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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 217

धर्मव्याध द्वारा ब्राह्मण को माता-पिता के दर्शन

मोक्षधर्म के व्याध द्वारा किए गए वर्णन से प्रसन्न होकर ब्राह्मण कहता है कि धर्म के विषय में उससे कुछ भी अज्ञात नहीं है। तब धर्मव्याध उसे अपने घर के भीतर ले जाता है ताकि वह उस धर्म को अपनी आँखों से देख सके जिससे व्याध ने सिद्धि पाई, और वहाँ उसे अपने वृद्ध माता-पिता के दर्शन कराता है, जो अपने पुत्र को आशीर्वाद देते हैं और उसकी सेवा की प्रशंसा करते हैं। शिष्टाचार के आदान-प्रदान के बाद व्याध बताता है कि उसके पिता और माता ही उसके परम देवता, उसकी पवित्र अग्नियाँ और उसके वेद हैं, जिनकी वह पत्नी और पुत्र के साथ सेवा करता है, और उन्नति चाहने वाले पुरुष के पाँच गुरु गिनाता है।

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मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.217.1)

एवं संकथिते कृत्स्ने मोक्षधर्मे युधिष्ठिर । दृढप्रीतमना विप्रो धर्मव्याधमुवाच ह ॥

evaṃ saṃkathite kṛtsne mokṣadharme yudhiṣṭhira | dṛḍhaprītamanā vipro dharmavyādhamuvāca ha

हे युधिष्ठिर, इस प्रकार सम्पूर्ण मोक्षधर्म का वर्णन हो जाने पर अत्यन्त प्रसन्नचित्त ब्राह्मण ने धर्मव्याध से कहा—

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 2 (3.217.2)

न्याययुक्तमिदं सर्वं भवता परिकीर्तितम् । न तेऽस्त्यविदितं किंचिद्धर्मेष्वभिसमीक्ष्यते ॥

nyāyayuktamidaṃ sarvaṃ bhavatā parikīrtitam | na te'styaviditaṃ kiṃciddharmeṣvabhisamīkṣyate

आपने जो कुछ कहा है, वह सब युक्तिसंगत है। धर्म के विषय में आपके लिए कुछ भी अज्ञात नहीं दिखाई देता।

व्याध उवाच

श्लोक 3 (3.217.3)

प्रत्यक्षं मम यो धर्मस्तं च पश्य द्विजोत्तम । येन सिद्धिरियं प्राप्ता मया ब्राह्मणपुङ्गव ॥

pratyakṣaṃ mama yo dharmastaṃ ca paśya dvijottama | yena siddhiriyaṃ prāptā mayā brāhmaṇapuṅgava

हे द्विजोत्तम, अब मेरे उस प्रत्यक्ष धर्म को भी देखिए, जिससे मैंने यह सिद्धि पाई है, हे ब्राह्मणश्रेष्ठ।

श्लोक 4 (3.217.4)

उत्तिष्ठ भगवन्क्षिप्रं प्रविश्याभ्यन्तरं गृहम् । द्रष्टुमर्हसि धर्मज्ञ मातरं पितरं च मे ॥

uttiṣṭha bhagavankṣipraṃ praviśyābhyantaraṃ gṛham | draṣṭumarhasi dharmajña mātaraṃ pitaraṃ ca me

हे भगवन्, शीघ्र उठिए और घर के भीतर चलिए; हे धर्मज्ञ, आपको मेरे माता-पिता के दर्शन करने चाहिए।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 5 (3.217.5)

इत्युक्तः स प्रविश्याथ ददर्श परमार्चितम् । सौधं हृद्यं चतुःशालमतीव च मनोरमम् ॥

ityuktaḥ sa praviśyātha dadarśa paramārcitam | saudhaṃ hṛdyaṃ catuḥśālamatīva ca manoramam

ऐसा कहे जाने पर ब्राह्मण ने भीतर जाकर एक सुन्दर, भली-भाँति सँवारा हुआ, चार शालाओं वाला अत्यन्त मनोहर भवन देखा।

श्लोक 6 (3.217.6)

देवतागृहसंकाशं दैवतैश्च सुपूजितम् । शयनासनसंबाधं गन्धैश्च परमैर्युतम् ॥

devatāgṛhasaṃkāśaṃ daivataiśca supūjitam | śayanāsanasaṃbādhaṃ gandhaiśca paramairyutam

वह देवमन्दिर के समान था, उसमें देवताओं की भली-भाँति पूजा होती थी, वह शय्याओं और आसनों से भरा था और उत्तम सुगन्धों से सुवासित था।

श्लोक 7 (3.217.7)

तत्र शुक्लाम्बरधरौ पितरावस्य पूजितौ । कृताहारौ तु संतुष्टावुपविष्टौ वरासने ॥

tatra śuklāmbaradharau pitarāvasya pūjitau | kṛtāhārau tu saṃtuṣṭāvupaviṣṭau varāsane

वहाँ व्याध के माता-पिता श्वेत वस्त्र धारण किए, सम्मानित होकर, भोजन के बाद सन्तुष्ट भाव से उत्तम आसनों पर बैठे थे।

श्लोक 8 (3.217.8)

तस्य व्याधस्य पितरौ ब्राह्मणः संददर्श ह । धर्मव्याधस्तु तौ दृष्ट्वा पादेषु शिरसाऽपतत् ॥

tasya vyādhasya pitarau brāhmaṇaḥ saṃdadarśa ha | dharmavyādhastu tau dṛṣṭvā pādeṣu śirasā'patat

ब्राह्मण ने उस व्याध के माता-पिता को देखा, और धर्मव्याध उन्हें देखते ही उनके चरणों में सिर रखकर गिर पड़ा।

वृद्धावूचतुः

श्लोक 9 (3.217.9)

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ धर्मज्ञ धर्मस्त्वामभिरक्षतु । प्रीतौ स्वस्तव शौचेन दीर्घमायुरवाप्नुहि । गतिमिष्टां तपो ज्ञानं मेधां च परमां गतः ॥

uttiṣṭhottiṣṭha dharmajña dharmastvāmabhirakṣatu | prītau svastava śaucena dīrghamāyuravāpnuhi | gatimiṣṭāṃ tapo jñānaṃ medhāṃ ca paramāṃ gataḥ

उठो, उठो, धर्मज्ञ! धर्म तुम्हारी रक्षा करे। हम तुम्हारी पवित्रता से प्रसन्न हैं; तुम दीर्घायु हो। तुमने अभीष्ट गति, तप, ज्ञान और परम मेधा प्राप्त कर ली है।

श्लोक 10 (3.217.10)

सत्पुत्रेण त्वया पुत्र नित्यं काले सुपूजितौ । सुखमेव वसावोऽत्र देवलोकगताविव ॥

satputreṇa tvayā putra nityaṃ kāle supūjitau | sukhameva vasāvo'tra devalokagatāviva

पुत्र, तुम सुपुत्र हो; तुमने सदा उचित समय पर हमारा भली-भाँति आदर-सत्कार किया है। हम यहाँ ऐसे सुख से रहते हैं मानो देवलोक में पहुँच गए हों।

श्लोक 11 (3.217.11)

न तेऽन्यद्दैवतं किंचिद्दैवतेष्वपि वर्तते । प्रयतसत्वाद्द्विजातीनां दमेनासि समन्वितः ॥

na te'nyaddaivataṃ kiṃciddaivateṣvapi vartate | prayatasatvāddvijātīnāṃ damenāsi samanvitaḥ

देवताओं में भी तुम्हारे लिए (हमसे बढ़कर) कोई दूसरा देवता नहीं है। द्विजों के समान शुद्ध अन्तःकरण के कारण तुम संयम से युक्त हो।

श्लोक 12 (3.217.12)

पितुः पितामहा ये च तथैव प्रपितामहाः । प्रीतास्ते सततं पुत्र दमेनावां च पूजया ॥

pituḥ pitāmahā ye ca tathaiva prapitāmahāḥ | prītāste satataṃ putra damenāvāṃ ca pūjayā

पुत्र, तुम्हारे पिता के पितामह और प्रपितामह भी तुम्हारे संयम और हमारी पूजा से सदा प्रसन्न रहते हैं।

श्लोक 13 (3.217.13)

मनसा कर्मणा वाचा शुश्रूषा नैव हीयते । न चान्या हि तथा बुद्धिर्दृश्यते सांप्रतं तव ॥

manasā karmaṇā vācā śuśrūṣā naiva hīyate | na cānyā hi tathā buddhirdṛśyate sāṃprataṃ tava

मन, कर्म और वाणी से तुम्हारी सेवा में कभी कमी नहीं आती, और इस समय तुममें कोई दूसरी बुद्धि दिखाई नहीं देती।

श्लोक 14 (3.217.14)

जामदग्न्येन रामेण यथा वृद्धौ सुपूजितौ । तथा त्वया कृतं सर्वं तद्विशिष्टं च पुत्रक ॥

jāmadagnyena rāmeṇa yathā vṛddhau supūjitau | tathā tvayā kṛtaṃ sarvaṃ tadviśiṣṭaṃ ca putraka

जैसे जमदग्निपुत्र परशुराम ने अपने वृद्ध माता-पिता का सम्मान किया था, वैसे ही बेटा, तुमने भी सब किया है, बल्कि उससे भी बढ़कर।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 15 (3.217.15)

ततस्तं ब्राह्मणं ताभ्यां धर्मव्याधो न्यवेदयत् । तौ स्वागतेन तं विप्रमर्चयामासतुस्तदा ॥

tatastaṃ brāhmaṇaṃ tābhyāṃ dharmavyādho nyavedayat | tau svāgatena taṃ vipramarcayāmāsatustadā

तब धर्मव्याध ने उन दोनों से उस ब्राह्मण का परिचय कराया, और उन्होंने स्वागत करके उस विप्र का सत्कार किया।

श्लोक 16 (3.217.16)

प्रतिगृह्य च तां पूजां द्विजः पप्रच्छ तावुभौ । सपुत्राभ्यां सभृत्याभ्यां कच्चिद्वां कुशलं गृहे । अनामयं च वां कच्चित्सुखं वेह शरीरयोः ॥

pratigṛhya ca tāṃ pūjāṃ dvijaḥ papraccha tāvubhau | saputrābhyāṃ sabhṛtyābhyāṃ kaccidvāṃ kuśalaṃ gṛhe | anāmayaṃ ca vāṃ kaccitsukhaṃ veha śarīrayoḥ

उनकी पूजा स्वीकार करके ब्राह्मण ने उन दोनों से पूछा, 'क्या पुत्र और सेवकों सहित आपके घर में सब कुशल है? और क्या आप दोनों यहाँ शरीर से नीरोग और सुखी हैं?'

वृद्धावूचतुः

श्लोक 17 (3.217.17)

कुशलं नौ गृहे विप्र भृत्यवर्गे च सर्वशः । कच्चित्त्वमप्यविघ्नेन संप्राप्तो भगवन्निति ॥

kuśalaṃ nau gṛhe vipra bhṛtyavarge ca sarvaśaḥ | kaccittvamapyavighnena saṃprāpto bhagavanniti

हे विप्र, हमारे घर में और सेवकों में सब प्रकार कुशल है। हे भगवन्, क्या आप भी यहाँ बिना किसी विघ्न के पहुँचे हैं?

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 18 (3.217.18)

बाढमित्येव तौ विप्रः प्रत्युवाच मुदान्वितः । धर्मव्याधस्तु तं विप्रमर्थवद्वाक्यमब्रवीत् ॥

bāḍhamityeva tau vipraḥ pratyuvāca mudānvitaḥ | dharmavyādhastu taṃ vipramarthavadvākyamabravīt

'अवश्य,' ब्राह्मण ने प्रसन्न होकर उन दोनों को उत्तर दिया। तब धर्मव्याध ने उस विप्र से सार्थक वचन कहे—

व्याध उवाच

श्लोक 19 (3.217.19)

पिता माता च भगवन्नेतौ मे दैवतं परम् । यद्दैवतेभ्यः कर्तव्यं तदेताभ्यां करोम्यहम् ॥

pitā mātā ca bhagavannetau me daivataṃ param | yaddaivatebhyaḥ kartavyaṃ tadetābhyāṃ karomyaham

हे भगवन्, ये मेरे पिता और माता ही मेरे परम देवता हैं। देवताओं के लिए जो कुछ करना चाहिए, वह मैं इन्हीं के लिए करता हूँ।

श्लोक 20 (3.217.20)

त्रयस्त्रिंशद्यथा देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः । संपूज्याः सर्वलोकस्य तथा वृद्धाविमौ मम ॥

trayastriṃśadyathā devāḥ sarve śakrapurogamāḥ | saṃpūjyāḥ sarvalokasya tathā vṛddhāvimau mama

जैसे इन्द्र आदि सभी तैंतीस देवता सारे संसार के पूज्य हैं, वैसे ही ये दोनों वृद्ध मेरे लिए पूज्य हैं।

श्लोक 21 (3.217.21)

उपाहारानाहरन्तो देवतानां यथा द्विजाः । कुर्वन्ति तद्वदेताभ्यां करोम्यहमतन्द्रितः ॥

upāhārānāharanto devatānāṃ yathā dvijāḥ | kurvanti tadvadetābhyāṃ karomyahamatandritaḥ

जैसे द्विज देवताओं के लिए उपहार लाकर उनकी सेवा करते हैं, वैसे ही मैं बिना आलस्य के इन दोनों की सेवा करता हूँ।

श्लोक 22 (3.217.22)

एतौ मे परमं ब्रह्मन्पिता माता च दैवतम् । एतौ पुष्पैः फलैरन्नैस्तोषयामि सदा द्विज ॥

etau me paramaṃ brahmanpitā mātā ca daivatam | etau puṣpaiḥ phalairannaistoṣayāmi sadā dvija

हे ब्रह्मन्, मेरे पिता और माता ही मेरे परम देवता हैं; हे द्विज, मैं सदा पुष्पों, फलों और अन्न से इन्हें सन्तुष्ट रखता हूँ।

श्लोक 23 (3.217.23)

एतावेवाग्नयो मह्यं यान्वदन्ति मनीषिणः । यज्ञा वेदाश्च चत्वारः सर्वमेतौ मम द्विज ॥

etāvevāgnayo mahyaṃ yānvadanti manīṣiṇaḥ | yajñā vedāśca catvāraḥ sarvametau mama dvija

मनीषी जिन अग्नियों की बात करते हैं, वे मेरे लिए ये दोनों ही हैं; यज्ञ और चारों वेद भी यही हैं। हे द्विज, ये दोनों ही मेरे सब कुछ हैं।

श्लोक 24 (3.217.24)

एतदर्थं मम प्राणा भार्या पुत्रः सुहृज्जनः । सपुत्रदारः शुश्रूषां नित्यमेव करोम्यहम् ॥

etadarthaṃ mama prāṇā bhāryā putraḥ suhṛjjanaḥ | saputradāraḥ śuśrūṣāṃ nityameva karomyaham

मेरे प्राण, मेरी पत्नी, मेरा पुत्र और मेरे मित्र — सब इन्हीं के लिए हैं। पत्नी और पुत्र के साथ मैं सदा इनकी सेवा करता हूँ।

श्लोक 25 (3.217.25)

स्वयं च स्नापयाम्येतौ तथा पादौ प्रधावये । आहारं च प्रयच्छामि स्वयंच द्विजसत्तम ॥

svayaṃ ca snāpayāmyetau tathā pādau pradhāvaye | āhāraṃ ca prayacchāmi svayaṃca dvijasattama

हे द्विजश्रेष्ठ, मैं स्वयं इन्हें स्नान कराता हूँ और इनके पैर धोता हूँ, और अपने हाथों से इन्हें भोजन देता हूँ।

श्लोक 26 (3.217.26)

अनुकूलाः कथा वच्मि विप्रियं परिवर्जये । अधर्मेणापि संयुक्तं प्रियमाभ्यां करोम्यहम् ॥

anukūlāḥ kathā vacmi vipriyaṃ parivarjaye | adharmeṇāpi saṃyuktaṃ priyamābhyāṃ karomyaham

मैं इनसे अनुकूल बातें ही कहता हूँ और अप्रिय बात से बचता हूँ। अधर्म से जुड़ा हुआ भी यदि इन्हें प्रिय हो, तो मैं वह इनके लिए करता हूँ।

श्लोक 27 (3.217.27)

धर्ममेव गुरुं मत्वा साक्षादेतौ द्विजोत्तम । अतन्द्रितः सदा विप्र शुश्रूषां वै करोम्यहम् ॥

dharmameva guruṃ matvā sākṣādetau dvijottama | atandritaḥ sadā vipra śuśrūṣāṃ vai karomyaham

हे द्विजोत्तम, इन दोनों को साक्षात् धर्म और गुरु मानकर, हे विप्र, मैं बिना थके सदा इनकी सेवा करता हूँ।

श्लोक 28 (3.217.28)

पञ्चैव गुरवो ब्रह्मन्पुरुषस्य बुभूषतः । पिता माताऽग्निरात्मा च गुरुश्च द्विजसत्तम ॥

pañcaiva guravo brahmanpuruṣasya bubhūṣataḥ | pitā mātā'gnirātmā ca guruśca dvijasattama

हे ब्रह्मन्, उन्नति चाहने वाले पुरुष के पाँच ही गुरु हैं — पिता, माता, अग्नि, आत्मा और आचार्य, हे द्विजश्रेष्ठ।

श्लोक 29 (3.217.29)

एतेषु यस्तु वर्तेत सम्यगेव द्विजोत्तम । भवेयुरग्नयस्तेन परिचीर्णास्तु नित्यशः । गार्हस्थ्ये वर्तमानस्य एष धर्मः सनातनः ॥

eteṣu yastu varteta samyageva dvijottama | bhaveyuragnayastena paricīrṇāstu nityaśaḥ | gārhasthye vartamānasya eṣa dharmaḥ sanātanaḥ

हे द्विजोत्तम, जो इनके प्रति भली-भाँति आचरण करता है, उसके द्वारा मानो सदा अग्नियों की उपासना हो जाती है। गृहस्थ आश्रम में रहने वाले का यही सनातन धर्म है।

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