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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 213

धर्मव्याध द्वारा कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष-मार्ग का निरूपण

धर्मव्याध ब्राह्मण कौशिक से कहता है कि धर्म की गति सूक्ष्म और अनेक शाखाओं वाली है, और प्रत्येक शुभ या अशुभ कर्म का फल अवश्य मिलता है। योग्य लोगों की विफलता, दुष्टों की समृद्धि और भोजन होते हुए भी उसे न खा सकने वाले रोगियों का उदाहरण देकर वह बताता है कि मनुष्य का पुरुषार्थ स्वाधीन नहीं है और जीवन पर पूर्वकर्मों का फल शासन करता है। आत्मा के नित्य होने का प्रश्न पूछे जाने पर वह समझाता है कि जीव शरीर के साथ नहीं मरता, बल्कि कर्मों से बँधकर ऊँची-नीची योनियों में जाता है; अंत में धर्मपरायण मनुष्य धर्म के फलों से भी तृप्त न होकर वैराग्य धारण करता है और तप तथा इन्द्रिय-निग्रह द्वारा ब्रह्मपद पाता है। तब ब्राह्मण पूछता है कि इन्द्रियाँ क्या हैं और उनका निग्रह कैसे किया जाए।

अध्याय 212अध्याय-सूचीअध्याय 214

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.213.1)

धर्मव्याधस्तु निपुणं पुनरेव युधिष्ठिर । विप्रर्षभमुवाचेदं सर्वधर्मभृतांवर ॥

dharmavyādhastu nipuṇaṃ punareva yudhiṣṭhira | viprarṣabhamuvācedaṃ sarvadharmabhṛtāṃvara

हे समस्त धर्मात्माओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर! तब धर्मव्याध ने उस श्रेष्ठ ब्राह्मण से फिर कुशलतापूर्वक यह कहा —

व्याध उवाच

श्लोक 2 (3.213.2)

श्रुतिप्रमाणो धर्मोऽयमिति वृद्धानुशासनम् । सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य बहुशाखा ह्यनन्तिका ॥

śrutipramāṇo dharmo'yamiti vṛddhānuśāsanam | sūkṣmā gatirhi dharmasya bahuśākhā hyanantikā

"धर्म का प्रमाण श्रुति है" — ऐसा वृद्धजनों का उपदेश है। धर्म की गति सूक्ष्म है, उसकी अनेक शाखाएँ हैं और उसका अन्त नहीं है।

श्लोक 3 (3.213.3)

प्राणान्तिके विवाहे च वक्तव्यमनृतं भवेत् । अनृतेन भवेत्सत्यं सत्येनैवानृतं भवेत् ॥

prāṇāntike vivāhe ca vaktavyamanṛtaṃ bhavet | anṛtena bhavetsatyaṃ satyenaivānṛtaṃ bhavet

प्राण संकट में हों या विवाह का अवसर हो, तो असत्य भी बोला जा सकता है। असत्य से सत्य सिद्ध हो सकता है और सत्य से ही असत्य।

श्लोक 4 (3.213.4)

यद्भूतहितमत्यन्तं तत्सत्यमिति धारणा । विपर्ययकृतोऽधर्मः पश्य धर्मस्य सूक्ष्मताम् ॥

yadbhūtahitamatyantaṃ tatsatyamiti dhāraṇā | viparyayakṛto'dharmaḥ paśya dharmasya sūkṣmatām

जो प्राणियों के लिए अत्यन्त हितकर हो, वही सत्य है — ऐसी धारणा है। इसके विपरीत जो हो, वह अधर्म है। धर्म की सूक्ष्मता को देखो!

श्लोक 5 (3.213.5)

यत्करोत्यशुभं कर्म शुभं वा यदि सत्तम । अवश्यं तत्समाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः ॥

yatkarotyaśubhaṃ karma śubhaṃ vā yadi sattama | avaśyaṃ tatsamāpnoti puruṣo nātra saṃśayaḥ

हे सज्जनश्रेष्ठ, मनुष्य जो भी शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसका फल उसे अवश्य मिलता है — इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 6 (3.213.6)

विषमां च दशां प्राप्तो देवान्गर्हति वै भृशम् । आत्मनः कर्मदोषेण न विजानात्यपण्डितः ॥

viṣamāṃ ca daśāṃ prāpto devāngarhati vai bhṛśam | ātmanaḥ karmadoṣeṇa na vijānātyapaṇḍitaḥ

विषम दशा में पड़ने पर अज्ञानी मनुष्य देवताओं की कठोर निन्दा करता है; वह नहीं समझता कि यह उसके अपने कर्मदोष से हुआ है।

श्लोक 7 (3.213.7)

मूढो नैकृतिकश्चापि चपलश्च द्विजोत्तम । न शुभं कर्म बध्नाति पुरुषं पापनिश्चयम् ॥

mūḍho naikṛtikaścāpi capalaśca dvijottama | na śubhaṃ karma badhnāti puruṣaṃ pāpaniścayam

हे द्विजोत्तम, जो मूढ़, कपटी और चंचल है — पाप का निश्चय कर चुके ऐसे मनुष्य से शुभ कर्म नहीं जुड़ते।

श्लोक 8 (3.213.8)

सुखदुःखविपर्यासो यदा समुपपद्यते । नैनं प्रज्ञा सुनीतं वा त्रायते नैव पौरुषम् ॥

sukhaduḥkhaviparyāso yadā samupapadyate | nainaṃ prajñā sunītaṃ vā trāyate naiva pauruṣam

जब सुख और दुःख का उलट-फेर आ पड़ता है, तब न बुद्धि, न उत्तम नीति और न ही पुरुषार्थ उसकी रक्षा कर पाता है।

श्लोक 9 (3.213.9)

यो यमिच्छेद्यथा कामं तं तं कामं स आप्नुयात् । यदि स्यादपराधीनं पौरुषस्य क्रियाफलम् ॥

yo yamicchedyathā kāmaṃ taṃ taṃ kāmaṃ sa āpnuyāt | yadi syādaparādhīnaṃ pauruṣasya kriyāphalam

यदि मनुष्य के पुरुषार्थ का फल किसी दूसरे के अधीन न होता, तो जो जिस वस्तु की जैसी इच्छा करता, वह उसे वैसी ही प्राप्त कर लेता।

श्लोक 10 (3.213.10)

संयताश्चापि दक्षाश्च मतिमन्तश्च मानवाः । दृश्यन्ते निष्फलाः सन्तः प्रहीणाः सर्वकर्मभिः ॥

saṃyatāścāpi dakṣāśca matimantaśca mānavāḥ | dṛśyante niṣphalāḥ santaḥ prahīṇāḥ sarvakarmabhiḥ

फिर भी संयमी, कुशल और बुद्धिमान मनुष्य भी अपने सारे प्रयत्नों से थककर निष्फल होते देखे जाते हैं।

श्लोक 11 (3.213.11)

भूतानामपरः कश्चिद्धिंसायां सततोत्थितः । वञ्चनायां च लोकस्य स सुखेनैव युज्यते ॥

bhūtānāmaparaḥ kaściddhiṃsāyāṃ satatotthitaḥ | vañcanāyāṃ ca lokasya sa sukhenaiva yujyate

दूसरा कोई, जो प्राणियों की हिंसा और लोगों को ठगने में ही सदा लगा रहता है, सुख भोगता है।

श्लोक 12 (3.213.12)

अचेष्टमपि चासीनं श्रीः कंचिदुपतिष्ठति । कश्चित्कर्माणि कुर्वन्हि न प्राप्यमधिगच्छति ॥

aceṣṭamapi cāsīnaṃ śrīḥ kaṃcidupatiṣṭhati | kaścitkarmāṇi kurvanhi na prāpyamadhigacchati

कोई बिना कुछ किए बैठा रहता है, फिर भी लक्ष्मी उसके पास आती है; और कोई कर्म करते हुए भी प्राप्य वस्तु नहीं पाता।

श्लोक 13 (3.213.13)

देवानिष्ट्वा तपस्तप्त्वा कृपणैः पुत्रगृध्नुभिः । दशमासधृता गर्भा जायन्ते कुलपांसनाः ॥

devāniṣṭvā tapastaptvā kṛpaṇaiḥ putragṛdhnubhiḥ | daśamāsadhṛtā garbhā jāyante kulapāṃsanāḥ

पुत्र की लालसा रखने वाले दीन लोग देवताओं की पूजा और तप करते हैं, और दस मास गर्भ में धारण की गई संतानें कुल को कलंकित करने वाली निकलती हैं।

श्लोक 14 (3.213.14)

अपरे धनधान्यैश्च भोगैश्च पितृसंचितैः । विपुलैरभिजायन्ते लब्धास्तैरेव मङ्गलैः ॥

apare dhanadhānyaiśca bhogaiśca pitṛsaṃcitaiḥ | vipulairabhijāyante labdhāstaireva maṅgalaiḥ

दूसरे लोग पिता द्वारा संचित प्रचुर धन-धान्य और भोगों के बीच जन्म लेते हैं और उन्हीं मंगलमय वस्तुओं को पाते हैं।

श्लोक 15 (3.213.15)

न देहजा मनुष्याणां व्याधयो द्विजसत्तम । कर्मजा हि मनुष्याणां रोगा नास्त्यत्र संशयः ॥

na dehajā manuṣyāṇāṃ vyādhayo dvijasattama | karmajā hi manuṣyāṇāṃ rogā nāstyatra saṃśayaḥ

हे द्विजश्रेष्ठ, मनुष्यों के रोग शरीर से उत्पन्न नहीं होते; मनुष्यों के रोग कर्मों से ही उत्पन्न होते हैं — इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 16 (3.213.16)

आधिभिश्चैव बाध्यन्ते व्यालैः क्षुद्रमृगा इव । ते चापि कुशलैर्वैद्यैर्निपुणैः संभृतौषधैः । व्याधयो विनिवार्यन्ते मृगा व्याधैरिव द्विज ॥

ādhibhiścaiva bādhyante vyālaiḥ kṣudramṛgā iva | te cāpi kuśalairvaidyairnipuṇaiḥ saṃbhṛtauṣadhaiḥ | vyādhayo vinivāryante mṛgā vyādhairiva dvija

वे मानसिक व्यथाओं से वैसे ही पीड़ित होते हैं जैसे हिंसक जन्तुओं से छोटे मृग। और हे द्विज, कुशल, निपुण तथा औषधियों से सम्पन्न वैद्य उन रोगों को वैसे ही दूर भगाते हैं जैसे व्याध मृगों को।

श्लोक 17 (3.213.17)

येषामस्ति च भोक्तव्यं ग्रहणीरोगपीडिताः । न शक्नुवन्ति ते भोक्तुं चेष्टितं पूर्वकर्मणा ॥

yeṣāmasti ca bhoktavyaṃ grahaṇīrogapīḍitāḥ | na śaknuvanti te bhoktuṃ ceṣṭitaṃ pūrvakarmaṇā

जिनके पास खाने को भोजन है, पर जो ग्रहणी-रोग से पीड़ित हैं, वे उसे खा नहीं सकते — यह पूर्वकर्मों का ही परिणाम है।

श्लोक 18 (3.213.18)

अपरे बाहुबलिनः क्लिश्यन्ति बहवो जनाः । दुःखेन चाधिगच्छन्ति भोजनं द्विजसत्तम ॥

apare bāhubalinaḥ kliśyanti bahavo janāḥ | duḥkhena cādhigacchanti bhojanaṃ dvijasattama

हे द्विजश्रेष्ठ, बहुत-से दूसरे लोग भुजाओं में बल रखते हुए भी कष्ट उठाते हैं और बड़े दुःख से भोजन पाते हैं।

श्लोक 19 (3.213.19)

इति लोकमनाक्रन्दं देहशङ्कापरिप्लुतम् । स्रोतसाऽसकृदाक्षिप्तं ह्रियमाणं बलीयसा ॥

iti lokamanākrandaṃ dehaśaṅkāpariplutam | srotasā'sakṛdākṣiptaṃ hriyamāṇaṃ balīyasā

इस प्रकार यह असहाय संसार शरीर की चिन्ता में डूबा हुआ, बार-बार प्रबल प्रवाह से उछाला जाता और बहाया जाता है।

श्लोक 20 (3.213.20)

न म्रियेयुर्न जीर्येयुः सर्वे स्युः सर्वकामिकाः । नाप्रियं प्रतिपश्येयुर्विधिश्च यदि नो भवेत् ॥

na mriyeyurna jīryeyuḥ sarve syuḥ sarvakāmikāḥ | nāpriyaṃ pratipaśyeyurvidhiśca yadi no bhavet

यदि विधि न होती, तो न कोई मरता, न कोई बूढ़ा होता; सबकी सारी कामनाएँ पूरी होतीं और किसी को कुछ भी अप्रिय न देखना पड़ता।

श्लोक 21 (3.213.21)

उपर्युपरि लोकस्य सर्वो गन्तुं समीहते । यतते च यथाशक्ति न च तद्वर्तते तथा ॥

uparyupari lokasya sarvo gantuṃ samīhate | yatate ca yathāśakti na ca tadvartate tathā

हर कोई संसार में सबसे ऊपर उठना चाहता है और यथाशक्ति प्रयत्न भी करता है, परंतु वैसा होता नहीं।

श्लोक 22 (3.213.22)

बहवः संप्रदृश्यन्ते तुल्यनक्षत्रमङ्गलाः । महत्तु फलवैषम्यं दृश्यते कर्मसिद्धिषु ॥

bahavaḥ saṃpradṛśyante tulyanakṣatramaṅgalāḥ | mahattu phalavaiṣamyaṃ dṛśyate karmasiddhiṣu

बहुत-से लोग एक ही नक्षत्र और एक ही शुभ मुहूर्त में जन्मे दिखाई देते हैं, फिर भी उनके कर्मों की सिद्धि के फल में बड़ा अन्तर दिखता है।

श्लोक 23 (3.213.23)

न केचिदीशते ब्रह्मन्स्वयंग्राह्यस्य सत्तम । कर्मणां प्राकृतानां वै इह सिद्धिः प्रदृश्यते ॥

na kecidīśate brahmansvayaṃgrāhyasya sattama | karmaṇāṃ prākṛtānāṃ vai iha siddhiḥ pradṛśyate

हे ब्रह्मन्, हे सज्जनश्रेष्ठ, कोई भी उस वस्तु का भी स्वामी नहीं है जिसे वह स्वयं ग्रहण करना चाहता है। यहाँ तो पूर्वकृत कर्मों की ही सिद्धि दिखाई देती है।

श्लोक 24 (3.213.24)

तथा श्रुतिरियंब्रह्मञ्जीवः किल सनातनः । शरीरमध्रुवं लोके सर्वेषां प्राणिनामिह ॥

tathā śrutiriyaṃbrahmañjīvaḥ kila sanātanaḥ | śarīramadhruvaṃ loke sarveṣāṃ prāṇināmiha

हे ब्रह्मन्, श्रुति भी ऐसा ही कहती है कि जीव सनातन है, जबकि इस लोक में सभी प्राणियों का शरीर अनित्य है।

श्लोक 25 (3.213.25)

वध्यमाने शरीरे तु देहनाशो भवत्युत । जीवः संक्रमतेऽन्यत्रकर्मबन्धनिबन्धनः ॥

vadhyamāne śarīre tu dehanāśo bhavatyuta | jīvaḥ saṃkramate'nyatrakarmabandhanibandhanaḥ

शरीर के नष्ट किए जाने पर केवल देह का नाश होता है; पर जीव कर्मों के बन्धन में बँधा हुआ दूसरी जगह चला जाता है।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 26 (3.213.26)

कथं धर्मविदांश्रेष्ठ जीवो भवति शाश्वतः । एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं तत्त्वेन वदतांवर ॥

kathaṃ dharmavidāṃśreṣṭha jīvo bhavati śāśvataḥ | etadicchāmyahaṃ jñātuṃ tattvena vadatāṃvara

हे धर्मज्ञों में श्रेष्ठ, जीव शाश्वत कैसे है? हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, मैं इसे तत्त्व से जानना चाहता हूँ।

व्याध उवाच

श्लोक 27 (3.213.27)

न जीवनाशोस्ति हि देहभेदे । मिथ्यैतदाहुर्म्रियतीति मूढाः । जीवस्तु देहान्तरितः प्रयाति । दशार्धतैवास्य शरीरभेदः ॥

na jīvanāśosti hi dehabhede | mithyaitadāhurmriyatīti mūḍhāḥ | jīvastu dehāntaritaḥ prayāti | daśārdhataivāsya śarīrabhedaḥ

देह के छिन्न होने पर जीव का नाश नहीं होता; मूढ़ लोग झूठ ही कहते हैं कि वह मर जाता है। जीव तो दूसरे शरीर में चला जाता है; शरीर का टूटना केवल उसका पंचतत्त्व में मिल जाना है।

श्लोक 28 (3.213.28)

अन्यो हि नाश्नाति कृतं हि कर्म । मनुष्यलोके मनुजस्य कश्चित् । यत्तेन किंचिद्धि कृतंहि कर्म । तदश्नुते नास्ति कृतस्य नाशः ॥

anyo hi nāśnāti kṛtaṃ hi karma | manuṣyaloke manujasya kaścit | yattena kiṃciddhi kṛtaṃhi karma | tadaśnute nāsti kṛtasya nāśaḥ

मनुष्यलोक में किसी के किए हुए कर्म का फल कोई दूसरा नहीं भोगता। जिसने जो भी कर्म किया है, वही उसे भोगता है; किए हुए कर्म का नाश नहीं होता।

श्लोक 29 (3.213.29)

सुपुण्यशीला हि भवन्ति पुण्या । नराधमाः पापकृतो भवन्ति । नरोऽनुयातस्त्विह कर्मभिः स्वै- । स्ततः समुत्पद्यति भावितस्तैः ॥

supuṇyaśīlā hi bhavanti puṇyā | narādhamāḥ pāpakṛto bhavanti | naro'nuyātastviha karmabhiḥ svai- | stataḥ samutpadyati bhāvitastaiḥ

पुण्यशील लोग पुण्यात्मा बनते हैं, और अधम मनुष्य पापकर्मी होते हैं। मनुष्य के पीछे यहाँ उसके अपने कर्म चलते हैं, और उन्हीं से प्रभावित होकर वह फिर जन्म लेता है।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 30 (3.213.30)

कथं संभवते योनौ कथं वा पुण्यपापयोः । जातीः पुण्या ह्यपुण्याश्च कथं गच्छति सत्तम ॥

kathaṃ saṃbhavate yonau kathaṃ vā puṇyapāpayoḥ | jātīḥ puṇyā hyapuṇyāśca kathaṃ gacchati sattama

हे सज्जनश्रेष्ठ, जीव गर्भ में कैसे जन्म लेता है? और पुण्य तथा पाप के अनुसार वह पवित्र और अपवित्र योनियों में कैसे जाता है?

व्याध उवाच

श्लोक 31 (3.213.31)

गर्भाधानसमायुक्तं कर्मेदं संप्रदृश्यते । समासेन तु ते क्षिप्रं प्रवक्ष्यामि द्विजोत्तम ॥

garbhādhānasamāyuktaṃ karmedaṃ saṃpradṛśyate | samāsena tu te kṣipraṃ pravakṣyāmi dvijottama

हे द्विजोत्तम, कर्म का यह क्रम गर्भाधान से ही जुड़ा हुआ दिखाई देता है। मैं इसे संक्षेप में शीघ्र ही तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 32 (3.213.32)

यथा संभृतसंभारः पुनरेव प्रजायते । शुभकृच्छुभयोनीषु पापकृत्पापयोनिषु ॥

yathā saṃbhṛtasaṃbhāraḥ punareva prajāyate | śubhakṛcchubhayonīṣu pāpakṛtpāpayoniṣu

मनुष्य ने जैसी कर्म-सामग्री संचित की है, वैसे ही वह फिर जन्म लेता है — शुभ कर्म करने वाला शुभ योनियों में और पाप करने वाला पाप-योनियों में।

श्लोक 33 (3.213.33)

शुभैः प्रयोगैर्देवत्वंव्यामिश्रैर्मानुषो भवेत् । मोहनीयैर्वियोनीषु त्वधोगामी च किल्बिषैः ॥

śubhaiḥ prayogairdevatvaṃvyāmiśrairmānuṣo bhavet | mohanīyairviyonīṣu tvadhogāmī ca kilbiṣaiḥ

शुभ कर्मों से वह देवत्व पाता है, मिश्रित कर्मों से मनुष्य बनता है, मोह में डालने वाले कर्मों से निम्न योनियों में जाता है और पापों से अधोगति को प्राप्त होता है।

श्लोक 34 (3.213.34)

जातिमृत्युजरादुःखैः सततं समभिद्रुतः । संसारे पच्यमानश्च दोषैरात्मकृतैर्नरः ॥

jātimṛtyujarāduḥkhaiḥ satataṃ samabhidrutaḥ | saṃsāre pacyamānaśca doṣairātmakṛtairnaraḥ

जन्म, मृत्यु और जरा के दुःखों से निरन्तर घिरा हुआ मनुष्य अपने ही किए हुए दोषों से संसार में पकता रहता है।

श्लोक 35 (3.213.35)

तिर्यग्योनिसहस्राणि गत्वा नरकमेव च । जीवाः संपरिवर्तन्ते कर्मबन्धनिबन्धनाः ॥

tiryagyonisahasrāṇi gatvā narakameva ca | jīvāḥ saṃparivartante karmabandhanibandhanāḥ

हजारों पशु-पक्षी योनियों और नरक में भी जाकर जीव कर्मों के बन्धन में बँधे हुए चक्कर काटते रहते हैं।

श्लोक 36 (3.213.36)

जन्तुस्तु कर्मभिस्तैस्तैः स्वकृतैः प्रेत्य दुःखितः । तद्दुःखप्रतिघातार्थमपुण्यां योनिमाप्नुते ॥

jantustu karmabhistaistaiḥ svakṛtaiḥ pretya duḥkhitaḥ | tadduḥkhapratighātārthamapuṇyāṃ yonimāpnute

अपने ही किए हुए उन-उन कर्मों से मृत्यु के बाद दुःखी हुआ प्राणी उस दुःख को भोगकर समाप्त करने के लिए अपवित्र योनि में जन्म लेता है।

श्लोक 37 (3.213.37)

ततः कर्म समादत्ते पुनरन्यन्नवं बहु । पच्यते तु पुनस्तेन भुक्त्वाऽपथ्यमिवातुरः ॥

tataḥ karma samādatte punaranyannavaṃ bahu | pacyate tu punastena bhuktvā'pathyamivāturaḥ

फिर वह बहुत-से नए कर्म बटोर लेता है, और उनसे वैसे ही फिर पकता है जैसे अपथ्य खाकर रोगी कष्ट पाता है।

श्लोक 38 (3.213.38)

अजस्रमेव दुःखार्तोऽदुःखितः सुखिसंज्ञितः । ततोऽनिवृत्तबन्धत्वात्कर्मणामुदयादपि ॥

ajasrameva duḥkhārto'duḥkhitaḥ sukhisaṃjñitaḥ | tato'nivṛttabandhatvātkarmaṇāmudayādapi

निरन्तर दुःख से पीड़ित रहते हुए भी वह अपने को दुःखरहित और सुखी समझता है। फिर बन्धनों के न छूटने से और कर्मों के फल देने से,

श्लोक 39 (3.213.39)

परिक्रामति संसारे चक्रवद्बहुवेदनः । स चेन्निवृत्तबन्धस्तु विशुद्धश्चापि कर्मभिः ॥

parikrāmati saṃsāre cakravadbahuvedanaḥ | sa cennivṛttabandhastu viśuddhaścāpi karmabhiḥ

वह बड़ी पीड़ा सहता हुआ चक्र की भाँति संसार में भटकता रहता है। परंतु यदि उसके बन्धन छूट जाएँ और वह कर्मों से शुद्ध हो जाए,

श्लोक 40 (3.213.40)

तपोयोगसमारम्भं कुरुते द्विजसत्तम । कर्मभिर्बहुभिश्चापि लोकानश्नाति कर्मभिः ॥

tapoyogasamārambhaṃ kurute dvijasattama | karmabhirbahubhiścāpi lokānaśnāti karmabhiḥ

तो हे द्विजश्रेष्ठ, वह तप और योग का आरम्भ करता है, और अपने अनेक कर्मों के द्वारा उन कर्मों से प्राप्त लोकों का उपभोग करता है।

श्लोक 41 (3.213.41)

स चेन्निवृत्तबन्धस्तु विशुद्धश्चापि कर्मभिः । प्राप्नोति सुकृताँल्लोकान्यत्रगत्वा न शोचति ॥

sa cennivṛttabandhastu viśuddhaścāpi karmabhiḥ | prāpnoti sukṛtām̐llokānyatragatvā na śocati

यदि उसके बन्धन छूट जाएँ और वह कर्मों से शुद्ध हो जाए, तो वह पुण्यात्माओं के उन लोकों को पाता है, जहाँ जाकर फिर शोक नहीं करना पड़ता।

श्लोक 42 (3.213.42)

पापं कुर्वन्पापवृत्तः पापस्यान्तं न गच्छति । पुण्यं कुर्वन्पुण्यवृत्तः पुण्यस्यान्तं न गच्छति । तस्मात्पुण्यं यतेत्कर्तुं वर्जयेत च पापकम् ॥

pāpaṃ kurvanpāpavṛttaḥ pāpasyāntaṃ na gacchati | puṇyaṃ kurvanpuṇyavṛttaḥ puṇyasyāntaṃ na gacchati | tasmātpuṇyaṃ yatetkartuṃ varjayeta ca pāpakam

जो पाप करता है और पापमय आचरण में रहता है, वह पाप के अन्त तक नहीं पहुँचता; जो पुण्य करता है और पुण्यमय आचरण में रहता है, उसके पुण्य का भी अन्त नहीं होता। इसलिए पुण्य करने का प्रयत्न करना चाहिए और पाप को त्याग देना चाहिए।

श्लोक 43 (3.213.43)

अनसूयुः कृतज्ञश्च कल्याणान्येव सेवते । सुखानि धर्ममर्थं च स्वर्गं च लभते नरः ॥

anasūyuḥ kṛtajñaśca kalyāṇānyeva sevate | sukhāni dharmamarthaṃ ca svargaṃ ca labhate naraḥ

जो ईर्ष्या से रहित और कृतज्ञ है, वह केवल कल्याणकारी कर्मों का सेवन करता है और सुख, धर्म, अर्थ तथा स्वर्ग प्राप्त करता है।

श्लोक 44 (3.213.44)

संस्कृतस्य च दान्तस्य नियतस्य यतात्मनः । प्राज्ञस्यानन्तरा वृत्तिरिह लोके परत्र च ॥

saṃskṛtasya ca dāntasya niyatasya yatātmanaḥ | prājñasyānantarā vṛttiriha loke paratra ca

जो संस्कारी, दान्त, नियमशील, संयतचित्त और प्राज्ञ है, उसका कल्याण इस लोक और परलोक दोनों में निरन्तर बना रहता है।

श्लोक 45 (3.213.45)

सतां धर्मेण वर्तेत क्रियां शिष्टवदाचरेत् । असंक्लेशेन लोकस्य वृत्तिं लिप्सेत वै द्विजः ॥

satāṃ dharmeṇa varteta kriyāṃ śiṣṭavadācaret | asaṃkleśena lokasya vṛttiṃ lipseta vai dvijaḥ

सज्जनों के धर्म के अनुसार आचरण करना चाहिए और शिष्ट लोगों की तरह कर्म करना चाहिए; ब्राह्मण को लोगों को कष्ट दिए बिना जीविका प्राप्त करनी चाहिए।

श्लोक 46 (3.213.46)

सन्ति ह्यागमविज्ञानाः शिष्टाः शास्त्रे विचक्षणाः । स्वधर्मेण क्रिया लोके कुर्वाणास्ते ह्यसंकराः ॥

santi hyāgamavijñānāḥ śiṣṭāḥ śāstre vicakṣaṇāḥ | svadharmeṇa kriyā loke kurvāṇāste hyasaṃkarāḥ

ऐसे शिष्ट पुरुष हैं जो आगमों के ज्ञाता और शास्त्रों में निपुण हैं; वे संसार में अपने धर्म के अनुसार कर्म करते हुए धर्मों का संकर नहीं होने देते।

श्लोक 47 (3.213.47)

प्राज्ञो धर्मेण रमते धर्मं चैवोपजीवति । तस्माद्धर्मादवाप्तेन धनेन द्विजसत्तम ॥

prājño dharmeṇa ramate dharmaṃ caivopajīvati | tasmāddharmādavāptena dhanena dvijasattama

बुद्धिमान मनुष्य धर्म में ही रमता है और धर्म से ही जीविका चलाता है। हे द्विजश्रेष्ठ, उस धर्म से प्राप्त धन से

श्लोक 48 (3.213.48)

तस्यैव सिंचते मूलं गुणान्पश्यति यत्र वै । धर्मात्मा भवति ह्येवं चित्तं चास्य प्रसीदति । स मित्रजनसंतुष्ट इह प्रेत्य च नन्दति ॥

tasyaiva siṃcate mūlaṃ guṇānpaśyati yatra vai | dharmātmā bhavati hyevaṃ cittaṃ cāsya prasīdati | sa mitrajanasaṃtuṣṭa iha pretya ca nandati

वह उसी की जड़ सींचता है जिसमें गुण देखता है। इस प्रकार वह धर्मात्मा बनता है और उसका चित्त प्रसन्न रहता है; मित्रों के बीच संतुष्ट रहकर वह इस लोक और परलोक में आनन्द पाता है।

श्लोक 49 (3.213.49)

शब्दं स्पर्शं तथा रूपं गन्धानिष्टांश्च सत्तम । प्रभुत्वं लभते चापि धर्मस्यैतत्फलं विदुः ॥

śabdaṃ sparśaṃ tathā rūpaṃ gandhāniṣṭāṃśca sattama | prabhutvaṃ labhate cāpi dharmasyaitatphalaṃ viduḥ

हे सज्जनश्रेष्ठ, वह मनचाहे शब्द, स्पर्श, रूप और गन्ध पाता है, और प्रभुत्व भी प्राप्त करता है — इसे धर्म का फल कहा गया है।

श्लोक 50 (3.213.50)

धर्मस्य च फलं लब्ध्वा न तुष्यति महाद्विज । अतुष्यमाणो निर्वेदमादत्ते ज्ञानचक्षुषा ॥

dharmasya ca phalaṃ labdhvā na tuṣyati mahādvija | atuṣyamāṇo nirvedamādatte jñānacakṣuṣā

हे महाब्राह्मण, धर्म का फल पाकर भी वह संतुष्ट नहीं होता; और संतोष न पाकर वह ज्ञान-दृष्टि से वैराग्य धारण करता है।

श्लोक 51 (3.213.51)

प्रज्ञाचक्षुर्नर इह दोषं नैवानुरुध्यते । विरज्यति यथाकामं न च धर्मं विमुञ्चति ॥

prajñācakṣurnara iha doṣaṃ naivānurudhyate | virajyati yathākāmaṃ na ca dharmaṃ vimuñcati

प्रज्ञा की दृष्टि रखने वाला मनुष्य यहाँ दोषों के वश में नहीं होता; वह इच्छानुसार विरक्त हो जाता है, फिर भी धर्म को नहीं छोड़ता।

श्लोक 52 (3.213.52)

फलत्यागे च यतते दृष्ट्वा लोकं क्रियात्मकम् । ततो मोक्षे प्रयतते नानुपायादुपायतः ॥

phalatyāge ca yatate dṛṣṭvā lokaṃ kriyātmakam | tato mokṣe prayatate nānupāyādupāyataḥ

संसार को कर्ममय देखकर वह कर्मफल के त्याग का प्रयत्न करता है; फिर वह मोक्ष के लिए यत्न करता है — उचित उपाय से, बिना उपाय के नहीं।

श्लोक 53 (3.213.53)

एवं निर्वेदमादत्ते पापं कर्म जहाति च । धार्मिकश्चापि भवति मोक्षं च लभते परम् ॥

evaṃ nirvedamādatte pāpaṃ karma jahāti ca | dhārmikaścāpi bhavati mokṣaṃ ca labhate param

इस प्रकार वह वैराग्य धारण करता है और पापकर्म छोड़ देता है; वह धार्मिक बनता है और परम मोक्ष प्राप्त करता है।

श्लोक 54 (3.213.54)

तपो निःश्रेयसं जन्तोस्तस्य मूलं शमो दमः । तेन सर्वानवाप्नोति कामान्यान्मनसेच्छति ॥

tapo niḥśreyasaṃ jantostasya mūlaṃ śamo damaḥ | tena sarvānavāpnoti kāmānyānmanasecchati

तप ही प्राणी का परम कल्याण है, और उसका मूल शम तथा दम है। उसी से वह मन में जो-जो कामनाएँ करता है, वे सब पा लेता है।

श्लोक 55 (3.213.55)

इन्द्रियाणां निरोधेन सत्येन च दमेन च । ब्रह्मणः पदमाप्नोति यत्परं द्विजसत्तम ॥

indriyāṇāṃ nirodhena satyena ca damena ca | brahmaṇaḥ padamāpnoti yatparaṃ dvijasattama

हे द्विजश्रेष्ठ, इन्द्रियों के निरोध, सत्य और दम के द्वारा वह ब्रह्म के उस पद को पाता है जो सबसे परे है।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 56 (3.213.56)

इन्द्रियाणीति यान्याहुः कानि तानि यतव्रत । निग्रहश्च कथं कार्यो निग्रहस्य च किं फलम् ॥

indriyāṇīti yānyāhuḥ kāni tāni yatavrata | nigrahaśca kathaṃ kāryo nigrahasya ca kiṃ phalam

हे व्रतनिष्ठ, जिन्हें इन्द्रियाँ कहा जाता है, वे कौन-सी हैं? उनका निग्रह कैसे किया जाए, और निग्रह का फल क्या है?

श्लोक 57 (3.213.57)

कथं च फलमाप्नोति तेषां धर्मभृतांवर । एतदिच्छामि तत्त्वेन धर्मं ज्ञातुं सुधार्मिक ॥

kathaṃ ca phalamāpnoti teṣāṃ dharmabhṛtāṃvara | etadicchāmi tattvena dharmaṃ jñātuṃ sudhārmika

हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ, उनके निग्रह का फल कैसे प्राप्त होता है? हे परम धार्मिक, मैं इस धर्म को तत्त्व से जानना चाहता हूँ।

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