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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 206

बृहदश्व का वनगमन और मधु-कैटभ का वध

बृहदश्व उदङ्क को आश्वासन देते हैं कि उनका पुत्र कुवलाश्व अपने सब पुत्रों के साथ धुन्धु का वध करेगा, और वन को चले जाते हैं। युधिष्ठिर के पूछने पर कि धुन्धु कौन था, मार्कण्डेय प्रलय के एकार्णव की कथा कहते हैं, जहाँ विष्णु शेषनाग पर सोए थे और उनकी नाभि के कमल से ब्रह्मा प्रकट हुए। दानव मधु और कैटभ ने ब्रह्मा को डराया; जागकर विष्णु ने उन्हें वर देना चाहा, पर अभिमानवश उन्होंने उलटे विष्णु को वर देने की बात कही, और विष्णु ने माँगा कि वे उनके हाथों वध्य हों। वचन से बँधे दानवों ने खुले स्थान पर मारे जाने की माँग की, और विष्णु ने अपनी जंघाओं पर चक्र से उनके सिर काट डाले।

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मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.206.1)

स एवमुक्तो राजर्षिरुदङ्केनापराजितः । उदङ्कं कौरवश्रेष्ठ कृताञ्जलिरथाब्रवीत् ॥

sa evamukto rājarṣirudaṅkenāparājitaḥ | udaṅkaṃ kauravaśreṣṭha kṛtāñjalirathābravīt

हे कुरुश्रेष्ठ! उदङ्क के ऐसा कहने पर अपराजित राजर्षि ने हाथ जोड़कर उदङ्क से कहा —

बृहदश्व उवाच

श्लोक 2 (3.206.2)

न हि मे गमनं ब्रह्मन्मोघमेतद्भविष्यति । पुत्रो ममायं भगवन्कुवलाश्व इति स्मृतः ॥

na hi me gamanaṃ brahmanmoghametadbhaviṣyati | putro mamāyaṃ bhagavankuvalāśva iti smṛtaḥ

हे ब्रह्मन्! मेरे चले जाने से यह कार्य व्यर्थ नहीं होगा। भगवन्! यह मेरा पुत्र कुवलाश्व के नाम से प्रसिद्ध है।

श्लोक 3 (3.206.3)

धृतिमान्क्षिप्रकारी च वीर्येणाप्रतिमो भुवि । प्रियं च ते सर्वमेतत्करिष्यति न संशयः ॥

dhṛtimānkṣiprakārī ca vīryeṇāpratimo bhuvi | priyaṃ ca te sarvametatkariṣyati na saṃśayaḥ

यह धैर्यवान, शीघ्र कार्य करने वाला और पराक्रम में पृथ्वी पर अनुपम है। यह आपका यह सारा प्रिय कार्य करेगा, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 4 (3.206.4)

पुत्रैः परिवृतः सर्वैः शूरैः परिघबाहुभिः । हनिष्यति महाबाहुस्तं वै धुन्धुं महाऽसुरम् । विसर्जयस्व मां ब्रह्मन्न्यस्तशस्त्रोस्मि सांप्रतम् ॥

putraiḥ parivṛtaḥ sarvaiḥ śūraiḥ parighabāhubhiḥ | haniṣyati mahābāhustaṃ vai dhundhuṃ mahā'suram | visarjayasva māṃ brahmannyastaśastrosmi sāṃpratam

परिघ जैसी भुजाओं वाले अपने सब शूरवीर पुत्रों से घिरा हुआ यह महाबाहु उस महासुर धुन्धु का वध करेगा। हे ब्रह्मन्! मुझे जाने दीजिए; मैं अब शस्त्र त्याग चुका हूँ।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 5 (3.206.5)

तथाऽस्त्विति च तेनोक्तो मुनिनाऽमिततेजसा । स तमादिश्य तनयमुदङ्काय महात्मने । क्रियतामिति राजर्षिर्जगाम वनमुत्तमम् ॥

tathā'stviti ca tenokto muninā'mitatejasā | sa tamādiśya tanayamudaṅkāya mahātmane | kriyatāmiti rājarṣirjagāma vanamuttamam

अपार तेजस्वी मुनि ने कहा, "ऐसा ही हो।" तब राजर्षि अपने पुत्र को महात्मा उदङ्क का कार्य करने की आज्ञा देकर — "यह कार्य करो" — उत्तम वन को चले गए।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 6 (3.206.6)

क एष भगवन्दैत्यो महावीर्यस्तपोधन । कस्य पुत्रोऽथ नप्ता वा एतदिच्छामि वेदितुम् ॥

ka eṣa bhagavandaityo mahāvīryastapodhana | kasya putro'tha naptā vā etadicchāmi veditum

हे तपोधन भगवन्! यह महापराक्रमी दैत्य कौन था? वह किसका पुत्र या पौत्र था? यह मैं जानना चाहता हूँ।

श्लोक 7 (3.206.7)

एवं महाबलो दैत्यो न श्रुतो मे तपोधन । यस्य निश्वासवातेन कम्पते भूः सपर्वता ॥

evaṃ mahābalo daityo na śruto me tapodhana | yasya niśvāsavātena kampate bhūḥ saparvatā

हे तपोधन! ऐसे महाबली दैत्य के विषय में मैंने कभी नहीं सुना, जिसके श्वास की वायु से पर्वतों सहित पृथ्वी काँप उठती है।

श्लोक 8 (3.206.8)

एतदिच्छामि भगवन्याथातथ्येन वेदितुम् । सर्वमेव महाप्राज्ञ विस्तरेण तपोधन ॥

etadicchāmi bhagavanyāthātathyena veditum | sarvameva mahāprājña vistareṇa tapodhana

हे भगवन्, हे महाप्राज्ञ तपोधन! मैं यह सब यथार्थ रूप से और विस्तार के साथ जानना चाहता हूँ।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 9 (3.206.9)

शृणु राजन्निदं सर्वं यथावृत्तं नराधिप । कथ्यमानं महाप्राज्ञ विस्तरेण यथातथम् ॥

śṛṇu rājannidaṃ sarvaṃ yathāvṛttaṃ narādhipa | kathyamānaṃ mahāprājña vistareṇa yathātatham

हे राजन्, हे नराधिप! जो कुछ जैसे घटित हुआ, वह सब सुनो। हे महाप्राज्ञ! मैं इसे विस्तार से यथार्थ रूप में कहता हूँ।

श्लोक 10 (3.206.10)

एकार्णवे निरालोके नष्टे स्थावरजङ्गमे । प्रनष्टेषु च भूतेषु सर्वेषु भरतर्षभ ॥

ekārṇave nirāloke naṣṭe sthāvarajaṅgame | pranaṣṭeṣu ca bhūteṣu sarveṣu bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ! जब सब कुछ प्रकाशहीन एक ही महासागर था, स्थावर-जंगम नष्ट हो चुके थे और सारे प्राणी लुप्त हो गए थे,

श्लोक 11 (3.206.11)

प्रभवं लोककर्तारं विष्णुं शाश्वतमव्ययम् । यमाहुर्मुनयः सिद्धाः सर्वलोकमहेश्वरम् । चतुर्भुजमुदाराङ्गं दृष्टवानस्मि भारत ॥

prabhavaṃ lokakartāraṃ viṣṇuṃ śāśvatamavyayam | yamāhurmunayaḥ siddhāḥ sarvalokamaheśvaram | caturbhujamudārāṅgaṃ dṛṣṭavānasmi bhārata

हे भारत! तब मैंने उन विष्णु को देखा जो सबके उद्गम, लोकों के कर्ता, शाश्वत और अविनाशी हैं, जिन्हें मुनि और सिद्ध समस्त लोकों का महेश्वर कहते हैं — चार भुजाओं वाले और सुन्दर अंगों वाले।

श्लोक 12 (3.206.12)

सुष्वाप भगवान्विष्णुरप्शय्यामेक एव हि । नागस्य भोगे महति शेषस्यामिततेजसः ॥

suṣvāpa bhagavānviṣṇurapśayyāmeka eva hi | nāgasya bhoge mahati śeṣasyāmitatejasaḥ

भगवान् विष्णु जल को शय्या बनाकर अपार तेजस्वी शेषनाग के विशाल शरीर पर अकेले सो रहे थे।

श्लोक 13 (3.206.13)

लोककर्ता महाभाग भगवानच्युतो हरिः । नागभोगेन महता परिरभ्य महीमिमाम् ॥

lokakartā mahābhāga bhagavānacyuto hariḥ | nāgabhogena mahatā parirabhya mahīmimām

लोकों के कर्ता, महाभाग भगवान् अच्युत हरि नाग के विशाल शरीर से इस पृथ्वी को लपेटे हुए थे।

श्लोक 14 (3.206.14)

स्वपतस्तस्य देवस्य पद्मं सूर्यसमप्रभम् । नाभ्या विनिःसृतं दिव्यं तत्रोत्पन्नः पितामहः ॥

svapatastasya devasya padmaṃ sūryasamaprabham | nābhyā viniḥsṛtaṃ divyaṃ tatrotpannaḥ pitāmahaḥ

उन सोते हुए देव की नाभि से सूर्य के समान प्रभा वाला एक दिव्य कमल निकला, और उसी में पितामह उत्पन्न हुए —

श्लोक 15 (3.206.15)

साक्षाल्लोकगुरुर्ब्रह्मा पद्मे सूर्यसमप्रभः । चतुर्वेदश्चतुर्मूर्तिश्चतुर्वर्गश्चतुर्मुखः ॥

sākṣāllokagururbrahmā padme sūryasamaprabhaḥ | caturvedaścaturmūrtiścaturvargaścaturmukhaḥ

स्वयं लोकगुरु ब्रह्मा, जो कमल में सूर्य के समान दीप्त थे — चारों वेदों से युक्त, चार मूर्तियों वाले, चारों पुरुषार्थों के स्वरूप और चार मुखों वाले,

श्लोक 16 (3.206.16)

स्वप्रभावाद्दुराधर्षो महाबलपराक्रमः । कस्यचित्त्वथ कालस्य दानवौ वीर्यवत्तमौ ॥

svaprabhāvāddurādharṣo mahābalaparākramaḥ | kasyacittvatha kālasya dānavau vīryavattamau

अपने प्रभाव से दुर्धर्ष और महान् बल-पराक्रम वाले थे। फिर कुछ समय बीतने पर दो अत्यन्त पराक्रमी दानव,

श्लोक 17 (3.206.17)

मधुश्च कैटभश्चैव दृष्टवन्तौ हरिं प्रभुम् । शयानं शयने दिव्ये नागभोगे महाद्युतिम् ॥

madhuśca kaiṭabhaścaiva dṛṣṭavantau hariṃ prabhum | śayānaṃ śayane divye nāgabhoge mahādyutim

मधु और कैटभ ने प्रभु हरि को देखा, जो नाग के शरीर रूपी दिव्य शय्या पर महान् तेज के साथ लेटे थे —

श्लोक 18 (3.206.18)

बहुयोजनविस्तीर्णे बहुयोजनमायते । किरीटकौस्तुभधरं पीतकौशेयवाससम् ॥

bahuyojanavistīrṇe bahuyojanamāyate | kirīṭakaustubhadharaṃ pītakauśeyavāsasam

वह शय्या अनेक योजन चौड़ी और अनेक योजन लम्बी थी; वे किरीट और कौस्तुभ मणि धारण किए, पीला रेशमी वस्त्र पहने थे,

श्लोक 19 (3.206.19)

दीप्यमानं श्रिया राजंस्तेजसा वपुषा तथा । सहस्रसूर्यप्रतिममद्भुतोपमदर्शनम् ॥

dīpyamānaṃ śriyā rājaṃstejasā vapuṣā tathā | sahasrasūryapratimamadbhutopamadarśanam

हे राजन्! वे शोभा, तेज और शरीर की कान्ति से देदीप्यमान थे, सहस्र सूर्यों के समान, अद्भुत दर्शन वाले।

श्लोक 20 (3.206.20)

विस्मयः सुमहानासीन्मधुकैटभयोस्तदा ॥

vismayaḥ sumahānāsīnmadhukaiṭabhayostadā

तब मधु और कैटभ को बड़ा आश्चर्य हुआ,

श्लोक 21 (3.206.21)

दृष्ट्वा पितामहं चापि पद्मे पद्मनिभेक्षणम् । वित्रासयेतामथ तौ ब्रह्माणममितौजसम् ॥

dṛṣṭvā pitāmahaṃ cāpi padme padmanibhekṣaṇam | vitrāsayetāmatha tau brahmāṇamamitaujasam

जब उन्होंने कमल में कमल-जैसे नेत्रों वाले पितामह को भी देखा। तब वे दोनों अपार तेजस्वी ब्रह्मा को डराने लगे।

श्लोक 22 (3.206.22)

वित्रास्यमानो बहुधा ब्रह्मा ताभ्यां महायशाः । अकम्पयत्पद्मनालं ततोऽबुध्यत केशवः ॥

vitrāsyamāno bahudhā brahmā tābhyāṃ mahāyaśāḥ | akampayatpadmanālaṃ tato'budhyata keśavaḥ

उनके बार-बार डराने पर महायशस्वी ब्रह्मा ने कमल की नाल को हिलाया, और तब केशव जाग उठे।

श्लोक 23 (3.206.23)

अथापश्यत गोविन्दो दानवौ वीर्यवत्तरौ ॥

athāpaśyata govindo dānavau vīryavattarau

तब गोविन्द ने उन दोनों अत्यन्त पराक्रमी दानवों को देखा।

श्लोक 24 (3.206.24)

दृष्ट्वा तावब्रवीद्देवः स्वागतं वां महाबलौ । ददामि वां वरं श्रेष्ठं प्रीतिर्हि मम जायते ॥

dṛṣṭvā tāvabravīddevaḥ svāgataṃ vāṃ mahābalau | dadāmi vāṃ varaṃ śreṣṭhaṃ prītirhi mama jāyate

उन्हें देखकर देव ने कहा — "हे महाबलियो! तुम दोनों का स्वागत है। मैं तुम्हें श्रेष्ठ वर देता हूँ, क्योंकि मुझे प्रसन्नता हो रही है।"

श्लोक 25 (3.206.25)

तौ प्रहस्य हृषीकेशं महादर्पौ महाबलौ । प्रत्यब्रूतां महाराज सहितौ मधुसूदनम् ॥

tau prahasya hṛṣīkeśaṃ mahādarpau mahābalau | pratyabrūtāṃ mahārāja sahitau madhusūdanam

हे महाराज! वे दोनों महाबली और घमंडी दानव हँसकर एक साथ मधुसूदन हृषीकेश से बोले —

मधुकैटभावूचतुः

श्लोक 26 (3.206.26)

आवां वरय देव त्वं वरदौ स्वः सुरोत्तम । दातारौ स्वो वरं तुभ्यं तद्ब्रवीह्यविचारयन् ॥

āvāṃ varaya deva tvaṃ varadau svaḥ surottama | dātārau svo varaṃ tubhyaṃ tadbravīhyavicārayan

हे देव, हे सुरश्रेष्ठ! तुम हमसे वर माँगो; हम दोनों वर देने वाले हैं। हम तुम्हें वर देंगे; बिना हिचक बताओ।

भगवानुवाच

श्लोक 27 (3.206.27)

प्रतिगृह्णे वरं वीरावीप्सितश्च वरो मम । युवां हि वीर्यसंपन्नौ न वामस्ति समः पुमान् ॥

pratigṛhṇe varaṃ vīrāvīpsitaśca varo mama | yuvāṃ hi vīryasaṃpannau na vāmasti samaḥ pumān

हे वीरो! मैं वर स्वीकार करता हूँ, और मुझे एक वर चाहिए भी। तुम दोनों पराक्रम से सम्पन्न हो; तुम्हारे समान कोई पुरुष नहीं है।

श्लोक 28 (3.206.28)

वध्यत्वमुपगच्छेतां मम सत्यपराक्रमौ । एतदिच्छाम्यहं कामं प्राप्तुं लोकहिताय वै ॥

vadhyatvamupagacchetāṃ mama satyaparākramau | etadicchāmyahaṃ kāmaṃ prāptuṃ lokahitāya vai

सच्चे पराक्रम वाले तुम दोनों मेरे हाथों वध्य हो जाओ। लोकहित के लिए मैं यही कामना पूरी करना चाहता हूँ।

मधुकैटभावूचतुः

श्लोक 29 (3.206.29)

अनृतंनोक्तपूर्वं नौ स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा । सत्ये धर्मे च निरतौ विद्ध्यावां पुरुषोत्तम ॥

anṛtaṃnoktapūrvaṃ nau svaireṣvapi kuto'nyathā | satye dharme ca niratau viddhyāvāṃ puruṣottama

हमने पहले कभी हँसी-खेल में भी असत्य नहीं कहा, तो अन्य अवसर की बात ही क्या। हे पुरुषोत्तम! जान लो कि हम सत्य और धर्म में लगे रहते हैं।

श्लोक 30 (3.206.30)

बले रूपे च शौर्ये च शमे न च समोस्ति नौ । धर्मे तपसि दाने च शीलसत्वदमेषु च ॥

bale rūpe ca śaurye ca śame na ca samosti nau | dharme tapasi dāne ca śīlasatvadameṣu ca

बल, रूप, शौर्य और शान्ति में हमारे समान कोई नहीं है; धर्म, तप, दान, शील, सत्त्व और संयम में भी नहीं।

श्लोक 31 (3.206.31)

उपप्लवो महानस्मानुपावर्तत केशव । उक्तं प्रतिकुरुष्व त्वं कालो हि दुरतिक्रमः ॥

upaplavo mahānasmānupāvartata keśava | uktaṃ pratikuruṣva tvaṃ kālo hi duratikramaḥ

हे केशव! हम पर बड़ी विपत्ति आ पड़ी है। जो तुमने कहा है, उसे पूरा करो; काल को लाँघना कठिन है।

श्लोक 32 (3.206.32)

आवामिच्छावहे देव कृतमेकं त्वया विभो । अनावृतेऽवकाशे त्वं जह्यावां सुरसत्तम ॥

āvāmicchāvahe deva kṛtamekaṃ tvayā vibho | anāvṛte'vakāśe tvaṃ jahyāvāṃ surasattama

हे देव, हे विभो! पर हम चाहते हैं कि तुम हमारे लिए एक बात करो — हे सुरश्रेष्ठ! हमें ऐसे स्थान पर मारो जो ढका न हो।

श्लोक 33 (3.206.33)

पुत्रत्वमधिगच्छाव तव चापि सुलोचन । वर एष वृतोदेव तद्विद्धि सुरसत्तम ॥

putratvamadhigacchāva tava cāpi sulocana | vara eṣa vṛtodeva tadviddhi surasattama

और हे सुन्दर नेत्रों वाले! हम तुम्हारे पुत्र बनें। हे देव, हे सुरश्रेष्ठ! हमने यही वर चुना है, इसे जान लो।

श्लोक 34 (3.206.34)

अनृतं मा भवेद्देव यद्धि नौ संश्रुतं तदा ॥

anṛtaṃ mā bhaveddeva yaddhi nau saṃśrutaṃ tadā

हे देव! तब हमसे जो वचन दिया गया था, वह असत्य न हो।

भगवानुवाच

श्लोक 35 (3.206.35)

बाढमेवं करिष्यामि सर्वमेतद्भविष्यति ॥

bāḍhamevaṃ kariṣyāmi sarvametadbhaviṣyati

ठीक है, मैं ऐसा ही करूँगा; यह सब होगा।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 36 (3.206.36)

सविचिन्त्याथ गोविन्दो नापश्यद्यदनावृतम् । अवकाशंपृथिव्यां वा दिवि वा मधुसूदनः ॥

savicintyātha govindo nāpaśyadyadanāvṛtam | avakāśaṃpṛthivyāṃ vā divi vā madhusūdanaḥ

तब विचार करने पर मधुसूदन गोविन्द को पृथ्वी या स्वर्ग में कहीं भी कोई खुला स्थान दिखाई नहीं दिया।

श्लोक 37 (3.206.37)

स्वकावनावृतावूरू दृष्ट्वा देववरस्तदा । मधुकैटभयो राजञ्शिरसी मधुसूदनः । चक्रेण शितधारेण न्यकृन्तत महायशाः ॥

svakāvanāvṛtāvūrū dṛṣṭvā devavarastadā | madhukaiṭabhayo rājañśirasī madhusūdanaḥ | cakreṇa śitadhāreṇa nyakṛntata mahāyaśāḥ

तब अपनी जंघाओं को खुला देखकर देवश्रेष्ठ, महायशस्वी मधुसूदन ने, हे राजन्, तीखी धार वाले चक्र से मधु और कैटभ के सिर काट डाले।

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