आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 207
कुवलाश्व द्वारा धुन्धु का वध
मार्कण्डेय बताते हैं कि मधु और कैटभ के पुत्र धुन्धु ने कठोर तपस्या से ब्रह्मा से यह वर पाया कि देवता, दानव आदि कोई उसे मार न सके, और पिता के वध का बदला लेने के लिए वह देवताओं और विष्णु को सताने लगा तथा उज्जानक की रेत के नीचे उदङ्क के आश्रम के पास छिपकर सोने लगा। उदङ्क के आग्रह पर विष्णु के तेज से भरे राजा कुवलाश्व अपने इक्कीस हज़ार पुत्रों के साथ निकलते हैं और बालू के समुद्र को खुदवाते हैं; धुन्धु मुख की आग से पुत्रों को जला देता है, पर राजा योगबल से जल द्वारा वह आग बुझाकर ब्रह्मास्त्र से दैत्य को भस्म कर देते हैं। धुन्धुमार कहलाकर वे देवताओं से वर पाते हैं, उनके तीन पुत्र बचकर इक्ष्वाकु वंश को आगे बढ़ाते हैं, और कथा इसके श्रवण के पुण्य के साथ समाप्त होती है।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.207.1)
धुन्धुर्नाम महाराज तयोः पुत्रो महाद्युतिः । स तपोऽतप्यत महन्महावीर्यपराक्रमः ॥
dhundhurnāma mahārāja tayoḥ putro mahādyutiḥ | sa tapo'tapyata mahanmahāvīryaparākramaḥ
हे महाराज, उन दोनों का पुत्र धुन्धु नाम का था, जो अत्यन्त तेजस्वी था। महान पराक्रम और बल वाले उस दैत्य ने बड़ी तपस्या की।
श्लोक 2 (3.207.2)
अतिष्ठदेकपादेन कृशो धमनिसंततः । तस्मै ब्रह्मा ददौ प्रीतो वरं वव्रे स च प्रभुम् ॥
atiṣṭhadekapādena kṛśo dhamanisaṃtataḥ | tasmai brahmā dadau prīto varaṃ vavre sa ca prabhum
वह एक पैर पर खड़ा रहा, दुबला हो गया और उसकी नसें उभर आईं। प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे वर दिया, और उसने प्रभु से यह वर माँगा—
धुन्धुरुवाच
श्लोक 3 (3.207.3)
देवदानवयक्षाणां सर्पगन्धर्वरक्षसाम् । अवध्योऽहं भवेयं वै वर एष वृतो मया ॥
devadānavayakṣāṇāṃ sarpagandharvarakṣasām | avadhyo'haṃ bhaveyaṃ vai vara eṣa vṛto mayā
"मैं देवताओं, दानवों, यक्षों, सर्पों, गन्धर्वों और राक्षसों से अवध्य हो जाऊँ—यही वर मैंने चुना है।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 4 (3.207.4)
एवं भवतु गच्छेति तमुवाच पितामहः । स एवमुक्तस्तत्पादौ मूर्ध्ना स्पृष्ट्वा जगाम ह ॥
evaṃ bhavatu gaccheti tamuvāca pitāmahaḥ | sa evamuktastatpādau mūrdhnā spṛṣṭvā jagāma ha
"ऐसा ही हो, जाओ," पितामह ने उससे कहा। यह सुनकर धुन्धु ने सिर से उनके चरणों का स्पर्श किया और चला गया।
श्लोक 5 (3.207.5)
स तु धुन्धुर्वरं लब्ध्वा महावीर्यपराक्रमः । अनुस्मरन्पितृवधं द्रुतं विष्णुमुपागमत् ॥
sa tu dhundhurvaraṃ labdhvā mahāvīryaparākramaḥ | anusmaranpitṛvadhaṃ drutaṃ viṣṇumupāgamat
वर पाकर महान बल-पराक्रम वाला धुन्धु अपने पिता के वध को याद करके शीघ्र ही विष्णु के पास (उनसे बैर लेने) पहुँचा।
श्लोक 6 (3.207.6)
स तु देवान्सगन्धर्वाञ्जित्वा धुन्धुरमर्षणः । बबाध सर्वानसकृद्विष्णुं देवांश्च वै भृशम् ॥
sa tu devānsagandharvāñjitvā dhundhuramarṣaṇaḥ | babādha sarvānasakṛdviṣṇuṃ devāṃśca vai bhṛśam
असहिष्णु धुन्धु ने गन्धर्वों सहित देवताओं को जीत लिया और विष्णु तथा सब देवताओं को बार-बार बहुत पीड़ा दी।
श्लोक 7 (3.207.7)
समुद्रवालुकापूर्णे उज्जानक इति स्मृते । आगम्य च स दुष्टात्मा तं देशं भरतर्षभ । बाधते स्म परं शक्त्या तमुदङ्काश्रमं विभो ॥
samudravālukāpūrṇe ujjānaka iti smṛte | āgamya ca sa duṣṭātmā taṃ deśaṃ bharatarṣabha | bādhate sma paraṃ śaktyā tamudaṅkāśramaṃ vibho
हे भरतश्रेष्ठ, समुद्र की बालू से भरे उज्जानक नाम से प्रसिद्ध प्रदेश में वह दुष्टात्मा आया, और हे प्रभो, पूरी शक्ति से वहाँ उदङ्क के आश्रम को सताने लगा।
श्लोक 8 (3.207.8)
अन्तर्भूमिगतस्तत्र वालुकान्तर्हितस्तथा । मधुकैटभयोः पुत्रो धुन्धुर्भीमपराक्रमः ॥
antarbhūmigatastatra vālukāntarhitastathā | madhukaiṭabhayoḥ putro dhundhurbhīmaparākramaḥ
वहाँ धरती के भीतर जाकर, बालू में छिपा हुआ, मधु-कैटभ का भयंकर पराक्रमी पुत्र धुन्धु
श्लोक 9 (3.207.9)
शेते लोकविनाशाय तपोबलमुपाश्रितः । उदङ्कस्याश्रमाभ्याशे निःश्वसन्पावकार्चिषः ॥
śete lokavināśāya tapobalamupāśritaḥ | udaṅkasyāśramābhyāśe niḥśvasanpāvakārciṣaḥ
अपने तपोबल के सहारे लोकों के विनाश के लिए उदङ्क के आश्रम के पास सोया पड़ा था और साँसों से आग की लपटें छोड़ता था।
श्लोक 10 (3.207.10)
एतस्मिन्नेव काले तु राजा सबलवाहनः । कुवलाश्वो नरपतिरन्वितो बलशालिनाम् ॥
etasminneva kāle tu rājā sabalavāhanaḥ | kuvalāśvo narapatiranvito balaśālinām
उसी समय नरपति राजा कुवलाश्व अपनी सेना और वाहनों के साथ, बलशाली वीरों से घिरे हुए,
श्लोक 11 (3.207.11)
सहस्रैरेकविंशत्या पुत्राणामरिमर्दनः । प्रायादुदङ्कसहितो धुन्धोस्तस्य वधाय वै ॥
sahasrairekaviṃśatyā putrāṇāmarimardanaḥ | prāyādudaṅkasahito dhundhostasya vadhāya vai
अपने इक्कीस हज़ार पुत्रों के साथ, वह शत्रुओं का मर्दन करने वाला राजा उदङ्क को साथ लेकर धुन्धु के वध के लिए निकला।
श्लोक 12 (3.207.12)
तमाविशत्ततो विष्णुर्भगवांस्तेजसा प्रभुः । उदङ्कस्य नियोगेन लोकानां हितकाम्यया ॥
tamāviśattato viṣṇurbhagavāṃstejasā prabhuḥ | udaṅkasya niyogena lokānāṃ hitakāmyayā
तब उदङ्क के कहने पर और लोकों के हित की इच्छा से भगवान् प्रभु विष्णु अपने तेज से उस राजा में प्रविष्ट हो गए।
श्लोक 13 (3.207.13)
तस्मिन्प्रयाते दुर्धर्षे दिवि शब्दो महानभूत् । एष श्रीमान्नृपसुतो धुन्धुमारो भविष्यति ॥
tasminprayāte durdharṣe divi śabdo mahānabhūt | eṣa śrīmānnṛpasuto dhundhumāro bhaviṣyati
उस दुर्धर्ष राजा के प्रस्थान करते ही आकाश में एक बड़ी वाणी हुई—"यह श्रीमान राजपुत्र धुन्धुमार (धुन्धु को मारने वाला) होगा।"
श्लोक 14 (3.207.14)
दिव्यैश्च पुष्पैस्तं देवाः समन्तात्पर्यवाकिरन् । देवदुन्दुभयश्चापि नेदुः स्वयमनीरिताः ॥
divyaiśca puṣpaistaṃ devāḥ samantātparyavākiran | devadundubhayaścāpi neduḥ svayamanīritāḥ
देवताओं ने चारों ओर से उस पर दिव्य फूल बरसाए, और देवताओं की दुन्दुभियाँ बिना बजाए अपने-आप बज उठीं।
श्लोक 15 (3.207.15)
शीतश्च वायुः प्रववौ प्रयाणे तस्य धीमतः । विपांसुलां महीं कुर्वन्ववर्ष च सुरेश्वरः । प्रदक्षिणाश्चाप्यभवन्वन्यास्तं समृगद्विजाः ॥
śītaśca vāyuḥ pravavau prayāṇe tasya dhīmataḥ | vipāṃsulāṃ mahīṃ kurvanvavarṣa ca sureśvaraḥ | pradakṣiṇāścāpyabhavanvanyāstaṃ samṛgadvijāḥ
उस बुद्धिमान राजा के प्रस्थान के समय शीतल वायु बहने लगी, और देवराज इन्द्र ने धरती की धूल शान्त करते हुए वर्षा की। वन के पशु-पक्षी भी उसकी प्रदक्षिणा करने लगे।
श्लोक 16 (3.207.16)
अन्तरिक्षे विमानानि देवतानां युधिष्ठिर । तत्रैव समदृश्यन्त धुन्धुर्यत्र महासुरः ॥
antarikṣe vimānāni devatānāṃ yudhiṣṭhira | tatraiva samadṛśyanta dhundhuryatra mahāsuraḥ
हे युधिष्ठिर, आकाश में देवताओं के विमान ठीक वहीं दिखाई देने लगे जहाँ महादैत्य धुन्धु पड़ा था।
श्लोक 17 (3.207.17)
कुवलाश्वस्य धुन्धोश्च युद्धकौतूहलान्विताः । देवगन्धर्वसहिताः समवैक्षन्महर्षयः ॥
kuvalāśvasya dhundhośca yuddhakautūhalānvitāḥ | devagandharvasahitāḥ samavaikṣanmaharṣayaḥ
कुवलाश्व और धुन्धु का युद्ध देखने की उत्सुकता से देवताओं और गन्धर्वों के साथ महर्षि भी देखने लगे।
श्लोक 18 (3.207.18)
नारायणेन कौरव्य तेजसाऽऽप्यायितस्तदा । स गतो नृपतिः क्षिप्रं पुत्रैस्तैः सर्वतो दिशम् ॥
nārāyaṇena kauravya tejasā''pyāyitastadā | sa gato nṛpatiḥ kṣipraṃ putraistaiḥ sarvato diśam
हे कौरव्य, तब नारायण के तेज से बल पाकर वह राजा अपने पुत्रों के साथ शीघ्र ही चारों दिशाओं में फैल गया।
श्लोक 19 (3.207.19)
अर्णवं खानयामास कुवलाश्वो महीपतिः । हितार्थं सर्वलोकानामुदङ्कस्य वशे स्थितः ॥
arṇavaṃ khānayāmāsa kuvalāśvo mahīpatiḥ | hitārthaṃ sarvalokānāmudaṅkasya vaśe sthitaḥ
सब लोकों के हित के लिए उदङ्क के कहे अनुसार चलते हुए राजा कुवलाश्व ने उस बालू के समुद्र को खुदवाया।
श्लोक 20 (3.207.20)
कुवलाश्वस्य पुत्रैश्च तस्मिन्वै वालुकार्णवे । सप्तभिर्दिवसैः खात्वा दृष्टो धुन्धुर्महाबलः ॥
kuvalāśvasya putraiśca tasminvai vālukārṇave | saptabhirdivasaiḥ khātvā dṛṣṭo dhundhurmahābalaḥ
कुवलाश्व के पुत्रों ने उस बालू के समुद्र को सात दिन तक खोदा, तब महाबली धुन्धु दिखाई दिया।
श्लोक 21 (3.207.21)
आसीद्घोरं वपुस्तस्य वालुकान्तर्हितं महत् । दीप्यमानं यथा सूर्यस्तेजसा भरतर्षभ ॥
āsīdghoraṃ vapustasya vālukāntarhitaṃ mahat | dīpyamānaṃ yathā sūryastejasā bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, बालू में छिपा उसका विशाल शरीर भयानक था और सूर्य के समान तेज से दमक रहा था।
श्लोक 22 (3.207.22)
ततो धुन्धुर्महाराज दिशमावृत्य पश्चिमाम् । सुप्तोऽभूद्राजशार्दूल कालानलसमद्युतिः ॥
tato dhundhurmahārāja diśamāvṛtya paścimām | supto'bhūdrājaśārdūla kālānalasamadyutiḥ
हे महाराज, हे राजसिंह, प्रलयकाल की अग्नि के समान दमकता हुआ धुन्धु पश्चिम दिशा को घेरकर सोया हुआ था।
श्लोक 23 (3.207.23)
कुवलाश्वस्य पुत्रैस्तु सर्वतः परिवारितः । अभिद्रुतः शरैस्तीक्ष्णैर्गदाभिर्मुसलैरपि ॥
kuvalāśvasya putraistu sarvataḥ parivāritaḥ | abhidrutaḥ śaraistīkṣṇairgadābhirmusalairapi
कुवलाश्व के पुत्रों ने उसे चारों ओर से घेर लिया और तीखे बाणों, गदाओं और मूसलों से,
श्लोक 24 (3.207.24)
पट्टिशैः परिघैः प्रासैः खड्गैश्च विमलैः शितैः । स वध्यमानः संक्रुद्धः समुत्तस्थौ महाबलः ॥
paṭṭiśaiḥ parighaiḥ prāsaiḥ khaḍgaiśca vimalaiḥ śitaiḥ | sa vadhyamānaḥ saṃkruddhaḥ samuttasthau mahābalaḥ
पट्टिशों, परिघों, प्रासों और चमकती तीखी तलवारों से उस पर प्रहार किया। इस प्रकार मारे जाने पर वह महाबली क्रोध में भरकर उठ खड़ा हुआ।
श्लोक 25 (3.207.25)
क्रुद्धश्चाभक्षयत्तेषां शस्त्राणि विविधानि च । आस्याद्वमन्पावकं स संवर्तकसमं तदा ॥
kruddhaścābhakṣayatteṣāṃ śastrāṇi vividhāni ca | āsyādvamanpāvakaṃ sa saṃvartakasamaṃ tadā
क्रोध में उसने उनके तरह-तरह के शस्त्र निगल लिए और अपने मुख से प्रलय की संवर्तक अग्नि जैसी आग उगली।
श्लोक 26 (3.207.26)
तान्सर्वान्नृपतेः पुत्रानदहत्स्वेन तेजसा । मुखजेनाग्निना क्रुद्धो लोकानुद्वर्तयन्निव ॥
tānsarvānnṛpateḥ putrānadahatsvena tejasā | mukhajenāgninā kruddho lokānudvartayanniva
मुख से निकली उस आग से उसने अपने तेज द्वारा राजा के सब पुत्रों को जला डाला, मानो क्रोध में वह लोकों को उलट देना चाहता हो—
श्लोक 27 (3.207.27)
क्षणेन राजशार्दूल पुरेव कपिलः प्रभुः । सगरस्यात्मजान्क्रुद्धस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥
kṣaṇena rājaśārdūla pureva kapilaḥ prabhuḥ | sagarasyātmajānkruddhastadadbhutamivābhavat
हे राजसिंह, एक ही क्षण में, जैसे पूर्वकाल में भगवान कपिल ने क्रोध करके सगर के पुत्रों को जलाया था। यह बड़ी अद्भुत बात हुई।
श्लोक 28 (3.207.28)
तेषु क्रोधाग्निदग्धेषु तदा भरतसत्तम । तं प्रबुद्धं महात्मानं कुम्भकर्णमिवापरम् । आससाद महातेजाः कुवलाश्वो महीपतिः ॥
teṣu krodhāgnidagdheṣu tadā bharatasattama | taṃ prabuddhaṃ mahātmānaṃ kumbhakarṇamivāparam | āsasāda mahātejāḥ kuvalāśvo mahīpatiḥ
हे भरतसत्तम, जब वे उसकी क्रोधाग्नि में जल गए, तब महातेजस्वी राजा कुवलाश्व दूसरे कुम्भकर्ण के समान जागे हुए उस विशालकाय दैत्य के सामने पहुँचे।
श्लोक 29 (3.207.29)
तस्य वारि महाराज सुस्राव बहु देहतः । तत्तदापीयते तेजो राज्ञा वारिमयं नृप ॥
tasya vāri mahārāja susrāva bahu dehataḥ | tattadāpīyate tejo rājñā vārimayaṃ nṛpa
हे महाराज, उस राजा के शरीर से बहुत-सा जल बह निकला, और हे नरेश, जल बनी हुई वह आग राजा ने पी डाली।
श्लोक 30 (3.207.30)
योगी योगेन सृष्टं स शमयित्वा च वारिणा । ब्रह्मास्त्रेण ततो राजा दैत्यं क्रूरपराक्रमम् । ददाह भरतश्रेष्ठ सर्वलोकाभयाय वै ॥
yogī yogena sṛṣṭaṃ sa śamayitvā ca vāriṇā | brahmāstreṇa tato rājā daityaṃ krūraparākramam | dadāha bharataśreṣṭha sarvalokābhayāya vai
योगी राजा ने योगबल से उस जल द्वारा दैत्य की उत्पन्न की हुई आग बुझा दी; फिर, हे भरतश्रेष्ठ, सब लोकों को अभय देने के लिए उसने ब्रह्मास्त्र से उस क्रूर पराक्रमी दैत्य को जला डाला।
श्लोक 31 (3.207.31)
सोऽस्त्रेण दग्ध्वा राजर्षिः कुवलाश्वो महासुरम् । सुरशत्रुममित्रघ्नस्त्रैलोक्येश इवापरः ॥
so'streṇa dagdhvā rājarṣiḥ kuvalāśvo mahāsuram | suraśatrumamitraghnastrailokyeśa ivāparaḥ
देवताओं के शत्रु उस महादैत्य को अस्त्र से जलाकर शत्रुनाशक राजर्षि कुवलाश्व तीनों लोकों के दूसरे स्वामी के समान शोभित हुए।
श्लोक 32 (3.207.32)
धुन्धोर्वधात्तदा राजा कुवलाश्वो महामनाः । धुन्धुमार इति ख्यातो नाम्ना समभवत्ततः ॥
dhundhorvadhāttadā rājā kuvalāśvo mahāmanāḥ | dhundhumāra iti khyāto nāmnā samabhavattataḥ
धुन्धु का वध करने के कारण उदारचित्त राजा कुवलाश्व तभी से धुन्धुमार नाम से प्रसिद्ध हो गए।
श्लोक 33 (3.207.33)
प्रीतैश्च त्रिदशैः सर्वैर्महर्षिसहितैस्तदा । वरं वृणीष्वेत्युक्तः स प्राञ्जलिः प्रणतस्तदा । अतीव मुदितो राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥
prītaiśca tridaśaiḥ sarvairmaharṣisahitaistadā | varaṃ vṛṇīṣvetyuktaḥ sa prāñjaliḥ praṇatastadā | atīva mudito rājannidaṃ vacanamabravīt
तब प्रसन्न हुए सब देवताओं ने महर्षियों के साथ उनसे कहा—"वर माँगो।" हे राजन्, तब वे हाथ जोड़कर, झुककर, अत्यन्त हर्षित होकर यह वचन बोले—
कुवलाश्व उवाच
श्लोक 34 (3.207.34)
दद्यां वित्तं द्विजाग्र्येभ्यः शत्रूणां चापि दुर्जयः । सख्यं च विष्णुना मे स्याद्भूतेष्वद्रोह एव च । धर्मे रतिश्च सततं स्वर्गे वासस्तथाऽक्षयः ॥
dadyāṃ vittaṃ dvijāgryebhyaḥ śatrūṇāṃ cāpi durjayaḥ | sakhyaṃ ca viṣṇunā me syādbhūteṣvadroha eva ca | dharme ratiśca satataṃ svarge vāsastathā'kṣayaḥ
"मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणों को धन दूँ और शत्रुओं के लिए अजेय रहूँ; विष्णु से मेरी मित्रता हो और किसी प्राणी से मेरा द्रोह न हो; धर्म में मेरी सदा प्रीति रहे और स्वर्ग में मेरा अक्षय निवास हो।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 35 (3.207.35)
तथाऽस्त्विति ततो देवैः प्रीतैरुक्तः स पार्थिवः । ऋषिभिश्च सगन्धर्वैरुदङ्केन च धीमता ॥
tathā'stviti tato devaiḥ prītairuktaḥ sa pārthivaḥ | ṛṣibhiśca sagandharvairudaṅkena ca dhīmatā
"ऐसा ही हो," प्रसन्न देवताओं ने उस राजा से कहा, और गन्धर्वों सहित ऋषियों तथा बुद्धिमान उदङ्क ने भी यही कहा।
श्लोक 36 (3.207.36)
संभाष्य चैनं विविधैराशीर्वादैस्ततो नृपम् । देवा महर्षयश्चापि स्वानि स्थानानि भेजिरे ॥
saṃbhāṣya cainaṃ vividhairāśīrvādaistato nṛpam | devā maharṣayaścāpi svāni sthānāni bhejire
राजा से वार्तालाप करके और उन्हें अनेक प्रकार के आशीर्वाद देकर देवता और महर्षि अपने-अपने स्थानों को चले गए।
श्लोक 37 (3.207.37)
तस्य पुत्रास्त्रयः शिष्टा युधिष्ठिर तदाऽभवन् । दृढाश्वः कपिलाश्वश्च भद्राश्वश्चैव भारत ॥
tasya putrāstrayaḥ śiṣṭā yudhiṣṭhira tadā'bhavan | dṛḍhāśvaḥ kapilāśvaśca bhadrāśvaścaiva bhārata
हे युधिष्ठिर, हे भारत, तब उनके तीन पुत्र शेष बचे—दृढाश्व, कपिलाश्व और भद्राश्व।
श्लोक 38 (3.207.38)
तेभ्यः परम्परा राजन्निक्ष्वाकूणां महात्मनाम् । वंशस्य सुमहाभाग राज्ञाममिततेजसाम् ॥
tebhyaḥ paramparā rājannikṣvākūṇāṃ mahātmanām | vaṃśasya sumahābhāga rājñāmamitatejasām
हे राजन्, उन्हीं से महात्मा इक्ष्वाकुओं की परम्परा चली—हे महाभाग, अपार तेज वाले राजाओं का वंश।
श्लोक 39 (3.207.39)
एवं स निहतस्तेन कुवलाश्वेन सत्तम । धुन्धुर्नाम महादैत्यो मधुकैटभयोः सुतः ॥
evaṃ sa nihatastena kuvalāśvena sattama | dhundhurnāma mahādaityo madhukaiṭabhayoḥ sutaḥ
हे सज्जनश्रेष्ठ, इस प्रकार मधु और कैटभ का पुत्र धुन्धु नाम का महादैत्य कुवलाश्व द्वारा मारा गया।
श्लोक 40 (3.207.40)
कुवलाश्वश्च नृपतिर्धुन्धुमार इति स्मृतः । नाम्ना च गुणयुक्तेन तदाप्रभृति सोऽभवत् ॥
kuvalāśvaśca nṛpatirdhundhumāra iti smṛtaḥ | nāmnā ca guṇayuktena tadāprabhṛti so'bhavat
और राजा कुवलाश्व धुन्धुमार के नाम से स्मरण किए जाने लगे; तभी से वे इस गुणानुरूप नाम वाले हो गए।
श्लोक 41 (3.207.41)
एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । धौन्धुमारमुपाख्यानं प्रथितं यस्य कर्मणा ॥
etatte sarvamākhyātaṃ yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi | dhaundhumāramupākhyānaṃ prathitaṃ yasya karmaṇā
जो तुमने मुझसे पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया—धुन्धुमार का उपाख्यान, जिस राजा के कर्म से यह नाम प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 42 (3.207.42)
इदं तु पुण्यमाख्यानं विष्णोः समनुकीर्तनम् । शृणुयाद्यः स धर्मात्मा पुत्रवांश्च भवेन्नरः ॥
idaṃ tu puṇyamākhyānaṃ viṣṇoḥ samanukīrtanam | śṛṇuyādyaḥ sa dharmātmā putravāṃśca bhavennaraḥ
यह पवित्र कथा विष्णु का गुणगान है। जो मनुष्य इसे सुनता है, वह धर्मात्मा और पुत्रवान होता है।
श्लोक 43 (3.207.43)
आयुष्मान्भूतिमांश्चैव श्रुत्वा भवति पर्वसु । न च व्याधिभयं किंचित्प्राप्नोति विगतज्वरः ॥
āyuṣmānbhūtimāṃścaiva śrutvā bhavati parvasu | na ca vyādhibhayaṃ kiṃcitprāpnoti vigatajvaraḥ
जो पर्व के दिनों में इसे सुनता है, वह दीर्घायु और ऐश्वर्यवान होता है; उसे रोग का कोई भय नहीं होता और वह सब सन्ताप से मुक्त रहता है।