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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 216

तीन गुण, प्राणवायु और आत्मा

ब्राह्मण के अनुरोध पर धर्मव्याध तमस्, रजस् और सत्त्व के लक्षण बताता है और कहता है कि शूद्र कुल में जन्मा व्यक्ति भी सद्गुणों से वैश्यत्व, क्षत्रियत्व और अन्त में ब्राह्मणत्व तक पहुँच जाता है। शरीर में अग्नि और वायु कैसे कार्य करते हैं, यह पूछे जाने पर वह समझाता है कि प्राण और जठराग्नि किस प्रकार शरीर को धारण करते हैं, और प्राण, अपान, समान, उदान तथा व्यान किस प्रकार मल बाहर ले जाते हैं, सन्धियों को चलाते हैं और अन्न पचाते हैं। फिर वह मूर्त शरीर, आत्मा और क्षेत्रज्ञ का वर्णन करता है, जिन्हें केवल शान्त और सूक्ष्म बुद्धि ही देख पाती है, और अन्त में लोभ-क्रोध के निग्रह, सत्य, अहिंसा और त्याग का उपदेश देता है, जिनसे मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त होता है।

अध्याय 215अध्याय-सूचीअध्याय 217

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.216.1)

एवं तु सूक्ष्मे कथिते धर्मव्याधेन भारत । ब्राह्मणः स पुनः सूक्ष्मं पप्रच्छ सुसमाहितः ॥

evaṃ tu sūkṣme kathite dharmavyādhena bhārata | brāhmaṇaḥ sa punaḥ sūkṣmaṃ papraccha susamāhitaḥ

हे भारत, धर्मव्याध द्वारा इस प्रकार सूक्ष्म विषय कहे जाने पर उस ब्राह्मण ने पूर्ण एकाग्र होकर फिर एक सूक्ष्म प्रश्न पूछा।

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 2 (3.216.2)

सत्वस्य रजसश्चैव तमसश्च यथातथम् । गुणांस्तत्त्वेन मे ब्रूहि यथावदिह पृच्छतः ॥

satvasya rajasaścaiva tamasaśca yathātatham | guṇāṃstattvena me brūhi yathāvadiha pṛcchataḥ

मैं पूछता हूँ, मुझे सत्त्व, रजस् और तमस् — इन गुणों का स्वरूप यथार्थ रूप से ठीक-ठीक बताइए।

व्याध उवाच

श्लोक 3 (3.216.3)

हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि । एतान्गुणान्पृथक्त्वेन निबोध गदतो मम ॥

hanta te kathayiṣyāmi yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi | etānguṇānpṛthaktvena nibodha gadato mama

अच्छा, तुम मुझसे जो पूछते हो, वह मैं तुम्हें बताता हूँ। इन गुणों का अलग-अलग वर्णन मुझसे सुनो।

श्लोक 4 (3.216.4)

मोहात्मकं तमस्तेषां रज एषां प्रवर्तकम् । प्रकाशबहुलत्वाच्च सत्वं ज्याय इहोच्यते ॥

mohātmakaṃ tamasteṣāṃ raja eṣāṃ pravartakam | prakāśabahulatvācca satvaṃ jyāya ihocyate

इनमें तमस् मोहस्वरूप है, रजस् प्रवृत्ति कराने वाला है, और प्रकाश की अधिकता के कारण सत्त्व को यहाँ श्रेष्ठ कहा गया है।

श्लोक 5 (3.216.5)

अविद्याबहुलो मूढः स्वप्नशीलो विचेतनः । दुर्हृषीकस्तमोध्यस्तः सक्रोधस्तामसोऽलसः ॥

avidyābahulo mūḍhaḥ svapnaśīlo vicetanaḥ | durhṛṣīkastamodhyastaḥ sakrodhastāmaso'lasaḥ

तामस मनुष्य अविद्या से भरा, मूढ़, निद्राशील और चेतनाहीन होता है; उसकी इन्द्रियाँ दूषित होती हैं, वह अन्धकार से ग्रस्त, क्रोधी और आलसी होता है।

श्लोक 6 (3.216.6)

सुवृत्तवाक्यो मन्त्री च यो नराग्र्योऽभ्यसूयकः । विवित्समानो विप्रर्षे स्तब्धो मानी स राजसः ॥

suvṛttavākyo mantrī ca yo narāgryo'bhyasūyakaḥ | vivitsamāno viprarṣe stabdho mānī sa rājasaḥ

जो वाक्चतुर हो और मन्त्रणा देता फिरे, मनुष्यों में आगे रहने की चाह रखे और दूसरों के गुणों में दोष देखे, हे विप्रर्षे, जो लाभ का इच्छुक, अकड़ वाला और अभिमानी हो, वह राजस है।

श्लोक 7 (3.216.7)

प्रकाशबहुलो धीरो निर्विवित्सोऽनसूयकः । अक्रोधनो नरो धीमान्दान्तश्चैव स सात्विकः ॥

prakāśabahulo dhīro nirvivitso'nasūyakaḥ | akrodhano naro dhīmāndāntaścaiva sa sātvikaḥ

जिसमें प्रकाश की अधिकता हो, जो धीर हो, संग्रह की इच्छा से रहित हो, ईर्ष्याहीन, क्रोधरहित, बुद्धिमान और संयमी हो, वह सात्त्विक है।

श्लोक 8 (3.216.8)

सात्विकस्त्वथ संबुद्धो लोकवृत्तैर्न लिप्यते । यदा बुध्यति बोद्धव्यं लोकवृत्तं जुगुप्सते ॥

sātvikastvatha saṃbuddho lokavṛttairna lipyate | yadā budhyati boddhavyaṃ lokavṛttaṃ jugupsate

सात्त्विक मनुष्य जब जाग जाता है, तब संसार के व्यवहारों से लिप्त नहीं होता; जानने योग्य को जान लेने पर वह लोक-व्यवहार से विमुख हो जाता है।

श्लोक 9 (3.216.9)

वैराग्यस्य च रूपं तु पूर्वमेव प्रवर्तते । मृदुर्भवत्यहंकारः प्रसीदत्यार्जवं च यत् ॥

vairāgyasya ca rūpaṃ tu pūrvameva pravartate | mṛdurbhavatyahaṃkāraḥ prasīdatyārjavaṃ ca yat

पहले वैराग्य का स्वरूप प्रकट होता है; उसका अहंकार कोमल हो जाता है और उसकी सरलता निर्मल हो उठती है।

श्लोक 10 (3.216.10)

ततोऽस्य सर्वद्वन्द्वानि प्रशाम्यन्ति परस्परम् । न चास्यासंयमो नाम क्वचिद्भवति कश्चन ॥

tato'sya sarvadvandvāni praśāmyanti parasparam | na cāsyāsaṃyamo nāma kvacidbhavati kaścana

तब उसके सारे द्वन्द्व परस्पर शान्त हो जाते हैं, और उसमें कहीं भी किसी प्रकार का असंयम नहीं रहता।

श्लोक 11 (3.216.11)

शूद्रयोनौ हि जातस्य सद्गुणानुपतिष्ठतः । वैश्यत्वं भवति ब्रह्मन्क्षत्रियत्वं तथैव च ॥

śūdrayonau hi jātasya sadguṇānupatiṣṭhataḥ | vaiśyatvaṃ bhavati brahmankṣatriyatvaṃ tathaiva ca

हे ब्रह्मन्, शूद्र-योनि में जन्मा व्यक्ति भी यदि सद्गुणों का आचरण करे, तो उसे वैश्यत्व प्राप्त होता है और उसी प्रकार क्षत्रियत्व भी।

श्लोक 12 (3.216.12)

आर्जवे वर्तमानस्य ब्राह्मण्यमभिजायते । गुणास्ते कीर्तिताः सर्वे किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

ārjave vartamānasya brāhmaṇyamabhijāyate | guṇāste kīrtitāḥ sarve kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi

और जो सरलता में स्थित रहता है, उसमें ब्राह्मणत्व उत्पन्न होता है। मैंने तुम्हें सारे गुण बता दिए; अब और क्या सुनना चाहते हो?

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 13 (3.216.13)

पार्थिवं धातुमासाद्य शारीरोऽग्निः कथं भवेत् । अवकाशविशेषेण कथं वर्तयतेऽनिलः ॥

pārthivaṃ dhātumāsādya śārīro'gniḥ kathaṃ bhavet | avakāśaviśeṣeṇa kathaṃ vartayate'nilaḥ

पार्थिव धातु का आश्रय लेकर शरीर की अग्नि कैसे बनती है? और शरीर के विशेष अवकाशों के द्वारा वायु किस प्रकार कार्य करता है?

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 14 (3.216.14)

प्रश्नमेतं समुद्दिष्टं ब्राह्मणेन युधिष्ठिर । व्याधस्तु कथयामास ब्राह्मणाय महात्मने ॥

praśnametaṃ samuddiṣṭaṃ brāhmaṇena yudhiṣṭhira | vyādhastu kathayāmāsa brāhmaṇāya mahātmane

हे युधिष्ठिर, ब्राह्मण ने यह प्रश्न रखा, और व्याध ने उस महात्मा ब्राह्मण को इसका उत्तर दिया।

व्याध उवाच

श्लोक 15 (3.216.15)

मूर्धानमाश्रितो वह्निः शरीरं परिपालयन् । प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते ॥

mūrdhānamāśrito vahniḥ śarīraṃ paripālayan | prāṇo mūrdhani cāgnau ca vartamāno viceṣṭate

मस्तक में स्थित अग्नि शरीर की रक्षा करती है। प्राण मस्तक में और अग्नि में स्थित होकर सबको गतिशील रखता है।

श्लोक 16 (3.216.16)

भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं प्राणे प्रतिष्ठितम् । श्रेष्ठं तदेव भूतानां ब्रह्मज्योतिरुपास्महे ॥

bhūtaṃ bhavyaṃ bhaviṣyaṃ ca sarvaṃ prāṇe pratiṣṭhitam | śreṣṭhaṃ tadeva bhūtānāṃ brahmajyotirupāsmahe

भूत, वर्तमान और भविष्य — सब कुछ प्राण में प्रतिष्ठित है। वही प्राणियों में श्रेष्ठ है; हम ब्रह्मज्योति के रूप में उसकी उपासना करते हैं।

श्लोक 17 (3.216.17)

स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः । मनोबुद्धिरहंकारो भूतानां विषयश्च सः ॥

sa jantuḥ sarvabhūtātmā puruṣaḥ sa sanātanaḥ | manobuddhirahaṃkāro bhūtānāṃ viṣayaśca saḥ

वही जीव है, सब प्राणियों का आत्मा, वही सनातन पुरुष है; वही मन, बुद्धि और अहंकार है, और वही भूतों का विषय है।

श्लोक 18 (3.216.18)

अव्यक्तं सत्वसंज्ञं च जीवः कालः स चैव हि । प्रकृतिः पुरुषश्चैव प्राण एव द्विजोत्तम ॥

avyaktaṃ satvasaṃjñaṃ ca jīvaḥ kālaḥ sa caiva hi | prakṛtiḥ puruṣaścaiva prāṇa eva dvijottama

अव्यक्त, सत्त्व नाम वाला तत्त्व, जीव और काल भी — वही सब है। हे द्विजोत्तम, प्रकृति और पुरुष भी प्राण ही हैं।

श्लोक 19 (3.216.19)

जागर्ति स्वप्नकाले च स्वप्ने स्वप्नायते च सः । जाग्रत्सु बलमाधत्ते चेष्टत्सु चेष्टयत्यपि ॥

jāgarti svapnakāle ca svapne svapnāyate ca saḥ | jāgratsu balamādhatte ceṣṭatsu ceṣṭayatyapi

वह निद्रा के समय भी जागता है और स्वप्न में वही स्वप्न देखता है; जागने वालों में बल भरता है और चेष्टा करने वालों को चेष्टा कराता है।

श्लोक 20 (3.216.20)

तस्मिन्निरुद्धे विप्रेन्द्र मृत इत्यभिधीयते । त्यक्त्वा शरीरं भूतात्मा पुनरन्यत्प्रपद्यते ॥

tasminniruddhe viprendra mṛta ityabhidhīyate | tyaktvā śarīraṃ bhūtātmā punaranyatprapadyate

हे विप्रेन्द्र, उसके रुक जाने पर मनुष्य को मृत कहा जाता है; भूतात्मा शरीर को छोड़कर फिर दूसरे शरीर को प्राप्त होता है।

श्लोक 21 (3.216.21)

एष त्वग्निरपानेन प्राणेन परिपाल्यते । पृष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ॥

eṣa tvagnirapānena prāṇena paripālyate | pṛṣṭhatastu samānena svāṃ svāṃ gatimupāśritaḥ

यह अग्नि अपान और प्राण से पोषित होती है, और पीछे से समान से; ये सब अपनी-अपनी गति में स्थित रहते हैं।

श्लोक 22 (3.216.22)

बस्तिमूले गुदे चैव पावकं समुपाश्रितः । वहन्मूत्रं पुरीषं वाऽप्यपानः परिवर्तते ॥

bastimūle gude caiva pāvakaṃ samupāśritaḥ | vahanmūtraṃ purīṣaṃ vā'pyapānaḥ parivartate

मूत्राशय के मूल में और गुदा में अग्नि का आश्रय लेकर अपान वायु मूत्र और मल को बाहर ले जाता हुआ घूमता रहता है।

श्लोक 23 (3.216.23)

प्रयत्ने कर्मणि बले य एकस्त्रिषु वर्तते । उदान इति तं प्राहुरध्यात्मविदुषो जनाः ॥

prayatne karmaṇi bale ya ekastriṣu vartate | udāna iti taṃ prāhuradhyātmaviduṣo janāḥ

जो अकेला प्रयत्न, कर्म और बल — इन तीनों में कार्य करता है, उसे अध्यात्मवेत्ता लोग उदान कहते हैं।

श्लोक 24 (3.216.24)

सन्धौसन्धौ संनिविष्टः सर्वेष्वपि तथाऽनिलः । शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ॥

sandhausandhau saṃniviṣṭaḥ sarveṣvapi tathā'nilaḥ | śarīreṣu manuṣyāṇāṃ vyāna ityupadiśyate

मनुष्यों के शरीरों में जो वायु प्रत्येक सन्धि में स्थित रहता है, उसे व्यान कहा जाता है।

श्लोक 25 (3.216.25)

धातुष्वग्निस्तु विततः स तु वायुसमीरितः । रसान्धातूंश्च दोषांश्च वर्तयन्परिधावति ॥

dhātuṣvagnistu vitataḥ sa tu vāyusamīritaḥ | rasāndhātūṃśca doṣāṃśca vartayanparidhāvati

धातुओं में फैली हुई अग्नि वायु से प्रेरित होकर रसों, धातुओं और दोषों को चलाती हुई सर्वत्र दौड़ती है।

श्लोक 26 (3.216.26)

प्राणानां संनिपातात्तु सन्निपातः प्रजायते । सोष्मा सोऽग्निरिति ज्ञेयो योऽन्नं पचति देहिनां ॥

prāṇānāṃ saṃnipātāttu sannipātaḥ prajāyate | soṣmā so'gniriti jñeyo yo'nnaṃ pacati dehināṃ

प्राणों के मेल से संनिपात उत्पन्न होता है; वही ऊष्मा वह अग्नि जानी जाती है जो देहधारियों का अन्न पचाती है।

श्लोक 27 (3.216.27)

अपानोदानयोर्मध्ये प्राणव्यानौ समाहितौ । समन्वितस्त्वधिष्ठानं सम्यक्पचति पावकः ॥

apānodānayormadhye prāṇavyānau samāhitau | samanvitastvadhiṣṭhānaṃ samyakpacati pāvakaḥ

अपान और उदान के बीच प्राण और व्यान स्थित हैं; इनसे युक्त होकर अग्नि अपने स्थान में अन्न को भली-भाँति पचाती है।

श्लोक 28 (3.216.28)

अस्यापि पायुपर्यन्तस्तथा स्याद्गुदसंज्ञितः । स्रोतांसि तस्माज्जायन्ते सर्वप्राणेषु देहिनाम् ॥

asyāpi pāyuparyantastathā syādgudasaṃjñitaḥ | srotāṃsi tasmājjāyante sarvaprāṇeṣu dehinām

उसका मार्ग भी पायु तक जाता है, और वह छोर गुदा कहलाता है; उसी से देहधारियों के सब प्राणों में स्रोत (नाड़ियाँ) उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 29 (3.216.29)

अग्निवेगवहः प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते । स ऊर्ध्वमागम्य पुनः समुत्क्षिपति पावकम् ॥

agnivegavahaḥ prāṇo gudānte pratihanyate | sa ūrdhvamāgamya punaḥ samutkṣipati pāvakam

अग्नि के वेग को वहन करने वाला प्राण गुदा के छोर पर रुक जाता है; फिर वह ऊपर आकर अग्नि को ऊपर की ओर उछाल देता है।

श्लोक 30 (3.216.30)

पक्वाशयस्त्वधोनाभ्या ऊर्ध्वमामाशयः स्थितः । नाभिमध्ये शरीरस्य प्राणाः सर्वे प्रतिष्ठिताः ॥

pakvāśayastvadhonābhyā ūrdhvamāmāśayaḥ sthitaḥ | nābhimadhye śarīrasya prāṇāḥ sarve pratiṣṭhitāḥ

नाभि के नीचे पक्वाशय है और ऊपर आमाशय; शरीर के मध्य नाभि में सारे प्राण प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 31 (3.216.31)

प्रवृत्ता हृदयात्सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा । वहन्त्यन्नरसान्नाड्यो दशप्राणप्रचोदिताः ॥

pravṛttā hṛdayātsarve tiryagūrdhvamadhastathā | vahantyannarasānnāḍyo daśaprāṇapracoditāḥ

हृदय से निकलकर सारी नाड़ियाँ तिरछी, ऊपर और नीचे जाती हैं, और दस प्राणों से प्रेरित होकर अन्न का रस ले जाती हैं।

श्लोक 32 (3.216.32)

योगिनामेष मार्गस्तु येन गच्छन्ति तत्परम् । जितक्लमासनो धीरो मूर्धन्यात्मानमादधत् ॥

yogināmeṣa mārgastu yena gacchanti tatparam | jitaklamāsano dhīro mūrdhanyātmānamādadhat

यही योगियों का वह मार्ग है जिससे वे परम पद को जाते हैं: थकान और आसन को जीत लेने वाला धीर योगी आत्मा को मूर्धा में स्थापित करता है।

श्लोक 33 (3.216.33)

एवं सर्वेषु विततौ प्राणापानौ हि देहिषु । तौ तावदग्निसहितौ विद्धि वै प्राणमात्मनि ॥

evaṃ sarveṣu vitatau prāṇāpānau hi dehiṣu | tau tāvadagnisahitau viddhi vai prāṇamātmani

इस प्रकार प्राण और अपान सभी देहधारियों में फैले हुए हैं। अग्नि सहित इन दोनों को आत्मा में स्थित प्राण जानो।

श्लोक 34 (3.216.34)

एकादशविकारात्मा कलासंभारसंभृतः । मूर्तिमन्तं हि तं विद्धि नित्यं कर्मजितात्मकम् ॥

ekādaśavikārātmā kalāsaṃbhārasaṃbhṛtaḥ | mūrtimantaṃ hi taṃ viddhi nityaṃ karmajitātmakam

जो ग्यारह विकारों से बना है और अनेक कलाओं के संयोग से पुष्ट है, उसे सदा कर्म से जीता जाने वाला मूर्त रूप जानो।

श्लोक 35 (3.216.35)

तस्मिन्यः संस्थितो ह्यग्निर्नित्यं स्थाल्यामिवाहितः । आत्मानं तं विजानीहि नित्यं योगजितात्मकम् ॥

tasminyaḥ saṃsthito hyagnirnityaṃ sthālyāmivāhitaḥ | ātmānaṃ taṃ vijānīhi nityaṃ yogajitātmakam

उसमें जो अग्नि पात्र में रखी अग्नि की भाँति सदा स्थित है, उसे सदा योग से जीता जाने वाला आत्मा जानो।

श्लोक 36 (3.216.36)

देवो यः संस्थितस्तस्मिन्नब्बिन्दुरिव पुष्करे । क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं त्यागजितात्मकं ॥

devo yaḥ saṃsthitastasminnabbinduriva puṣkare | kṣetrajñaṃ taṃ vijānīhi nityaṃ tyāgajitātmakaṃ

उसमें जो देव कमल-पत्र पर जल-बिन्दु की भाँति स्थित है, उसे सदा त्याग से जीता जाने वाला क्षेत्रज्ञ जानो।

श्लोक 37 (3.216.37)

जीवात्मकं विजानीहि रजः सत्वं तमस्तथा । जीवमात्मगुणं विद्धि तथाऽऽत्मानं परात्मकं ॥

jīvātmakaṃ vijānīhi rajaḥ satvaṃ tamastathā | jīvamātmaguṇaṃ viddhi tathā''tmānaṃ parātmakaṃ

रजस्, सत्त्व और तमस् को जीव-स्वरूप जानो; जीव को आत्मा का गुण जानो, और आत्मा को परमात्मस्वरूप।

श्लोक 38 (3.216.38)

सचेतनं जीवगुणं वदन्ति । स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम् । ततः परं क्षेत्रविदो वदन्ति । प्राकल्पयद्यो भुवनानि सप्त ॥

sacetanaṃ jīvaguṇaṃ vadanti | sa ceṣṭate ceṣṭayate ca sarvam | tataḥ paraṃ kṣetravido vadanti | prākalpayadyo bhuvanāni sapta

कहते हैं कि जीव का गुण चेतन है; वह स्वयं चेष्टा करता है और सबको चेष्टा कराता है। क्षेत्र के ज्ञाता कहते हैं कि उससे भी परे वह है जिसने सातों लोकों की रचना की।

श्लोक 39 (3.216.39)

एष सर्वेषु भूतेषु भूतात्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया ज्ञानवेदिभिः ॥

eṣa sarveṣu bhūteṣu bhūtātmā na prakāśate | dṛśyate tvagryayā buddhyā sūkṣmayā jñānavedibhiḥ

यह भूतात्मा सब प्राणियों में रहते हुए भी प्रकट नहीं होता, परन्तु ज्ञानीजन तीक्ष्ण और सूक्ष्म बुद्धि से उसे देख लेते हैं।

श्लोक 40 (3.216.40)

चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम् । प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्नुते ॥

cittasya hi prasādena hanti karma śubhāśubham | prasannātmātmani sthitvā sukhamānantyamaśnute

चित्त की प्रसन्नता से मनुष्य शुभ और अशुभ कर्मों का नाश कर देता है; प्रसन्नचित्त होकर आत्मा में स्थित हुआ वह अनन्त सुख भोगता है।

श्लोक 41 (3.216.41)

लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्तः सुखं स्वपेत् । सुखदुःखे हि संत्यज्य निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः । निवाते वा यथा दीपो दीप्येत्कुशलदीपितः ॥

lakṣaṇaṃ tu prasādasya yathā tṛptaḥ sukhaṃ svapet | sukhaduḥkhe hi saṃtyajya nirdvandvo niṣparigrahaḥ | nivāte vā yathā dīpo dīpyetkuśaladīpitaḥ

उस प्रसन्नता का लक्षण यह है: जैसे तृप्त मनुष्य सुख से सोता है, और जैसे वायुरहित स्थान में कुशलता से जलाया गया दीपक प्रकाशित होता है, वैसा ही वह होता है जिसने सुख-दुःख त्याग दिए हैं और जो द्वन्द्वों तथा परिग्रह से रहित है।

श्लोक 42 (3.216.42)

पूर्वरात्रेऽपरे चैव युञ्जानः सततं मनः । लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥

pūrvarātre'pare caiva yuñjānaḥ satataṃ manaḥ | laghvāhāro viśuddhātmā paśyatyātmānamātmani

रात के पहले और पिछले पहर में निरन्तर मन को योग में लगाता हुआ, अल्पाहारी और शुद्धात्मा पुरुष अपने भीतर आत्मा का दर्शन करता है।

श्लोक 43 (3.216.43)

प्रदीप्तेनेव दीपेन मनोदीपेन पश्यति । दृष्ट्वाऽऽत्मानं निरात्मानं स तदा विप्रमुच्यते ॥

pradīpteneva dīpena manodīpena paśyati | dṛṣṭvā''tmānaṃ nirātmānaṃ sa tadā vipramucyate

जलते हुए दीपक के समान मन-रूपी दीपक से वह देखता है; और आत्मा को अहंभाव से रहित देखकर वह तब मुक्त हो जाता है।

श्लोक 44 (3.216.44)

सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः । एतत्पवित्रं यञ्ज्ञानं तपो वै संक्रमो मतः ॥

sarvopāyaistu lobhasya krodhasya ca vinigrahaḥ | etatpavitraṃ yañjñānaṃ tapo vai saṃkramo mataḥ

सभी उपायों से लोभ और क्रोध को वश में करना चाहिए। यही पवित्र ज्ञान है, और यही तप पार उतरने का साधन माना गया है।

श्लोक 45 (3.216.45)

नित्यं क्रोधात्तपो रक्षेच्छ्रियं रक्षेच्च मत्सरात् । विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥

nityaṃ krodhāttapo rakṣecchriyaṃ rakṣecca matsarāt | vidyāṃ mānāpamānābhyāmātmānaṃ tu pramādataḥ

तप की सदा क्रोध से रक्षा करनी चाहिए, लक्ष्मी की ईर्ष्या से, विद्या की मान-अपमान से, और अपनी प्रमाद से।

श्लोक 46 (3.216.46)

आनृशंस्यं परो धर्मः क्षमा च परमं बलम् । आत्मज्ञानं परं ज्ञानं परं सत्यव्रतव्रतम् ॥

ānṛśaṃsyaṃ paro dharmaḥ kṣamā ca paramaṃ balam | ātmajñānaṃ paraṃ jñānaṃ paraṃ satyavratavratam

क्रूरता का अभाव परम धर्म है, क्षमा परम बल है, आत्मज्ञान परम ज्ञान है, और सत्य का व्रत परम व्रत है।

श्लोक 47 (3.216.47)

सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यं ज्ञानं हितं भवेत् । यद्भूतहितमत्यन्तं तद्वै सत्यं परं मतम् ॥

satyasya vacanaṃ śreyaḥ satyaṃ jñānaṃ hitaṃ bhavet | yadbhūtahitamatyantaṃ tadvai satyaṃ paraṃ matam

सत्य बोलना श्रेयस्कर है; सत्य ही ज्ञान है और हितकारी है। जो प्राणियों के लिए अत्यन्त हितकारी हो, वही परम सत्य माना गया है।

श्लोक 48 (3.216.48)

यस्य सर्वे समारम्भा निराशीर्बन्धनाः सदा । त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी स च बुद्धिमान् ॥

yasya sarve samārambhā nirāśīrbandhanāḥ sadā | tyāge yasya hutaṃ sarvaṃ sa tyāgī sa ca buddhimān

जिसके सारे कार्य सदा कामना के बन्धन से रहित हों, और जिसने त्याग में सब कुछ आहुत कर दिया हो, वही त्यागी है और वही बुद्धिमान है।

श्लोक 49 (3.216.49)

यदा न गुरुतां चैनं च्यावयेदुपपादयन् । तं विद्याद्ब्राह्मणो योगमयोगं योगसंज्ञितम् ॥

yadā na gurutāṃ cainaṃ cyāvayedupapādayan | taṃ vidyādbrāhmaṇo yogamayogaṃ yogasaṃjñitam

जब कोई भी वस्तु उसे परखती हुई भी उसकी गम्भीरता से विचलित न कर सके, तब ब्राह्मण उसे योग जाने — विषयों से वह वियोग जिसे योग कहा जाता है।

श्लोक 50 (3.216.50)

न हिंस्यात्सर्वभूतानि मैत्रायणगतश्चरेत् । नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥

na hiṃsyātsarvabhūtāni maitrāyaṇagataścaret | nedaṃ jīvitamāsādya vairaṃ kurvīta kenacit

किसी भी प्राणी की हिंसा न करे; मैत्री के मार्ग पर चले। यह जीवन पाकर किसी से वैर न करे।

श्लोक 51 (3.216.51)

आकिंचन्यं सुसंतोषो निराशित्वमचापलम् । एतदेव परं ज्ञानं सदात्मज्ञानमुत्तमम् ॥

ākiṃcanyaṃ susaṃtoṣo nirāśitvamacāpalam | etadeva paraṃ jñānaṃ sadātmajñānamuttamam

अकिंचनता, पूर्ण सन्तोष, आशा से मुक्ति और अचपलता — यही परम ज्ञान है, यही उत्तम आत्मज्ञान है।

श्लोक 52 (3.216.52)

परिग्रहं परित्यज्य भवेद्बुद्ध्या यतव्रतः । अशोकं स्थानमाश्रित्य निश्चलं प्रेत्य चेह च ॥

parigrahaṃ parityajya bhavedbuddhyā yatavrataḥ | aśokaṃ sthānamāśritya niścalaṃ pretya ceha ca

परिग्रह को त्यागकर बुद्धि से दृढ़व्रती बने, और इस लोक तथा परलोक में अचल, शोकरहित स्थान का आश्रय ले।

श्लोक 53 (3.216.53)

तपोनित्येन दान्तेन मुनिना संयतात्मना । अजितं जेतुकामेन भाव्यं सङ्गेष्वसङ्गिना ॥

taponityena dāntena muninā saṃyatātmanā | ajitaṃ jetukāmena bhāvyaṃ saṅgeṣvasaṅginā

जो अजेय को जीतना चाहे, उसे नित्य तप में लगा, दमनशील, संयतचित्त मुनि होना चाहिए, और आसक्तियों के बीच भी अनासक्त रहना चाहिए।

श्लोक 54 (3.216.54)

गुणागुणमनासङ्गमेककार्यमनन्तरम् । एतत्तद्ब्रह्मणो वृत्तमाहुरेकपदं सुखम् ॥

guṇāguṇamanāsaṅgamekakāryamanantaram | etattadbrahmaṇo vṛttamāhurekapadaṃ sukham

गुण और अगुण दोनों से अनासक्त, एक ही लक्ष्य वाला और निरन्तर — इसे ब्रह्म का आचरण कहते हैं, जो एकमात्र सुखमय पद है।

श्लोक 55 (3.216.55)

परित्यजति यो दुःखं सुखं चाप्युभयं नरः । ब्रह्म प्राप्नोति सोऽत्यन्तमासङ्गं च न गच्छति ॥

parityajati yo duḥkhaṃ sukhaṃ cāpyubhayaṃ naraḥ | brahma prāpnoti so'tyantamāsaṅgaṃ ca na gacchati

जो मनुष्य दुःख और सुख दोनों को त्याग देता है, वह पूर्ण रूप से ब्रह्म को प्राप्त होता है और आसक्ति में नहीं पड़ता।

श्लोक 56 (3.216.56)

यथाश्रुतमिदं सर्वं समासेन द्विजोत्तम । एतत्ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥

yathāśrutamidaṃ sarvaṃ samāsena dvijottama | etatte sarvamākhyātaṃ kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi

हे द्विजोत्तम, जैसा मैंने सुना था, वह सब मैंने तुम्हें संक्षेप में बता दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?

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