आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 211
धर्मव्याध द्वारा शिष्टाचार का वर्णन
कौशिक धर्मव्याध से पूछता है कि शिष्टों के आचरण को कैसे पहचाना जाए और उसके पाँच पवित्र साधन कौन-से हैं। व्याध उन्हें यज्ञ, दान, तप, वेद और सत्य बताता है और शिष्टों का वर्णन करता है — जो काम और क्रोध को जीत चुके हैं, सत्यवादी, अहिंसक, उदार हैं और गुरुजनों तथा शास्त्रों के प्रति निष्ठावान हैं। वह सिखाता है कि धर्म के तीन स्रोत हैं — वेद, धर्मशास्त्र और शिष्टों का आचरण — और ऐसे लोग धैर्य की नाव से इन्द्रियों की नदी पार करके स्वर्ग प्राप्त करते हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.211.1)
स तु विप्रो महाप्राज्ञ धर्मव्याधमपृच्छत । शिष्टाचारं कथमहं विद्यामिति नरोत्तम ॥
sa tu vipro mahāprājña dharmavyādhamapṛcchata | śiṣṭācāraṃ kathamahaṃ vidyāmiti narottama
हे महाप्राज्ञ नरश्रेष्ठ, तब उस ब्राह्मण ने धर्मव्याध से पूछा — "मैं शिष्टों का आचरण कैसे जानूँ?
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 2 (3.211.2)
पञ्च कानि पवित्राणि शिष्टाचारेषु नित्यदा । एतदिच्छामि भद्रं ते श्रोतुं धर्मभृतांवर । त्वत्तो महामते व्याध तद्ब्रवीहि यथातथम् ॥
pañca kāni pavitrāṇi śiṣṭācāreṣu nityadā | etadicchāmi bhadraṃ te śrotuṃ dharmabhṛtāṃvara | tvatto mahāmate vyādha tadbravīhi yathātatham
शिष्टों के आचरण में सदा रहने वाले वे पाँच पवित्र करने वाले साधन कौन-से हैं? हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ, आपका कल्याण हो, मैं यह आपसे सुनना चाहता हूँ। हे परम बुद्धिमान व्याध, मुझे यह यथावत् बताइए।"
व्याध उवाच
श्लोक 3 (3.211.3)
यज्ञो दानं तपो वेदाः सत्यं च द्विजसत्तम । पञ्चैतानि पवित्राणि शिष्टाचारेषु नित्यदा ॥
yajño dānaṃ tapo vedāḥ satyaṃ ca dvijasattama | pañcaitāni pavitrāṇi śiṣṭācāreṣu nityadā
"हे द्विजश्रेष्ठ, यज्ञ, दान, तप, वेद और सत्य — ये पाँच पवित्र करने वाले साधन शिष्टों के आचरण में सदा रहते हैं।
श्लोक 4 (3.211.4)
कामक्रोधौ वशे कृत्वा दम्भं लोभमनार्जवम् । धर्ममित्येवं संतुष्टास्ते शिष्टाः शिष्टसंमताः ॥
kāmakrodhau vaśe kṛtvā dambhaṃ lobhamanārjavam | dharmamityevaṃ saṃtuṣṭāste śiṣṭāḥ śiṣṭasaṃmatāḥ
जो काम और क्रोध को तथा दम्भ, लोभ और कुटिलता को वश में करके "यही धर्म है" यह मानकर संतुष्ट रहते हैं, वे ही शिष्ट हैं और शिष्टजन उन्हें मान देते हैं।
श्लोक 5 (3.211.5)
न तेषां भिद्यते वृत्तं यज्ञस्वाध्यायशीलिनाम् । आचारपालनं चैव द्वितीयं शिष्टलक्षणम् ॥
na teṣāṃ bhidyate vṛttaṃ yajñasvādhyāyaśīlinām | ācārapālanaṃ caiva dvitīyaṃ śiṣṭalakṣaṇam
यज्ञ और स्वाध्याय में लगे रहने वाले उन लोगों का आचरण कभी खण्डित नहीं होता; और सदाचार का पालन शिष्टों का दूसरा लक्षण है।
श्लोक 6 (3.211.6)
गुरुशुश्रूषणं सत्यमक्रोधो दानमेव च । एतच्चतुष्टयं ब्रह्मञ्शिष्टाचारेषु नित्यदा ॥
guruśuśrūṣaṇaṃ satyamakrodho dānameva ca | etaccatuṣṭayaṃ brahmañśiṣṭācāreṣu nityadā
गुरुजनों की सेवा, सत्य, क्रोध न करना और दान — हे ब्रह्मन्, ये चारों शिष्टों के आचरण में सदा रहते हैं।
श्लोक 7 (3.211.7)
शिष्टाचारे मनः कृत्वा प्रतिष्ठाप्य च सर्वशः । यामयं लभते तुष्टिं सा न शक्या ह्यतोऽन्यथा ॥
śiṣṭācāre manaḥ kṛtvā pratiṣṭhāpya ca sarvaśaḥ | yāmayaṃ labhate tuṣṭiṃ sā na śakyā hyato'nyathā
शिष्टाचार में मन लगाकर और उसे हर प्रकार से स्थापित करके मनुष्य जो संतोष पाता है, वह और किसी उपाय से नहीं मिल सकता।
श्लोक 8 (3.211.8)
वेदस्योपनिषत्सत्यं सत्यस्योपनिषद्दमः । दमस्योपनिषत्त्यागः शिष्टाचारेषु नित्यदा ॥
vedasyopaniṣatsatyaṃ satyasyopaniṣaddamaḥ | damasyopaniṣattyāgaḥ śiṣṭācāreṣu nityadā
वेद का रहस्य सत्य है, सत्य का रहस्य इन्द्रियसंयम है, और संयम का रहस्य त्याग है — ये शिष्टों के आचरण में सदा रहते हैं।
श्लोक 9 (3.211.9)
ये तु धर्मानसूयन्ते बुद्धिमोहान्विता नराः । अपथा गच्छतां तेषामनुयाता च पीड्यते ॥
ye tu dharmānasūyante buddhimohānvitā narāḥ | apathā gacchatāṃ teṣāmanuyātā ca pīḍyate
जो बुद्धि के मोह से ग्रस्त मनुष्य धर्मों से द्वेष करते हैं, वे कुमार्ग पर चलते हैं, और उनके पीछे चलने वाला भी कष्ट पाता है।
श्लोक 10 (3.211.10)
ये तु शिष्टाः सुनियताः श्रुतित्यागपरायणाः । धर्मपन्थानमारूढाः सत्यधर्मपरायणाः ॥
ye tu śiṣṭāḥ suniyatāḥ śrutityāgaparāyaṇāḥ | dharmapanthānamārūḍhāḥ satyadharmaparāyaṇāḥ
परन्तु जो शिष्ट हैं, भलीभाँति संयमी हैं, श्रुति और त्याग में तत्पर हैं, धर्म के मार्ग पर आरूढ़ हैं और सत्य तथा धर्म में निष्ठ हैं,
श्लोक 11 (3.211.11)
नियच्छन्ति परां बुद्धिं शिष्टाचारान्विता जनाः । उपाध्यायमते युक्ताः स्थित्या धर्मार्थदर्शिनः ॥
niyacchanti parāṃ buddhiṃ śiṣṭācārānvitā janāḥ | upādhyāyamate yuktāḥ sthityā dharmārthadarśinaḥ
शिष्टाचार से युक्त ऐसे लोग अपनी बुद्धि को परम लक्ष्य में दृढ़ता से लगाए रखते हैं; वे आचार्य के मत का पालन करते हैं और मर्यादा में स्थित रहकर धर्म और उसके प्रयोजन को देखते हैं।
श्लोक 12 (3.211.12)
नास्तिकान्भिन्नमर्यादान्क्रूरान्पापमतौ स्थितान् । त्यज ताञ्ज्ञानमाश्रित्य धार्मिकानुपसेव्य च ॥
nāstikānbhinnamaryādānkrūrānpāpamatau sthitān | tyaja tāñjñānamāśritya dhārmikānupasevya ca
ज्ञान का आश्रय लेकर नास्तिकों, मर्यादा तोड़ने वालों, क्रूर और पाप-बुद्धि में स्थित लोगों का त्याग करो, और धर्मात्माओं की सेवा करो।
श्लोक 13 (3.211.13)
कामलोभग्रहाकीर्णां पञ्चेन्द्रियजलां नदीम् । नावं धृतिमयीं कृत्वा जन्मदुर्गाणि संतर ॥
kāmalobhagrahākīrṇāṃ pañcendriyajalāṃ nadīm | nāvaṃ dhṛtimayīṃ kṛtvā janmadurgāṇi saṃtara
धैर्य की नाव बनाकर उस नदी को पार करो, जिसका जल पाँचों इन्द्रियाँ हैं और जो काम और लोभ रूपी मगरमच्छों से भरी है — इस प्रकार जन्म के संकटों को पार कर जाओ।
श्लोक 14 (3.211.14)
क्रमेण संचितो धर्मो बुद्धियोगमयो महान् । शिष्टाचारे भवेत्साधू रागः शुक्ले व वाससि ॥
krameṇa saṃcito dharmo buddhiyogamayo mahān | śiṣṭācāre bhavetsādhū rāgaḥ śukle va vāsasi
धीरे-धीरे संचित किया गया, बुद्धियोग से युक्त महान धर्म शिष्टाचार पर वैसे ही भलीभाँति चढ़ता है जैसे सफ़ेद कपड़े पर रंग।
श्लोक 15 (3.211.15)
अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतहितं परम् । अहिंसा परमो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः । सत्यं कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तयः ॥
ahiṃsā satyavacanaṃ sarvabhūtahitaṃ param | ahiṃsā paramo dharmaḥ sa ca satye pratiṣṭhitaḥ | satyaṃ kṛtvā pratiṣṭhāṃ tu pravartante pravṛttayaḥ
अहिंसा और सत्य वचन समस्त प्राणियों के लिए परम हितकारी हैं। अहिंसा परम धर्म है, और वह सत्य पर प्रतिष्ठित है। सत्य को आधार बनाकर ही सब प्रवृत्तियाँ चलती हैं।
श्लोक 16 (3.211.16)
सत्यमेव गरीयस्तु शिष्टाचारनिषेवितम् । आचारश्च सतां धर्मः सन्तो ह्याचारलक्षणाः ॥
satyameva garīyastu śiṣṭācāraniṣevitam | ācāraśca satāṃ dharmaḥ santo hyācāralakṣaṇāḥ
शिष्टजनों द्वारा अपनाया गया सत्य ही सबसे बढ़कर है। आचार ही सज्जनों का धर्म है, और सज्जन अपने आचार से ही पहचाने जाते हैं।
श्लोक 17 (3.211.17)
यो यथा प्रकृतिर्जन्तुः स स्वां प्रकृतिमश्नुते । पापात्मा क्रोधकामादीन्दोषानाप्नोत्यनात्मवान् ॥
yo yathā prakṛtirjantuḥ sa svāṃ prakṛtimaśnute | pāpātmā krodhakāmādīndoṣānāpnotyanātmavān
जिस प्राणी की जैसी प्रकृति होती है, वह अपनी उसी प्रकृति के अनुसार चलता है। असंयमी पापी मनुष्य क्रोध, काम आदि दोषों को प्राप्त होता है।
श्लोक 18 (3.211.18)
आरम्भो न्याययुक्तो यः स हि धर्म इति स्मृतः । अनाचारस्त्वधर्मेति एतच्छिष्टानुशासनम् ॥
ārambho nyāyayukto yaḥ sa hi dharma iti smṛtaḥ | anācārastvadharmeti etacchiṣṭānuśāsanam
न्यायसंगत कार्य का आरम्भ ही धर्म कहलाता है, और सदाचार का अभाव अधर्म है — यही शिष्टों की शिक्षा है।
श्लोक 19 (3.211.19)
अक्रुध्यन्तोऽनसूयन्तो निरहंकारमत्सराः । ऋजवः शमसंपन्नाः शिष्टाचारा भवन्ति ते ॥
akrudhyanto'nasūyanto nirahaṃkāramatsarāḥ | ṛjavaḥ śamasaṃpannāḥ śiṣṭācārā bhavanti te
जो क्रोध नहीं करते, ईर्ष्या नहीं करते, अहंकार और मत्सर से रहित हैं, सरल हैं और शान्ति से युक्त हैं — वे ही शिष्टाचारी होते हैं।
श्लोक 20 (3.211.20)
त्रैविद्यवृद्धाः शुचयो वृत्तवन्तो मनस्विनः । गुरुशुश्रूषवो दान्ताः शिष्टाचारा भवन्त्युत ॥
traividyavṛddhāḥ śucayo vṛttavanto manasvinaḥ | guruśuśrūṣavo dāntāḥ śiṣṭācārā bhavantyuta
तीनों वेदों में परिपक्व, पवित्र, सदाचारी, मनस्वी, गुरुजनों की सेवा करने वाले और संयमी — ऐसे लोग शिष्टाचारी होते हैं।
श्लोक 21 (3.211.21)
तेषामहीनसत्वानां दुष्कराचारकर्मणाम् । स्वैः कर्मभिः सत्कृतानां घोरत्वं संप्रणश्यति ॥
teṣāmahīnasatvānāṃ duṣkarācārakarmaṇām | svaiḥ karmabhiḥ satkṛtānāṃ ghoratvaṃ saṃpraṇaśyati
जिनका धैर्य कभी क्षीण नहीं होता, जिनका आचार और कर्म दूसरों के लिए दुष्कर है, और जो अपने कर्मों से सम्मानित हैं, उनकी सारी कठोरता नष्ट हो जाती है।
श्लोक 22 (3.211.22)
तं तदाचारमाश्चर्यं पुराणं शाश्वतं ध्रुवम् । धर्म्यं धर्मेण पश्यन्तः स्वर्गं यान्ति मनीषिणः ॥
taṃ tadācāramāścaryaṃ purāṇaṃ śāśvataṃ dhruvam | dharmyaṃ dharmeṇa paśyantaḥ svargaṃ yānti manīṣiṇaḥ
उस अद्भुत, प्राचीन, शाश्वत और अटल धर्मसंगत आचार को धर्म की दृष्टि से देखते हुए मनीषी स्वर्ग को जाते हैं।
श्लोक 23 (3.211.23)
आस्तिका मानहीनाश्च द्विजातिजनपूजकाः । श्रुतवृत्तोपसंपन्नास्ते सन्तः स्वर्गगामिनः ॥
āstikā mānahīnāśca dvijātijanapūjakāḥ | śrutavṛttopasaṃpannāste santaḥ svargagāminaḥ
आस्तिक, अभिमान से रहित, द्विजों का सम्मान करने वाले, विद्या और सदाचार से सम्पन्न — ऐसे सज्जन स्वर्ग जाते हैं।
श्लोक 24 (3.211.24)
वेदोक्तः प्रथमो धर्मो धर्मशास्त्रेषु चापरः । शिष्टाचीर्णश्च शिष्टानां त्रिविधं धर्मलक्षणम् ॥
vedoktaḥ prathamo dharmo dharmaśāstreṣu cāparaḥ | śiṣṭācīrṇaśca śiṣṭānāṃ trividhaṃ dharmalakṣaṇam
पहला धर्म वेदों में कहा गया है, दूसरा धर्मशास्त्रों में, और तीसरा शिष्टों द्वारा आचरित धर्म है — इस प्रकार धर्म के तीन लक्षण हैं।
श्लोक 25 (3.211.25)
धारणं चापि वेदानां तीर्थानामवगाहनम् । क्षमा सत्यार्जवं शौचं शिष्टाचारनिदर्शनम् ॥
dhāraṇaṃ cāpi vedānāṃ tīrthānāmavagāhanam | kṣamā satyārjavaṃ śaucaṃ śiṣṭācāranidarśanam
वेदों को धारण करना, तीर्थों में स्नान करना, क्षमा, सत्य, सरलता और पवित्रता — ये शिष्टाचार के परिचायक हैं।
श्लोक 26 (3.211.26)
सर्वभूतदयावन्तो ह्यहिंसानिरताः सदा । परुषं च न भाषन्ते सदा सन्तो द्विजप्रियाः ॥
sarvabhūtadayāvanto hyahiṃsāniratāḥ sadā | paruṣaṃ ca na bhāṣante sadā santo dvijapriyāḥ
सब प्राणियों पर दया करने वाले, सदा अहिंसा में लगे रहने वाले, कभी कठोर न बोलने वाले — ऐसे सज्जन द्विजों को प्रिय होते हैं।
श्लोक 27 (3.211.27)
शुभानामशुभानां च कर्मणां सबलाश्रयम् । विपाकमभिजानन्ति ते शिष्टाः शिष्टसंमताः ॥
śubhānāmaśubhānāṃ ca karmaṇāṃ sabalāśrayam | vipākamabhijānanti te śiṣṭāḥ śiṣṭasaṃmatāḥ
वे शुभ और अशुभ कर्मों के परिणाम को, उसके बल और आधार सहित, भलीभाँति जानते हैं; वे ही शिष्ट हैं, जिन्हें शिष्टजन मान देते हैं।
श्लोक 28 (3.211.28)
न्यायोपेता गुणोपेताः सर्वलोकहितैषिणः । सन्तः स्वर्गजितः शक्त्या सन्निविष्टाश्च सत्पथे । दातारः संविभक्तारो दीनानुग्रहकारिणः ॥
nyāyopetā guṇopetāḥ sarvalokahitaiṣiṇaḥ | santaḥ svargajitaḥ śaktyā sanniviṣṭāśca satpathe | dātāraḥ saṃvibhaktāro dīnānugrahakāriṇaḥ
न्यायपरायण, गुणवान, समस्त लोक का हित चाहने वाले सज्जन अपनी शक्ति से स्वर्ग जीत लेते हैं और सन्मार्ग पर स्थिर रहते हैं; वे दानी हैं, सबको उनका भाग बाँटते हैं और दीनों पर कृपा करते हैं।
श्लोक 29 (3.211.29)
सर्वपूज्याः श्रुतधनास्तथैव च तपस्विनः । सर्वभूतदयावन्तस्ते शिष्टाः शिष्टसंमताः ॥
sarvapūjyāḥ śrutadhanāstathaiva ca tapasvinaḥ | sarvabhūtadayāvantaste śiṣṭāḥ śiṣṭasaṃmatāḥ
सबके पूज्य, विद्या को ही धन मानने वाले, तपस्वी और समस्त प्राणियों पर दयालु — वे ही शिष्ट हैं, जिन्हें शिष्टजन मान देते हैं।
श्लोक 30 (3.211.30)
दाननित्याः सुखान्याशु प्राप्नुवन्त्यपि च श्रियम् । पीडया च कलत्रस्य भृत्यानां च समाहिताः ॥
dānanityāḥ sukhānyāśu prāpnuvantyapi ca śriyam | pīḍayā ca kalatrasya bhṛtyānāṃ ca samāhitāḥ
सदा दान करने वाले वे शीघ्र ही सुख और लक्ष्मी भी पा लेते हैं। एकाग्रचित्त वे लोग अपनी पत्नी और सेवकों को कष्ट में डालकर भी,
श्लोक 31 (3.211.31)
अतिशक्त्या प्रयच्छन्ति सन्तः सद्भिः समागताः । लोकयात्रां च पश्यन्तो धर्ममात्महितानि च । एवं सन्तोवर्तमानास्त्वेधन्ते शाश्वतीः समाः ॥
atiśaktyā prayacchanti santaḥ sadbhiḥ samāgatāḥ | lokayātrāṃ ca paśyanto dharmamātmahitāni ca | evaṃ santovartamānāstvedhante śāśvatīḥ samāḥ
सज्जनों से मिलने पर अपनी शक्ति से भी बढ़कर दान देते हैं। लोकव्यवहार, धर्म और अपने हित का ध्यान रखते हुए इस प्रकार आचरण करने वाले सज्जन अनन्त वर्षों तक उन्नति करते हैं।
श्लोक 32 (3.211.32)
अहिंसा सत्यवचनमानृशंस्यमथार्जवम् । अद्रोहो नातिमानश्च ह्रीस्तितिक्षा दमः शमः ॥
ahiṃsā satyavacanamānṛśaṃsyamathārjavam | adroho nātimānaśca hrīstitikṣā damaḥ śamaḥ
अहिंसा, सत्य वचन, क्रूरता का अभाव और सरलता, द्रोह न करना, अत्यधिक अभिमान न करना, लज्जा, सहनशीलता, इन्द्रियसंयम और मन की शान्ति —
श्लोक 33 (3.211.33)
धीमन्तो धृतिमन्तश्च भूतानामनुकम्पकाः । अकामद्वेषसंयुक्तास्ते सन्तो लोकसत्कृताः ॥
dhīmanto dhṛtimantaśca bhūtānāmanukampakāḥ | akāmadveṣasaṃyuktāste santo lokasatkṛtāḥ
जिन बुद्धिमान और धैर्यवान लोगों में ये गुण हैं, जो प्राणियों पर दया करते हैं और काम तथा द्वेष से रहित हैं — वे सज्जन संसार में सम्मान पाते हैं।
श्लोक 34 (3.211.34)
त्रीण्येव तु पदान्याहुः सतां वृत्तमनुस्मरन् । न चैव द्रुह्येद्दद्याच्च सत्यं चैव सदा वदेत् ॥
trīṇyeva tu padānyāhuḥ satāṃ vṛttamanusmaran | na caiva druhyeddadyācca satyaṃ caiva sadā vadet
सज्जनों के आचरण का स्मरण करते हुए कहा जाता है कि उसके तीन ही पद हैं — किसी से द्रोह न करे, दान दे और सदा सत्य बोले।
श्लोक 35 (3.211.35)
सर्वत्र च दयावन्तः सन्तः करुणवेदिनः । गच्छन्तीह सुसंतुष्टा धर्म्यं पन्थानमुत्तमम् ॥
sarvatra ca dayāvantaḥ santaḥ karuṇavedinaḥ | gacchantīha susaṃtuṣṭā dharmyaṃ panthānamuttamam
सर्वत्र दया रखने वाले, दूसरों की पीड़ा अनुभव करने वाले सज्जन यहाँ भलीभाँति संतुष्ट रहकर धर्म के उत्तम मार्ग पर चलते हैं।
श्लोक 36 (3.211.36)
शिष्टाचारा महात्मानो येषां धर्मः सुनिश्चितः । अनसूया क्षमा शान्तिः संतोषः प्रियवादिता ॥
śiṣṭācārā mahātmāno yeṣāṃ dharmaḥ suniścitaḥ | anasūyā kṣamā śāntiḥ saṃtoṣaḥ priyavāditā
जिनका धर्म सुनिश्चित है, ऐसे शिष्टाचारी महात्माओं के लिए — ईर्ष्या का अभाव, क्षमा, शान्ति, संतोष, मधुर वाणी,
श्लोक 37 (3.211.37)
कामक्रोधपरित्यागः शिष्टाचारनिषेवणम् । कर्म च श्रुतसंपन्नं सतां मार्गमनुत्तमम् ॥
kāmakrodhaparityāgaḥ śiṣṭācāraniṣevaṇam | karma ca śrutasaṃpannaṃ satāṃ mārgamanuttamam
काम और क्रोध का त्याग, शिष्टाचार का पालन और शास्त्रज्ञान से युक्त कर्म — यही सज्जनों का सर्वोत्तम मार्ग है।
श्लोक 38 (3.211.38)
शिष्टाचारं निषेवन्ते नित्यं धर्ममनुव्रताः । प्रज्ञाप्रासादमारुह्य मुह्यतो महतो जनान् ॥
śiṣṭācāraṃ niṣevante nityaṃ dharmamanuvratāḥ | prajñāprāsādamāruhya muhyato mahato janān
सदा धर्म का अनुसरण करते हुए वे शिष्टाचार का पालन करते हैं। प्रज्ञा के महल पर चढ़कर वे मोह में पड़े बहुसंख्यक लोगों को देखते हैं;
श्लोक 39 (3.211.39)
प्रेक्षन्ते लोकवृत्तानि विविधानि द्विजोत्तमाः । अतिपुण्यानि दानानि तानि द्विजवरोत्तम ॥
prekṣante lokavṛttāni vividhāni dvijottamāḥ | atipuṇyāni dānāni tāni dvijavarottama
ये श्रेष्ठ द्विज लोक के विविध व्यवहारों को देखते हैं। हे द्विजश्रेष्ठ, उनके वे दान अत्यन्त पुण्यदायक होते हैं।
श्लोक 40 (3.211.40)
एतत्ते सर्वमाख्यातं यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् । शिष्टाचारगुणान्ब्रह्मन्पुरस्कृत्य द्विजर्षभ ॥
etatte sarvamākhyātaṃ yathāprajñaṃ yathāśrutam | śiṣṭācāraguṇānbrahmanpuraskṛtya dvijarṣabha
हे ब्रह्मन्, हे द्विजश्रेष्ठ, शिष्टाचार के गुणों को सबसे आगे रखकर, अपनी समझ के अनुसार और जैसा सुना है वैसा, मैंने यह सब आपसे कह दिया।"