आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 208
पतिव्रताओं की महिमा पर युधिष्ठिर का प्रश्न
युधिष्ठिर मार्कण्डेय से पतिव्रता स्त्रियों की महिमा बताने को कहते हैं; वे उनकी सेवा की कठिनाई पर और सन्तान को जन्म देने तथा पालने में माता-पिता के कष्टों पर आश्चर्य प्रकट करते हैं। मार्कण्डेय उत्तर देते हैं कि माता-पिता बड़े प्रयत्न से पुत्र पाते हैं और उससे यश तथा धर्म की आशा रखते हैं, और जो पुत्र उनकी आशा पूरी करता है वही धर्मज्ञ है। वे कहते हैं कि स्त्री के लिए यज्ञ, श्राद्ध या उपवास आवश्यक नहीं; पति की सेवा से ही वह स्वर्ग पा लेती है। फिर वे पतिव्रताओं के धर्म का वर्णन आरम्भ करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.208.1)
ततो युधिष्ठिरो राजा मार्कण्डेयं महाद्युतिम् । पप्रच्छ भरतश्रेष्ठ धर्मप्रश्नं स दुर्वचम् ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā mārkaṇḍeyaṃ mahādyutim | papraccha bharataśreṣṭha dharmapraśnaṃ sa durvacam
हे भरतश्रेष्ठ, तब राजा युधिष्ठिर ने महातेजस्वी मार्कण्डेय से धर्म के विषय में एक ऐसा प्रश्न पूछा जिसका उत्तर देना कठिन था।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 2 (3.208.2)
श्रोतुमिच्छामि भगवन्स्त्रीणां माहात्म्यमुत्तमम् । कथ्यमानं त्वया विप्र सूक्ष्मं धर्म्यं च तत्त्वतः ॥
śrotumicchāmi bhagavanstrīṇāṃ māhātmyamuttamam | kathyamānaṃ tvayā vipra sūkṣmaṃ dharmyaṃ ca tattvataḥ
"भगवन्, हे विप्र, मैं आपसे स्त्रियों की उत्तम महिमा सुनना चाहता हूँ—उसके सूक्ष्म धर्म के साथ, यथार्थ रूप में।
श्लोक 3 (3.208.3)
प्रत्यक्षमिह विप्रर्षे देवा दृश्यन्ति सत्तम । सूर्याचन्द्रमसौ वायुः पृथिवी वह्निरेव च ॥
pratyakṣamiha viprarṣe devā dṛśyanti sattama | sūryācandramasau vāyuḥ pṛthivī vahnireva ca
हे विप्रर्षि, हे सत्पुरुषों में श्रेष्ठ, यहाँ प्रत्यक्ष देवता दिखाई देते हैं—सूर्य और चन्द्रमा, वायु, पृथ्वी और अग्नि;
श्लोक 4 (3.208.4)
पिता माता च भगवन्गाव एव च सत्तम । यच्चान्यदेव विहितं तच्चापि भृगुनन्दन ॥
pitā mātā ca bhagavangāva eva ca sattama | yaccānyadeva vihitaṃ taccāpi bhṛgunandana
भगवन्, पिता और माता भी, और हे श्रेष्ठ, गौएँ भी, और हे भृगुनन्दन, इसके अतिरिक्त जो कुछ भी विधान किया गया है, वह भी।
श्लोक 5 (3.208.5)
मन्येऽहं गुरुवत्सर्वमेकपत्न्यस्तथा स्त्रियः । पतिव्रतानां शुश्रूषा दुष्करा प्रतिभाति मे । पतिव्रतानां माहात्म्यं वक्तुमर्हसि नः प्रभो ॥
manye'haṃ guruvatsarvamekapatnyastathā striyaḥ | pativratānāṃ śuśrūṣā duṣkarā pratibhāti me | pativratānāṃ māhātmyaṃ vaktumarhasi naḥ prabho
इन सबको मैं गुरुजनों के समान पूज्य मानता हूँ, और एक पति वाली स्त्रियों को भी। पतिव्रताओं की सेवा मुझे अत्यन्त कठिन प्रतीत होती है। हे प्रभो, कृपया हमें पतिव्रताओं की महिमा बताइए—
श्लोक 6 (3.208.6)
निरुध्य चेन्द्रियग्रामं मनः संरुध्य चानघ । पतिं दैवतवच्चापि चिन्तयन्त्यः स्थिता हि याः ॥
nirudhya cendriyagrāmaṃ manaḥ saṃrudhya cānagha | patiṃ daivatavaccāpi cintayantyaḥ sthitā hi yāḥ
उन स्त्रियों की, हे निष्पाप, जो इन्द्रियों के समूह को रोककर और मन को वश में करके पति का देवता के समान चिन्तन करती रहती हैं।
श्लोक 7 (3.208.7)
भगवन्दुष्करं त्वेतत्प्रतिभाति मम प्रभो । मातापित्रोश्च शुश्रूषा स्त्रीणां भर्तरि च द्विज ॥
bhagavanduṣkaraṃ tvetatpratibhāti mama prabho | mātāpitrośca śuśrūṣā strīṇāṃ bhartari ca dvija
भगवन्, हे प्रभो, यह मुझे बड़ा कठिन लगता है—हे द्विज, स्त्रियों द्वारा माता-पिता की और पति की सेवा।
श्लोक 8 (3.208.8)
स्त्रीणां धर्मात्सुघोराद्धि नान्यं पश्यामि दुष्करम् । साध्वाचाराः स्त्रियो ब्रह्मन्कुर्वन्तीह सदादृताः ॥
strīṇāṃ dharmātsughorāddhi nānyaṃ paśyāmi duṣkaram | sādhvācārāḥ striyo brahmankurvantīha sadādṛtāḥ
स्त्रियों के इस कठोर धर्म से कठिन मुझे कुछ नहीं दिखता, जिसे हे ब्रह्मन्, सदाचारिणी और सम्मानित स्त्रियाँ यहाँ सदा निभाती हैं।
श्लोक 9 (3.208.9)
दुष्करं खलु कुर्वन्ति पितरो मातरश्च वै । एकपत्न्यश्च या नार्यो याश्च सत्यं वदन्त्युत ॥
duṣkaraṃ khalu kurvanti pitaro mātaraśca vai | ekapatnyaśca yā nāryo yāśca satyaṃ vadantyuta
सचमुच माता-पिता बड़ा कठिन कार्य करते हैं; और वे स्त्रियाँ भी जो एक ही पति वाली हैं और सत्य बोलती हैं,
श्लोक 10 (3.208.10)
कुक्षिणा दशमासांश्च गर्भं संधारयन्ति याः । नार्यः कालेन संभूय किमद्भुततरं ततः ॥
kukṣiṇā daśamāsāṃśca garbhaṃ saṃdhārayanti yāḥ | nāryaḥ kālena saṃbhūya kimadbhutataraṃ tataḥ
जो स्त्रियाँ दस महीने तक गर्भ को कोख में धारण करती हैं और समय आने पर उसे जन्म देती हैं—इससे अधिक अद्भुत क्या होगा?
श्लोक 11 (3.208.11)
संशयं परमं प्राप्य वेदनामतुलामपि । प्रजायन्ते सुतान्नार्यो दुःखेन महता विभो ॥
saṃśayaṃ paramaṃ prāpya vedanāmatulāmapi | prajāyante sutānnāryo duḥkhena mahatā vibho
हे प्रभो, प्राणों के बड़े संकट में पड़कर और अतुलनीय पीड़ा सहकर स्त्रियाँ बड़े कष्ट से पुत्रों को जन्म देती हैं,
श्लोक 12 (3.208.12)
पुष्णन्ति चापि महता स्नेहेन द्विजपुङ्गव । चिन्तयन्ति ततश्चापि किंशीलोऽयं भविष्यति ॥
puṣṇanti cāpi mahatā snehena dvijapuṅgava | cintayanti tataścāpi kiṃśīlo'yaṃ bhaviṣyati
और हे द्विजश्रेष्ठ, बड़े स्नेह से उनका पालन-पोषण करती हैं; फिर भी वे सोचती रहती हैं कि यह कैसे स्वभाव वाला होगा।
श्लोक 13 (3.208.13)
याश्च क्रूरेषु सर्वेषु वर्तमाना जुगुप्सिताः । स्वकर्म कुर्वन्ति सदा दुष्करं तच्च मे मतम् ॥
yāśca krūreṣu sarveṣu vartamānā jugupsitāḥ | svakarma kurvanti sadā duṣkaraṃ tacca me matam
और जो स्त्रियाँ सब प्रकार की कठोर और निन्दित परिस्थितियों में रहकर भी सदा अपना कर्तव्य करती हैं—वह भी मेरे मत में कठिन है।
श्लोक 14 (3.208.14)
क्षत्रधर्मसमाचारतत्त्वं व्याख्याहि मे द्विज । धर्मः सुदुर्लभो विप्र नृशंसेन महात्मना ॥
kṣatradharmasamācāratattvaṃ vyākhyāhi me dvija | dharmaḥ sudurlabho vipra nṛśaṃsena mahātmanā
हे द्विज, मुझे क्षत्रिय-धर्म के आचरण का तत्त्व समझाइए। हे विप्र, क्रूर मनुष्य के लिए, चाहे वह महान हो, धर्म अत्यन्त दुर्लभ है।
श्लोक 15 (3.208.15)
एतदिच्छामि भगवन्प्रश्नं प्रश्नविदांवर । श्रोतुं भृगुकुलश्रेष्ठ शुश्रूषे तव सुव्रत ॥
etadicchāmi bhagavanpraśnaṃ praśnavidāṃvara | śrotuṃ bhṛgukulaśreṣṭha śuśrūṣe tava suvrata
भगवन्, हे प्रश्नों के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ, मैं इसी प्रश्न का उत्तर सुनना चाहता हूँ। हे भृगुकुलश्रेष्ठ, हे सुव्रत, मैं आपकी बात सुनने को उत्सुक हूँ।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 16 (3.208.16)
हन्त तेऽहं समाख्यास्ये प्रश्नमेतं सुदुर्वचम् । तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ गदतस्तन्निबोध मे ॥
hanta te'haṃ samākhyāsye praśnametaṃ sudurvacam | tattvena bharataśreṣṭha gadatastannibodha me
"अच्छा, हे भरतश्रेष्ठ, मैं इस कठिन प्रश्न का यथार्थ उत्तर तुम्हें दूँगा। मेरे कहे को ध्यान से सुनो।
श्लोक 17 (3.208.17)
मातरं श्रेयसीं तात पितॄनन्ये तु मेनिरे । दुष्करं कुरुते माता विवर्धयति या प्रजाः ॥
mātaraṃ śreyasīṃ tāta pitṝnanye tu menire | duṣkaraṃ kurute mātā vivardhayati yā prajāḥ
हे तात, कुछ लोगों ने माता को श्रेष्ठ माना है और कुछ ने पिता को। जो माता सन्तान को पाल-पोसकर बड़ा करती है, वह बड़ा कठिन काम करती है।
श्लोक 18 (3.208.18)
तपसा देवतेज्याभिर्वन्दनेन तितिक्षया । सुप्रशस्तैरुपायैश्चापीहन्ते पितरः सुतान् ॥
tapasā devatejyābhirvandanena titikṣayā | supraśastairupāyaiścāpīhante pitaraḥ sutān
तपस्या से, देवताओं की पूजा से, वन्दना से, सहनशीलता से और अन्य उत्तम उपायों से पिता पुत्र पाने का प्रयत्न करते हैं।
श्लोक 19 (3.208.19)
एवं कृच्छ्रेण महता पुत्रं प्राप्य सुदुर्लभम् । चिन्तयन्ति सदा वीर कीदृशोऽयं भविष्यति ॥
evaṃ kṛcchreṇa mahatā putraṃ prāpya sudurlabham | cintayanti sadā vīra kīdṛśo'yaṃ bhaviṣyati
हे वीर, इस प्रकार बड़े कष्ट से दुर्लभ पुत्र पाकर वे सदा चिन्ता करते रहते हैं कि यह कैसा होगा।
श्लोक 20 (3.208.20)
आशंसते हि पुत्रेषु पिता माता च भारत । यशः कीर्तिमथैश्वर्यं तेजो धर्मं तथैव च ॥
āśaṃsate hi putreṣu pitā mātā ca bhārata | yaśaḥ kīrtimathaiśvaryaṃ tejo dharmaṃ tathaiva ca
हे भारत, पिता और माता पुत्रों से यश, कीर्ति, ऐश्वर्य, तेज और धर्म की भी आशा रखते हैं।
श्लोक 21 (3.208.21)
मातुः पितुश्च राजेन्द्र सततं हितकारिणोः । तयोराशां तु सफलां यः करोति स धर्मवित् ॥
mātuḥ pituśca rājendra satataṃ hitakāriṇoḥ | tayorāśāṃ tu saphalāṃ yaḥ karoti sa dharmavit
हे राजेन्द्र, सदा हित चाहने वाले माता-पिता की आशा को जो पुत्र सफल करता है, वही धर्म का ज्ञाता है।
श्लोक 22 (3.208.22)
पिता माता च राजेन्द्र तुष्यतो यस्य नित्यशः । इह प्रेत्य च तस्याथ कीर्तिर्धर्मश्च शाश्वतः ॥
pitā mātā ca rājendra tuṣyato yasya nityaśaḥ | iha pretya ca tasyātha kīrtirdharmaśca śāśvataḥ
हे राजेन्द्र, जिससे माता-पिता सदा सन्तुष्ट रहते हैं, उसे इस लोक और परलोक में शाश्वत कीर्ति और धर्म प्राप्त होते हैं।
श्लोक 23 (3.208.23)
नैव यज्ञक्रियाः काश्चिन्न श्राद्धं नोपवासकम् । या तु भर्तरि शुश्रूषा तया स्वर्गं जयत्युत ॥
naiva yajñakriyāḥ kāścinna śrāddhaṃ nopavāsakam | yā tu bhartari śuśrūṣā tayā svargaṃ jayatyuta
स्त्री के लिए न कोई यज्ञ-कर्म है, न श्राद्ध, न उपवास; पति की सेवा से ही वह स्वर्ग को जीत लेती है।
श्लोक 24 (3.208.24)
एतत्प्रकरणं राजन्नधिकृत्य युधिष्ठिर । पतिव्रतानां नियतं धर्मं चावहितः शृणु ॥
etatprakaraṇaṃ rājannadhikṛtya yudhiṣṭhira | pativratānāṃ niyataṃ dharmaṃ cāvahitaḥ śṛṇu
हे राजा युधिष्ठिर, इसी विषय को लेकर पतिव्रताओं का नियत धर्म ध्यान से सुनो।"