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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 209

कौशिक और पतिव्रता स्त्री

मार्कण्डेय विद्वान तपस्वी ब्राह्मण कौशिक की कथा सुनाते हैं, जो एक बगुली की बीट गिरने पर क्रोध भरी दृष्टि से उसे मार डालता है और फिर पछताता है। भिक्षा माँगते समय एक घर में गृहिणी अपने भूखे पति की सेवा करती है और उसे प्रतीक्षा करनी पड़ती है; जब वह ब्राह्मण के अपमान का उलाहना देता है, तो वह बताती है कि उसे बगुली की बात ज्ञात है और पतिव्रता होने के कारण उसका वैसा अनिष्ट नहीं हो सकता। वह सच्चे ब्राह्मण के लक्षण बताती है—क्रोध और मोह से रहित, सत्यवादी, संयमी और स्वाध्याय में लगा हुआ—और धर्म जानने के लिए उसे मिथिला में धर्मव्याध के पास भेजती है। क्रोध शान्त होने पर कौशिक उसका आभार मानकर स्वयं को धिक्कारता हुआ घर लौट जाता है।

अध्याय 208अध्याय-सूचीअध्याय 210

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.209.1)

कश्चिद्द्विजातिप्रवरो वेदाध्यायी तपोधनः । तपस्वी धर्मशीलश्च कौशिको नाम भारत ॥

kaściddvijātipravaro vedādhyāyī tapodhanaḥ | tapasvī dharmaśīlaśca kauśiko nāma bhārata

हे भारत, कौशिक नाम का एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था—वेदों का अध्ययन करने वाला, तपस्वी, तप का धनी और धर्मपरायण।

श्लोक 2 (3.209.2)

साङ्गोपनिषदान्वेदानधीते द्विजसत्तमः । स वृक्षमूले कस्मिंश्चिद्वेदानुच्चारयन्स्थितः ॥

sāṅgopaniṣadānvedānadhīte dvijasattamaḥ | sa vṛkṣamūle kasmiṃścidvedānuccārayansthitaḥ

वह श्रेष्ठ ब्राह्मण अंगों और उपनिषदों सहित वेदों का अध्ययन करता था। एक बार वह किसी वृक्ष के नीचे खड़ा होकर वेदपाठ कर रहा था।

श्लोक 3 (3.209.3)

उपरिष्टाच्च वृक्षस्य बलाका संन्यलीयत । तया पुरीषमुत्सृष्टं ब्राह्मणस्य तदोपरि ॥

upariṣṭācca vṛkṣasya balākā saṃnyalīyata | tayā purīṣamutsṛṣṭaṃ brāhmaṇasya tadopari

उस वृक्ष के ऊपर एक बगुली छिपकर बैठी थी, और उसने उस ब्राह्मण के ऊपर बीट कर दी।

श्लोक 4 (3.209.4)

समवेक्ष्य ततः क्रुद्धः समपध्यायत द्विजः । तां बलाकां महाराज निलीनां नगमूर्धनि ॥

samavekṣya tataḥ kruddhaḥ samapadhyāyata dvijaḥ | tāṃ balākāṃ mahārāja nilīnāṃ nagamūrdhani

यह देखकर ब्राह्मण क्रोधित हो गया और हे महाराज, उसने वृक्ष की चोटी पर बैठी उस बगुली का मन में अनिष्ट-चिन्तन किया।

श्लोक 5 (3.209.5)

भृशं क्रोधाभिभूतेन बलाका सा निरीक्षिता । अपध्याता च विप्रेण न्यपतद्धरणीतले ॥

bhṛśaṃ krodhābhibhūtena balākā sā nirīkṣitā | apadhyātā ca vipreṇa nyapataddharaṇītale

क्रोध से अभिभूत उस ब्राह्मण ने जब उस बगुली को देखा और उसका अनिष्ट सोचा, तो वह धरती पर गिर पड़ी।

श्लोक 6 (3.209.6)

बलाकां पतितां दृष्ट्वा गतसत्त्वामचेतनाम् । कारुण्यादभिसंतप्तः पर्यशोचत तां द्विजः । अकार्यं कृतवानस्मि द्वेषरागबलात्कृतः ॥

balākāṃ patitāṃ dṛṣṭvā gatasattvāmacetanām | kāruṇyādabhisaṃtaptaḥ paryaśocata tāṃ dvijaḥ | akāryaṃ kṛtavānasmi dveṣarāgabalātkṛtaḥ

बगुली को निष्प्राण और अचेत पड़ी देखकर ब्राह्मण करुणा से सन्तप्त होकर उसके लिए शोक करने लगा—"द्वेष और राग के वश में होकर मैंने यह अनुचित कर्म कर डाला।"

श्लोक 7 (3.209.7)

इत्युक्त्वा बहुशो विद्वान्ग्रामं भैक्षाय संश्रितः । ग्रामे शुचीनि प्रचरन्कुलानि भरतर्षभ ॥

ityuktvā bahuśo vidvāngrāmaṃ bhaikṣāya saṃśritaḥ | grāme śucīni pracarankulāni bharatarṣabha

बार-बार ऐसा कहकर वह विद्वान भिक्षा के लिए गाँव में गया। हे भरतश्रेष्ठ, गाँव के पवित्र घरों में घूमते हुए

श्लोक 8 (3.209.8)

देहीति याचमानोऽसौ तिष्ठेत्युक्तः स्त्रिया ततः । शौचं तु यावत्कुरुते भाजनस्य कुटुम्बिनी ॥

dehīti yācamāno'sau tiṣṭhetyuktaḥ striyā tataḥ | śaucaṃ tu yāvatkurute bhājanasya kuṭumbinī

उसने "भिक्षा दो" कहकर माँगा, तो एक स्त्री ने उससे कहा—"ठहरिए।" जब तक वह गृहिणी बर्तन साफ़ कर रही थी,

श्लोक 9 (3.209.9)

एतस्मिन्नन्तरे राजन्क्षुधासंपीडितो भृशम् । भर्ता प्रविष्टः सहसा तस्या भरतसत्तम ॥

etasminnantare rājankṣudhāsaṃpīḍito bhṛśam | bhartā praviṣṭaḥ sahasā tasyā bharatasattama

हे राजन्, हे भरतसत्तम, उसी बीच भूख से अत्यन्त व्याकुल उसका पति सहसा घर में आ गया।

श्लोक 10 (3.209.10)

सा तु दृष्ट्वा पतिं साध्वी ब्राह्मणं व्यपहाय तम् । पाद्यमाचमनीयं वै ददौ भर्तुस्तथाऽऽसनम् ॥

sā tu dṛṣṭvā patiṃ sādhvī brāhmaṇaṃ vyapahāya tam | pādyamācamanīyaṃ vai dadau bhartustathā''sanam

पति को देखकर उस साध्वी ने ब्राह्मण को छोड़ दिया और पति को पैर धोने का जल, आचमन का जल और आसन दिया।

श्लोक 11 (3.209.11)

प्रह्वा पर्यचरच्चापि भर्तारमसितेक्षणा । आहारेणाथ भक्ष्यैश्च वाक्यैः सुमधुरैस्तथा ॥

prahvā paryacaraccāpi bhartāramasitekṣaṇā | āhāreṇātha bhakṣyaiśca vākyaiḥ sumadhuraistathā

वह श्यामनयना विनम्र होकर भोजन, व्यंजनों और अत्यन्त मधुर वचनों से पति की सेवा करने लगी।

श्लोक 12 (3.209.12)

उच्छिष्टं भाविता भर्तुर्भुङ्क्ते नित्यं युधिष्ठिर । दैवतं च पतिं मेने भर्तुश्चित्तानुसारिणी ॥

ucchiṣṭaṃ bhāvitā bharturbhuṅkte nityaṃ yudhiṣṭhira | daivataṃ ca patiṃ mene bhartuścittānusāriṇī

हे युधिष्ठिर, पति में अनुरक्त वह सदा पति के भोजन से बचा हुआ ही खाती थी। वह पति को देवता मानती थी और उसकी इच्छा के अनुसार चलती थी।

श्लोक 13 (3.209.13)

कर्मणा मनसा वाचा नात्यश्नान्नापि चापिबत् । तं सर्वभावोपगता पतिशुश्रूषणे रता ॥

karmaṇā manasā vācā nātyaśnānnāpi cāpibat | taṃ sarvabhāvopagatā patiśuśrūṣaṇe ratā

कर्म, मन और वाणी से वह कभी उससे पहले न खाती थी, न पीती थी। वह सम्पूर्ण भाव से उसके प्रति समर्पित थी और पति की सेवा में ही प्रसन्न रहती थी।

श्लोक 14 (3.209.14)

साध्वाचारा शुचिर्दक्षा कुटुम्बस्य हितैषिणी । भर्तुश्चापि हितं यत्तत्सततं साऽनुवर्तते ॥

sādhvācārā śucirdakṣā kuṭumbasya hitaiṣiṇī | bhartuścāpi hitaṃ yattatsatataṃ sā'nuvartate

वह सदाचारिणी, पवित्र और कुशल थी, परिवार का हित चाहती थी, और जो कुछ पति के लिए हितकर होता, वही सदा करती थी।

श्लोक 15 (3.209.15)

देवतातिथिभृत्यानां श्वश्रूश्वशुरयोस्तथा । शुश्रूषणपरा नित्यं सततं संयतेन्द्रिया ॥

devatātithibhṛtyānāṃ śvaśrūśvaśurayostathā | śuśrūṣaṇaparā nityaṃ satataṃ saṃyatendriyā

वह देवताओं, अतिथियों, सेवकों और सास-ससुर की सेवा में सदा लगी रहती थी और अपनी इन्द्रियों को सदा संयम में रखती थी।

श्लोक 16 (3.209.16)

सा ब्राह्मणं तदा दृष्ट्वा संस्थितं भैक्षकाङ्क्षिणम् । कुर्वती पतिशुश्रूषां सस्माराथ शुभेक्षणा ॥

sā brāhmaṇaṃ tadā dṛṣṭvā saṃsthitaṃ bhaikṣakāṅkṣiṇam | kurvatī patiśuśrūṣāṃ sasmārātha śubhekṣaṇā

पति की सेवा करते हुए उस सुन्दर नेत्रों वाली स्त्री ने भिक्षा की प्रतीक्षा में खड़े ब्राह्मण को देखा, तब उसे उसका स्मरण हुआ।

श्लोक 17 (3.209.17)

व्रीडिता साऽभवत्साध्वी तदा भरतसत्तम । भिक्षामादाय विप्राय निर्जगाम यशस्विनी ॥

vrīḍitā sā'bhavatsādhvī tadā bharatasattama | bhikṣāmādāya viprāya nirjagāma yaśasvinī

हे भरतसत्तम, तब वह साध्वी लज्जित हो गई, और वह यशस्विनी भिक्षा लेकर ब्राह्मण के पास बाहर आई।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 18 (3.209.18)

किमिदं भवति त्वं मां तिष्ठेत्युक्त्वा वराङ्गने । उपरोधं कृतवती न विसर्जितवत्यसि ॥

kimidaṃ bhavati tvaṃ māṃ tiṣṭhetyuktvā varāṅgane | uparodhaṃ kṛtavatī na visarjitavatyasi

"हे सुन्दरी, यह क्या बात है? तुमने मुझसे 'ठहरिए' कहकर मुझे रोके रखा और विदा नहीं किया।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 19 (3.209.19)

ब्राह्मणं क्रोधसंतप्तं ज्वलन्तमिव तेजसा । दृष्ट्वा साध्वी मनुष्येन्द्र सान्त्वपूर्वं वचोऽब्रवीत् ॥

brāhmaṇaṃ krodhasaṃtaptaṃ jvalantamiva tejasā | dṛṣṭvā sādhvī manuṣyendra sāntvapūrvaṃ vaco'bravīt

हे नरेन्द्र, क्रोध से तपे हुए, तेज से मानो जलते हुए उस ब्राह्मण को देखकर साध्वी ने उसे शान्त करते हुए मीठे वचन कहे—

स्त्र्युवाच

श्लोक 20 (3.209.20)

क्षमस्व विप्रप्रवर क्षमस्व स्त्रीजडात्मताम् । प्रसीद भगवन्मह्यं कृपां कुरु मयि द्विज ॥

kṣamasva viprapravara kṣamasva strījaḍātmatām | prasīda bhagavanmahyaṃ kṛpāṃ kuru mayi dvija

"हे विप्रश्रेष्ठ, क्षमा कीजिए, स्त्री की जड़ता को क्षमा कीजिए। भगवन्, मुझ पर प्रसन्न होइए; हे द्विज, मुझ पर कृपा कीजिए।

श्लोक 21 (3.209.21)

क्षन्तुमर्हसि मे विद्वन्भर्ता मे दैवतं महत् । स चापि क्षुधितः श्रान्तः प्राप्तः शुश्रूषितो मया ॥

kṣantumarhasi me vidvanbhartā me daivataṃ mahat | sa cāpi kṣudhitaḥ śrāntaḥ prāptaḥ śuśrūṣito mayā

हे विद्वन्, मुझे क्षमा कीजिए। मेरे पति मेरे परम देवता हैं; वे भूखे और थके हुए आए थे, और मैं उनकी सेवा कर रही थी।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 22 (3.209.22)

ब्राह्मणा न गरीयांसो गरीयांस्ते पतिः कृतः । गृहस्थधर्मे वर्तन्ती ब्राह्मणानवमन्यसे ॥

brāhmaṇā na garīyāṃso garīyāṃste patiḥ kṛtaḥ | gṛhasthadharme vartantī brāhmaṇānavamanyase

"तो ब्राह्मण बड़े नहीं रहे, तुमने अपने पति को ही बड़ा बना दिया! गृहस्थ-धर्म में रहते हुए तुम ब्राह्मणों का अपमान करती हो।

श्लोक 23 (3.209.23)

इन्द्रोऽप्येषां प्रणमते किं पुनर्मानवो भुवि । अवलिप्ते न जानीषे वृद्धानां न श्रुतं त्वया ॥

indro'pyeṣāṃ praṇamate kiṃ punarmānavo bhuvi | avalipte na jānīṣe vṛddhānāṃ na śrutaṃ tvayā

इन्द्र भी इन्हें प्रणाम करते हैं, फिर पृथ्वी के मनुष्य की तो बात ही क्या! हे घमण्डी स्त्री, क्या तुम नहीं जानतीं? क्या तुमने बड़ों से यह नहीं सुना?

श्लोक 24 (3.209.24)

ब्राह्मणा ह्यग्निसदृशा दहेयुः पृथिवीमपि । सपर्वतवनद्वीपां क्षिप्रमेवावमानिताः ॥

brāhmaṇā hyagnisadṛśā daheyuḥ pṛthivīmapi | saparvatavanadvīpāṃ kṣipramevāvamānitāḥ

ब्राह्मण अग्नि के समान होते हैं; अपमानित होने पर वे पर्वतों, वनों और द्वीपों सहित पूरी पृथ्वी को भी क्षण भर में जला सकते हैं।"

स्त्र्युवाच

श्लोक 25 (3.209.25)

नाहं बलाका विप्रर्षे त्यज क्रोधं तपोधन । अनया क्रुद्धया दृष्ट्या क्रुद्धः किं मां करिष्यसि ॥

nāhaṃ balākā viprarṣe tyaja krodhaṃ tapodhana | anayā kruddhayā dṛṣṭyā kruddhaḥ kiṃ māṃ kariṣyasi

"हे विप्रर्षि, मैं बगुली नहीं हूँ। हे तपोधन, क्रोध छोड़ दीजिए। इस क्रोध भरी दृष्टि से, क्रोधित होकर आप मेरा क्या कर लेंगे?

श्लोक 26 (3.209.26)

नावजानाम्यहं विप्रान्देवैस्तुल्यान्मनस्विनः । अपराधमिमं विप्र क्षन्तुमर्हसि मेऽनघ ॥

nāvajānāmyahaṃ viprāndevaistulyānmanasvinaḥ | aparādhamimaṃ vipra kṣantumarhasi me'nagha

मैं देवताओं के समान मनस्वी ब्राह्मणों का अनादर नहीं करती। हे निष्पाप विप्र, मेरे इस अपराध को क्षमा कीजिए।

श्लोक 27 (3.209.27)

जानामि तेजो विप्राणां महाभाग्यं च धीमताम् । अपेयः सागरः क्रोधात्कृतो हि लवणोदकः ॥

jānāmi tejo viprāṇāṃ mahābhāgyaṃ ca dhīmatām | apeyaḥ sāgaraḥ krodhātkṛto hi lavaṇodakaḥ

मैं ब्राह्मणों के तेज और ज्ञानियों के महान प्रभाव को जानती हूँ। उनके क्रोध से ही समुद्र खारे जल वाला और न पीने योग्य बना दिया गया।

श्लोक 28 (3.209.28)

तथैव दीप्ततपसां मुनीनां भावितात्मनाम् । येषां क्रोधाग्निरद्यापि समुद्रे नोपशाम्यति । कस्तान्परिभवेन्मूढो ब्राह्मणानमितौजसः ॥

tathaiva dīptatapasāṃ munīnāṃ bhāvitātmanām | yeṣāṃ krodhāgniradyāpi samudre nopaśāmyati | kastānparibhavenmūḍho brāhmaṇānamitaujasaḥ

वैसे ही प्रज्वलित तप वाले, शुद्ध अन्तःकरण वाले उन मुनियों का प्रभाव भी मैं जानती हूँ, जिनकी क्रोधाग्नि आज भी समुद्र में शान्त नहीं होती। कौन मूर्ख अपार तेज वाले ब्राह्मणों का तिरस्कार करेगा?

श्लोक 29 (3.209.29)

ब्राह्मणानां परिभवाद्वातापिः सुदुरात्मवान् । अगस्त्यमृषिमासाद्य जीर्णः क्रूरो महासुरः ॥

brāhmaṇānāṃ paribhavādvātāpiḥ sudurātmavān | agastyamṛṣimāsādya jīrṇaḥ krūro mahāsuraḥ

ब्राह्मणों का अपमान करने के कारण ही अत्यन्त दुष्ट और क्रूर महादैत्य वातापि ऋषि अगस्त्य के पास पहुँचकर पच गया।

श्लोक 30 (3.209.30)

बहुप्रभावाः श्रूयन्ते ब्राह्मणानां महात्मनाम् । क्रोधः सुविपुलो ब्रह्मन्प्रसादश्च महात्मनाम् । अस्मिंस्त्वतिक्रमे ब्रह्मन्क्षन्तुमर्हसि मेऽनघ ॥

bahuprabhāvāḥ śrūyante brāhmaṇānāṃ mahātmanām | krodhaḥ suvipulo brahmanprasādaśca mahātmanām | asmiṃstvatikrame brahmankṣantumarhasi me'nagha

महात्मा ब्राह्मणों के अनेक प्रभाव सुने जाते हैं; हे ब्रह्मन्, महात्माओं का क्रोध भी बहुत बड़ा होता है और कृपा भी। हे निष्पाप ब्रह्मन्, मेरे इस अपराध को आप क्षमा करें।

श्लोक 31 (3.209.31)

पतिशुश्रूषया धर्मो यः स मे रोचते द्विज । दैवतेष्वपि सर्वेषु भर्ता मे दैवतं परम् ॥

patiśuśrūṣayā dharmo yaḥ sa me rocate dvija | daivateṣvapi sarveṣu bhartā me daivataṃ param

हे द्विज, पति की सेवा में जो धर्म है, वही मुझे प्रिय है। सब देवताओं में मेरे पति ही मेरे परम देवता हैं।

श्लोक 32 (3.209.32)

अविशेषेण तस्याहं कुर्यां धर्मं द्विजोत्तम । शुश्रूषायाः फलं पश्य पत्युर्ब्राह्मण यादृशम् ॥

aviśeṣeṇa tasyāhaṃ kuryāṃ dharmaṃ dvijottama | śuśrūṣāyāḥ phalaṃ paśya patyurbrāhmaṇa yādṛśam

हे द्विजोत्तम, मैं बिना किसी भेद के उन्हीं के प्रति अपना धर्म निभाती हूँ। हे ब्राह्मण, पति की सेवा का कैसा फल होता है, यह देखिए—

श्लोक 33 (3.209.33)

बलाका हि त्वया दग्धा रोषात्तद्विदितं मया । क्रोधः शत्रुः शरीरस्थो मनुष्याणां द्विजोत्तम ॥

balākā hi tvayā dagdhā roṣāttadviditaṃ mayā | krodhaḥ śatruḥ śarīrastho manuṣyāṇāṃ dvijottama

आपने क्रोध में एक बगुली को जला डाला—यह मुझे ज्ञात है। हे द्विजोत्तम, क्रोध मनुष्यों के शरीर में ही रहने वाला शत्रु है।

श्लोक 34 (3.209.34)

मास्म क्रुध्यो बलाकेव न वध्याऽस्मि पतिव्रता । यः क्रोधमोहौ त्यजति तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

māsma krudhyo balākeva na vadhyā'smi pativratā | yaḥ krodhamohau tyajati taṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ

क्रोध मत कीजिए; मैं बगुली की तरह मारी नहीं जा सकती, क्योंकि मैं पतिव्रता हूँ। जो क्रोध और मोह को त्याग देता है, उसे ही देवता ब्राह्मण मानते हैं।

श्लोक 35 (3.209.35)

यो वदेदिह सत्यानि गुरुं संतोषयेत च । हिंसितश्च न हिंसेत तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

yo vadediha satyāni guruṃ saṃtoṣayeta ca | hiṃsitaśca na hiṃseta taṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ

जो यहाँ सत्य बोलता है, गुरु को सन्तुष्ट रखता है, और चोट पाकर भी बदले में चोट नहीं करता, उसे देवता ब्राह्मण मानते हैं।

श्लोक 36 (3.209.36)

जितेन्द्रियो धर्मपरः स्वाध्यायनिरतः शुचिः । कामक्रोधौ वशौ यस्य तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

jitendriyo dharmaparaḥ svādhyāyanirataḥ śuciḥ | kāmakrodhau vaśau yasya taṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ

जो जितेन्द्रिय, धर्मपरायण, स्वाध्याय में लगा हुआ और पवित्र है, और काम तथा क्रोध जिसके वश में हैं, उसे देवता ब्राह्मण मानते हैं।

श्लोक 37 (3.209.37)

यस्य चात्मसमो लोको धर्मज्ञस्य मनस्विनः । सर्वधर्मेषु चरतस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

yasya cātmasamo loko dharmajñasya manasvinaḥ | sarvadharmeṣu caratastaṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ

जिस धर्मज्ञ और मनस्वी के लिए सारा संसार अपने समान है और जो सब धर्मों का आचरण करता है, उसे देवता ब्राह्मण मानते हैं।

श्लोक 38 (3.209.38)

योऽध्यापयेदधीयीत यजेद्वा याजयीत वा । दद्याद्वाऽपि यथाशक्ति तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

yo'dhyāpayedadhīyīta yajedvā yājayīta vā | dadyādvā'pi yathāśakti taṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ

जो पढ़ाता और पढ़ता है, यज्ञ करता और कराता है, और यथाशक्ति दान देता है, उसे देवता ब्राह्मण मानते हैं।

श्लोक 39 (3.209.39)

ब्रह्मचारी वदान्यो योऽप्यधीयाद्द्विजपुङ्गवः । स्वाध्यायवानमत्तो वै तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥

brahmacārī vadānyo yo'pyadhīyāddvijapuṅgavaḥ | svādhyāyavānamatto vai taṃ devā brāhmaṇaṃ viduḥ

जो श्रेष्ठ द्विज ब्रह्मचारी, उदार और अध्ययनशील है, जो स्वाध्याय करता है और कभी प्रमाद नहीं करता, उसे देवता ब्राह्मण मानते हैं।

श्लोक 40 (3.209.40)

यद्ब्राह्मणानां कुशलं तदेषां परिकीर्तयेत् । सत्यं तथा व्याहरतां नानृते रमते मनः ॥

yadbrāhmaṇānāṃ kuśalaṃ tadeṣāṃ parikīrtayet | satyaṃ tathā vyāharatāṃ nānṛte ramate manaḥ

ब्राह्मणों के लिए जो कल्याणकारी हो, वही उनसे कहना चाहिए; जो सत्य बोलते हैं, उनका मन असत्य में नहीं रमता।

श्लोक 41 (3.209.41)

धनं तु ब्राह्मणस्याहुः स्वाध्यायं दममार्जवम् । इन्द्रियाणां निग्रहं च शाश्वतं द्विजसत्तम ॥

dhanaṃ tu brāhmaṇasyāhuḥ svādhyāyaṃ damamārjavam | indriyāṇāṃ nigrahaṃ ca śāśvataṃ dvijasattama

हे द्विजश्रेष्ठ, कहते हैं कि ब्राह्मण का धन स्वाध्याय, दम, सरलता और इन्द्रियों का स्थायी निग्रह है।

श्लोक 42 (3.209.42)

सत्यार्जवे धर्ममाहुः परं धर्मविदो जनाः । दुर्ज्ञेयः शाश्वतो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः ॥

satyārjave dharmamāhuḥ paraṃ dharmavido janāḥ | durjñeyaḥ śāśvato dharmaḥ sa ca satye pratiṣṭhitaḥ

धर्म के जानकार सत्य और सरलता को परम धर्म कहते हैं। सनातन धर्म को जानना कठिन है, और वह सत्य पर टिका है।

श्लोक 43 (3.209.43)

श्रुतिप्रमाणो धर्मः स्यादिति वृद्धानुशासनम् । बहुधा दृश्यते धर्मः सूक्ष्म एव द्विजोत्तम ॥

śrutipramāṇo dharmaḥ syāditi vṛddhānuśāsanam | bahudhā dṛśyate dharmaḥ sūkṣma eva dvijottama

धर्म का प्रमाण श्रुति है—ऐसा वृद्धों का उपदेश है। हे द्विजोत्तम, धर्म अनेक रूपों में दिखाई देता है और वह सूक्ष्म ही है।

श्लोक 44 (3.209.44)

भगवानपि धर्मज्ञः स्वाध्यायनिरतः शुचिः । न तु तत्त्वेन भगवन्धर्मं वेत्सीति मे मतिः ॥

bhagavānapi dharmajñaḥ svādhyāyanirataḥ śuciḥ | na tu tattvena bhagavandharmaṃ vetsīti me matiḥ

भगवन्, आप धर्मज्ञ हैं, स्वाध्याय में लगे रहते हैं और पवित्र हैं; फिर भी, भगवन्, मेरा विचार है कि आप धर्म को उसके तत्त्व से नहीं जानते।

श्लोक 45 (3.209.45)

यदि विप्र न जानीषे धर्मं परमकं द्विज । धर्मव्याधं ततः पृच्छ गत्वा तु मिथिलां पुरीम् ॥

yadi vipra na jānīṣe dharmaṃ paramakaṃ dvija | dharmavyādhaṃ tataḥ pṛccha gatvā tu mithilāṃ purīm

हे विप्र, यदि आप परम धर्म को नहीं जानते, तो मिथिला नगरी जाकर धर्मव्याध से पूछिए।

श्लोक 46 (3.209.46)

मातापितृभ्यां शुश्रूषुः सत्यवादी जितेन्द्रियः । मिथिलायां वसेद्व्याधः स ते धर्मान्प्रवक्ष्यति ॥

mātāpitṛbhyāṃ śuśrūṣuḥ satyavādī jitendriyaḥ | mithilāyāṃ vasedvyādhaḥ sa te dharmānpravakṣyati

मिथिला में एक व्याध रहता है, जो माता-पिता की सेवा में लगा रहता है, सत्यवादी और जितेन्द्रिय है; वह आपको धर्मों का उपदेश देगा।

श्लोक 47 (3.209.47)

तत्र गच्छस्व भद्रं ते यथाकामं द्विजोत्तम । व्याधः परमधर्मात्मा स ते छेत्स्यति संशयम् ॥

tatra gacchasva bhadraṃ te yathākāmaṃ dvijottama | vyādhaḥ paramadharmātmā sa te chetsyati saṃśayam

हे द्विजोत्तम, आपका कल्याण हो, इच्छानुसार वहाँ जाइए। वह व्याध परम धर्मात्मा है; वह आपका संशय दूर कर देगा।

श्लोक 48 (3.209.48)

अत्युक्तमपि मे सर्वं क्षन्तुमर्हस्यनिन्दित । स्त्रियो ह्यवध्याः सर्वेषां ये धर्ममभिविन्दते ॥

atyuktamapi me sarvaṃ kṣantumarhasyanindita | striyo hyavadhyāḥ sarveṣāṃ ye dharmamabhivindate

हे अनिन्दित, मैंने जो कुछ अधिक भी कहा हो, वह सब क्षमा कीजिए। धर्म को जानने वाले किसी के लिए भी स्त्रियाँ अवध्य होती हैं।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 49 (3.209.49)

प्रीतोऽस्मि तव भद्रं ते गतः क्रोधश्च शोभने । उपालम्भस्त्वया प्रोक्तो मम निःश्रेयसं परम् ॥

prīto'smi tava bhadraṃ te gataḥ krodhaśca śobhane | upālambhastvayā prokto mama niḥśreyasaṃ param

"हे शोभने, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; मेरा क्रोध चला गया। तुमने जो उलाहना दिया है, वह मेरे लिए परम कल्याणकारी है।

श्लोक 50 (3.209.50)

स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि साधयिष्यामि शोभने । धन्या त्वमसि कल्याणि यस्याः स्याद्वृत्तमीदृशम् ॥

svasti te'stu gamiṣyāmi sādhayiṣyāmi śobhane | dhanyā tvamasi kalyāṇi yasyāḥ syādvṛttamīdṛśam

तुम्हारा मंगल हो, मैं जाऊँगा और अपना कार्य सिद्ध करूँगा, हे शोभने। हे कल्याणी, तुम धन्य हो, जिसका आचरण ऐसा है।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 51 (3.209.51)

तया विसृष्टो निर्गत्य स्वमेव भवनं ययौ । विनिन्दन्स स्वमात्मानं कौशिको द्विजसत्तमः ॥

tayā visṛṣṭo nirgatya svameva bhavanaṃ yayau | vinindansa svamātmānaṃ kauśiko dvijasattamaḥ

उससे विदा लेकर द्विजश्रेष्ठ कौशिक बाहर निकला और स्वयं को धिक्कारता हुआ अपने घर लौट गया।

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