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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 218

व्याध का कौशिक को घर लौटने का उपदेश और अपने पूर्वजन्म की कथा

अपने माता-पिता का ब्राह्मण कौशिक से परिचय कराने के बाद धर्मात्मा व्याध बताता है कि पतिव्रता ने यह भेंट पहले ही देख ली थी, और कौशिक से कहता है कि वेदाध्ययन के लिए माता-पिता की अनुमति लिए बिना घर छोड़कर उसने उनके साथ अन्याय किया है; वे शोक से अंधे हो गए हैं, इसलिए उसे तुरंत लौटकर उनकी सेवा करनी चाहिए। कौशिक कृतज्ञ होकर ऐसा करने का वचन देता है और पूछता है कि धर्म का ऐसा ज्ञाता शूद्र-योनि में कैसे जन्मा। व्याध बताता है कि पूर्वजन्म में वह एक विद्वान ब्राह्मण था, जिसने अपने मित्र राजा के साथ शिकार करते हुए भूल से एक ऋषि को बाण मार दिया और उनके शाप से व्याध बनकर जन्मा।

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मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.218.1)

गुरू निवेद्य विप्राय तौ मातापितरावुभौ । पुनरेव स धर्मात्मा व्याधो ब्राह्मणमब्रवीत् ॥

gurū nivedya viprāya tau mātāpitarāvubhau | punareva sa dharmātmā vyādho brāhmaṇamabravīt

धर्मात्मा व्याध ने अपने दोनों गुरुजनों — माता और पिता — का ब्राह्मण से परिचय कराया और फिर ब्राह्मण से कहा।

व्याध उवाच

श्लोक 2 (3.218.2)

प्रवृत्तचक्षुर्जातोस्मि संपश्य तपसो बलम् । यदर्थमुक्तोसि तया गच्छ त्वं मिथिलामिति ॥

pravṛttacakṣurjātosmi saṃpaśya tapaso balam | yadarthamuktosi tayā gaccha tvaṃ mithilāmiti

"तपस्या का बल देखिए — मुझे दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई है। इसीलिए उसने आपसे कहा था, 'मिथिला जाओ' —

श्लोक 3 (3.218.3)

पतिशुश्रूषपरया दान्तया सत्यशीलया । मिथिलायां वसन्व्याधः स ते धर्मान्प्रवक्ष्यति ॥

patiśuśrūṣaparayā dāntayā satyaśīlayā | mithilāyāṃ vasanvyādhaḥ sa te dharmānpravakṣyati

पति-सेवा में तत्पर, संयमी और सत्यशील उस स्त्री ने कहा था — 'मिथिला में रहने वाला एक व्याध तुम्हें धर्म का उपदेश देगा।'"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 4 (3.218.4)

पतिव्रतायाः सत्यायाः शीलाढ्याया यतव्रत । संस्मृत्य वाक्यं धर्मज्ञ गुणवानसि मे मतः ॥

pativratāyāḥ satyāyāḥ śīlāḍhyāyā yatavrata | saṃsmṛtya vākyaṃ dharmajña guṇavānasi me mataḥ

"हे व्रतधारी, हे धर्मज्ञ, उस सत्यनिष्ठ, शीलवती पतिव्रता के वचन का स्मरण करके मैं आपको सचमुच गुणवान मानता हूँ।"

व्याध उवाच

श्लोक 5 (3.218.5)

यत्तया त्वं द्विजश्रेष्ठ नियुक्तो मां प्रति प्रभो । दृष्टमेव तया सम्यगेकपत्न्या न संशयः ॥

yattayā tvaṃ dvijaśreṣṭha niyukto māṃ prati prabho | dṛṣṭameva tayā samyagekapatnyā na saṃśayaḥ

"हे द्विजश्रेष्ठ, हे प्रभु, उस एकपतिव्रता ने आपको मेरे पास भेजकर निःसंदेह ठीक ही देखा था।

श्लोक 6 (3.218.6)

त्वदनुग्रहबुद्ध्या तु विप्रैतद्दर्शितं मया । वाक्यं च शृणु मे तात यत्ते वक्ष्ये हितं द्विज ॥

tvadanugrahabuddhyā tu vipraitaddarśitaṃ mayā | vākyaṃ ca śṛṇu me tāta yatte vakṣye hitaṃ dvija

हे विप्र, आप पर अनुग्रह करने के विचार से ही मैंने आपको यह दिखाया है। हे तात, अब मेरी बात सुनिए; हे द्विज, मैं आपके हित की बात कहूँगा।

श्लोक 7 (3.218.7)

त्वया न पूजिता माता पिता च द्विजसत्तम । अनिसृष्टोसि निष्क्रान्तो गृहात्ताभ्यामनिन्दित ॥

tvayā na pūjitā mātā pitā ca dvijasattama | anisṛṣṭosi niṣkrānto gṛhāttābhyāmanindita

हे द्विजश्रेष्ठ, आपने अपनी माता और पिता का आदर नहीं किया। हे निर्दोष, आप उनकी अनुमति लिए बिना ही घर से निकल पड़े।

श्लोक 8 (3.218.8)

वेदोच्चारणकार्यार्थमयुक्तं तत्त्वया कृतम् । तव शोकेन वृद्धौ तावन्धीभूतौ तपस्विनौ ॥

vedoccāraṇakāryārthamayuktaṃ tattvayā kṛtam | tava śokena vṛddhau tāvandhībhūtau tapasvinau

वेदपाठ के लिए आपने ऐसा किया, पर यह उचित नहीं था। आपके शोक में वे दोनों वृद्ध तपस्वी अंधे हो गए हैं।

श्लोक 9 (3.218.9)

तौ प्रसादयितुं गच्छ मा त्वां धर्मोऽत्यगादयम् । तपस्वी त्वं महात्मा च धर्मे च निरतः सदा ॥

tau prasādayituṃ gaccha mā tvāṃ dharmo'tyagādayam | tapasvī tvaṃ mahātmā ca dharme ca nirataḥ sadā

जाकर उन्हें प्रसन्न कीजिए, जिससे यह धर्म आपसे छूट न जाए। आप तपस्वी हैं, महात्मा हैं और सदा धर्म में लगे रहते हैं —

श्लोक 10 (3.218.10)

सर्वमेतदपार्थं ते क्षिप्रं तौ संप्रसादय । तौ प्रसाद्य द्विजश्रेष्ठ यच्छ्रेयस्तदवाप्स्यसि ॥

sarvametadapārthaṃ te kṣipraṃ tau saṃprasādaya | tau prasādya dvijaśreṣṭha yacchreyastadavāpsyasi

फिर भी यह सब आपके लिए व्यर्थ है। शीघ्र ही उन्हें प्रसन्न कीजिए। हे द्विजश्रेष्ठ, उन्हें प्रसन्न कर लेने पर आप वह सब पा लेंगे जो आपके लिए कल्याणकारी है।

श्लोक 11 (3.218.11)

श्रद्दधस्व मम ब्रह्मन्नान्यथा कर्तुमर्हसि । गम्यतामद्यविप्रर्षे श्रेयस्ते कथयाम्यहम् ॥

śraddadhasva mama brahmannānyathā kartumarhasi | gamyatāmadyaviprarṣe śreyaste kathayāmyaham

हे ब्रह्मन्, मेरी बात पर विश्वास कीजिए; आपको इसके विपरीत नहीं करना चाहिए। हे विप्रर्षि, आज ही चले जाइए; मैं आपसे आपके कल्याण की बात कह रहा हूँ।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 12 (3.218.12)

यदेतदुक्तं भवता सर्वं सत्यमसंशयम् । प्रीतोस्मि तव भद्रं ते धर्माचारगुणान्वित ॥

yadetaduktaṃ bhavatā sarvaṃ satyamasaṃśayam | prītosmi tava bhadraṃ te dharmācāraguṇānvita

"आपने जो कुछ कहा है, वह सब निःसंदेह सत्य है। मैं आपसे प्रसन्न हूँ; आपका कल्याण हो, हे धर्माचरण और गुणों से युक्त पुरुष।"

व्याध उवाच

श्लोक 13 (3.218.13)

दैवतप्रतिमो हि त्वं यस्त्वं धर्ममनुव्रतः । पुराणं शाश्वतं दिव्यं दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥

daivatapratimo hi tvaṃ yastvaṃ dharmamanuvrataḥ | purāṇaṃ śāśvataṃ divyaṃ duṣprāpamakṛtātmabhiḥ

"आप देवता के समान हैं, क्योंकि आप उस धर्म का पालन करते हैं जो पुरातन, शाश्वत और दिव्य है और जिसे असंयमी लोग कठिनाई से भी नहीं पा सकते।

श्लोक 14 (3.218.14)

मातापित्रोः सकाशं हि गत्वा त्वं द्विजसत्तम । अतन्द्रितः कुरु क्षिप्रं मातापित्रोर्हि पूजनम् । अतः परमहं धर्मं नान्यं पश्यामि कंचन ॥

mātāpitroḥ sakāśaṃ hi gatvā tvaṃ dvijasattama | atandritaḥ kuru kṣipraṃ mātāpitrorhi pūjanam | ataḥ paramahaṃ dharmaṃ nānyaṃ paśyāmi kaṃcana

हे द्विजश्रेष्ठ, अपने माता-पिता के पास जाइए और बिना आलस्य के शीघ्र ही उनकी पूजा-सेवा कीजिए। इससे बढ़कर मैं कोई दूसरा धर्म नहीं देखता।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 15 (3.218.15)

इहाहमागतो दिष्ट्या दिष्ट्या मे संगतं त्वया । ईदृशा दुर्लभा लोके नरा धर्मप्रदर्शकाः ॥

ihāhamāgato diṣṭyā diṣṭyā me saṃgataṃ tvayā | īdṛśā durlabhā loke narā dharmapradarśakāḥ

"मेरा सौभाग्य है कि मैं यहाँ आया, सौभाग्य है कि आपसे मेरी भेंट हुई। धर्म का मार्ग दिखाने वाले ऐसे मनुष्य संसार में दुर्लभ हैं।

श्लोक 16 (3.218.16)

एको नरसहस्रेषु धर्मवान्विद्यते न वा । प्रीतोस्मि तव सत्येन भद्रं ते पुरुषर्षभ ॥

eko narasahasreṣu dharmavānvidyate na vā | prītosmi tava satyena bhadraṃ te puruṣarṣabha

हज़ारों मनुष्यों में कोई एक धर्मात्मा होता है, या वह भी नहीं होता। हे पुरुषश्रेष्ठ, मैं आपकी सत्यनिष्ठा से प्रसन्न हूँ; आपका कल्याण हो।

श्लोक 17 (3.218.17)

पतमानोऽद्यनरके भवताऽस्मि समुद्धृतः । भवितव्यमथैवं च यद्दृष्टोसि मयाऽनघ ॥

patamāno'dyanarake bhavatā'smi samuddhṛtaḥ | bhavitavyamathaivaṃ ca yaddṛṣṭosi mayā'nagha

मैं नरक में गिर रहा था, आज आपने मेरा उद्धार कर दिया। हे निष्पाप, ऐसा ही होना था, तभी तो मुझे आपके दर्शन हुए।

श्लोक 18 (3.218.18)

राजा ययातिर्दौहित्रैः पतितस्तारितो यथा । सद्भिः पुरुषशार्दूल तथाऽहं भवता त्विह ॥

rājā yayātirdauhitraiḥ patitastārito yathā | sadbhiḥ puruṣaśārdūla tathā'haṃ bhavatā tviha

हे पुरुषसिंह, जैसे स्वर्ग से गिरे हुए राजा ययाति को उनके सज्जन दौहित्रों ने तार दिया था, वैसे ही यहाँ आपने मुझे तार दिया है।

श्लोक 19 (3.218.19)

मातापितृभ्यां शुश्रूषां करिष्ये वचनात्तव । नाकृतात्मा वेदयति धर्माधर्मविनिश्चयम् ॥

mātāpitṛbhyāṃ śuśrūṣāṃ kariṣye vacanāttava | nākṛtātmā vedayati dharmādharmaviniścayam

आपके कहने से मैं अपने माता-पिता की सेवा करूँगा। जिसका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है, वह धर्म और अधर्म का निर्णय नहीं कर सकता।

श्लोक 20 (3.218.20)

दुर्ज्ञेयः शाश्वतो धर्मः शूद्रयोनौ हि वर्तता । न त्वां शूद्रमहं मन्ये भवितव्यं हि कारणम् ॥

durjñeyaḥ śāśvato dharmaḥ śūdrayonau hi vartatā | na tvāṃ śūdramahaṃ manye bhavitavyaṃ hi kāraṇam

शाश्वत धर्म को जानना कठिन है, फिर भी वह शूद्र-योनि में रहने वाले आपमें विद्यमान है। मैं आपको शूद्र नहीं मानता; इसका अवश्य कोई कारण होगा।

श्लोक 21 (3.218.21)

येन कर्मविशेषेण प्राप्तेयं शूद्रता त्वया । एतामिच्छामि विज्ञातुं तत्त्वेन तव शूद्रताम् । कामयानस्य मे शंस सर्वं त्वं प्रयतात्मवान् ॥

yena karmaviśeṣeṇa prāpteyaṃ śūdratā tvayā | etāmicchāmi vijñātuṃ tattvena tava śūdratām | kāmayānasya me śaṃsa sarvaṃ tvaṃ prayatātmavān

किस विशेष कर्म के कारण आपको यह शूद्रत्व प्राप्त हुआ? मैं ठीक-ठीक जानना चाहता हूँ कि आप शूद्र कैसे बने। हे संयमी, मैं उत्सुक हूँ; मुझे सब कुछ बताइए।"

व्याध उवाच

श्लोक 22 (3.218.22)

अनतिक्रमणीया वै ब्राह्मणा मे द्विजोत्तम । शृणु सर्वमिदं वृत्तं पूर्वदेहे ममानघ ॥

anatikramaṇīyā vai brāhmaṇā me dvijottama | śṛṇu sarvamidaṃ vṛttaṃ pūrvadehe mamānagha

"हे द्विजोत्तम, ब्राह्मणों की बात मैं टाल नहीं सकता। हे निष्पाप, पूर्व शरीर में मेरे साथ जो कुछ हुआ, वह सब सुनिए।

श्लोक 23 (3.218.23)

अहं हि ब्राह्मणः पूर्वमासं द्विजवरात्मजः । वेदाध्यायी सुकुशलो वेदाङ्गानां च पारगः । आत्मदोषकृतैर्ब्रह्मन्नवस्थामाप्तवानिमाम् ॥

ahaṃ hi brāhmaṇaḥ pūrvamāsaṃ dvijavarātmajaḥ | vedādhyāyī sukuśalo vedāṅgānāṃ ca pāragaḥ | ātmadoṣakṛtairbrahmannavasthāmāptavānimām

पहले मैं एक श्रेष्ठ ब्राह्मण का पुत्र, स्वयं ब्राह्मण था — वेदपाठ में कुशल और वेदाङ्गों में पारंगत। हे ब्रह्मन्, अपने ही दोषों के कारण मैं इस दशा को पहुँचा हूँ।

श्लोक 24 (3.218.24)

कश्चिद्राजा मम सखा धनुर्वेदपरायणः । संसर्गाद्धनुषि श्रेष्ठस्ततोऽहमभवं द्विज ॥

kaścidrājā mama sakhā dhanurvedaparāyaṇaḥ | saṃsargāddhanuṣi śreṣṭhastato'hamabhavaṃ dvija

धनुर्वेद में रमा हुआ एक राजा मेरा मित्र था। हे द्विज, उसकी संगति से मैं भी धनुष चलाने में श्रेष्ठ हो गया।

श्लोक 25 (3.218.25)

एतस्मिन्नेव काले तु मृगयां निर्गतो नृपः । सहितो योधमुख्यैश्च मन्त्रिभिश्च सुसंवृतः । ततोऽभ्यहन्मृगांस्तत्र सुबहूनाश्रमं प्रति ॥

etasminneva kāle tu mṛgayāṃ nirgato nṛpaḥ | sahito yodhamukhyaiśca mantribhiśca susaṃvṛtaḥ | tato'bhyahanmṛgāṃstatra subahūnāśramaṃ prati

उन्हीं दिनों वह राजा अपने प्रमुख योद्धाओं के साथ और मन्त्रियों से घिरा हुआ शिकार खेलने निकला। वहाँ एक आश्रम के पास उसने बहुत-से मृग मारे।

श्लोक 26 (3.218.26)

अथ क्षिप्तः शरो घोरो मयापि द्विजसत्तम । ताडितश्च ऋषिस्तेन शरेणानतपर्वणा ॥

atha kṣiptaḥ śaro ghoro mayāpi dvijasattama | tāḍitaśca ṛṣistena śareṇānataparvaṇā

हे द्विजश्रेष्ठ, तब मैंने भी एक भयंकर बाण छोड़ा, और झुकी गाँठों वाले उस बाण से एक ऋषि घायल हो गए।

श्लोक 27 (3.218.27)

भूमौ निपतितो ब्रह्मन्नुवाच प्रतिनादयन् । नापराध्याम्यहं किंचित्केन पापमिदं कृतम् ॥

bhūmau nipatito brahmannuvāca pratinādayan | nāparādhyāmyahaṃ kiṃcitkena pāpamidaṃ kṛtam

हे ब्रह्मन्, भूमि पर गिरकर वे ऊँचे स्वर में, जिससे चारों ओर गूँज उठी, बोले — 'मैंने तो कोई अपराध नहीं किया; यह पाप किसने किया है?'

श्लोक 28 (3.218.28)

मन्वानस्तं मृगं चाहं संप्राप्तः सहसा मुनिम् । अपश्यं तमृषिं विद्धं शरेणानतपर्वणा । तमुग्रतपसं विप्रं निष्टनन्तं महीतले ॥

manvānastaṃ mṛgaṃ cāhaṃ saṃprāptaḥ sahasā munim | apaśyaṃ tamṛṣiṃ viddhaṃ śareṇānataparvaṇā | tamugratapasaṃ vipraṃ niṣṭanantaṃ mahītale

उन्हें मृग समझकर मैं झटपट मुनि के पास पहुँचा, और मैंने देखा कि झुकी गाँठों वाले बाण से बिंधे वे उग्र तपस्वी ब्राह्मण-ऋषि भूमि पर पड़े कराह रहे हैं।

श्लोक 29 (3.218.29)

अकार्यकरणाच्चापि भृशं मे व्यथितं मनः । अजानता कृतमिदं मयेत्यहमथाब्रुवम् ॥

akāryakaraṇāccāpi bhṛśaṃ me vyathitaṃ manaḥ | ajānatā kṛtamidaṃ mayetyahamathābruvam

यह अनुचित कर्म कर बैठने से मेरा मन बहुत व्यथित हुआ, और मैंने कहा — 'यह मुझसे अनजाने में हो गया है।

श्लोक 30 (3.218.30)

क्षन्तुमर्हसि मे सर्वमिति चोक्तो मया मुनिः ॥

kṣantumarhasi me sarvamiti cokto mayā muniḥ

आप मेरा सब अपराध क्षमा करें' — ऐसा मैंने मुनि से कहा।

श्लोक 31 (3.218.31)

ततः प्रत्यब्रवीद्वाक्यमृषिर्मां क्रोधमूर्च्छितः । व्याधस्त्वं भविता क्रूर शूद्रयोनाविति द्विज ॥

tataḥ pratyabravīdvākyamṛṣirmāṃ krodhamūrcchitaḥ | vyādhastvaṃ bhavitā krūra śūdrayonāviti dvija

हे द्विज, तब क्रोध से मूर्च्छित-से उन ऋषि ने मुझसे कहा — 'हे क्रूर, तू शूद्र-योनि में व्याध होकर जन्म लेगा।'"

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