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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 219

शाप का अनुग्रह, शोक पर व्याध का उपदेश और कौशिक की घर-वापसी

व्याध बताता है कि उसने घायल ऋषि से क्षमा माँगी; शाप टल नहीं सकता था, पर ऋषि ने अनुग्रह किया कि वह माता-पिता की सेवा करने वाला धर्मात्मा व्याध बनेगा, उसे पूर्वजन्म की स्मृति रहेगी और शाप क्षीण होने पर वह फिर ब्राह्मण होकर स्वर्ग जाएगा। कौशिक उसे सांत्वना देते हुए कहता है कि ब्राह्मण जन्म से नहीं, आचरण से होता है, और व्याध उत्तर में बताता है कि ज्ञान, संतोष और उद्यम से शोक को कैसे जीता जाए। कौशिक विदा लेकर घर लौटता है और अपने अंधे माता-पिता की सेवा करता है; मार्कण्डेय पतिव्रता और धर्मव्याध की कथा समाप्त करते हैं, और युधिष्ठिर कहते हैं कि ऐसे धर्म को सुनते हुए उनका मन नहीं भरता।

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व्याध उवाच

श्लोक 1 (3.219.1)

एवं शप्तोऽहमृषिणा तदा द्विजवरोत्तम । अहं प्रासादयमृषिं गिरा वाक्यविशारदम् ॥

evaṃ śapto'hamṛṣiṇā tadā dvijavarottama | ahaṃ prāsādayamṛṣiṃ girā vākyaviśāradam

"हे द्विजश्रेष्ठ, ऋषि से इस प्रकार शाप पाकर मैंने तब उन वाक्य-कुशल ऋषि को वाणी से प्रसन्न करने का प्रयत्न किया —

श्लोक 2 (3.219.2)

अजानता मयाऽकार्यमिदमद्य कृतं मुने । क्षन्तुमर्हसि तत्सर्वं प्रसीद भगवन्निति ॥

ajānatā mayā'kāryamidamadya kṛtaṃ mune | kṣantumarhasi tatsarvaṃ prasīda bhagavanniti

'हे मुनि, आज यह अनुचित कर्म मुझसे अनजाने में हो गया है। हे भगवन्, आप यह सब क्षमा करें, प्रसन्न हों।'"

ऋषिरुवाच

श्लोक 3 (3.219.3)

नान्यथा भविता शाप एवमेतदसंशयम् । आनृशंस्यादहं किंचित्कर्ताऽनुग्रहमद्य ते ॥

nānyathā bhavitā śāpa evametadasaṃśayam | ānṛśaṃsyādahaṃ kiṃcitkartā'nugrahamadya te

"यह शाप टल नहीं सकता; निःसंदेह ऐसा ही होगा। पर दया करके आज मैं तुम पर कुछ अनुग्रह करूँगा।

श्लोक 4 (3.219.4)

शूद्रयोन्यां वर्तमानो धर्मज्ञो हि भविष्यसि । मातापित्रोश्च शुश्रूषां करिष्यसि न संशयः ॥

śūdrayonyāṃ vartamāno dharmajño hi bhaviṣyasi | mātāpitrośca śuśrūṣāṃ kariṣyasi na saṃśayaḥ

शूद्र-योनि में रहते हुए भी तुम धर्म के ज्ञाता होगे, और निःसंदेह अपने माता-पिता की सेवा करोगे।

श्लोक 5 (3.219.5)

तयोः शुश्रूषया सिद्धिं महतीं समवाप्स्यसि । जातिस्मरश्च भविता स्वर्गं चैव गमिष्यसि ॥

tayoḥ śuśrūṣayā siddhiṃ mahatīṃ samavāpsyasi | jātismaraśca bhavitā svargaṃ caiva gamiṣyasi

उनकी सेवा से तुम्हें महान सिद्धि प्राप्त होगी; तुम्हें अपने पूर्वजन्म का स्मरण रहेगा और तुम स्वर्ग भी जाओगे।

श्लोक 6 (3.219.6)

भूत्वा च धार्मिको व्याधः पित्रोः शुश्रूषणे रतः । शापक्षये तु निर्वृत्ते भविताऽसि पुनर्द्विजः ॥

bhūtvā ca dhārmiko vyādhaḥ pitroḥ śuśrūṣaṇe rataḥ | śāpakṣaye tu nirvṛtte bhavitā'si punardvijaḥ

माता-पिता की सेवा में लगे धर्मात्मा व्याध बनकर रहने के बाद, शाप का अंत होने पर तुम फिर से ब्राह्मण हो जाओगे।"

व्याध उवाच

श्लोक 7 (3.219.7)

एवं शप्तः पुरा तेन ऋषिणाऽस्म्युग्रतेजसा । प्रसादश्च कृतस्तेन ममैव द्विपदांवर ॥

evaṃ śaptaḥ purā tena ṛṣiṇā'smyugratejasā | prasādaśca kṛtastena mamaiva dvipadāṃvara

"हे नरश्रेष्ठ, इस प्रकार पूर्वकाल में उन उग्र तेजस्वी ऋषि ने मुझे शाप दिया था, और इसी प्रकार उन्होंने मुझ पर अनुग्रह भी किया।

श्लोक 8 (3.219.8)

शरं चोद्धृतवानस्मि तस्य वै द्विजसत्तम । आश्रमं च मया नीतो न च प्राणैर्व्ययुज्यत ॥

śaraṃ coddhṛtavānasmi tasya vai dvijasattama | āśramaṃ ca mayā nīto na ca prāṇairvyayujyata

हे द्विजश्रेष्ठ, मैंने उनके शरीर से बाण निकाला और उन्हें आश्रम ले गया; उनके प्राण नहीं गए।

श्लोक 9 (3.219.9)

एतत्ते सर्वमाख्यातं यथा मम पुराऽभवत् । अभितश्चापि गन्तव्यो मया स्वर्गो द्विजोत्तम ॥

etatte sarvamākhyātaṃ yathā mama purā'bhavat | abhitaścāpi gantavyo mayā svargo dvijottama

पूर्वकाल में मेरे साथ जो कुछ हुआ, वह सब मैंने आपको बता दिया। हे द्विजोत्तम, शीघ्र ही मुझे स्वर्ग जाना है।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 10 (3.219.10)

एवमेतानि पुरुषा दुःखानि च सुखानि च । आप्नुवन्ति महाबुद्धे नोत्कण्ठां कर्तुमर्हसि ॥

evametāni puruṣā duḥkhāni ca sukhāni ca | āpnuvanti mahābuddhe notkaṇṭhāṃ kartumarhasi

"हे महाबुद्धिमान, इसी प्रकार मनुष्य दुःख और सुख पाते हैं। आपको खेद नहीं करना चाहिए।

श्लोक 11 (3.219.11)

दुष्करं हि कृतं कर्म जानता जातिमात्मनः । लोकवृत्तान्ततत्त्वज्ञ नित्यं धर्मपरायण ॥

duṣkaraṃ hi kṛtaṃ karma jānatā jātimātmanaḥ | lokavṛttāntatattvajña nityaṃ dharmaparāyaṇa

हे लोक-व्यवहार के तत्त्व को जानने वाले, सदा धर्मपरायण, अपने पूर्वजन्म को जानते हुए भी आपने यह कठिन कर्म निभाया है।

श्लोक 12 (3.219.12)

कर्मदोषाच्च वै विद्वन्नात्मजातिकृतेन वै । कंचित्कालं मृष्यतां वै ततोसि भविता द्विजः ॥

karmadoṣācca vai vidvannātmajātikṛtena vai | kaṃcitkālaṃ mṛṣyatāṃ vai tatosi bhavitā dvijaḥ

हे विद्वन्, यह एक कर्म के दोष से हुआ है, आपकी जाति के कारण नहीं। कुछ समय और सह लीजिए; उसके बाद आप ब्राह्मण हो जाएँगे।

श्लोक 13 (3.219.13)

सांप्रतं च मतो मेऽसि ब्राह्मणो नात्र संशयः ॥

sāṃprataṃ ca mato me'si brāhmaṇo nātra saṃśayaḥ

और अभी भी मैं आपको ब्राह्मण ही मानता हूँ; इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 14 (3.219.14)

ब्राह्मणः पतनीयेषु वर्तमानो विकर्मसु । दाम्भिको दुष्कृतप्रायः शूद्रेण सदृशो भवेत् ॥

brāhmaṇaḥ patanīyeṣu vartamāno vikarmasu | dāmbhiko duṣkṛtaprāyaḥ śūdreṇa sadṛśo bhavet

जो ब्राह्मण पतन कराने वाले निषिद्ध कर्मों में लगा रहता है, जो दम्भी और प्रायः दुष्कर्मी है, वह शूद्र के समान हो जाता है।

श्लोक 15 (3.219.15)

यस्तु शूद्रो दमे सत्ये धर्मे च सततोत्थितः । तं ब्राह्मणमहं मन्ये वृत्तेन हि भवेद्द्विजः ॥

yastu śūdro dame satye dharme ca satatotthitaḥ | taṃ brāhmaṇamahaṃ manye vṛttena hi bhaveddvijaḥ

पर जो शूद्र सदा इन्द्रिय-संयम, सत्य और धर्म में तत्पर रहता है, उसे मैं ब्राह्मण मानता हूँ; क्योंकि आचरण से ही मनुष्य द्विज होता है।

श्लोक 16 (3.219.16)

कर्मदोषेण विषमां गतिमाप्तोसि दारुणाम् । क्षीणदोषमहं मन्ये चाभितस्त्वां नरोत्तम ॥

karmadoṣeṇa viṣamāṃ gatimāptosi dāruṇām | kṣīṇadoṣamahaṃ manye cābhitastvāṃ narottama

एक कर्म के दोष से आप इस विषम और कठोर गति को प्राप्त हुए हैं। पर हे नरश्रेष्ठ, मैं मानता हूँ कि आपका दोष शीघ्र ही क्षीण हो जाएगा।

श्लोक 17 (3.219.17)

कर्तुमर्हसि नोत्कण्ठां त्वद्विधा ह्यविषादिनः । लोकवृत्तान्ततत्वज्ञा नित्यं धर्मपरायणाः ॥

kartumarhasi notkaṇṭhāṃ tvadvidhā hyaviṣādinaḥ | lokavṛttāntatatvajñā nityaṃ dharmaparāyaṇāḥ

आपको खेद नहीं करना चाहिए। आप जैसे लोग विषाद नहीं करते; वे लोक-व्यवहार के तत्त्व को जानते हैं और सदा धर्म में लगे रहते हैं।"

व्याध उवाच

श्लोक 18 (3.219.18)

प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः । एतद्विज्ञानसामर्थ्यं न बालैः समतामियात् ॥

prajñayā mānasaṃ duḥkhaṃ hanyācchārīramauṣadhaiḥ | etadvijñānasāmarthyaṃ na bālaiḥ samatāmiyāt

"मन के दुःख को बुद्धि से और शरीर के दुःख को औषधियों से नष्ट करना चाहिए। यही ज्ञान की सामर्थ्य है; मनुष्य को मूर्खों के समान नहीं बनना चाहिए।

श्लोक 19 (3.219.19)

अनिष्टसंप्रयोगाच्च विप्रयोगात्प्रियस्य च । मनुष्या मानसैर्दुःखैर्युज्यन्ते चाल्पबुद्धयः ॥

aniṣṭasaṃprayogācca viprayogātpriyasya ca | manuṣyā mānasairduḥkhairyujyante cālpabuddhayaḥ

अप्रिय के संयोग और प्रिय के वियोग से अल्पबुद्धि मनुष्य ही मानसिक दुःखों से घिर जाते हैं।

श्लोक 20 (3.219.20)

गुणैर्भूतानि युज्यन्ते वियुज्यन्ते तथैव च । सर्वाणि नैतदेकस्य शोकस्थानं हि विद्यते ॥

guṇairbhūtāni yujyante viyujyante tathaiva ca | sarvāṇi naitadekasya śokasthānaṃ hi vidyate

सभी प्राणी सुख-दुःख आदि गुणों से जुड़ते भी हैं और उसी प्रकार उनसे बिछुड़ते भी हैं। यह किसी एक का ही भाग्य नहीं है, इसलिए शोक का कोई कारण नहीं है।

श्लोक 21 (3.219.21)

अनिष्टेनान्वितं पश्यंस्तथा क्षिप्रं विरज्यते । ततश्च प्रतिकुर्वन्ति यदि पश्यन्त्युपक्रमम् ॥

aniṣṭenānvitaṃ paśyaṃstathā kṣipraṃ virajyate | tataśca pratikurvanti yadi paśyantyupakramam

किसी वस्तु को अप्रिय से जुड़ा देखकर मनुष्य शीघ्र ही उससे विरक्त हो जाता है; और यदि लोगों को कोई उपाय दिखाई दे, तो वे उसका प्रतिकार करते हैं।

श्लोक 22 (3.219.22)

शोचतो न भवेत्किंचित्केवलं परितप्यते । परित्यजन्ति ये दुःखं सुखं वाऽप्युभयं नराः ॥

śocato na bhavetkiṃcitkevalaṃ paritapyate | parityajanti ye duḥkhaṃ sukhaṃ vā'pyubhayaṃ narāḥ

शोक करने से कुछ नहीं होता, मनुष्य केवल संताप पाता है। जो मनुष्य दुःख और सुख दोनों को त्याग देते हैं —

श्लोक 23 (3.219.23)

त एव सुखमेधन्ते ज्ञानतृप्ता मनीषिणः । असंतोषपरा मूढाः संतोषं यान्ति पण्डिताः ॥

ta eva sukhamedhante jñānatṛptā manīṣiṇaḥ | asaṃtoṣaparā mūḍhāḥ saṃtoṣaṃ yānti paṇḍitāḥ

वे ही ज्ञान से तृप्त मनीषी सुख में बढ़ते हैं। मूढ़ लोग असंतोष में डूबे रहते हैं, पण्डित संतोष को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 24 (3.219.24)

असंतोषस्य नास्त्यन्तस्तुष्टिस्तु परमं सुखम् । न शोचन्ति गताध्वानः पश्यन्तः परमां गतिम् ॥

asaṃtoṣasya nāstyantastuṣṭistu paramaṃ sukham | na śocanti gatādhvānaḥ paśyantaḥ paramāṃ gatim

असंतोष का कोई अंत नहीं, संतोष ही परम सुख है। जो ज्ञान का मार्ग तय कर चुके हैं, वे परम गति को देखते हुए शोक नहीं करते।

श्लोक 25 (3.219.25)

न विषादे मनः कार्यं विषादो विषमुत्तमम् । मारयत्यकृतप्रज्ञं बालं क्रुद्ध इवोरगः ॥

na viṣāde manaḥ kāryaṃ viṣādo viṣamuttamam | mārayatyakṛtaprajñaṃ bālaṃ kruddha ivoragaḥ

मन को विषाद में न डुबोइए; विषाद सबसे घातक विष है। जैसे क्रुद्ध सर्प बालक को मार डालता है, वैसे ही वह अविवेकी मनुष्य को मार डालता है।

श्लोक 26 (3.219.26)

यं विषादोऽभिभवति विषमे समुपस्थिते । तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न विद्यते ॥

yaṃ viṣādo'bhibhavati viṣame samupasthite | tejasā tasya hīnasya puruṣārtho na vidyate

विपत्ति आने पर जिसे विषाद घेर लेता है, उसका तेज नष्ट हो जाता है, और ऐसे तेजहीन मनुष्य का कोई पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता।

श्लोक 27 (3.219.27)

अवश्यं क्रियमाणस्य कर्मणो दृश्यते फलम् । न हि निर्वेदमागम्य किंचित्प्राप्नोति शोभनम् ॥

avaśyaṃ kriyamāṇasya karmaṇo dṛśyate phalam | na hi nirvedamāgamya kiṃcitprāpnoti śobhanam

किए जाने वाले कर्म का फल अवश्य दिखाई देता है; पर निराश होकर बैठ जाने से किसी को कुछ भी शुभ प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 28 (3.219.28)

अथाप्युपायं पश्येत दुःखस्य परिमोक्षणे । अशोचन्नारभेतैव युक्तश्चाव्यसनी भवेत् ॥

athāpyupāyaṃ paśyeta duḥkhasya parimokṣaṇe | aśocannārabhetaiva yuktaścāvyasanī bhavet

बल्कि दुःख से छूटने का उपाय खोजना चाहिए, और शोक किए बिना, सावधान और व्यसनों से मुक्त रहकर कार्य आरम्भ कर देना चाहिए।

श्लोक 29 (3.219.29)

भूतेष्वभावं संचिन्त्य ये तु बुद्धेः परं गताः । न शोचन्ति कृतप्रज्ञाः पश्यन्तः परमां गतिम् ॥

bhūteṣvabhāvaṃ saṃcintya ye tu buddheḥ paraṃ gatāḥ | na śocanti kṛtaprajñāḥ paśyantaḥ paramāṃ gatim

जो प्राणियों की अनित्यता पर विचार करके बुद्धि से परे परम तत्त्व को प्राप्त हो चुके हैं, वे ज्ञानी परम गति को देखते हुए शोक नहीं करते।

श्लोक 30 (3.219.30)

न शोचामि रमे विद्वन्कालाकाङ्क्षी स्थितोस्म्यहम् । एतैर्निदर्शनैर्ब्रह्मन्नावसीदामि सत्तम ॥

na śocāmi rame vidvankālākāṅkṣī sthitosmyaham | etairnidarśanairbrahmannāvasīdāmi sattama

हे विद्वन्, मैं शोक नहीं करता, प्रसन्न रहता हूँ और अपने समय की प्रतीक्षा में स्थित हूँ। हे ब्रह्मन्, हे सज्जनश्रेष्ठ, इन उदाहरणों के कारण मैं हताश नहीं होता।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 31 (3.219.31)

कृतप्रज्ञोसि मेधावी बुद्धिश्च विपुला तव । पापान्निवृत्तोसि सदा ज्ञानवृद्धोसि धर्मवित् ॥

kṛtaprajñosi medhāvī buddhiśca vipulā tava | pāpānnivṛttosi sadā jñānavṛddhosi dharmavit

"आप प्रज्ञावान और मेधावी हैं, आपकी बुद्धि विशाल है। आप सदा पाप से दूर रहे हैं; आप ज्ञान में बढ़े हुए और धर्म के ज्ञाता हैं।

श्लोक 32 (3.219.32)

आपृच्छे त्वां स्वस्ति तेऽस्तु धर्मस्त्वां परिरक्षतु । अप्रमादस्तु कर्तव्यो धर्मे धर्मभृतांवर ॥

āpṛcche tvāṃ svasti te'stu dharmastvāṃ parirakṣatu | apramādastu kartavyo dharme dharmabhṛtāṃvara

अब मैं आपसे विदा लेता हूँ। आपका कल्याण हो, धर्म आपकी रक्षा करे। हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, धर्म में कभी प्रमाद न कीजिए।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 33 (3.219.33)

बाढमित्येव तं व्याधः कृताञ्जलिरुवाच ह । प्रदक्षिणमथो कृत्वा प्रस्थितो द्विजसत्तमः ॥

bāḍhamityeva taṃ vyādhaḥ kṛtāñjaliruvāca ha | pradakṣiṇamatho kṛtvā prasthito dvijasattamaḥ

"व्याध ने हाथ जोड़कर उनसे कहा — 'ऐसा ही हो'; और वे श्रेष्ठ ब्राह्मण उसकी प्रदक्षिणा करके चल पड़े।

श्लोक 34 (3.219.34)

स तु गत्वा द्विजः सर्वां शुश्रूषां कृतवांस्तदा । मातापितृभ्यामन्धाभ्यां यथान्यायं सुसंशितः ॥

sa tu gatvā dvijaḥ sarvāṃ śuśrūṣāṃ kṛtavāṃstadā | mātāpitṛbhyāmandhābhyāṃ yathānyāyaṃ susaṃśitaḥ

उस ब्राह्मण ने घर जाकर दृढ़ निश्चय के साथ अपने अंधे माता-पिता की यथोचित रूप से सब प्रकार की सेवा की।

श्लोक 35 (3.219.35)

एतत्ते सर्वमाख्यातं निखिलेन युधिष्ठिर । पृष्टवानसि यं तात धर्मं धर्मभृतांवर ॥

etatte sarvamākhyātaṃ nikhilena yudhiṣṭhira | pṛṣṭavānasi yaṃ tāta dharmaṃ dharmabhṛtāṃvara

हे युधिष्ठिर, हे तात, हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ, आपने जिस धर्म के विषय में पूछा था, वह सब मैंने आपको पूरा-पूरा बता दिया —

श्लोक 36 (3.219.36)

पतिव्रताया माहात्म्यं ब्राह्मणस्य च सत्तम । मातापित्रोश्च शुश्रूषा धर्मव्याधेन कीर्तिता ॥

pativratāyā māhātmyaṃ brāhmaṇasya ca sattama | mātāpitrośca śuśrūṣā dharmavyādhena kīrtitā

हे सज्जनश्रेष्ठ, पतिव्रता की और ब्राह्मण की महिमा, तथा धर्मव्याध द्वारा बताई गई माता-पिता की सेवा।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 37 (3.219.37)

अत्यद्भुतमिदं ब्रह्मन्धर्माख्यानमनुत्तमम् । सर्वधर्मविदांश्रेष्ठ कथितं मुनिसत्तम ॥

atyadbhutamidaṃ brahmandharmākhyānamanuttamam | sarvadharmavidāṃśreṣṭha kathitaṃ munisattama

"हे ब्रह्मन्, हे सब धर्मज्ञों में श्रेष्ठ, हे मुनिश्रेष्ठ, आपने यह अत्यन्त अद्भुत और अनुपम धर्म-कथा सुनाई है।

श्लोक 38 (3.219.38)

सुखश्राव्यतया विद्वन्मुहूर्त इव मे गतः । न हि तृप्तोस्मि भगवञ्शृण्वानो धर्ममुत्तमम् ॥

sukhaśrāvyatayā vidvanmuhūrta iva me gataḥ | na hi tṛptosmi bhagavañśṛṇvāno dharmamuttamam

हे विद्वन्, इसे सुनना इतना सुखद था कि यह समय मुझे एक मुहूर्त-सा बीता लगा। हे भगवन्, इस उत्तम धर्म को सुनते हुए मेरा मन नहीं भरता।"

अध्याय 218अध्याय-सूचीअध्याय 220