā deva khaṃ nābhirmadhusūdana | pādau te pṛthivī caiva romāṇyoṣadhayastathā
हे देव, हे मधुसूदन! पर्वत आपकी जंघाएँ हैं और आकाश आपकी नाभि; पृथ्वी आपके चरण हैं और ओषधियाँ आपके रोम।
श्लोक 18 (3.204.18)
इन्द्रसोमाग्निवरुणा देवासुरमहोरगाः । प्रह्वास्त्वामुपतिष्ठन्ति स्तुवन्तो विविधैः स्तवैः ॥
indrasomāgnivaruṇā devāsuramahoragāḥ | prahvāstvāmupatiṣṭhanti stuvanto vividhaiḥ stavaiḥ
इन्द्र, सोम, अग्नि और वरुण, देवता, असुर और महानाग विनत होकर अनेक स्तोत्रों से आपकी स्तुति करते हुए आपकी सेवा में उपस्थित रहते हैं।
श्लोक 19 (3.204.19)
त्वया व्याप्तानि सर्वाणि भूतानि भुवनेश्वर । योगिनः सुमहावीर्याः स्तुवन्ति त्वां महर्षयः ॥
tvayā vyāptāni sarvāṇi bhūtāni bhuvaneśvara | yoginaḥ sumahāvīryāḥ stuvanti tvāṃ maharṣayaḥ
हे भुवनेश्वर! सभी प्राणी आपसे व्याप्त हैं। महान् शक्तिशाली योगी और महर्षि आपकी स्तुति करते हैं।
श्लोक 20 (3.204.20)
त्वयि तुष्टे जगच्छान्तं त्वयि क्रुद्धे महद्भयम् । भयानामपनेतासि त्वमेकः पुरुषोत्तम ॥
tvayi tuṣṭe jagacchāntaṃ tvayi kruddhe mahadbhayam | bhayānāmapanetāsi tvamekaḥ puruṣottama
आपके प्रसन्न रहने पर जगत् शान्त रहता है और आपके क्रुद्ध होने पर महान् भय छा जाता है। हे पुरुषोत्तम! भयों को दूर करने वाले एकमात्र आप ही हैं।
श्लोक 21 (3.204.21)
देवानां मानुषाणां च सर्वभूतसुखावहः । त्रिभिर्विक्रमणैर्देव त्रयो लोकास्त्वया वृताः ॥
devānāṃ mānuṣāṇāṃ ca sarvabhūtasukhāvahaḥ | tribhirvikramaṇairdeva trayo lokāstvayā vṛtāḥ
आप देवताओं, मनुष्यों और सभी प्राणियों को सुख देने वाले हैं। हे देव! आपने तीन पगों से तीनों लोकों को व्याप्त कर लिया।
श्लोक 22 (3.204.22)
असुराणां समृद्धानां विनाशश्च त्वया कृतः । तव विक्रमणैर्देवा निर्वाणमगमन्परम् ॥
asurāṇāṃ samṛddhānāṃ vināśaśca tvayā kṛtaḥ | tava vikramaṇairdevā nirvāṇamagamanparam
समृद्ध असुरों का विनाश भी आपने ही किया। आपके पराक्रम से देवताओं ने परम शान्ति पाई,
श्लोक 23 (3.204.23)
पराभवं च दैत्येन्द्रास्त्वयि क्रुद्धे महाद्युते । त्वं हि कर्ता विकर्ता च भूतानामिह सर्वशः । आराधयित्वा त्वां देवाः सुखमेधन्ति नित्यशः ॥
parābhavaṃ ca daityendrāstvayi kruddhe mahādyute | tvaṃ hi kartā vikartā ca bhūtānāmiha sarvaśaḥ | ārādhayitvā tvāṃ devāḥ sukhamedhanti nityaśaḥ
और हे महातेजस्वी! आपके कुपित होने पर दैत्यराज पराजित हुए। यहाँ सब प्राणियों के कर्ता और संहर्ता आप ही हैं। आपकी आराधना करके देवता सदा सुख से फलते-फूलते हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 24 (3.204.24)
एवं स्तुतो हृषीकेश उदङ्केन महात्मना । उदङ्कमब्रवीद्विष्णुः प्रीतस्तेऽहं वरं वृणु ॥
evaṃ stuto hṛṣīkeśa udaṅkena mahātmanā | udaṅkamabravīdviṣṇuḥ prītaste'haṃ varaṃ vṛṇu
महात्मा उदङ्क द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर हृषीकेश विष्णु ने उदङ्क से कहा — "मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, वर माँगो।"
उदङ्क उवाच
श्लोक 25 (3.204.25)
पर्याप्तो मे वरो ह्येष यदहं दृष्टवान्हरिम् । पुरुषं शाश्वतं दिव्यं स्रष्टारं जगतः प्रभुम् ॥
paryāpto me varo hyeṣa yadahaṃ dṛṣṭavānharim | puruṣaṃ śāśvataṃ divyaṃ sraṣṭāraṃ jagataḥ prabhum
मेरे लिए यही वर पर्याप्त है कि मैंने हरि के दर्शन कर लिए — उस सनातन दिव्य पुरुष के, जो जगत् के स्रष्टा और स्वामी हैं।
विष्णुरुवाच
श्लोक 26 (3.204.26)
प्रीतस्तेऽहमलौल्येन भक्त्या तव च सत्तम । अवश्यं हि त्वया ब्रह्मन्मत्तो ग्राह्यो वरो द्विज ॥
prītaste'hamalaulyena bhaktyā tava ca sattama | avaśyaṃ hi tvayā brahmanmatto grāhyo varo dvija
हे सज्जनश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी निर्लोभता और भक्ति से प्रसन्न हूँ। हे ब्रह्मन्, हे द्विज! तुम्हें मुझसे वर अवश्य लेना होगा।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 27 (3.204.27)
एवं स च्छन्द्यमानस्तु वरेण हरिणा तदा । उदङ्कः प्राञ्जलिर्वव्रे वरं भरतसत्तम ॥
evaṃ sa cchandyamānastu vareṇa hariṇā tadā | udaṅkaḥ prāñjalirvavre varaṃ bharatasattama
हे भरतश्रेष्ठ! हरि द्वारा इस प्रकार वर लेने का आग्रह किए जाने पर उदङ्क ने हाथ जोड़कर यह वर माँगा —
उदङ्क उवाच
श्लोक 28 (3.204.28)
यदि मे भगवन्प्रीतः पुण्डरीकनिभेक्षण । धर्मे सत्ये दमे चैव बुद्धिर्भवतु मे सदा । अभ्यासश्च भवेद्भक्त्या त्वयि नित्यं ममेश्वर ॥
yadi me bhagavanprītaḥ puṇḍarīkanibhekṣaṇa | dharme satye dame caiva buddhirbhavatu me sadā | abhyāsaśca bhavedbhaktyā tvayi nityaṃ mameśvara
हे कमलनयन भगवन्! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो मेरी बुद्धि सदा धर्म, सत्य और इन्द्रिय-संयम में लगी रहे, और हे मेरे ईश्वर, आपकी भक्ति में मेरा अभ्यास नित्य बना रहे।
भगवानुवाच
श्लोक 29 (3.204.29)
सर्वमेतद्धि भविता मत्प्रसादात्तव द्विज ॥
sarvametaddhi bhavitā matprasādāttava dvija
हे द्विज! मेरी कृपा से यह सब तुम्हें प्राप्त होगा।
श्लोक 30 (3.204.30)
प्रतिभास्यति योगश्च येन युक्तो दिवौकसाम् । त्रयाणामपि लोकानां महत्कार्यं करिष्यसि ॥
pratibhāsyati yogaśca yena yukto divaukasām | trayāṇāmapi lokānāṃ mahatkāryaṃ kariṣyasi
तुममें वह योगशक्ति भी प्रकट होगी, जिससे युक्त होकर तुम स्वर्गवासी देवताओं के लिए और तीनों लोकों के लिए एक महान् कार्य करोगे।
श्लोक 31 (3.204.31)
उत्सादनार्थं लोकानां धुन्धुर्नाम महासुरः । तपस्यति तपो घोरं शृणु यस्तं हनिष्यति ॥
utsādanārthaṃ lokānāṃ dhundhurnāma mahāsuraḥ | tapasyati tapo ghoraṃ śṛṇu yastaṃ haniṣyati
धुन्धु नाम का एक महान् असुर लोकों का विनाश करने के लिए घोर तप कर रहा है। सुनो, उसे कौन मारेगा।
श्लोक 32 (3.204.32)
राजा हि वीर्यवांस्तात इक्ष्वाकुरपराजितः । बृहदश्व इति ख्यातो भविष्यति महीपतिः ॥
rājā hi vīryavāṃstāta ikṣvākuraparājitaḥ | bṛhadaśva iti khyāto bhaviṣyati mahīpatiḥ
हे तात! इक्ष्वाकु-वंश में एक पराक्रमी और अपराजित राजा होगा, जो बृहदश्व नाम से विख्यात पृथ्वीपति बनेगा।
श्लोक 33 (3.204.33)
तस्य पुत्रः शुचिर्दान्तः कुवलाश्व इति श्रुतः । स योगबलमास्थाय मामकं पार्थिवोत्तमः । शासनात्तव विप्रर्षे धुन्धुमारो भविष्यति ॥
tasya putraḥ śucirdāntaḥ kuvalāśva iti śrutaḥ | sa yogabalamāsthāya māmakaṃ pārthivottamaḥ | śāsanāttava viprarṣe dhundhumāro bhaviṣyati
उसका पुत्र पवित्र और संयमी होगा, जो कुवलाश्व नाम से प्रसिद्ध होगा। हे विप्रर्षे! वह श्रेष्ठ राजा मेरे योगबल का आश्रय लेकर तुम्हारी आज्ञा से धुन्धुमार बनेगा।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 34 (3.204.34)
उदङ्कमेवमुक्त्वा तु विष्णुरन्तरधीयत ॥
udaṅkamevamuktvā tu viṣṇurantaradhīyata
उदङ्क से ऐसा कहकर विष्णु अन्तर्धान हो गए।