आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 215
पञ्चमहाभूत और इन्द्रिय-निग्रह
युधिष्ठिर को कथा सुनाते हुए मार्कण्डेय बताते हैं कि ब्राह्मण कौशिक ने धर्मव्याध से पाँच महाभूतों के गुणों के विषय में पूछा। व्याध समझाता है कि पृथ्वी के पाँच गुण हैं, जल के चार, तेज के तीन, वायु के दो और आकाश का एक; जब तक ये सन्तुलन में रहते हैं तब तक प्राणी टिके रहते हैं और उनके विषम होने पर देहधारी दूसरी देह में चला जाता है; और व्यक्त तथा अव्यक्त में क्या भेद है। फिर वह सिखाता है कि इन्द्रियों का संयम ही तप है, जिस पर स्वर्ग और नरक दोनों निर्भर हैं, और शरीर की तुलना उस रथ से करता है जिसके घोड़े इन्द्रियाँ हैं और जिन्हें धीर सारथि लगाम से थामे रहता है।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.215.1)
एवमुक्तः स विप्रस्तु धर्मव्याधेन भारत । कथामकथयद्भूयो मनसः प्रीतिवर्धनीम् ॥
evamuktaḥ sa viprastu dharmavyādhena bhārata | kathāmakathayadbhūyo manasaḥ prītivardhanīm
हे भारत, धर्मव्याध के ऐसा कहने पर उस ब्राह्मण ने फिर से मन को आनन्द देने वाली चर्चा आरम्भ की।
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 2 (3.215.2)
महाभूतानि यान्याहुः पञ्च धर्मविदांवर । एकैकस्य गुणान्सम्यक्पञ्चानामपि मे वद ॥
mahābhūtāni yānyāhuḥ pañca dharmavidāṃvara | ekaikasya guṇānsamyakpañcānāmapi me vada
हे धर्मज्ञों में श्रेष्ठ, जिन्हें पाँच महाभूत कहा जाता है, उन पाँचों में से प्रत्येक के गुण मुझे ठीक-ठीक बताइए।
व्याध उवाच
श्लोक 3 (3.215.3)
भूमिरापस्तथा ज्योतिर्वायुराकाशमेव च । गुणोत्तराणि सर्वाणि तेषां वक्ष्यामि ते गुणान् ॥
bhūmirāpastathā jyotirvāyurākāśameva ca | guṇottarāṇi sarvāṇi teṣāṃ vakṣyāmi te guṇān
पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश — इनमें से प्रत्येक में अपने बाद वाले भूतों के गुण भी रहते हैं। मैं तुम्हें उनके गुण बताता हूँ।
श्लोक 4 (3.215.4)
भूमिः पञ्चगुणा ब्रह्मन्नुदकं च चतुर्गुणम् । गुणास्त्रयस्तेजसि च त्रयश्चाकाशवातयोः ॥
bhūmiḥ pañcaguṇā brahmannudakaṃ ca caturguṇam | guṇāstrayastejasi ca trayaścākāśavātayoḥ
हे ब्रह्मन्, पृथ्वी के पाँच गुण हैं और जल के चार; तेज में तीन गुण हैं, और वायु तथा आकाश में मिलाकर तीन।
श्लोक 5 (3.215.5)
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः । एते गुणाः पञ्च भूमेः सर्वेभ्यो गुणवत्तराः ॥
śabdaḥ sparśaśca rūpaṃ ca raso gandhaśca pañcamaḥ | ete guṇāḥ pañca bhūmeḥ sarvebhyo guṇavattarāḥ
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध — ये पृथ्वी के पाँच गुण हैं; वह गुणों में अन्य सब भूतों से बढ़कर है।
श्लोक 6 (3.215.6)
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसश्चापि द्विजोत्तम । अपामेते गुणा ब्रह्मन्कीर्तितास्तव सुव्रत ॥
śabdaḥ sparśaśca rūpaṃ ca rasaścāpi dvijottama | apāmete guṇā brahmankīrtitāstava suvrata
हे द्विजोत्तम, शब्द, स्पर्श, रूप और रस — हे उत्तम व्रत वाले ब्राह्मण, ये जल के गुण मैंने तुम्हें बताए।
श्लोक 7 (3.215.7)
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च तेजसोऽथ गुणास्त्रयः । शब्दः स्पर्शश्च वायौ तु शब्दश्चाकाश एव तु ॥
śabdaḥ sparśaśca rūpaṃ ca tejaso'tha guṇāstrayaḥ | śabdaḥ sparśaśca vāyau tu śabdaścākāśa eva tu
शब्द, स्पर्श और रूप — ये तेज के तीन गुण हैं; वायु में शब्द और स्पर्श हैं, और आकाश में केवल शब्द।
श्लोक 8 (3.215.8)
एते पञ्चदश ब्रह्मन्गुणा भूतेषु पञ्चसु । वर्तन्ते सर्वभूतेषु येषु लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥
ete pañcadaśa brahmanguṇā bhūteṣu pañcasu | vartante sarvabhūteṣu yeṣu lokāḥ pratiṣṭhitāḥ
हे ब्रह्मन्, ये पन्द्रह गुण उन पाँच भूतों में रहते हैं जिन पर सारे लोक टिके हैं, और ये सभी प्राणियों में विद्यमान हैं।
श्लोक 9 (3.215.9)
अन्योन्यं नातिवर्तन्ते संपच्च भवति द्विज । यदा तु विषमं भावमाचरन्ति चराचराः ॥
anyonyaṃ nātivartante saṃpacca bhavati dvija | yadā tu viṣamaṃ bhāvamācaranti carācarāḥ
जब तक ये एक-दूसरे का अतिक्रमण नहीं करते, तब तक कल्याण रहता है, हे द्विज। परन्तु जब चर और अचर प्राणी विषम अवस्था में पहुँच जाते हैं,
श्लोक 10 (3.215.10)
तदा देही देहमन्यं व्यतिरोहति कालतः । प्रातिलोम्याद्विनश्यन्ति जायन्ते चानुपूर्वशः ॥
tadā dehī dehamanyaṃ vyatirohati kālataḥ | prātilomyādvinaśyanti jāyante cānupūrvaśaḥ
तब समय आने पर देहधारी जीव दूसरी देह में चला जाता है। प्राणी विपरीत क्रम से नष्ट होते हैं और क्रमानुसार जन्म लेते हैं।
श्लोक 11 (3.215.11)
तत्र तत्र हि दृश्यन्ते धातवः पाञ्चभौतिकाः । यैरावृतमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥
tatra tatra hi dṛśyante dhātavaḥ pāñcabhautikāḥ | yairāvṛtamidaṃ sarvaṃ jagatsthāvarajaṅgamam
जहाँ-तहाँ पाँच महाभूतों से बने धातु दिखाई देते हैं, जिनसे यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है।
श्लोक 12 (3.215.12)
इन्द्रियैर्गृह्यते यद्यत्तत्तद्व्यक्तमिति स्मृतम् । तदव्यक्तमिति ज्ञेयं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥
indriyairgṛhyate yadyattattadvyaktamiti smṛtam | tadavyaktamiti jñeyaṃ liṅgagrāhyamatīndriyam
जो-जो इन्द्रियों से ग्रहण किया जाता है, वह व्यक्त कहलाता है; और जो इन्द्रियों से परे है तथा केवल लिङ्ग (अनुमान) से जाना जाता है, उसे अव्यक्त समझना चाहिए।
श्लोक 13 (3.215.13)
यथास्वं ग्राहकान्येषां शब्दादीनामिमानि तु । इन्द्रियाणि तथा देही धारयन्निह तप्यते ॥
yathāsvaṃ grāhakānyeṣāṃ śabdādīnāmimāni tu | indriyāṇi tathā dehī dhārayanniha tapyate
ये इन्द्रियाँ अपने-अपने ढंग से शब्द आदि विषयों को ग्रहण करती हैं; और देहधारी इन्हें धारण करता हुआ यहाँ संताप पाता है।
श्लोक 14 (3.215.14)
लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि पश्यति । परापरज्ञः सक्तः सन्स तु भूतानि पश्यति ॥
loke vitatamātmānaṃ lokaṃ cātmani paśyati | parāparajñaḥ saktaḥ sansa tu bhūtāni paśyati
वह आत्मा को लोक में व्याप्त और लोक को आत्मा में देखता है। पर और अपर को जानने वाला वह, आसक्त रहते हुए भी, सब प्राणियों को देखता है।
श्लोक 15 (3.215.15)
पश्यतः सर्वभूतानि सर्वावस्थासु सर्वदा । ब्रह्मभूतस्य संयोगो नाशुभेनोपपद्यते ॥
paśyataḥ sarvabhūtāni sarvāvasthāsu sarvadā | brahmabhūtasya saṃyogo nāśubhenopapadyate
जो सब प्राणियों को उनकी सब अवस्थाओं में सदा देखता है और ब्रह्मरूप हो गया है, उसका अशुभ से संयोग नहीं होता।
श्लोक 16 (3.215.16)
ज्ञानमूलात्मकं क्लेशमतिवृत्तस्य मोहजम् । लोकबुद्धिप्रकाशेन ज्ञेयमार्गेण गम्यते ॥
jñānamūlātmakaṃ kleśamativṛttasya mohajam | lokabuddhiprakāśena jñeyamārgeṇa gamyate
जो अज्ञान से उपजे मोहजनित क्लेश को पार कर चुका है, उसके लिए ज्ञेय तत्त्व का मार्ग संसार को प्रकाशित करने वाली बुद्धि के प्रकाश से तय होता है।
श्लोक 17 (3.215.17)
अनादिनिधनं जन्तुमात्मयोनिं सदाव्ययम् । अनौपम्यममूर्तं च भगवानाह बुद्धिमान् ॥
anādinidhanaṃ jantumātmayoniṃ sadāvyayam | anaupamyamamūrtaṃ ca bhagavānāha buddhimān
बुद्धिमान भगवान ने जीव को आदि और अन्त से रहित, स्वयम्भू, सदा अविनाशी, अनुपम और निराकार बताया है।
श्लोक 18 (3.215.18)
तपोमूलमिदं सर्वं यन्मां विप्रानुपृच्छसि । तपसा हि समाप्नोति यद्यदेवाभिवाञ्छति । इन्द्रियाण्येव संयम्य तपो भवति नान्यथा ॥
tapomūlamidaṃ sarvaṃ yanmāṃ viprānupṛcchasi | tapasā hi samāpnoti yadyadevābhivāñchati | indriyāṇyeva saṃyamya tapo bhavati nānyathā
हे विप्र, तुम मुझसे जो कुछ पूछते हो, उस सबका मूल तप है। तप से ही मनुष्य जो-जो चाहता है, वह पा लेता है। और इन्द्रियों को वश में करना ही तप है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं।
श्लोक 19 (3.215.19)
इन्द्रियाण्येव तत्सर्वं यत्स्वर्गनरकावुभौ । निगृहीतविसृष्टानि स्वर्गाय नरकाय च ॥
indriyāṇyeva tatsarvaṃ yatsvarganarakāvubhau | nigṛhītavisṛṣṭāni svargāya narakāya ca
स्वर्ग और नरक दोनों इन्द्रियाँ ही हैं; वश में की हुई वे स्वर्ग की ओर ले जाती हैं और खुली छोड़ी हुई नरक की ओर।
श्लोक 20 (3.215.20)
एष योगविधिः कृत्स्नो यावदिन्द्रियधारणम् । एतन्मूलं हि तपसः स्वर्गस्य नरकस्य च ॥
eṣa yogavidhiḥ kṛtsno yāvadindriyadhāraṇam | etanmūlaṃ hi tapasaḥ svargasya narakasya ca
इन्द्रियों को वश में रखना — यही योग की सम्पूर्ण विधि है। यही तप का मूल है, और स्वर्ग तथा नरक का भी।
श्लोक 21 (3.215.21)
इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमार्च्छत्यसंशयम् । सन्नियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं समाप्नुयात् ॥
indriyāṇāṃ prasaṅgena doṣamārcchatyasaṃśayam | sanniyamya tu tānyeva tataḥ siddhiṃ samāpnuyāt
इन्द्रियों की आसक्ति से मनुष्य निःसन्देह दोष को प्राप्त होता है; पर उन्हीं को भली-भाँति संयमित करके वह सिद्धि पा लेता है।
श्लोक 22 (3.215.22)
षण्णामात्मनि योज्यानामैश्वर्यं योऽधितिष्ठति । न स पापैः कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रियः ॥
ṣaṇṇāmātmani yojyānāmaiśvaryaṃ yo'dhitiṣṭhati | na sa pāpaiḥ kuto'narthairyujyate vijitendriyaḥ
जो आत्मा में जोड़ी जाने वाली छहों (इन्द्रियों) पर प्रभुत्व रखता है, वह जितेन्द्रिय पापों से भी लिप्त नहीं होता, अनर्थों की तो बात ही क्या।
श्लोक 23 (3.215.23)
रथः शरीरं पुरुषस्य दृष्ट- । मात्मा नियन्तेन्द्रियाण्याहुरश्वान् । तैरप्रमत्तः कुशली सदश्वै- । र्दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः ॥
rathaḥ śarīraṃ puruṣasya dṛṣṭa- | mātmā niyantendriyāṇyāhuraśvān | tairapramattaḥ kuśalī sadaśvai- | rdāntaiḥ sukhaṃ yāti rathīva dhīraḥ
मनुष्य का शरीर रथ माना गया है, आत्मा उसका सारथि है, और इन्द्रियों को घोड़े कहा गया है। इन उत्तम और सधे हुए घोड़ों के साथ सावधान, कुशल और धीर पुरुष रथी के समान सुख से यात्रा करता है।
श्लोक 24 (3.215.24)
षण्णामात्मनियुक्तानामिन्द्रियाणां प्रमाथिनाम् । यो धीरो धारयेद्रश्मीन्स स्यात्परमसारथिः ॥
ṣaṇṇāmātmaniyuktānāmindriyāṇāṃ pramāthinām | yo dhīro dhārayedraśmīnsa syātparamasārathiḥ
जो धीर पुरुष आत्मा से जुड़ी हुई छहों मथ डालने वाली इन्द्रियों की लगाम थामे रहता है, वही श्रेष्ठ सारथि है।
श्लोक 25 (3.215.25)
इन्द्रियाणां प्रसृष्टानां हयानामिव वर्त्मसु । धृतिं कुर्वीत सारथ्ये धृत्या तानि जयेद्ध्रुवम् ॥
indriyāṇāṃ prasṛṣṭānāṃ hayānāmiva vartmasu | dhṛtiṃ kurvīta sārathye dhṛtyā tāni jayeddhruvam
जब इन्द्रियाँ मार्ग पर घोड़ों की तरह बेलगाम दौड़ती हैं, तब सारथि के समान धैर्य से उन्हें थामना चाहिए; धैर्य से उन पर निश्चय ही विजय पाई जाती है।
श्लोक 26 (3.215.26)
इन्द्रियाणां विचरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य हरते बुद्धिं नावं वायुरिवाम्भसि ॥
indriyāṇāṃ vicaratāṃ yanmano'nuvidhīyate | tadasya harate buddhiṃ nāvaṃ vāyurivāmbhasi
विचरती हुई इन्द्रियों के पीछे जब मन चल पड़ता है, तो वह मनुष्य की बुद्धि को वैसे ही हर लेता है जैसे जल में वायु नाव को बहा ले जाती है।
श्लोक 27 (3.215.27)
येषु विप्रतिपद्यन्ते षट्स्वमोहात्फलागमम् । तेष्वध्यवसिताध्यायी विन्दते ध्यानजं फलम् ॥
yeṣu vipratipadyante ṣaṭsvamohātphalāgamam | teṣvadhyavasitādhyāyī vindate dhyānajaṃ phalam
जिन छह (इन्द्रियों) के विषय में लोग फल पाने की इच्छा में भटक जाते हैं, उन्हीं पर मोहरहित होकर दृढ़ निश्चय से ध्यान करने वाला ध्यान से उत्पन्न फल पाता है।