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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 212

धर्मव्याध का हिंसा और स्वधर्म पर उपदेश

मार्कण्डेय धर्मव्याध और ब्राह्मण कौशिक की कथा आगे बढ़ाते हैं। व्याध स्वीकार करता है कि उसका व्यवसाय घोर है, किंतु वह इसे विधि और पूर्वकर्म का परिणाम बताता है, जिसमें वह केवल निमित्त है। वह देवताओं और पितरों को अर्पित मांस के विधान, शिबि और रन्तिदेव के उदाहरणों तथा यज्ञ में पशुवध का उल्लेख करता है, और तर्क देता है कि खेती करने, चलने और बैठने तक में अनगिनत जीव मरते हैं, इसलिए संसार में कोई भी पूर्णतः अहिंसक नहीं है। अंत में वह कहता है कि संसार में बहुत कुछ उलटा दिखाई देता है, और जो अपने कर्म में निष्ठा से लगा रहता है वही महान यश पाता है।

अध्याय 211अध्याय-सूचीअध्याय 213

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.212.1)

स तु विप्रमथोवाच धर्मव्याधो युधिष्ठिर । यदहं ह्याचरे कर्म घोरमेतदसंशयम् ॥

sa tu vipramathovāca dharmavyādho yudhiṣṭhira | yadahaṃ hyācare karma ghorametadasaṃśayam

युधिष्ठिर! तब धर्मव्याध ने उस ब्राह्मण से कहा — "मैं जो कर्म करता हूँ, वह निःसन्देह घोर है।"

व्याध उवाच

श्लोक 2 (3.212.2)

विधिस्तु बलवान्ब्रह्मन्दुस्तरं हि पुरा कृतम् । पुरा कृतस्य पापस्य कर्मदोषो भवत्ययम् ॥

vidhistu balavānbrahmandustaraṃ hi purā kṛtam | purā kṛtasya pāpasya karmadoṣo bhavatyayam

किंतु हे ब्रह्मन्, विधि बलवान है और पूर्वजन्म में किया हुआ कर्म दुर्लंघ्य होता है। मेरे कर्म का यह दोष पूर्वकृत पाप से ही उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 3 (3.212.3)

दोषस्यैतस्य वै ब्रह्मन्विघाते यत्नवानहम् । विधिना हि हते पूर्वं निमित्तं घातको भवेत् ॥

doṣasyaitasya vai brahmanvighāte yatnavānaham | vidhinā hi hate pūrvaṃ nimittaṃ ghātako bhavet

हे ब्रह्मन्, इस दोष को मिटाने का मैं यत्न करता रहता हूँ। जब विधि ने किसी प्राणी को पहले ही मार डाला हो, तब मारने वाला तो निमित्त-मात्र होता है।

श्लोक 4 (3.212.4)

निमित्तभूता हि वयं कर्मणोऽस्य द्विजोत्तम ॥

nimittabhūtā hi vayaṃ karmaṇo'sya dvijottama

हे द्विजश्रेष्ठ, इस कर्म में हम तो केवल निमित्त हैं।

श्लोक 5 (3.212.5)

येषां हतानां मांसानि विक्रीणीमो वयं द्विज । तेषामपि भवेद्धर्म उपयोगेन भक्षणात् । देवतातिथिभृत्यानां पितृणां चापि पूजनात् ॥

yeṣāṃ hatānāṃ māṃsāni vikrīṇīmo vayaṃ dvija | teṣāmapi bhaveddharma upayogena bhakṣaṇāt | devatātithibhṛtyānāṃ pitṛṇāṃ cāpi pūjanāt

हे द्विज, जिन मारे गए पशुओं का मांस हम बेचते हैं, उनमें भी धर्म होता है — उस मांस के उपयोग और भक्षण से, तथा उससे देवताओं, अतिथियों, आश्रितों और पितरों का पूजन होने से।

श्लोक 6 (3.212.6)

ओषध्यो वीरुधश्चैव पशवो मृगपक्षिणः । अन्नाद्यभूता लोकस्य इत्यपि श्रूयते श्रुतिः ॥

oṣadhyo vīrudhaścaiva paśavo mṛgapakṣiṇaḥ | annādyabhūtā lokasya ityapi śrūyate śrutiḥ

ओषधियाँ, लताएँ, पशु, मृग और पक्षी — ये सब संसार के भोज्य पदार्थ हैं; ऐसा श्रुति भी कहती है।

श्लोक 7 (3.212.7)

आत्ममांसप्रसादेन शिबिरौशीनरो नृपः । स्वर्गं सुदुर्लभं प्राप्तः क्षमावान्द्विजसत्तम ॥

ātmamāṃsaprasādena śibirauśīnaro nṛpaḥ | svargaṃ sudurlabhaṃ prāptaḥ kṣamāvāndvijasattama

हे द्विजश्रेष्ठ, उशीनर के पुत्र क्षमाशील राजा शिबि ने अपने ही मांस के दान से अत्यन्त दुर्लभ स्वर्ग प्राप्त किया।

श्लोक 8 (3.212.8)

राज्ञो महानसे पूर्वं रन्तिदेवस्य वै द्विज । द्वे सहस्रे तु वध्येते पशूनामन्वहं तदा । अहन्यहनि पच्येते द्वे सहस्रे गवां तथा ॥

rājño mahānase pūrvaṃ rantidevasya vai dvija | dve sahasre tu vadhyete paśūnāmanvahaṃ tadā | ahanyahani pacyete dve sahasre gavāṃ tathā

हे द्विज, पूर्वकाल में राजा रन्तिदेव की पाकशाला में प्रतिदिन दो हजार पशु मारे जाते थे, और दिन-प्रतिदिन दो हजार गौएँ भी पकाई जाती थीं।

श्लोक 9 (3.212.9)

समांसं ददतो ह्यन्नं रन्तिदेवस्य नित्यशः । अतुला कीर्तिरभवन्नृपस्य द्विजसत्तम ॥

samāṃsaṃ dadato hyannaṃ rantidevasya nityaśaḥ | atulā kīrtirabhavannṛpasya dvijasattama

रन्तिदेव सदा मांस-सहित अन्न का दान करते थे, इसलिए हे द्विजश्रेष्ठ, उस राजा की अनुपम कीर्ति हुई।

श्लोक 10 (3.212.10)

चातुर्मास्ये च पशवो वध्यन्त इति नित्यशः । अग्नयो मांसकामाश्च इत्यपि श्रूयते श्रुतिः ॥

cāturmāsye ca paśavo vadhyanta iti nityaśaḥ | agnayo māṃsakāmāśca ityapi śrūyate śrutiḥ

चातुर्मास्य यज्ञ में नियमपूर्वक पशुओं का वध होता है, और अग्नियाँ मांस की कामना करती हैं — ऐसा भी श्रुति कहती है।

श्लोक 11 (3.212.11)

यज्ञेषु पशवो ब्रह्मन्वध्यन्ते सततं द्विजैः । संस्कृताः किल मन्त्रैश्च तेऽपि स्वर्गमवाप्नुवन् ॥

yajñeṣu paśavo brahmanvadhyante satataṃ dvijaiḥ | saṃskṛtāḥ kila mantraiśca te'pi svargamavāpnuvan

हे ब्रह्मन्, यज्ञों में द्विज निरन्तर पशुओं का वध करते हैं; कहते हैं कि मन्त्रों से संस्कारित होकर वे पशु भी स्वर्ग को प्राप्त हुए।

श्लोक 12 (3.212.12)

यदि नैवाग्नयो ब्रह्मन्मांसकामाऽभवन्पुरा । भक्ष्यं नैवाभवन्मांसं कस्यचिद्द्विजसत्तम ॥

yadi naivāgnayo brahmanmāṃsakāmā'bhavanpurā | bhakṣyaṃ naivābhavanmāṃsaṃ kasyaciddvijasattama

हे ब्रह्मन्, यदि आदिकाल में अग्नियाँ मांस की इच्छुक न होतीं, तो हे द्विजश्रेष्ठ, मांस किसी का भी भोजन न बनता।

श्लोक 13 (3.212.13)

अत्रापि विधिरुक्तश्च मुनिभिर्मांसभक्षणे ॥

atrāpi vidhiruktaśca munibhirmāṃsabhakṣaṇe

इस विषय में भी मुनियों ने मांस-भक्षण की विधि बताई है।

श्लोक 14 (3.212.14)

देवतानां पितृणां च भुङ्क्ते दत्त्वाऽपि यः सदा । यथाविधि यथाश्रद्धं न स दुष्येत भक्षणात् ॥

devatānāṃ pitṛṇāṃ ca bhuṅkte dattvā'pi yaḥ sadā | yathāvidhi yathāśraddhaṃ na sa duṣyeta bhakṣaṇāt

जो सदा विधिपूर्वक और श्रद्धा के साथ पहले देवताओं और पितरों को अर्पित करके ही भोजन करता है, वह उस भक्षण से दूषित नहीं होता।

श्लोक 15 (3.212.15)

अमांसाशी भवत्येवमित्यपि श्रूयते श्रुतिः । भार्यां गच्छन्ब्रह्मचारी ऋतौ भवति ब्राह्मणः ॥

amāṃsāśī bhavatyevamityapi śrūyate śrutiḥ | bhāryāṃ gacchanbrahmacārī ṛtau bhavati brāhmaṇaḥ

ऐसा व्यक्ति मांस न खाने वाला ही माना जाता है — यह भी श्रुति कहती है — जैसे ऋतुकाल में ही पत्नी के पास जाने वाला ब्राह्मण ब्रह्मचारी ही रहता है।

श्लोक 16 (3.212.16)

सत्यानृते विनिश्चित्य अत्रापि विधिरुच्यते । सौदासेन तदा राज्ञा मानुषा भक्षिता द्विज । शापाभिभूतेन भृशमत्र किं प्रतिभाति ते ॥

satyānṛte viniścitya atrāpi vidhirucyate | saudāsena tadā rājñā mānuṣā bhakṣitā dvija | śāpābhibhūtena bhṛśamatra kiṃ pratibhāti te

सत्य और असत्य का निर्णय करके इस विषय में भी विधि बताई गई है। हे द्विज, शाप से अभिभूत राजा सौदास ने एक समय मनुष्यों को खा डाला था — इस विषय में तुम्हें क्या जान पड़ता है?

श्लोक 17 (3.212.17)

स्वधर्म इतिकृत्वा तु न त्यजामि द्विजोत्तम । पुरा कृतमिति ज्ञात्वा जीवाम्येतेन कर्मणा ॥

svadharma itikṛtvā tu na tyajāmi dvijottama | purā kṛtamiti jñātvā jīvāmyetena karmaṇā

हे द्विजोत्तम, इसे अपना धर्म मानकर मैं इसे नहीं छोड़ता। इसे पूर्वकृत कर्म का फल जानकर मैं इसी कर्म से जीविका चलाता हूँ।

श्लोक 18 (3.212.18)

स्वधर्मं त्यजतो ब्रह्मन्नधर्म इह दृश्यते । स्वकर्मनिरतो यस्तु धर्मः स इति निश्चयः ॥

svadharmaṃ tyajato brahmannadharma iha dṛśyate | svakarmanirato yastu dharmaḥ sa iti niścayaḥ

हे ब्रह्मन्, जो अपना धर्म त्याग देता है, उसमें यहाँ अधर्म देखा जाता है; और जो अपने कर्म में लगा रहता है, वही धर्म है — यह निश्चय है।

श्लोक 19 (3.212.19)

कुले हि विहितं कर्म देही तं न विमुञ्चति । धात्रा विधिरयं दृष्टो बहुधा कर्मनिर्णये ॥

kule hi vihitaṃ karma dehī taṃ na vimuñcati | dhātrā vidhirayaṃ dṛṣṭo bahudhā karmanirṇaye

मनुष्य अपने कुल के लिए विहित कर्म को नहीं छोड़ता। कर्मों का निर्णय करते समय विधाता ने यह विधान अनेक प्रकार से निश्चित किया है।

श्लोक 20 (3.212.20)

द्रष्टव्यस्तु भवेद्ब्रह्मन्धर्मो धर्मविनिश्चये । कथं कर्म शुभं कुर्यां कथं मुच्ये पराभवात् ॥

draṣṭavyastu bhavedbrahmandharmo dharmaviniścaye | kathaṃ karma śubhaṃ kuryāṃ kathaṃ mucye parābhavāt

फिर भी हे ब्रह्मन्, धर्म का निश्चय करते समय धर्म पर दृष्टि रखनी चाहिए — मैं शुभ कर्म कैसे करूँ, इस पतन से कैसे छूटूँ?

श्लोक 21 (3.212.21)

कर्मणस्तस्य घोरस्य बहुधा निर्णयो भवेत् । दाने च सत्यवाक्ये च गुरुशुश्रूषणे तथा । द्विजातिपूजने चाहं धर्मे च निरतः सदा ॥

karmaṇastasya ghorasya bahudhā nirṇayo bhavet | dāne ca satyavākye ca guruśuśrūṣaṇe tathā | dvijātipūjane cāhaṃ dharme ca nirataḥ sadā

उस घोर कर्म का प्रायश्चित्त अनेक प्रकार से हो सकता है। मैं सदा दान, सत्य-भाषण, गुरुजनों की सेवा, द्विजों के पूजन और धर्म में लगा रहता हूँ।

श्लोक 22 (3.212.22)

अतिमानातिवादाभ्यां निवृत्तोस्मि द्विजोत्तम । कृषिं साध्वीति मन्यन्ते तत्र हिंसा परा स्मृता ॥

atimānātivādābhyāṃ nivṛttosmi dvijottama | kṛṣiṃ sādhvīti manyante tatra hiṃsā parā smṛtā

हे द्विजोत्तम, मैं अत्यधिक अभिमान और कटु वचनों से दूर रहता हूँ। लोग खेती को अच्छा कर्म मानते हैं, पर उसमें भी बड़ी हिंसा मानी गई है।

श्लोक 23 (3.212.23)

कर्षन्तो लाङ्गलैरुर्वीं घ्नन्ति भूमिशयान्बहून् । जीवानन्यांश्च बहुशस्तत्रकिं प्रतिभाति ते ॥

karṣanto lāṅgalairurvīṃ ghnanti bhūmiśayānbahūn | jīvānanyāṃśca bahuśastatrakiṃ pratibhāti te

हल से धरती जोतते हुए लोग भूमि में रहने वाले अनेक जीवों को और बहुत-से अन्य प्राणियों को भी मार डालते हैं — इस विषय में तुम्हें क्या जान पड़ता है?

श्लोक 24 (3.212.24)

धान्यबीजानि यान्याहुर्व्रीह्यादीनि द्विजोत्तम । सर्वाण्येतानि जीवा हि तत्र किं प्रतिभाति ते ॥

dhānyabījāni yānyāhurvrīhyādīni dvijottama | sarvāṇyetāni jīvā hi tatra kiṃ pratibhāti te

हे द्विजोत्तम, धान आदि जिन अन्न-बीजों का लोग नाम लेते हैं, वे सब भी जीव ही हैं — इस विषय में तुम्हें क्या जान पड़ता है?

श्लोक 25 (3.212.25)

अध्याक्रम्य पशूंश्चापि घ्नन्ति वै भक्षयन्ति च । वृक्षांस्तथौषधीश्चापि छिन्दन्ति पुरुषा द्विज ॥

adhyākramya paśūṃścāpi ghnanti vai bhakṣayanti ca | vṛkṣāṃstathauṣadhīścāpi chindanti puruṣā dvija

हे द्विज, मनुष्य पशुओं पर टूट पड़कर उन्हें मारते और खाते हैं, और वृक्षों तथा ओषधियों को भी काट डालते हैं।

श्लोक 26 (3.212.26)

जीवा हि बहवो ब्रह्मन्वृक्षेषु च फलेषु च । उदके बहवश्चापि तत्रकिं प्रतिभाति ते ॥

jīvā hi bahavo brahmanvṛkṣeṣu ca phaleṣu ca | udake bahavaścāpi tatrakiṃ pratibhāti te

हे ब्रह्मन्, वृक्षों और फलों में बहुत-से जीव रहते हैं, और जल में भी अनेक जीव हैं — इस विषय में तुम्हें क्या जान पड़ता है?

श्लोक 27 (3.212.27)

सर्वं व्याप्तमिदं ब्रह्मन्प्राणिभिः प्राणिजीवनैः । मत्स्यान्ग्रसन्ते मत्स्याश्च तत्रकिं प्रतिभाति ते ॥

sarvaṃ vyāptamidaṃ brahmanprāṇibhiḥ prāṇijīvanaiḥ | matsyāngrasante matsyāśca tatrakiṃ pratibhāti te

हे ब्रह्मन्, यह सारा जगत् ऐसे प्राणियों से भरा है जो दूसरे प्राणियों पर ही जीते हैं; मछलियाँ मछलियों को निगल जाती हैं — इस विषय में तुम्हें क्या जान पड़ता है?

श्लोक 28 (3.212.28)

सत्वैः सत्वानि जीवन्ति बहुधा द्विजसत्तम । प्राणिनोऽन्योन्यभक्षाश्च तत्रकिं प्रतिभाति ते ॥

satvaiḥ satvāni jīvanti bahudhā dvijasattama | prāṇino'nyonyabhakṣāśca tatrakiṃ pratibhāti te

हे द्विजश्रेष्ठ, प्राणी अनेक प्रकार से प्राणियों पर ही जीवित रहते हैं, और जीव एक-दूसरे को खाते हैं — इस विषय में तुम्हें क्या जान पड़ता है?

श्लोक 29 (3.212.29)

चङ्क्रम्यमाणा जीवांश्च धरणीसंश्रितान्बहून् । पद्भ्यां घ्नन्ति नरा विप्र तत्र किं प्रतिभाति ते ॥

caṅkramyamāṇā jīvāṃśca dharaṇīsaṃśritānbahūn | padbhyāṃ ghnanti narā vipra tatra kiṃ pratibhāti te

हे विप्र, चलते-फिरते हुए मनुष्य अपने पैरों से धरती पर रहने वाले अनेक जीवों को मार डालते हैं — इस विषय में तुम्हें क्या जान पड़ता है?

श्लोक 30 (3.212.30)

उपविष्टाः शयानाश्च घ्नन्ति जीवाननेकशः । अज्ञानादथवा ज्ञानात्तत्रकिं प्रतिभाति ते ॥

upaviṣṭāḥ śayānāśca ghnanti jīvānanekaśaḥ | ajñānādathavā jñānāttatrakiṃ pratibhāti te

बैठते और लेटते हुए भी लोग, जाने या अनजाने, अनगिनत जीवों को मार डालते हैं — इस विषय में तुम्हें क्या जान पड़ता है?

श्लोक 31 (3.212.31)

जीवैर्ग्रस्तमिदं सर्वमाकाशं पृथिवी तथा । अविज्ञानाच्च हिंसन्ति तत्र किं प्रतिभाति ते ॥

jīvairgrastamidaṃ sarvamākāśaṃ pṛthivī tathā | avijñānācca hiṃsanti tatra kiṃ pratibhāti te

यह सारा आकाश और पृथ्वी जीवों से भरे हुए हैं, और मनुष्य अनजाने में उनकी हिंसा करते हैं — इस विषय में तुम्हें क्या जान पड़ता है?

श्लोक 32 (3.212.32)

अहिंसेति यदुक्तं हि पुरुषैर्विस्मितैः पुरा । के न हिंसन्ति जीवान्वै लोकेऽस्मिन्द्विजसत्तम ॥

ahiṃseti yaduktaṃ hi puruṣairvismitaiḥ purā | ke na hiṃsanti jīvānvai loke'smindvijasattama

पूर्वकाल में विस्मित पुरुषों ने जिस "अहिंसा" की बात कही थी — हे द्विजश्रेष्ठ, इस लोक में ऐसा कौन है जो जीवों की हिंसा नहीं करता?

श्लोक 33 (3.212.33)

बहु संचिन्त्य इह वै नास्ति कश्चिदहिंसकः ॥

bahu saṃcintya iha vai nāsti kaścidahiṃsakaḥ

भली-भाँति विचार करने पर यही निकलता है कि यहाँ कोई भी अहिंसक नहीं है।

श्लोक 34 (3.212.34)

अहिंसायां तु निरता यतयो द्विजसत्तम । कुर्वन्त्येव हि हिंसां ते यत्नादल्पतरा भवेत् ॥

ahiṃsāyāṃ tu niratā yatayo dvijasattama | kurvantyeva hi hiṃsāṃ te yatnādalpatarā bhavet

हे द्विजश्रेष्ठ, अहिंसा में लगे हुए यति भी हिंसा करते ही हैं; प्रयत्न से वह केवल कम की जा सकती है।

श्लोक 35 (3.212.35)

आलक्ष्याश्चैव पुरुषाः कुले जाता महागुणाः । महाघोराणि कर्माणि कृत्वा लज्जन्ति वै न च ॥

ālakṣyāścaiva puruṣāḥ kule jātā mahāguṇāḥ | mahāghorāṇi karmāṇi kṛtvā lajjanti vai na ca

उत्तम कुलों में जन्मे, महान गुणों वाले प्रतिष्ठित पुरुष भी अत्यन्त घोर कर्म करके लज्जित नहीं होते।

श्लोक 36 (3.212.36)

सुहृदः सुहृदोऽन्यांश्च दुर्हृदश्चापि दुर्हृदः । सम्यक्प्रवृत्तान्पुरुषान्न सम्यगनुपश्यति ॥

suhṛdaḥ suhṛdo'nyāṃśca durhṛdaścāpi durhṛdaḥ | samyakpravṛttānpuruṣānna samyaganupaśyati

मित्र मित्रों और दूसरों की ओर, तथा शत्रु शत्रुओं की ओर देखते हैं, पर जो पुरुष ठीक आचरण करते हैं, उन्हें कोई ठीक से नहीं देखता।

श्लोक 37 (3.212.37)

समृद्धैश्च न नन्दन्ति बान्धवा बान्धवैरपि । गुरूंश्चैव विनिन्दन्ति मूढा निश्चितमानिनः ॥

samṛddhaiśca na nandanti bāndhavā bāndhavairapi | gurūṃścaiva vinindanti mūḍhā niścitamāninaḥ

बन्धु अपने ही बन्धुओं की समृद्धि से प्रसन्न नहीं होते, और अपने मत को ही निश्चित मानने वाले मूढ़ अपने गुरुओं की निन्दा करते हैं।

श्लोक 38 (3.212.38)

बहु लोके विपर्यस्तं दृश्यते द्विजसत्तम । धर्मयुक्तमधर्मं च तत्र किं प्रतिभाति ते ॥

bahu loke viparyastaṃ dṛśyate dvijasattama | dharmayuktamadharmaṃ ca tatra kiṃ pratibhāti te

हे द्विजश्रेष्ठ, संसार में बहुत कुछ उलटा दिखाई देता है — धर्मयुक्त भी और अधर्म भी आपस में उलझे हुए। इस विषय में तुम्हें क्या जान पड़ता है?

श्लोक 39 (3.212.39)

वक्तुं बहुविधं शक्यं धर्माधर्मेषु कर्मसु । स्वकर्मनिरतो यो हि स यशः प्राप्नुयान्महत् ॥

vaktuṃ bahuvidhaṃ śakyaṃ dharmādharmeṣu karmasu | svakarmanirato yo hi sa yaśaḥ prāpnuyānmahat

कर्मों के धर्म और अधर्म के विषय में अनेक प्रकार से बहुत कुछ कहा जा सकता है; किंतु जो अपने कर्म में लगा रहता है, वही महान यश प्राप्त करता है।

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