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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 205

उदङ्क का बृहदश्व से धुन्धु-वध का अनुरोध

मार्कण्डेय शशाद से लेकर बृहदश्व और उनके पुत्र कुवलाश्व तक इक्ष्वाकु-वंश का वर्णन करते हैं; कुवलाश्व के इक्कीस हजार पुत्र थे। जब बृहदश्व कुवलाश्व का राज्याभिषेक करके वन को चलते हैं, तब मुनि उदङ्क उन्हें रोककर कहते हैं कि प्रजा की रक्षा ही राजा का सबसे बड़ा धर्म है। वे बताते हैं कि मधु-कैटभ का पुत्र दानव धुन्धु उनके आश्रम के पास उज्जालक की बालू के नीचे पड़ा है; ब्रह्मा के वर से वह अवध्य है और उसके वार्षिक श्वास से धूल और आग के साथ पृथ्वी काँप उठती है। विष्णु ने वचन दिया है कि जो राजा उसे मारेगा, उसमें वे अपने तेज से प्रवेश करेंगे।

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मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.205.1)

इक्ष्वाकौ संस्थिते राजञ्शशादः पृथिवीमिमाम् । प्राप्तः परमधर्मात्मा सोऽयोध्यायां नृपोऽभवत् ॥

ikṣvākau saṃsthite rājañśaśādaḥ pṛthivīmimām | prāptaḥ paramadharmātmā so'yodhyāyāṃ nṛpo'bhavat

हे राजन्! इक्ष्वाकु के दिवंगत होने पर परम धर्मात्मा शशाद ने यह पृथ्वी पाई और वे अयोध्या के राजा हुए।

श्लोक 2 (3.205.2)

शशादस्य तु दायादः ककुत्स्थो नाम वीर्यवान् । अनेनाश्चापि काकुत्स्थः पृथुश्चानेनसः सुतः ॥

śaśādasya tu dāyādaḥ kakutstho nāma vīryavān | anenāścāpi kākutsthaḥ pṛthuścānenasaḥ sutaḥ

शशाद के उत्तराधिकारी पराक्रमी ककुत्स्थ थे; ककुत्स्थ के पुत्र अनेना हुए और अनेना के पुत्र पृथु।

श्लोक 3 (3.205.3)

विष्वगश्वः पृथोः पुत्रस्तस्मादार्द्रश्च जज्ञिवान् । आर्द्रस्य युवनाश्वस्तु श्रावस्तस्तस्य चात्मजः ॥

viṣvagaśvaḥ pṛthoḥ putrastasmādārdraśca jajñivān | ārdrasya yuvanāśvastu śrāvastastasya cātmajaḥ

पृथु के पुत्र विष्वगश्व थे और उनसे आर्द्र का जन्म हुआ; आर्द्र के पुत्र युवनाश्व हुए और उनके पुत्र श्रावस्त।

श्लोक 4 (3.205.4)

जज्ञे श्रावस्तको राजा श्रावस्ती येन निर्मिता । श्रावस्तस्य तु दायादो बृहदश्वो महाबलः ॥

jajñe śrāvastako rājā śrāvastī yena nirmitā | śrāvastasya tu dāyādo bṛhadaśvo mahābalaḥ

वही राजा श्रावस्तक हुए, जिन्होंने श्रावस्ती नगरी बसाई। श्रावस्त के उत्तराधिकारी महाबली बृहदश्व थे।

श्लोक 5 (3.205.5)

बृहदश्वस्य दायादः कुवलाश्व इति स्मृतः । कुवलाश्वस्य पुत्राणां सहस्राण्येकविंशतिः ॥

bṛhadaśvasya dāyādaḥ kuvalāśva iti smṛtaḥ | kuvalāśvasya putrāṇāṃ sahasrāṇyekaviṃśatiḥ

बृहदश्व के उत्तराधिकारी कुवलाश्व के नाम से स्मरण किए जाते हैं। कुवलाश्व के इक्कीस हजार पुत्र थे,

श्लोक 6 (3.205.6)

सर्वे विद्यासु निष्णाता बलवन्तो दुरासदाः । कुवलाश्वश्च पितृतोगुणैरभ्यधिकोऽभवत् ॥

sarve vidyāsu niṣṇātā balavanto durāsadāḥ | kuvalāśvaśca pitṛtoguṇairabhyadhiko'bhavat

सभी विद्याओं में निपुण, बलवान और दुर्जय थे। कुवलाश्व गुणों में अपने पिता से भी बढ़कर थे।

श्लोक 7 (3.205.7)

समये तं तदा राज्ये बृहदश्वोऽभ्यषेचयत् । कुवलाश्वं महाराज शूरमुत्तमधार्मिकम् ॥

samaye taṃ tadā rājye bṛhadaśvo'bhyaṣecayat | kuvalāśvaṃ mahārāja śūramuttamadhārmikam

हे महाराज! उचित समय आने पर बृहदश्व ने शूरवीर और परम धार्मिक कुवलाश्व का राज्य पर अभिषेक कर दिया।

श्लोक 8 (3.205.8)

पुत्रसंक्रामितश्रीस्तु बृहदश्वो महीपतिः । जगाम तपसे धीमांस्तपोवनममित्रहा ॥

putrasaṃkrāmitaśrīstu bṛhadaśvo mahīpatiḥ | jagāma tapase dhīmāṃstapovanamamitrahā

अपनी राजलक्ष्मी पुत्र को सौंपकर शत्रुनाशक, बुद्धिमान राजा बृहदश्व तप करने के लिए तपोवन को चले गए।

श्लोक 9 (3.205.9)

अथ शुश्राव राजर्षिं तमुदङ्को नराधिप । वनं संप्रस्थितं राजन्बृहदश्वं द्विजोत्तमः ॥

atha śuśrāva rājarṣiṃ tamudaṅko narādhipa | vanaṃ saṃprasthitaṃ rājanbṛhadaśvaṃ dvijottamaḥ

हे नराधिप! तब द्विजश्रेष्ठ उदङ्क ने सुना कि राजर्षि बृहदश्व वन के लिए प्रस्थान कर चुके हैं।

श्लोक 10 (3.205.10)

तमुदङ्को महातेजाः सर्वास्त्रविदुषांवरम् । न्यवारयदमेयात्मा समासाद्य पुरोत्तमे ॥

tamudaṅko mahātejāḥ sarvāstraviduṣāṃvaram | nyavārayadameyātmā samāsādya purottame

महातेजस्वी और अपार आत्मबल वाले उदङ्क ने उस श्रेष्ठ नगर में पहुँचकर समस्त अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ उस राजा को रोका।

उदङ्क उवाच

श्लोक 11 (3.205.11)

भवता रक्षणं कार्यं तत्तावत्कर्तुमर्हसि । निरुद्विग्ना वयं राजंस्त्वत्प्रसादाद्वसेमहि ॥

bhavatā rakṣaṇaṃ kāryaṃ tattāvatkartumarhasi | nirudvignā vayaṃ rājaṃstvatprasādādvasemahi

रक्षा करना आपका कर्तव्य है; पहले उसे ही पूरा कीजिए। हे राजन्! आपकी कृपा से हम निर्भय होकर रहें।

श्लोक 12 (3.205.12)

त्वया हि पृथिवी राजन्रक्ष्यमाणा महात्मना । भविष्यति निरुद्विग्ना नारण्यं गन्तुमर्हसि ॥

tvayā hi pṛthivī rājanrakṣyamāṇā mahātmanā | bhaviṣyati nirudvignā nāraṇyaṃ gantumarhasi

हे राजन्! आप जैसे महात्मा से रक्षित होकर ही पृथ्वी निर्भय रहेगी; आपको वन में नहीं जाना चाहिए।

श्लोक 13 (3.205.13)

पालने हि महान्धर्मः प्रजानामिह दृश्यते । न तथा दृश्यतेऽरण्ये माभूत्ते बुद्धिरीदृशी ॥

pālane hi mahāndharmaḥ prajānāmiha dṛśyate | na tathā dṛśyate'raṇye mābhūtte buddhirīdṛśī

प्रजा के पालन में ही यहाँ महान् धर्म दिखाई देता है; वन में वैसा धर्म नहीं दिखता। आप ऐसा विचार न करें।

श्लोक 14 (3.205.14)

ईदृशो न हि राजेन्द्र धर्मः क्वचन दृश्यते । प्रजानां पालने यत्नः पुरा राजर्षिभिः कृतः ॥

īdṛśo na hi rājendra dharmaḥ kvacana dṛśyate | prajānāṃ pālane yatnaḥ purā rājarṣibhiḥ kṛtaḥ

हे राजेन्द्र! प्राचीन राजर्षियों ने प्रजा के पालन में जो प्रयत्न किया, वैसा धर्म और कहीं दिखाई नहीं देता।

श्लोक 15 (3.205.15)

रक्षितव्याः प्रजा राज्ञा तास्त्वं रक्षितुमर्हसि । निरुद्विग्नस्तपस्तप्तुं न हि शक्नोमि पार्थिव ॥

rakṣitavyāḥ prajā rājñā tāstvaṃ rakṣitumarhasi | nirudvignastapastaptuṃ na hi śaknomi pārthiva

राजा को प्रजा की रक्षा करनी चाहिए; आप उनकी रक्षा करें। हे पृथ्वीपति! मैं निर्भय होकर तप नहीं कर पा रहा हूँ।

श्लोक 16 (3.205.16)

ममाश्रमसमीपे वै समेषु मरुधन्वसु । समुद्रवालुकापूर्ण उज्जालक इति स्मृतः । बहुयोजनविस्तीर्णो बहुयोजनमायतः ॥

mamāśramasamīpe vai sameṣu marudhanvasu | samudravālukāpūrṇa ujjālaka iti smṛtaḥ | bahuyojanavistīrṇo bahuyojanamāyataḥ

मेरे आश्रम के पास समतल मरुभूमि में बालू से भरा एक समुद्र है, जो उज्जालक नाम से प्रसिद्ध है। वह अनेक योजन चौड़ा और अनेक योजन लम्बा है।

श्लोक 17 (3.205.17)

तत्र रौद्रो दानवेन्द्रो महावीर्यपराक्रमः । मधुकैटभयोः पुत्रो धुन्धुर्नाम सुदारुणः । अन्तर्भूमिगतो राजन्वसत्यमितविक्रमः ॥

tatra raudro dānavendro mahāvīryaparākramaḥ | madhukaiṭabhayoḥ putro dhundhurnāma sudāruṇaḥ | antarbhūmigato rājanvasatyamitavikramaḥ

वहाँ महान् बल और पराक्रम वाला, अत्यन्त भयंकर धुन्धु नाम का दानवराज रहता है, जो मधु और कैटभ का पुत्र है। हे राजन्! वह असीम पराक्रमी भूमि के भीतर निवास करता है।

श्लोक 18 (3.205.18)

तं निहत्य महाराज वनं त्वं गन्तुमर्हसि ॥

taṃ nihatya mahārāja vanaṃ tvaṃ gantumarhasi

हे महाराज! उसे मारकर ही आप वन को जाइए।

श्लोक 19 (3.205.19)

शेते लोकविनाशाय तप आस्थाय दारुणम् । त्रिदशानां विनाशाय लोकानां चापि पार्थिव ॥

śete lokavināśāya tapa āsthāya dāruṇam | tridaśānāṃ vināśāya lokānāṃ cāpi pārthiva

हे पृथ्वीपति! वह लोकों के विनाश के लिए — देवताओं और समस्त लोकों का संहार करने के लिए — कठोर तप का आश्रय लेकर सोया पड़ा है।

श्लोक 20 (3.205.20)

अवध्यो दैवतानां हि दैत्यानामथ रक्षसाम् । नागानामथ यक्षाणां गन्धर्वाणां च सर्वशः । अवाप्य स वरं राजन्सर्वलोकपितामहात् ॥

avadhyo daivatānāṃ hi daityānāmatha rakṣasām | nāgānāmatha yakṣāṇāṃ gandharvāṇāṃ ca sarvaśaḥ | avāpya sa varaṃ rājansarvalokapitāmahāt

हे राजन्! सब लोकों के पितामह ब्रह्मा से वर पाकर वह देवताओं, दैत्यों, राक्षसों, नागों, यक्षों और गन्धर्वों — किसी के द्वारा भी मारा नहीं जा सकता।

श्लोक 21 (3.205.21)

तं विनाशय भद्रं ते मा ते बुद्धिरतोऽन्यथा । प्राप्स्यसे महतीं कीर्तिं शाश्वतीमव्ययां ध्रुवाम् ॥

taṃ vināśaya bhadraṃ te mā te buddhirato'nyathā | prāpsyase mahatīṃ kīrtiṃ śāśvatīmavyayāṃ dhruvām

आपका कल्याण हो, उसका विनाश कीजिए; आपका मन इससे विमुख न हो। इससे आपको महान्, शाश्वत, अक्षय और अटल कीर्ति मिलेगी।

श्लोक 22 (3.205.22)

क्रूरस्य तस्य स्वपतो वालुकान्तर्हितस्य च । संवत्सरस्य पर्यन्ते निःश्वासः संप्रवर्तते ॥

krūrasya tasya svapato vālukāntarhitasya ca | saṃvatsarasya paryante niḥśvāsaḥ saṃpravartate

बालू के नीचे छिपा वह क्रूर असुर सोया रहता है, और प्रत्येक वर्ष के अन्त में उसका श्वास बाहर निकलता है।

श्लोक 23 (3.205.23)

यदा तदा भूश्चलति सशैलवनकानना । तस्य निःश्वासवातेन रज उद्धूयते महत् ॥

yadā tadā bhūścalati saśailavanakānanā | tasya niḥśvāsavātena raja uddhūyate mahat

जब ऐसा होता है, तब पर्वतों, वनों और काननों सहित पृथ्वी काँप उठती है, और उसके श्वास की वायु से धूल का भारी बवंडर उठता है।

श्लोक 24 (3.205.24)

आदित्यरथमाश्रित्य सप्ताहं भूमिकम्पनम् । सविस्फुलिङ्गं सज्वालं धूममिश्रं सुदारुणम् ॥

ādityarathamāśritya saptāhaṃ bhūmikampanam | savisphuliṅgaṃ sajvālaṃ dhūmamiśraṃ sudāruṇam

वह धूल सूर्य के रथ तक पहुँच जाती है, और सात दिन तक धरती डोलती रहती है — चिनगारियों, लपटों और धुएँ से भरा अत्यन्त भयंकर उपद्रव।

श्लोक 25 (3.205.25)

तेन राजन्न शक्नोमि तस्मिन्स्थातुं स्व आश्रमे ॥

tena rājanna śaknomi tasminsthātuṃ sva āśrame

हे राजन्! इसी कारण मैं अपने आश्रम में नहीं रह पाता।

श्लोक 26 (3.205.26)

तं विनाशय राजेन्द्र लोकानां हितकाम्यया । लोकाः स्वस्था भविष्यन्ति तस्मिन्विनिहतेऽसुरे ॥

taṃ vināśaya rājendra lokānāṃ hitakāmyayā | lokāḥ svasthā bhaviṣyanti tasminvinihate'sure

हे राजेन्द्र! लोकों के हित की इच्छा से उसका विनाश कीजिए। उस असुर के मारे जाने पर सारे लोक सुखी हो जाएँगे।

श्लोक 27 (3.205.27)

धुन्धुनामानमत्युग्रं दानवं घोरविग्रहम् । समरे घोरतुमुले विनाशय महेषुणा ॥

dhundhunāmānamatyugraṃ dānavaṃ ghoravigraham | samare ghoratumule vināśaya maheṣuṇā

धुन्धु नाम के उस अत्यन्त उग्र और भयानक रूप वाले दानव का घोर, घमासान युद्ध में महान् बाण से विनाश कीजिए।

श्लोक 28 (3.205.28)

त्वं हि तस्य विनाशाय पर्याप्त इति मे मतिः । तेजसा तव तेजश्च विष्णुराप्याययिष्यति ॥

tvaṃ hi tasya vināśāya paryāpta iti me matiḥ | tejasā tava tejaśca viṣṇurāpyāyayiṣyati

मेरा विचार है कि आप उसका विनाश करने में समर्थ हैं। विष्णु अपने तेज से आपके तेज को बढ़ाएँगे।

श्लोक 29 (3.205.29)

विष्णुना च वरो दत्तः पूर्वं मम महीपते ॥

viṣṇunā ca varo dattaḥ pūrvaṃ mama mahīpate

हे महीपते! विष्णु ने पहले मुझे एक वर दिया था —

श्लोक 30 (3.205.30)

यस्तं महासुरं रौद्रं वधिष्यति महीपतिः । तेजस्तद्वैष्णवमिति प्रवेक्ष्यति दुरासदम् ॥

yastaṃ mahāsuraṃ raudraṃ vadhiṣyati mahīpatiḥ | tejastadvaiṣṇavamiti pravekṣyati durāsadam

"जो राजा उस भयंकर महासुर का वध करेगा, उसमें वह दुर्धर्ष वैष्णव तेज प्रवेश करेगा।"

श्लोक 31 (3.205.31)

तत्तेजस्त्वंसमाधाय राजेन्द्र भुवि दुःसहम् । तं निषूदय संदिष्टो दैत्यं रौद्रपराक्रमम् ॥

tattejastvaṃsamādhāya rājendra bhuvi duḥsaham | taṃ niṣūdaya saṃdiṣṭo daityaṃ raudraparākramam

हे राजेन्द्र! पृथ्वी पर असहनीय उस तेज को अपने भीतर धारण करके, आज्ञा के अनुसार उस भयानक पराक्रमी दैत्य का संहार कीजिए।

श्लोक 32 (3.205.32)

न हि धुन्धुर्महातेजास्तेजसाऽल्पेन शक्यते । निर्दग्धुं पृथिवीपाल स हि वर्षशतैरपि ॥

na hi dhundhurmahātejāstejasā'lpena śakyate | nirdagdhuṃ pṛthivīpāla sa hi varṣaśatairapi

हे पृथ्वीपाल! महातेजस्वी धुन्धु को थोड़े-से तेज से सैकड़ों वर्षों में भी भस्म नहीं किया जा सकता।

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